इन सहमे हुए शहरों की फ़ज़ा कुछ कहती है
इन सहमे हुए शहरों की फ़ज़ा कुछ कहती है कभी तुम भी सुनो ये धरती क्या कुछ कहती
General Poetry
इन सहमे हुए शहरों की फ़ज़ा कुछ कहती है कभी तुम भी सुनो ये धरती क्या कुछ कहती
जब ज़रा तेज़ हवा होती है कैसी सुनसान फ़ज़ा होती है, हम ने देखे हैं वो सन्नाटे भी
सर में जब इश्क़ का सौदा न रहा क्या कहें ज़ीस्त में क्या क्या न रहा, अब तो
कल जिन्हें ज़िंदगी थी रास बहुत आज देखा उन्हें उदास बहुत, रफ़्तगाँ का निशाँ नहीं मिलता एक रही
दर्द कम होने लगा आओ कि कुछ रात कटे ग़म की मीआ’द बढ़ा जाओ कि कुछ रात कटे,
यूँ तेरे हुस्न की तस्वीर ग़ज़ल में आए जैसे बिल्क़ीस सुलेमाँ के महल में आए, जब्र से एक
तेरे मिलने को बेकल हो गए हैं मगर ये लोग पागल हो गए हैं, बहारें ले के आए
कब तलक मुद्दआ कहे कोई न सुनो तुम तो क्या कहे कोई ? ग़ैरत ए इश्क़ को क़ुबूल
अव्वलीं चाँद ने क्या बात सुझाई मुझ को याद आई तेरी अंगुश्त ए हिनाई मुझ को, सर ए
कुछ तो एहसास ए ज़ियाँ था पहले दिल का ये हाल कहाँ था पहले, अब तो झोंके से