सूरज उस के घर की कोई खिड़की है

sooraj us ke ghar kee koi khidaki hai

सूरज उस के घर की कोई खिड़की है सुब्ह खुले तो शाम को बँद हो जाती है, नस्ल

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए

hum ne kab chaha ki wo shakhs humara ho jaaye

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो

एक छोटा सा ख़्वाब था जो पूरा नहीं हुआ

ek chhota saa khwab tha jo poora nahin hua

एक छोटा सा ख़्वाब था जो पूरा नहीं हुआ वो शख्स मेरा हो कर भी मेरा नहीं हुआ,

दार ओ रसन पे हर कोई मंसूर तो नहीं

daar o rasan pe har koi mansoor to nahin

दार ओ रसन पे हर कोई मंसूर तो नहीं झुलसे हुए पहाड़ सभी तूर तो नहीं, ईसा नफ़स

भटकता हूँ मगर खोया नहीं हूँ

bhatakta hoon magar khoya nahi hoon

भटकता हूँ मगर खोया नहीं हूँ बनाई राह पे चलता नहीं हूँ, मुझे रंगने की कोशिश मत करो

वस्ल की आख़िरी मंज़िल है फ़ना हो जाना

vasl kee aakhiri manzil hai fana ho jaana

वस्ल की आख़िरी मंज़िल है फ़ना हो जाना तुझ से मिल कर तेरे बंदे का ख़ुदा हो जाना,

अपना तुम्हें बनाना था कह कर बना लिया

apna tumhen banana tha kah kar bana liya

अपना तुम्हें बनाना था कह कर बना लिया तर्ज़ ए वफ़ा का एक नया दफ़्तर बना लिया, दुनिया

मुझे यक़ीं है कोई रास्ता तो निकलेगा

mujhe yaqeen hai koi raasta to nikalega

मुझे यक़ीं है कोई रास्ता तो निकलेगा अगर जो कुछ नहीं निकला ख़ुदा तो निकलेगा, मैं रेगज़ारों में

रस्सी तो जल गई मगर ऐंठन नहीं गई

rassi to jal gayi magar aiethan nahi gayi

रस्सी तो जल गई मगर ऐंठन नहीं गई चाहत तुम्हारी यूँ दम ए कुश्तन नहीं गई, तुम चाहते

बढ़ कर किसी से हाथ मिलाने नहीं गए

badh kar kisi se haath milaane nahi gaye

बढ़ कर किसी से हाथ मिलाने नहीं गए तेवर वही हैं अब भी पुराने नहीं गए, दालान अपनी