ज़र्द मौसम के एक शजर जैसी

zard mausam ke ek sazar jaisi

ज़र्द मौसम के एक शजर जैसी सारी बस्ती है मेरे घर जैसी, जब बिगड़ता है वक़्त इंसाँ का

ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में

khatm hai baadal ki jab se

ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में आग होती जा रही है ज़िंदगानी धूप में, चाँद

एक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ

ek haveli hoon us

एक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ ख़ुद ही आँगन ख़ुद ही शजर भी हूँ, अपनी मस्ती

कुछ ज़रूरत से कम किया गया है

kuch zarurat se kam

कुछ ज़रूरत से कम किया गया है तेरे जाने का ग़म किया गया है, ता क़यामत हरे भरे

ज़ौक़ ए गुनाह ओ अज़्म ए पशेमाँ लिए हुए

zauq e gunah o

ज़ौक़ ए गुनाह ओ अज़्म ए पशेमाँ लिए हुए क्या क्या हुनर हैं हज़रत ए इंसाँ लिए हुए,

जुदाई रूह को जब इश्तिआल देती है

judaai rooh ko jab

जुदाई रूह को जब इश्तिआल देती है ख़ुनुक हवा भी बदन को उबाल देती है, अगर हो वक़्त

दिल है सहरा से कुछ उदास बहुत

dil hai sahra se

दिल है सहरा से कुछ उदास बहुत घर को वीराँ करूँ तो घास बहुत, रोब पड़ जाए इस

अब रहा क्या जो लुटाना रह गया

ab raha kya jo

अब रहा क्या जो लुटाना रह गया ज़िंदगी का एक ताना रह गया, एक तअल्लुक़ जिन से था

एक लम्हा कि मिलें सारे ज़माने जिसमें

ek lamha ki mile

एक लम्हा कि मिलें सारे ज़माने जिसमें एक नुक्ता सभी हिकमत के ख़ज़ाने जिसमें, दायरा जिसमें समा जाएँ

सूखी ज़मीं को याद के बादल भिगो गए

sookhi zamin ko yaad

सूखी ज़मीं को याद के बादल भिगो गए पलकों को आज बीते हुए पल भिगो गए, आँसू फ़लक