# Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari > A huge collection of selected Ghazals of famous Hindi and Urdu poets. ## Posts - [मैंने तुम्हे कितना सोचा ज़रीन कभी सोचा तुमने..](https://bazmeshayari.com/maine-tumhe-kitna-socha/): इश्क़ सहरा है कि दरियाँ कभी सोचा तुमनेतुझसे क्या है मेरा नाता कभी सोचा तुमने ? हाँ मैं तन्हा हूँ ये इक़रार भी करता हूँमगर किसने किया है तन्हा कभी सोचा तुमने ? ये अलग बात है कि जताया नहीं मैंने तुझकोवरना कितना तुझको है चाहा कभी सोचा तुमने ? तुझे आवाज़ लिखा, फूल लिखा, प्यार लिखामैंने क्या क्या तुझे लिखा कभी सोचा तुमने ? मुतमअईन हूँ तुझे लफ्ज़ो की हरारत दे करमैंने तुम्हे कितना सोचा ज़रीन कभी सोचा तुमने ?? - [हम शज़र से नहीं साये से वफ़ा करते है...](https://bazmeshayari.com/shazar-se-nahi-saye-se/): हम शज़र से नहीं साये से वफ़ा करते हैयही है वजह कि हम लोग दगा करते है, हम परिंदे है हमें क़ैद में रखना वरनापर निकलते ही हवाओ में उड़ा करते है, अपनी तक़दीर भी है रास्तो से मिलती जुलतीकिसी तक दो से बिछड़ने को मिला करते है, हमको मालूम तो होती है हकीक़त लेकिनयार जो भी कहे सच मान लिया करते है, ज़िन्दगी हम कहाँ जीते है ये जीती है हमेंहम तो बस गर्दिश ए अय्याम जिया करते है, कितनी ख्वाहिश थी तुझे ज़ीस्त मनाया जाएऔर मनाने में तुझे और खफ़ा करते है, हक़ यही है कि जिए और - [वो दौर और था वो महबूबा और थी...](https://bazmeshayari.com/wo-daur-aur-tha/): वो दौर और था वो महबूबा और थीजिनके आशिको को इश्क़ में मुक़ाम मिला है ये दौर और है ये महबूबा और हैजिनके आशिको को फ़क़त इल्ज़ाम मिला है, लिखना मेरी मज़ार के खुतबे पे ये हुरुफ़मरहूम को किसी के चाहने का इनाम मिला है..!! - [कल यूँ ही तेरा तज़किरा निकला...](https://bazmeshayari.com/kal-yun-hi-jo-tera/): कल यूँ ही तेरा तज़किरा निकलाफिर जो यादो का सिलसिला निकलालोग कब कब के आशना निकलेवक़्त कितना गुरेज़ पा निकलाइश्क़ में भी सियासते निकलीकुर्बतो में भी फ़ासला निकलारात भी आज बेक़रां निकलीचाँद भी आज ग़मज़दा निकलासुनते आये थे किस्से मज़नू केआप जो देखा तो वाकया निकलाहमने माना वो बेवफ़ा ही सहीक्या करोगे जो बा वफ़ा निकलामुख़्तसर थी फ़िराक की घड़ियाँफिर लेकिन हिसाब का निकला..!! - [आँख से फिर न बहेगा दिल ए बर्बाद का दुःख...](https://bazmeshayari.com/aankh-se-fir-na-bahega/): आँख से फिर न बहेगा दिल ए बर्बाद का दुःखजब परीजाद समझ लेगी अनाज़ाद का दुःख याद करता हूँ तो तार ए रग ए जान टूटती हैमार डालेगा किसी रोज़ तेरी याद का दुःख तख़्त ए परवेज़ से वाबस्ता था सुख शिरीन काकैसे कर सकती थी महसूस वो फ़रहाद का दुःख ? नस्ल दर नस्ल दुखो को किया तकसीम मगरखत्म होने को नहीं आता है अज़दाद का दुःख..!! - [लम्हे लम्हे के सियासत पर नज़र रखते है](https://bazmeshayari.com/lamhe-lamhe-ke-siyasat/): लम्हे लम्हे के सियासत पर नज़र रखते हैहमसे दीवाने भी दुनियाँ की ख़बर रखते है इतने नादान भी नहीं हम कि भटक कर रह जाएनिगाहों में कोई मंज़िल ना सही रहगुज़र रखते है मार ही डाले बेमौत ये दुनियाँ वालेअगर हम ज़िन्दा है तो जीने का हुनर रखते है इस क़दर हमसे तगाफुल ना बरतिए साहब !हम कुछ अपने दुआओं में भी असर रखते है..!! - [बहुत रोया वो हमको याद कर के...](https://bazmeshayari.com/bahut-roya-wo-hamko/): बहुत रोया वो हमको याद कर केहमारी ज़िन्दगी बर्बाद कर के, पलट कर फिर यही आ जाएँगे हमवो देखे तो हमें आज़ाद कर के, रिहाई की कोई सूरत नहीं हैमगर हाँ मिन्नत ए सैयाद कर के, बदन मेरा छुआ था उसने लेकिनगया है रूह को आबाद कर के, हर आमिर तूल देना चाहता हैमुक़र्रर ज़ुल्म की मियाद कर के - [तलाश अपना मैं नाम करूँ...](https://bazmeshayari.com/talash-apna-main-naam/): किसी रोज़ शाम के वक़्तसूरज के आराम के वक़्तमिल जाए जो साथ तेराहाथ में ले कर हाथ तेरादूर किसी तन्हाई मेंदुनियाँ से जुदाई मेंअपने संग बैठाऊँ तुझेदिल का हाल सुनाऊँ तुझेतेरी इज्ज़त ओ एहतराम करूँतेरे हाथो की लकीरों मेंतलाश मैं अपना नाम करूँ…. - [ख़ुदा गारत करे ऐसे वतन के दुश्मन को...](https://bazmeshayari.com/khuda-garat-kare-aise/): जिसको देखो वही इक्तिदार चाहता हैयार चाहता है प्रोटोकॉल मर्ज़ी का, हर कोई चाहता है बनना सियासतदाँसियासत की आड़ में कारोबार चाहता है, उसको क्या गरज़ कोई जिये या मरेवो बस अपना घर गुलज़ार चाहता है, विदेशी मुल्कों के दौरे कौमी खज़ाने परबस हर सूरत मुल्क को लूटना यार चाहता है, ख़ुदा गारत करे ऐसे वतन के दुश्मन कोजो पूरे करने अपने शौक हज़ार चाहता है..!! - [जो मैं भी रूठा तो सुबह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी](https://bazmeshayari.com/jo-main-rutha-to/): ये लाल डिबिया में जो पड़ी है वो मुँह दिखाई पड़ी रहेगीजो मैं भी रूठा तो सुबह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी न तू ने पहने जो अपने हाथों में मेरी इन उँगलियों के कंगनतो सोच ले कितनी सूनी सूनी तेरी कलाई पड़ी रहेगी हमारे घर से यूँ भाग जाने पे क्या बनेगा मैं सोचता हूँमोहल्ले भर में कई महीनों तलक दहाई पड़ी रहेगी जहाँ पे कप के किनारे पर एक लिपस्टिक का निशान होगावहीं पे एक दो क़दम की दूरी पे एक टाई पड़ी रहेगी हर एक खाने से पहले झगड़ा खिलाएगा कौन पहले लुक़्माहमारे घर में तो - [तेरे उकताते हुए लम्स से महसूस हुआ...](https://bazmeshayari.com/bichhadne-ka-waqt-hua/): तेरे उकताते हुए लम्स से महसूस हुआअब बिछड़ने का तेरे वक़्त हुआ चाहता है, अजनबियत तेरे लहज़े की पता देती हैतू खफ़ा है तो नहीं, हाँ पर होना चाहती है, मेरी तोहमत न लगे तुझ पे सो मैं दूर हुआमुझसे बढ़कर तेरा अब कौन भला चाहता है, मैं कि ख़ुद को भी कोई फैज़ कभी दे न सकाऔर तू है कि फ़क़त मुझसे सिला चाहती है, तू मुझसे रोज़ मिले, मिलता रहे, मिलता रहेमैं कहूँ या न कहूँ दिल तो मेरा चाहता है, तू तो मुझ तालिब ए गम शख्स पे हैरान न होदिल बड़ा है ना, सो ये गम - [इससे पहले कि कोई इनको चुरा ले](https://bazmeshayari.com/isse-pahle-ki-koi/): इससे पहले कि कोई इनको चुरा ले, गिन लोतुमने जो दर्द किये मेरे हवाले, गिन लो चल के आया हूँ, उठा कर नहीं लाया गया मैंकोई शक है तो मेरे पाँव के छाले गिन लो जब मैं आया तो अकेला था, गिना था तुमनेआज हर सिम्त मेरे चाहने वाले गिन लो मकड़ियो ! घर की सफाई का समय आ पहुँचाआख़िरी बार दर ओ बाम के जाले गिन लो ज़ख्म गिनने है अगर मेरे बदन के याराँ !तुमने जो संग मेरी सिम्त उछाले गिन लो ख़ुद ही फिर फ़ैसला करना कि अभी दिन है कि रातशौक से गिन लो अँधेरे, फिर - [किसी ने ज़िस्म, किसी ने ज़मीर बेचा है](https://bazmeshayari.com/kisi-ne-jism-kisi-ne-zamir/): हरीस दिल ने ज़माना कसीर बेचा हैकिसी ने ज़िस्म, किसी ने ज़मीर बेचा है, नहीं रही बशरियत की खूबी इन्सान मेंअसास ए इंसा का सबने ख़मीर बेचा है, इरम भी न मिली जिसके हसूल की खातिरसमझ कर ईमान को सबने हक़ीर बेचा है, बस एक ओहदे की खातिर अमीर ए लश्कर नेमुखालिफिन को एक एक तीर बेचा है, बुज़ुर्ग के हुआ फैजान का यहाँ सौदाकि पैरोकारो ने अपना ही पीर बेचा है..!! - [मेरा नहीं तो वो अपना ही कुछ ख्याल करे](https://bazmeshayari.com/mera-nahi-to-apna-hi/): मेरा नहीं तो वो अपना ही कुछ ख्याल करेउसे कहो कि ताअल्लुक़ को फिर बहाल करे मिले तो इतनी रियायत अता करे मुझ परमेरे जवाब को सुन कर कोई सवाल करे क़लाम कर कि मेरे लफ्ज़ को सहूलत होतेरा सकूत मेरी गुफ़्तगू मुहाल करे न गुज़रे वक़्त का पूछे न आने वाले काकोई सवाल करे भी तो हसब हाल करे वो होंठ हो कि तबस्सुम, सकूत हो कि सुखनतेरा ज़माल हर एक रंग में कमाल करे बुलंदियों पे कहाँ तक तुझे तलाश करूँहर एक साँस पे उम्र ए रवां ज़वाल करे निगाह ए यार न हो तो निखर नहीं पाताकोई - [मुझे ख़बर नहीं कितने ख़सारे रखे गए](https://bazmeshayari.com/mujhe-khabar-nahi-kitne-sahare/): मुझे ख़बर नहीं कितने ख़सारे रखे गएमेरे नसीब में सब गम तुम्हारे रखे गए हमारे साथ मुहब्बत में इतना ज़ुल्म हुआहमारी आँख में जलते अंगारे रखे गए मैं कह चुका था मुझे तैरना नहीं आताबहुत ही दूर तभी तो किनारे रखे गए किसी से ख़ास तआल्लुक़ तो फिर बना ही नहींतुम्हारे बाद तो वक्ती गुज़ारे रखे गए किसी की आँख तरसती रही उजाले कोकिसी की आँख में सारे नज़ारे रखे गए हम ऐसे लोग मुहब्बत का आसरा थे मगरहमारे वास्ते झूठे सहारे रखे गए..!! - [हाँ, ये ही मुहब्बत है , मुहब्बत एक हकीक़त है...](https://bazmeshayari.com/haan-ye-hi-muhabbat-hai/): मैं रूठा था मुहब्बत सेकि मुहब्बत कुछ नहीं होती, मुहब्बत तो फ़क़त दिखवा हैकि मुहब्बत झूठ है लोगो, मुहब्बत सिर्फ़ एक कहानी हैजो किताबो में ही मिलती है, मुहब्बत एक अफ़साना हैमगर जबसे ये जाना है कि… हकीक़त और होती हैदिखावा और होता है, मुहब्बत और होती है, कि एक अंजान को रस्ताबताया जा भी सकता है, मगर उसे मंज़िल तकपहुँचाना ही मुहब्बत है, कि एक ग़रीब के बच्चो कोदुआ दी भी जा सकती है, मगर उन्हें कुछ अच्छाखिलाना ही मुहब्बत है, कि एक मज़दूर को उसकीमज़दूरी दे देना भी काफ़ी है, मगर उससे रवैया अपनाअच्छा रखना ही मुहब्बत है, - [मेरी हो के भी तुम मेरी नहीं....](https://bazmeshayari.com/meri-ho-ke-bhi-tum-meri-nahi/): मेरी हो के भी तुम मेरी नहींगिला तो नहीं पर ये मलाल है, अगरचे मेरे पास तुम नहीं मगरआस पास यही कही तुम हो कुछ तुम ही समझा दो दिल कोये कमाल कैसा कमाल है ! अज़ीब सी एक कशमकश है दिल मेंये ना हिज़्र है ना विसाल है..!! - [जिनकी सूरत पे तुम्हारा सारा शहर मरता है...](https://bazmeshayari.com/shayri-on-surat-in-hindi/): ये जो बात बात में उन हसीन आँखों की बात करते होवो उन आँखों में हमारा अक्स रखते है, और ये जिनके ख़्वाब तुम्हारी आँखों में है नवो अपने ख़्वाबो में हमें आदाब करते है, जिनके सामने आने पर तुम्हारी निगाह नहीं हटतीवो मुस्कुरा के लम्हों तक हमें ही तकते है, जिनकी सूरत पर तुम्हारा सारा शहर मरता हैवो है जो फ़क़त एक हम ही पे मरते है, जिनके इंतज़ार में तुम एक मुद्दत से जाग रहे होवो तो आँखों से मुन्तज़िर हमारे लगते है, जिनके क़सीदे सुनाते सुनाते तुम नहीं थकतेसुना है वो हर वक़्त हमारी ही बात करते - [ताअज्ज़ुब है अँधे आईना दिखा रहे है...](https://bazmeshayari.com/andhe-aaina-dikha-rahe-hai-shayri-in-hindi/): मुझ में है खामियाँ मुज़रिम बता रहे हैताअज्ज़ुब है अँधे आईना दिखा रहे है, ज़ुल्म तो ये है कि खेल कूद की उम्रो मेंहमारे बच्चे बस्तों का बोझ उठा रहे है, उसमे भी है कशिश शक्ल ए ज़मीं जैसीहम उसकी ही ज़ानिब खीचे जा रहे है, कुछ लोग नमाज़ अदा करने के बादअपने ही हमसायों की दीवारे गिरा रहे है, अब भी कम शनास है अहल ए वतनपत्थर की खातिर लोग हीरे गँवा रहे है..!! - [तू कर ले नज़र अंदाज़ अभी अपने अंदाज़ में](https://bazmeshayari.com/kar-le-nazar-andaz/): तू कर ले नज़र अंदाज़ अभी अपने अंदाज़ मेंहम हँसते हुए तेरे ज़ुल्म ओ सितम सह जाएँगे, मगर रखना याद जिस दिन इस दुनियाँ से जाएँगेवो मिसाल ए वफ़ा, खुशी और प्यार छोड़ जाएँगे, जब कभी भी तुम करोगी याद इस दीवाने कोतो हँसती हुई आँखों में से भी आँसू निकल आएँगे..!! - [जब मुझको सब क़ुबूल था, तुम क्यों चले गए ?](https://bazmeshayari.com/jab-sab-qubool-tha/): ये भी कोई उसूल था ? तुम क्यों चले गए ?जब मुझको सब क़ुबूल था, तुम क्यों चले गए ? कुछ देर पास बैठते, करते ना कोई बातमैं किस क़दर मलूल था, तुम क्यों चले गए ? ख़ुद पर मलाल किस लिए ? पछतावा किस लिए ?क्या मैं तुम्हारी भूल था ? तुम क्यों चले गए ? खुशियाँ समेटने ही तलक मेरे साथ थेजब दर्द का नज़ूल था, तुम क्यों चले गए ? दुनियाँ में सिर्फ एक तुम्हारे सिवा तो कुछहासिल था ना वसूल था, तुम क्यों चले गए ? सच में तुम्हारी ज़ीस्त में कुछ भी नहीं थायानि बहुत - [हसीन रुत में...उदास क्यों हो ?](https://bazmeshayari.com/shayri-udas-kyo-ho/): हसीन रुत में गुलाब चेहरोंमुझे बताओ उदास क्यों हो ? दिलो पे बीती हुई कहानीमुझे सुनाओ उदास क्यों हो ? जो रंज़िशे दिल में पल रही हैमुनाफिक़त में जो ढल रही हैभूला के शिकवे मिटा के दूरीगले लगाओ उदास क्यों हो ? क़िताब ए दिल के हर सफ़हे पेलिखा है हमने लफ्ज़ ए मुहब्बतहमें हमारी वफ़ा के बदलेसज़ा सुनाओ उदास क्यों हो ? फ़रेब खाना भी मशगला हैफ़रेब देना भी मशगला हैतो दिल के लुटने पे कैसा मातमख़ुशी मनाओ उदास क्यों हो ?? - [सवाल है कि उसको ऐतबार क्यों नहीं रहा ?](https://bazmeshayari.com/shayri-on-aetbar-in-hind/): सवाल ये नहीं कि वो पुकार क्यों नहीं रहासवाल है कि उसको ऐतबार क्यों नहीं रहा ? ये कौन इर्द गिर्द नफरतो के जाल बुन गया ?हमारे आस पास तेरा प्यार क्यों नहीं रहा ? किसे बताऊँ इंतज़ार ए मौत भी नहीं मुझे !किसे बताऊँ ज़िन्दगी गुज़ार क्यों नहीं रहा ? वो सब के सब गिले कहो कहाँ पे भूल आये हो ?तुम्हारी आँख में वो इंतज़ार क्यों नहीं रहा ? ख्याल एक ख्याल वो जो बस तेरा ख्याल था !न जाने अब वो ज़ेहन पर सवाल क्यों नहीं रहा ? चमक है माल ओ ज़र की ! जिसपे गर्द - [शायद समझ ही न पाए ज़माना मुहब्बत..](https://bazmeshayari.com/shayad-samjh-hi-na-paye/): हकीक़त है या फ़साना मुहब्बतपतंगे का ख़ुद को जलाना मुहब्बत जो तारीफ़ ए फ़रहाद शिरीन से पूछेतो बोली है वो बस दीवाना मुहब्बत मुहब्बत का रब से जो तुमको है दावाबताओ है क्या सूद खाना मुहब्बत ? फ़िदा कर्बला में की शब्बीर ने जानफ़क़त क्या है आँसू बहाना मुहब्बत ? दिलो से है होते मुहब्बत के सौदेकिसी को नहीं आज़माना मुहब्बत मुहब्बत है करनी तो खुल के करो नानहीं हमसे नज़रे चुराना मुहब्बत क्या लौटने का जो वायदा है रब सेबशर ! इसको है भूल जाना मुहब्बत ? है उल्फ़त एक पाक़ जज़्बे का नामशायद समझ ही न पाए ज़माना - [जवाब उसका नहीं है कोई लाज़वाब है वो](https://bazmeshayari.com/khubsurati-shayri-in-hindi/): ग़ज़ल का हुस्न और गीत का शबाब है वोनशा है जिसमे सुखन का वही शराब है वो उसे न देख एक महकता हुआ गुलाब है वोतन्हा ही कितनी निगाहों का इंतेखाब है वो मिसाल मिल न सकी कायनात में उसकीजवाब उसका नहीं है कोई लाज़वाब है वो मेरी इन आँखों को ताबीर मिल नहीं पातीजिसे मैं देखता रहता हूँ ऐसा एक ख़्वाब है वो न जाने कितने हिज़ाबो में छुपा है वो मगरनिगाह ए दिल से जो देखूँ तो बेहिज़ाब है वो वो आया है पूछने मुझसे हाल मेरा मगर मैं कैसे बताऊँ कि सुकुन ए दिल में इज़्तिराब है - [ऐसा कोई लम्हा होता जिसमे तन्हा होते हम !](https://bazmeshayari.com/aisa-koi-lamha-hota/): ऐसा कोई लम्हा होता जिसमे तन्हा होते हमचुपके चुपके करते बातें यूँ न रुसवा होते हम, पूरा हर के सपना होता दुनियाँ में अपना भीजहा चाहते वहाँ मिल लेते तोता मैना होते हम, हर वक़्त ख्याल तुम्हारा यादे तुम्हारी होती हैयाद यूँ जो रब को करते सबसे आला होते हम, दिन से शब तक कहते तेरी यादो के सिवाकाश ! चाँद सूरज सितारे दुनियाँ में न होते हम, दीद तेरी होती हरदम फिर न यादो में तेरीबरखा बन कर बरसे होते दरियाँ दरियाँ होते हम, बहते अश्को के किनारे मुझसे मिल कर किसी नेहै बताया इससे बेहतर था कि तन्हा - [हजारो बार सोचोगे हमें तहरीर करने तक](https://bazmeshayari.com/shayri-on-tahrir/): हमें दरियाफ़त करने से हमें तसखीर करने तकबहुत है मरहले बाक़ी, हमें जंज़ीर करने तक, हमारे हिज़्र के किस्से, समेटोगे तो लिखोगेहज़ारों बार सोचोगे, हमें तहरीर करने तक, हमारा दिल है पैमाना, सो पैमाना तो छलकेगाचलो दो घूँट तुम भर लो, हमें तासीर करने तक, पुराने रंग छोड़ो आँख के, एक रंग ही काफ़ी हैमुहब्बत से चश्म भर लो, हमें तस्वीर होने तक, हुनर तकमील से पहले, मसूर भी छुपाता हैज़रा तुम भी छुपा रखो, हमें तामीर करने तक, वो हमको रोज़ लुटते है, अदाओं से बहानो सेख़ुदा रखे ! सलामत उन्हें हमें फ़कीर होने तक - [दोस्तों को आँसूओ का तोहफ़ा मत देना](https://bazmeshayari.com/dosti-shayri-in-hindi/): गर करो जहाँ में किसी से भी दोस्तीतो फिर ताउम्र उसको धोखा मत देना, खिला कर लबो पर वादी ए तबस्सुमदोस्तों को आँसूओ का तोहफ़ा मत देना, दूर इतना ना होना कि रोये याद कर केदोस्तों को शिकवा का मौका मत देना..!! - [गैरो में तुमने मुझको अपना कहा शुक्रिया](https://bazmeshayari.com/shayri-on-dosti-in-hindi-3/): दुनियाँ के फ़िक्र ओ गम से आज़ाद किया शुक्रियाऐ दोस्त ! तेरा और तेरी दोस्ती का शुक्रिया , तेरी महफ़िल में मेरा ज़िक्र हुआ आज शुक्रियामुझे भी वाह तुमने याद किया आज शुक्रिया, तुम मुझसे दूर रह कर गैरो के न हुएगैरो में तुमने मुझको अपना कहा शुक्रिया, तुमने सजा लिया है लेकिन अभी न देखनाअपनी निगाहों में हमारा अक्स शुक्रिया, हम सोचते रहे कहे या कि न कहेइस नज़र ए इनायत का एक बार शुक्रिया, सुखनवर तेरा जवाब नहीं अहल ए क़लम मेंकहना आसान कर दिया दिल का पयाम शुक्रिया..!! - [ऐ दोस्त ! तूने दोस्ती का हक़ अदा किया](https://bazmeshayari.com/shayri-on-dosti-in-hindi-2/): ऐ दोस्त तूने दोस्ती का हक़ अदा कियाअपनी ख़ुशी लुटा कर मेरा गम घटा दिया, कहने को तो अपने है जहाँ में बहुत मगरअपनों ने मुझे दर से दरबदर करा दिया, लड़ता रहा दुनियाँ से अपनों के लिए मैंअपनों ने तो वफ़ा का मुझे ये सिला दिया, बड़े अरसे दराज़ के बाद गम हुआ था कमहँसना अभी सीखा था कि फिर से रुला दिया, मन की लगी हुई आग बुझी थी अभी अभीकुछ देर ही गुज़री थी कि घर भी जला दिया..!! - [मुहब्बत सीप का मोती, बहर की पैकरानी है](https://bazmeshayari.com/muhabbat-shayri-in-hindi/): कौन कहता है मुहब्बत बस एक कहानी हैमुहब्बत तो सहीफ़ा है, मुहब्बत आसमानी है, मुहब्बत को खुदारा तुम कभी भी झूठ न समझोमुहब्बत मोअजज़ा है मोअजज़ो की तर्ज़ुमानी है, मुहब्बत फूल की ख़ुशबू मुहब्बत तितलियों का रंगमुहब्बत पर्वतो की झील का शफ्फाक़ पानी है, मुहब्बत एक सितारा है, वफ़ा का इस्तआरा हैमुहब्बत सीप का मोती, बहर की पैकरानी है, ज़मीं वालो बताओ किस तरह समझे मुहब्बत कोमुहब्बत तो ज़मीं पर आसमानों की निशानी है, मुहब्बत रौशनी है, रंग है, ख़ुशबू है, नगमा हैमुहब्बत उड़ता पंक्षी है, मुहब्बत बहता पानी है, मुहब्बत माँओ का आँचल, मुहब्बत भाई की चाहतमुहब्बत खेलता बच्चा - [हमारे मुल्क में तमाशे अज़ीब हो रहे है](https://bazmeshayari.com/siyasat-shayri-in-hindi/): हमारे मुल्क में तमाशे अज़ीब हो रहे हैअमीर और अमीर, ग़रीब और ग़रीब हो रहे है, मुल्क की खातिर ना अहल ए वतन की खातिरदुश्मन ए जाँ एक दूसरे के क़रीब हो रहे है, शाद है वो सब जो डॉलर्स में खेलते हैबुरे हम अहल ए वतन के मगर नसीब हो रहे है, गिले शिकवे सब भूला कर शेर ओ शुकर हुए हैहम जिनकी खातिर एक दूसरे के रकीब हो रहे है, कब, कैसे और कौन बदलेगा मेरे मुल्क की तक़दीरहालात देख कर अश्क ख़ूँ के दिल से शकीब हो रहे है..!! - [दोस्ती में कहाँ कोई उसूल होता है](https://bazmeshayari.com/shayri-on-dosti-in-hindi/): सच्ची दोस्ती में कहाँ कोई उसूल होता हैयार गरीब हो या अमीर बेशक़ क़ुबूल होता है गरज़ नहीं मुझे कि वो खूबसूरत है या बदसूरतदोस्ती में कहाँ कोई लायक कोई फ़िज़ूल होता है आँख नम होने से पहले हाल ए दिल जान लेवही दोस्त हक़ ए दोस्ती का महसूल होता है..!! - [वक़्त काटना उससे पूछो हिज़्र में जिसकी गुज़री है](https://bazmeshayari.com/hizr-me-jiski-guzri-hai/): दर्द ए दिल के कम होने का तन्हा कुछ सामान हुआहम भी अब कुछ दिन जी लेंगे इसका भी इम्कान हुआ, एक दीये की लौ ने सारा शहर जला कर खाक़ कियाएक हवा का झोंका बन कर आँधी और तूफान हुआ, आरज़ूओ की नीची साँस ने इस दर पे दस्तक दीऔर जूनूं का एक एक लम्हा मेरे घर का मेहमान हुआ, वक़्त का काटना उससे पूछो हिज़्र में जिसकी गुज़री होएक एक लम्हा एक सदी था कब हम पर आसान हुआ, कोई किसी का मीत नहीं है दुनियाँ कहती आई हैहमने जिसको अपना जाना वक़्त पे वो भी अंजान हुआ, - [समंदर और साहिल प्यास की ज़िन्दा अलामत है](https://bazmeshayari.com/samandar-aur-sahil/): तुम्हारा मुन्तज़िर हूँ तो हज़ारों घर बनाता हूँवो रस्ते बनते जाते है कुछ इतने दर बनाता हूँ, जो सारा दिन मेरे ख़्वाबो को रेज़ा रेज़ा करते हैमैं उन लम्हों को सी कर रात का बिस्तर बनाता हूँ, हमारे दौर में रक्कासा के पाँव नहीं होतेअधूरे ज़िस्म लिखता हूँ खामिदा सर बनाता हूँ, समंदर और साहिल प्यास की ज़िन्दा अलामत हैउन्हें मैं तिश्नगी की हद को भी छू कर बनाता हूँ, मेरे जज्बो को लफ्ज़ो की बंदिश मार देती हैकिसी से क्या कहूँ क्या ज़ात के अन्दर बनाता हूँ..!! - [ऐसा शज़र ए बख्त सूख ही जाए तो बेहतर है,](https://bazmeshayari.com/shayri-on-bewafai-in-hindi-2/): सेहरा में साया तलक ना दे सके मुसाफ़िर को ऐसा शज़र ए बख्त सूख ही जाए तो बेहतर है, दिल की लगी को दिल्लगी समझे गर इश्क़ वाले ऐसे दिलरुबा से तअल्लुक़ भुलाए तो बेहतर है, पत्थर पे लिखी लकीर मिट जाए तो बेहतर हैज़फ़ा ए संगदिल हरगिज़ याद न आए तो बेहतर है, कागज़ पे लिखे लफ्ज़ जल भी जाए तो बेहतर हैकिसी बेवफ़ा को दिल से भुलाए तो बेहतर है, क्यों वक़्त को किसी के लिए बर्बाद करे हम ?इस हाल को ना फिर माज़ी बनाये तो बेहतर है..!! - [तेरे शहर वाले मेरा मौज़ू ए सुखन जानते है](https://bazmeshayari.com/mauzu-e-sukhan/): तू गज़ल ओढ़ के निकले कि धनक ओट छुपेलोग जिस रूप में देखे तुझे पहचानते है, यार तो यार है, अग्यार भी अब महफ़िल मेंमैं तेरा ज़िक्र न छेडूँ तो बुरा मानते है, कितने लहजों के गिलाफो में छुपाऊँ तुझको ?तेरे शहर वाले मेरा मौज़ू ए सुखन जानते है..!! - [कोई रब से नहीं माँगता](https://bazmeshayari.com/shayari-on-life-in-hindi/): है आशना भी अज़नबीनफरतो की आड़ में, सब की ज़िन्दगी है रवां दवांख़ुदगर्ज़ियो के मदार में, कोई मंज़िलो से है बेख़बरकोई रास्तो में भटक रहा, कोई रब से नहीं माँगताया तड़प नहीं है पुकार में, जो लिखा हुआ वही पा रहाना गुरुर कर किसी बात पर, तेरा फूलो से गुज़र हुआमैं चल रहा हूँ ख़ार में, तू शुक्र कर हर हाल मेंये क़ुदरत के है फ़ैसले, कोई सेर हुआ खिज़ा में भीकोई उजड़ गया बहार में, चार दिन की ज़िन्दगीहमने रब को भूला कर गुज़ार दी, कुछ हसरतो में गुज़र गईकुछ कट रही इंतज़ार में, - [मैं अक्सर भूल जाता हूँ](https://bazmeshayari.com/hindi-shayri-on-main-aksar-bhool-jata-hoo/): मैं अक्सर भूल जाता हूँ…. कहाँ ख़ामोश रहना थाकहाँ शिकवा न करना थाकहाँ ज़ुमला न कसना थाकहाँ हरगिज़ न हँसना थाकहाँ न सर उठाना थाकहाँ गुस्सा दबाना थाकहाँ रिश्ता बचाना थाकहाँ पे हार जाना थाकहाँ बस मुस्कुराना थाकहाँ सब भूल जाना थाकहाँ नज़रे झुकाना थाकहाँ सोचे छुपानी थीकहाँ पर माफ़ करना थाकहाँ दिल साफ़ रखना थाकहाँ न ज़िद्द लगानी थीकहाँ चाहत दिखानी थीकहाँ हिम्मत बढ़ानी थीकहाँ नेकी कमानी थी वक़्त जब बीत जाता हैमुझे सब याद आता हैहर एक लम्हा, हर एक चेहरासबक़ एक दे कर जाता हैमगर मैं क्या करूँ अपना ?मैं कुँजी सब्र की रख केकही पर भूल - [समुंदरों के लिए सीपियाँ बनाते थे](https://bazmeshayari.com/shayari-on-humanity-in-hindi/): अजीब लोग थे वो तितलियाँ बनाते थेसमुंदरों के लिए सीपियाँ बनाते थे वही बनाते थे लोहे को तोड़ कर तालाफिर उस के बा’द वही चाबियाँ बनाते थे मेरे क़बीले में ता’लीम का रिवाज न थामेरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे फ़ुज़ूल वक़्त में वो सारे शीशागर मिल करसुहागनों के लिए चूड़ियाँ बनाते थे हमारे गाँव में दो चार हिन्दू दर्ज़ी थेनमाज़ियो के लिए वही टोपियाँ बनाते थे..!! ~लियाक़त जाफ़री - [वो जानता ही नहीं है कि मुफ़्लिसी क्या है ?](https://bazmeshayari.com/hindi-shayari-on-muflisi/): वो जानता ही नहीं है कि मुफ़्लिसी क्या है ?गुज़र रही है जो मुश्किल से ज़िन्दगी क्या है ? ना मिले रोटियाँ कभी उसे जो कि हो भूखावही ग़रीब बता सकता है कि बेकसी क्या है ? कभी किसी मुफ़लिस जो मिलो तो पूछनानये अमीरों को क्या मालूम सादगी क्या है ? माँ के होते हुए हाथ न उठे थे कभी दुआ कोउनसे पूछना बाद माँ के बँदगी क्या है.?? - [तू मेरी रूह का हिस्सा है, तू ही जान मेरी](https://bazmeshayari.com/shayari-on-love-in-hindi/): जब भी सोचा कभी अपना तो हमारा सोचा क्या मिला और हुआ कितना ख़सारा सोचा ?बाद मुद्दत के यही क़िस्सा दोबारा सोचा, रात भर देर तलक नींद न आई मुझकोरात भर देर तलक तुझको ही यारा सोचा, मैं तो गुज़र जाऊँगा तुझसे जुदा हो करकैसे होगा मेरे बिन तेरा गुज़ारा सोचा ? अब मेरी सोच भी हैरान है, कैसे मैंनेइतनी फ़ुर्सत से तुझे सारे का सारा सोचा, ये भी मुमकिन है कि ज़न्नत में ही मिले शायदजैसा घर मैंने कभी अपना तुम्हारा सोचा, आज आ जा कि तुझे अश’आर में अपने लिख लूँतू भी तो देखे कि तुझे कितना प्यारा - [तुझे भूलने की दुआ करूँ](https://bazmeshayari.com/hindi-shayri-on-shikayat/): तुझे इस क़दर है शिकायतेंकभी सुन ले मेरी हिकायते, तुझे गर न कोई मलाल होमैं भी एक तुझसे गिला करूँ ? तू नमाज़ ए इश्क़ है जान ए जाँतुझे रात ओ दिन मैं अदा करूँ, तेरा प्यार तेरी मुहब्बतेमेरी ज़िन्दगी की इबादतें, जो हो ज़िस्म ओ जाँ में रवां दवांउसे कैसे ख़ुद से जुदा करूँ ? तू है दिल में, तू ही नज़र में हैतू है शाम तू ही सहर में है, जो निज़ात चाहूँ हयात सेतुझे भूलने की दुआ करूँ..!! - [ख़रीद कर जो परिंदे उड़ाए जाते है](https://bazmeshayari.com/shayari-on-parinde-in-hindi/): ख़रीद कर जो परिंदे उड़ाए जाते हैंहमारे शहर में कसरत से पाए जाते है, मैं देख आया हूँ एक ऐसा कारखाना जहाँचिराग़ तोड़ के सूरज बनाए जाते हैं, मैं इस लिए भी समन्दर से खौफ़ खाता हूँमुझे निसाब में दरिया पढ़ाये जाते हैं, कहीं मिलेंगे तो फिर तुम भी जान जाओगेहम ऐसे हैं नहीं जैसे कि बताये जाते हैं..!! - [ये इत्तेफ़ाक थोड़ी है](https://bazmeshayari.com/bazm-e-shayri-shayari-in-hindi/): मिल के तुमको छोड़ दे कोई मज़ाक थोड़ी है हम दोनों जो मिले हैये इत्तेफ़ाक थोड़ी है, मिल के तुमको छोड़ देकोई मज़ाक थोड़ी है, अगर होती मुहब्बतएक हद तक तो छोड़ भी देते, पर हमारी तुमसे मुहब्बतका कोई हिसाब थोड़ी है, पढ़ कर इसे तुम ढूँढोगेमेरी इस गज़ल का जवाब, ये मेरे दिल की आवाज़ हैसफहा ए क़िताब थोड़ी है..!! - [बड़े बेमुरौत होते है ये हुस्न वाले](https://bazmeshayari.com/hindi-shayri-shayari-in-hindi/): कही दिल लगाने की कोशिश न करना मुहब्बत की झूठी अदाओं पे साहबजवानी लुटाने की कोशिश न करना, बड़े बेमुरौत होते है ये हुस्न वालेकही दिल लगाने की कोशिश न करना, हँसी आती है अपनी बरबादियो परन यूँ प्यार से देखे बन्दा परवर मेरे दिल के ज़ख्मो को नींद आ गई हैउन्हें तुम जगाने की कोशिश न करना सितमगर से ज़ोर ओ सितम की शिकायतन हम कर सकते है न हम कर सकेंगे, मेरे आँसूओ तुम मेरा साथ देनाउन्हें कुछ बताने की कोशिश न करना, शमा बन के महफ़िल में हम जल रहे हैमगर दिल की हालत है परवानो जैसी, - [किसी की आँखों में ऐसा कभी ख़ुमार न था](https://bazmeshayari.com/hazaro-log-the-kahne/): किसी की आँखों में ऐसा कभी ख़ुमार न थाकि जिसका सारे जहाँ में कोई उतार न था, न आये गर तेरी गिनती में हम तो क्या शिकवा ?हमारा घर के भी लोगो में कुछ शुमार न था, हज़ारों लोग थे कहने को मेरे अपने ऐ दोस्त !कोई भी शख्स मगर मेरा गम गुसार न था, चले जो साथ मेरे उनका शुक्रिया लेकिनसलाम उनपे जिन्हें मुझ पे ऐतबार न था, मिला है साथ तेरा जिसको मैं तो हैरान हूँतुम्हारे चाहने वालो में भी वो शुमार न था, किसी को कैसे भला रोकते हम मुहब्बत सेहमें जब अपने ही दिल पर कुछ - [मोहब्बत क्या करेंगे वो जो जाँ देने से डरते हैं](https://bazmeshayari.com/shayri-in-hindi-3/): मुसाफ़िर भी सफ़र में इम्तिहाँ देने से डरते हैंमोहब्बत क्या करेंगे वो जो जाँ देने से डरते हैं तेरी यादों के मौसम भी तुझे रुस्वा नहीं करतेसुलगते हैं दिल-ओ-जाँ और धुआँ देने से डरते हैं शरीक-ए-ज़िंदगी है ए’तिबार-ए-ज़िंदगी वर्नामकाँ मालिक किराए पर मकाँ देने से डरते हैं बुज़ुर्गों की कोई सुनता नहीं है इस ज़माने मेंबड़े छोटों के बारे में ज़बाँ देने से डरते हैं मेरे क़ातिल की मेरे घर से ही इमदाद होती हैमेंरे भाई मेरे हक़ में बयाँ देने से डरते हैं..!! नवाज़ देवबंदी - [दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते](https://bazmeshayari.com/shayri-in-hindi-2/): मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहतेदो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपनाइक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते कम-हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र मेंतूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्याऔर बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते..!! नवाज़ देवबंदी - [किसी चिड़ियाँ के बच्चे की](https://bazmeshayari.com/shayri-in-hindi/): मुझे गुमनाम रहने काकुछ ऐसा शौक है हमदमकिसी बेनाम सहरा मेंभटकती रूह हो जैसे, जहाँ साये तरसते होकिसी पैकर की आहट कोजहाँ ज़िन्दा ना हो कोईजहाँ पे मौत रहती हो, या कुछ ऐसे कि दरियाँ केकही उस पर कीकर परकिसी चिड़ियाँ के बच्चे कीतड़पती प्यास हो जैसे..!! - [Inspirational Quotes](https://bazmeshayari.com/inspirational-quotes-2/): जैसे कोयल की खूबसूरती उसके आवाज़ में हैवैसे ही एक औरत की खूबसूरती उसका अपनेपरिवार के प्रति समर्पण में है,एक बदसूरतइन्सान की खूबसूरती उसके लहज़े और जानकारी में हैऔर एक फ़कीर की खूबसूरती उसकी सादगीऔर माफ़ करने के हुनर में है… - [इख़्तियार ए संजीदगी
अक्सर जवानी उजाड़ देती है](https://bazmeshayari.com/shayari/): इख़्तियार ए संजीदगीअक्सर जवानी उजाड़ देती है रवानी ए ज़िन्दगी कोवहशत उजाड़ देती है, एक छोटी सी गलती भीबनी कहानी बिगाड़ देती है, कम उम्रो में ज़िम्मेदारीबचपन बिगाड़ देती है, इख़्तियार ए संजीदगीअक्सर जवानी उजाड़ देती है..!! - [किसी का दिखावे का प्यार नहीं](https://bazmeshayari.com/belaus-muflisi-bhi-hai/): बेलौस मुफ़्लिसी भी है क़ुबूल मुझेमगर अमीर ए शहर बदकार नहीं, दुश्मन ए बदतर से भी निभा लूँगामगर दोस्त कोई भी अदाकार नहीं, दुश्मनी में रहे क़ायम मेयार नवाबमुझे कत्तई पसंद ख़ूँ ए ऐतबार नहीं, खुले दिल की नफरते भी पसंद है मुझेपर किसी का दिखावे का प्यार नहीं..!! - [लम्हा भर वो भी तड़पती होगी](https://bazmeshayari.com/%e0%a4%b2%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%80/): तड़पता हूँ मैं लैल ओ नहारलम्हा भर वो भी तड़पती होगी दुआओं में वो भी ख़ुदा सेकोई फ़रियाद तो करती होगी मेरे जितना ना करे ना सहीपर याद तो वो भी करती होगी बहुत मशरूफ ही सहीवो अपनी उस दुनियाँ में फिर भी तन्हाईयो के कुछ पल वो भीमेरे लिए बर्बाद तो करती होगी..!! - [बेलौस प्यार कहाँ करते है लोग ?](https://bazmeshayari.com/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a5%8c%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b2/): रूबरू हो कर भी इस ज़माने मेंकिसी पे ऐतबार कहाँ करते है लोग ? मतलबपरस्तो की इस दुनियाँ मेंबेलौस प्यार कहाँ करते है लोग ? मसलहत और खुदगर्ज़ी ना होशामिल तो याद कहाँ करते है लोग ? खाने में नमक की हो जैसे ज़रूरतवैसे ही यहाँ इस्तेमाल करते है लोग..!! - [इन्सान हूँ इंसानियत की तलब है](https://bazmeshayari.com/insan-hoon-insaniyat-ki/): इन्सान हूँ इंसानियत की तलब हैकिसी खुदाई का तलबगार नहीं हूँ, ख़ुमारी ए दौलत ना शोहरत का नशाअबतक किसी का ख़तावार नहीं हूँ, ख़िदमत ए वालिदैन फ़र्ज़ है मुझ परसिवाय औरो का तीमारदार नहीं हूँ, उन्ही की दुआओं का सिला है जोअबतक किसी का कर्ज़दार नहीं हूँ, बेशक़, मुफ़्लिसी में गुजरी है हयातमगर गिरफ्तार ए बदकिरदार नहीं हूँ, ठोकरे खाई है ख़ुद ज़माने भर कीपर शुक्र ए ख़ुदा है गुनाहगार नहीं हूँ..!! - [अपनी खताओ पे शर्मिन्दा भी हो जाता हूँ](https://bazmeshayari.com/apni-khataao-pe-sharminda/): अपनी खताओ पे शर्मिन्दा भी हो जाता हूँमुझे तुम्हारी तरह बहाने बनाना नहीं आता, गर हूँ ख़तावार तो सर झुका भी सकता हूँपर घमंडी के आगे सर झुकाना नहीं आता, मैं इस लिए भी दुनियाँ में नाकाम रह गयामुझे तुम्हारी तरह यूँ बात बनाना नहीं आता, तुम्हारी चिंगारी से अहल ए चमन जल गयातुम कहते हो तुम्हे आग लगाना नहीं आता, हम दुश्मनों से भी हँस हँस के गले मिलते हैतुम्हारी तरह सीने में खंज़र छुपाना नहीं आता..!! - [पहले मगफिरत की दुआ कीजिए](https://bazmeshayari.com/shayri-on-magfirat-in-hindi/): चाहते है इज्ज़त ओ मुक़ाम ए बलंदी तोसर को खालिक़ के आगे झुका लीजिए, गर है ख्वाहिश पाने की इल्म ओ हुनरउस्तादों से बा अदब ही मिला कीजिए, ज़िन्दगी के तजरुबे की हो दरकार जोकुछ वक़्त बुजुर्गो के साथ बीता लीजिए, तब्सिरा करिएगा गैरो के ऐब ओ हुनर पेपहले ख़ुद को तो आईना दिखा लीजिए, जानते है कि गीबत है गुनाह ए अज़ीमक्यों ना करने से पहले तज़्किरा कीजिए, देख कर माल ओ ज़र या हुस्न ओ ज़मालआहे भरने से पहले शुक्र ए ख़ुदा कीजिए, गर हो गई कोई खता ज़िन्दगी में तोफिर पहले मगफिरत की दुआ कीजिए..!! - [फूँक मार कर बुझाने में लगे है](https://bazmeshayari.com/shayri-on-naari-in-hindi/): कइयो ने कोशिश कर लीकई और मिटाने में लगे है, सदियों से ज़ालिम ज़माने वालेनारियो को गिराने में लगे है, शायद चिराग़ समझ करफूँक मार कर बुझाने में लगे है, मगर भूल बैठे है वो नादांक़तरा नहीं समन्दर है नारी, ख़ुद ही डूब जाएँगे वो सबजो नारी को डुबाने में लगे है..!! - [इल्ज़ाम फक़त ख्यालात पे क्यों आता है??](https://bazmeshayari.com/ilzam-shayri-in-hindi/): हसरत ए दीद ओ वस्ल लिए ख्याल मेरातेरे हुस्न ए ख्वाबीदा से जब टकराता है, ख्वाहिश ए जानाँ से दीवाने की रूह कोपयाम ए इश्क़ ए जावेदाँ मिल ही जाता है, अक्स ए ख़ुशबू बनकर वो इत्र ओ अम्बरकी तरह दिल ओ दिमाग पे छा जाता है, लाख कर ले कोशिशे होश में रहने कीपर रूह में समा कर बहका ही जाता है, क़सूर तो शबाब ए इश्क़ ए जावेदाँ का हैतो इल्ज़ाम फक़त ख्यालात पे क्यों आता है?? - [आते ही चुनाव तुमको हमारा ख्याल आता है](https://bazmeshayari.com/shayri-on-election-in-hindi/): वाह ! रे सियासत ए हिंदुस्तानतुझे दाँव पेच का खेल क्या कमाल आता है, यूँ तो रहा करते है नदारदआते ही चुनाव तुमको हमारा ख्याल आता है, सबब पतझड़ का जो होता हैवही ओढ़े मौसम ए बहार की खाल आता है, कर के तारीकियो के हवालेराह दिखाने को जुगनू लेकर मशाल आता है, गाते है क़सीदे वतपरस्ती केख़ूँ_ ए_ वतन फ़रोश में अभी उबाल आता है, कही बँटते है साड़ी कपड़ेकोई लेकर रजाई दुशाला और शाल आता है, कही से तेल, कही से नमकतो कही से बिन माँगे ही महँगा दाल आता है, गर ना हो यकीं तो आज़मा लोअगर - [ख़ुदा की नज़र में एक सा हर बशर होता है](https://bazmeshayari.com/shayri-on-khuda-in-hindi/): मुफ़्लिस हो कि रईसए शहरकोईख़ुदा की नज़र में एक सा हर बशर होता है, इबादत हो के प्रार्थना या अरदास कहीनज़्रओनियाज़ की नीयत में क़सर होता है, वरना दुआ ए बादशाह हो कि फ़कीरहर एक की दुआओं में एक सा असर होता हैं, ना हो यकीं तो आज़मा लो हर दवा से पहलेमुब्तिलाएमर्ज़ पर दुआओं का असर होता है..!! - [परिंदा समझ कर शिकार कर गई](https://bazmeshayari.com/shayri-on-bewafai-in-hindi/): वो माहिर थी फन ए अय्यारी मेंअपने इश्क़ में मुझे बीमार कर गई, अनाड़ी सी शख्सियत थी अपनीवो मुहब्बत में भी कारोबार कर गई, जिसे समझते रहे चारागर ए हयातपरिंदा समझ कर शिकार कर गई, सबक़ ऐसा जो ना किताबो में थाइस क़दर मुझको होशियार कर गई, हम निभाते रह गए अहद ए वफ़ावो लफ्ज़ ए वफ़ा को दागदार कर गई - [बहाना गरीबो को अधिकार दिलाना रहेगा](https://bazmeshayari.com/bahana-shayri-in-hindi/): मौसम ए सर्दी में बारिश ए ख़ास चल रहा है हमारी गलियों में मेढको का आना जाना रहेगा, मयस्सर ना था दीदार बगैर रस्म ए मुँह दिखाई उनका का अब सरेआम मिलना मिलाना रहेगा, हमारे हाथो का पानी तक न था गँवारा जिन्हें उनका ही हमारे साथ खाना, और नहाना रहेगा, गर बनी बात महज़ दिखावे से तो ठीक वरना टेढ़ी उंगलियों से इनका ज़ोर आज़माना रहेगा, सफेदपोशो कि गन्दगी को छुपाने कि खातिर वबा ए कोरोना इनके लिए बेहतर बहाना रहेगा, कर्फ्यू के नाम पर कर के घरो में क़ैद हमको इनके दौर ए हमदर्दी का मौसम सुहाना रहेगा, - [अमीर ए मुल्क के नसीब है उरूज़ पे](https://bazmeshayari.com/amir-e-mulq-ke/): अमीर ए मुल्क के नसीब है उरूज़ पे हम गरीबो के हिस्से ज़वाल आ रहे है, मुल्क में मौसम ए इंतेख़ाब आ गया है सियासी शिकारी ले जाल आ रहे है, उम्र भर ना की कद्र ख़ुद के माँ बाप की उन्हें भी हम गरीबो के ख्याल आ रहे है, निवाला ए हराम खाने वाले हराम खोर आज हक़ ओ हलाल का गीत गा रहे है, कदमबोसी की बदौलत ज़िन्दगी जीने वाले अब मेहनत कशो को जीना सीखा रहे है..!! - [अब जो लौटे हो इतने सालों में...](https://bazmeshayari.com/ab-jo-laute-ho-itne-saalo-me/): अब जो लौटे हो इतने सालों मेंधूप उतरी हुई है बालों में, तुम मिरी आँख के समुंदर मेंतुम मिरी रूह के उजालों में, फूल ही फूल खिल उठे मुझ मेंकौन आया मिरे ख़यालों में, मैं ने जी-भर के तुझ को देख लियातुझ को उलझा के कुछ सवालों में, मेरी ख़ुशियों की काएनात भी तूतू ही दुख-दर्द के हवालों में, जब तिरा दोस्तों में ज़िक्र आएटीस उठती है दिल के छालों में, तुम से आबाद है ये तन्हाईतुम ही रौशन हो घर के जालों में, साँवली शाम की तरह है वोवो न गोरों में है न कालों में, क्या उसे याद - [आँखों से मिरी इस लिए लाली नहीं जाती...](https://bazmeshayari.com/aankho-se-mere-is-liye-lali-nahi-jati/): आँखों से मिरी इस लिए लाली नहीं जातीयादों से कोई रात जो ख़ाली नहीं जाती, अब उम्र न मौसम न वो रस्ते कि वो पलटेइस दिल की मगर ख़ाम-ख़याली नहीं जाती, माँगे तो अगर जान भी हँस के तुझे दे देंतेरी तो कोई बात भी टाली नहीं जाती, आए कोई आ कर ये तिरे दर्द सँभालेहम से तो ये जागीर सँभाली नहीं जाती, मा’लूम हमें भी हैं बहुत से तिरे क़िस्सेपर बात तिरी हम से उछाली नहीं जाती, हमराह तिरे फूल खिलाती थी जो दिल मेंअब शाम वही दर्द से ख़ाली नहीं जाती, हम जान से जाएँगे तभी बात बनेगीतुम - [बाँध ले हाथ पे सीने पे सजा ले तुमको...](https://bazmeshayari.com/baandh-le-haath-pe/): बाँध ले हाथ पे सीने पे सजा ले तुमकोजी में आता है कि ताबीज़ बना ले तुमको, फिर तुम्हे रोज़ संवारे तुम्हे बढ़ता देखेक्यूँ न आँगन में चमेली सा लगा ले तुमको, जैसे बालो में कोई फूल चुना करता हैघर के गुलदान में फूलो सा सजा ले तुमको, क्या अज़ब ख्वाहिश उठती है हमारे दिल मेंकर के मुन्ना सा हवाओं में उछाले तुमको, इस क़दर टूट के तुम पे हमें प्यार आता हैअपनी बाहों में भरे मार ही डाले तुमको, कभी ख़्वाबो की तरह आँख के परदे में रहोकभी ख्वाहिश की तरह दिल में बुला ले तुमको, है तुम्हारे लिए - [तुम मेरी ख्वाहिश नहीं हो....](https://bazmeshayari.com/tum-meri-khwahish-nahi-ho/): तुम मेरी ख्वाहिश नहीं होख्वाहिश पूरी हो जाए तो तलब नहीं रहती, तुम मेरी आदत भी नहीं होआदत तो बुरी भी होती है, तुम मेरी ज़रूरत भी नहीं होज़रूरत पूरी हो जाए तो दूसरे की तलाश रहती है, तुम मेरी दुनियाँ भी नहीं होदुनियाँ तो फ़ानी है एक दिन खत्म हो जाएगी, तुम मेरी ला हासिल मुहब्बत होजिसकी तलब हमेशा इस दिल में ज़िन्दा रहती है..!! - [जो रहता है दिल के क़रीब...](https://bazmeshayari.com/jo-rahta-hai-dil-ke-qarib/): जो रहता है दिल के क़रीबअक्सर वही दूर हुआ करता है, जो नहीं हो मयस्सर हमकोवही मतलूब हुआ करता है, जिसे पाना मुहाल हो ये दिलउसे ही पाने की दुआ करता है..!! - [संभाला होश है जबसे मुक़द्दर सख्त तर निकला...](https://bazmeshayari.com/sambhala-hosh-hai-jabse/): संभाला होश है जबसेमुक़द्दर सख्त तर निकलाबड़ा है वास्ता जिससेवही ज़ेर ओ ज़बर निकला, सबक़ देता रहा मुझकोसदा रौशन ख्याली काउसे जब पास से देखातो ख़ुद भी तंग नज़र निकला, समझ कर ज़िन्दगी जिससेमुहब्बत कर रहे थे हमउसे जब छू कर देखा तोफ़क़त ख़ाली बशर निकला, मुहब्बत का नशा उतरातो तब साबित हुआ मुझकोजिसे मंज़िल समझते थेवो बे मक़सद सफ़र निकला..!! - [तुम्हे बहार की कलियाँ जवाँ पुकारती है...](https://bazmeshayari.com/tumhe-bahaar-ki-kaliyan-javaan/): तुम्हे बहार की कलियाँ जवाँ पुकारती हैकहती मरहबा ! सब तितलियाँ पुकारती है, न बोसा प्यार का अंबर फिशां लबो से लोये मेरी साँसों की खामोशियाँ पुकारती है, हसीं रातें हैं दीदार को बनी तेरेक़मर, नज़ूम की किरने रवां पुकारती है, न आना सामने शीशे के हो के तुम मलबूसलटकती ज़ुल्फ़ की ये कुण्डलियाँ पुकारती है, ज़मीं ओ चर्ख बहुत गर्म जोशी में है आजघटाओ से निकलती बिजलियाँ पुकारती है, पसंद आई है मेहँदी को इस कदर ज़द सेनहीं है छोड़नी, तलियां ऐ जाँ, पुकारती है, मुराअज़ात तेरी एक पल को भी गँवारा नहींये नीली फ़ाम सी परियाँ यहाँ पुकारती - [होश में रह के बे हवास फिर रहे है आज....](https://bazmeshayari.com/hosh-me-rah-ke-be-hawaas-fir-rahe-hai/): होश में रह के बे हवास फिर रहे है आजतेरे नगर में हम उदास फिर रहे है आज, हैं फ़ासले भी काफी, हम में और तुम में दोस्त !इसी सबब तो तेरे पास फिर रहे है आज, ऐ दोस्तों ! ऐ दुश्मनों ! ये पूछना उसेवो ज़िन्दगी से क्यूँ निरास फिर रहे है आज, वो चाहतो की आड़ में बने है अज़नबी वहाँ पेहम हम भी रू शनास फिर रहे है आज, जो शेर हमको ख़ुद समझ नहीं है आ सकावो शेर ले के हम क़यास, फिर रहे हैं आज, कभी भी दिल के जो क़रीब नहीं रहे हैवो मेरे - [कहे दुनियाँ उसे ऐसे ही बेकार न आये...](https://bazmeshayari.com/kahe-duniyan-use-aise-hi-bekar-naa-aaye/): कहे दुनियाँ उसे ऐसे ही बेकार न आयेक़िस्मत का मेरी बन के ख़रीदार न आये, इस बार मुलाक़ात मुहब्बत तो न होगीइस बार मेरा हाशिया बरदार न आये, दुनियाँ में तो मरते थे मेरे हुस्न पे लेकिनअब हश्र में क्यूँ मेरे तलबगार न आये ? सब लोग हो सर गश्ता मेरे सामने एक दिनपीछे से जो दुश्मन का कोई वार न आये, लगता है यहाँ फैला हवाओं का है जादूदौरान ए सफ़र राह में अश्ज़ार न आये, कुछ रोज़ में हो जाएगा बंद आँख का चश्मापीने मेरी आँखों से जो मयख़्वार न आये, वैसे तो ख्यालो में तेरा राज है - [कर के सारी हदों को पार चला....](https://bazmeshayari.com/kar-ke-saari-hado-ko-paar-chala/): कर के सारी हदों को पार चलाआज फिर से मैं कु ए यार चला, उसने वायदा किया था मिलने काकर के उस पर मैं ऐतबार चला, जाने क्या बात उसमे ऐसी थीउसकी ज़ानिब जो बार बार चला, मिट गए हम मिल गई खुशियाँरब को दिल से जो मैं पुकार चला, क्यूँ हो बे कैफ़ ज़िन्दगी उसकीले के दोस्तों जो माँ का प्यार चला..!! - [पलकों को तेरी शर्म से झुकता हुआ मैं देखूँ...](https://bazmeshayari.com/palko-ko-teri-sharm-se-jhukta-hua/): पलकों को तेरी शर्म से झुकता हुआ मैं देखूँधड़कन को अपने दिल की रुकता हुआ मैं देखूँ, पीने का शौक़ मुझको हरगिज़ नहीं है मगरक़दमों को मयकदे पे रुकता हुआ मैं देखूँ, या रब करम की बारिश एक बार ऐसी कर देहर फूल को चमन में हँसता हुआ मैं देखूँ, जब भी उठे दुआओ की खातिर ये हाथ मेरेआँखों को आँसूओ से भरता हुआ मैं देखूँ, दोस्तों ! मेरे रब का कितना करम है मुझ पेख़ुशबूओ को संग अपने चलता हुआ मैं देखूँ..!! - [रुख से नक़ाब उनके जो हटती चली गई...](https://bazmeshayari.com/rukh-se-naqab-unke/): रुख से नक़ाब उनके जो हटती चली गईचादर सी एक नूर की बिछती चली गई, आये वो मेरे घर पे तो जाने ये क्या हुआ ?हर एक चीज ख़ुद से निखरती चली गई, गुज़र जिधर जिधर से मेरा प्यार दोस्तोंख़ुशबू उधर हवाओं में घुलती चली गई, आई बहार अबकी चमन में कुछ इस तरहगुल की हर एक शाख़ लचकती चली गई, तौक़ीर कर चुका था समंदर से दोस्तीकश्ती भँवर से उसकी गुज़रती चली गई..!! - [हर नाला तिरे दर्द से अब और ही कुछ है....](https://bazmeshayari.com/har-nala-tere-dard-se-ab-aur-hi-kuch-hai/): हर नाला तिरे दर्द से अब और ही कुछ हैहर नग़्मा सर-ए-बज़्म-ए-तरब और ही कुछ है, अरबाब-ए-वफ़ा जान भी देने को हैं तयारहस्ती का मगर हुस्न-ए-तलब और ही कुछ है, ये काम न ले नाला-ओ-फ़र्याद-ओ-फ़ुग़ां सेअफ़्लाक उलट देने का ढब और ही कुछ है, इक सिलसिला-ए-राज़ है जीना कि हो मरनाजब और ही कुछ था मगर अब और ही कुछ है, कुछ मेहर-ए-क़यामत है न कुछ नार-ए-जहन्नमहोश्यार कि वो क़हर-ओ-ग़ज़ब और ही कुछ है, मज़हब की ख़राबी है न अख़्लाक़ की पस्तीदुनिया के मसाइब का सबब और ही कुछ है, बेहूदा-सारी सज्दे में है जान खपानाआईन-ए-मोहब्बत में अदब और ही - [आरज़ू मैं ने कोई की ही नहीं....](https://bazmeshayari.com/charkh-se-kuchh-ummid-thi-hi-nahi/): चर्ख़ से कुछ उमीद थी ही नहींआरज़ू मैं ने कोई की ही नहीं, मज़हबी बहस मैं ने की ही नहींफ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं, चाहता था बहुत सी बातों कोमगर अफ़्सोस अब वो जी ही नहीं, जुरअत-ए-अर्ज़-ए-हाल क्या होतीनज़र-ए-लुत्फ़ उस ने की ही नहीं, इस मुसीबत में दिल से क्या कहताकोई ऐसी मिसाल थी ही नहीं, आप क्या जानें क़द्र-ए-या-अल्लाहजब मुसीबत कोई पड़ी ही नहीं, शिर्क छोड़ा तो सब ने छोड़ दियामेरी कोई सोसाइटी ही नहीं, पूछा ‘अकबर’ है आदमी कैसाहँस के बोले वो आदमी ही नहीं..!! ~अकबर इलाहाबादी - [जिन्हें कर सका न क़ुबूल मैं...](https://bazmeshayari.com/jinhe-kar-saka-n-qubul-main/): जिन्हें कर सका न क़ुबूल मैंवो शरीक़ राह ए सफ़र हुए, जो मेरी तलब मेरी आस थेवही लोग मुझसे बिछड़ गए, जिन्हें मानता ही नहीं ये दिलवही लोग है मेरे हमसफ़र, मुझे हर तरह से जो रास थेवही लोग मुझसे बिछड़ गए, मुझे लम्हा भर के रफाक़तो केसराब और सताएँ गए, मेरी उमर भर की जो प्यास थे,वही लोग मुझसे बिछड़ गए, - [अभी क्या कहे अभी क्या सुने ?](https://bazmeshayari.com/abhi-kya-kahe-abhi-kya/): अभी क्या कहे अभी क्या सुने? कि सर ए फसील ए सकूत ए जाँकफ़ ए रोज़ ओ शब पे शरर नुमावो जो हर्फ़ हर्फ़ चिराग़ थाउसे किस हवा ने बुझा दिया ?कभी लब हिलेंगे तो पूछना ! सर ए शहर ए अहद ए विसाल ए दिलवो जो निकहतों का हुजूम थाउसे दस्त ए मौज़ ए फ़िराक नेतह ए खाक़ कब से मिला दिया ?कभी गुल खिलेंगे तो पूछना ! अभी क्या कहे अभी क्या सुने ?यूँही ख्वाहिशो के फ़शार मेंकभी बे सबब कभी बे ख़ललकहाँ, कौन किस से बिछड़ गया ?किसे, किसने भूला दिया ?कभी फिर मिलेंगे तो पूछना…!! - [कभी ऐसा भी होता है ?](https://bazmeshayari.com/kabhi-aisa-bhi-hota-hai-ki/): कभी ऐसा भी होता है ?कि जिसको हमसफ़र जानेकि जो शरीक़ ए दर्द होवही हमसे बिछड़ जाए, कभी ऐसा भी होता है ?कि आँखे जिन ख़्वाबो कोहकीक़त जान बैठी होवो सब सपने बिखर जाएँ, कभी ऐसा भी होता है ?कि जिसके साथ पहरों साअतेंहमने गुज़ारी होउसी से राब्ता टूट जाए, कभी ऐसा भी होता है ?खिज़ाओ के दीवाने कोबहारो में बहारो से मुहब्बतहोने ही वाली होऔर यकायक मौसम बदल जाए, कभी ऐसा भी होता है ?कि जिसके नाम के आगे हमारा नाम आया होजिसे महरम बनाया होउसी को अपने हाथों सेकिसी को सौंप कर आए, कभी ऐसा भी होता है - [दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के...](https://bazmeshayari.com/do-jahan-teri-muhabbat-me-haar-ke/): दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार केवो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के, वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैंतुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के, इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिनदेखे हैं हम ने हौसले परवरदिगार के, दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दियातुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के, भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज ‘फ़ैज़’मत पूछ वलवले दिल-ए-ना-कर्दा-कार के..!! - [ये मिस्रा नहीं है वज़ीफ़ा मिरा है...](https://bazmeshayari.com/ye-misra-nahi-wazifa-mera-hai/): ये मिस्रा नहीं है वज़ीफ़ा मिरा हैख़ुदा है मोहब्बत मोहब्बत ख़ुदा है, कहूँ किस तरह मैं कि वो बेवफ़ा हैमुझे उस की मजबूरियों का पता है, हवा को बहुत सर-कशी का नशा हैमगर ये न भूले दिया भी दिया है, मैं उस से जुदा हूँ वो मुझ से जुदा हैमोहब्बत के मारों पे फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा है, नज़र में है जलते मकानों का मंज़रचमकते हैं जुगनू तो दिल काँपता है, उन्हें भूलना या उन्हें याद करनावो बिछड़े हैं जब से यही मश्ग़ला है, गुज़रता है हर शख़्स चेहरा छुपाएकोई राह में आईना रख गया है, बड़ी जान लेवा हैं माज़ी की यादेंभुलाने - [वो सिवा याद आए भुलाने के बा'द...](https://bazmeshayari.com/wo-siwa-yaad-aaye-bhulane-ke-baad/): वो सिवा याद आए भुलाने के बा’दज़िंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बा’द, दिल सुलगता रहा आशियाने के बा’दआग ठंडी हुई इक ज़माने के बा’द, रौशनी के लिए दिल जलाना पड़ाऐसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बा’द, जब न कुछ बन पड़ा अर्ज़-ए-ग़म का जवाबवो ख़फ़ा हो गए मुस्कुराने के बा’द, दुश्मनों से पशेमान होना पड़ादोस्तों का ख़ुलूस आज़माने के बा’द, रंज हद से गुज़र के ख़ुशी बन गयाहो गए पार हम डूब जाने के बा’द, बख़्श दे या रब अहल-ए-हवस को बहिश्तमुझ को क्या चाहिए तुझ को पाने के बा’द, कैसे कैसे गिले याद आए ‘ख़ुमार’उन के आने से - [वो हमें जिस क़दर आज़माते रहे...](https://bazmeshayari.com/wo-hame-jis-kadar-aazmate-rahe/): वो हमें जिस क़दर आज़माते रहेअपनी ही मुश्किलों को बढ़ाते रहे, वो अकेले में भी जो लजाते रहेहो न हो उन को हम याद आते रहे, याद करने पे भी दोस्त आए न याददोस्तों के करम याद आते रहे, आँखें सूखी हुई नद्दियाँ बन गईंऔर तूफ़ाँ ब-दस्तूर आते रहे, प्यार से उन का इंकार बर-हक़ मगरलब ये क्यूँ देर तक थरथराते रहे, थीं कमानें तो हाथों में अग़्यार केतीर अपनों की जानिब से आते रहे, कर लिया सब ने हम से किनारा मगरएक नासेह ग़रीब आते जाते रहे, मय-कदे से निकल कर जनाब-ए-‘ख़ुमार’का’बा ओ दैर में ख़ाक उड़ाते रहे..!! ~ख़ुमार - [ज़िन्दगी खाक़ न थी बस खाक़ उड़ाते गुज़री...](https://bazmeshayari.com/zindagi-khaaq-thi-khaaq-udate-guzri/): ज़िन्दगी खाक़ न थी बस खाक़ उड़ाते गुज़रीतुझसे क्या कहते, तेरे पास जो आते गुज़री, दिन जो गुज़रा तो किसी याद की रौ में गुज़राशाम आई तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़री, अच्छे वक्तो की तमन्ना में रही उम्र ए रवाँवक़्त ऐसा था कि बस नाज़ उठाते गुज़री, ज़िन्दगी जिसके मुक़द्दर में हो खुशियाँ तेरीउसको आता है निभाना, सो निभाते गुज़री, ज़िन्दगी नाम उधर है किसी सरशारी काऔर इधर दूर से एक आस लगाते गुज़री, रात क्या आई कि तन्हाई की सरगोशी मेंबु का आलम था मगर सुनते सुनाते गुज़री, बारहा चौंक सी जाती है मसाफ़त दिल कीकिसी की आवाज़ थी - [गुरेज़ कर के मुसाफ़िर कोई गुज़र भी गया...](https://bazmeshayari.com/gurez-kar-ke-musafir-koi/): गुरेज़ कर के मुसाफ़िर कोई गुज़र भी गयान जाने कैसे मेरी रूह में उतर भी गया, ये ज़ख्म ए इश्क़ है, कोशिश करो कि ये हरा ही रहेकसक तो जा न सकेगी, अगर ये भर भी गया, मैं रंग भरता था सौ सौ तरह मुहब्बत मेंशबाब खत्म हुआ और ये हुनर भी गया, ख़जिल बहुत हूँ कि आवारगी भी ढब से न कीमैं दरबदर तो फिरा, लेकिन अपने घर भी गया, कहा था उसने कि मुस्काओ और मर जाओसो मैं उसी घड़ी मुस्काया और मर भी गया, बस एक याद की वहशत गई न दिल सेजहाँ जहाँ भी मैं ठहरा, - [ज़रा सी देर ठहर कर सवाल करते है...](https://bazmeshayari.com/zara-see-der-thahar-kar/): ज़रा सी देर ठहर कर सवाल करते हैसफ़र से आये हुओ का ख्याल करते है, मैं जानता हूँ मुझे मुझसे माँगने वालेपराई चीज का जो लोग हाल करते है, ज़माना हो गया हालाकिं दश्त छोड़े हुएहमारे तज्करे अब भी गज़ाल करते है, वो इश्क़ जिसके गिने जा चुके है दिनहम इस चिराग़ की साँसे बहाल करते है..!! - [महफिले लूट गई जज़्बात ने दम तोड़ दिया...](https://bazmeshayari.com/mahfil-e-loot-gai/): महफिले लूट गई जज़्बात ने दम तोड़ दियासाज़ ख़ामोश है नगमात ने दम तोड़ दिया, अनगिनत महफिले महरूम ए चिरागाँ है अभीकौन कहता है कि ज़ुल्मात ने दम तोड़ दिया, आज फिर बुझ गए जल जल के उम्मीदों के चिराग़आज फिर तारो भरी रात ने दम तोड़ दिया, - [दिल मेरा मिस्र का बाज़ार भी हो सकता है...](https://bazmeshayari.com/dil-mera-misr-ka-baazar-bhi/): दिल मेरा मिस्र का बाज़ार भी हो सकता हैकोई धड़कन का ख़रीदार भी हो सकता है, कोई हो सकता है क़ातिल भी सफ ए यारां मेंकोई हमदर्द सरदार भी हो सकता है, अब तक अश्क़ गिरा करते थे तन्हाई मेंये तमाशा सर ए बाज़ार भी हो सकता है, मुझ पे ताने न कसो, मुझको न पागल समझोमैं इन्सान हूँ मुझे प्यार भी हो सकता है, उसकी चौखट पे जाना है ज़रा थाम ले दिलवहाँ इक़रार भी, इन्कार भी हो सकता है..!! - [नख्ल ए ममनूअ के रुख दोबारा गया](https://bazmeshayari.com/nakhl-e-mamnooa-ke/): नख्ल ए ममनूअ के रुख दोबारा गया, मैं तो मारा गयाअर्श से फ़र्श पर क्यूँ उतारा गया ? मैं तो मारा गया, जो पढ़ा था किताबो में वो और था, ज़िन्दगी और हैमेरा ईमान सारे का सारा गया, मैं तो मारा गया, गम गले पड़ गया, ज़िन्दगी बुझ गई, अक्ल जाती रहीइश्क़ के खेल में क्या तुम्हारा गया, मैं तो मारा गया, मुझको घेरा है तूफ़ान ने इस क़दर, कुछ न आये नज़रमेरी कश्ती गई या किनारा गया, मैं तो मारा गया, मुझको तू ही बता, दस्त ओ बाजू मेरे खो गए है कहाँ ?ऐ मुहब्बत ! मेरा हर सहारा - [उस ने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया..](https://bazmeshayari.com/sukut-e-shab-me-bhi/): उस ने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दियाहिज्र की रात बाम पर माह-ए-तमाम रख दिया, आमद-ए-दोस्त की नवेद कू-ए-वफ़ा में आम थीमैं ने भी इक चराग़ सा दिल सर-ए-शाम रख दिया, शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रहीउस ने जो फेर ली नज़र मैं ने भी जाम रख दिया, उस ने नज़र नज़र में ही ऐसे भले सुख़न कहेमैं ने तो उस के पाँव में सारा कलाम रख दिया, देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैंमैं ने तो सब हिसाब-ए-जाँ बर-सर-ए-आम रख दिया, अब के बहार ने भी कीं ऐसी शरारतें कि बसकब्क-ए-दरी की चाल में तेरा ख़िराम - [उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ...](https://bazmeshayari.com/usko-juda-hue-zamana/): उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआअब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ, ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़ऐ मर्ग-ए-ना-गहाँ तिरा आना बहुत हुआ, हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदाइतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ, अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनीउस से ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ, अब क्यूँ न ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार देंइस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ, अब तक तो दिल का दिल से तआ’रुफ़ न हो सकामाना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ, क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं - [मैं तुझको भूल के ज़िंदा रहूँ ख़ुदा न करे...](https://bazmeshayari.com/tujhko-bhool-ke-zinda-rahoo/): वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करेमैं तुझको भूल के ज़िंदा रहूँ ख़ुदा न करे, रहेगा साथ तेरा प्यार ज़िन्दगी बनकरये और बात मेरी ज़िन्दगी वफ़ा न करे ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई मेंख़ुदा किसी से किसी को मगर जुदा न करे सुना है उसको मोहब्बत दुआयें देती हैजो दिल पे चोट तो खाये मगर गिला न करे ज़माना देख चुका है परख चुका है उसे“क़तील” जान से जाये पर इल्तजा न करे..!! ~क़तील शिफ़ाई - [दिल में न हो जुरअत तो मोहब्बत नहीं मिलती...](https://bazmeshayari.com/naa-ho-jurrat-to-muhabbat-nahi-milti/): दिल में न हो जुरअत तो मोहब्बत नहीं मिलतीख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती , कुछ लोग यूँही शहर में हम से भी ख़फ़ा हैंहर एक से अपनी भी तबीअ’त नहीं मिलती, देखा है जिसे मैं ने कोई और था शायदवो कौन था जिस से तिरी सूरत नहीं मिलती, हँसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनतरोने की यहाँ वैसे भी फ़ुर्सत नहीं मिलती, निकला करो ये शम्अ लिए घर से भी बाहरकमरे में सजाने को मुसीबत नहीं मिलती..!! - [धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो...](https://bazmeshayari.com/dhoop-me-niklo-ghataaon/): धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखोज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो, सिर्फ़ आँखों से ही दुनिया नहीं देखी जातीदिल की धड़कन को भी बीनाई बना कर देखो, पत्थरों में भी ज़बाँ होती है दिल होते हैंअपने घर के दर-ओ-दीवार सजा कर देखो, वो सितारा है चमकने दो यूँही आँखों मेंक्या ज़रूरी है उसे जिस्म बना कर देखो, फ़ासला नज़रों का धोका भी तो हो सकता हैवो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो..!! - [ख़िर्द-मंदों से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है...](https://bazmeshayari.com/teri-raza-kya-hai/): ख़िर्द-मंदों से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या हैकि मैं इस फ़िक्र में रहता हूँ मेरी इंतिहा क्या हैख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहलेख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है - [तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ....](https://bazmeshayari.com/tere-ishq-ki-inteha/): तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँमिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ, सितम हो कि हो वादा-ए-बे-हिजाबीकोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ, ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों कोकि मैं आप का सामना चाहता हूँ, ज़रा सा तो दिल हूँ मगर शोख़ इतनावही लन-तरानी सुना चाहता हूँ, कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िलचराग़-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ, भरी बज़्म में राज़ की बात कह दीबड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ..!! - [सितारों से आगे जहाँ और भी हैं...](https://bazmeshayari.com/sitaro-se-aage-jahan/): सितारों से आगे जहाँ और भी हैंअभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं, तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँयहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं, क़नाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू परचमन और भी आशियाँ और भी हैं, अगर खो गया इक नशेमन तो क्या ग़ममक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं, तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरातिरे सामने आसमाँ और भी हैं, इसी रोज़ ओ शब में उलझ कर न रह जाकि तेरे ज़मान ओ मकाँ और भी हैं, गए दिन कि तन्हा था मैं अंजुमन मेंयहाँ अब मिरे राज़-दाँ और भी हैं..!! - [लिखना नहीं आता तो मेरी जान पढ़ा कर...](https://bazmeshayari.com/likhna-nahi-aata-to/): लिखना नहीं आता तो मेरी जान पढ़ा करहो जाएगी तेरी मुश्किल आसान पढ़ा कर, पढ़ने के लिए अगर तुझे कुछ न मिले तोचेहरे पे लिखे दर्द के उन्वान पढ़ा कर, लारेब, तेरी रूह को तस्कीन मिलेगीतू क़ुर्ब के लम्हात में क़ुरआन पढ़ा कर, आ जाएगा तुझे इक़बाल जीने का क़रीनातू सरवर ए कोनैन के फ़रमान पढ़ा कर..!! - [कुछ दूर हमारे साथ चलो दिल की कहानी कह देंगे](https://bazmeshayari.com/kuch-door-hamare-saath-chalo/): कुछ दूर हमारे साथ चलोहम दिल की कहानी कह देंगे, समझे न जिसे तुम आँखों सेवो बात ज़ुबानी कह देंगे, फूलो की तरह जब होंठो पेएक शोख तबस्सुम बिखरेगा, धीरे से तुम्हारे कानो मेंएक बात पुरानी कह देंगे, इज़हार ए वफ़ा तुम क्या जानोइक़रार ए वफ़ा तुम क्या जानो हम ज़िक्र करेंगे गैरो काऔर अपनी कहानी कह देंगे, कुछ दूर हमारे साथ चलोहम दिल की कहानी कह देंगे..!! - [वतन से दूर आ कर जो बड़ी दौलत कमाते है...](https://bazmeshayari.com/watan-se-door-aakar-jo/): वतन से दूर आ कर जो बड़ी दौलत कमाते हैकभी आओ हमें देखो कि गम कितना उठाते है, बड़ा महँगा पसीना है, बड़े सस्ते खिलौने हैयहाँ अरमान लुटा कर हम बड़े डॉलर बचाते है, तरस जाते है अपनों की मुहब्बत को तो हम यारोसिरहाने रख कर तस्वीरे बहुत आँसू बहाते है, ठिठुरती सर्द रातों में अकेले जा के साहिल परतरसती खाली आँखों में समन्दर भर के लाते है, किसी बच्चे की किलकारी नहीं सुन पाते सालो सेख्यालो में यहाँ कांधो पे उसको हम सुलाते है, वतन से दूर आ कर जो बड़ी दौलत कमाते हैकभी आओ हमें देखो कि गम - [यूँ ही हर बात पे हँसने का बहाना आये...](https://bazmeshayari.com/yun-hi-har-baat-pe-hansne-ka-bahana/): यूँ ही हर बात पे हँसने का बहाना आयेफिर वो मासूम सा बचपन का ज़माना आये, काश ! लौटे मेरे पापा भी खिलौने ले करकाश फिर से मेरे हाथो में खज़ाना आये, काश ! दुनियाँ की भी फ़ितरत हो मेरी माँ जैसीजब मैं बिन बात के रूठूँ तो मनाना आये, हमको क़ुदरत ही सीखा देती है कितनी बातेंकाश ! उस्तादों को भी क़ुदरत सा पढ़ाना आये, आह ! सहसा कभी स्कूल से छुट्टी जो मिलेचीख कर बच्चो का वो शोर मचाना आये, आज बचपन कही बस्तों में ही उलझा हैकाश ! फिर वो तितली को पकड़ना वो उड़ाना आये..!! - [अहल ए उल्फ़त के हवालो पे हँसी आती है...](https://bazmeshayari.com/ahle-ulfat-ke-hawalo-pe-hansi-aati-hai/): अहल ए उल्फ़त के हवालो पे हँसी आती हैलैला मज़नू की मिसालो पे हँसी आती है, जब भी तमसील ए मुहब्बत का ख्याल आता हैमुझको अपने ही ख्यालो पे हँसी आती है, लोग अपने लिए औरो में वफ़ा ढूँढ़ते हैइन गैरो में वफ़ा ढूँढने वालो पे हँसी आती है, देखने वालो ! तबस्सुम को करम मत समझोमासूमियत देख देखने वालो पे हँसी आती है, चाँदनी रात मुहब्बत में हसीं थी लेकिनअब तो इन बीमार उजालो पे हँसी आती है..!! - [ज़ी चाहता है फ़लक पे जाऊँ....](https://bazmeshayari.com/jee-chahta-hai-falaq-pe-jaaoon/): ज़ी चाहता है फ़लक पे जाऊँसूरज को गुरूब से बचाऊँ, बस मेरा चले जो गर्दिशो परदिन को भी न चाँद को बुझाऊँ, मैं छोड़ के सीधे रास्तो कोभटकी हुई नेकियाँ कमाऊँ, इमकान पे इस कदर यकीं हैसहराओं में बीज डाल आऊँ, मैं शब के मुसाफिरों की खातिरमशाल न मिले तो घर जलाऊँ, अशआर है मेरे इस्तआरेआओ तुम्हे आईना मैं दिखलाऊँ, यूँ बँट के बिखर के रह गया हूँहर शख्स में अपना अक्स मैं पाऊँ, आवाज़ जो दूँ किसी के दर परअन्दर से भी ख़ुद ही निकल के आऊँ, ऐ चारागराँ अस्र ए हाज़िरफौलाद का दिल मैं कहाँ से लाऊँ ? - [अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की...](https://bazmeshayari.com/shaharo-se-khabar-aati-hai/): अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों कीकोई पहचान ही बाक़ी नहीं वीरानो की, दिल में वो ज़ख्म खिले है कि चमन क्या शय हैघर में बारात सी उतरी हुई गुल दानो की, उनको क्या फ़िकर कि मैं पार लगा या डूबाबहस करते रहे साहिल पे जो तूफानों की, तेरी रहमत तो मुसल्लम है मगर ये तो बताकौन बिजली को ख़बर देता है काशानो की, मक़बरे बनते है जिन्दो के मकानों से बुलंदकिस कदर औज़ पे तक़रिम है इंसानों की, एक एक याद के हाथो पे चिरागों भरे तश्तकाबा दिल की फ़ज़ा है कि सनम खानों की..!! - [अंदाज़ हू ब हू तेरी आवाज़ ए पा का था...](https://bazmeshayari.com/andaz-hoo-ba-hoo/): अंदाज़ हू ब हू तेरी आवाज़ ए पा का थादेखा निकल के घर से तो झोंका हवा का था, उस हुस्न ए इत्तिफ़ाक पे लुट कर भी शाद हूँतेरी रज़ा जो थी वो तकाज़ा वफ़ा का था, दिल राख हो चुका तो चमक और बढ़ गईये तेरी याद थी कि अमल कीमिया का था, उस रिश्ते ए लतीफ़ के इसरार क्या खिलेंतू सामने था और तसव्वुर ख़ुदा का था, छुप छुप के रोऊँ और सर ए अंजुमन हँसूमुझको ये मशविरा मेरे दर्द ए आशना का था, उठा अज़ीब तसाद से इन्सान का ख़मीरआदि फ़ना का था तू पुजारी बक़ा का - [जब तेरा हुक्म मिला तर्क ए मुहब्बत कर दी...](https://bazmeshayari.com/jab-tera-huqm-mila/): जब तेरा हुक्म मिला तर्क ए मुहब्बत कर दीदिल मगर उसपे वो धड़का कि क़यामत कर दी, तुझसे किस तरह मैं इज़हार ए तमन्ना करतालफ्ज़ सोचा तो मायने ने बग़ावत कर दी, मैं तो समझा था कि लौट आते है जाने वालेतूने जा कर तो जुदाई मेरी क़िस्मत कर दी, तुझको पूजा है कि असनाम परस्ती की हैमैंने वहदत के मुफाहीम की कसरत कर दी, मुझको दुश्मन के इरादों पे भी प्यार आता हैतेरी उल्फ़त ने मुहब्बत मेरी आदत कर दी, पूछ बैठा हूँ मैं तुझसे तेरे कूचे का पतातेरे हालात ने कैसी तेरी सूरत कर दी, क्या तेरा ज़िस्म - [तलाशने सुकून को चला था एक रोज़ को...](https://bazmeshayari.com/talashne-chala-tha-sukun-ko/): तलाशने सुकून को चला था एक रोज़ कोनफ्स के पीछे चला था एक रोज़ वो, उसे ख़बर नहीं थी कि सुकून मिलेगा कहाँदूसरों के इशारो पर निकल पड़ा एक रोज़ वो, दौलत की रेल पेल थी, नौकरों की भीड़ थीफिर भी सुकून मिला नहीं, दिल था क्यों न मुतमईन, मुस्कुराहटो में खोट थी, उदास क्यूँ थी ज़िन्दगी ?तलाश ने जवाब को निकल पड़ा एक रोज़ वो, पहाड़ो की शैर की, समन्दरो को भी छान लियाआसमानों पे परवाज़ की, जंगलो में भी खो गया, न मिला कुछ तो चाँद पर भी पहुँच गयासारी दुनियाँ खँगालने पर भी ख़ाली हाथ रहा वो, - [अब पहन लीजिये नक़ाबो को....](https://bazmeshayari.com/ab-pahan-lijiye-naqabo-ko/): अब पहन लीजिये नक़ाबो कोआने दीजिये ना इन्क़लाबो को, तोड़ कर ख़ुशबू लीजिये एक बारऔर मसल दीजिये गुलाबो को, तुमसे मिल कर मैं भूल जाता हूँसब गुनाहों को सब सबाबों को, हैं तरसते हसीं देखे कोईछोड़ परदे के इज़्तराबो को, नाम पर तेरे वारता हूँ मैंशेर ओ हिक़मत की सब किताबो को, मेरे हर ख़्वाब की हो तुम ताबीरदेख मैंने लिया है ख़्वाबो को..!! - [किस तरह ये दिल हुआ तुम पर फ़िदा, लिख जाऊँगा](https://bazmeshayari.com/kis-tarah-ye-dil-hua-tum-pe-fida/): किस तरह ये दिल हुआ तुम पर फ़िदा, लिख जाऊँगाअपनी पेशानी पे अपनी हर खता लिख जाऊँगा, नेक नामी आपकी क़ायम रहेगी इस तरहआपको मासूम, मैं ख़ुद को बुरा लिख जाऊँगा, लौह पर मुझसे ख़ुदा लिखवाए गर मेरी रज़ावो हमेशा ख़ुश रहे मैं यही दुआ लिख जाऊँगा, तजरुबा जिससे मेरे दिल ने बहुत पाया सुरूरदेखना उनकी हया की इन्तेहा लिख जाऊँगा, मैं वसीयत में लहद अपनी सजाने के लिएहो कफ़न मेरा फ़क़त उनकी रिदा, लिख जाऊँगा..!! - [शिद्दत से हो रहा है दिल बेक़रार आ जा...](https://bazmeshayari.com/shiddat-se-ho-raha-hai-dil-beqarar/): शिद्दत से हो रहा है दिल बेक़रार आ जामुमकिन नहीं है मुझसे अब इंतज़ार आ जा, इस बार भी हवाओं में ताज़गी नहीं हैगुज़री थी तेरे बिन ही पिछली बहार आ जा, जज़्बात की तेरे घर बारात भेजता हूँअश्को की पालकी में होकर सवार आ जा, दुनियाँ के शोर ओ गुल से छुटकारा चाहता हूँसुन ख़ामोशी में अपने दिल की पुकार आ जा, फूलो में ताज़गी थी तेरी नज़ाकतो सेबिस्तर पे चुभ रहे है गुल बन के ख़ार आ जा, याद आ रही है तेरे हाथो की हर शरारतचेहरे को छू रही है फिर से फ़ुहार आ जा, लो शाम - [वो दिखी थी आज ख़्वाब में मुझे....](https://bazmeshayari.com/wo-dikhi-thi-aaj/): वो दिखी थी आज ख़्वाब में मुझेचेहरा उनका गुलाब जैसा था, पड़ी जो नज़र तो झुकी न पलकवो देखने में माहताब जैसे था, सादगी तो उनकी पूछो ही नावो बरअक्स चौदहवी के चाँद जैसा था..!! - [कुछ लफ्ज़ अगर मुझे मिल जाएँ....](https://bazmeshayari.com/kuch-lafz-agar-mil-jaayen/): कुछ लफ्ज़ अगर मुझे मिल जाएँमैं उनमे तुझे तहरीर करूँ, अपनी ज़ात के रंग तुझमे भर करतुझे फिर से मैं तहरीर करूँ, तू पलकों पर जो ख़्वाब बनेमैं उन सबकी ताबीर करूँ, तेरे दिल में अपनी धड़कन रख करतेरी रूह को अपनी जागीर करूँ..!! - [धनक के रंग चुरा ले हमारा बस जो चले...](https://bazmeshayari.com/dhanak-ke-rang-chura-le/): धनक के रंग चुरा ले हमारा बस जो चलेतेरी हथेली में डाले हमारा बस जो चले, बना के वक़्त का कोई वज़ूद सूरज साउसे डुबोये निकाले हमारा बस जो चले, ये चाँद गेंद के जैसे उछालते जाएँसितारे जेब में डाले हमारा बस जो चले, तुम्हारी मिट्टी को गुँथे हम अपनी मिट्टी मेंफिर एक ज़िस्म में ढाले हमारा बस जो चले, ज़मीं ने बाँध के रखा है जिस कशिश से ये चाँदतुम्हे यूँ ख़ुद से लगा ले हमारा बस जो चले, ये कार ए इश्क़ जुनूं है न जान ए शीशा गरीतुम्हे तो नोच के खा ले हमारा बस जो चले, - [चलो मंज़ूर है मुझको, मुझे कुछ भी सजा दे दो...](https://bazmeshayari.com/chalo-manzoor-hai-mujhko/): चलो मंज़ूर है मुझकोमुझे कुछ भी सजा दे दोसुनो ! गर मिल नहीं पाएतो एक दूजे से कहते हैकि क़िस्मत ही कुछ ऐसी थीहमारा दोष ही कब था ?तुम्हे पाने की मैंने भीबहुत कोशिश तो की लेकिनमेरी मजबूरियाँ समझोमैं तुमसे प्यार करता हूँतुम्हे मैं खो नहीं सकतातुम्हारे साथ रह लूँगातुम्हारा हो नहीं सकतातुम्हे मालूम तो है न ?फ़क़त एक तुम ही ऐसी होजो मुझसे ख़ूब वाकिफ़ हैमुझे गर तुम न समझोगीभला फिर कौन समझेगा ? मेरा तुम साथ दोगी ना ?कहो भी साथ दोगी ना ?कि जबतक साँस बाकी हैरहेंगे राब्ते में हमक़सम मेरी उठाओ तुमकहीं ना तुम बदल जानामेरी - [जब से या रब मैं तेरे इस जहान में हूँ...](https://bazmeshayari.com/jabse-yaa-rab-main/): एक मुसलसल से इम्तिहान में हूँजबसे या रब मैं तेरे इस जहान में हूँ, सिर्फ़ इतना सा है क़सूर मेरामैं नहीं वो हूँ जिस गुमान में हूँ, कौन पहुँचा है आसमानों तकएक सदी से बस उड़ान में हूँ, जिस खता ने ज़मीन पर पटकाढीठ ऐसा कि फिर उसी ध्यान में हूँ, अपने किस्से में भी यूँ लगता हैमैं किसी और दास्तान में हूँ, दर ओ दीवार भी नहीं सुनतेइतना तन्हा मैं इस मकान में हूँ, ज़िन्दगी एक लिहाफ़ ए मलमली हैसर्द मौसम है और खीच तान में हूँ, तौलती है मुझे यूँ सबकी नज़रेजैसे मैं कोई जिन्स किसी दुकान में - [ऐसा न हो कि हर एक शय में मुझे तेरा गुमाँ होने लगे](https://bazmeshayari.com/aisa-na-ho-ki-mujhe/): ये तो इस पर है कि कब और कहाँ होने लगेये तमाशा वो जहाँ चाहे वहाँ होने लगे, क़ुर्ब के सिलसिले इतने न बढ़ा ऐसा न होकि हर एक शय में मुझे तेरा गुमाँ होने लगे, काश लफ्ज़ो के सहारे की ज़रूरत न पड़ेदर्द ए दिल ख़ुद ही किसी तौर बयाँ होने लगे, वो जो एक उम्र गुरेजाँ रहे हमसे यारो !अब वही लोग क़रीब ए रग ए जाँ होने लगे, ये ग़रीबी भी बड़ा काम हमारे आईइसके आते ही कई चेहरें अयाँ होने लगे, कल हमें जान ए तमाशा थे तमाशागर भीक्या अज़ीब आज तमाशा सर ए जान होने - [ग़ज़ल को फिर सजा के सूरत ए महबूब लाया हूँ...](https://bazmeshayari.com/gazal-ko-fir-saja-ke-surat-e-mahbub/): ग़ज़ल को फिर सजा के सूरत ए महबूब लाया हूँसुनो अहल ए सुखन ! मैं फिर नया असलूब लाया हूँ, कहो, दस्त ए मुहब्बत से हर एक दर पे दस्तक क्यों ?कहा, सबके लिए मैं प्यार का मक्तूब लाया हूँ, कहो, क्या दास्ताँ लाये हो दिल वालो की बस्ती से ?कहा, एक वाकया में आप से मंसूब लाया हूँ, कहो, ये ज़िस्म किसका ? जान किसकी ? रूह किसकी है ?कहा, तेरे लिए सब कुछ मेरे महबूब लाया हूँ, कहो, कैसे मिटा डालूँ अना, मैं इल्तज़ा कर के ?कहा, मैं तो लब पे अर्ज़ ए ना मतलूब लाया हूँ, कहो, - [दिल ए गुमशुदा ! कभी मिल ज़रा...](https://bazmeshayari.com/dil-e-gumshuda-kabhi-mil-zara/): दिल ए गुमशुदा ! कभी मिल ज़राकिसी ख़ुश्क खाक़ के ढेर परया किसी मकान की मुंडेर पर, दिल ए गुमशुदा ! कभी मिल ज़राजहाँ लोग हो, उसे छोड़ करकिसी राह पर, किसी मोड़ पर, दिल ए गुमशुदा ! कभी मिल ज़रामुझे वक़्त दे, मेरी बात सुन !मेरी हालतों को तू देख लेमुझे अपना हाल बता कभीकभी पास आ, कभी मिल सहीमेरे हाल पूछ, बता मुझेमेरे किस गुनाह की सज़ा है ये ? तू जूनून साज़ भी ख़ुद बनामेरी वजह ए इश्क़ यकीं तेरामिला यार भी तो तेरे सबबवो गया तो तू भी चला गया, दिल ए गुमशुदा ये वफ़ा है - [शिक़स्त ए ख़्वाब के अब मुझमे हौसले भी नहीं..](https://bazmeshayari.com/shikast-e-khwab-ke-ab-mujh-me/): आँखों में नींदों के सिलसिले भी नहींशिक़स्त ए ख़्वाब के अब मुझमे हौसले भी नहीं, नहीं नहीं ! ये ख़बर दुश्मनों ने दी होगीवो आये ! आ के चले भी गए ! मिले भी नहीं ! ये कौन लोग अँधेरे की बात करते हैअभी तो चाँद तेरी याद के ढले भी नहीं, अभी से मेरे रफूगर के हाथ थकने लगेअभी तो चाक मेरे ज़ख्म के सिले भी नहीं, खफ़ा अगरचे हमेशा हुए मगर अबवो बरहमी है कि हमसे उन्हें गिले भी नहीं, मुताअ ए क़ल्ब ओ ज़िगर है, हमें कहीं से मिलेमगर वो ज़ख्म जो उस दस्त ए शबनमी से - [यूँ ही उम्मीद दिलाते है ज़माने वाले...](https://bazmeshayari.com/yun-hi-ummid-dilate-hai/): यूँ ही उम्मीद दिलाते है ज़माने वालेकब पलटते है भला छोड़ के जाने वाले, तू कभी देख झुलसते हुए सहरा में दरख़्तकैसे जलते है वफ़ाओ को निभाने वाले, इनसे आती है तेरे लम्स की ख़ुशबू अब भीख़त निकाले हुए बैठा हूँ सब पुराने वाले, आ कभी देख ज़रा उनकी शबों में आ करकितना रोते है ज़माने को हँसाने वाले, कुछ तो आँखों की ज़बानी भी कह जाते हैमुँह से होते नहीं सब राज़ बताने वाले..!! - [कागज़ पर तहरीर दिलचस्प दास्तान हूँ मैं...](https://bazmeshayari.com/hasraton-se-bhara-qabristan/): हसरतों से भरा क़ब्रिस्तान हूँ मैंआबाद कर मुझे कि वीरान हूँ मैं, तसल्ली दे मुझको कि तू है इधरक़ैद में तन्हा परेशान हूँ मैं, तूने छोड़ दिया मुझे और बताया भी नहींइस हिमाक़त से तेरी हैरान हूँ मैं, फराक़त तेरी आख़िर मार ही डालेगीकबतक जिऊँगा इन्सान हूँ मैं, मेरी उम्र से ज्यादा है बोझ मुझ परबूढ़े तासीर का नौजवान हूँ मैं, किस तबीयत के ज़ालिम ने डसा है मुझेपूरा कर के छोड़ा हुआ अरमान हूँ मैं, मुझे पढ़ता है ये ज़माना बड़े जौक के साथकागज़ पर तहरीर दिलचस्प दास्तान हूँ मैं..!! - [तरसती आँखे, उदास चेहरा, नहीफ़ लहज़ा, बगैर तेरे...](https://bazmeshayari.com/tarasti-aankhe-udas-chehra/): तरसती आँखे, उदास चेहरा, नहीफ़ लहज़ा, बगैर तेरेबिखरी ज़ुल्फे, लिबास उजड़ा, वज़ूद ख़स्ता, बगैर तेरे, अमीक़ जंगल, घप अँधेरा, डूबती साँसे, ज़ईफ़ धड़कनबरहना पाँव, बे नाम मंज़िल, निशाँ न रास्ता, बगैर तेरे, ख़ामोश बुलबुल, सर्दियत झड, बेरंग मौसम, वीरान गुलशनन फूल ख़ुशबू, हवा न बादल न कोई नगमा, बगैर तेरे, उम्मीद मद्धम, मिज़ाज बरहम, मायूस जीवन, बेआस हरदमन कोई ख्वाहिश न कोई हसरत, न है तमन्ना, बगैर तेरे, काली सुबहे, सुर्ख रातें, वक़्त साकीन, उदास शामेहज़ार सदियों के है बराबर हर एक लम्हे, बगैर तेरे, तावीज़ उलटे, अधूरी मन्नत, वजीफे, जादू नाकाम सारेन इस्तखारा ही काम आया, न कोई धागा, - [मेरे जैसा बन जाओगे, जब इश्क़ तुम्हे हो जाएगा...](https://bazmeshayari.com/jab-ishq-tumhe-ho-jayega/): मेरे जैसा बन जाओगे, जब इश्क़ तुम्हे हो जाएगादीवारों से टकराओगे, जब इश्क़ तुम्हे हो जाएगा, हर बात गँवारा कर लोगे, मन्नत भी उतारा कर लोगेताबीज़े भी बंधवाओगे, जब इश्क़ तुम्हे हो जाएगा, तन्हाई के झूले झूलोगे, हर बात पुरानी भूलोगेख़ुद से घबड़ा जाओगे, जब इश्क़ तुम्हे हो जाएगा, जब सूरज भी खो जाएगा और चाँद कही छुप जाएगातुम भी घर देर से आओगे, जब इश्क़ तुम्हे हो जाएगा, बेचैनी जब हद से बढ़ जाएगी और याद किसी की आयेगीफिर तुम भी गज़ले गाओगे, जब इश्क़ तुम्हे हो जाएगा..!! - [दर्द का शहर बसाते हुए रो पड़ता हूँ...](https://bazmeshayari.com/dard-ka-shahar-basaate-hue-ro-padta-hoo/): दर्द का शहर बसाते हुए रो पड़ता हूँरोज़ घर लौट के आते हुए रो पड़ता हूँ जाने क्या सोच के ले लेता हूँ ताज़ा गजरेऔर फिर फेकने जाते हुए रो पड़ता हूँ ज़िस्म पे चाकू से हँसते हुए जो लिखा थाअब तो वो नाम दिखाते हुए रो पड़ता हूँ राह तकते हुए देखूँ जो किसी तन्हा कोजाने क्यूँ आस दिलाते हुए रो पड़ता हूँ लोग जब रोग की तफ़सील तलब करते हैसख्त एक बात छुपाते हुए रो पड़ता हूँ गरम थी चोट तभी लिख सका ये गम की बियाधअब तो एक शेर सुनाते हुए रो पड़ता हूँ रोज़ दिल करता - [बहुत सलीक़े से चीख ओ पुकार करते रहे...](https://bazmeshayari.com/bahut-salike-se-chikh-o-pukar/): बहुत सलीक़े से चीख ओ पुकार करते रहेहम अपने दर्द के मरकज़ पे वार करते रहे ज्यादा उम्र तो गाड़ी घसीटने में कटीजहाँ पे हो सका किस्तों में प्यार करते रहे सवाद ए अक्ल में मजनूं की आबरू के लिएहम एक हाथ से दामन को तार करते रहे कही कही पे हमारी पसंद पूछी गईज्यादा काम तो बे इख़्तियार करते रहे थी नींद मुफ़्त मगर ये भी ख़ुद को दे न सकेगिज़ा के नाम पे बस ज़हर मार करते रहे ट्रेन छुटी तो कितने ही अश्क छूट गएतमाम उम्र नशिस्तें शुमार करते रहे उदास रुत में जो यादो का उजड़ा - [तुझसे मंसूब रहूँ तेरी कही जाऊँ पिया...](https://bazmeshayari.com/tujhse-mansub-rahoo/): तुझसे मंसूब रहूँ तेरी कही जाऊँ पियातेरी निस्बत से लिखी और पढ़ी जाऊँ पिया झूमती फिरती हवाओ की तरह से मैं भीचूम कर लम्स तेरा मस्त हुई जाऊं पिया तेरे अहसास से लिपटी रहूँ खुशबु की तरहरात की रानी बनू और खिली जाऊँ पिया तेरी आहट का समाअत में कोई दर जो खुलेमैं उसी दर में दीया बन के जली जाऊँ पिया रात के पिछले पहर वज्द के आलम में कहीमैं तेरी रूह में तहलील हुई जाऊँ पिया फिर तेरे इश्क़ में खुशबु का बदन पहने हुएतेरी चौखट पे अगर बन के जली जाऊँ पिया जब कही कोई फ़कीरो में - [दर्द से यादो से अश्को से शनासाई है...](https://bazmeshayari.com/dard-se-yaado-se-ashko-se/): दर्द से यादो से अश्को से शनासाई हैकितना आबाद मेरा गोशा ए तन्हाई है, ख़ार तो ख़ार है कुछ गुल भी खफ़ा है मुझसेमैंने काँटो से उलझने की सज़ा पाई है, मेरे पीछे तो है हर आन ये खल्क़त का हुजूमअब ख़ुदा जाने ये इज्ज़त है कि रुसवाई है, ख़ुदा जाने उनका दीदार कैसा क़यामत होगाजब फ़क़त उनके तस्वीर में ये रअनाई है..!! - [हवा ए शाम ! ज़रा सा क़याम होगा न ?](https://bazmeshayari.com/hawa-e-shaam/): हवा ए शाम ! ज़रा सा क़याम होगा न ?चिराग़ ए जाँ को जलाओ, क़लाम होगा न ? बस एक बात ही पूछी बिछड़ने वाले नेकभी कही पे मिले तो, सलाम होगा न ? वहाँ बहशत में ख़ोर ओ कसूर होंगे मगरक़रार ए जाँ का भी कुछ इंतज़ाम होगा न ? कभी कभी ही लेकिन पुकारते है तुझेहमारा चाहने वालो में शुमार नाम होगा न ? अगर मैं आधा अधूरा ही लौट आऊँ तोनिगाह ए नाज़ ! वही एहतिमाम होगा न ? बस एक आखिरी बार मुहब्बत से देखना हैबताओ ! तुमसे ये छोटा सा काम होगा न ?? - [अब तेरी याद से वहशत नहीं होती मुझ को...](https://bazmeshayari.com/ab-teri-yaad-se-wahshat-nahi/): अब तेरी याद से वहशत नहीं होती मुझ कोज़ख़्म खुलते हैं अज़िय्यत नहीं होती मुझ को, अब कोई आए चला जाए मैं ख़ुश रहता हूँअब किसी शख़्स की आदत नहीं होती मुझ को, ऐसा बदला हूँ तेरे शहर का पानी पी करझूट बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझ को, है अमानत में ख़यानत सो किसी की ख़ातिरकोई मरता है तो हैरत नहीं होती मुझ को, तू जो बदले तेरी तस्वीर बदल जाती हैरंग भरने में सुहूलत नहीं होती मुझ को, अक्सर औक़ात मैं ता’बीर बता देता हूँबाज़ औक़ात इजाज़त नहीं होती मुझ को, इतना मसरूफ़ हूँ जीने की हवस में - [जाते जाते वो हमको रुला कर चला गया...](https://bazmeshayari.com/jaate-jaate-wo-humko/): जाते जाते वो हमको रुला कर चला गयागम की आँधी से सामना कर कर चला गया, वो हमेशा के लिए छोड़ कर हमकोदिल के अरमान मिट्टी में मिला कर चला गया, वो जिसकी रौशनी से मुनव्वर था दिल अपनाआज वही चिराग़ ए उल्फ़त बुझा के चला गया, वो जिसके प्यार में पागल थे हम सुबह ओ शामआज वही हमें मजनूं दीवाना बना कर चला गया, वो जिसकी वफ़ा पर हमें नाज़ था बहुतआज वही सबक़ ए बेवफ़ाई पढ़ा कर चला गया, वू जिसकी दोस्ती दुनियाँ में ज़िन्दा मिसाल थीआज वही पीठ में खंज़र लगा कर चला गया..!! - [कोई सिपाही नहीं बच सका निशानों से...](https://bazmeshayari.com/koi-sipahi-nahi-bach-saka/): कोई सिपाही नहीं बच सका निशानों सेगली में तीर बरसते रहे मकानों से, ये बर्बादी अचानक से थोड़ी आई हैकलाम करना पड़ा मुझको बदज़ुबानो से, हमारे राह में दीवार बन गए वो लोगजिन्हें सुनाई भी नहीं दे रहा था कानो से, तमाशे यूँ ही नहीं कामयाब हो जातेमकीं खींच के लाये गए मकानों, बहुत से शेर सुनाएँ है गुनगुना के मगरये जंग जीती नहीं जा रही अब तरानों से..!! - [उल्फ़त की नज़र से हमें एक बार तो देखो...](https://bazmeshayari.com/ulfat-ki-nazar-se-hame/): उल्फ़त की नज़र से हमें एक बार तो देखोकरते है क्या क्या तुम पे निसार तो देखो, जज़्बे गर हो सच्चे और दिल में लगन होगिर जाती है रस्ते की हर एक दीवार तो देखो, करूँ कैसे उससे मैं अपने दिल की बातक्या है मेरी औक़ात, ज़रा मेरे सरकार तो देखो, देती है वो ज़ख्म ऐसे, जिसका मरहम भी नहीं कोईशमशीर से भी होती है ज़ुबान तेज़ धार तो देखो, बात जो भी करो, जिससे भी करो पूरी ही करोटूट जाए जो एक बार तो फिर होता नहीं ऐतबार तो देखो, ज़िन्दगी हो जाएगी आसाँ और कभी मोहताज़ न होगीचादर - [जान ओ दिल हम उन्ही पे निसार करते है...](https://bazmeshayari.com/jaan-o-dil-unhi-pe-nisar/): जान ओ दिल हम उन्ही पे निसार करते हैहाँ है इक़रार सिर्फ उन्हें ही प्यार करते है, बंद हो या खुली हो ये मेरी आँखेहर लम्हा बस उन्ही का ही दीदार करते है, महफ़िल कोई भी हो, कैसी भी होहर जगह, हर सिम्त ज़िक्र ए दिलदार करते है, तर्क ए ताअल्लुक़ कर के भी उन्होंने देखा हैआशिक़ फिर भी मिलने का इसरार करते है, शराब का सा नशा है उनकी आँखों मेंफिर भी डूब के उनमे हम ख़ुद को बीमार करते है..?? - [भाइयो में फ़साद क्या करूँ मैं...??](https://bazmeshayari.com/bhaiyo-me-fasad-kya-karoo-main/): भाइयो में फ़साद क्या करूँ मैंबाप की ज़ायदाद क्या करूँ मैं, जिन में चुप रहने की नसीहत होऐसे शेरो पे दाद क्या करूँ मैं, लोग महफूज़ है मेरे दम सेऔर कैसा जिहाद क्या करूँ मैं, अपने हाथो से चोरी हो चुका हूँआप पर ऐतमाद क्या करूँ मैं ? सीने जैसा कोई सफ़ीना नहींनाख़ुदाओ को याद क्या करूँ मैं ? मैं उसे कामयाब लग रहा हूँऔर उसे नामुराद क्या करूँ मैं ? याद तो कर लूँ मैं तुझे लेकिनयाद करने के बाद क्या करूँ मैं..?? - [मेरे दिल में मुहब्बत ज़रा देखिए...](https://bazmeshayari.com/mere-dil-me-muhabbat-zara/): मेरे दिल में मुहब्बत ज़रा देखिएचश्म ए पुरनम से मेरी वफ़ा देखिए, छोड़ जाएँगे मुझको ये एहसास हैजाते जाते यूँ मुझको ज़रा देखिए, तुझको देखा अज़ीब कैफ़ तारी हुआमेरे दिल की ये महकी फिज़ा देखिए, आप है कि मिलने को राज़ी नहींजान ए जानाँ मेरी ये सदा देखिए, देख कर तुझको फिर से जो देखा तुझेहो गया तुझ पे फिर से फ़िदा देखिए, ज़िस्म है मुंजमिद रूह कही और हैहासिल है नवाब को ये सज़ा देखिए..!! - [जाने कितने रकीब रहते है...](https://bazmeshayari.com/jaane-kitne-raqib-rahte-hai/): जाने कितने रकीब रहते हैज़िन्दगी के क़रीब रहते है, मेरी सोचो के आस्तां से परेमेरे अपने हबीब रहते है, उनको दिल की दवा नहीं मिलतीजिनके घर में तबीब रहते है, जैसे सहरा में शाम ढलती हैऐसे अपने नसीब रहते है, तुमने देखा नहीं मगर दिल मेंवसवसे तो अज़ीब रहते है, कुछ फ़कीरो के भेष में अक्सरबादशाह भी क़रीब रहते है..!! - [ग़ज़ल की शक्ल में एक बात है सुनाने की...](https://bazmeshayari.com/gazal-ke-shakl-me-ek-baat/): ग़ज़ल की शक्ल में एक बात है सुनाने कीएक उसका नाम है वजह मुस्कुराने की, इस तरह राब्ता क़ायम है उनकी महफ़िल सेअब क़ैद हट गई तसव्वुर में आने जाने की, ज़माना छूटता है छूट जाए क्या परवाह ?बस एक फ़रेब खुर्दा जान है ज़माने की, क्यों आप दे रहे है मुझको लालच ए दुनियाँ ?मैं नवाब ज़ाद हूँ मुझे हाज़त नहीं ज़माने की, हिम्मत ही दब गई वाइज़ो की ये सुन करहिम्मत नहीं मुझे हक़ बात को छुपाने की, दुनियाँ बदल गई जबसे मैं हो गया उनकाअज़ीब ये शान है मुर्शिद से दिल लगाने की, तमन्ना यही है जीते - [नहीं ऐसे किसी को तड़पाना चाहिए...](https://bazmeshayari.com/nahi-aise-kisi-ko-tadpana/): भूल पाते हम नहीं गुज़रा ज़माना चाहकर भीया खुदा नहीं ऐसे किसी को तड़पाना चाहिए, संगदिलो में भी अता कर रहमदिली या ख़ुदाइश्क़ में रस्म ए उल्फत निभाना आना चाहिए, या ख़ुदा हो मयस्सर रहमत तेरी इतनी किवक्त कैसा भी हो सबका गुज़र जाना चाहिए..!! - [रहा हूँ दुश्मनों में ख़ुश हमेशा....](https://bazmeshayari.com/raha-hoo-dushmano-me/): मुझे अपनों में उलझन ही रही हैरहा हूँ दुश्मनों में ख़ुश हमेशा, है इनकी इस अदा पे जान हाज़िरये खुल के वार करते है हमेशा, ये जज्बो को नहीं हथियार करतेकही दुश्मन, रहे दुश्मन हमेशा, ये रखते है समझ अच्छे बुरे कीसो चाह के भी नहीं लड़ते हमेशा, इधर अपनों का तुमको क्या बताएँ ?ये छुप के वार करते है हमेशा, इन्हें अच्छे बुरे से क्या गरज़ हैहसद जब काम है इनका हमेशा, खता खाता हूँ मैं हर बार इनसेकि मुझको ये कहे अच्छा हमेशा, मुझे अपनों से बस यही गिला हैकहेंगे कुछ करेंगे कुछ हमेशा, जो मिलना छोड़ दो - [फ़ासले क़ुर्ब की पहचान हुआ करते है...](https://bazmeshayari.com/fasle-qurb-ki-pahchan/): फ़ासले क़ुर्ब की पहचान हुआ करते हैबेसबब लोग परेशान हुआ करते है, ये हकीक़त है जहाँ टूट के चाहा जाएवहाँ बिछड़ने के भी इमकान हुआ करते है, मेरे फैले हुए हाथो को हिक़ारत से न देखमाँगने वाले भी इन्सान हुआ करते है, हम बेसब्र थे मगर हमसे बिछड़ने वालेहम तेरे ज़ब्त पर हैरान हुआ करते है, गम की शिद्दत से कोहेसार पिघलते देखेइन्सान तो फिर इन्सान हुआ करते है, ज़िन्दगी जिनके लिए ज़ुर्म ओ सज़ा होघर भी उनके लिए ज़िन्दान हुआ करते है..!! - [नींद ना आये फूलो पे, काँटो पे सोना पड़ता है...](https://bazmeshayari.com/neend-naa-aaye-phoolo/): यहाँ पल पल चलना पड़ता हैहर रंग में ढलना पड़ता है, हर मोड़ पे ठोकर लगती हैहर हाल में चलना पड़ता है, हर दिल को समझने की खातिरबस ख़ुद से लड़ना पड़ता है, कभी ख़ुद को खोना पड़ता हैकभी छुप के रोना पड़ता है, कभी नींद न आये फूलो पेकाँटो पे सोना पड़ता है, कभी मर के जीना पड़ता हैकभी जी के मरना पड़ता है, कभी तो खुशियाँ लौट के आयेंगीइस आस में जीना पड़ता है, हर हाल में चलना पड़ता हैहर हाल में जीना पड़ता है..!! - [सर रख कर रोने को शाना चाहिए था...](https://bazmeshayari.com/sar-rakh-kar-rone-ko/): सर रख कर रोने को शाना चाहिए थामैं तन्हा था तुझको आना चाहिए था, आज मैं आया था ख़ुद को परसा देनेमुझको बीच से हट जाना चाहिए था, महफ़िल मेरी वीरान होती जाती हैहम उम्रो को दोस्त बनाना चाहिए था, बस एक लम्हा चाहा था दिलदारी काकौन सा मुझको एक ज़माना चाहिए था ? आज के दिन अच्छा था घर में रहना हीवहशत करनी थी, वीराना चाहिए था, तू भी मेरा ग़म ही बाँटने आया हैयार ! मेरा कुछ तो ध्यान बटाना चाहिए था, किस को मेरा साथ निभाना आता है ?तुझको तो मेरा साथ निभाना चाहिए था, हद से - [जिस शेर का उन्वान मुहब्बत थी, वो तुम थे...](https://bazmeshayari.com/jis-sher-ka-unwan-muhabbat-thi/): जिस शेर का उन्वान मुहब्बत थी, वो तुम थेजिस दर्द का दरमान मुहब्बत थी, वो तुम थे, रंगीन सी गलियाँ वो नज़ारे, वो फज़ाएँजिस देश की पहचान मुहब्बत थी, वो तुम थे, हर ख़्वाब चमन ज़ार था, हर सोच थी गुलरंगकलियों पे जो मुस्कान, मुहब्बत थी, वो तुम थे, सपनो का सजाया हुआ एक ताज़ महल थादिल में जो थे अरमान, मुहब्बत थी, वो तुम थे, दिल के ग़रीब खाने पे दस्तक दिए बगैरआया था जो मेहमान, मुहब्बत थी, वो तुम थे, एक पल नहीं, ना दिन ओ रात, न माह ओ सालसदियों से जो पहचान, मुहब्बत थी, वो तुम - [चाहा है तुझे मैंने तेरी ज़ात से हट कर...](https://bazmeshayari.com/chaha-hai-tujhe-teri/): चाहा है तुझे मैंने तेरी ज़ात से हट करइस बार खड़ा हूँ मैं रवायात से हट कर, तुम इश्क़ के किस्से मुझे आ कर न सुनाओदुनियाँ में नहीं कुछ भी मफ़ादात से हट कर, जिस शख्स को पूजा था उसे माँग रहा हूँमैं माँग रहा हूँ उसे औकात से हट कर, हाँ सोच रहा हूँ मैं तुझे अपना बना लूँहाँ सोच रहा हूँ मैं ख्यालात से हट कर, गम ये है कि मैं अपने क़बीले का बड़ा हूँचलना ही पड़ेगा मुझे सुकरात से हट कर, वाएज़ ने कहा अक्ल कहाँ पर है तुम्हारीमैंने ये कहाँ ख़ुल्द के बागात से हट - [तुझे ना आयेगी मुफ़लिस की मुश्किलात समझ..](https://bazmeshayari.com/tujhe-naa-ayegi-muflis-ki/): तुझे ना आयेगी मुफ़लिस की मुश्किलात समझमैं छोटे लोगो के घर का बड़ा हूँ, बात समझ, मेरे अलावा है छः लोग मुनहसर मुझ परमेरी हर एक मुसीबत को ज़र्ब सात समझ, फ़लक से कट के ज़मीन पर गिरी पतंग देखतो हिज़्र काटने वालो की नफ्सियात समझ, शुरू दिन से उधेड़ा गया है मेरा वज़ूदजो देख रहा है इसे मेरी बाकियात समझ, क़िताब ए इश्क़ में हर आह ! एक आयत हैऔर आँसूओ को हरुफ़ ए मक्तआ’त समझ, करे ये काम तो कुनबे का दिन गुज़रता हैहमारे हाथो को घर की घड़ी के हाथ समझ, दिल ओ दिमाग ज़रूरी है ज़िन्दगी - [हमको आना ही पड़ा परदेश कमाने के लिए...](https://bazmeshayari.com/humko-aana-hi-pada-pardesh/): राह से हिज़्र की दीवार हटाने के लिएहाथ भी जोड़े उसको मनाने के लिए, अपनी खातिर तो कभी जी के नहीं देख सकेउम्र सब हमने बसर की है ज़माने के लिए, मौसम ए हिज़्र करे रोज़ ही रोने की तलबआँख में अश्क नहीं अब कि बहाने के लिए, कीमती चीज मुहब्बत थी सो बर्बाद हुईपास अब कुछ भी नहीं यार बचाने के लिए, इस कदर घेर के रखा है उदासियो ने मुझेसिर्फ़ हँसता हूँ मैं अब तस्वीर खिचाने के लिए, घर के हर फ़र्द की ख्वाहिश का लिए बोझ लिएहमको आना ही पड़ा परदेश कमाने के लिए..!! - [फिर यूँ हुआ कि रास्ते यकज़ा नहीं रहे...](https://bazmeshayari.com/fir-yun-hua-ki/): फिर यूँ हुआ कि रास्ते यकज़ा नहीं रहेवो भी अना परस्त था मैं भी अना परस्त, फिर यूँ हुआ कि साथ तेरा छोड़ना पड़ासाबित हुआ कि लाज़िम ओ मलज़ूम कुछ नहीं, फिर यूँ हुआ कि हाथ से कश्कोल गिर गयाखैरात ले के मुझसे चला तक नहीं गया, वो कर नहीं रहा था मेरी बात का यकीनफिर यूँ हुआ कि मर के दिखाना पड़ा मुझे, फिर यूँ हुआ कि शेर सारे खत्म हो गएफिर यूँ हुआ कि सर को खुजाने लगे सभी, फिर यूँ हुआ कि ज़िस्म ही पत्थर का हो गयारोका जब एक शख्स की आवाज़ ने मुझे, फिर यूँ - [रात भी, नींद भी, कहानी भी...](https://bazmeshayari.com/raat-bhi-neend-bhi/): रात भी, नींद भी, कहानी भीहाय, क्या चीज़ है जवानी भी एक पैग़ाम-ए-ज़िन्दगानी भीआशिक़ी मर्गे-नागहानी भी इस अदा का तेरी जवाब नहींमेहरबानी भी, सरगरानी भी दिल को अपने भी ग़म थे दुनिया मेंकुछ बलायें थी आसमानी भी मंसबे-दिल खुशी लुटाना हैग़मे-पिन्हाँ की पासबानी भी दिल को शोलों से करती है सेराबज़िन्दगी आग भी है, पानी भी शादकामों को ये नहीं तौफ़ीक़दिले-गमगीं की शादमानी भी लाख हुस्न-ए-यकीं से बढकर हैउन निगाहों की बदगुमानी भी तंगना-ए-दिले-मलूल में हैबहर-ए-हस्ती की बेकरानी भी इश्क़े-नाकाम की है परछाईशादमानी भी, कामरानी भी देख दिल के निगारखाने मेंज़ख्म-ए-पिन्हाँ की है निशानी भी ख़ल्क़ क्या क्या मुझे नहीं - [खो न जाए कहीं हर ख़्वाब सदाओं की तरह...](https://bazmeshayari.com/kho-naa-jaaye-har-khwab/): खो न जाए कहीं हर ख़्वाब सदाओं की तरहज़िंदगी महव-ए-तजस्सुस है हवाओं की तरह टूट जाए न कहीं शीशा-ए-पैमान-ए-वफ़ावक़्त बे-रहम है पत्थर के ख़ुदाओं की तरह हम से भी पूछो सुलगते हुए मौसम की कसकहम भी हर दश्त पे बरसे हैं घटाओं की तरह बारहा ये हुआ जा कर तेरे दरवाज़े तकहम पलट आए हैं नाकाम दुआओं की तरह कभी माइल-ब-रिफ़ाक़त कभी माइल-ब-गुरेज़ज़िंदगी हम से मिली तेरी अदाओं की तरह..!! - [कब तक यूँ बहारों में, पतझड़ का चलन होगा...](https://bazmeshayari.com/kabtak-yun-baharo-me/): कब तक यूँ बहारों में, पतझड़ का चलन होगाकलियों की चिता होगी, फूलों का हवन होगा, हर धर्म की रामायण युग-युग से ये कहती हैसोने का हिरण लोगे, सीता का हरण होगा, जब प्यार किसी दिल का पूजा में बदल जाएहर साँस दुआ होगी हर शब्द भजन होगा, ग़म गम के अंधेरों से, मायूस हो न जानाहर रात की मुट्ठी में, सूरज का रतन होगा..!! - [मेरे ख़ुदा मैं अपने ख़यालों को क्या करूँ..](https://bazmeshayari.com/mere-khuda-mai-apne/): मेरे ख़ुदा मैं अपने ख़यालों को क्या करूँअंधों के इस नगर में उजालों को क्या करूँ ? चलना ही है मुझे मेरी मंज़िल है मीलों दूरमुश्किल ये है कि पाँवों के छालों को क्या करूँ ? दिल ही बहुत है मेरा इबादत के वास्तेमस्जिद का क्या करूँ मैं शिवालों का क्या करूँ ? मैं जानता हूँ सोचना अब एक जुर्म हैलेकिन मैं दिल में उठते सवालों को क्या करूँ ? जब दोस्तों की दोस्ती है सामने मेरेदुनिया में दुश्मनी की मिसालों को क्या करूँ ?? -राजेश रेड्डी - [हौसले गम से लड़ गए मेरे...](https://bazmeshayari.com/hausle-gam-se-lad-gaye/): हौसले गम से लड़ गए मेरेअश्क मुश्किल में पड़ गए मेरे, मैंने हिज़रत का बीज क्या बोयापाँव जड़ से उखड़ गए मेरे, ठन गई यूँ मेरी मुक़द्दर सेकाम बनते बिगड़ गए मेरे, नींद टूटी खिज़ा की दस्तक परख़्वाब पलकों से झड़ गए मेरे, सब रफूगर किधर गए यारोज़ख्म फिर से उधड़ गए मेरे..!! - [इश्क उनसे हुआ देखते देखते...](https://bazmeshayari.com/ishq-unse-hua-dekhte/): इश्क उनसे हुआ देखते देखतेहुस्न पर मर मिटा देखते देखते, कातिलाना अदा रोग देकर गईबेख़बर फ़िर रहा देखते देखते, गैर के साथ रिश्ता बना प्यार कादे गई वो दग़ा देखते देखते, मैं हक़ीकत न समझा हुई देर थीघाव दिल पर लगा देखते देखते, छोड़ जाते ये गलियाँ मगर क्या करेंजाम ग़म का पिया देखते देखते, थी दवा भी वही ज़ख्म जिसने दियामैं फ़ना हो गया देखते देखते, बिन उसके हुआ जीना दुश्वारफिर जनाजा उठा देखते देखते..!! - [साथ मुझको ही पाओगे जिधर जाओगे...](https://bazmeshayari.com/mujhko-hi-paaoge/): साथ मुझको ही पाओगे जिधर जाओगेइससे ज्यादा तुम्हे चाहा तो बिगड़ जाओगे, दिल ए नादान ने किया फिर से भरोसा क्यों करमैंने सोचा था कि इस बार सुधर जाओगे, हमको मालूम नहीं तर्क ए ताअल्लुक़ का सबबइतना मालूम है बिछड़ोगे तो मर जाओगे, मैंने सीखा ही नहीं फिर से बसाना दिल मेंदिल से निकले तो मेरी जान किधर जाओगे ? शायद तुम्हे इल्म ही नहीं, दुनियाँ क्या है ?इससे उम्मीद लगाओगे तो बिखर जाओगे..!! - [चलो मौत को गले लगा कर देखे....](https://bazmeshayari.com/chalo-maut-ko-gale/): चलो मौत को गले लगा कर देखेज़िन्दगी से पीछा छुड़ा कर देखे, घुट घुट कर जीने से बारहा बेहतर हैख़ुद को सफहा ए हस्ती से मिटा कर देखे, जब कोई हसरत नहीं जीते रहने कीफिर क्यों न ज़िन्दगी की कश्तियाँ जला कर देखे, सुना है क़ुबूल हो जाती है हर दुआ माँगीचलो हम भी उम्मीद कोई बंधा कर देखे, शायद उन्हें आ जाए थोडा तरस हम परनदामत के चंद आँसू सही बहा कर देखे..!! - [सोचा कि ख़ुद पे ज़रा सी इनायत कर लूँ..](https://bazmeshayari.com/khud-pe-inayat-kar-loo/): सोचा कि ख़ुद पे ज़रा सी इनायत कर लूँऐ ज़िन्दगी तुझसे वो पहली सी मुहब्बत कर लूँ, सुनाऊँ अब किस किस को मैं सबब ए दिल ए वीरानआईना सामने रख कर अपनी ही शिकायत कर लूँ, तू शाह है तो मेरे फ़कीरी की गैरत ना छेड़कही ऐसा न हो तुझसे भी अदावत कर लूँ, एक मेरी अना के सिवा कौन मेरे साथ रहाजान देकर फिर क्यूँ न उसकी हिफाज़त कर लूँ, झुक जाएँ सर ए तस्लीम ए ख़म अमीर ए शहर के आगेमैं भी कैसे इस फ़िक्र की हिमायत कर लूँ ? पहचान मेरी बन गया है तू वरनादिल करता - [मैं सोचो के किस गुमाँ में था....](https://bazmeshayari.com/main-socho-ke-kis-guman-me-tha/): मैं सोचो के किस गुमाँ में थामैं किसी दूसरे जहान में था, रहने वाले आबाद हो न सकेकोई आसिब उस मकान में था, बात दिल की मेरी जुबान पे थीतीर अबतक मेरे कमान में था, मेरे दिल में ही जलवा फरमा थामैं ये समझा किसी जहान में था, मैं जिसके प्यार में फ़ना था यारो !वो किसी और के ध्यान में था..!! - [सब्ज़ गुम्बद से सदा आती है...](https://bazmeshayari.com/sabz-gumbad-se-sada-aati-hai/): सब्ज़ गुम्बद से सदा आती हैमुझको वो ताज़ा हवा आती है, चाँद भी तब ही चमक उठता हैजब सहन ए नबवी की ज़िया आती है, ख़ुद ही क़ाबिल मैं तमन्ना के नहींख़ुद मेरे मन से निदा आती है, देख सकता मैं भी जी भर लेकिनअपनी नज़रों पे हया आती है, अश्क बहने लगे महसूस हुआतैयबा से बाद ए सबा आती है, जब भी पैगाम है जाता दिल सेदर ए आका से अता आती है, मैं ख़ुश हूँ जो अता मुझको हुईमुझको आका की दुआ आती है..!! - [एक चिड़ियाँ ने आज ये सवाल किया..](https://bazmeshayari.com/chidiya-ne-ye-sawal-kiya/): बैठ कर पास मेरे एक चिड़ियाँ ने आज ये सवाल कियाहम तो ठहरे परिंदे, इन्सान ने इन्सान का क्या हाल किया ? बेज़ुबान मैं मगर चूं चूं कर के ज़ाकर ए ख़ुदा हुई और तूअहल ए जुबान भी हुआ और मैं मैं से ख़ुद को निकलना मुहाल किया, बना मशीन के आडो में और तक़ब्बुर तुम्हारा आसमान छुएअक्ल की बुनियाद पे अशरफ़ हुआ मगर अक्ल का न इस्तेमाल किया, जो दुनियाँ की पट्टी तो बाँधे है आँखों पर, क्या भूल गया ?हर शाह का कफ़न में लपेट के अरूज़ ख़ुदा ने ज़वाल किया, ये हाल तेरा हुआ तबसे तू भूला - [मेरे मुल्क की तो बिल्कुल खाम है सियासत...](https://bazmeshayari.com/mere-mulq-ki-kham-hai/): ये जो आवाम में फ़िक्र ए आम है सियासतमेरे मुल्क की तो बिल्कुल खाम है सियासत, नफ़रत का ज़हर घोलने का है यहाँ रिवाज़हाँ इस लिए तो यहाँ की बदनाम है सियासत, बदनाम कर दिया है इसको कुछ अय्यारो नेवरना तो एक पाकीज़ा नाम है सियासत, दुश्वार है बहुत गर लीडर अमीन है तोचोरो के लिए तो एक अच्छा दाम है सियासत, गुमराह करती है गाफ़िल को ये और बढ़ करहरामखोरो के लिए तो बस इल्हाम है सियासत..!! - [इन्सान भूल चुका है इन्सान की क़ीमत...](https://bazmeshayari.com/insan-bhool-chuka/): इन्सान भूल चुका है इन्सान की क़ीमतबाज़ार में बढ़ गई आज हैवान की क़ीमत, इक्तिदार में आते है इख़्तियार की लालच मेंकुछ लोग लगा बैठे अपने ईमान की क़ीमत, तुमने तो मज़मून बना लिया खून से लिपटी लाश कोएक माँ से पूछना एक जवान की क़ीमत, मेरी ही तरह आओ मैं हक़ की तरफ से हूँशेख ने भी माँग ली आख़िर अपनी ज़बान की क़ीमत, उठा जब जनाज़ा तो बहुत से अपने पास पाए हमनेशायद मुझसे ज्यादा थी मेरे मकान की क़ीमत, इन्सान भूल चुका है इन्सान की क़ीमतबाज़ार में बढ़ गई आज हैवान की क़ीमत..!! - [तन्हाइयो में अश्क बहाने से क्या मिला...](https://bazmeshayari.com/tanhaaiyo-me-ashk-bahane/): तन्हाइयो में अश्क बहाने से क्या मिलाख़ुद को दीया बना के जलाने से क्या मिला ? मुझसे बिछड़ के रेत सा वो भी बिखर गयाउस जाने वाले शख्स को जाने से क्या मिला ? अब भी मेरे वज़ूद में हर साँस में वहीमैं सोचता हूँ उसको भुलाने से क्या मिला ? तू क्या गया कि दिल मेरा ख़ामोश हो गयाइन धड़कनो के शोर मचाने से क्या मिला ? अपने ही एक दर्द का चारा न कर सकेसारे जहाँ का दर्द उठाने से क्या मिला ? जिसके लिए लिखा इसे वो तो न सुन सकावो गीत महफ़िलो में सुनाने से क्या - [बेलौस हँसी दिखाना, दिल से निभाना हर रिश्ता यहाँ...](https://bazmeshayari.com/belaus-hansi-dikhana-dil-se-nibhana/): बेलौस हँसी दिखाना, दिल से निभाना हर रिश्ता यहाँ मुस्कान पर अपने पराये सभी का अधिकार होता है, खुदगर्ज़ी का हुनर विरासत में मिलता है हैवानो को झूठी मुस्कान से नफ़रत छुपाने वाला मक्कार होता है, चैन ओ अमन हो ज़िन्दगी में ना रंजिश ओ गम हो कोई दर्द के बदले दुःख ओ तकलीफ देना व्यापार होता है, अपने हिस्से का गम उठाना है ख़ुद ही यही मुक़द्दर है मातम पर मनाएँ जो जश्न उस इसाँ पर धिक्कार होता है, भूल ना जाना बुलंदियों पर पहुँच कर तुम औकात अपनी क्योकि निभाना राजा कभी फ़कीर का क़िरदार होता है..!! - [हिज़्र में खून रुलाते हो, कहाँ होते हो ?](https://bazmeshayari.com/hizr-me-khoon-rulate-ho-kahan-hote-ho/): हिज़्र में खून रुलाते हो, कहाँ होते हो ? लौट कर क्यूँ नहीं आते हो, कहाँ होते हो ? जब भी मिलता है कोई शख्स बहारो जैसा मुझको तुम कैसे भूलाते हो, कहाँ होते हो ? याद आती है अकेले में तुम्हारी नींदे किस तरह ख़ुद को सुलाते हो, कहाँ होते हो ? मुझसे बिछड़े हो तो महबूब ए नज़र हो किस के ? आजकल किस को मनाते हो, कहाँ होते हो ? शब की तन्हाई में अक्सर ये ख्याल आता है अपने दुःख किस को सुनाते हो, कहाँ होते हो ? मौसम ए गुल में नशा हिज़्र का बढ़ - [गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले...](https://bazmeshayari.com/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%ad%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%8f-%e0%a4%a8%e0%a5%8c-%e0%a4%ac/): गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले, क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले, कभी तो सुब्ह तिरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़ कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-बार चले, बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल ग़रीब सही तुम्हारे नाम पे आएँगे ग़म-गुसार चले, जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ हमारे अश्क तिरी आक़िबत सँवार चले, हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब गिरह में ले के गरेबाँ का तार तार चले, मक़ाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जचा ही नहीं जो कू-ए-यार से निकले तो - [यूँ उम्र भर रहे बेताब देखने के लिये...](https://bazmeshayari.com/yun-umr-bhar-rahe-betab/): यूँ उम्र भर रहे बेताब देखने के लिये किसी कँवल का हंसीं ख़ाब देखने के लिये, कहाँ थे देखो सनम हम कहाँ चले आये वो गुलबदन के वो महताब देखने के लिये, न जाने कब से हक़ीक़त की थी तलब हमको न जाने कब से थे बेताब देखने के लिये, छुआ तो जाना हर इक ख़्वाब था धुआँ यारो बचा न कुछ भी यहाँ नायाब देखने के लिये, क़रीब जा के हर एक चीज खोयी है हमने लुटे हैं ज़िंदगी शादाब देखने के लिये, कटी है ज़िंदगी अपनी भी यूँ उसूलों पर फ़ज़ा में रह गया तल्ख़ाब देखने के लिये, - [एक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाब...](https://bazmeshayari.com/ek-arse-se-zamin-se-lapta-hai/): एक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाब कोई बतलाये कहाँ गायब हुआ है इन्किलाब, एक वो भी वक्त था तनकर चला करता था वो एक ये भी वक्त आया है छुपा है इन्किलाब, खूबसूरत आज दुनिया बन गई है कत्लगाह जालिमों से मिल गया है अब सुना है इन्किलाब, है अगर जिन्दा तो आता क्यों नहीं वो सामने ऐसा लगता है कि शायद मर चुका है इन्किलाब, लोग कहते हैं गलतफहमी है ऐसा है नहीं आज भी बहुतों के सीने में है जिन्दा इन्किलाब..!! - [गुलों में रंग न खुशबू, गरूर फिर भी है...](https://bazmeshayari.com/gulo-me-rang-n-khushboo-guru-fir-bhi-hai/): गुलों में रंग न खुशबू, गरूर फिर भी है नशे में रूप के वो चूर-चूर फिर भी है, रंगे हैं हाथ गुनाहों से बाँह तक लेकिन शहर में नाम तुम्हारा हजूर फिर भी है, उसे भले ही डकैती का गुर नहीं मालूम गिरहकटी का उसे कुछ शऊर फिर भी है, नई बहू तो हजारों में एक है लेकिन नज़र में सास के वो बेशऊर फिर भी है, कटेगी उम्र हवाओं का रुख बदलने में बुझे चिराग तो मेरा कसूर फिर भी है, वो राम नाम जपेंगे और ये पढ़ेंगे नमाज़ मगर दिमाग में उनके फितूर फिर भी है..!! ~राम अवध - [अश्क आँखों में छुपाते हुए थक जाता हूँ...](https://bazmeshayari.com/ashq-aankho-me-chhupate-hue-thak-jata-hoon/): अश्क आँखों में छुपाते हुए थक जाता हूँ बोझ पानी का उठाते हुए थक जाता हूँ, पाँव रखते है जो मुझ पर उन्हें एहसास नहीं मैं निशानात मिटाते हुए थक जाता हूँ, बर्फ़ ऐसी कि पिघलती नहीं पानी बन कर प्यास ऐसी कि बुझाते हुए थक जाता हूँ..!! - [तुम जैसे तो लाखो ही थे, है और भी आएँगे...](https://bazmeshayari.com/tum-jaise-to-lakho-the-hai-aur-ayenge/): तुम जैसे तो लाखो ही थे, है और भी आएँगे मगर हम जैसे तुम्हे बहुत कम ही मिल पाएँगे, बेचते है ज़मीर ओ क़लम जो और लोग है हमारे पैगाम ए हक़ तुम्हे सितारों पे नज़र आएँगे, तुम्हे मुबारक़ हो बद्दुआओ का दरियाँ साहब हम तो मज़लूमो की एक आह से ही मर जाएँगे, हम तुम्हे फूलो की वफ़ाओ में नज़र आएँगे जब भी ढूँढोगे अमन की फिज़ाओ में नज़र आएँगे, जब कभी याद आये तो बस हाथ उठा लेना तुम हम हर एक हक़ परस्त की दुआओं में नज़र आएँगे, मत ढूँढना हमें तुम कभी नफरतो की तपीश में - [आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं...](https://bazmeshayari.com/agaah-apni-maut-se-koi-bashar-nahi/): आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं सामान सौ बरस के हैं कल की ख़बर नहीं, आ जाएँ रोब-ए-ग़ैर में हम वो बशर नहीं कुछ आप की तरह हमें लोगों का डर नहीं, इक तो शब-ए-फ़िराक़ के सदमे हैं जाँ-गुदाज़ अंधेर इस पे ये है कि होती सहर नहीं, क्या कहिए इस तरह के तलव्वुन-मिज़ाज को वादे का है ये हाल इधर हाँ उधर नहीं, रखते क़दम जो वादी-ए-उल्फ़त में बे-धड़क ‘हैरत’ सिवा तुम्हारे किसी का जिगर नहीं..!! ~हैरत इलाहाबादी - [तेरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है...](https://bazmeshayari.com/tere-badan-se-jo-chhoo-kar/): तेरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है मिसाल-ए-रंग वो झोंका नज़र भी आता है, तमाम शब जहाँ जलता है इक उदास दिया हवा की राह में इक ऐसा घर भी आता है, वो मुझ को टूट के चाहेगा छोड़ जाएगा मुझे ख़बर थी उसे ये हुनर भी आता है, उजाड़ बन में उतरता है एक जुगनू भी हवा के साथ कोई हम-सफ़र भी आता है, वफ़ा की कौन सी मंज़िल पे उस ने छोड़ा था के वो तो याद हमें भूल कर भी आता है, जहाँ लहू के समंदर की हद ठहरती है वहीं जज़ीरा-ए-लाल-ओ-गुहर भी आता - [एक पगली मेरा नाम जो ले शरमाये भी घबराये भी...](https://bazmeshayari.com/ek-pagli-mera-naam-jo-le/): एक पगली मेरा नाम जो ले शरमाये भी घबराये भी गलियों गलियों मुझसे मिलने आये भी घबराये भी, रात गए घर जाने वाली गुमसुम लड़की राहों में अपनी उलझी जुल्फों को सुलझाए भी घबराये भी, कौन बिछड़ कर फिर लौटेगा क्यों आवारा फिरते हो रातों को एक चाँद मुझे समझाये भी घबराये भी, आने वाली रुत का कितना खौफ है उसकी आँखों में जाने वाला दूर से हाथ हिलाए भी घबराये भी..!! ~मोहसिन नक़वी - [वही किस्से है वही बात पुरानी अपनी...](https://bazmeshayari.com/wahi-qisse-hai-wahi/): वही किस्से है वही बात पुरानी अपनी कौन सुनता है भला राम कहानी अपनी, सितमगर को ये हमदर्द समझ लेती है कितनी ख़ुश फ़हम है कमबख्त जवानी अपनी, रोज मिलते है दरीचे में नये फूल मुझे छोड़ जाता है कोई रोज निशानी अपनी, तुझसे बिछड़े है तो पाया है बियाबाँ का सकूत वरना दरियाँओ से मिलती थी रवानी अपनी..!! ~मोहसिन नक़वी - [रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो...](https://bazmeshayari.com/ret-par-likh-ke-mera-naam/): रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो आँख सच बोलती हैं प्यार छुपाया न करो, लोग हर बात का अफ़साना बना लेते हैं सबको हालात की रूदाद सुनाया न करो, ये ज़ुरूरी नहीं हर शख़्स मसीहा ही हो प्यार के ज़ख़्म अमानत हैं दिखाया न करो, शहर-ए-एहसास में पथराव बहुत हैं ‘मोहसिन’ दिल को शीशे के झरोखों में सजाया न करो..!! ~मोहसिन नक़वी - [उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती...](https://bazmeshayari.com/use-kahna-bichhdne-se-muhabbat-to-nahi-marti/): उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती बिछड़ जाना मुहब्बत की सदाकत की अलामत है मुहब्बत एक फितरत है, हाँ फितरत कब बदलती है सो, जब हम दूर हो जाएं, नए रिश्तों में खो जाएं तो यह मत सोच लेना तुम, के मुहब्बत मर गई होगी नहीं ऐसे नहीं होगा .. मेरे बारे में गर तुम्हारी आंखें भर आयें छलक कर एक भी आंसू पलक पे जो उतर आये तो बस इतना समझ लेना, जो मेरे नाम से इतनी तेरे दिल को अकीदत है तेरे दिल में बिछड़ कर भी अभी मेरी मुहब्बत है मुहब्बत तो बिछड़ कर भी - [नहीं डरता मैं काँटो से मगर फूलो से डरता हूँ...](https://bazmeshayari.com/nahi-dart-main-kaanto-se-magar-foolo-se/): नहीं डरता मैं काँटो से मगर फूलो से डरता हूँ चुभन दे जाएँ जो दिल को मैं उन बातो से डरता हूँ, मुझे तो नींद भी अच्छी नहीं लगती हकीक़त में दिखाएँ ख़्वाब जो झूठे मैं उन नींदों से डरता हूँ, अना का मैं नहीं कायल मुहब्बत है मुझे सबसे जो दिलो में बुग्ज़ रखते हो मैं उन अपनों से डरता हूँ, मुझे एहसास है सबका मैं सबके काम आता हूँ मगर जो कीना रखते हो मैं उन रिश्तो से डरता हूँ, मैं बन्दा हूँ ख़ुदा का और ख़ुदा का खौफ़ है मुझको जो डरते नहीं रब से मैं उन - [कभी याद आऊँ तो पूछना ज़रा अपनी फ़ुर्सत ए शाम से...](https://bazmeshayari.com/kabhi-yaad-aaoon-to/): कभी याद आऊँ तो पूछना ज़रा अपनी फ़ुर्सत ए शाम से किसे इश्क़ था तेरी ज़ात से किसे प्यार था तेरे नाम से, ज़रा याद कर कि वो कौन था जो कभी तुझे भी अजीज़ था, वो जो जी उठा था तेरे नाम से वो जो मर मिटा था तेरे नाम पे, हमें बेरुखी का नहीं गिला कि यही वफ़ाओ का है सिला, मगर ऐसा ज़ुर्म था कौन सा ? कि गए हम दुआ ओ सलाम से, कभी याद आऊँ तो पूछना ज़रा अपनी फ़ुर्सत ए शाम से..!! - [जान मेरी जान कोई और है बात मेरी मान कोई और है...](https://bazmeshayari.com/jaan-meri-jaan-koi-aur-hai/): जान मेरी जान कोई और है बात मेरी मान कोई और है, हो गया हूँ मैं किसी का हमसफ़र अब मेरी पहचान कोई और है, नाज़ तेरे ज़ुल्म पर है आज भी इश्क़ की ये शान कोई और है, अब उम्र भर की जुदाई किस लिए ये तेरा एहसान कोई और है, जी रहा हूँ अब किसी की ज़िन्दगी ज़िस्म में इन्सान कोई और है, रास आई कब रफ़ाक़त मर के भी उसका क़ब्रिस्तान कोई और है..!! - [सुना है इस मुहब्बत में बहुत नुक़सान होता है...](https://bazmeshayari.com/suna-hai-is-muhabbat/): सुना है इस मुहब्बत में बहुत नुक़सान होता है, महकता झूमता जीवन गमो के नाम होता है, सुना है इस मुहब्बत में कही भी दिल नहीं लगता, बिना उसके निगाहों में कोई मौसम नहीं जँचता, खफ़ा जिससे मुहब्बत हो वो जीवन भर नहीं हँसता, बहुत अनमोल है ये दिल उजड़ कर फिर नहीं बसता, सुना है इस मुहब्बत में बहुत नुक़सान होता है..!! - [वो जो दिल में तेरा मुक़ाम है किसी और को वो दिया नहीं..](https://bazmeshayari.com/wo-jo-dil-me-tara-muqam-hai/): वो जो दिल में तेरा मुक़ाम है किसी और को वो दिया नहीं, वो जो रिश्ता तुझसे है बन गया किसी और से वो बना नहीं, वो जो प्यार तुझसे हो गया किसी और से वो हुआ नहीं, वो जो राज़ तुझसे है कह दिया किसी और से वो कहा नहीं, वो जो सुख मिला तेरी ज़ात से किसी और से वो मिला नहीं, तू बसा है आँखों में जिस तरह कोई और ऐसे बसा नहीं, तू हुआ है जितना क़रीब तर कोई और इतना हुआ नहीं..!! - [तेरी आँखों के दरीचे से गुज़ारे जाते...](https://bazmeshayari.com/teri-aankho-ke-dariche-se-guzare-jaate/): तेरी आँखों के दरीचे से गुज़ारे जाते तो मेरे ख़्वाब यूँ बे मौत न मारे जाते, एक रिवायत की तरह हम भी ज़मीं पर उतरे पुछा जाता तो तेरे दिल पे उतारे जाते, माना थी शर्त ए वफ़ा नाम छुपाया जाता मेरी ज़ानिब मेरी जान कुछ तो इशारे जाते, एक ही दिल था सो उसको तो फ़िदा होना था होते दस बीस भी गर तुम पे ही वारे जाते, ये यकीं हमको है भूला वो नहीं होगा हमें जाने किस नाम से अब हम है पुकारे जाते, ऐ मुहब्बत ! तुझे फिर कौन मुहब्बत कहता तेरे मारे भी जो आसानी - [बाग़ पा कर ख़फ़क़ानी ये डराता है मुझे...](https://bazmeshayari.com/baag-paa-khafqaani-ye-darata-hai/): बाग़ पा कर ख़फ़क़ानी ये डराता है मुझे साया-ए-शाख़-ए-गुल अफ़ई नज़र आता है मुझे, जौहर-ए-तेग़ ब-सर-चश्म-ए-दीगर मालूम हूँ मैं वो सब्ज़ा कि ज़हराब उगाता है मुझे, मुद्दआ महव-ए-तमाशा-ए-शिकस्त-ए-दिल है आइना-ख़ाना में कोई लिए जाता है मुझे, नाला सरमाया-ए-यक-आलम ओ आलम कफ़-ए-ख़ाक आसमाँ बैज़ा-ए-क़ुमरी नज़र आता है मुझे, ज़िंदगी में तो वो महफ़िल से उठा देते थे देखूँ अब मर गए पर कौन उठाता है मुझे, बाग़ तुझ बिन गुल-ए-नर्गिस से डराता है मुझे चाहूँ गर सैर-ए-चमन आँख दिखाता है मुझे, शोर-ए-तिम्साल है किस रश्क-ए-चमन का या रब आइना बैज़ा-ए-बुलबुल नज़र आता है मुझे, हैरत-ए-आइना अंजाम-ए-जुनूँ हूँ ज्यूँ शम्अ किस क़दर - [क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना...](https://bazmeshayari.com/qayamat-hai-ki-sun/): क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना तअ’ज्जुब से वो बोला यूँ भी होता है ज़माने में, दिल-ए-नाज़ुक पे उस के रहम आता है मुझे ‘ग़ालिब’ न कर सरगर्म उस काफ़िर को उल्फ़त आज़माने में..!! ~मिर्ज़ा ग़ालिब - [तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो...](https://bazmeshayari.com/tum-jaano-tumko-gair-se/): तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो मुझ को भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो ? बचते नहीं मुवाख़ज़ा-ए-रोज़-ए-हश्र से क़ातिल अगर रक़ीब है तो तुम गवाह हो, क्या वो भी बे-गुनह-कुश ओ हक़-ना-शनास हैं माना कि तुम बशर नहीं ख़ुर्शीद ओ माह हो, उभरा हुआ नक़ाब में है उन के एक तार मरता हूँ मैं कि ये न किसी की निगाह हो, जब मय-कदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की क़ैद मस्जिद हो मदरसा हो कोई ख़ानक़ाह हो, सुनते हैं जो बहिश्त की तारीफ़ सब दुरुस्त लेकिन ख़ुदा करे वो तिरा जल्वा-गाह हो, ‘ग़ालिब’ भी - [नहीं कि मुझको क़यामत का ए'तिक़ाद नहीं...](https://bazmeshayari.com/nahi-ki-mujhko-qayamat/): नहीं कि मुझको क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं, कोई कहे कि शब-ए-मह में क्या बुराई है बला से आज अगर दिन को अब्र ओ बाद नहीं, जो आऊँ सामने उन के तो मर्हबा न कहें जो जाऊँ वाँ से कहीं को तो ख़ैर-बाद नहीं, कभी जो याद भी आता हूँ मैं तो कहते हैं कि आज बज़्म में कुछ फ़ित्ना-ओ-फ़साद नहीं, अलावा ईद के मिलती है और दिन भी शराब गदा-ए-कूच-ए-मय-ख़ाना ना-मुराद नहीं, जहाँ में हो ग़म-ओ-शादी बहम हमें क्या काम दिया है हम को ख़ुदा ने वो दिल कि शाद नहीं, तुम उन के वा’दे - [नफ़स न अंजुमन-ए-आरज़ू से बाहर खींच...](https://bazmeshayari.com/nafas-na-anjuman-e-aarzoo-se/): नफ़स न अंजुमन-ए-आरज़ू से बाहर खींच अगर शराब नहीं इंतिज़ार-ए-साग़र खींच, कमाल-ए-गर्मी-ए-सई-ए-तलाश-ए-दीद न पूछ ब-रंग-ए-ख़ार मिरे आइने से जौहर खींच, तुझे बहाना-ए-राहत है इंतिज़ार ऐ दिल किया है किस ने इशारा कि नाज़-ए-बिस्तर खींच, तिरी तरफ़ है ब-हसरत नज़ारा-ए-नर्गिस ब-कोरी-ए-दिल-ओ-चश्म-ए-रक़ीब साग़र खींच, ब-नीम-ग़म्ज़ा अदा कर हक़-ए-वदीअत-ए-नाज़ नियाम-ए-पर्दा-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर से ख़ंजर खींच, मिरे क़दह में है सहबा-ए-आतिश-ए-पिन्हाँ ब-रू-ए-सुफ़रा कबाब-ए-दिल-ए-समंदर खींच, न कह कि ताक़त-ए-रुस्वाई-ए-विसाल नहीं अगर यही अरक़-ए-फ़ित्ना है मुकर्रर खींच, जुनून-ए-आइना मुश्ताक़-ए-यक-तमाशा है हमारे सफ़्हे पे बाल-ए-परी से मिस्तर खींच, ख़ुमार-ए-मिन्नत-ए-साक़ी अगर यही है ‘असद’ दिल-ए-गुदाख़्ता के मय-कदे में साग़र खींच..!! ~मिर्ज़ा ग़ालिब - [न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता...](https://bazmeshayari.com/na-tha-kuchh-to-khuda-tha/): न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता, हुआ जब ग़म से यूँ बे-हिस तो ग़म क्या सर के कटने का न होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होता, हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता..!! ~मिर्ज़ा ग़ालिब   - [चलो सागर ए इश्क़ का किनारा ढूँढे...](https://bazmeshayari.com/chalo-sagar-e-ishq-ka-kinara-dhoondhe/): चलो सागर ए इश्क़ का किनारा ढूँढे डूबने वालो के लिए सहारा ढूँढे, यूँ भी ज़माने में गम है बे शुमार चलो मिल कर इसका कोई चारा ढूँढे, हमारे लिए काफी है तुम्हारी एक झलक तुम्हारे वास्ते आओ नया नज़ारा ढूँढे..!! - [कभी लफ्ज़ भूल जाऊँ, कभी बात भूल जाऊँ...](https://bazmeshayari.com/kabhi-lafz-bhool-jaaoon-kabhi-baat-bhool-jaaoon/): कभी लफ्ज़ भूल जाऊँ कभी बात भूल जाऊँ तुझे इस क़दर चाहूँ कि अपनी ज़ात भूल जाऊँ उठ कर कभी जो तेरे पास से चल दूँ जाते हुए ख़ुद को तेरे पास भूल जाऊँ कैसे कहूँ तुमसे कि कितना चाह है तुम्हे अगर ये कहने पे तुमको आऊँ अल्फाज़ भूल जाऊँ..!!   - [जो तेरे प्यार के दरियाँ कशीद हो जाएँ...](https://bazmeshayari.com/jo-tere-pyar-ka-dariyan-kashid-ho-jaaye/): जो तेरे प्यार के दरियाँ कशीद हो जाएँ मेरी हयात के मंज़र ज़दीद हो जाएँ, तुम्हारी चश्म ए मुहब्बत की एक झलक से यहाँ गुलाब लम्हों से सब मुस्तफीद हो जाएँ..!!   एक ज़माने के बाद आई है शाम ए गम… एक ज़माने के बाद आई है शाम ए गम शाम ए गम मेरे दर से कहाँ जाएगी ? मेरी क़िस्मत में है जो तुम्हारी कमी वो कमी मेरे दर से कहाँ जाएगी ? - [हम जो बे हाल ए ज़ार बैठे है...](https://bazmeshayari.com/hum-jo-haal-e/): हम जो बे हाल ए ज़ार बैठे है दिल की दिल में हार बैठे है, तेरी महफ़िल से तो निकल गए थे मगर तेरी यादे संभाल बैठे है, तेरे अश्क ओ ख़ुमार पे दिल क़ुर्बान तेरी नज़र ए ज़माल पे दिल क़ुर्बान, तू नसीब में नहीं था शायद शुक्र ए ख़ुदा कुछ पल तो गुज़ार बैठे है..!! - [सितारों को जो छू कर देखते है...](https://bazmeshayari.com/sitaro-ko-jo-choo-kar-dekhte-hai/): सितारों को जो छू कर देखते है सिकंदर है मुक़द्दर देखते है, समन्दर में हमें दिखते है क़तरे वो क़तरों में समन्दर देखते है, दरियाँ से भी कुछ आगे है मंज़िल ज़मीं तुम, हम तो अम्बर देखते है, निकलना भी ज़रूरी है सफ़र पर कभी सहरा कभी घर देखते है, बनाया जब से शीशे का घरौंदा हर एक पत्थर को डर कर देखते है, खज़ाने हैं मुक़द्दर में उन्ही के जो हर सीपी में गौहर देखते है, ना जाने हम मुन्तज़िर किस चीज के है जबकि बे अम्ली को घर घर देखते है..!! - [सब के होते हुए लगता है कि घर ख़ाली है...](https://bazmeshayari.com/sabke-hote-hue-lagta-hai-ki-ghar-khali-hai/): सब के होते हुए लगता है कि घर ख़ाली है ये तकल्लुफ़ है कि जज़्बात की पामाली है, आसमानों से उतरने का इरादा हो तो सुन शाख़ पर एक परिंदे की जगह ख़ाली है, जिस की आँखों में शरारत थी वो महबूबा थी ये जो मजबूर सी औरत है ये घर वाली है, रात बे-लुत्फ़ है परहेज़ के सालन की तरह दिन भिकारी के कटोरे की तरह ख़ाली है, मुद्दतों ख़ुद को भरोसे में लिया है मैं ने तब कहीं तेरी मोहब्बत ने सिपर डाली है..!! ~शकील जमाली - [खिड़कियाँ खोल रहा था कि हवा आएगी...](https://bazmeshayari.com/khidkiyan-khol-raha-tha-ki-hawa-ayegi/): खिड़कियाँ खोल रहा था कि हवा आएगी क्या ख़बर थी कि चिरागों को निगल जाएगी, मुझेको इस वास्ते बारिश नहीं अच्छी लगती जब भी वो आएगी, कोई याद उठा लाएगी, उसने हँसते हुए कर ली है अलाहिदा राहें मैं समझता था कि बिछ्ड़ेगी तो मर जाएगी, मैं मुसाफ़िर हूँ, मैं तो बहर तौर चला जाऊँगा मगर तू मेरे बाद भला कैसे संभल पाएगी ? मेरी आवाज़ को तरसेगी समाअत तेरी उम्र भर फिर तुझको मेरी कॉल नहीं आएगी..!! - [मुलाकातें हमारी बेइरादा क्यों नहीं होतीं ?](https://bazmeshayari.com/mulaqate-hamari-beirada-kyo/): मुलाकातें हमारी बेइरादा क्यों नहीं होतीं ? मुहब्बत की गुजर कहीं कुशादा क्यों नहीं होतीं हमारे दरमियान ये अजनबियत का धुवां क्यों है हमारी चाहतें हद से ज्यादा क्यों नहीं होती ? मेरे जज़्बात की खुशबू उतरती क्यों नहीं तुम में ? तेरे दिल की सभी राहें कुशादा क्यों नहीं होती ? खुशी की चंद बूंदे जिस्म को गीला कर तो देती हैं मयस्सर तो रहती लेकिन ज्यादा क्यों नहीं होतीं ? तेरे नज़दीक रहके भी ये दूरी का गुमां कैसा, तेरी बाहें मेरी खातिर कुशादा क्यों नहीं होतीं ? नाज़ ओ अदा हमेशा ही ये दिखलाती हैं राहो में - [किस की तलाश है किस के असर में हैं...](https://bazmeshayari.com/kis-ki-talash-kis-ki-asar-me-hai/): किस की तलाश है किस के असर में हैं जब से चले हैं घर से मुसलसल सफ़र में हैं, सारे तमाशे ख़त्म हुए सब लोग जा चुके एक हम ही रह गए जो फ़रेब ए सहर में हैं, ऐसी तो कोई ख़ास ख़ता भी नहीं हुई हमसे हाँ ये समझ लिया था कि हम अपने घर में हैं, अब के बहार देखिए क्या नक़्श छोड़ जाए ना आसार बादलों के न पत्ते हरे शजर में हैं, तुझ से बिछड़ना कोई नया हादसा तो नहीं ऐसे हज़ारों क़िस्से अबतक हमारी ख़बर में हैं..!! - [मेरे दिल के अरमां रहे रात जलते...](https://bazmeshayari.com/mere-dil-ke-armaan-rahe-raat-jalte/): मेरे दिल के अरमां रहे रात जलते रहे सब करवट पे करवट बदलते, यूँ हारी है बाज़ी मुहब्बत की हमने बहुत रोया है दिल दहलते दहलते, लगी दिल की है जख्म जाता नहीं ये बहल जाएगा दिल बहलते बहलते, तड़प बेवफा मत जमाने की खातिर चल चले कहीं और टहलते टहलते, अभी इश्क का ये तो पहला कदम है अभी जख्म खाने है कई चलते चलते, है कमज़ोर सीढ़ी मुहब्बत की लेकिन ये चढ़नी भी पड़ेगी, संभलते संभलते, ये ज़ीस्त अब उजाले से डरने लगी है हुई शाम क्यूँ ये दिन के यूँ ढलते ढलते, जवाब आया न तो मुहब्बत - [कुछ इस तरह से इबादत खफ़ा हुई हमसे...](https://bazmeshayari.com/kuch-is-tarah-se-ibadat-khafa-hui-hamse/): कुछ इस तरह से इबादत खफ़ा हुई हमसे नमाज़ ए इश्क बहुत कम अदा हुई हमसे, गरीब आँखों में आंसू भी अब नहीं आते इलाही रहम ! फिर क्या खता हुई हमसे, हम इब्तिदा ही कहाँ नेकियों की थे या रब ! तो फिर गुनाहों की क्यों इन्तेहा हुई हमसे, ये बदनसीबी हमारी है कम हुआ ऐसे कि दुश्मनों के भी हक़ में दुआ हुई हमसे, सलूक मौत का हम से ना जाने कैसा हो ये ज़िन्दगी तो बहुत बे मज़ा हुई हमसे, कहाँ छुपायेंगे महशर में खुद को हम कहाँ अता अत ए खैर उल वरा हुई हमसे..!! - [कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ...](https://bazmeshayari.com/qashti-chala-raha-hai-magar-kis-ada-ke-saath/): कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ हम भी न डूब जाएँ कहीं ना ख़ुदा के साथ, दिल की तलब पड़ी है तो आया है याद अब वो तो चला गया था किसी दिलरुबा के साथ, जब से चली है आदम ओ यज़्दाँ की दास्ताँ हर बावफ़ा का रब्त है एक बेवफ़ा के साथ, मेहमान मेज़बाँ ही को बहका के ले उड़ा ख़ुश्बू ए गुल भी घूम रही है सबा के साथ, पीर ए मुग़ाँ से हम को कोई बैर तो नहीं थोड़ा सा इख़्तिलाफ़ है मर्द ए ख़ुदा के साथ, शैख़ और बहिश्त कितने तअ’ज्जुब की बात - [ये है मयकदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है...](https://bazmeshayari.com/ye-hai-maykada-yahan-rind-hai/): ये है मयकदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है ये हरम नहीं है ऐ शैख़ जी यहाँ पारसाई हराम है, जो ज़रा सी पी के बहक गया उसे मयकदे से निकाल दो यहाँ तंग-नज़र का गुज़र नहीं यहाँ अहल-ए-ज़र्फ़ का काम है, कोई मस्त है कोई तिश्ना-लब तो किसी के हाथ में जाम है मगर इस पे कोई करे भी क्या ये तो मय-कदे का निज़ाम है, ये जनाब-ए-शैख़ का फ़ल्सफ़ा है अजीब सारे जहान से जो वहाँ पियो तो हलाल है जो यहाँ पियो तो हराम है, इसी काएनात में ऐ ‘जिगर’ कोई इंक़लाब उठेगा फिर - [न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम...](https://bazmeshayari.com/naa-ibtida-ki-khabar-naa-inteha-malum/): न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम, दुआ तो ख़ैर दुआ से उमीद-ए-ख़ैर भी है ये मुद्दआ’ है तो अंजाम-ए-मुद्दआ मालूम, हुआ न राज़-ए-रज़ा फ़ाश वो तो ये कहिए मेरे नसीब में थी वर्ना सई-ए-ना-मालूम, मेरी वफ़ा के सिवा ग़ायत-ए-जफ़ा क्यूँ हो तेरी जफ़ा के सिवा हासिल-ए-वफ़ा मालूम, कुछ उन के रहम पे थी यूँ ही ज़िंदगी मौक़ूफ़ कि उन को राज़-ए-मोहब्बत भी हो गया मालूम, तेरे ख़याल के असरार बे-ख़ुदी में खुले हमीं छुपा न सके वर्ना दिल को क्या मालूम, फ़रेब-ए-अम्न में कुछ मस्लहत तो है - [किसी से भी नहीं हम सब्र की तलक़ीन लेते है...](https://bazmeshayari.com/kisi-se-bhi-nahi-ham-sabr-e-talqin/): किसी से भी नहीं हम सब्र की तलक़ीन लेते है हमें मिलती नहीं जो चीज उसको छीन लेते है, बुढ़ापा आ गया लेकिन नहीं बदला मिजाज़ उनका अभी तक कपड़े वो अपने लिए रंगीन लेते है, फ़कीरो को कभी दर से न ख़ाली लौटने देना दुआएँ देते है वो, खैरात जब मिस्कीन लेते है, वो सारे लोग रंज़ ओ गम से पा जाते है आज़ादी जो सुबह ओ शाम वरद सुरह यासिन लेते है, हैरत है क्यूँ अहल ए फिलिस्तीन की सुजाअत पर यज़ीदो से सदा लोहा तो अहल ए दीन लेते है..!! - [आँखे बन जाती है सावन की घटा शाम के बाद...](https://bazmeshayari.com/aankhe-ban-jati-hai-sawan-ki-ghata/): आँखे बन जाती है सावन की घटा शाम के बाद लौट जाता है अगर कोई खफ़ा शाम के बाद, वो जो टाल जाती रही सर से बला शाम के बाद कोई तो था कि जो देता था दुआ शाम के बाद, आँखे भरती है शब ए हिज़्र यतीमो की तरह सर्द हो जाती है हर रोज़ हवा शाम के बाद, शाम तक क़ैद रहा करते है दिल के अन्दर दर्द हो जाते है सारे ही रिहा शाम के बाद, लोग थक हार के सो जाते है लेकिन जानाँ हम ने ख़ुश हो कर तेरा दर्द सहा शाम के बाद, चाँद - [मुझको पागल कहने वाला ख़ुद ही पागल हो जाएगा...](https://bazmeshayari.com/mujhko-pagal-kahne-wala/): कोई हसीन मंज़र आँखों से जब ओझल हो जाएगा मुझको पागल कहने वाला ख़ुद ही पागल हो जाएगा, पलकों पे उसकी जलेंगे बुझेंगे जूगनू जब मेरी यादो के कमरे में होगी अश्को की बरसातें घर जंगल हो जाएगा, जिस दिन उसकी ज़ुल्फे उसके शानो पर खुल जाएँगी उस दिन शर्म से पानी पानी ख़ुद भी बादल हो जाएगा, जब भी वो पाकीज़ा दामन आ जाएगा कभी हाथ मेरे आँखों का ये मैला पानी ख़ुद ब ख़ुद गँगा जल हो जाएगा, उसकी यादें,उसकी बातें, उसकी वफ़ाएं, उसका प्यार किसको ख़बर थी जीना मुश्किल एक एक पल हो जाएगा, मत घबड़ा ऐ - [तभी तो मैं मुहब्बत का कही हवालाती नहीं होता...](https://bazmeshayari.com/tabhi-to-main-muhabbat/): तभी तो मैं मुहब्बत का कही हवालाती नहीं होता जहाँ अपने सिवा कोई शख्स मुलाक़ाती नहीं होता, गिरफ्तार ए इश्क़ ए वफ़ा का कोई एक मौसम रख जो नाला रोज़ बह निकले वो तो बरसाती नहीं होता, बिछड़ने का इरादा है तो मुझसे मशविरा कर लो मुहब्बत का कोई फ़ैसला तन्हा ओ ज़ाती नहीं होता, तुम्हे इस दिल में जगह दी थी नज़र से दूर क्या करते ? जो मरकज़ में ठहर जाए वो मुज़ाफाती नहीं होता..!! - [मैं रातें जाग कर अक्सर वो यादें झाँक कर अक्सर...](https://bazmeshayari.com/main-raaten-jaag-kar-aksar/): मैं रातें जाग कर अक्सर वो यादें झाँक कर अक्सर निशाँ जो छोड़ देती है मेरी ही ज़ात पर अक्सर, मैं जिसको खत लिखता था क़िताबे फाड़ कर अक्सर मेरी तजलील करती है वो मुँह पर मार कर अक्सर, वो ऊँगली जो फिरती थी मेरे रुखसार पर अक्सर वही ऊँगली अब उठती है मेरे क़िरदार पर अक्सर, दीदार ए य़ार करता था छतो को टाप कर अक्सर जुदाई ख़ूब सहता हूँ मैं उसको हार कर अक्सर, जब ज़िक्र ए यार चलता है किसी भी बात पर अक्सर मैं तेरा नाम लेता हूँ हमशक्ल काँप कर अक्सर, मैं ख़ुद से रोज़ - [मेरे दोस्त, ऐ मेरे प्यारे अभी बात है अधूरी...](https://bazmeshayari.com/mere-dost-ae-mere-pyare/): मेरे दोस्त, ऐ मेरे प्यारे अभी बात है अधूरी अभी चाँदनी है बाक़ी अभी रात है अधूरी, वही सहरा का है मंज़र मेरे सामने अभी भी तेरी दीद के सिवा भी तो निज़ात है अधूरी, मैंने देखी सब्ज़ शाखिन किसी बाग़ में थी कहती तू कहाँ है खोया गाफ़िल तेरी ज़ात है अधूरी, कोई दोस्त मुझको मिलता कोई गम ही देता मुझको ये दुआ है नामुक़म्मल कि अभी हयात है अधूरी..!! - [चाँद यूँ कुछ देर को आते हो चले जाते हो...](https://bazmeshayari.com/chaand-yun-kuch-der-ko-aate-ho/): चाँद यूँ कुछ देर को आते हो चले जाते हो मेरी नज़रों से छुप कर बादलो में शरमाते हो, मुझको गरविदा अपने हुस्न का बना कर फिर प्यार से दूरी का हुक्म फ़रमाते हो, चाँद कैसे आफ़ताब की जगह ले कर तुम किस अदा से जलवा नूर अपने सर मनवाते हो, हर दिन मुझसे महव ए गो हो कर तुम किस तरह मनाज़िर ए ख़्वाब दिखाते हो, चाँद हम रोज़ तुम्हारी क़ुर्बत को तरस जाते है और तुम हो कि सितारों में महफ़िल सजाते हो..!! - [एक हकीकी ख़्वाब हुआ तेरा साथ सराब हुआ...](https://bazmeshayari.com/ek-haqiqi-khwab-hua-tera-saath/): एक हकीकी ख़्वाब हुआ तेरा साथ सराब हुआ, सब अंदेशे कमाल थे मुक़म्मल हुए, पैकर ए ज़माल थे, तुम क़ातिल हुए,तो न चर्चा हुआ मेरी आह तक का तमाशा हुआ, अफ़सोस की खैर गुंजाइश नहीं मुझे क़बूल गम की नुमाइश नहीं, लब ज़ख़्मी तब बा ख़ुदा हुए ये कहते हुए कि रस्ते अब जुदा हुए..!! - [मैंने पल भर में यहाँ लोगो को बदलते हुए देखा है...](https://bazmeshayari.com/maine-pal-bhar-me-yahan-logo-ko/): मैंने पल भर में यहाँ लोगो को बदलते हुए देखा है ज़िन्दगी से हारे हुए लोगो को जीतते हुए देखा है, अक्सर पत्थरो में मैंने कीड़ो को पलते हुए देखा है ग़रीब का हक़ शरीफ़ लोगो को खाते हुए देखा है, बेबस और क्या करे बस अफ़सोस ही कर सकता है दौलत के आगे जिसने मुन्सफ़ को बदलते हुए देखा है, शाम को मैंने खाली हाथ परिन्दों को लौटते देखा है फिर भी माल बरसो का लोगो को जोड़ते हुए देखा है, पहचान असली चेहरे की भी करवा देता है बुरा वक़्त मैंने मुश्किल हालात में रिश्तो को बदलते हुए - [इस तसल्ली से बरसते है आँसू तेरे सामने...](https://bazmeshayari.com/is-tasalli-se-barasate-hai-aansoo/): इस तसल्ली से बरसते है आँसू तेरे सामने कि तेरा हाथ मेरे रुखसार को तो आएगा, तेरे चाहने वालो की फ़ेहरिस्त लम्बी है मगर ये उम्मीद है हमारा भी नंबर कभी तो आएगा, हर बार जुदाई पे, लड़ाई पे बहुत रोता हूँ मैं अज़ीज़म ये वक़्त ए मुक़ाफात जल्द ही आएगा, तूने देखा ही नहीं आज तक आँखों में मेरी फिर इश्क़ तुझे खाक़ मुझ में नज़र आएगा, बगैर तस्वीरो के, कपड़ो के गुज़ार दी ये ईद भी दीवाना धीमे से यूँ ही एक दिन विसाल कर जाएगा..!! - [जिधर देखते है हर तरफ गमो के अम्बार देखते है...](https://bazmeshayari.com/jidhar-dekhte-hai-har-taraf-gamo-ka/): जिधर देखते है हर तरफ गमो के अम्बार देखते है हर किसी को रंज़ ओ अलम में गिरफ्तार देखते है, ख़ुदा जाने ख़ुशियों को किसकी नज़र लग गई ईद पर भी मुल्क में माहौल ना साज़गार देखते है, क्या ये वजह ए ग़ुरबत है या फिर कोई और ही वजह बहरहाल एक अनचाहा सा मुसल्लत आज़ार देखते है, हर एक अपना सा मुँह लिए बैठा है किसी कोने में इस बेरुखी के कारण हर रिश्ते में आई दरार देखते है, छोटे बड़े का अदब मानो जैसे भूल से गए हो सभी नतीजतन हर तरफ गुस्ताखी का गरम बाज़ार देखते है, - [जानता कोई नहीं आज असूलो की ज़ुबान...](https://bazmeshayari.com/jaanta-koi-nahi-aaj-asoolo-ki-zuban/): जानता कोई नहीं आज असूलो की ज़ुबान काश ! आ जाए हमें बोलना फूलों की ज़ुबान, मौसम ए गुल है खिले आपकी ख़ुशबू के गुलाब बोलना आ के ज़रा फिर से वो झूलों की ज़ुबान, ये रवैया भी हमें शहर के लोगो से मिला फूल के मुँह में रखी आज बबूलों की ज़ुबान, आप ने समझा हमें गम का तदारुक भी किया जानता कौन भला हमसे फ़जूलों की ज़ुबान, बे वज़ह गर्क़ कोई एक भी उम्मत न हुई डालते पुश्त पे जब लोग रसूलो की ज़ुबान, आज हसरत से हर एक दौर निकल भागे है क्या हुआ ? बोलता है - [बशर तरसते है उम्दा खानों को...](https://bazmeshayari.com/bashar-taraste-hai-umda/): बशर तरसते है उम्दा खानों को मौत पड़ती है हुक्मरानो को, ज़ुर्म आज़ाद फिर रहा है यहाँ बेकसों से भरे ये थानों को, छुप के बैठेगा तू कहाँ हमसे जानते है तेरे हर ठिकाने को, सर पे रखते है हम ज़मी लेकिन ज़ेर ए पा अपने आसमानों को, आये दिन इनके बीच दंगल है देखो गत्ते के इन पहलवानों को, क्या ये कम है कि बोलने को जुबां मिल गई हम जैसे बेजुबानो को, यही धरती का सीना चाक करें और रोटी नहीं किसानो को, एक नया मसला हुआ दरपेश फिर से सहरा के ऊँट बानो को, चारो सू सरफिरी - [सब गुनाह ओ हराम चलने दो....](https://bazmeshayari.com/sab-gunah-o-haram-chalne-do/): सब गुनाह ओ हराम चलने दो कह रहे है निज़ाम चलने दो, ज़िद्द है क्या वक़्त को बदलने की यूँ ही सब बे लगाम चलने दो, मुफ़्त मरता नहीं तू राहो में तुझको देते है दाम चलने दो, हक़ को छोड़ो क़िताब को छोड़ो हुक्म ए हाकिम से काम चलने दो, शाह आएँगे शाह जाएँगे तुम रहोगे सदा गुलाम चलने दो..!! - [ज़हालत की तारीकियो में गुम अहल ए वतन को...](https://bazmeshayari.com/zahalat-ki-tarikiyo-me-gum/): ज़हालत की तारीकियो में गुम अहल ए वतन को वो ले कर तालीम की मशाल रास्ता दिखाने चला है, दीदावर तन्हा ही निज़ाम ए शैतान से टकराने चला है ज़ुल्मत पसंद हरीफो को आईना ए हक़ दिखाने चला है, मुद्दतो से मुल्क में बिछाए गए गंदे सियासी जाल को वो अपनी क़लम की ज़ोर से जड़ से मिटाने चला है, हम तो दुआएँ खैर के तलबगार है फ़क़त या अल्लाह सुना है वो अकेला ही ज़ुल्मत के परखचे उड़ाने चला है..!! ~नवाब ए हिन्द - [एक शख्स की खातिर ज़बर कर बैठा हूँ...](https://bazmeshayari.com/ek-shakhs-ki-khatir-zabar-kar-baitha-hoo/): एक शख्स की खातिर ज़बर कर बैठा हूँ मैं ज़िन्दगी को इधर उधर कर बैठा हूँ, उस लम्हे पे तो क़यामत बरपा करनी थी मगर न जाने क्यूँ अब सबर कर बैठा हूँ, अहद था शिद्दत ए अज़ीयत ए फ़िराक से न रोऊँगा अहद टूट गया जानाँ मैं चश्म ए तर कर बैठा हूँ, वो नफ़ीस मिज़ाजी छीन ली ज़माने ने आके देख अब दिल को पत्थर कर बैठा हूँ, तुझ जैसे वायदा शिकन पे ऐतबार नहीं करना चाहिए मगर मैं कर बैठा हूँ, मेरी अब ख्वाहिश ए मुख़्तसर वस्ल नहीं इसी लिए वस्ल को अब हिज़्र कर बैठा हूँ..!! - [मेरे ज़ख्मो की हालात को रफूगर जानता है...](https://bazmeshayari.com/mere-zakhmo-ki-halat-ko-rafoogar-janta-hai/): ख़ुदा की कौन सी है राह बेहतर जानता है मज़ा है नेकियों में क्या कलंदर जानता है, बहुत हमदर्द है मेरे मगर अनजान है सब मेरे ज़ख्मो की हालात को रफूगर जानता है, किसी से मैं नहीं कहता मगर मेरी गरीबी मेरी दीवारों का उखड़ा पलस्तर जानता है, कभी मंदिर कभी मस्ज़िद पे है उसका बसेरा मज़हब इंसानियत का बस कबूतर जानता है, सनम तेरी जुदाई में कटा है वक़्त ए मुश्किल गिने दिन हिज़्र में कितने कैलेंडर जानता है, कही भर पेट रोटी तो कही से हाथ खाली किसी की कैसी है नीयत गदागर जानता है, मैं प्यासा रह - [ऐ निगाह ए दोस्त ये क्या हो गया, क्या कर दिया...](https://bazmeshayari.com/ae-nigaah-e-dost-ye-kya-ho-gaya/): ऐ निगाह ए दोस्त ये क्या हो गया क्या कर दिया पहले पहले रौशनी दी फिर अँधेरा कर दिया, आदमी को दर्द ए दिल की कद्र करनी चाहिए ज़िन्दगी की तल्खियों में लुत्फ़ पैदा कर दिया, इस निगाह ए शौक़ की तीर अफ़गनी रखी रही मैंने पहले इसको मज़रूह ए तमाशा कर दिया, उनकी महफ़िल के तसव्वुर ने फिर उनकी याद ने मेरे गम खाना की रौनक को दोबाला कर दिया, मयकदे की शाम और काँपते हाथों में ज़ाम तिश्नगी की खैर हो ये किस को रुसवा कर दिया..!! - [दिलो में बस अपने मुहब्बत भरे...](https://bazmeshayari.com/dilo-me-bas-apne/): चलो आओ हम एक वायदा करें दिलो में बस अपने मुहब्बत भरे, वो सब काम जिनसे दुखे दिल कोई करें अहद अहम वो न हरगिज़ करे, मिटा दे ज़माने से हम नफरतें मुहब्बत की खातिर जिएँ और मरे, हैं इन्सान की दुश्मन ये सारी नफुर मुहब्बत का हर शू बोला बाला करे, गुनाहों से सारे करें हम इज्तिनाब सभी अमल हम सुन्नतो पर करे, सभी हम पियें ज़ाम ए इश्क़ ए नबी ﷺ किसी से नहीं बस ख़ुदा से हम डरे..!! - [सुरखाब क्या ख़रीदे असबाब क्या ख़रीदे ...](https://bazmeshayari.com/surkhab-kya-kharide-asbab-kya-kharide/): सुरखाब क्या ख़रीदे असबाब क्या ख़रीदे फ़ितरत फ़कीर जिसकी अलक़ाब क्या ख़रीदे, ले जा इन्हें उठा कर सौदा नहीं है मुमकिन जिस आँख में न नींदे वो ख़्वाब क्या ख़रीदे, बेकार अश्क ले कर सहरा गया था मज़नू जो बूँद को तरसता सैलाब क्या ख़रीदे, बाज़ार है ये दुनियाँ हर शय पे जी ये आये एक कशमकश अज़ब है बेताब क्या ख़रीदे, माना ज़मीं है तेरी पर सोच ले तू नादाँ जब आसमां न तेरा माहताब क्या ख़रीदे, आदत, चलन, तरीक़े ये इश्क़ खाक़ बदले ज़ाहिल हो जो अज़ल का आदाब क्या ख़रीदे, ऐ इन्सान समन्दरो की क्या मिन्नतें करे - [मत पूछो मुसलमान का हाल...](https://bazmeshayari.com/mat-pucho-musalman-haal/): मत पूछो मुसलमान का हाल… मस्ज़िद के लिए सर कटाने को तैयार है लेकिन मस्ज़िद में सर झुकाने को तैयार नहीं है, नबी क़रीम का नाम सुनते झूम जाते है लोग नबी क़रीम का हुक्म सुनते ही घूम जाते है लोग, कहते है कि मेरे रग रग में है नबी नबी लेकिन पढ़ते है नमाज़ हफ्ते में कभी कभी..!! - [फ़लक पे कितना उदास कितना तन्हा...](https://bazmeshayari.com/falaq-pe-kitna-udas-kitna-tanha/): फ़लक पे कितना उदास कितना तन्हा कितना बेकस सा लगा हिलाल ए ईद, हम हुजूम ए शहर में भी तन ए तन्हा वहाँ वो कहकशाँ में हो कर भी अकेला, काश ! दरम्याँ दूरियाँ कम हो गई होती तो इस साल हमारी भी ईद हो गई होती..!! ~नवाब ए हिन्द - [मैं हूँ मेरी चश्म-ए-तर है रात है तन्हाई है...](https://bazmeshayari.com/main-hoon-meri-chashm/): मैं हूँ मेरी चश्म-ए-तर है रात है तन्हाई है दर्द मेरा हम-सफ़र है रात है तन्हाई है, जुगनुओं से साथ चलने की गुज़ारिश कीजिए हिज्र का लम्बा सफ़र है रात है तन्हाई है, फिर वही यादें वही आँसू वही आह-ओ-फ़ुग़ाँ फिर वही दीवार-ओ-दर है रात है तन्हाई है, दोस्तों की भीड़ को मसरूफ़ियत में खो दिया आज फ़ुर्सत बाम पर है रात है तन्हाई है, तुझ को पाने के जुनूँ में हम वहाँ तक आ गए ख़ुद को अब खोने का डर है रात है तन्हाई है..!! - [रवैये मार देते है ये लहज़े मार देते है...](https://bazmeshayari.com/rawaiye-maar-dete-hai/): रवैये मार देते है ये लहज़े मार देते है वही जो जान से प्यारे हैं रिश्ते मार देते है, कभी बरसो गुज़रने पर कही भी कुछ नहीं होता कभी ऐसा भी होता है कि लम्हे मार देते है, कभी मंज़िल पे जाने के निशाँ तक भी नहीं मिलते जो रास्तो में भटक जाएँ तो रस्ते मार देते है, कहानी खत्म होती है कभी अंज़ाम से पहले अधूरे ना मुक़म्मल से ये किस्से मार देते है, हजारो वार दुनियाँ के सहे जाते है हँस हँस के मगर अपनों के ताने और शिकवे मार देते है, मुझे अक्सर ये लगता है कि - [आगाज़ ईद है, अंज़ाम ईद है, नेक काम ईद है...](https://bazmeshayari.com/aagaaz-eid-anzam-eid-hai/): ईद मुबारक़ आगाज़ ईद है, अंज़ाम ईद है, नेक काम ईद है सच्चाई ओ हक़ पे रहे क़ायम तो हर गाम ईद है, ख़िदमत ए ख़ल्क़ और दिल से रब की इबादत जिसने भी की उन सबके लिए इनआम ईद है..!! ~नवाब ए हिन्द - [अपनी ज़रूरत के मुताबिक़....](https://bazmeshayari.com/apni-zarurat-ke-mutabik/): अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ लोगो के जज़्बात बदल जाते है, इंसानों की इन्हें फिक़र नहीं मगर ये हैवानो की खैर मनाते है, इनके रंग बदलने का हुनर देख ख़ुद गिरगिट भी शरमा जाते है, ऐसे इंसानियत के दुश्मन भी अपने आप को इन्सान बताते है, कोठे और दलालों के मालिक भी नारी उत्थान का नारा लगाते है, साडी बाँटते दिन के उजालो में वही रातो में दुशासन बन जाते है..!! ~नवाब ए हिन्द - [कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती...](https://bazmeshayari.com/kahte-hai-eid-hai/): कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती हम को अगर मयस्सर जानाँ की दीद होती, क़ीमत में दीद-ए-रुख़ की हम नक़्द-ए-जाँ लगाते बाज़ार-ए-नाज़ लगता दिल की ख़रीद होती, कुछ अपनी बात कहते कुछ मेरा हाल सुनते नाज़-ओ-नयाज़ की यूँ गुफ़्त-ओ-शुनीद होती, जल्वे दिखाते जाते वो तर्ज़-ए-दिलबरी के और दिल में याँ हवा-ए-नाज़-ए-मज़ीद होती, तेग़-ए-नज़र से दिल पर वो वार करते जाते और लब पे याँ सदा-ए-हल-मिम-मज़ीद होती, अबरू से उन के ग़म्ज़ा तीर-ए-अदा लगाता ये दिल क़तील होता ये जाँ शहीद होती, कुछ हौसला बढ़ाता अंदाज़-ए-लुत्फ़-ए-जानाँ कुछ दग़दग़ा सा होता कुछ कुछ उमीद होती..!! ~ग़ुलाम भीक नैरंग - [आये जो वो तो दिल के सब अरमान मचल गए...](https://bazmeshayari.com/aaye-jo-wo-to/): आये जो वो तो दिल के सब अरमान मचल गएबुझते हुए चिराग़ ए वफ़ा फिर से जल गए, मिलते तो सबसे आ के है एक हम ही को मगरमिलती नहीं ख़बर वो कब आ कर निकल गए, पैमां ओ अहद क्या हुए, सोचूँ कभी कभीक्यूँ कुर्बतों के होते वो इतने बदल गए, वीरान थी ज़िन्दगी मेरी एक दीद के बगैरअब ऐसी ज़िन्दगी से वो कैसे बहल गए, वारफ्तगी शौक का आलम न पूछिएहम लोग इंतज़ार के साँचे में ढल गए, है इश्तियाक़ ए दिल को ख़लिश जानने का अबक्यूँ कर वो अपनी बातों से पहलू बदल गए..!! - [राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगा](https://bazmeshayari.com/raaj-kahan-tak-raaj-rahega/): राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगाजी का दाग़ उजागर हो कर सूरज को शरमाएगा, शहरों को वीरान करेगा अपनी आँच की तेज़ी सेवीरानों में मस्त अलबेले वहशी फूल खिलाएगा, हाँ यही शख़्स गुदाज़ और नाज़ुक होंटों पर मुस्कान लिएऐ दिल अपने हाथ लगाते पत्थर का बन जाएगा, दीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से कीवो तो दर्द का बानी ठहरा वो क्या दर्द बटाएगा, तेरा नूर ज़ुहूर सलामत इक दिन तुझ पर माह-ए-तमामचाँद-नगर का रहने वाला चाँद-नगर लिख जाएगा..!! ~इब्न-ए-इंशा - [पीत करना तो हम से निभाना सजन...](https://bazmeshayari.com/peet-karna-to-hamse-nibhana-sajan/): पीत करना तो हम से निभाना सजनहम ने पहले ही दिन था कहा ना सजन, तुम ही मजबूर हो हम ही मुख़्तार हैंख़ैर माना सजन ये भी माना सजन, अब जो होने के क़िस्से सभी हो चुकेतुम हमें खो चुके हम तुम्हें खो चुके, आगे दिल की न बातों में आना सजनकि ये दिल है सदा का दिवाना सजन, ये भी सच है न कुछ बात जी कीबनी सूनी रातों में देखा किए चाँदनी, पर ये सौदा है हम को पुराना सजनऔर जीने का अपने बहाना सजन, शहर के लोग अच्छे हैं हमदर्द हैंपर हमारी सुनो हम जहाँ-गर्द हैं, दाग़-ए-दिल - [हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर माह-ए-तमाम हुए..](https://bazmeshayari.com/hilal-e-shaam-se/): लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर पल में माह-ए-तमाम हुएहम हर बुर्ज में घटते घटते सुब्ह तलक गुमनाम हुए, उन लोगों की बात करो जो इश्क़ में ख़ुश-अंजाम हुएनज्द में क़ैस यहाँ पर ‘इंशा’ ख़ार हुए नाकाम हुए, किस का चमकता चेहरा लाएँ किस सूरज से माँगें धूपघूर अँधेरा छा जाता है ख़ल्वत-ए-दिल में शाम हुए, एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता हैएक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए, शौक़ की आग नफ़स की गर्मी घटते घटते सर्द न होचाह की राह दिखा कर तुम तो वक़्फ़-ए-दरीचा-ओ-बाम हुए, उन से बहार ओ बाग़ की बातें - [कुछ कहने का वक़्त नहीं कुछ न कहो ख़ामोश रहो...](https://bazmeshayari.com/kuch-naa-kaho-khamosh-raho/): कुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहोऐ लोगो ख़ामोश रहो हाँ ऐ लोगो ख़ामोश रहो, सच अच्छा पर उस के जिलौ में ज़हर का है इक प्याला भीपागल हो क्यूँ नाहक़ को सुक़रात बनो ख़ामोश रहो, उन का ये कहना सूरज ही धरती के फेरे करता हैसर-आँखों पर सूरज ही को घूमने दो ख़ामोश रहो, महबस में कुछ हब्स है और ज़ंजीर का आहन चुभता हैफिर सोचो हाँ फिर सोचो हाँ फिर सोचो ख़ामोश रहो, गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैंइस बगिया के भेद न खोलो सैर करो ख़ामोश रहो, आँखें - [किस को पार उतारा तुम ने किस को पार उतारोगे...](https://bazmeshayari.com/kisko-paar-utara-tumne-kisko-paar/): किस को पार उतारा तुम ने किस को पार उतारोगेमल्लाहो तुम परदेसी को बीच भँवर में मारोगे, मुँह देखे की मीठी बातें सुनते इतनी उम्र हुईआँख से ओझल होते होते जी से हमें बिसारोगे, आज तो हम को पागल कह लो पत्थर फेंको तंज़ करोइश्क़ की बाज़ी खेल नहीं है खेलोगे तो हारोगे, अहल-ए-वफ़ा से तर्क-ए-तअ’ल्लुक़ कर लो पर इक बात कहेंकल तुम इन को याद करोगे कल तुम इन्हें पुकारोगे, उन से हम से प्यार का रिश्ता ऐ दिल छोड़ो भूल चुकोवक़्त ने सब कुछ मेट दिया है अब क्या नक़्श उभारोगे, ‘इंशा’ को किसी सोच में डूबे दर - [कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा...](https://bazmeshayari.com/kal-chaudawahi-ki-raat-thi/): कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेराकुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा, हम भी वहीं मौजूद थे हम से भी सब पूछा किएहम हँस दिए हम चुप रहे मंज़ूर था पर्दा तेरा, इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटीं महफ़िलेंहर शख़्स तेरा नाम ले हर शख़्स दीवाना तेरा, कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगरजंगल तिरे पर्बत तिरे बस्ती तिरी सहरा तेरा, हम और रस्म-ए-बंदगी आशुफ़्तगी उफ़्तादगीएहसान है क्या क्या तेरा ऐ हुस्न-ए-बे-परवा तेरा, दो अश्क जाने किस लिए पलकों पे आ कर टिक गएअल्ताफ़ की - [सब झाड़ फूँक सीख गए शेख जी से हम...](https://bazmeshayari.com/sab-jhaad-foonk-sikh-gaye-shekh-ji-se-ham/): सब झाड़ फूँक सीख गए शेख जी से हममुर्गे को ज़िबह करते है उल्टी छुरी से हम, बचपन में क्या अटैक किया था ज़ुकाम नेपरहेज़ कर रहे है अभी तक दही से हम, हैबिट कुछ इस तरह हुई खा खा के डालडाजजबज होने लगते है ख़ुशबू ए घी से हम, मुँह अपना एक बार जला था जो दूध सेपीने लगे है फूँक के मट्ठा तभी से हम, जिस शायरी से शेख है फ़ाके में मुब्तिलारोज़ी कमा रहे है उसी शायरी से हम, ख़ुशबू ए मर्ग आती है हर लफ्ज़ लफ्ज़ सेकरते है गुफ़्तगू जो किसी मौलवी से हम, आने दो - [ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में तमाम तेरी हिकायतें हैं...](https://bazmeshayari.com/ye-meri-gazale-meri-nazme-tamam/): ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में तमाम तेरी हिकायतें हैंये तज़किरे तेरी लुत्फ़ के हैं ये शेर तेरी शिकायतें हैं, मैं सब तेरी नज़्र कर रहा हूँ ये उन ज़मानों की स’अतें हैंजो ज़िन्दगी के नये सफ़र में तुझे किसी रोज़ याद आयें, तो एक एक हर्फ़ जी उठेगा पहन के अन्फ़ास की क़बायेंउदास तनहाईयों के लम्हों में नाच उठेंगी ये अप्सरायें, मुझे तेरी दर्द के अलावा भी और दुख थे, ये जानता हूँहज़ार ग़म थे जो ज़िन्दगी की तलाश में थे, ये जानता हूँ, मुझे ख़बर है कि तेरी आँचल में दर्द की रेत छानता हूँमगर हर एक बार - [इब्तिदा ए इश्क़ में मेरा यूँ हुआ दिल ख़राब आधा...](https://bazmeshayari.com/ibtida-e-ishq-me-mera-yun-hua/): इब्तिदा ए इश्क़ में मेरायूँ हुआ दिल ख़राब आधा, कि जैसे सिख पर चढ़ते हीजल गया हो कबाब आधा, लगता है मेरे महबूब की हैशायद एक आँख गायब, क्योकि वो जब भी उलटता हैउलटता है रुख से नक़ाब आधा..!! - [लानत है तेरी ज़िन्दगी पे नहीं तू किसी काज का...](https://bazmeshayari.com/lanat-hai-teri-zindagi-pe/): लानत है तेरी ज़िन्दगी पे नहीं तू किसी काज काशक्ल ए इंसानी में छुपा तू इब्लीस के मिजाज़ का, बेशर्म धोबी का कुत्ता है तू घर का न घाट काबीबी भी जा चुकी है कह के दुश्मन आनाज का, कहती थी तुम्हारी रोटी क्यों न कुत्तो को डाल दूँ ?तू है सरासर निकम्मा बेगैरत नासुर इस समाज का..!! - [बहार रुत में उजाड़ रस्ते...](https://bazmeshayari.com/bahar-rut-me-ujad-raste/): बहार रुत में उजाड़ रस्तेतका करोगे तो रो पड़ोगे, किसे से मिलने को जब भीसजा करोगे तो रो पड़ोगे, तुम्हारे वायदों ने यार मुझकोतबाह किया है कुछ इस तरह, कि ज़िन्दगी में जो फिर किसी सेदगा करोगे तो रो पड़ोगे, मैं जानता हूँ मेरी मुहब्बतउजाड़ देगी तुम्हे भी ऐसे, कि चाँद रातो में अब किसी सेमिला करोगे तो रो पड़ोगे, बरसती बारिश में याद रखनातुम्हे सताएंगी मेरी आँखे, किसी वली के मज़ार पर जबदुआ करोगे तो रो पड़ोगे..!! - [किसी के इश्क़ में रस्तों की धूल हो गए हैं...](https://bazmeshayari.com/kisi-ke-ishq-me-rasto-ki-dhool/): किसी के इश्क़ में रस्तों की धूल हो गए हैंख़ुदा का शुक्र कि पैसे वसूल हो गए हैं, जनाब-ए-हिज्र ने क़त-ओ-बुरीद की ऐसीकि खींच-तान के ख़ुद को क़ुबूल हो गए हैं, कभी वो आता था मिलने हमें जहाँ छुप करहम उस मज़ार की क़ब्रों के फूल हो गए हैं, अगर वो चाँद मिले तो हमारी जानिब सेउसे बताना सितारे वसूल हो गए हैं, चहक उठा है अचानक चमन उदासी काचराग़ चाँद हुआ ज़ख़्म फूल हो गए हैं, वो लोग तेरे लिए जिन को रद्द किया हम नेसुना है आज वो तुझ को क़ुबूल हो गए हैं, कभी जो ताब-ओ-तमन्ना की - [धमाल धूल उड़ाए तो इश्क़ होता है...](https://bazmeshayari.com/dhamaal-dhool-udaye-to/): धमाल धूल उड़ाए तो इश्क़ होता हैवज़ूद वज्द में आये तो इश्क़ होता है, बहा रहा है वो जलते चिराग़ पानी मेंउतर के तह में जलाए तो इश्क़ होता है, तपीश तो होती है लेकिन धुआँ नहीं होताजो आग अश्क़ लगाए तो इश्क़ होता है, दुकान ए वस्ल तो खोले उदास दिल में मगरख़ुशी से हिज़्र कमाए तो इश्क़ होता है, जो खाल ओ खद में मुक़ैद हो संग की सूरतपिघल के उसको दिखाए तो इश्क़ होता है, क़दम क़दम वो धमक हो, ज़मीन धड़क उठेफ़लक गुबार में आये तो इश्क़ होता है, असाए जज़्ब की ज़र्बो से तोड़ कर - [इश्क़ ज़न्नत इश्क़ दोज़ख इश्क़ तो मशहूर है...](https://bazmeshayari.com/ishq-zannat-ishq-dozakh-ishq-to-mashahoor-hai/): इश्क़ ज़न्नत इश्क़ दोज़ख इश्क़ तो मशहूर हैइश्क़ जंगल इश्क़ मंगल इश्क़ तो मसरूर है, इश्क़ मुज़रिम इश्क़ मुल्ज़िम इश्क़ तो क़सूर हैइश्क़ काज़ी इश्क़ क़ज़ा इश्क़ तो मफरूर है, इश्क़ हवा इश्क़ वफ़ा इश्क़ तो मकदूर हैइश्क़ हासिल इश्क़ हसूल इश्क़ तो मगरूर है, इश्क़ रूमी इश्क़ जामी इश्क़ कोह ए तूर हैइश्क़ हब्शी इश्क़ करनी इश्क़ बे मंसूर है, इश्क़ आफ़त इश्क़ आतिश इश्क़ मतलूब ए ख़ुदाइश्क़ मज़नू इश्क़ लैला इश्क़ फ़रियाद ओ सदा इश्क़ बातिन इश्क़ ज़ाहिर इश्क़ तमसील ए इलाहइश्क़ साकिन इश्क़ जारी इश्क़ हमनाम ए ख़ुदा, इश्क़ बाक़ी इश्क़ साक़ी इश्क़ मायनी अताइश्क़ फ़रहाद इश्क़ - [हिसार-ए-दीद में रोईदगी मालूम होती है...](https://bazmeshayari.com/hisaar-e-deed-me-roidagi-malum-hoti-hai/): हिसार-ए-दीद में रोईदगी मालूम होती हैतो क्यूँ अंदेशा-ए-तिश्ना-लबी मालूम होती है, तुम्हारी गुफ़्तुगू से आस की ख़ुश्बू छलकती हैजहाँ तुम हो वहाँ पे ज़िंदगी मालूम होती है, सितारे मिस्ल जुगनू ज़ाइचे में रक़्स करते हैंज़रा सी देर में कुछ रौशनी मालूम होती है, जहाँ पर एक जोगन मस्त हो कर गुनगुनाती हैउसी साहिल पे इक गिरती नदी मालूम होती है, उदासी ज़ुल्फ़ खोलेगी दिनों की याद में गुम हैशुऊ’र-ए-गुल को फ़िक्र-ए-तिश्नगी मालूम होती है, जहाँ पे फूल खिलता है सँवरता है बिखरता हैउसी शाख़-ए-मोहब्बत पे कली मालूम होती है, सताती है तुम्हारी याद जब मुझ को शब-ए-हिज्राँमुझे ख़ुद अपनी हस्ती - [हर एक दर्द मुहब्बत के नाम होता है...](https://bazmeshayari.com/her-ek-dard-muhabbat-ke-naam/): हर एक दर्द मुहब्बत के नाम होता हैयही तमाशा मगर सुबह ओ शाम होता है, कही भी मिलता नहीं है दयार ए खलुत मेंकि जब भी इससे कोई हमको काम होता है, कोई भी बनता नहीं दोस्त हम गरीबो काजबकि हमारी सिम्त से मुस्बत पयाम होता है, शेख साहब ये देख के ही न मर जाएँ कहीहमारे हाथो में उल्फ़त का सदा जाम होता है, वो क़स्र ए शाही में रहता है अपनी राहत सेग़रीब खाने में तो फ़क़त उसका क़याम होता है, ख़ुदा का फज़ल है इल्म ओ कमाल में अब भीजहाँ ए इश्क़ में अपना आली क़लाम होता - [तुमको बेलौस प्यार करता हूँ....](https://bazmeshayari.com/tumko-be-laus-pyar/): हर वक़्त इंतज़ार करता हूँतुमको बेलौस प्यार करता हूँ, पर दिल में रखता हूँ बताता नहींप्यार कब आशकार करता हूँ, शगफ़ है शायरी से इस लिए येमशगला इख़्तियार करता हूँ, मेरे दुश्मन नहीं हो यार हो तुमदोस्तों में शुमार करता हूँ, तेरे बिन दिल नहीं मेरा लगताइस लिए कॉल यार करता हूँ..!! - [मतलब परस्तो को क्या पता कि दोस्ती क्या है...](https://bazmeshayari.com/matlab-parasto-ko-kya-pata-ki/): मतलब परस्तो को क्या पता कि दोस्ती क्या हैगुज़र गई है जो मुश्किलो में वो ज़िन्दगी क्या है, मिलेंगे जब कभी हिज़्र ए जुदाई में कटे वो दिनशायद तभी यकीं होगा कि ये तिश्नगी क्या है, धूप में ख़ुद को जला कर भी सोना पड़े भूखावही ग़रीब बता सकता है कि बेकसी क्या है, खिलौना समझ कर खेलने वाले रखना याददिल टूटा तो चलेगा पता प्यार आशिकी क्या है, तुझे ख़बर ही नहीं आलम ए दिल की लगी का मिला गया कोई तो होगी ख़बर दिल्लगी क्या है, तुझसे पहले पता कहाँ था मुझे रास्ता मयकदे का जो तेरे लब - [मुक़द्दर का चमकता सितारा हो भी सकता है...](https://bazmeshayari.com/muqaddar-ka-chamakta-sitara/): मुक़द्दर का चमकता सितारा हो भी सकता हैमुझे तक़दीर का शायद इशारा हो भी सकता है, मिलावट झूठ की ना कर सदाक़त की तिज़ारत मेंअगर ऐसा करोगे तो ख़सारा हो भी सकता है, किसी के भी इशारे पर ये दिल तो अब नहीं चलतामगर ये एक इशारे पर तुम्हारा हो भी सकता है, वो ज़र्रा है मगर उसकी चमक तो आसमां तक हैसहारा तुम अगर दे दो वो तारा हो भी सकता है, दिल ए मुज़तर को समझाया है अब मैंने यही कह करतख्य्यल और तसव्वुर में गुज़ारा हो भी सकता है, अभी भी वक़्त है आदिल सभी को मुत्तहिद - [एक मैं और इतने लाखों सिलसिलों के सामने...](https://bazmeshayari.com/ek-main-aur-itne-laakho-silsilo/): एक मैं और इतने लाखों सिलसिलों के सामनेएक सौत-ए-गुंग जैसे गुम्बदों के सामने, मिटते जाते नक़्श दूद-ए-दम की आमद रफ़्त सेखुलते जाते बे-सदा लब आइनों के सामने, है हवा-ए-सैर-ए-आब और अजनबी सी सर-ज़मींउड़ रही है ख़ाक-ए-कोहना साहिलों के सामने, आग जलती है घरों में या कोई तस्वीर हैयादगार-ए-जुर्म-ए-आदम ख़ाकियों के सामने, दुश्मनी रस्म-ए-जहाँ है दोस्ती हर्फ़-ए-ग़लतआदमी तन्हा खड़ा है ज़ालिमों के सामने, चार चुप चीज़ें हैं बहर-ओ-बर फ़लक और कोहसारदिल दहल जाता है इन ख़ाली जगहों के सामने, बातिन-ए-ज़रदार पुर-असरार है जैसे ‘मुनीर’कान-ए-ज़र की बंद हैबत मशअ’लों के सामने..!! ~मुनीर नियाज़ी - [इक मसाफ़त पाँव शल करती हुई सी ख़्वाब में...](https://bazmeshayari.com/ek-mashafat-paanvshal-karti-hui/): इक मसाफ़त पाँव शल करती हुई सी ख़्वाब मेंइक सफ़र गहरा मुसलसल ज़र्दी-ए-महताब में, तेज़ है बू-ए-शगूफ़ा हाए मर्ग-ए-ना-गहाँघिर गई ख़ाक-ए-ज़मीं जैसे हिसार-ए-आब में, हासिल-ए-जोहद-ए-मुसलसल मुस्तक़िल आज़ुर्दगीकाम करता हूँ हवा में जुस्तुजू नायाब में, तंग करती है मकाँ में ख़्वाहिश-सैर-ए-बसीतहै असर दाइम फ़लक का सहन की मेहराब में, ऐ ‘मुनीर’ अब इस क़दर ख़ामोशियाँ ये क्या हुआये सिफ़त आई कहाँ से पारा-ए-सीमाब में..!! ~मुनीर नियाज़ी - [एक नगर के नक़्श भुला दूँ एक नगर ईजाद करूँ...](https://bazmeshayari.com/ek-nagar-ke-naqsh-bhula-doon/): एक नगर के नक़्श भुला दूँ एक नगर ईजाद करूँएक तरफ़ ख़ामोशी कर दूँ एक तरफ़ आबाद करूँ, मंज़िल-ए-शब जब तय करनी है अपने अकेले दम से हीकिस के लिए इस जगह पे रुक कर दिन अपना बर्बाद करूँ, बहुत क़दीम का नाम है कोई अब्र-ओ-हवा के तूफ़ाँ मेंनाम जो मैं अब भूल चुका हूँ कैसे उस को याद करूँ, जा के सुनूँ आसार-ए-चमन में साएँ साएँ शाख़ों कीख़ाली महल के बुर्जों से दीदार-ए-बर्क़-ओ-बाद करूँ, शे’र ‘मुनीर’ लिखूँ मैं उठ कर सेहन-ए-सहर के रंगों मेंया फिर काम ये नज़्म-ए-जहाँ का शाम ढले के ब’अद करूँ..!! ~मुनीर नियाज़ी - [इक तेज़ तीर था कि लगा और निकल गया...](https://bazmeshayari.com/ek-tez-teer-tha-ki-laga/): इक तेज़ तीर था कि लगा और निकल गयामारी जो चीख़ रेल ने जंगल दहल गया, सोया हुआ था शहर किसी साँप की तरहमैं देखता ही रह गया और चाँद ढल गया, ख़्वाहिश की गर्मियाँ थीं अजब उन के जिस्म मेंख़ूबाँ की सोहबतों में मिरा ख़ून जल गया, थी शाम ज़हर-ए-रंग में डूबी हुई खड़ीफिर इक ज़रा सी देर में मंज़र बदल गया, मुद्दत के बा’द आज उसे देख कर ‘मुनीर’इक बार दिल तो धड़का मगर फिर सँभल गया..!! ~मुनीर नियाज़ी - [ग़ैरों से मिल के ही सही बे-बाक तो हुआ...](https://bazmeshayari.com/gairo-se-mil-ke-hi-sahi/): ग़ैरों से मिल के ही सही बे-बाक तो हुआबारे वो शोख़ पहले से चालाक तो हुआ, जी ख़ुश हुआ है गिरते मकानों को देख करये शहर ख़ौफ़-ए-ख़ुद से जिगर-चाक तो हुआ, ये तो हुआ कि आदमी पहुँचा है माह तककुछ भी हुआ वो वाक़िफ़-ए-अफ़्लाक तो हुआ, कुछ और वो हुआ न हुआ मुझ को देख करयाद-ए-बहार-ए-हुस्न से ग़मनाक तो हुआ, इस कश्मकश में हम भी थके तो हैं ऐ ‘मुनीर’शहर-ए-ख़ुदा सितम से मगर पाक तो हुआ..!! ~मुनीर नियाज़ी - [है शक्ल तेरी गुलाब जैसी, नज़र है तेरी शराब जैसी..](https://bazmeshayari.com/shakl-hai-teri-gulab-jaisi/): है शक्ल तेरी गुलाब जैसीनज़र है तेरी शराब जैसी, हवा सहर की है इन दिनों मेंबदलते मौसम के ख़्वाब जैसी, सदा है इक दूरियों में ओझलमिरी सदा के जवाब जैसी, वो दिन था दोज़ख़ की आग जैसावो रात गहरे अज़ाब जैसी, ये शहर लगता है दश्त जैसाचमक है उस की सराब जैसी, ‘मुनीर’ तेरी ग़ज़ल अजब हैकिसी सफ़र की किताब जैसी..!! ~मुनीर नियाज़ी - [ग़म की बारिश ने भी तेरे नक़्श को धोया नहीं...](https://bazmeshayari.com/gam-ki-barish-ne-bhi-tera-naqsh/): ग़म की बारिश ने भी तेरे नक़्श को धोया नहींतू ने मुझ को खो दिया मैं ने तुझे खोया नहीं, नींद का हल्का गुलाबी सा ख़ुमार आँखों में थायूँ लगा जैसे वो शब को देर तक सोया नहीं, हर तरफ़ दीवार-ओ-दर और उन में आँखों के हुजूमकह सके जो दिल की हालत वो लब-ए-गोया नहीं, जुर्म आदम ने किया और नस्ल-ए-आदम को सज़ाकाटता हूँ ज़िंदगी भर मैं ने जो बोया नहीं, जानता हूँ एक ऐसे शख़्स को मैं भी ‘मुनीर’ग़म से पत्थर हो गया लेकिन कभी रोया नहीं..!! ~मुनीर नियाज़ी - [चादर की इज्ज़त करता हूँ, और परदे को मानता हूँ..](https://bazmeshayari.com/chadar-ki-izzat-karta-hoon/): चादर की इज्ज़त करता हूँऔर परदे को मानता हूँ, हर परदा परदा नहीं होताइतना मैं भी जानता हूँ, सारे मर्द ही एक जैसे हैतुमने कैसे कह डाला ? मैं भी तो एक मर्द हूँतुमको ख़ुद से बेहतर मानता हूँ..!! - [उसे कहना मुहब्बत दिल के ताले तोड़ देती है...](https://bazmeshayari.com/muhabbat-dil-ke-taale-tod-deti-hai/): उसे कहना मुहब्बत दिल के ताले तोड़ देती हैउसे कहना मुहब्बत दो दिलो को जोड़ देती है, उसे कहना मुहब्बत नाम है रूहों के मिलने काउसे कहना मुहब्बत नाम है ज़ख्मो के सिलने का, उसे कहना मुहब्बत तो दिलो में रौशनी भर देउसे कहना मुहब्बत पत्थरो को मोम सा कर दे, उसे कहना मुहब्बत दूर है रस्म ओ रिवाज़ो सेउसे कहना मुहब्बत मावरा तख्तों से ताज़ो से, उसे कहना मुहब्बत का नहीं अलबदल कोईउसे कहना मुहब्बत का नहीं है हमशक्ल कोई, उसे कहना मुहब्बत पर यकीं कर लो मेरे हमदमउसे कहना मुहब्बत दिल में तुम भर लो मेरे हमदम..!! - [कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहज़े में...](https://bazmeshayari.com/koi-to-fool-khilaye/): कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहज़े मेंअज़ब तरह की घुटन है हवा के लहज़े में, ये वक़्त किसकी रौनत पे खाक़ डाल गया ?ये कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहज़े में, न जाने खल्क ख़ुदा कौन से अज़ाब में हैहवाएँ चीख पड़ी इल्तज़ा के लहज़े में, खुला फ़रेब मुहब्बत दिखाई देता हैअज़ब कमाल है उस बेवफ़ा के लहज़े में, यही है मसलहत ज़ब्र एहतियात तो फिरहम अपना हाल कहेंगे छुपा के लहज़े में..!! - [ख़बर क्या थी कि ऐसे अज़ाब उतरेंगे...](https://bazmeshayari.com/khabar-kya-thi-aise-azab-utrenge/): ख़बर क्या थी कि ऐसे अज़ाब उतरेंगेजो होंगे बाँझ वो आँखों में ख़्वाब उतरेंगे, सजेंगे ज़िस्म पे कुछ पैरहन गुनाहों केजो दिल पे नक्श थे सारे सवाब उतरेंगे, कड़कती धूप के जलते सफ़र में मैं तन्हाचलूँ तो, आँख में लेकिन सराब उतरेंगे, चलेगी शहर ए तमन्ना में हिज़्र की आँधीतमाम कच्चे घड़ो पर चनाब उतरेंगे, न जाने साँस में कितने ही रंग महकेंगेजब उसके लम्स के मुझ पर गुलाब उतरेंगे, यारो ! उनके लिए ज़िन्दगी का पढ़ना क्या ?जो ले के दर्द ओ अलम की क़िताब उतरेंगे..!! - [अपने एहसास से छू कर मुझे संदल कर दो...](https://bazmeshayari.com/apne-ehsas-se-chhoo-kar-mujhe-sandal-kar-do/): अपने एहसास से छू कर मुझे संदल कर दोमैं कि सदियों से अधूरा हूँ मुकम्मल कर दो, न तुम्हें होश रहे और न मुझे होश रहेइस क़दर टूट के चाहो मुझे पागल कर दो, तुम हथेली को मिरे प्यार की मेहंदी से रंगोअपनी आँखों में मिरे नाम का काजल कर दो, इस के साए में मिरे ख़्वाब दहक उट्ठेंगेमेरे चेहरे पे चमकता हुआ आँचल कर दो, धूप ही धूप हूँ मैं टूट के बरसो मुझ परइस क़दर बरसो मिरी रूह में जल-थल कर दो, जैसे सहराओं में हर शाम हवा चलती हैइस तरह मुझ में चलो और मुझे जल-थल कर - [अभी तो इश्क़ में ऐसा भी हाल होना है...](https://bazmeshayari.com/abhi-to-ishq-me-aisa-bhi-haal-hona-hai/): अभी तो इश्क़ में ऐसा भी हाल होना हैकि अश्क रोकना तुम से मुहाल होना है, हर एक लब पे है मेरी वफ़ा के अफ़्सानेतिरे सितम को अभी ला-ज़वाल होना है, बजा कि ख़्वाब हैं लेकिन बहार की रुत मेंये तय है कि अब के हमें भी निहाल होना है, तुम्हें ख़बर ही नहीं तुम तो लौट जाओगेतुम्हारे हिज्र में लम्हा भी साल होना है, हमारी रूह पे जब भी अज़ाब उतरेंगेतुम्हारी याद को इस दिल को ढाल होना है, कभी तो रोएगा वो भी किसी की बाँहों मेंकभी तो उस की हँसी को ज़वाल होना है, मिलेंगी हम को - [चराग़ ए तूर जलाओ बड़ा अँधेरा है...](https://bazmeshayari.com/charag-e-toor-jalaao-bada-andhera-hai/): चराग़ ए तूर जलाओ बड़ा अँधेरा है ज़रा नक़ाब उठाओ बड़ा अँधेरा है, अभी तो सुब्ह के माथे का रंग काला है अभी फ़रेब न खाओ बड़ा अँधेरा है, वो जिन के होते हैं ख़ुर्शीद आस्तीनों में उन्हें कहीं से बुलाओ बड़ा अँधेरा है, मुझे तुम्हारी निगाहों पे ऐतमाद नहीं मेरे क़रीब न आओ बड़ा अँधेरा है, फ़राज़ ए अर्श से टूटा हुआ कोई तारा कहीं से ढूँढ के लाओ बड़ा अँधेरा है, बसीरतों पे उजालों का ख़ौफ़ तारी है मुझे यक़ीन दिलाओ बड़ा अँधेरा है, जिसे ज़बान ए ख़िरद में शराब कहते हैं वो रौशनी सी पिलाओ बड़ा अँधेरा - [भूली हुई सदा हूँ मुझे याद कीजिए...](https://bazmeshayari.com/bhooli-hui-sada-hoon-mujhe/): भूली हुई सदा हूँ मुझे याद कीजिए तुम से कहीं मिला हूँ मुझे याद कीजिए, मंज़िल नहीं हूँ ख़िज़्र नहीं राहज़न नहीं मंज़िल का रास्ता हूँ मुझे याद कीजिए, मेरी निगाह ए शौक़ से हर गुल है देवता मैं इश्क़ का ख़ुदा हूँ मुझे याद कीजिए, नग़्मों की इब्तिदा थी कभी मेरे नाम से अश्कों की इंतिहा हूँ मुझे याद कीजिए, गुमसुम खड़ी हैं दोनों जहाँ की हक़ीक़तें मैं उन से कह रहा हूँ मुझे याद कीजिए, ‘साग़र’ किसी के हुस्न ए तग़ाफ़ुल शिआर की बहकी हुई अदा हूँ मुझे याद कीजिए..!! ~साग़र सिद्दीक़ी - [ग़म के मुजरिम ख़ुशी के मुजरिम हैं...](https://bazmeshayari.com/gam-ke-muzrim-khushi-ke/): ग़म के मुजरिम ख़ुशी के मुजरिम हैं लोग अब ज़िंदगी के मुजरिम हैं, और कोई गुनाह याद नहीं सज्दा ए बेख़ुदी के मुजरिम हैं, इस्तिग़ासा है राह ओ मंज़िल का राहज़न रहबरी के मुजरिम हैं, मयकदे में ये शोर कैसा है बादाकश बंदगी के मुजरिम हैं, दुश्मनी आप की इनायत है हम फ़क़त दोस्ती के मुजरिम हैं, हम फ़क़ीरों की सूरतों पे न जा ख़िदमत ए आदमी के मुजरिम हैं, कुछ ग़ज़ालान ए आगही ‘साग़र’ नग़्मा ओ शायरी के मुजरिम हैं..!! ~साग़र सिद्दीक़ी - [सोहनी धरती के रखवाले ये प्यारे खाक़ी वर्दी वाले...](https://bazmeshayari.com/sohni-dharti-ke-rakhwale-ye-pyare-vardiwale/): सोहनी धरती के रखवाले ये प्यारे खाक़ी वर्दी वाले, हर बाप का फ़ख्र ओ गुरुर है ये हर माँ की आँख का नूर है ये, हर बहन के सर की चादर है मुल्क की सरहद के मुहाफ़िज़ है, इस मुल्क की मिट्टी के मतवाले ये प्यारे खाक़ी वर्दी वाले, अल्लाह रखे आबाद वतन को ताहश्र रखे शाद वतन को, और बन के ये निगेहबान रहे तेगों के साये में पाले, ये प्यारे खाक़ी वर्दी वाले..!! - [हारे हुए नसीब का मयार देख कर...](https://bazmeshayari.com/haare-hue-nasib-ka-mayar-dekh-kar/): हारे हुए नसीब का मयार देख कर वो चल पड़ा है इश्क़ का अख़बार देख कर, आयेंगी काम देखना कागज़ की कश्तियाँ हाथों में एक यकीन का पतवार देख कर, करतास पर सजा दिया अपने ही दुःख का फन उस अहद ए कुर्बनाक का फ़नकार देख कर, पहले की तरह आज भी तन्हा तो हूँ मगर कद बढ़ गया है बाप की दस्तार देख कर, इन्सान की तो खू है ये इन्सान नोचना दुनियाँ में मुफ़्लिसी का अज़ादार देख कर, दश्त ए वफ़ा में रक्स के जलते है कुछ चिराग़ आँखों में उनके अपना ही अक्स बार बार देख कर..!! - [अज़ब ही मेरे मुल्क की कहानी है...](https://bazmeshayari.com/azab-hi-mere-mulq/): अज़ब ही मेरे मुल्क की कहानी है यहाँ सस्ता खून पर महँगा पानी है, खिले है फूल कागज़ पर यहाँ हर सू चमन के गुल खिज़ा की निशानी है, फ़ख्र से चलता दौलतमंद यहाँ पर यहाँ अफ्लास क्यूँ सिफ़त ए नादानी है, है सच मय्यूब हर सू तुम ज़रा देखो वतन में झूठ ओ फ़रेब की हुक्मरानी है, उगलता ज़र है आँगन मेरे ही घर का बरहना फिर यहाँ की क्यों जवानी है..?? - [छोड़ के सब कुछ फक़त तुम इन्सान बनो...](https://bazmeshayari.com/chhod-ke-sab-kuch-faqat/): बना के भेजा था उस रब ने अपना तर्जुमान तुम्हे छोड़ के सब कुछ फक़त तुम इन्सान बनो, ये रुस्वाइयाँ और तल्खियाँ क्यों बिखेर रहे हो ? निखारो ख़ुद को अलग एक पहचान बनो, हवस परस्ती का लिबास क्यूँ पहने हुए हो तुम ? कभी तो निकलो किसी के लिए मेहरबान बनो, ये मर्द ए मोमिन की शान नहीं है कि झूठ बोले बस करो अब तो इस मिट्टी पर कुछ एहसान बनो, ये बद दीयानती और रिश्वत जैसी बुराइयाँ क्यों समा गई तुम में ? उठो इस ख़्वाब ए गफ़लत से और ख़ुदा का फ़रमान बनो, फिर भी जो - [एक मय्यत ज़मीं तले उतरी एक मय्यत नहीं उठाई गई...](https://bazmeshayari.com/ek-mayyat-zami-tale-utri/): उसमें कोई रईस मुज़रिम था जो कहानी नहीं सुनाई गई, एक मय्यत ज़मीं तले उतरी एक मय्यत नहीं उठाई गई, एक रक्कासा का रक्स क्या देखा एक मुल्ला की पारसाई गई, ज़िन्दगी ख़ुद सवाल करती है ज़िन्दगी किस लिए बिताई गई, मौत आएगी और बताएगी ज़िन्दगी किस लिए बनाई गई, शेर आते रहे रवानी से नींद कमबख्त है कि आई गई..!! - [दुआ तो दूर है अबतक सलाम आया नहीं...](https://bazmeshayari.com/dua-to-door-abtak-salam-aya-nahi/): तेरी तरफ से कोई भी पयाम आया नहीं दुआ तो दूर है अबतक सलाम आया नहीं, मुझे तो तुझ पे यकीं था भरे ज़माने में मगर ये दुःख है मेरे तू भी काम आया नहीं, उजड़ गए है तेरे बाद हसरतो के महल कोई भी शमअ जलाने गुलाम आया नहीं, उसे तो सोचा मुक़म्मल हर घड़ी मैंने वो आधा हिस्से में ही आया तमाम आया नहीं, किस के इश्क़ का ऐसा नशा चढ़ा मुझ पर कि अक्ल ओ ज़ेहन में कोई क़लाम आया नहीं, तमाम उम्र सफ़र में गुज़र गई मेरी लेकिन चले थे जिसके लिए कभी वो मुक़ाम आया - [तुम्हारी सोच, तुम्हारे गुमाँ से बाहर हम...](https://bazmeshayari.com/tumhari-soch-tumhare-gumaan-se-bahar/): तुम्हारी सोच, तुम्हारे गुमाँ से बाहर हम खड़े हुए है सफ ए दोस्तां से बाहर हम, हमें ही रास न आया मुहब्बतों का चलन सो कर दिए गए दिल की दुकां से बाहर हम, हमारी अपनी कहानी में हम कहीं भी न थे और अब पड़े है तेरी दास्ताँ से बाहर हम, हमारा इश्क़ हमें उस मुक़ाम पर लाया पहुँच गए है कही दो जहाँ से बाहर हम, हमारा रिश्ता है मिट्टी से इस कदर गहरा कि जा ही सकते नहीं खाक़दां से बाहर हम, हमारी सोच पर पहरे बिठाने वाले सुन तुझे ही कर देंगे हर इम्तिहाँ से बाहर - [पूछो अगर तो करते है इन्कार सब के सब...](https://bazmeshayari.com/pucho-agar-to-karte-hai-inqar-sab-ke-sab/): पूछो अगर तो करते है इन्कार सब के सब सच ये कि है हयात से बेज़ार सब के सब, अपनी ख़बर किसी को नहीं फिर भी जाने क्यूँ ? पढ़ते है रोज़ शहर में अख़बार सब के सब, था एक मैं जो शर्त ए वफ़ा तोड़ता रहा हालांकि बा वफ़ा थे मेरे यार सब के सब, सोचो तो नफरतों का ज़खीरा है एक दिल करते है यूँ तो प्यार का इज़हार सब के सब, ज़िंदान कोई क़रीब नहीं और न रक्स गाह सुनते है एक अज़ीब सी झंकार सब के सब, मैदान ए जंग आने से पहले पलट गए निकले - [कहीं क़बा तो कहीं आस्तीं बिछाते हुए](https://bazmeshayari.com/kahin-kaba-to-kahin/): कहीं क़बा तो कहीं आस्तीं बिछाते हुए मैं मर गया हूँ वफादारियाँ निभाते हुए, अज़ीब रात थी आँखे ही ले गई मेरी मैं बुझ गया था चिराग़ ए सहर जलाते हुए, अज़ीब शख्स है क़ुर्बत के ख़्वाब दे के मुझे बिछड़ गया है अचानक ही मुस्कुराते हुए, सज़ा के तौर पे आँखे निकाल ली उसने मैं रो पड़ा था उसे कोई दास्ताँ सुनाते हुए, अज़ब नहीं था कि दरिया लपेट लेता मुझे मैं भाग आया हूँ तिश्ना लबी बचाते हुए, अज़ब उदासी तबीयत में भर गई है मियाँ तुम्हारे शहर से अपना सफ़र उठाते हुए, ख़ुदा ज़मीं पे होता तो - [हमारे खून में अब तक ये बीमारी नहीं आई...](https://bazmeshayari.com/hamare-khoon-me-abtak-ye-bimari/): वफ़ादारी पे दे दी जान मगर ग़द्दारी नहीं आई हमारे खून में अब तक ये बीमारी नहीं आई, ख़ुदा का शुक्र सोहबत का असर होता नहीं हम पर अदाकारों में रह कर भी अदाकारी नहीं आई, अमीर ए शहर हो कर भी नहीं कोई तेरी इज्ज़त तेरे हिस्से में कभी गैरत और ख़ुद्दारी नहीं आई, हमारी दरस गाहो की निज़ामत ऐसी बिगड़ी है क़िताबे पढ़ के भी बच्चो में होशियारी नहीं आई, लगाई आग उसने शहर में इतनी सफ़ाई से कि उसके घर पे उड़ के एक भी चिंगारी नहीं आई, अभी से किस लिए बेटे को भेजें नौकरी करने - [वो कौन है जो गम का मज़ा जानते नहीं...](https://bazmeshayari.com/wo-kaun-hai-jo-gam-ka-maza-jante-nahi/): वो कौन है जो गम का मज़ा जानते नहीं बस दूसरों के दर्द को ही पहचानते नहीं, इस ज़ब्र ए मसलहत से रुस्वाइयाँ भली जैसे कि हम उन्हें और वो हमें जानते नहीं, कमबख्त आँख उठी न कभी उनके रूबरू हम उनको जानते तो है, पहचानते नहीं, वाइज़ ख़ुलूस है तेरे अंदाज़ ए फ़िकर में हम तेरी गुफ़्तगू का कभी बुरा मानते नहीं, हद से बढ़े तो अलम भी है झेल दोस्तों सब कुछ जो जानते है, वो कुछ जानते नहीं, रहते है आफ़ियत से वही लोग जहाँ में जो ज़िन्दगी में दिल का कहा मानते नहीं..!! - [आवाम भूख से देखो निढाल है कि नहीं ?](https://bazmeshayari.com/awaam-bhookh-se-dekho/): आवाम भूख से देखो निढाल है कि नहीं ? हर एक चेहरे से ज़ाहिर मलाल है कि नहीं ? तमाम चीजों की क़ीमत बढ़ाई जाती रही गरीबो को मारने की ये चाल है कि नहीं ? पहुँच से पहले ही बाहर था ऐश का सामाँ फ़लक के पास अभी आटा, दाल है कि नहीं ? जो गले फाड़ कर महँगाई को कोसता था उसे अपने अहद में इसका ख्याल है कि नहीं ? हमारे ज़िस्म से नोचा है गोश्त, खून चूसा है दोबारा वो देखने आया है खाल है कि नहीं ? वो जिसके अहद में माँ बाप बेच दे - [बस एक ही हल इसका हमारे पास है लोगो...](https://bazmeshayari.com/bas-ek-hi-hal-iska-hamare-paas-hai-logo/): बस एक ही हल इसका हमारे पास है लोगो जो हुक्मराँ बिक जाए वो बकवास है लोगो, किस भूख से गुज़रे है, हमें प्यास बला की पुछा है कभी, उनको ये एहसास है लोगो ? जिसको समझ बैठे थे कश्कोल शिकन है अफ़सोस वही ज़ात का ही दास है लोगो, क़ानून यहाँ पाओगे एक और तरह का है इसके लिए आम, कोई ख़ास है लोगो, तालीम का मौक़ा है उन्हें जिनको नहीं शौक़ मज़दूरी करें वो कि जिन्हें प्यास है लोगो, माथे पे कोई बल न कोई लब पे गिला है हर ज़ोर ओ ज़फ़ा अब तो हमें रास है - [चुनाव से पहले मशरूफ़ होते है सारे ही उम्मीदवार...](https://bazmeshayari.com/chunav-se-pahle-mashroof/): चुनाव से पहले मशरूफ़ होते है सारे ही उम्मीदवार दिन रात मीटिंगे होती है इन सबके प्यादे और लोटो की, फिर वोट पड़ने के बाद चुनाव खत्म होता है जैसे ही तो फिर पहली गिनती शुरू होती है पड़े हुए वोटो की, अगर जनता का फ़ैसला न क़ुबूल हो इनमे किसी को तो फिर दूसरी गिनती शुरू होती है कड़क कड़क नोटों की, बाद इसके भी सरकारी नतीज़ा न माने जब कोई तो तीसरी गिनती यहाँ शुरू होती है लट्ठ और सोटो की, सब लाठी और डंडे ले कर आ जाते है मैदान ए जंग में फिर तो सामत सी - [जानते सब है मुझे, पहचानता कोई नहीं...](https://bazmeshayari.com/jaante-sab-hai-mujhe-pahchanta-koi-nahi/): आशना होते हुए भी आशना कोई नहीं जानते सब है मुझे, पहचानता कोई नहीं, तन्हा मेरे ज़िम्मे क्यूँ है कार ए एहतिजाज़ बोलना सब जानते है, बोलता कोई नहीं, मयकशी की भी सजा है, ख़ुदकुशी की भी सजा कौन किस मुश्किल में है, ये देखता कोई नहीं, मुख्तलिफ़ लफ्ज़ो में ये है अब मिजाज़ ए दोस्ती राब्ता सबसे है, लेकिन वास्ता कोई नहीं, हमने ख़ुद पैदा किये है ज़िन्दगी में मसअले वरना सच्ची बात ये है मसअला कोई नहीं, ख़ुद क़लामी थी जिसे मैं गुफ़्तगू समझा किया मैं अकेला था, यहाँ आया गया कोई नहीं, हुस्न हो ना मेहरबाँ या - [ज़िन्दा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या...](https://bazmeshayari.com/zinda-rahe-to-kya-hai-jo-mar-jaayen-to-kya/): ज़िन्दा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या दुनियाँ से ख़ामोशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या, हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने एक ख़्वाब है जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या, अब कौन मुन्तज़िर है हमारे लिए वहाँ शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या, दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र दरिया ए गम के पार उतर जाएँ हम तो क्या..!! ~मुनीर नियाज़ी - [खटकती जो रहे दिल में वो हसरत हम भी रखते है...](https://bazmeshayari.com/khatakti-jo-rahe-dil-me-wo-hasrat/): वतन की सर ज़मी से इश्क़ ओ उल्फ़त ही नहीं खटकती जो रहे दिल में वो हसरत हम भी रखते है, वतन पर मर मिटने की हिम्मत हम भी रखते है ये ज़ुर्रत, ये शुज़ाअत, ये बसालत हम भी रखते है, दुनियाँ को हिला देने के खोखले दावे बाँधने वालो दुनियाँ को हिला देने की ताक़त बस हम ही रखते है, बला से हो अगर सारे फ़सादी हिमायती तुम्हारे ख़ुदा ए हर दो आलम की हिमायत हम भी रखते है, बहार ए गुलशन अमीद भी सिरात हो जाए करम की आरज़ू ऐ अब्र ए रहमत हम भी रखते है, गिला - [कितने ही पेड़ ख़ौफ़ ए ख़िज़ाँ से उजड़ गए...](https://bazmeshayari.com/kitne-hi-ped-khauf/): कितने ही पेड़ ख़ौफ़ ए ख़िज़ाँ से उजड़ गए कुछ बर्ग ए सब्ज़ वक़्त से पहले ही झड़ गए, कुछ आँधियाँ भी अपनी मुआविन सफ़र में थीं थक कर पड़ाव डाला तो ख़ेमे उखड़ गए, अब के मेरी शिकस्त में उन का भी हाथ है वो तीर जो कमान के पंजे में गड़ गए, सुलझी थीं गुत्थियाँ मेरी दानिस्त में मगर हासिल ये है कि ज़ख़्मों के टाँके उखड़ गए, निरवान क्या बस अब तो अमाँ की तलाश है तहज़ीब फैलने लगी जंगल सुकड़ गए, इस बंद घर में कैसे कहूँ क्या तिलिस्म है खोले थे जितने क़ुफ़्ल वो होंटों - [बढ़ जाएगी शायद मेरी तन्हाई ज़रा और...](https://bazmeshayari.com/badh-jayegi-meri-tanhai-zara-aur/): हो जाएगी जब तुम से शनासाई ज़रा और बढ़ जाएगी शायद मेरी तन्हाई ज़रा और, क्यूँ खुल गए लोगों पे मेरी ज़ात के असरार ऐ काश कि होती मेरी गहराई ज़रा और, फिर हाथ पे ज़ख़्मों के निशाँ गिन न सकोगे ये उलझी हुई डोर जो सुलझाई ज़रा और, तरदीद तो कर सकता था फैलेगी मगर बात इस तौर भी होगी तेरी रुस्वाई ज़रा और, क्यूँ तर्क ए तअ’ल्लुक़ भी किया लौट भी आया ? अच्छा था कि होता जो वो हरजाई ज़रा और, है दीप तेरी याद का रौशन अभी दिल में ये ख़ौफ़ है लेकिन जो हवा आई - [जीवन को दुख दुख को आग और आग को पानी कहते...](https://bazmeshayari.com/jivan-ko-dukh-dukh/): जीवन को दुख दुख को आग और आग को पानी कहते बच्चे लेकिन सोए हुए थे किस से कहानी कहते ? सच कहने का हौसला तुम ने छीन लिया है वर्ना शहर में फैली वीरानी को सब वीरानी कहते, वक़्त गुज़रता जाता और ये ज़ख़्म हरे रहते तो बड़ी हिफ़ाज़त से रखी है तेरी निशानी कहते, वो तो शायद दोनों का दुख एक जैसा था वर्ना हम भी पत्थर मारते तुझ को और दीवानी कहते, तब्दीली सच्चाई है इस को मानते लेकिन कैसे आईने को देख के एक तस्वीर पुरानी कहते, तेरा लहजा अपनाया अब दिल में हसरत सी है - [दुनियाँ के लोग खुशियाँ मनाने में रह गए...](https://bazmeshayari.com/duniyan-ke-log-khushiyan/): दुनियाँ के लोग खुशियाँ मनाने में रह गए हम बदनसीब अश्क बहाने में रह गए, कुछ जाँ निसार ऐसे भी गुज़रे है दहर में मिट कर भी जिनके नाम ज़माने में रह गए, मिस्मार हो गया था मेरा घर फ़साद में ता उम्र हम अपना घर ही बनाने में रह गए, आँसू छलक पड़े तो ख़बर सबको हो गई हम अपने दिल का दाग़ छुपाने में रह गए, ख़ुद सर बुलन्द हो न सके उम्र भर कभी अपने हरीफ़ को जो सिर्फ झुकाने में रह गए, सीखा नहीं ज़माने से छोटा सा एक सबक़ ता उम्र हम दूसरों को ही - [मुहब्बत आज़माती है, मुझे तुम याद आते हो...](https://bazmeshayari.com/muhabbat-aazmati-hai/): मुहब्बत आज़माती है, मुझे तुम याद आते हो जुदाई अब सताती है, मुझे तुम याद आते हो, मुहब्बत के सुनहरे बाग़ में है चैन से कोयल कोई जब गीत गाती है, मुझे तुम याद आते हो, अज़ीयत हो कि राहत हो, कोई कैसी भी मंज़िल हो तुम्हारी याद आती है, मुझे तुम याद आते हो, कोई तश्कीन शुदा चेहरा नहीं भाता,निगाह लेकिन तुम्हे रो कर बुलाती है, मुझे तुम याद आते हो, नहीं जब तुम यहाँ होते, उदासी ज़ुल्म ढहाती है मुझे इतना रुलाती है, मुझे तुम याद आते हो, मुझे लोरी सुनाती है मेरी तन्हाईयाँ शब भर उदासी गुनगुनाती - [अर्ज़ ए गम कभी उसके रूबरू भी हो जाए...](https://bazmeshayari.com/arz-e-gam-kabhi-uske-rubroo/): अर्ज़ ए गम कभी उसके रूबरू भी हो जाए शायरी तो होती है, कभी गुफ़्तगू भी हो जाए, ज़ख्म ए हिज़्र भरने से याद तो नहीं जाती कुछ निशाँ तो रहते है, दिल रफू भी हो जाए, रिंद है भरे बैठे और है मयकदा ख़ाली क्या बने जो ऐसे में एक “हू” भी हो जाए, पहली नामुरादी का दुःख कहीं बिसरता है बाद में अगर कोई सुर्खुरू भी हो जाए, दीन ओ दिल तो खो बैठे अब फ़राज़ क्या गम है कु ए यार में गारत आबरू भी हो जाए..!! ~अहमद फ़राज़ - [हमसे क़ीमत तो ये पूरी ही लिया करती है...](https://bazmeshayari.com/hamse-qimat-to-ye-poori-liya/): हमसे क़ीमत तो ये पूरी ही लिया करती है ज़िन्दगी ख़्वाब अधूरे ही दिया करती है, हर मुहब्बत ने अँधेरो को किया है रौशन रौशनी तेज भी अँधा ही किया करती है, ख़ोज मुश्किल में ही तू मुश्किलों का हल अपनी हाँ मुसीबत भी बहुत से ज़ख्म सिया करती है, मिलो अच्छा है ज़माने से ज़माना बन कर खून के घूँट भी मुरौत ही पिया करती है, क्या बुरा इसमें अगर जीत नहीं पाया तो हार ये जीत से पुरअज्म जिया करती है, क्यूँ ये उम्मीद कि हम चाल चले दुनियाँ से राह ख़ुद्दारी तो अपनी ही लिया करती है..!! - [मुहब्बत कहाँ अब घरों में मिले...](https://bazmeshayari.com/muhabbat-kahan-ab-gharo-me-mile/): मुहब्बत कहाँ अब घरों में मिले यहाँ फूल भी पत्थरो में मिले, जो फिरते रहे दनदनाते हुए वही लोग अब मकबरों में मिले, मुहब्बत, मुरौत, ख़ुलूस ओ वफ़ा कहाँ अब हमें रहबरों में मिले ? पुजारी है सब माल ओ ज़र के यहाँ मुरौत कहाँ अब दिलो में मिले, हमें शक़ था गैरो पे पर क्या हुआ जो अपने थे वही क़ातिलो में मिले, जो मंज़िल हो नज़दीक बेकार है सफ़र का मज़ा फ़ासलो में मिले, वो ख़ामोश थे सर झुकाए हुए जो पत्थर के बुत मंदिरों में मिले, बहुत लिखने वाले है हमसे बेहतर मगर मेरे जैसे कम शायरों - [चंद सिक्को के एवज़ हर ज़ुर्म के सबूत मिटाने वालो...](https://bazmeshayari.com/chand-sikko-ke-evaz/): चंद सिक्को के एवज़ हर ज़ुर्म के सबूत मिटाने वालो इक्तिदार के नशे में धूत, लोगो पे ज़ुल्म ढहाने वालो, हर चढ़ते सूरज के बनावटी नगमात गाने वालो किसी ग़रीब की इज्ज़त ख़राब कर के इतराने वालो, रखना याद, एक दिन तुम्हारा हिसाब होगा….. हर एक शख्सियत में बे वजह ऐब निकालने वालो ज़हरपली नापाक़ ज़ुबान से सीने पे तीर बरसाने वालो, ज़ुल्म के साथी बन के मज़लूमो का दिल दुखाने वालो बेकस की मजबूरियों का नाजायज़ फ़ायदा उठाने वालो, रखना याद, एक दिन तुम्हारा हिसाब होगा….. इंसाफ़ के परचम तले, इंसाफ़ की धज्जियाँ उड़ाने वालो क़लम ओ ज़मीर बेच - [सुनो ! दौर ए बेहिस में जब कमाली हार जाता है...](https://bazmeshayari.com/suno-daur-e-behis/): सुनो ! दौर ए बेहिस में जब कमाली हार जाता है हरामी जीत जाते है हलाली हार जाता है, जहाँ बागों की डाली पर बरसना छोड़ दे बादल वहाँ बाग़ो की रखवाली पे माली हार जाता है, जो कर लेते है सौदे खुदगर्ज़ अपने ज़मीरो के तो लोटे जीत जाते है, खिलाड़ी हार जाता है, यकीन जिसको हो इंसाफ़ ए ख़ुदा पर देखा है मैंने जहाँ में मात खा कर भी वो बाज़ी मार जाता है..!! - [ख़बरें हुकुमत की क़ब्रें आवाम की...](https://bazmeshayari.com/khabren-huqumat-ki-qabren-aawam-ki/): ख़बरें हुकुमत की क़ब्रें आवाम की हमको नहीं है लालच तुम्हारे इनाम की, बोया है तुमने जो भी काटोगे भी तुम ही पूरी ना होगी ख्वाहिश अपने दवाम, लोटे लौट आये है वापस अपने घर को कहानी है ये पुरानी, पुराने हमाम की, मुहब्बत करते हो तो करते रहो तुम ख़बर नहीं है तुमको इसके अंज़ाम की..!! - [एक ज़ालिम उसपे क़हर आँखे दिखा रहा है...](https://bazmeshayari.com/ek-zalim-uspe-qahar-aankhe/): एक तो ज़ालिम उसपे क़हर आँखे दिखा रहा है अंज़ाम ए बेहया शायद अब नज़दीक आ रहा है, गुजिस्तां कुछ वक़्त से पापी आकाइयों का सब जानते हो तुम यारो क़िरदार क्या रहा है, धरती है एक ढाँचा, कर्गस है चार ज़ानिब एक मरकज़ में है नोचे,एक सूबे को खा रहा है, हकीम की बे ज़ियाफ़त चौतीस लाख की और इस शहर का मुअल्लिम टुकड़े चबा रहा है, क्या तजरुबे को तुझको ये सरज़मी मिली थी ? चुल्लू में डूब मर तू, क्यों सीने दिखा रहा है ? चाले है शातिराना, नीयत भी खोट वाली वाहिद हुक्मराँ है जिससे सबको - [गम ए वफ़ा को पस ए पुश्त डालना होगा...](https://bazmeshayari.com/gam-e-wafa-ko-pas-e-pusht/): गम ए वफ़ा को पस ए पुश्त डालना होगा खटक रहा है जो काँटा निकालना होगा, फ़कीर ए इश्क़ हूँ कुछ दे के टालना होगा बस एक निगाह का सिक्का उछालना होगा, सवाल दोस्तों अज़मत का है सरो का नहीं हमें वक़ार का परचम संभालना होगा, गज़ब की प्यास लगी सामना सराब का है सो रेग ए सहरा से पानी निकालना होगा, उसे बताओ कि फाका है आज अपना भी मगर फ़कीर को इज्ज़त से टालना होगा, ये इंतज़ार सलामत रहे वो आएगा मगर है शर्त कि दिल को संभालना होगा, तुम्हारे दिल की ज़मी जल चुकी मगर हमदम इसी - [गुलाब चाँदनी रातों पे वार आये हम...](https://bazmeshayari.com/gulab-chaandni-raton-pe-waar/): गुलाब चाँदनी रातों पे वार आये हम तुम्हारे होंठों का सदका उतार आये हम, वो एक झील थी शफ्फाक़ नील पानी की उसमें डूब के ख़ुद को निखार आये हम, तेरे ही लम्स से उनका खराज़ मुमकिन है तेरे बगैर जो उम्रे गुज़ार आये हम, फिर उस गली से गुज़रना पड़ा तेरी खातिर फिर उस गली से बहुत बे क़रार आये हम, ये क्या सितम है कि इस नशा ए मुहब्बत में तेरे सिवा भी किसी को पुकार आये हम..!! - [हुई न खत्म तेरी रह गुज़ार क्या करते...](https://bazmeshayari.com/hui-na-khatm-teri-rah-guzar/): हुई न खत्म तेरी रह गुज़ार क्या करते तेरे हिसार से ख़ुद को फ़रार क्या करते ? सफ़ीना गर्क़ ही करना पड़ा हमें आख़िर तेरे बगैर समन्दर को पार क्या करते ? बस एक सकूत ही जिसका जवाब होना था वही सवाल मियाँ बार बार क्या करते ? फिर उसके बाद मनाया न जश्न ख़ुशबू का लहू में डूबी थी फ़सल बहार क्या करते ? नज़र की ज़द में नये फूल जिनकी आ जाए गई रुतों का भला वो इन्तजार क्या करते ?? - [एक लफ़्ज़ ए मोहब्बत का अदना ये फ़साना है...](https://bazmeshayari.com/ek-lafz-e-mohabbat-ka-adna-ye/): एक लफ़्ज़ ए मोहब्बत का अदना ये फ़साना है सिमटे तो दिल ए आशिक़ फैले तो ज़माना है, ये किसका तसव्वुर है ये किसका फ़साना है जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है, हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है, वो और वफ़ा दुश्मन मानेंगे न माना है सब दिल की शरारत है आँखों का बहाना है, क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है हम ख़ाक नशीनों की ठोकर में ज़माना है, वो हुस्न ओ जमाल उनका ये इश्क़ ओ शबाब अपना जीने की तमन्ना - [इसी चमन में ही हमारा भी एक ज़माना था...](https://bazmeshayari.com/isi-chaman-me-hi-hamara/): इसी चमन में ही हमारा भी एक ज़माना था यहीं कहीं कोई सादा सा आशियाना था, नसीब अब तो नहीं शाख़ भी नशेमन की लदा हुआ कभी फूलों से आशियाना था, तेरी क़सम अरे ओ जल्द रूठनेवाले गुरूर ए इश्क़ न था नाज़ ए आशिक़ाना था, तुम्हीं गुज़र गये दामन बचाकर वर्ना यहाँ वही शबाब वही दिल वही ज़माना था..!! - [आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है...](https://bazmeshayari.com/aadmi-aadmi-se-milta-hai/): आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है, भूल जाता हूँ मैं सितम उस के वो कुछ इस सादगी से मिलता है, आज क्या बात है के फूलों का रंग तेरी हँसी से मिलता है, मिल के भी जो कभी नहीं मिलता टूट कर दिल उसी से मिलता है, कार ओ बार ए जहाँ सँवरते हैं होश जब बेख़ुदी से मिलता है..!! - [आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था...](https://bazmeshayari.com/aankho-ka-tha-qusoor-naa-dil-ka/): आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था आया जो मेरे सामने मेरा ग़ुरूर था, वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था आता न था नज़र को नज़र का क़ुसूर था, कोई तो दर्दमंदे दिल ए नासुबूर था माना कि तुम न थे, कोई तुमसा ज़रूर था, लगते ही ठेस टूट गया साज़ ए आरज़ू मिलते ही आँख शीशा ए दिल चूर चूर था, ऐसा कहाँ बहार में रंगीनियों का जोश शामिल किसी का ख़ून ए तमन्ना ज़रूर था, साक़ी की चश्म ए मस्त का क्या कीजिए बयान इतना सुरूर था कि मुझे भी सुरूर था, - [अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहीं...](https://bazmeshayari.com/allah-agar-taufiq-na-de/): अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहीं फ़ैज़ान ए मोहब्बत आम सही, इर्फ़ान ए मोहब्बत आम नहीं, ये तूने कहा क्या ऐ नादाँ फ़ैयाज़ी ए क़ुदरत आम नहीं तू फ़िक्र ओ नज़र तो पैदाकर, क्या चीज़ है जो इनआम नहीं, या रब ये मुकाम ए इश्क़ है क्या गो दीदा ओ दिल नाकाम नहीं तस्कीन है और तस्कीन नहीं आराम है और आराम नहीं, आना है जो बज़्म ए जानाँ में पिन्दार ए ख़ुदी को तोड़ के आ ऐ होश ओ ख़िरद के दीवाने ये होश ओ ख़िरद का काम नहीं, इश्क़ और गवारा ख़ुद कर - [बड़ी क़दीम रिवायत है ये सताने की...](https://bazmeshayari.com/badi-qadim-riwayat-hai/): बड़ी क़दीम रिवायत है ये सताने की करो कुछ और ही तदबीर आज़माने की, कभी तो फूट कर रो लो हमारे शाने पर हमेशा सोचते हो क्यों हमें ही रुलाने की, चलो चले कही ऐसी जगह मेरे हमदम जहाँ न शर्त हो रस्म ए कुहन निभाने की, हजार आरज़ू पूरी करो तुम ज़माने की कमी रहेगी मगर फिर भी और पाने की, गम ओ अलम का भरम तोड़ना ज़रूरी है हर आदमी को ज़रूरत है मुस्कुराने की, उठाये रखते है जो पत्थर अपने हाथों में मशाल आप ही बन जाते है ज़माने की, न जाने चाँद मेरे घर में किस - [जिसे तुम प्यार समझे थे वो कारोबार था हमदम...](https://bazmeshayari.com/jise-tum-pyar-samjhe-the/): जिसे तुम प्यार समझे थे वो कारोबार था हमदम यहाँ सब अपने मतलब में मुहब्बत साथ रखते है, जो हर पल हँसते रहते हो, उन्हें तुम ख़ुश समझते हो ? अरे नादाँ ! वो हँसने में महारत ख़ास रखते है, ये जो ख़ामोश फिरते है, जो तन्हाई में रहते है ये अपने आप महफ़िल में, ख़ुदी को पास रखते है, बिकाऊ माल है सब कुछ, वो जज़्बे हो या बन्दे हो यहाँ मालिक और गाहक अपनी क़ीमत साथ रखते है, ये हाथो की लकीरें और शिकन आलूद पेशानी बताते है कि हम सब अपनी क़िस्मत साथ रखते है, मैं बेहद - [जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ...](https://bazmeshayari.com/jo-mila-usse-guzara-n-hua/): जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ जो हमारा था, वो हमारा न हुआ,   हम किसी और से मंसूब हुए क्या ये नुक़सान तुम्हारा न हुआ,   बे तक़ल्लुफ़ भी वो हो सकते थे मगर हमसे कोई इशारा न हुआ,   दोनों ही एक दूसरे पर मरते रहे कोई भी अल्लाह को प्यारा न हुआ..!! - [पास आओ कि एक इल्तज़ा सुन लो...](https://bazmeshayari.com/paas-aao-ki-ek-iltaza-sun-lo/): पास आओ कि एक इल्तज़ा सुन लो हाँ प्यार है तुमसे बेपनाह सुन लो, एक तुम्ही को तो ख़ुदा से माँगा है जब भी रब से माँगी कोई दुआ सुन लो, इब्तिदा ए इश्क़ ही हुई तुमसे और तुम्ही हो चाहत की इन्तेहा सुन लो, बगैर तेरे अब जी नहीं सकते हम हो सके तो लौट आओ, मेरी सदा सुन लो, देख बिन तेरे ये ज़िन्दगी अधूरी है ना रहो तुम अब यूँ खफ़ा और जुदा सुन लो, तुम सिर्फ तुम ही हो बस ज़िन्दगी मेरी सोलह आने है ये सच, तुम बा ख़ुदा सुन लो..!! - [मालूम है इस दुनियाँ में मशहूर नहीं है...](https://bazmeshayari.com/malum-hai-is-duniyan-me/): मालूम है इस दुनियाँ में मशहूर नहीं है ये गाँव तेरे दिल से तो अब दूर नहीं है, ये उसकी मशीयत है हमें मिलने न आये वरना वो किसी तौर भी मज़बूर नहीं है, मशरूफ़ रहा करता है वो शख्स हमेशा वैसे तो मेरा आईना है मगरूर नहीं है, तस्वीर ए मुहब्बत हूँ ज़रा गौर से देखो इस दुनियाँ में मुझ जैसा कोई चूर नहीं है, इस शहर ए ज़फ़ा जू में तुझे छोड़ दूँ कैसे हर बात है मंज़ूर मुझे, पर ये मंज़ूर नहीं है..!! - [माना कि अब तुम्हारा दिल भर गया होगा...](https://bazmeshayari.com/mana-ki-ab-tumahra/): माना कि अब तुम्हारा दिल भर गया होगा हमसे ना सही, प्यार कही और हो गया होगा, ये जो तुम आहिस्ता आहिस्ता से दूर जा रहे हो यक़ीनन कोई और तुम्हे मिल गया होगा, तुमने जो सिखाए है हमें आदाब ए मुहब्बत तो फिर उनको उन्ही पर लागू कर दिया होगा, हमारे साथ जो तुमने कुछ देर सफ़र किया है अब उसमे मजीद इज़ाफा कर लिया होगा, न जाने तुम रातों को सुकून से सोते हो मुझे तो लगता है इरादा कर लिया होगा, आज तक हम तुम्हारी जान थे, है न ? अब ये वायदा किसी और से कर - [हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले...](https://bazmeshayari.com/hazaro-khwahishe-aisi-ki/): हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले, डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले, निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले, भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले, मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले, हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी - [शाम तक सुबह की नज़रों से उतर जाते है...](https://bazmeshayari.com/shaam-tak-subah-kee-nazro-se/): शाम तक सुबह की नज़रों से उतर जाते है इतने समझौतों पे जीते है कि मर जाते है, हम तो बेनाम इरादों के मुसाफ़िर ठहरे कुछ पता हो तो बताये कि किधर जाते है, घर की गिरती हुई दीवार है हमसे अच्छी रास्ता चलते हुए लोग ठहर जाते है, एक जुदाई का वो लम्हा कि जो मरता ही नहीं लोग कहते थे सभी वक़्त गुज़र जाते है, फिर वही तल्खी हालात मुक़द्दर ठहरी नशे कैसे भी हो कुछ दिन में उतर जाते है..!! ~वसीम बरेलवी - [ख़्वाब के जज़ीरो पर एक दीया जलाना था...](https://bazmeshayari.com/khwab-ke-jaziro-par-ek-diya/): ख़्वाब के जज़ीरो पर एक दीया जलाना था और फिर हवाओं को रास्ता बताना था, दर्द की फ़सिलो तक, ये चिराग़ ए जान ले कर हमसफ़र के धोखे में हमको तन्हा जाना था, अपने सर की चादर को थाम कर मुझे तन्हा सर उठा के चलना था, ठोकरे भी खाना था, उसने रोती आँखों को चूम कर क़सम दी थी अब तो मुझको जीवन भर सिर्फ़ मुस्कुराना था, जिसकी सुर्ख ईंटों से नाग लिपटे रहते थे मुझको उस हवेली में आशियाँ बनाना था, क्या ख़बर थी बरसों से जल रहा है जो दिल में उस चिराग़ ने आख़िर मेरा घर - [उदास शामो का तुम कुछ हिसाब रख लेना...](https://bazmeshayari.com/udas-shamo-ka-tum/): उदास शामो का तुम कुछ हिसाब रख लेना, दिल ए हज़ीं में मुहब्बत का बाब रख लेना, न बैठना कभी तन्हा उदास मौसम में, नज़र के सामने तुम दिल की क़िताब रख लेना..!! - [बारिश की बरसती बूँदों ने जब दस्तक दी दरवाज़े पर...](https://bazmeshayari.com/barish-kee-barasti-boondo-ne/): बारिश की बरसती बूँदों ने जब दस्तक दी दरवाज़े पर महसूस हुआ तुम आये हो, अंदाज़ तुम्हारे जैसा था, हवा के हलके झोंके की जब आहट पाई खिड़की पर महसूस हुआ तुम गुज़रे हो, एहसास तुम्हारे जैसा था, मैंने जो गिरती बूँदों को जब रोकना चाहा हाथो में एक सर्द सा फिर एहसास हुआ, वो लम्स तुम्हारे जैसा था, तन्हा मैं चला जब बारिश में तब एक झोंके ने साथ दिया मैं समझा तुम हो साथ मेरे, वो एहसास तुम्हारे जैसा था, फिर रुक सी गई वो बारिश भी बाक़ी न रही एक आहट भी मैं समझा मुझे तुम छोड़ - [अभी तो चाँद निकला है, अभी तो रात बाक़ी है...](https://bazmeshayari.com/abhi-to-chaand-nikla-hai/): अभी तो चाँद निकला है, अभी तो रात बाक़ी है दिल को दिल से कहनी है, अभी वो बात बाक़ी है, तुम्हारे वस्ल में कबसे, ज़मीं प्यासी थी इस दिल की अभी तो अब्र छाए है, अभी बरसात बाक़ी है, वो बचपन की हसीं बाते, जवानी की खुराफ़ातें कहाँ वो अब हसीं लम्हे, कहाँ वो बात बाक़ी है, गुज़र जाएगी ये गम की, जो काली रात छाई है सहर भी होगी ख़ुशियों की, जो तेरा साथ बाक़ी है, मेरे दिल की तमन्नाएँ, जो थीं सारी हुई पूरी अधूरी कोई ख्वाहिश है, न कोई बात बाक़ी है, फ़साना बीती बातों का, - [वो लोग जो कुछ रोज़ जवानी में मिलेंगे...](https://bazmeshayari.com/wo-log-jo-kuch-roz-jawani-me/): वो लोग जो कुछ रोज़ जवानी में मिलेंगे हर शाम वो फिर तेरी कहानी में मिलेंगे, ढूँढो न हमें दुनियाँ की रंगीन फिज़ा में हम जैसे किसी याद पुरानी में मिलेंगे, हालात की तपती हुई दोपहर में बिछड़े ये तय है किसी शाम सुहानी में मिलेंगे, दावा नहीं, उम्मीद नहीं, रखते यक़ीन है हम फिर से इसी कूचा ए फ़ानी में मिलेगें, मिलना है गर हमसे तो पढ़ लीजिये हमको हम जैसे तेरी आँख के पानी में मिलेंगे..!! - [एक वो इतने खूबरू तौबा...](https://bazmeshayari.com/ek-wo-itne-khoobroo-tauba/): एक वो इतने खूबरू तौबा उसपे छूने की आरज़ू तौबा ! हाथ काँपेंगे रूह मचलेगी जब वो आएँगे रूबरू तौबा ! चाँद तारो से रात सजती हुई तेरी आवाज़ और तू तौबा ! लब नहीं उसकी आँखे बोलती है ऐसा अंदाज़ ए गुफ़्तगू तौबा…!! - [यूँ ही तन्हाई में अब दिल को सजा देते है...](https://bazmeshayari.com/yun-hi-tanhaai-me-ab-dil-ko/): यूँ ही तन्हाई में अब दिल को सजा देते है नाम लिखते है तेरा लिख के मिटा देते है, जब भी नाक़ाम ए मुहब्बत का कोई ज़िक्र करे लोग हँसते है मेरा नाम बता देते है, अब ख़ुशी की कोई तरक़ीब न सूझे अब ये आलम है कि गम ही मज़ा देते है, क्या ज़रूरत है कि देते हो ख़ुद को ये ज़हमत लाओ हम ख़ुद ही नशेमन को जला देते है, अब तसल्ली नहीं दी जाती मरीज़ ए गम को अब तो देखने वाले भी मरने की दुआ देते है..!! - [क्या मिला ? और हुआ कितना ख़सारा सोचा...](https://bazmeshayari.com/kya-mila-aur-hua-kitna-khasaara-socha/): क्या मिला ? और हुआ कितना ख़सारा सोचा बाद मुद्दत के यही क़िस्सा दोबारा सोचा, रात फिर देर तलक नींद न आई मुझको रात फिर देर तलक तुझको ही यारा सोचा, मैं तो मर जाऊँगा तुझसे जुदा हो कर कैसे होगा मेरे बिन फिर तेरा गुज़ारा सोचा, अब मेरी सोच भी हैरान है, कैसे मैंने इतनी फ़ुर्सत से तुझे सारा का सारा सोचा, ये भी मुमकिन है कि ज़न्नत में ही मिले शायद जैसा घर मैंने कभी अपना तुम्हारा सोचा, आज आ जा कि तुझे शेर में अपने लिख लूँ तू भी तो देखे कि तुझे कितना प्यारा सोचा, तू - [इश्क़ जब एक मगरूर से हुआ तो फिर...](https://bazmeshayari.com/ishq-jab-ek-magrur/): इश्क़ जब एक मगरूर से हुआ तो फिर छोड़ कर अना ख़ुद को झुकाना पड़ा मुझे, उसने खेला था खिलौना समझ कर दिल को ना चाह कर इश्क़ का रोग लगाना पड़ा मुझे, देख कर बेवफ़ाई में उसकी बुलंदियाँ नवाब ख़ुद को उसकी निगाहों में गिराना पड़ा मुझे, उसकी ख़ुशी की खातिर छुपा कर अश्क़ भी दिल की लगी को दिल्लगी बताना पड़ा मुझे, ख़ुदा ना करे उसे भी मिले वो दर्द ओ अलम जिन दर्द ओ गम को इश्क़ में उठाना पड़ा मुझे, दिल तोड़ कर हर बार इशारा तो किया उसने फिर भी आख़िरी सितम समझ निभाना पड़ा - [लरज़ती छत शिकस्ता बाम ओ दर से बात करनी है...](https://bazmeshayari.com/larzati-chhat-shikasta-baam-o-dar/): लरज़ती छत शिकस्ता बाम ओ दर से बात करनी है मुझे तन्हाई में कुछ अपने घर से बात करनी है, बिखरने के मराहिल में सहारा क्यूँ दिया मुझ को मेरी मिट्टी ने दस्त ए कूज़ा गर से बात करनी है, किया था जान दे के हम ने कार ए आशियाँ बंदी जलाया किस लिए बर्क़ ओ शरर से बात करनी है, मुक़ाबिल हुस्न जब आए सितमज़ादों की महफ़िल में ज़बाँ को क़ैद करना है नज़र से बात करनी है, बदल डाला है दुनिया को जो फ़िरऔनों की बस्ती में ख़ुदा ने आज शायद फिर बशर से बात करनी है..!! - [उदास चाँद खुले पानियों में छोड़ गया...](https://bazmeshayari.com/udas-chaand-khule-paaniyo/): उदास चाँद खुले पानियों में छोड़ गया वो अपना चेहरा मेरे आँसूओ में छोड़ गया, हवा के झोंके से लरजी थी एक शाख़ ए गुल किसी का ध्यान मुझे ख़ुशबूओ में छोड़ गया, गले मिले थे मुहब्बत की तेज धूप में हम ये कौन उड़ते हुए बादलो में छोड़ गया, सफ़र के पहले पड़ाव में मरने वाला शख्स अज़ीब खौफ़ हमारे दिलो में छोड़ गया, ये किसने हमको बनाया शिकस्ता मिट्टी से फिर उसके बाद घनी बारिशो में छोड़ गया, इस एहतिमाम से बिखरे हुए है फूल यहाँ निशानी जैसे कोई रास्तों में छोड़ गया..!! - [तेरे फ़िराक़ के लम्हे शुमार करते हुए...](https://bazmeshayari.com/tere-firaq-ke-lamhe-shumar/): तेरे फ़िराक़ के लम्हे शुमार करते हुए बिखर गए हैं तेरा इंतिज़ार करते हुए, तुम्हें ख़बर ही नहीं है कि कोई टूट गया मोहब्बतों को बहुत पाएदार करते हुए, मैं मुस्कुराता हुआ आइने में उभरूँगा वो रो पड़ेगी अचानक श्रृंगार करते हुए, वो कह रही थी समुंदर नहीं हैं आँखें हैं मैं उन में डूब गया ऐतबार करते हुए, भँवर जो मुझ में पड़े हैं वो मैं ही जानता हूँ तुम्हारे हिज्र के दरिया को पार करते हुए..!! - [सोचता हूँ कि उसे नींद भी आती होगी...](https://bazmeshayari.com/sochta-hoon-use-neend-bhi/): सोचता हूँ कि उसे नींद भी आती होगी या मेरी तरह फ़क़त अश्क बहाती होगी, वो मेरी शक्ल मेरा नाम भुलाने वाली अपनी तस्वीर से क्या आँख मिलाती होगी, इस ज़मीं पर भी है सैलाब मेरे अश्कों से मेरे मातम की सदा अर्श हिलाती होगी, शाम होते ही वो चौखट पे जला कर शमएँ अपनी पलकों पे कई ख़्वाब सुलाती होगी, उसने सिलवा भी लिए होंगे सियह रंग लिबास अब मोहर्रम की तरह ईद भी मनाती होगी, मेरे तारीक ज़मानों से निकलने वाली रौशनी तुझको मेरी याद तो दिलाती होगी, रूप दे कर मुझे इस में किसी शहज़ादे का अपने - [समन्दर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं...](https://bazmeshayari.com/samandar-me-utarta-hoon-to/): समन्दर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तेरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं, तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं, तेरी यादों की ख़ुश्बू खिड़कियों में रक़्स करती है तेरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं, न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं, मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर ज्योहीं क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं, हर एक मुफ़्लिस - [महफ़िल से मुझको उठाने के बाद क्या मिलेगा दिल दुखाने के बाद...](https://bazmeshayari.com/mahfil-se-mujhko-uthane-ke-baad/): महफ़िल से मुझको उठाने के बाद क्या मिलेगा दिल दुखाने के बाद, आज तो देख लूँ मैं तुम्हे गौर से आज देखा है हमने ज़माने के बाद, मैं समंदर की मन्नत ही करता रहा रेत का एक घरौंदा बनाने के बाद, नाचती है हवा अब मेरे सामने घर के सारे दीयो को बुझाने के बाद, यूँ न हो अपने हाथो गँवा दो मुझको मुझ सा तुमको मिलेगा ज़माने के बाद, सिसकियाँ रोकता ही रहा देर तक दर्द की इन्तेहा वो बताने के बाद, रौशनी के तलबगार रोते है क्यूँ घर चिरागों से अपने जलाने के बाद..!! - [अपने हो कर भी जो नहीं मिलते...](https://bazmeshayari.com/apne-ho-kar-bhi-jo-nahi-milte/): अपने हो कर भी जो नहीं मिलते दिल ये जा कर है क्यूँ वही मिलते ? यहाँ मिलती नहीं है जिनकी ताबीरें हाँ मगर वही ख़्वाब है हसीं मिलते, हमको माँगा नहीं गया दिल से कैसे मुमकिन था, हम नहीं मिलते ? यूँ नहीं बेकार हर तलाश गई वो नहीं तो चलो, हम ही मिलते, ये क़यामत तो बस दिलासा है मिलना होता नहीं, यही मिलते, लाज़िमन सब क़ुसूर मेरा है लोग तो सब है, बेहतरीन मिलते, तौबा कितनी सिमट गई दुनियाँ एक घर के नहीं, मकीं मिलते, सारे किस्से में वो रहे मेरे अब है अंज़ाम तो, नहीं मिलते, - [यूँ बात बात पे कर के मुकालमा मुझसे...](https://bazmeshayari.com/yun-baat-baat-pe-kar-ke/): यूँ बात बात पे कर के मुकालमा मुझसे वो खुल रहा है मुसलसल ज़रा ज़रा मुझसे, मैं शाख ए उमर पे बस सूखने ही वाला था लिपट गया कोई आ कर हरा भरा मुझसे, मैं उसके पहले वरक पर रुका हुआ हूँ अभी सो खत्म होगा कहाँ अब मुताअला मुझसे, पसंद आ गई कैसे उसे ये खाक़ मेरी वो आसमान भला कैसे आ लगा मुझसे, वो गुल बदन है तो मैं गुलबदन ही लिखूँगा कि सच तो ये है न होगा मुबालग़ा मुझसे, ये शायरी तो कोई और कर रहा है कही मैं लिख रहा हूँ वही जो कहा गया - [तेरे लिए सब छोड़ के भी तेरा न रहा मैं...](https://bazmeshayari.com/tere-liye-sab-chhod-ke-bhi-tera-na/): तेरे लिए सब छोड़ के भी तेरा न रहा मैं दुनियाँ भी गई इश्क़ में, तुझसे भी गया मैं, एक सोच में गुम हूँ, तेरी दीवार से लग कर मंज़िल पे पहुँच कर भी, ठिकाने न लगा मैं, इस दर्ज़ा मुझे खोखला कर रखा था गम ने लगता था गया अब के, गया अब के गया मैं, एक धोखे में दुनियाँ ने मेरी राय तलब की कहते थे कि पत्थर हूँ, मगर बोल पड़ा मैं..!! - [इस मुहब्बत के करम से पहले...](https://bazmeshayari.com/is-muhabbat-ke-karam-se-pahle/): इस मुहब्बत के करम से पहले ख़ुद को जीता था मैं तुमसे पहले, हसरत ओ यास ओ अलम से पहले दिल ये मगरूर था गम से पहले, चोट लाज़िम है शिफ़ा याब़ी को कौन समझा है सितम से पहले, तुमको जाना तो हमने जाना तुम भी पत्थर हो सनम से पहले, जाने वालों को भला रोके क्या ? दिल ये उठते है क़दम से पहले, हम भी मशहूर हुए बाद तेरे तुम भी गुमनाम थे हम से पहले, मेरी बातों में है तासीर के मैं दिल पे लिखता हूँ क़लम से पहले..!! - [तुझे क्या बताऊँ ऐ दिलरुबा तेरे सामने मेरा हाल है...](https://bazmeshayari.com/tumhe-kya-bataaoon-ae-dilruba/): तुझे क्या बताऊँ ऐ दिलरुबा तेरे सामने मेरा हाल है मुझे जुस्तुजू है फ़क़त तेरी मुझे सिर्फ़ तेरा ख़याल है, है नज़र में मेरी तो तू ही तू मेरा साँस तेरा ही गीत है मैं भुला सकूँ तुझे दिलरुबा भला कब ये मेरी मजाल है मेरे जिस्म में तू है हर जगह मेरे होश में तू मुक़ीम है मैं मुतीअ हूँ तेरा ही दिलरुबा मेरे ग़म की रात हिलाल है, मैं तो ज़िंदा तेरे ही दम से हूँ मेरी आरज़ू की तू ज़िंदगी तेरी बेवफ़ाई की एक नज़र मेरी ज़िंदगी का सवाल है, तेरी क़ुर्बतों की तलब मुझे तेरी दीद - [ज़हे क़िस्मत अगर तुम को हमारा दिल पसंद आया...](https://bazmeshayari.com/jah-e-qismat-agar-tumko/): ज़हे क़िस्मत अगर तुम को हमारा दिल पसंद आया मगर ये दाग़ क्यूँ कर ऐ मह-ए-कामिल पसंद आया, किया है क़त्ल लेकिन देखिए जाँ कब निकलती है कि उन को रक़्स-ए-बेताबाना-ए-बिस्मिल पसंद आया, वो मोमिन भी है माँगेगा दुआ सिद्क़-तनासुख़ की तेरे हाथों से मरना जिस को ऐ क़ातिल पसंद आया, न पूछो कब से मैं शामिल हुआ हूँ तीरा-बख़्तों में किसी के आरिज़-ए-रौशन का जब से तिल पसंद आया, ये गुस्ताख़ी है ऐ महरूम अपनी हद से बढ़ता है कि ता-हद्द-ए-ज़मीन-ए-ग़ालिब-ए-मुश्किल-पसंद आया..!! - [ख़ुद को न ऐ बशर कभी क़िस्मत पे छोड़ तू...](https://bazmeshayari.com/khud-ko-n-ae-bashar-kabhi/): ख़ुद को न ऐ बशर कभी क़िस्मत पे छोड़ तू दरिया की तेज धार को हिम्मत से मोड़ तू, इस ज़िंदगी की राह में दुश्वारियाँ भी हैं रहबर का हाथ छोड़ न रिश्तों को तोड़ तू, दुनिया की हर बुलंदी को है तेरा इंतिज़ार एहसास-ए-ना-रसाई की गर्दन मरोड़ तू, मेहनत के दम पे क्या नहीं कर सकता आदमी अपने लहू का आख़िरी क़तरा निचोड़ तू, जो कुछ है तेरे पास वही काम आएगा बारिश की आस में कभी मटकी न फोड़ तू, मन की ख़ुशी मिलेगी तू ये नेक काम कर टूटे हुए दिलों को किसी तरह जोड़ तू, दो-गज़ - [सुना कर हाल क़िस्मत आज़मा कर लौट आए हैं...](https://bazmeshayari.com/suna-kar-haal-qismat-aazma-kar/): सुना कर हाल क़िस्मत आज़मा कर लौट आए हैं उन्हें कुछ और बेगाना बना कर लौट आए हैं, फिर एक टूटा हुआ रिश्ता फिर एक उजड़ी हुई दुनियाँ फिर एक दिलचस्प अफ़्साना सुना कर लौट आए हैं, फ़रेब-ए-आरज़ू अब तो न दे ऐ मर्ग-ए-मायूसी हम उम्मीदों की एक दुनिया लुटा कर लौट आए हैं, ख़ुदा शाहिद है अब तो उन सा भी कोई नहीं मिलता ब-ज़ोम-ए-ख़्वेश उन को आज़मा कर लौट आए हैं, बिछे जाते हैं या रब क्यूँ किसी काफ़िर के क़दमों में वो सज्दे जो दर-ए-का’बा पे जा कर लौट आए हैं..!! - [हाथ उठे जो दुआ को, तो दिल ऐसे रखा...](https://bazmeshayari.com/haath-uthe-jo-dua-ko-to-dil-aise-rakha/): हाथ उठे जो दुआ को, तो दिल ऐसे रखा ख्वाहिशे बाद में रखी तुझे पहले रखा, वक़्त ने आजिज़ी इस दर्जा सिखाई थी हमें अपनी औकात को औकात से नीचे रखा, ज़िन्दगी ख़्वाब के दरबार से बाहर निकली हमने हर तल्ख़ हकीक़त को जब आगे रखा, आख़िरी वक़्त उतारी गई थी बंद घड़ी उसने ता उम्र मेरी याद को पहने रखा, खत के एक कोने में कुछ दिल थे, मगर हाय दिल उसने हर एक में था तीर पिरो के रखा, ये अगर इश्क़ है जो तुझको मेरी रूह से है क्या था वो रिश्ता जो उस शख्स ने मुझसे - [दर्द हो, दुःख हो तो दवा कीजिए...](https://bazmeshayari.com/dard-ho-dukh-ho-to-dawa-kijiye/): दर्द हो, दुःख हो तो दवा कीजिए फट पड़े आसमां तो क्या कीजिए ? नहीं इलाज़ ए गम हिज़्र ए यार क्या कीजिए ? तड़प रहा है दिल ए बेक़रार क्या कीजिए ? एक सितम हो तो जान दे दीजिए हो सितम पर सितम तो क्या कीजिए ? हाल सुन कर मेरा वो यूँ बोले और दिल दीजिए, और वफ़ा कीजिए, इश्क़ को दीजिए जुनूँ में फ़रोग दर्द से ही दर्द की बस दवा कीजिए, रास आए न गर कशाकिश ए ज़ीस्त दिल ए महजूं को फिर मुब्तिला कीजिए..!! - [जब लहज़े बदल जाएँ तो वज़ाहते कैसी...](https://bazmeshayari.com/jab-lahze-badal-jaayen-to/): जब लहज़े बदल जाएँ तो वज़ाहते कैसी नयी मयस्सर हो जाएँ तो पुरानी चाहतें कैसी ? वस्ल में गुज़रे लम्हे है अनमोल यादें हिज़्र में सुख, खुशियाँ, रहतें कैसी ? लोग बदल जाते है दिल भर जाने पे भी ला हासिल तलाश, चेहरों में शबाहतें कैसी ? हर फ़र्द ही बना है ख़ुद साख्ता पारसा यहाँ दुनियाँ दिखावे के लिए हों तो इबादतें कैसी ? - [जब भी तुम चाहो मुझे ज़ख्म नया देते रहो...](https://bazmeshayari.com/jab-bhi-tum-chaho-mujhe-zakhm/): जब भी तुम चाहो मुझे ज़ख्म नया देते रहो बाद में फिर मुझे सहने की दुआ देते रहो, ठीक से सोच समझ कर मुझे रुखसत करना ये न हो बाद में रो रो के सदा देते रहो, ठीक है मान लिया है कि खता थी मेरी जैसे तुम चाहो, मैं हाज़िर हूँ, सज़ा देते रहो, छोड़ जाओगे तो रो धो के संभल जाऊँगा पास रह कर मुझे गम हद से ज्यादा देते रहो, रूठ कर वो जो तुम्हे ख़ुद ही मना लेता है तुम उसी को दुआ सबसे जुदा देते रहो..!! - [इश्क़ में जान से गुज़रते है गुज़रने वाले...](https://bazmeshayari.com/ishq-me-jaan-se-guzrte-hai/): इश्क़ में जान से गुज़रते है गुज़रने वाले मौत की राह नहीं देखते मरने वाले, आखिरी वक़्त भी पूरा न किया वायदा ए वस्ल आप आते ही रहे मर गए मरने वाले, उठे और कूचा ए महबूब में पहुँचे आशिक़ ये मुसाफ़िर नहीं रस्ते में ठहरने वाले, जान देने का कहा मैंने तो हँस कर बोले तुम सलामत रहो हर रोज़ के मरने वाले, आसमां पे जो सितारे नज़र आते है याद आये मुझे दाग अपने उभरने वाले..!! - [ग़ज़ल का हुस्न है और गीत का शबाब है वो...](https://bazmeshayari.com/gazal-ka-husn-hai-aur-geet-ka/): ग़ज़ल का हुस्न है और गीत का शबाब है वो नशा है जिसमे सुखन का वही शराब है वो, उसे न देख महकता हुआ गुलाब है वो न जाने कितनी निगाहों का इंतिखाब है वो, मिसाल मिल न सकी क़ायनात में उसकी जवाब उसका नहीं कोई ला जवाब है वो, मेरी इन आँखों को ताबीर मिल नहीं पाती जिसे मैं देखता रहता हूँ ऐसा ख़्वाब है वो, न जाने कितने हिज़ाबों में वो छुपा है मगर निगाह ए दिल से जो देखो तो बे हिज़ाब है वो, उजाले अपने लुटा कर वो डूब जाएगा हसीन सुबह का रख़्शंदा आफ़ताब है - [अब भी कहता हूँ कि तुम्हे घबराना नहीं है...](https://bazmeshayari.com/ab-bhi-kahta-hoo-ki-tumhe/): अब भी कहता हूँ कि तुम्हे घबराना नहीं है घबरा कर कोई गलत क़दम उठाना नहीं है, हुनूज़ ज़िन्दा हूँ अभी मैं मरा नहीं हूँ दुश्मन के आगे सर अपना झुकाना नहीं है, क्या हुआ ? रुख हवाओं का ख़िलाफ़ है तेरे ? मगर ना उम्मीदी की तरफ तुमको जाना नहीं है, ऐ मेरे कौम तुम सब से अज़ीम कौम हो खौफ़ ए ख़ुदा के सिवा तुमको खौफ़ खाना नहीं है..!! - [सोचता हूँ लहू तुम्हारा मैं गरमाऊँ किस तरह... ?](https://bazmeshayari.com/sochta-hoon-lahoo-tumhara-main/): सोचता हूँ लहू तुम्हारा मैं गरमाऊँ किस तरह ? ऐ मेरी कौम तुम्हे आख़िर मैं जगाऊँ किस तरह ? क्या दलील पेश करूँ ? कौन गलत कौन सही ? बस यही फ़िक्र है यकीं तुमको दिलाऊँ किस तरह ? है मुमकिन मेरे नज़रिए से हो तुमको इख्तिलाफ़ मगर तुम्हे रहजनो के हवाले कर जाऊँ किस तरह ? हम एक आज़ाद कौम है किसी के गुलाम नहीं अब तुम्हे आज़ादी का मतलब मैं समझाऊँ किस तरह ? चारो तरफ रहजन बैठे है घात लगाए हुए ऐ मेरी कौम अब तुम्हे मैं बचाऊँ तो बचाऊँ किस तरह ? वो जिसके लौ की - [रात पिघली है तेरे सुरमई आँचल की तरह...](https://bazmeshayari.com/raat-pighli-hai-tere-surmai-aanchal-ki-tarah/): रात पिघली है तेरे सुरमई आँचल की तरह चाँद निकला है तुझे ढूँढने पागल की तरह, ख़ुश्क पत्तों की तरह लोग उड़े जाते है शहर भी अब नज़र आता है जंगल की तरह, फिर ख्यालों में तेरे क़ुर्ब की ख़ुशबू जागी फिर बरसने लगी आँखे मेरी बादल की तरह, बे वफ़ाओ से वफ़ा कर के गुज़ारी है हयात मैं बरसता रहा वीरानों में भी बादल की तरह..!! - [तुमको वहशत तो सीखा दी है गुज़ारे लायक...](https://bazmeshayari.com/tumko-wahshat-to-sikha-dee-hai/): तुमको वहशत तो सीखा दी है गुज़ारे लायक और कोई हुक्म ? कोई काम हमारे लायक ? माज़रत ! मैं तो किसी और के मसरफ़ में हूँ ढूँढ देता हूँ मगर कोई और तुम्हारे लायक, एक दो ज़ख्मो की गहराई, और आँखों के खँडहर और कुछ ख़ास नहीं मुझ में, नज़ारे लायक, घोसला, छावं, हरा रंग, समर कुछ भी नही देख ! मुझ जैसे शज़र होते है बस आरे लायक, दो वजूहात पे इस दिल की आसामी न मिली एक ! दरख्वास्त गुज़ार इतने, दो ! सारे लायक, इस इलाक़े में उजालों की जगह कोई नहीं सिर्फ़ परचम है यहाँ - [एक अनकही, ख़ामोश मुहब्बत पे बात कर...](https://bazmeshayari.com/ek-ankahi-khamosh-muhabbat-pe-baat-kar/): एक अनकही, ख़ामोश मुहब्बत पे बात कर जो कर सके तो बाप की चाहत पे बात कर, रखता है जिस ख़ुलूस से बच्चो के सर पे हाथ उस बेपनाह प्यार पे, शफ़क़त पे बात कर, माँ की फ़ज़ीलत से तो वाकिफ़ है सब यहाँ दिल है कि आज बाप की अजमत पे बात कर, औलाद को जो पालता है आन बान से उस बा वक़ार शख्स की उल्फत पे बात कर, करता नहीं है कोई यहाँ जिसका तज़किरा तू रब की उस अज़ीम इनायत पे बात कर, बेटी की रुखसती पे जो होता है अश्क बार उस आब दीदा बाप - [मुझे तन्हाई अपनी अब तुम्हारे नाम करना है...](https://bazmeshayari.com/mujhe-tanhai-apni-ab/): मुझे तन्हाई अपनी अब तुम्हारे नाम करना है बहुत मैं थक चुका हूँ अब मुझे आराम करना है, अभी तो रात बाक़ी है सुना है दिन भी आएगा अब हमको अपनी ज़िन्दगी को शाम करना है, तुम्हारा नाम ले कर अब ज़माना हमसे मिलता है मक़सद इस ख़राबे का तुम्हे बदनाम करना है, क़िताब ए ज़ीस्त मैं अपनी तुम्हारे नाम लिखूँगा जो दिल में राज़ ए पनाह है उन्हें अब आम करना है, भला कैसे ये कोई रहबरों से अपने पूछेगा है मंज़िल कौन सी अपनी, कहाँ क़याम करना है, अज़ीब सी एक उलझन है मुझको तेरी बस्ती में सलाम - [शादी से पहले हीरो नंबर वन शादी के बाद....](https://bazmeshayari.com/shadi-se-pahle-hero/): शादी से पहले हीरो नंबर वन शादी के बाद कुली नंबर वन शादी से पहले मैंने प्यार किया शादी के बाद ये मैंने क्या किया ? शादी से पहले जान मत जाओ शादी के बाद जान मत खाओ, शादी से पहले तुम बिन रहा न जाए शादी के बाद अब और सहा न जाए, शादी से पहले कुछ तो बोलो शादी के बाद कभी चुप भी हो लो, शादी के पहले आई लव यू शादी के बाद आज फिर आलू ? शादी से पहले जान मिलने कब आओगी ? शादी के बाद मायके कब जाओगी ???   - [सियासत ने बदला में'यार मुल्क में हुक्मरानी का...](https://bazmeshayari.com/siyasat-ne-badla-meyar-mulq-me/): सियासत ने बदला में’यार मुल्क में हुक्मरानी का देश चलने लगा है पा कर इशारे अमीर घरानों से, इन्सान पहचाने जाने लगे अब रंगों और हैवानो से यकज़हती की क़ीमत पूछो आज़ादी के दीवानों से, हरामखोरो ने जकड़ रखा है निज़ाम ए ज़म्हुरियत और तुम उम्मीद ए इंसाफ़ रखते हो ऐसे शैतानो से ? न नारों, न जुलूसो से और न प्रदर्शन या धरनों से न चीख ओ पुकार, न गाली गलौज के बयानों से, ऐ अहल ए वतन रखना तुम याद बस इतना कि मिलेगी आज़ादी तुमको फक़त आईन के एवानो से..!! ~नवाब ए हिन्द - [है बहुत अँधेरा अब सूरज निकलना चाहिए...](https://bazmeshayari.com/hai-bahut-andhera-ab-suraj-nikalna/): है बहुत अँधेरा अब सूरज निकलना चाहिए जैसे भी हो अब ये मौसम बदलना चाहिए, रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए, अभी कुछ ही लोगो ने ही बेचा है अपना ज़मीर ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए, फूल बन कर जो भी जिया वो यहाँ मसला गया जीस्त को अब फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए, छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए, दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहिए..!! - [संग ए मरमर से तराशा हुआ ये शोख़ बदन....](https://bazmeshayari.com/sang-e-marmar-se-tarasha-hua-ye-shokh/): संग ए मरमर से तराशा हुआ ये शोख़ बदन इतना दिलकश है कि अपनाने को जी चाहता है, सुर्ख होठों से छलकती है वो रंगीन शराब जिसको पी पी कर बहक जाने को जी चाहता है, नरम सीने में धड़कते है वो नाज़ुक तूफान जिनकी लहरों में उतर जाने को जी चाहता है, तुमसे क्या रिश्ता है कब से है मालूम नहीं लेकिन इस हुस्न पे मर जाने को जी चाहता है, बेख़बर वो सोये है लूट के नींद मेरी जज़्ब ए दिल पे तरस खाने को जी चाहता है, कब से ख़ामोश हो ऐ जान ए जहाँ कुछ तो - [वो नवाज़िशे वो इनायते वो बिला वजह की शिकायतें...](https://bazmeshayari.com/wo-nawazishe-wo-inayate/): वो नवाज़िशे वो इनायते वो बिला वजह की शिकायतें कभी रूठना कभी मनाना वो बिखरी सिमटी ख्वाहिशे, वो झुकाव सा वो खिंचाव सा वो आना बीच तनाव सा, तेरे साथ गुजरें जो साअतें समाअतो के ख़ाली सहन में, कर रही है सर गोशियाँ मुहब्बतें भी कमाल होती है..!! - [उसे मैं क्यूँ बताऊँ...???](https://bazmeshayari.com/use-main-kyun-bataaoon/): उसे मैं क्यूँ बताऊँ ??? मैंने उसको कितना चाहा है, बताया झूठ हो जाता है, सच्ची बात की ख़ुशबू तो ख़ुद महसूस होती है, मेरी बाते मेरी सोचे उसे ख़ुद जान जाने दो, अभी कुछ दिन और मुझे मेरी मुहब्बत को आज़माने दो..!!   - [अगर चाहते हो तुम सदा मुस्कुराना...](https://bazmeshayari.com/agar-chahte-ho-tum-sada-muskurana/): अगर चाहते हो तुम सदा मुस्कुराना कभी अपनी माँ का दिल न दुखाना,   करो अपनी माँ की हमेशा गुलामी फिर नौकर बनेगा तुम्हारा ज़माना,   गुस्सा न करना कभी अपनी माँ से हमेशा मुहब्बत से तुम उनको बुलाना,   ख़ुशी से अपनी माँ की हर एक बात मानो यक़ीनन ज़न्नत में बनेगा तुम्हारा ठिकाना,   चलेगी आसमानों पर तारीफ़ तुम्हारी कभी अपना गुस्सा न माँ को दिखाना..!! - [वो ख़ुद आँसू बहाएगा ज़रा तुम मर तो जाने दो...](https://bazmeshayari.com/wo-khud-aansoo-bahayega-zara-tum/): वो ख़ुद आँसू बहाएगा ज़रा तुम मर तो जाने दो मुझे वापस बुलाएगा ज़रा तुम मर तो जाने दो, मैं तेरा था मैं तेरा हूँ, तेरा ताउम्र रहना है बड़ी कसमे वो खाएगा ज़रा तुम मर तो जाने दो, वो जिन बातो पे हँसता है मुझे दीवाना कह कर वो सब बाते बताएगा ज़रा तुम मर तो जाने दो, अगर मैं ज़िन्दा रहता तो मुझे वो ख़ुश बहुत रखता ये सबसे कहता जाएगा ज़रा तुम मर तो जाने दो, जिसे फ़ुर्सत नहीं फ़ुर्सत में मुझको याद करने की न मुझको भूल पाएगा ज़रा तुम मर तो जाने दो, जो अब - [फिर झूम उठा सावन फिर काली घटा छाई...](https://bazmeshayari.com/fir-jhoom-utha-sawan/): फिर झूम उठा सावन फिर काली घटा छाई फिर दर्द ने करवट ली फिर याद तेरी आई, होंठो पे हवाओ के फिर गीत उभर आये सब तीर तेरे गम के इस दिल में उतर आये फिर ज़ख्म सुलग उठे फिर जान पे बन आई, फिर बाग़ वफ़ाओ के फूलो से महक उठे फिर तेरी जुदाई के सब दाग दाहक उठे फिर मेरे शबिस्ताँ में रोटी रही तन्हाई, एक पल में यूँ ही जान से हम जाने लगे जानाँ सब दर्द पुराने भी याद आने लगे जानाँ बर्बाद उमंगो की फिर चढ़ के घटा आई..!! - [चेहरे का ये निखार मुक़म्मल तो कीजिए...](https://bazmeshayari.com/chehre-ka-ye-nikhar/): चेहरे का ये निखार मुक़म्मल तो कीजिए ये रूप ये सिंगार मुक़म्मल तो कीजिए, रहने ही दे हुज़ूर नशेमन की बात अब दो दिन की ये बहार मुक़म्मल तो कीजिए, ख़्वाबो की ईंट ईंट जोड़ी थी आपने सपनो की वो दीवार मुक़म्मल तो कीजिए, काटी तभी जाग जाग के हमने फ़िराक में रातों का वो शुमार मुक़म्मल तो कीजिए, अब और कितना खून बहेगा ज़मीन पर लाशों का क़ारोबार मुक़म्मल तो कीजिए, किस्से सुने थे आपके इंसाफ़ के हुज़ूर कैसे हुआ फ़रार ? मुक़म्मल तो कीजिए..!!   - [किसी तरंग किसी सर ख़ुशी में रहता था...](https://bazmeshayari.com/kisi-tarang-kisi-sar-khushi-me-rahta-tha/): किसी तरंग किसी सर ख़ुशी में रहता था ये कल की बात है दिल ज़िन्दगी में रहता था, कि जैसे चाँद के चेहरे पे आफ़ताब की लौ खुला कि मैं भी किसी रौशनी में रहता था, सरशत ए आदम खाक़ी ज़रा नहीं बदली फ़लक पे पहुँचा मगर गार ही में रहता था, कहा ये किसी ने कि रहता था मैं ज़माने में हुज़ूम ए दर्द गम अ बेकसी में रहता था, कलाम करता था क़ौस ए क़ुज़ह के रंगों में वो एक ख्याल था और शायरी में रहता था, गुलो पे डोलता फिरता था ओस की सूरत सदा की लहर - [ज़िन्दगी पाँव न धर ज़ानिब ए अंज़ाम अभी...](https://bazmeshayari.com/zindagi-paanv-na-dhar-zanib-e-anzam/): ज़िन्दगी पाँव न धर ज़ानिब ए अंज़ाम अभी मेरे ज़िम्मे है अधूरे से कई काम अभी, अभी ताज़ा है बहुत घाव बिछड़ जाने का घेर लेती है तेरी याद सर ए शाम अभी, एक नज़र और इधर देख मसीहा मेरे तेरे बीमार को आया नहीं आराम अभी, रात आई है तो क्या, तुम तो नहीं आये हो मेरी क़िस्मत में कहाँ लिखा है आराम अभी, जान देने में करूँ देर, ये मुमकिन है कहाँ मुझ तक आया है मेरी जान तेरा पैगाम अभी, तायर ए दिल के ज़रा पर तो निकल लेने दो इस परिंदे को भी आना है तय - [कभी ख़ामोश रहोगी कभी कुछ बोलोगी...](https://bazmeshayari.com/kabhi-khamosh-rahogi-kabhi/): कभी ख़ामोश रहोगी कभी कुछ बोलोगी हमें भुलाना भी चाहो तो भूला ना पाओगी, कोई पूछेगा बे वजह मुस्कुराने का सबब गर बताना चाहोगी भी तो बता न पाओगी, भरी महफ़िल में रहोगी सहेलियों के साथ पर ख़ुद को हमें ही तलाश करती पाओगी, फ़ासले चाहे कितने भी हो हमारे दरमियाँ हम तुम्हे याद आएँगे, तुम हमें याद आओगी..!! - [मुझे इतना प्यार न दो बाबा....](https://bazmeshayari.com/mujhe-itna-pyar-na-do-baba/): बेटी का दर्द… मुझे इतना प्यार न दो बाबा कल जितना मुझे नसीब न हो, ये जो माथा चूमा करते हो कल इस पर शिकन अज़ीब न हो, मैं जब भी रोती हूँ बाबा तुम आँसू पोछा करते हो, मुझे इतना दूर ना छोड़ आना मैं रोऊँ और तुम क़रीब न हो, मेरे नाज़ उठाते हो बाबा मेरे लाड उठाते हो बाबा, मेरी छोटी छोटी ख्वाहिश पर तुम जान लुटाते हो बाबा, कल ऐसा न हो एक नगरी में मैं तन्हा तुमको याद करूँ, और रो रो कर फ़रियाद करूँ ऐ अल्लाह मेरे बाबा सा, कोई प्यार जताने वाला हो - [चिड़ियाँ होती है बेटियाँ....](https://bazmeshayari.com/chidiyan-hoti-hai-betiyan/): चिड़ियाँ होती है बेटियाँ मगर पंख नहीं होते बेटियों के, मायके भी होते है,ससराल भी होते है मगर घर नहीं होते बेटियों के, मायका कहता बेटियाँ पराई है ससराल कहता है पराये घर से आई है, ऐ ख़ुदा अब तू ही बता…… आख़िर ये बेटियाँ किस घर के लिए बनाई …!! - [फ़लक पे चाँद के हाले भी सोग करते हैं...](https://bazmeshayari.com/falaq-pe-chaand-ke-haale-bhi-sog-karte-hai/): फ़लक पे चाँद के हाले भी सोग करते हैं जो तू नहीं तो उजाले भी सोग करते हैं, तुम्हारे हाथ की चूड़ी भी बैन करती है हमारे होंट के ताले भी सोग करते हैं, नगर नगर में वो बिखरे हैं ज़ुल्म के मंज़र हमारी रूह के छाले भी सोग करते हैं, उसे कहो कि सितम में वो कुछ कमी कर दे कि ज़ुल्म तोड़ने वाले भी सोग करते हैं, तुम अपने दुख पे अकेले नहीं हो अफ़्सुर्दा तुम्हारे चाहने वाले भी सोग करते हैं..!! ~वसी शाह - [खून अपना हो या पराया हो....](https://bazmeshayari.com/khoon-apna-ho-ki/): खून अपना हो या पराया हो नस्ल ए आदम का खून है आखिर,   जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में अमन ए आलम का खून है आख़िर,   बम घरो पर गिरे कि सरहद पर रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,   खेत अपने जले या गैरो के ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!! - [हालात थे ख़राब या मैं ख़राब था...](https://bazmeshayari.com/halaat-the-kharab-yaa-main/): हालात थे ख़राब या मैं ख़राब था मेरे सवाल में शामिल जवाब था, ख़ुशी मेरी क़िस्मत ने छिनी मगर दर्द मेरा अपना इंतेखाब था, अमल की दुनियाँ में आगे नहीं तो क्या हुआ ? नसीहतों के मामले में हर शख्स नवाब था, दिखावे की दुनियाँ में उजालो की चाल देखो इन आँखों को लग रहा हर चेहरा माहताब था, दूसरों के सामने ख़ुद को सजावटो में छुपाने वाला अपनी ही ज़ात में बे नक़ाब था, छुड़वाया जो मुझसे आज की तालीम ने अब्बास ज़िन्दगी की क़िताब में वो इश्क़ का ब़ाब था..!! ~अब्बास तन्हा - [कभी लोग बदले कभी ठिकाना बदला...](https://bazmeshayari.com/kabhi-log-badle-kabhi/): कभी लोग बदले कभी ठिकाना बदला कभी सनम कभी सनम खाना बदला, साक़ी न मिल सका फिर भी उसे रिंद ने आख़िर में मैख़ाना बदला, पहले तो समझा कि तुम समझ में आओगे मगर उसके बाद फिर समझ में आना बदला, पहले तुझे तन्हाई में देखा करते थे फिर हम ने वही वीराना बदला, बदलते सब कुछ मिलते तुम फिर भी खता हुई हमसे जो यार का पैमाना बदला..!! ~अब्बास तन्हा - [ऐ दिल ये तेरी ज़िद्द मुझे नादानी लगती है...](https://bazmeshayari.com/ae-dil-ye-teri-zidd/): ऐ दिल ये तेरी ज़िद्द मुझे नादानी लगती है उसे पाने की उम्मीद अब बेमानी लगती है, क्यों खोया तू उसके ख़्वाबो ख्यालो में ? मुझे तो वो किसी और की दीवानी लगती है, माना देखा था कभी उसने यूँ तुझे प्यार से वो नादां सी लड़की अब सायानी लगती है, किसी को दिल में बसा लेना बड़ी बात नहीं पर यादो को भुलाने में सारी जवानी लगती है, कभी मैं भी पागल था किसी के प्यार में अब वो गुज़रे वक़्त की एक नादानी लगती है..!! - [बदन पे जिसके शराफ़त का पैरहन देखा...](https://bazmeshayari.com/badan-pe-jiske-sharafat-ka/): बदन पे जिसके शराफ़त का पैरहन देखा वो आदमी भी यहाँ हमने बदचलन देखा, ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत ए दुनियाँ किसी फ़कीर की मुट्ठी में वो रतन देखा, मुझे दिखा है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा, बड़ा न छोटा कोई फ़र्क बस नज़र का है सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा, ज़बाँ है और , बयाँ और, उसका मतलब और अज़ीब आज की दुनियाँ का व्याकरन देखा, लुटेरे डाकू भी अब अपने पे नाज़ करने लगे उन्होंने आज जो संतो का आचरन देखा, जो सादगी है कुहन में - [सितम सितम न रहा जब सनम सनम न रहा...](https://bazmeshayari.com/sitam-sitam-na-raha/): सितम सितम न रहा जब सनम सनम न रहा कुछ ऐसे दर्द ने घेरा कि गम भी गम न रहा, न तोड़ दें ये मेरा ज़र्फ़ ज़माने वाले कि था कभी जो एक चट्टान सा वो अज्म न रहा, तू आ के झाँक और बता क्या मेरी आँखों में ? ये लोग कह रहे है हिज़्र का अलम न रहा, कई बरस उधार के जिए तेरे पीछे ये बात और है जबीं पे पेंच ओ ख़म न रहा, वही था वजह ए सुखन, साज़ ए सुखन, दाद ए सुखन मिटा के मेरा लिखा वो कहीं रक़म न रहा..!! - [जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया...](https://bazmeshayari.com/jaate-jaate-wo-mujhe-achchi/): जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया उम्र भर दोहराऊँगा ऐसी कहानी दे गया, उससे मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी गम भी शायद वो बरा ए मेहरबानी दे गया, सब हवाएँ ले गया मेरे समन्दर की कोई और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया, खैर मैं प्यासा रहा पर उसने इतना तो किया मेरी पलकों की क़तारों को वो पानी दे गया..!! ~जावेद अख्तर - [सोयें कहाँ थे आँखों ने तकिए भिगोये थे...](https://bazmeshayari.com/soye-kahan-the-aankho-ne/): सोयें कहाँ थे आँखों ने तकिए भिगोये थे हम भी कभी किसी के लिए ख़ूब रोये थे, अँगनाई में खड़े हुए बेरी के पेड़ से वो लोग चलते वक़्त गले मिल के रोये थे, हर साल ज़र्द फूलों का एक काफ़िला रुका उसने जहाँ पे धूल अटे पाँव धोये थे, इस हादसे से मेरा ताअल्लुक़ नहीं कोई मेले में एक साथ कई बच्चे खोये थे, आँखों की कश्तियों में सफ़र कर रहे है वो जिन दोस्तों ने दिल के सफ़ीने डुबोये थे, कल रात मैं था मेरे अलावा कोई न था शैतान मर गया था फ़रिश्ते भी सोये थे..!! ~बशीर - [विसाल ऐसे भी महँगा पड़ेगा दोनों को...](https://bazmeshayari.com/vishal-aise-bhi-mahnga-padega/): विसाल ऐसे भी महँगा पड़ेगा दोनों को बिछड़ने के लिए मिलना पड़ेगा दोनों को, फिर ऐसे तर्क ए तअ’ल्लुक़ का फ़ाएदा क्या है ? जब एक कमरे में रहना पड़ेगा दोनों को, अब इस कहानी को एक मोड़ की ज़रूरत है अब इस कहानी में मरना पड़ेगा दोनों को, ये जान कर भी तअ’ल्लुक़ बढ़ाना ठीक नहीं कि अगले साल बिछड़ना पड़ेगा दोनों को, क़दम क़दम पे ज़माना मिलेगा राहों में क़दम क़दम पे सँभलना पड़ेगा दोनों को..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [उसने यूँ रास्ता दिया मुझको...](https://bazmeshayari.com/usne-yun-rasta-diya-mujhko/): उसने यूँ रास्ता दिया मुझको रास्ते से ही हटा दिया मुझको, दूर करने के वास्ते ख़ुद से ख़ुद का ही वास्ता दिया मुझको, मौत ही कुछ सुकून दे शायद ज़िंदगी ने तो थका दिया मुझको, जब मेरे बाल ओ पर शिकस्ता हुए तब क़फ़स से उड़ा दिया मुझको, जिस हवा ने मुझे जलाए रखा फिर उसी ने बुझा दिया मुझको..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [उम्र भर सीने में एक दर्द दबाए रखा...](https://bazmeshayari.com/umr-bhar-sine-me-ek-dard/): उम्र भर सीने में एक दर्द दबाए रखा एक बेनाम से रिश्ते को निभाए रखा, था मुझे वहम ओ गुमाँ कि वो फ़क़त मेरी है और उसने भी ये भरम मेरा बनाए रखा, आँधियाँ शर्म से हो जाएँ न पानी पानी सर यही सोच के पेड़ों ने झुकाए रखा, वैसे हर बात से रखा उसे वाक़िफ़ हमने लेकिन अफ़्साना ए उल्फ़त को छुपाए रखा, एक रिश्ता जिसे मैं दे न सका कोई नाम एक रिश्ता जिसे ताउम्र निभाए रखा, कूज़ा गर तुझ को बनाना ही नहीं था जब कुछ किस लिए चाक पे ता उम्र चढ़ाए रखा..?? ~अक्स समस्तीपुरी - [कुछ एक रोज़ में मैं चाहतें बदलता हूँ...](https://bazmeshayari.com/kuch-ek-roz-me-main-chahte/): कुछ एक रोज़ में मैं चाहतें बदलता हूँ अगर न सीट मिले तो बसें बदलता हूँ, हर एक रोज़ वो पहचान कैसे लेती है ? हर एक रोज़ तो मैं आहटें बदलता हूँ, हमेशा तुमको शिकायत रही जमाऊँ न हक़ तो सुन लो आज मैं अपनी हदें बदलता हूँ, कराहती हैं ये बिस्तर की सिलवटें मेरी तमाम रात मैं यूँ करवटें बदलता हूँ, ख़ुदा का शुक्र है आदत नहीं बने हो तुम कुछ एक रोज़ में मैं आदतें बदलता हूँ..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [जुदाई में तेरी आँखों को झील करते हुए...](https://bazmeshayari.com/judai-me-teri-aankho-ko/): जुदाई में तेरी आँखों को झील करते हुए सुबूत ज़ाएअ’ किया है दलील करते हुए, मैं अपने आप से ख़ुश भी नहीं हूँ जाने क्यों ? सो ख़ुश हूँ अपने ही रस्ते तवील करते हुए, न जाने याद उसे आया क्या अचानक ही गले लगा लिया मुझको ज़लील करते हुए, कहीं तेरी ही तरह हो गया न हो ये दिल सो डर रहा हूँ अब उसको वकील करते हुए, थकन सफ़र की तो महसूस ही नहीं होती चलूँ तुम्हें जो सर ए राह फ़ील करते हुए..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [झूठ का बोलना आसान नहीं होता है...](https://bazmeshayari.com/jhooth-bolna-aasaan-nahi/): झूठ का बोलना आसान नहीं होता है ये दिल तेरे बाद परेशान नहीं होता है, सब तेरे बा’द यही पूछते रहते हैं मुझे अब किसी बात पे हैरान नहीं होता है, कैसे तुम भूल गए हो मुझे आसानी से इश्क़ में कुछ भी तो आसान नहीं होता है, हिज्र का ज़ायका लीजिए ज़रा धीरे धीरे सब की थाली में ये पकवान नहीं होता है, कोई किरदार मज़ा देता नहीं है उसका जिस कहानी का तू उन्वान नहीं होता है, होने को क्या नहीं होता है जहाँ में लेकिन तुमसे मिलने का ही इम्कान नहीं होता है..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [क़िताब ए ज़ीस्त में ज़हमत के बाब इतने है...](https://bazmeshayari.com/kitab-e-zist-me-zahmat/): क़िताब ए ज़ीस्त में ज़हमत के बाब इतने है ज़रा सी उम्र मिली है अज़ाब इतने है, ज़फ़ा, फ़रेब, तड़प, दर्द ओ गम, कसक,आँसू हमारे सामने भी इंतिखाब इतने है, समन्दरों को भी पल में बहा के ले जाए हमारी आँख में आँसू ज़नाब इतने है, नक़ाबपोशो की बस्ती में शख्सियात कहाँ ? हर एक शख्स ने पहने नक़ाब इतने है, हमारे शेर को दिल की नज़र की हाज़त है हर एक लफ्ज़ में हुस्न ओ शबाब इतने है, हमें तलाश है ताबीर की मगर हमदम छिपा लिया है सभी कुछ ये ख़्वाब इतने है, कभी ज़ुबान खुली तो बताएँगे - [हरगिज़ किसी भी तौर किसी के न हो सके...](https://bazmeshayari.com/hargiz-kisi-bhi-taur-kisi/): हरगिज़ किसी भी तौर किसी के न हो सके हम उसके बाद और किसी के न हो सके, आया था ऐसा दौर सभी के हुए थे हम फिर आया ऐसा दौर किसी के न हो सके, अफ़सोस तुमको इतनी भी फ़ुर्सत नहीं मिली तुम मुझ पे करते ग़ौर किसी के न हो सके, या’नी हम उम्र भर रहे बर्बाद ख़ुद में ही या’नी ठिकाना ठोर किसी के न हो सके, जो लोग सब का ख़ास बने फिर रहे थे ‘अक्स’ वो लोग ख़ास तौर किसी के न हो सके..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [एक रात लगती है एक सहर बनाने में...](https://bazmeshayari.com/ek-raat-lagti-hai-ek/): एक रात लगती है एक सहर बनाने में हमने क्यों नहीं सोचा हमसफ़र बनाने में ? मंज़िलें बदलते हो पर तुम्हें नहीं मालूम उम्रें बीत जाती हैं रहगुज़र बनाने में, उम्र भर रहा हम पर उसका ही असर हावी बेअसर रहे जिस पर हम असर बनाने में, मौज में बनाता हूँ जिस्म जिस परिंदे का रूह काँप उठती है उसके पर बनाने में, तेरी याद की गाड़ी कुछ मदद करें शायद इस तवील रस्ते को अब मुख़्तसर बनाने में..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [दिन रात उसके हिज्र का दीमक लगे लगे...](https://bazmeshayari.com/din-raat-uske-hizr-ka/): दिन रात उसके हिज्र का दीमक लगे लगे दिल के तमाम ख़ाने मुझे खोखले लगे, महफ़िल में नाम उस का पुकारा गया था और सब लोग थे कि मेरी तरफ़ देखने लगे, अफ़सोस फ़िक्र ए जाँ ही नहीं रहती है हमें अफ़सोस आप जान हमें मानने लगे, जो कहते थे कोई तुझे ठुकरा न पाएगा जब बात ख़ुद पे आई तो वो सोचने लगे, मैं आज तक न ठीक से ख़ुद को समझ सका एक ही दफ़ा में आप मुझे जानने लगे..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [छोड़ कर ऐसे गया है छोड़ने वाला मुझे...](https://bazmeshayari.com/chhod-kar-aise-gaya-hai/): छोड़ कर ऐसे गया है छोड़ने वाला मुझे दोस्तो उसने कहीं का भी नहीं छोड़ा मुझे, बोलबाला इस क़दर ख़ामोशियों का है यहाँ काटने को दौड़ता है मेरा ही कमरा मुझे, हाँ वही तस्वीर जो खींची थी मैंने साथ में हाँ वही तस्वीर कर जाती है अब तन्हा मुझे, बात तो ये बा’द की है कुछ बनूँगा या नहीं कूज़ागर तू चाक पे तो रक़्स करवाता मुझे, बस इसी उम्मीद पे होता गया बर्बाद मैं गर कभी बिखरा तो आ कर तू सँभालेगा मुझे, आठवीं शब भी महज़ कुछ घंटों की मेहमान है गर मनाना होता तो अब तक मना - [अब दरमियाँ कोई भी शिकायत नहीं बची...](https://bazmeshayari.com/ab-darmiyan-koi-bhi/): अब दरमियाँ कोई भी शिकायत नहीं बची या’नी क़रीब आने की सूरत नहीं बची, अब और कोई सदमा नहीं झेल सकता मैं अब और मेरी आँखों में हैरत नहीं बची, ख़ामोशियों ने अपना असर कर दिया शुरू अब रिश्ते को सदा की ज़रूरत नहीं बची, हर सिम्त सिर्फ़ बात मोहब्बत की है रवाँ या’नी जहाँ में आज मोहब्बत नहीं बची, फ़ुर्सत के वक़्त इश्क़ से महरूम मैं रहा फिर ऐसा वक़्त आया कि फ़ुर्सत नहीं बची..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [अगर जो प्यार ख़ता है तो कोई बात नहीं...](https://bazmeshayari.com/agar-jo-pyar-khata-hai/): अगर जो प्यार ख़ता है तो कोई बात नहीं क़ज़ा ही इसकी सज़ा है तो कोई बात नहीं, तू सिर्फ़ मेरी है इस का ग़ुरूर है मुझको अगर ये वहम मेरा है तो कोई बात नहीं, मुआ’फ़ करने की आदत नहीं है वैसे तो अगर ये तीर तेरा है तो कोई बात नहीं, बिना बदन के तअ’ल्लुक़ बचा नहीं सकते यही जो रस्ता बचा है तो कोई बात नहीं, हाँ मेरे बा’द किसी और का न हो जाना तू आज मुझ से जुदा है तो कोई बात नहीं..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [पथरा गई आँखे तेरा इंतज़ार करते करते...](https://bazmeshayari.com/pathara-gai-aankhe-tera/): पथरा गई आँखे तेरा इंतज़ार करते करते टूट गए हम एक तरफ़ा प्यार करते करते, क़यामत है इज़हार करने की अदा उसकी कर देता है इन्कार वो इज़हार करते करते, इतना भी आसाँ नहीं ज़िस्म के पार जाना लोग डूबे ही है ये ज़िस्म पार करते करते, न जाने कब बिछड़ गए तुझसे ऐ ज़िन्दगी ख़्वाब पूरे होने का ऐतबार करते करते, ज़माना ये कि ग़र लिख दूँ कागज़ पे सच हर्फ़ बौखला जाते है तकरार करते करते..!! - [टूट कर बिखरे हुए इन्सान कहाँ जाएँगे ?](https://bazmeshayari.com/tut-kar-bikhre-hue/): टूट कर बिखरे हुए इन्सान कहाँ जाएँगे ? दूर तक सन्नाटा है नादान कहाँ जाएँगे ? रिश्ते जो खाक़ हुए नफ़रत की आग में अपनों में रहने के अरमान कहाँ जाएँगे ? छप्परो में सोते है आराम करने दीजिए तेज़ तपती धूप में मेहमान कहाँ जाएँगे ? हो सके तो पहले कड़वाहट निकालिए सोच लेंगे कल के फ़रमान कहाँ जाएँगे, मिट जाएँ मुल्क पर अलग बात है मगर छोड़ कर प्यारा हिंदुस्तान कहाँ जाएँगे ? कलयुगी शहंशाह करने लगा है फ़ैसला ये राम कहाँ जाएँगे, रहमान कहाँ जाएँगे ? माना दीवारों से सारी किलेबन्दी हो गई अब मेरे शहर के - [किसे ख़बर थी हवा राह साफ़ करते हुए...](https://bazmeshayari.com/kise-khabar-thi-hawa/): किसे ख़बर थी हवा राह साफ़ करते हुए मेरा तवाफ़ करेगी तवाफ़ करते हुए, मैं ऐसा हँस रहा था एतराफ़ करते हुए कि वो रो पड़ा मुझको माफ़ करते हुए, इससे बढ़ के मुहब्बत का सिला क्या होगा ? वो मेरा हो गया सबको ख़िलाफ़ करते हुए, बस एक प्यार ने सालिम रखा हमको यारों रकीब मर गए हम में शिगाफ़ करते हुए, उसे मनाने में हमने गँवा दिया उसको कि शीशा टूट गया धूल साफ़ करते हुए, हमारी नींद के पीछे छुपी है ताबानी चिराग़ सो गए ये इंकिशाफ़ करते हुए…!! - [रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना...](https://bazmeshayari.com/ret-bhari-hai-in-aankho-me/): रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना कोई सूखा पेड़ मिले तो उस से लिपट के रो लेना, उसके बा’द बहुत तन्हा हो जैसे जंगल का रस्ता जो भी तुम से प्यार से बोले साथ उसी के हो लेना, कुछ तो रेत की प्यास बुझाओ जनम जनम की प्यासी है साहिल पर चलने से पहले अपने पाँव भिगो लेना, मैं ने दरिया से सीखी है पानी की ये पर्दादारी ऊपर ऊपर हँसते रहना गहराई में रो लेना, रोते क्यूँ हो दिल वालों की क़िस्मत ऐसी होती है सारी रात यूँही जागोगे दिन निकले तो सो लेना..!! - [फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे...](https://bazmeshayari.com/fool-barse-kahin-shabnam/): फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे और इस दिल की तरफ़ बरसे तो पत्थर बरसे, कोई बादल हो तो थम जाए मगर अश्क मेरे एक रफ़्तार से दिन रात बराबर बरसे, बर्फ़ के फूलों से रौशन हुई तारीक ज़मीं रात की शाख़ से जैसे मह ओ अख़्तर बरसे, प्यार का गीत अँधेरों पे उजालों की फुवार और नफ़रत की सदा शीशे पे पत्थर बरसे, बारिशें छत पे खुली जगहों पे होती हैं मगर ग़म वो सावन है जो उन कमरों के अंदर बरसे..!! ~बशीर बद्र - [नज़र से गुफ़्तुगू ख़ामोश लब तुम्हारी तरह...](https://bazmeshayari.com/nazar-se-guftagoo-lab/): नज़र से गुफ़्तुगू ख़ामोश लब तुम्हारी तरह ग़ज़ल ने सीखे हैं अंदाज़ सब तुम्हारी तरह, जो प्यास तेज़ हो तो रेत भी है चादर ए आब दिखाई दूर से देते हैं सब तुम्हारी तरह, बुला रहा है ज़माना मगर तरसता हूँ कोई पुकारे मुझे बेसबब तुम्हारी तरह, हवा की तरह मैं बेताब हूँ कि शाख़ ए गुलाब लहकती है मेरी आहट पे अब तुम्हारी तरह, मिसाल ए वक़्त में तस्वीर ए सुब्ह ओ शाम हूँ अब मेरे वजूद पे छाई है शब तुम्हारी तरह, सुनाते हैं मुझे ख़्वाबों की दास्ताँ अक्सर कहानियों के पुर असरार लब तुम्हारी तरह..!! ~बशीर बद्र - [न जी भर के देखा न कुछ बात की...](https://bazmeshayari.com/naa-ji-bhar-ke-dekha/): न जी भर के देखा न कुछ बात की बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की, उजालों की परियाँ नहाने लगीं नदी गुनगुनाई ख़यालात की, मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई ज़बाँ सब समझते हैं जज़्बात की, मुक़द्दर मेरी चश्म ए पुर आब का बरसती हुई रात बरसात की, कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की..!! ~बशीर बद्र - [मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे...](https://bazmeshayari.com/musafir-ke-raste-badalte-rahe/): मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे मुक़द्दर में चलना था चलते रहे, कोई फूल सा हाथ काँधे पे था मेरे पाँव शोलों पे चलते रहे, मेरे रास्ते में उज़ाला रहा दीये उस की आँखों के जलते रहे, वो क्या था जिसे हमने ठुकरा दिया मगर उम्र भर हाथ मलते रहे, मुहब्बत, अदावत, वफ़ा, बेरुखी सब किराये के घर थे बदलते रहे, सूना है उन्हें भी हवा लग गई हवाओं के जो रुख़ बदलते रहे, लिपट के चरागों से वो सो गए जो फूलों पे करवट बदलते रहे..!! ~बशीर बद्र - [एक भटके हुए लश्कर के सिवा कुछ भी नहीं...](https://bazmeshayari.com/ek-bhatke-hue-lashkar/): एक भटके हुए लश्कर के सिवा कुछ भी नहीं ज़िन्दगानी मेरी ठोकर के सिवा कुछ भी नहीं, आप दामन को सितारों से सजाए रखिये मेरी क़िस्मत में तो पत्थर के सिवा कुछ भी नहीं, तेरा दामन तो छुड़ा ले गए दुनियाँ वाले अब मेरे हाथ में सागर के सिवा कुछ भी नहीं, मेरी टूटी हुई कश्ती का ख़ुदा हाफिज़ है दूर तक गहरे समन्दर के सिवा कुछ भी नहीं..!! - [प्यास जो उम्र भर न बुझी पुरानी होगी...](https://bazmeshayari.com/pyas-jo-umr-bhar-na-bujhi/): प्यास जो उम्र भर न बुझी पुरानी होगी कभी तो आख़िर वो प्यास बुझानी होगी, उम्र गुज़ार दी इंतज़ार में ही बस उसने राधा जैसी ही कोई वो भी दीवानी होगी, आख़िर क्या बात थी कि तुम बेवफ़ा हो गए वो बात तुम्हे आख़िर कभी तो बतानी होगी, रस्म ए उल्फ़त निभाने का वादा किया था ज़फ़ा ही सही रस्म कोई तो निभानी होगी, महफ़िल से कोई प्यासा ही न चला जाए कोई कम माँगे या ज्यादा पिलानी होगी, कोई नहीं आने वाला तुम्हारे जनाज़े में लाश तुम्हे अपनी ख़ुद ही उठानी होगी..!! - [गुल तेरा रंग चुरा लाए है गुलज़ारो में...](https://bazmeshayari.com/gul-tera-rang-chura-laye-hai/): गुल तेरा रंग चुरा लाए है गुलज़ारो में जल रहा हूँ भरी बरसात की बौछारों में, मुझसे कतरा के निकल जा मगर ऐ जान ए हया दिल की लौ देख रहा हूँ तेरी रुखसारो में, हुस्न ए बेगाना ए एहसास ज़माल अच्छा है गुन्चे खिलते है तो बिक जाते है बाज़ारों में, ज़िक्र करते है तेरा मुझसे बाउन्वान ए ज़फ़ा चारागर फूल पिरो लाए है तलवारों में, ज़ख्म छुप सकते है लेकिन मुझे फन ही सौगंध गम की दौलत भी है शामिल मेरे शहकारो में, मुझको नफ़रत से नहीं प्यार से मसलूब करो मैं तो शामिल हूँ मुहब्बत के गुनाहगारो - [आओ बाँट ले सब दर्द ओ अलम...](https://bazmeshayari.com/aao-baant-le-sab-dard-o-alam/): आओ बाँट ले सब दर्द ओ अलम कुछ तुम रख लो, कुछ हम रख ले अब पोंछ ले हम अपने आँसू कुछ तुम रख लो, कुछ हम रख ले, हम साथ रहे और हम साथ चले हम साथ जिएँ और साथ मरे इस राह ए वफ़ा पे अपने क़दम कुछ तुम रख लो, कुछ हम रख ले, माना कि दुखो से तुम हो भरे और हम भी ख़ाली हाथ नहीं ये ज़ुल्म ओ सितम तुम्हे मेरी क़सम कुछ तुम रख लो, कुछ हम रख ले, बे दर्द ज़माने वाले जो कुछ कहते है तो इनको कहने दो बेलौस तमन्नाओ का - [वो मेरे हाल पे रोया भी मुस्कुराया भी...](https://bazmeshayari.com/wo-mere-haal-pe-roya-bhi/): वो मेरे हाल पे रोया भी मुस्कुराया भी अजीब शख़्स है अपना भी है पराया भी, ये इंतिज़ार सहर का था या तुम्हारा था दीयाजलाया भी मैंने दीया बुझाया भी, मैं चाहता हूँ ठहर जाए चश्म ए दरिया में लरज़ता अक्स तुम्हारा भी मेरा साया भी, बहुत महीन था पर्दा लरज़ती आँखों का मुझे दिखाया भी तू ने मुझे छुपाया भी, बयाज़ भर भी गई और फिर भी सादा है तुम्हारे नाम को लिखा भी और मिटाया भी..!! ~आनिस मुईन - [ये क़र्ज़ तो मेरा है चुकाएगा कोई और...](https://bazmeshayari.com/ye-qarz-to-mera-hai/): ये क़र्ज़ तो मेरा है चुकाएगा कोई और दुख मुझ को है और नीर बहाएगा कोई और, क्या फिर यूँ ही दी जाएगी उजरत पे गवाही क्या तेरी सज़ा अब के भी पाएगा कोई और ? अंजाम को पहुँचूँगा मैं अंजाम से पहले ख़ुद मेरी कहानी भी सुनाएगा कोई और, तब होगी ख़बर कितनी है रफ़्तार ए तग़य्युर जब शाम ढले लौट के आएगा कोई और, उम्मीद ए सहर भी तो विरासत में है शामिल शायद कि दिया अब के जलाएगा कोई और, कब बार ए तबस्सुम मेरे होंठो से उठेगा ये बोझ भी लगता है उठाएगा कोई और, इस - [मेरे लोग ख़ेमा ए सब्र में मेरा शहर गर्द ए मलाल में...](https://bazmeshayari.com/mere-log-khema-e-sabr-me/): मेरे लोग ख़ेमा ए सब्र में मेरा शहर गर्द ए मलाल में अभी कितना वक़्त है ऐ ख़ुदा इन उदासियो के ज़वाल में ? कभी मौज़ ए ख़्वाब में खो गया कभी थक के रेत पे सो गया यूँ ही उम्र गुज़ार दी फक़त आरज़ू ए विसाल में, कहीं गर्दिशों के भँवर में हूँ किसी चाक पर मैं चढ़ा हुआ कहीं मेरी खाक़ जमी हुई किसी दश्त ए बर्फ़ मिसाल में, ये हवा ए गम ये फ़ज़ा ए नम मुझे खौफ़ है कि न डाल दे कोई पर्दा मेरी निगाह पर कोई रख्ना तेरे ज़माल पर..!! - [दोस्त क्या ख़ूब वफ़ा का सिला देते है...](https://bazmeshayari.com/dost-kya-khoob-wafa-ka-sila/): दोस्त क्या ख़ूब वफ़ा का सिला देते है हर नये मोड़ पर एक ज़ख्म नया देते है, तुमसे तो खैर घड़ी भर की मुलाक़ात रही लोग बरसो की रफ़ाक़त को भूला देते है, कैसे मुमकिन है कि धुँआ भी न हो और दिल भी जले चोट पड़ती है तो पत्थर भी सदा देते है, कौन होता है मुसीबत में किसका ऐ सनम आग लगती है तो पत्ते भी हवा देते है, जिन पर होता है बहुत दिल का भरोसा जाने क्यूँ वक़्त पड़ने पर वही लोग दगा देते है..!! - [निहत्थे आदमी के हाथ में हिम्मत ही काफी है...](https://bazmeshayari.com/nihatthe-aadmi-ke-hath-me/): निहत्थे आदमी के हाथ में हिम्मत ही काफी है हवा का रुख बदलने के लिए चाहत ही काफी है, ज़रूरत ही नहीं अहसास को अल्फाज़ की कोई समंदर की तरह अहसास में शिद्दत ही काफी है, मुबारक़ हो तुम्हे जीने के अंदाज़ शहरों में हमें तो गाँवों में मरने की बस राहत ही काफी है, बड़े हथियार लिए जंग में शामिल हुए लोगो बुराई से निपटने के लिए क़ुदरत ही काफी है, किसी दिलदार की दीवार क़िस्मत में नहीं तो क्या ? ये छप्पर, झोपड़े, खपरैल की यह छत ही काफी है..!! - [हो मुबारक़ तुम्हे तुम्हारी उड़ान पिंजरे में...](https://bazmeshayari.com/ho-mubaraq-tumhe-tumhari/): हो मुबारक़ तुम्हे तुम्हारी उड़ान पिंजरे में अता हुए है तुम्हे दो जहाँ पिंजरे में, है सैरगाह भी और उसमे आब ओ दाना भी रखा गया है कितना ध्यान पिंजरे में, यहीं हलाक़ हुआ था परिंदा ख्वाहिश का तभी तो है ये लहू के निशान पिंजरे में, फ़लक पे जब भी परिंदों की सफ़ नज़र आये कर लेना तुम अपनी यादे जवान पिंजरे में, इसी लिए तुम्हे रटाए गए सबक़ तरह तरह के कि तुम भूल जाओ खुला आसमान पिंजरे में..!! - [फ़साना अब कोई अंजाम पाना चाहता है...](https://bazmeshayari.com/fasana-ab-koi-anzam/): फ़साना अब कोई अंजाम पाना चाहता है तअल्लुक़ टूटने को एक बहाना चाहता है, जहाँ एक शख़्स भी मिलता नहीं है चाहने से वहाँ ये दिल हथेली पर ज़माना चाहता है, मुझे समझा रही है आँख की तहरीर उस की वो आधे रास्ते से लौट जाना चाहता है, ये लाज़िम है कि आँखें दान कर दे इश्क़ को वो जो अपने ख़्वाब की ताबीर पाना चाहता है, बहुत उकता गया है बेसुकूनी से वो अपनी समंदर झील के नज़दीक आना चाहता है, वो मुझ को आज़माता ही रहा है ज़िंदगी भर मगर ये दिल अब उस को आज़माना चाहता है, - [बारिश के क़तरे के दुख से ना वाक़िफ़ हो...](https://bazmeshayari.com/barish-ke-qatre-ke-dukh/): बारिश के क़तरे के दुख से ना वाक़िफ़ हो तुम हँसते चेहरे के दुख से ना वाक़िफ़ हो, तुम ने सिर्फ़ बिछड़ जाने का कर्ब सहा है पा कर खो देने के दुख से ना वाक़िफ़ हो, एक ही छत के नीचे रहते हैं हम लेकिन तुम मेरे लहजे के दुख से ना वाक़िफ़ हो, साथ किसी के रह कर जो तन्हा कटता है तुम ऐसे लम्हे के दुख से ना वाक़िफ़ हो, हाथों की चूड़ी की ज़बान समझ लेते हो फैले हुए गजरे के दुख से ना वाक़िफ़ हो, जो मंज़िल तक जा के और कहीं मुड़ जाए तुम - [सज़दे के सिवा सर को झुकाना नहीं आता...](https://bazmeshayari.com/sazde-ke-siwa-sar-ko/): रूठे हुए लोगो को मनाना नहीं आता सज़दे के सिवा सर को झुकाना नहीं आता, पत्थर तो चलाना मुझे आता है दोस्तों ! शाखों से परिंदों को उड़ाना नहीं आता, नफ़रत तो जताने में नहीं चूकते हो तुम मगर हैरत है तुम्हे प्यार जताना नहीं आता, मैं इस लिए नाक़ाम मुहब्बत में रह गया करना झूठा मुझे वादा या बहाना नहीं आता, सारे शहर को राख में तब्दील कर गया वो जिसे तुम कहते थे आग लगाना नहीं आता, होंठो पे सजी रहती है मुस्कान इस लिए क्योकि सीने में मुझे दर्द छुपाना नहीं आता..!! ~सिराज फैसल - [सावन को ज़रा खुल के बरसने की दुआ दो...](https://bazmeshayari.com/savan-ko-zara-khul-ke/): सावन को ज़रा खुल के बरसने की दुआ दो हर फूल को गुलशन में महकने की दुआ दो, मन मार के बैठे है जो सहमे हुए डर से उन सारे परिंदों को चहकने की दुआ दो, वो लोग जो उजड़े है फ़सादो से बला से लो साथ उन्हें फिर से पनपने की दुआ दो, कुछ लोग जो ख़ुद अपनी निगाहों से गिरे है भटके है वो ख्यालात बदलने की दुआ दो, जिन लोगो ने डरते हुए दरपन नहीं देखा उनको भी ज़रा सजने सँवरने की दुआ दो, बादल है कि कोहसार पिघलते ही नहीं है आज़ाद इन्हें अब तो बरसने - [रास्ते जो हमेशा सहल ढूँढ़ते है...](https://bazmeshayari.com/raste-jo-hamesha-sahal/): रास्ते जो हमेशा सहल ढूँढ़ते है हो न हो वो सराबो में जल ढूँढ़ते है, जब भी लगता है अब इम्तेहाँ है ज़रूरी उलझने हम खड़ी कर के हल ढूँढ़ते है, जिनके चलने से हो जाएँ राहे मुअत्तर आदमी ऐसा हम आजकल ढूँढ़ते है, बीज ऊसर में जो फेकते है हमेशा कितनी शिद्दत से उसमे फ़सल ढूँढ़ते है, धड़कनो से भरी बस्तियाँ छोड़ आये पत्थरो के नगर में गज़ल ढूँढ़ते है..!! इसको भी पढ़े – > न शब ओ रोज़ ही बदले है न हाल अच्छा है… - [आज जो तुम्हारी नज़र में एक तवायफ़ सी है वो...](https://bazmeshayari.com/aaj-jo-tumhari-nazar-me/): आज जो तुम्हारी नज़र में एक तवायफ़ सी है वो तुम्हारी ही तो बनाई हुई बेअदब रिवायत सी है वो, कभी ज़माने से जो अपने दिल की कहती ही नहीं लबो पे अनकही ठहरी हुई शिकायत सी है वो, किसी के लिए देखो तो इस जहाँ में नफ़रत सी है और किसी के लिए शायद एक इबादत सी है वो, ऐसा सबक़ जिसको हर कोई यहाँ पढ़ नहीं सकता तक़दीर के हाथों लिखी हुई दर्द की इबारत सी है वो, उसके ग़मों की दास्ताँ कोई समझेगा भी तो कैसे ? अश्क ए ख़ूनी से लिखी हुई एक लिखावट सी है - [हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए...](https://bazmeshayari.com/har-qadam-kahta-hai/): हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए मंज़िल ए हस्ती नहीं है दिल लगाने के लिए, क्या मुझे ख़ुश आए ये हैरत सरा ए बे सबात होश उड़ने के लिए है जान जाने के लिए, दिल ने देखा है बिसात ए क़ुव्वत ए इदराक को क्या बढ़े इस बज़्म में आँखें उठाने के लिए, ख़ूब उम्मीदें बंधीं लेकिन हुईं हिरमाँ नसीब बदलियाँ उठी मगर बिजली गिराने के लिए, साँस की तरकीब पर मिट्टी को प्यार आ ही गया ख़ुद हुई क़ैद उस को सीने से लगाने के लिए, जब कहा मैं ने भुला दो ग़ैर को हँस - [ख़राब लोगो से भी रस्म ओ राह रखते थे...](https://bazmeshayari.com/kharab-logo-se-bhi-rasm-o-raah/): ख़राब लोगो से भी रस्म ओ राह रखते थे पुराने लोग गज़ब की निगाह रखते थे, ये और बात कि करते थे गुनाह मगर गुनाहगारो से मिलने की चाह रखते थे, वो बादशाह भी साँसों की जंग हार गए जो अपने गिर्द हमेशा सिपाह रखते थे, हमारे शेरो पे होती थी वाह वाह बहुत हम अपने सीने में जब दर्द ओ आह रखते थे, बरहना सर है मगर एक वक़्त वो भी था हम अपने सर पे भी ज़रीं कुलाह रखते थे..!! - [सिखाया जो सबक़ माँ ने वो हर पल निभाता हूँ...](https://bazmeshayari.com/sikhaya-jo-sabaq-maa-ne/): सिखाया जो सबक़ माँ ने वो हर पल निभाता हूँ मुसीबत लाख आये सब्र दिल को सिखाता हूँ, सहे है दुःख तो मैंने भी मगर ज़ाहिर न कर पाया मुझे देखो मैं हर हाल में ख़ुशी से मुस्कुराता हूँ, अँधेरी रात गर आई तो उजाला दिन भी आएगा कभी तो दिन फिरेंगे ख़ुद को ये सपने दिखाता हूँ, जो अच्छा है भला उसका बुरा है तो भला उसका मेरी फ़ितरत में है शामिल गले सबको लगाता हूँ, ज़माने की दलीलों को मैं हँस कर टाल देता हूँ मैं ख़ुश हूँ देख लो कितना सभी को यूँ जताता हूँ, करोगे गर - [खुल के मिलने का सलीक़ा उन्हें आता नहीं...](https://bazmeshayari.com/khul-ke-milne-ka-saliqa/): खुल के मिलने का सलीक़ा उन्हें आता नहीं और मेरे क़रीब तो कोई चोर दरवाज़ा नहीं, वो समझते है उन्हें पा कर ही मैं रह जाऊँगा उनको मेरी प्यास की शिद्दत का अंदाज़ा नहीं, दुनियाँ को दिखाएँ, मुझको क्या दिखाना गुरुर गर वो समन्दर है तो है, मैं तो मगर प्यासा नहीं, कोई भी दस्तक दे, आहट करे कि आवाज़ दे मेरे हाथो में मेरा घर तो है मगर दरवाज़ा नहीं, अपनों को अपना कहा, चाहे किसी दर्ज़े के हो और जब ऐसा किया मैंने तो कभी शरमाया नहीं, उनकी महफ़िल में उन्ही की रौशनी जिनके चिराग़ मैं भी कुछ - [अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं...](https://bazmeshayari.com/ashaar-mere-yun-to/): अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं कुछ शेर फकत उनको सुनाने के लिए हैं, अब ये भी नहीं ठीक के हर दर्द मिटा दे कुछ दर्द कलेजें से लगाने के लिए हैं, आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे ये ख्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं, देखूँ तेरे हाथों को तो लगता हैं तेरे हाथ मंदिर फकत दीप जलाने के लिए हैं, सोचो तो बड़ी चीज़ हैं तहज़ीब बदन की वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं, ये इल्म का सौदा ये रिसालें ये किताबें एक शख्स की यादों को भुलाने के लिए - [कोई चेहरा न हुआ रोशन न उजागर आँखें...](https://bazmeshayari.com/koi-chehra-n-hua-raushan/): कोई चेहरा न हुआ रोशन न उजागर आँखें आइना देख रही थीं मेरी पत्थर आँखें, ले उड़ी वक्त की आँधी जिन्हें अपने हमराह आज फिर ढूँढ रही हैं वही मंज़र आँखें, फूट निकली तो कई शहर ए तमन्ना डूबे एक कतरे को तरसती हुयी बंज़र आँखें, उसको देखा है तो अब शक का वो आलम है अपने हलकों से निकल आयीं हैं बाहर आँखें, तू निगाहों की जुबां खूब समझता होगा तेरी जानिब तो उठा करती हैं अक्सर आँखें, लोग मरते न दर ओ बाम से टकरा के कभी देख लेते जो “कमाल” उसकी समंदर आँखें..!! ~अहमद कमाल ‘परवाज़ी - [इस तरह सताया है परेशान किया है...](https://bazmeshayari.com/is-tarah-sataya-hai/): इस तरह सताया है परेशान किया है गोया कि मोहब्बत नहीं एहसान किया है, तुझको ही नहीं मुझ को भी हैरान किया है इस दिल ने बड़ा हम को परेशान किया है, सोचा था कि तुम दूसरों जैसे नहीं होगे तुम ने भी वही काम मेरी जान किया है, हर रोज़ सजाते हैं तेरी याद के ग़ुंचे आँखों को तिरे हिज्र में गुलदान किया है, मुश्किल था बहुत मेरे लिए तर्क ए तअल्लुक़ ये काम भी तुम ने मेरा आसान किया है, ये दिल का नगर ऐसे तो वीरान था कब से ला रैब इसे आप ने सुनसान किया है, - [न शब ओ रोज़ ही बदले है न हाल अच्छा है...](https://bazmeshayari.com/naa-shab-o-roz-hi-badle/): न शब ओ रोज़ ही बदले है न हाल अच्छा है किस ब्राह्मण ने कहा था कि ये साल अच्छा है ? हम कि दोनों के गिरफ्तार रहे जानते है दाम ए दुनियाँ से कही ज़ुल्फ़ का जाल अच्छा है, मैंने पूछा था कि आख़िर ये तगाफुल कब तक ? मुस्कुराते हुए वो बोले कि सवाल अच्छा है, दिल न माने भी तो ऐसा है कि गाहे ब गाहे यार ए बे फैज़ से हल्क़ा सा मलाल अच्छा है, लज्जते क़ुर्ब ओ जुदाई की है अपनी अपनी मुस्तक़िल हिज़्र ही अच्छा न विसाल अच्छा है, दोस्ती अपनी जगह पर ये - [सब जल गया जलते हुए ख़्वाबों के असर से...](https://bazmeshayari.com/sab-jal-gaya-jalte-hue/): सब जल गया जलते हुए ख़्वाबों के असर से उठता है धुआँ दिल से निगाहों से जिगर से, आज उस के जनाज़े में है एक शहर सफ़ आरा कल मर गया जो आदमी तन्हाई के डर से, कब तक गए रिश्तों से निभाता मैं तअ’ल्लुक़ इस बोझ को ऐ दोस्त उतार आया हूँ सर से, जो आइना ख़ाना मेरी हैरत का सबब है मुमकिन है मेरे बाद मेरी दीद को तरसे, इस अहद ए ख़िज़ाँ में किसी उम्मीद के मानिंद पत्थर से निकल आऊँ मगर अब्र तो बरसे, रूठे हुए सूरज को मनाने की लगन में हम लोग सर ए - [एक दिन मुल्क के हर घर में उजाला होगा...](https://bazmeshayari.com/ek-din-mulq-ke-har-ghar-me/): एक दिन मुल्क के हर घर में उजाला होगा हर शख्स यहाँ सबका भला चाहने वाला होगा, इंसानों को होगी इंसानियत से मुहब्बत जब मिटेंगी नफरते, अमन का ही बोलबाला होगा, मेरा हमदम, मेरा हमदर्द, हमसफ़र जो है वक़्त ए गम में दुआएँ खैर माँगने वाला होगा, राम ओ रहीम गमगुसार होंगे एक दूसरे के वो भी लौटेगा जिसे नफ़रत ने निकाला होगा, कोई ठिठुरेगा नहीं मौसम ए सरमा में कही हर एक ज़िस्म पे लिबास ओ दुशाला होगा, आदमी आदमी होगा, ना रहेगा कोई फ़र्क ना कोई गोरा ही रहेगा ना कोई काला होगा, न किसी की ज़िन्दगी गुज़रेगी - [लोग कैसे है यहाँ के ? ये नगर कैसा है ?](https://bazmeshayari.com/log-kaise-hai-yahan-ke/): लोग कैसे है यहाँ के ? ये नगर कैसा है ? उनकी जादू भरी बातों में असर कैसा है ? डूबने वाले को बाहर तो निकल आने दो बाद में पूछते रहना कि भँवर कैसा है ? क्या बता पाएँगे ये फूटपाथ पे सोने वाले कोई पूछे भी अगर उनसे कि घर कैसा है ? आंधियाँ रुकते ही देखेंगे चमन में जा कर जिसकी कमज़ोर जड़ें थी वो शज़र कैसा है ? चाँद से चेहरे पे कल जिस के ख़राश आई थी माना दुश्मन था, बताओ तो मगर कैसा है ? - [गुज़रे जो अपने यारों की सोहबत में चार दिन...](https://bazmeshayari.com/guzre-jo-apne-yaaro-ki/): गुज़रे जो अपने यारों की सोहबत में चार दिन ऐसा लगा बसर हुए जन्नत में चार दिन, उम्र ए ख़िज़र की उस को तमन्ना कभी न हो इंसान जी सके जो मोहब्बत में चार दिन, जब तक जिए निभाएँगे हम उन से दोस्ती अपने रहे जो दोस्त मुसीबत में चार दिन, ऐ जान ए आरज़ू वो क़यामत से कम न थे काटे तेरे बग़ैर जो ग़ुर्बत में चार दिन, फिर उम्र भर कभी न सुकूँ पा सका ये दिल कटने थे जो भी कट गए राहत में चार दिन, जो फ़क़्र में सुरूर है शाही में वो कहाँ हम भी - [वो दिल की झील में उतरा था एक साअ'त को...](https://bazmeshayari.com/wo-dil-ki-jheel-me-utra-tha/): वो दिल की झील में उतरा था एक साअ’त को ये उम्र हो गई है सहते इस मलामत को, कहीं तो साया ए दीवार ए आगही मिल जाए कोई तो आए करे ख़त्म इस मसाफ़त को, तुम्हीं से मिल के मेरी दिल से आश्नाई हो तुम्हारे बाद ही जाना है इस क़यामत को, वो एक शख़्स मुझे कर गया सभी से जुदा तरस रहा हूँ मैं जिस शख़्स की रिफ़ाक़त को, अजीब लोग हैं इस शहर के ब नाम ए वफ़ा हवाएँ देते हैं हर शोला ए अदावत को, जवाज़ भी तो कोई हो मेरी तबाही का छुपा रहे हो - [ग़ैरत ए इश्क़ सलामत थी अना ज़िंदा थी...](https://bazmeshayari.com/gairat-e-ishq-salamat-thi/): ग़ैरत ए इश्क़ सलामत थी अना ज़िंदा थी वो भी दिन थे कि रह ओ रस्म ए वफ़ा ज़िंदा थी, क़ैस को दोश न दो रखियो न फ़रहाद को नाम इन्ही लोगों से मोहब्बत की अदा ज़िंदा थी, शहर ए बीमार के हर कूचा ओ बाम ओ दर पर हम भी मरते थे कि जब ख़ल्क़ ए ख़ुदा ज़िंदा थी, बुझ गईं शमएँ तो दम तोड़ गए झोंके भी जिस तरह ज़हर ए रक़ाबत से हवा ज़िंदा थी, याद ए अय्याम कि सहरा ए मोहब्बत में ‘फ़राज़’ जरस ए क़ाफ़िला ए दिल की सदा ज़िंदा थी..!! ~अहमद फ़राज़ - [उसे हम पा ही लेते बस ज़रा सा और चलते तो...](https://bazmeshayari.com/use-ham-paa-hi-lete-bas/): उसे हम पा ही लेते बस ज़रा सा और चलते तो सफ़र आसान था लेकिन ज़रा रस्ते संभलते तो, जो टूटे हम तो कोई भी हमें संभाल न पाया समेट लेता मैं उनको अगर जब वो बिखरते तो, बहुत मुश्किल था मेरी ज़िन्दगी का रास्ता लेकिन सफ़र आसान हो जाता अगर वो साथ चलते तो, उसे हम चाहते है किस क़दर मालूम नहीं है ख़ुशी से मर ही जाते हम अगर वो हम पे मरते तो, मुहब्बत करता है लेकिन उसे मेरी जीत का डर है मैं सब कुछ हार देता वो ज़रा इज़हार करते तो..!! - [तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की...](https://bazmeshayari.com/tinka-tinka-kaante-tode/): तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की क्यूँ इतनी लम्बी होती है चाँदनी रात जुदाई की ? नींद में कोई अपने आप से बातें करता रहता है काल कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई की, सीने में दिल की आहट जैसे कोई जासूस चले हर साए का पीछा करना आदत है हरजाई की, आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं क्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई की ? तारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थी साहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की..!! ~गुलज़ार - [सहमा सहमा डरा सा रहता है...](https://bazmeshayari.com/sahma-sahma-dara-saa-rahta-hai/): सहमा सहमा डरा सा रहता है जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है, काई सी जम गई है आँखों पर सारा मंज़र हरा सा रहता है, एक पल देख लूँ तो उठता हूँ जल गया घर ज़रा सा रहता है, सर में जुम्बिश ख़याल की भी नहीं ज़ानुओं पर धरा सा रहता है..!! ~गुलज़ार - [शाम से आज साँस भारी है...](https://bazmeshayari.com/shaam-se-aaj-sans-bhari-hai/): शाम से आज साँस भारी है बे क़रारी सी बे क़रारी है, आपके बाद हर घड़ी हमने आपके साथ ही गुज़ारी है, रात को दे दो चाँदनी की रिदा दिन की चादर अभी उतारी है, शाख पर कोई कहकहा तो खिले कैसी चुप सी चमन पे तारी है, कल का हर वाकया तुम्हारा था आज की दास्ताँ हमारी है..!! ~गुलज़ार - [ज़हर के घूँट भी हँस हँस के पीये जाते है...](https://bazmeshayari.com/zahar-ke-ghoont-bhi-hans/): ज़हर के घूँट भी हँस हँस के पीये जाते है हम बहरहाल सलीक़े से जीये जाते है, एक दिन हम भी बहुत याद किए जाएँगे चंद अफ़साने ज़माने को दिए जाते है, हमको दुनियाँ से मुहब्बत भी बहुत है लेकिन लाख़ इल्ज़ाम भी दुनियाँ को दिए जाते है, बज़्म ए अग़्यार सही, अज़ रह ए तनकीद सही शुक्र है हम भी कहीं याद किए जाते है, हम किए जाते है तक़लीद ए रवायात ए जुनूँ और ख़ुद चाक़ ए गिरेबाँ भी सिए जाते है, गम ने बख्शी है ये मोहतात मिजाज़ी हमको ज़ख्म भी खाते है आँसू भी पिए जाते - [किसी के वायदे पे क्यों ऐतबार हमने किया ?](https://bazmeshayari.com/kisi-ke-wayde-pe-kyo/): किसी के वायदे पे क्यों ऐतबार हमने किया ? न आने वालो का क्यों इंतज़ार हमने किया ? न वो हमारे हुए और न हम रहे अपने मुहब्बतों का अज़ब कारोबार हमने किया, वो खेल खेल रहे थे, वो खेल खेल चुके खता हमारी थी क्यों उन से प्यार हमने किया ? बिछड़ के उनसे न जब दिल किसी तरह बहला शराब खाने का रुख इख़्तियार हमने किया..!! - [रोग ऐसे भी गम ए यार से लग जाते है...](https://bazmeshayari.com/rog-aise-bhi-gam-e-yaar-se/): रोग ऐसे भी गम ए यार से लग जाते है दर से उठते है तो दीवार से लग जाते है, इश्क़ आगाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है बाद में सैकड़ो आज़ार से लग जाते है, पहले पहले होस एक आध दुकां खोलती है फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते है, बे बसी भी कभी क़ुर्बत का सबब बनती है रो न पाएँ तो गले यार से लग जाते है, कतरनें गम की जो गलियों में उड़ी फिरती है घर में ले आओ तो अंबार से लग जाते है, दाग दामन के हों, दिल के हों कि चेहरे - [दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के...](https://bazmeshayari.com/dono-jahan-teri-muhabbat/): दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा है कोई शब ए ग़म गुज़ार के, वीराँ है मय कदा ख़ुम ओ साग़र उदास हैं तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के, एक फ़ुर्सत ए गुनाह मिली वो भी चार दिन देखे हैं हम ने हौसले परवरदीगार के, दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के, भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज ‘फ़ैज़’ मत पूछ वलवले दिल ए ना कर्दा कार के..!! ~फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - [किस्से मेरी उल्फ़त के जो मर्क़ूम है सारे...](https://bazmeshayari.com/qisse-meri-ulfat-ke-jo/): किस्से मेरी उल्फ़त के जो मर्क़ूम है सारे आ देख तेरे नाम से मौसम है सारे, बस इस लिए हर काम अधूरा ही पड़ा है ख़ादिम भी मेरी कौम के मखदूम है सारे, अब कौन मेरे यादों की जंज़ीर को खोले हाकिम मेरी बस्ती के महकूम है सारे, शायद ये ज़र्फ है जो ख़ामोश हूँ अब तक वरना तो तेरे ऐब भी मालूम है सारे, हर ज़ुर्म मेरी ज़ात से मंसूब है क्या मेरे सिवा शहर में मासूम है सारे ?? - [ये इश्क़ पे सब दुनियाँ वाले बेकार की बातें करते है...](https://bazmeshayari.com/ye-ishq-pe-sab-duniya-wale/): ये इश्क़ पे सब दुनियाँ वाले बेकार की बातें करते है पायल के ग़मों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते है, हर दिल में छुपा है तीर कोई हर पाँव में है जंज़ीर कोई पूछे कोई उनसे गम के मज़े जो प्यार की बातें करते है, उल्फ़त के नये दीवानों को किस तरह से कोई समझाए नज़रों पे जिनके लगी है पाबंदी दीदार की बातें करते है, भँवरे है अगर मदहोश तो क्या परवाने भी है ख़ामोश तो क्या ? फिर भी प्यार के नग्मे गाते है सब यार की बातें करते है..!! - [कोई नहीं आता समझाने अब आराम से हैं दीवाने...](https://bazmeshayari.com/koi-nahi-aata-samjhane/): कोई नहीं आता समझाने अब आराम से हैं दीवाने, तय न हुए दिल के वीराने थक कर बैठ गए दीवाने, मजबूरी सब को होती है मिलना हो तो लाख बहाने, बन न सकी अहबाब से अपनी वो दाना थे हम दीवाने, नई नई उम्मीदें आ कर छेड़ रही हैं ज़ख़्म पुराने, जल्वा ए जानाँ की तफ़्सीरें एक हक़ीक़त लाख फ़साने, दुनिया भर का दर्द सहा है हम ने तेरे ग़म के बहाने, फिर वहशत आई सुलझाने होश ओ ख़िरद के ताने बाने, फिर अपने आँचल से हवा दी शो’ला ए गुल को बाद ए सबा ने, फिर वो डाल गए - [कितना बेकार तमन्ना का सफ़र होता है...](https://bazmeshayari.com/kitna-bekar-tamanna-ka-safar/): कितना बेकार तमन्ना का सफ़र होता है कल की उम्मीद पे हर आज बसर होता है, यूँ मैं सहमा हुआ घबराया हुआ रहता हूँ जैसे हर वक़्त किसी बात का डर होता है, दिन गुज़रता है तो लगता है बड़ा काम हुआ रात कटती है तो इक माअरका सर होता है, लोग कहते हैं मुक़द्दर का नविश्ता जिसको हम नहीं मानते हर चंद मगर होता है, ‘सैफ़’ इस दौर में इतना भी ग़नीमत समझो क़ैद में रौज़न ए दीवार भी दर होता है..!! ~सैफ़ुद्दीन सैफ़ - [इंशा जी उठा अब कूच करो, इस शहर में जी का लगाना क्या...](https://bazmeshayari.com/insha-ji-utha-ab-kooch-karo/): इंशा जी उठा अब कूच करो, इस शहर में जी का लगाना क्या वहशी को सुकूं से क्या मतलब, जोगी का नगर में ठिकाना क्या ? इस दिल के दरीदा दामन को देखो तो सही सोचो तो सही जिस झोली में सौ छेद हुए, उस झोली का फैलाना क्या ? शब बीती चाँद भी डूब चला, जंज़ीर पड़ी दरवाज़े में क्यूँ देर गए घर आये हो, सजनी से करोगे बहाना क्या ? फिर हिज़्र की लम्बी रात मियाँ, संजोग की तो ही एक घड़ी जो दिल में है लब पर आने दो, शर्माना क्या, घबराना क्या ? उस रोज जो - [शिकवा भी ज़फ़ा का कैसे करे एक नाज़ुक सी दुश्वारी है...](https://bazmeshayari.com/shikwa-bhi-zafa-ka-kaise/): शिकवा भी ज़फ़ा का कैसे करे एक नाज़ुक सी दुश्वारी है आगाज़ ए वफ़ा ख़ुद हमने किया था पहली भूल हमारी है, दुःख तुमको जब जब पहुँचा है ख़ुद हमने आँसू पोछें है अब दिल पे हमारे चोट लगी है अबके तुम्हारी बारी है, बिन खेले बाज़ी जीत के भी तुम हमसे शाकी रहते हो और हमको देखो हमने तो ख़ुद जान के बाज़ी हारी है, कुछ दर्द ए तन्हा, कुछ फ़िक्र ए जहाँ कुछ शर्म ए खता, कुछ खौफ़ ए सज़ा एक बोझ उठाये फिरता हूँ और बोझ भी कितना भारी है, जो ज़ख्म ए कारी लगा है दिल - [उर्दू है मेरा नाम मैं ख़ुसरो की पहेली...](https://bazmeshayari.com/urdu-hai-mera-naam-mai/): उर्दू है मेरा नाम मैं ख़ुसरो की पहेली मैं मीर की हमराज़ हूँ ग़ालिब की सहेली, दक्कन के वाली ने मुझे गोदी में खिलाया सौदा के क़सीदो ने मेरा हुस्न बढ़ाया, है मीर की अज़मत कि मुझे चलना सिखाया मैं दाग के आँगन में खिली बन के चमेली, ग़ालिब ने बुलंदी का सफ़र मुझको सिखाया हाली ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया, इक़बाल ने आईना ए हक़ मुझको दिखाया मोमिन ने सजाई मेरे ख़्वाबो की हवेली, जौक की अज़मत कि दिए मुझको सहारे चकबस्त की उल्फ़त ने मेरे ख़्वाब सँवारे, फ़ानी ने सजाए मेरी पलकों पे सितारे अकबर ने रचाई - [क़र्ज़ जाँ का उतारने के लिए मैं जीया ख़ुद को मारने के लिए...](https://bazmeshayari.com/qarz-jaan-utarne-ke-liye/): क़र्ज़  जाँ का उतारने के लिए मैं जीया ख़ुद को मारने के लिए,   मुझे जलना पड़ा दीये की तरह शब की ज़ुल्फे सँवारने के लिए,   देख ! ख़ुद को मिटा दिया मैंने नक्श तेरे उभारने के लिए,   मैंने दहलीज पर धरी आँखे तुझको दिल में उतारने के लिए,   उसने तोहफ़ा दिया उदासी का वक़्त ख़ुशी ख़ुशी गुज़ारने के लिए,   फिर भी इस मुहब्बत के खेल में मैं हूँ तैयार उससे हारने के लिए..!! - [ये ज़र्द पत्तों की बारिश मेरा ज़वाल नहीं...](https://bazmeshayari.com/ye-zard-patton-ki-barish/): ये ज़र्द पत्तों की बारिश मेरा ज़वाल नहीं मेरे बदन पे किसी दूसरे की शाल नहीं, उदास हो गई एक फ़ाख़्ता चहकती हुई किसी ने क़त्ल किया है ये इंतिक़ाल नहीं, तमाम उम्र ग़रीबी में बा वक़ार रहे हमारे अहद में ऐसी कोई मिसाल नहीं, वो ला शरीक है उस का कोई शरीक कहाँ वो बे मिसाल है उस की कोई मिसाल नहीं, मैं आसमान से टूटा हुआ सितारा हूँ कहाँ मिली थी ये दुनिया मुझे ख़याल नहीं, वो शख़्स जिसको दिल ओ जाँ से बढ़ के चाहा था बिछड़ गया तो ब ज़ाहिर कोई मलाल नहीं..!! ~बशीर बद्र - [वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है...](https://bazmeshayari.com/wo-chandani-ka-badan/): वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है, उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिए बनाया है, कहाँ से आई ये ख़ुशबू ये घर की ख़ुशबू है इस अजनबी के अँधेरे में कौन आया है, महक रही है ज़मीं चाँदनी के फूलों से ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है, उसे किसी की मोहब्बत का ए’तिबार नहीं उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है, तमाम उम्र मेरा दिल उसी धुएँ में घुटा वो इक चराग़ था मैं ने उसे बुझाया है..!! ~बशीर बद्र - [वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है...](https://bazmeshayari.com/wahi-taaz-hai-wahi-takht-hai/): वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है, बड़े शौक़ से मेरा घर जला कोई आँच तुझ पे न आएगी ये ज़बाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी का ग़ुलाम है, यहाँ एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें तेरा कीर्तन अभी पाप है अभी मेरा सज्दा हराम है, मैं ये मानता हूँ मेरे दीये तेरी आँधियों ने बुझा दिए मगर एक जुगनू हवाओं में अभी रौशनी का इमाम है, मेरे फ़िक्र ओ फ़न तेरी अंजुमन न उरूज था - [थी जिसकी जुस्तज़ू वो हकीक़त नहीं मिली...](https://bazmeshayari.com/thi-jiski-justazoo-wo-haqiqat-nahi/): थी जिसकी जुस्तज़ू वो हकीक़त नहीं मिली इन बस्तियों में हमको रफ़ाक़त नहीं मिली, अबतक हूँ इस गुमाँ में कि हम भी है दहर में इस वहम से निज़ात की सूरत नहीं मिली, रहता था उसके साथ बहुत देर तक मगर उन रोज़ ओ शब में मुझको ये फ़ुर्सत नहीं मिली, कहना था जिसको उससे किसी वक़्त में मुझे उस बात के कलाम की मोहलत नहीं मिली, कुछ दिन के बाद उससे जुदा हो गए मुनीर उस बेवफ़ा से अपनी तबीयत नहीं मिली..!! ~मुनीर नियाज़ी - [अब जो बिछडे हैं, तो बिछडने की शिकायत कैसी...](https://bazmeshayari.com/ab-jo-bichhde-hai-to-bichhadne-ki/): अब जो बिछडे हैं, तो बिछडने की शिकायत कैसी मौत के दरिया में उतरे तो जीने की इजाजत कैसी ? जलाए हैं खुद ने दीप जो राह में तूफानों के तो मांगे फिर हवाओं से बचने की रियायत कैसी ? फैसले रहे फासलों के हम दोनों के गर तो इन्तकाम कैसा और दरमियां सियासत कैसी ? ना उतावले हो सुर्ख पत्ते टूटने को साख से तो क्या तूफान, फिर आंधियो की हिमाकत कैसी ? वीरां हुई कहानी जो सपनों की तेरी मेरी उजडी पड़ी है अब तलक जर्जर इमारत जैसी, अब जो बिछडे हैं, तो बिछडने की शिकायत कैसी मौत - [कौन कहता है शरारत से तुम्हे देखते है...](https://bazmeshayari.com/kaun-kahta-hai-shararat-se-tumhe-dekhte-hai/): कौन कहता है शरारत से तुम्हे देखते है जान ए मन हम तो मुहब्बत से तुम्हे देखते है, तुमको मालूम नहीं तुम हो मुक़दस कितने देखते है तो हम अक़ीदत से तुम्हे देखते है, देख के तुमको किसी और की याद आती है हम किसी और ही निस्बत से तुम्हे देखते है, साथ गैरो के नज़र आओ तो जी कुढ़ता है क्या कहे कैसी अज़ीयत से हम तुम्हे देखते है, झोकनी पड़ती है ये जान अज़ाबो में हमें कौन कहता है हम सहूलत से तुम्हे देखते है, जाने क्या लिखते हो क्या सोचते रहते हो वसी रात को जब भी - [तू समझता है कि रिश्तों की दुहाई देंगे...](https://bazmeshayari.com/tu-samjhta-hai-ki-rishto-ki-duhai-denge/): तू समझता है कि रिश्तों की दुहाई देंगे हम तो वो हैं तेरे चेहरे से दिखाई देंगे, हम को महसूस किया जाए है ख़ुश्बू की तरह हम कोई शोर नहीं हैं जो सुनाई देंगे, फ़ैसला लिखा हुआ रखा है पहले से ख़िलाफ़ आप क्या ख़ाक अदालत में सफ़ाई देंगे, पिछली सफ़ में ही सही है तो इसी महफ़िल में आप देखेंगे तो हम क्यूँ न दिखाई देंगे..!! ~वसीम बरेलवी - [तहरीर से वर्ना मेरी क्या हो नहीं सकता...](https://bazmeshayari.com/tahrir-se-warna-meri-kya-ho-nahi/): तहरीर से वर्ना मेरी क्या हो नहीं सकता एक तू है जो लफ़्ज़ों में अदा हो नहीं सकता, आँखों में ख़यालात में साँसों में बसा है चाहे भी तो मुझ से वो जुदा हो नहीं सकता, जीना है तो ये जब्र भी सहना ही पड़ेगा क़तरा हूँ समुंदर से ख़फ़ा हो नहीं सकता, गुमराह किए होंगे कई फूल से जज़्बे ऐसे तो कोई राहनुमा हो नहीं सकता, क़द मेरा बढ़ाने का उसे काम मिला है जो अपने ही पैरों पे खड़ा हो नहीं सकता, ऐ प्यार तेरे हिस्से में आया तेरी क़िस्मत वो दर्द जो चेहरों से अदा हो नहीं - [जो पत्थरो में जुबां ढूँढे हम वो चीज है दोस्त...](https://bazmeshayari.com/jo-pattharo-me-zuban-dhoondhe/): जो पत्थरो में जुबां ढूँढे हम वो चीज है दोस्त है मर्ज़ ख़्वाब सजाना तो हम मरीज़ है दोस्त, हमें कहानियाँ लिखने दो बहते पानी पर ये बेवकूफियाँ हमको बहुत अजीज़ है दोस्त, जुनूँ के रास्ते में जिसने भी ठोकरे खाई हो उसे पता है कि ये ठोकरे बहुत लजीज़ है दोस्त, नसीहते नहीं सुनते न सबक़ लेते है मैं क्या करूँ कि मेरे ख़्वाब बड़े बदतमीज़ है दोस्त, नहीं है हम कोई ज़ेवर मगर पहन लो हमें बदन ढकेंगे तेरा हम तेरी कमीज़ है दोस्त..!! - [दोस्तों से रसाई सोचेंगे सबसे हो आशनाई सोचेंगे...](https://bazmeshayari.com/dosto-se-rasaai-sochenge/): दोस्तों से रसाई सोचेंगे सबसे हो आशनाई सोचेंगे, सोचती चाहे जो रहे दुनियाँ हम तो सबकी भलाई सोचेंगे, प्यार करते रहे है मुखलिस जो कैसे फिर बेवफ़ाई सोचेंगे, बेवफ़ाई की गर मेरे जानाँ फिर कभी हम जुदाई सोचेंगे, नाचना तो नहीं मुझे आता जब मैं नाचूँगा भाई सोचेंगे, लिख गज़ल इसलिए रहा हूँ मैं फिर ख़ुदा की खुदाई सोचेंगे, जब हमारी क़िताब आयेगी हम भी फिर रुनुमाई सोचेंगे, मिल न इंसाफ़ गर सका मुझको जब ये गोली चलाई सोचेंगे, हम किसी को दुःख नहीं देते जब कभी सर पे आई सोचेंगे..!! - [तेरे में अब तो रही बात वो नहीं है दोस्त...](https://bazmeshayari.com/tere-me-ab-to-rahi-baat-wo-nahi/): तेरे में अब तो रही बात वो नहीं है दोस्त हुई ये अपनी मुलाक़ात वो नहीं है दोस्त, चले ही आओ पुकारा है याद भी किया है मेरी तो आने की औक़ात वो नहीं है दोस्त, नसीब में लिखी थी ख़ुशी गई थी मिल कि आनी ज़ीस्त में फिर रात वो नहीं है दोस्त, ख़ुलूस भी था बहुत प्यार से ही लाये थे ये पहली वाली मराआत वो नहीं है दोस्त, था इश्तियाक़ मुहब्बत हो कम गई है क्यूँ ? हुई थी फूलो की बरसात वो नहीं है दोस्त, ख़ुशी मनाई है हमने इस लिए क्योकि मिली थी दर्द की - [हिज़्र ए गम क़ुर्ब में तन्हाई रुलाती होगी...](https://bazmeshayari.com/hizr-e-gam-qurb-me-tanhaai/): हिज़्र ए गम क़ुर्ब में तन्हाई रुलाती होगी याद मेरी भी उसे फिर तो सताती होगी, ऐ हवा जा के ख़बर मेरे सनम की लाना पास तू उसके गुज़र के ही तो जाती होगी, कोई मुखलिस मिल जाए तो फिर क्या कहने अपने चेहरे को वो आँचल से छुपाती होगी, होती होगी कभी दस्तक कोई दरवाज़े पर दौड़ कर भागते हुए दरवाज़े पे जाती होगी, प्यार से तोहफ़े दिए थे तो गनीमत समझे तीर अपनी तो वो नज़रों के चलाती होगी, खून से ख़त ही लिखे थे कभी उसने तो मुझे कटी हुई ऊँगली कभी याद तो दिलाती होगी, प्यार - [किसी की आह सुनते ही जो फ़ौरन काँप जाते है...](https://bazmeshayari.com/kisi-ki-aah-sunte-hi-jo-kaanp/): किसी की आह सुनते ही जो फ़ौरन काँप जाते है वही इंसानियत के दर्द में आँसू बहाते है, न जाने कौन सी दुनियाँ मेरे हिस्से में आई है वफ़ा का नाम सुनते ही सभी पत्थर उठाते है, उन्हें इंसानियत के दर्द का एहसास क्या होगा ? जो ले कर नाम मज़हब का हमें हरदम लड़ाते है, हमें नाकाम करने की बहुत साज़िश हुई लेकिन ख़ुदा के फ़ज़ल से अब भी क़दम आगे बढ़ाते है, हमारी ख़ामोशी पे तंज़ करना भी हिमाक़त है हम अपने खून से इस मुल्क का नक्शा बनाते है..!! - [नफ़रत को छोड़ द तू मुहब्बत की बात कर...](https://bazmeshayari.com/nafrat-ko-chhod-de-tu-muhabbat-ki/): नफ़रत को छोड़ द तू मुहब्बत की बात कर इत्तिहाद ओ अमन ओ शराफ़त की बात कर, मत कर हमारे मुल्क में गन्दी सियासते एक दूसरे के दर्द में शिरकत की बात कर, क्यूँ मस्लकी लड़ाई में उलझा हुआ है तू ? रोज़ा, नमाज़, हज़, ओ इबादत की बात कर, एक दूसरे को काफ़िर ओ मुशरिक न बोलना इस्लाम का सबक़ है ये उल्फ़त की बात कर, मत बाँट अपनी कौम को फ़िरको के नाम पर रहना है हमको प्यार से इज्ज़त की बात कर..!! - [अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं...](https://bazmeshayari.com/apni-marzi-se-kahan-apne-safar/): अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं, पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं, वक़्त के साथ है मिटी का सफ़र सदियों से किस को मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं, चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब सोचते रहते हैं किस राहगुज़र के हम हैं, हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं, गिनतियों में ही गिने जाते हैं - [कहानियों ने ज़रा खींच कर बदन अपने...](https://bazmeshayari.com/kahaniyo-ne-zara-khich-kar-badan/): कहानियों ने ज़रा खींच कर बदन अपने हरम सरा से बुलाया हमें वतन अपने, खुले गले की क़मीसें खुले गले के फ़िराक़ ये लड़कियाँ हैं बदलती हैं पैरहन अपने, ग़दर के फूल सजाती हैं ऐसे बालों में सँभाल सकती हों जैसे भरे बदन अपने, अजब भड़क है शराबों की और आँखों की बला है हुस्न बिदकने लगे हैं बन अपने, पराए दर्द की ठिकरी से घर करें रौशन कि सिफ़्लगी की रियाज़त में हैं मगन अपने, ये इंकिसार के पुतले ये सीम-ओ-ज़र की सना ये मस्ख़रे हैं कि चोले में गोरकन अपने, हमें निकालो घरों की कमीन गाहों से लहू - [अदा है ख़्वाब है तस्कीन है तमाशा है...](https://bazmeshayari.com/ada-hai-khwab-hai-taskin-hai/): अदा है ख़्वाब है तस्कीन है तमाशा है हमारी आँख में एक शख़्स बेतहाशा है, ज़रा सी चाय गिरी और दाग़ दाग़ वरक़ ये ज़िंदगी है कि अख़बार का तराशा है, तुम्हारा बोलता चेहरा पलक से छू छू कर ये रात आईना की है ये दिन तराशा है, तेरे वजूद से बारादरी दमक उठी कि फूल पल्लू सरकने से इर्तिआशा है, मैं बेज़बाँ नहीं जो बोलता हूँ लिख लिख कर मेरी ज़बान तले ज़हर का बताशा है, तुम्हारी याद के चर्कों से लख़्त लख़्त है जी कि ख़ंजरों से किसी ने बदन को क़ाशा है, जहान भर से जहाँ गर्द - [तुम्हे न फिर से सताएँगे हम, ख़ुदा हाफिज़...](https://bazmeshayari.com/tumhe-n-fir-se-satayenge-ham/): तुम्हे न फिर से सताएँगे हम, ख़ुदा हाफिज़ कि अब न लौट के आएँगे हम, ख़ुदा हाफिज़, रखेंगे तुमको बहुत दूर अपनी नज़रों से मगर न दिल से भूला पाएँगे हम, ख़ुदा हाफिज़, हमारी ज़ात से तकलीफ हो रही है तुम्हे एक और ही शहर बसाएँगे हम, ख़ुदा हाफिज़, बिछड़ते वक़्त उदासी है आखिरी हद पर मगर न अब अश्क बहाएँगे हम, ख़ुदा हाफिज़, अगर मिलेंगी न खुशियाँ तुम्हारी निस्बत से तो ग़मों का जश्न ही मनाएँगे हम, ख़ुदा हाफिज़, निकाल दो ये परस्तिश की आरज़ू दिल से अब तुम्हे ख़ुदा न बनाएँगे हम, ख़ुदा हाफिज़..!! - [दिल ने जब जब तुझ पे इंहिसार किया...](https://bazmeshayari.com/dil-ne-jab-jab-tujh-pe-inhisar-kiya/): दिल ने जब जब तुझ पे इंहिसार किया तुमने ख़ुद को और भी बे ऐतबार किया, तू चल दिया नये रंगों के जहाँ में हर पल बस मैंने तेरा ही इन्तिज़ार किया, तेरे दिए दुखो का बन गया मैं आदी बेसबब मुस्तक़िल ग़मों को इख़्तियार किया, तुम पस ए पर्दा ही रहे मुहब्बतों के बाद हमें नाहक़ ज़माने में, इश्तिहार किया, सबक़ सब ही सिखा दिए फ़रेब के तुझ से जब से रिश्ता उस्तुवार किया, मुनाफिक़त का बे मिसाल शाहकार था वो गले लग के मेरे, मुझ पे वार किया, आदी न था उसका, तो वो मेरा था बे ऐतबार - [नादान न बन इतना तू हर सवाल का जवाब जानता है...](https://bazmeshayari.com/nadaan-na-ban-itna-tu-har/): नादान न बन इतना तू हर सवाल का जवाब जानता है मेरी नींदे चुराने वाले तू मेरा हर ख़्वाब जानता है, मत कर कज़ा मेरे सज़दे इस तरह ख्यालो में आ कर तू तो हर गुनाह और हर सवाब जानता है, तेरी सादगी और तेरे ज़ुल्म की मिसाल क्या दूँ ज़माने को मुझे सब काँटे और तुझे हर गुलाब जानता है, अंजान समझ के और बदनाम न कर मुझको बाज़ार ए मुहब्बत में तू तो तिज़ारत ए इश्क़ का हर एक हिसाब जानता है, शक़ हो अगर मेरी वफ़ा पे तो कभी साक़ी से पूछ लेना मैख़ाने में किस को - [वही बहाना बना है उदास होने का...](https://bazmeshayari.com/wahi-bahana-bana-hai-udas-hone-ka/): बहुत गुमान था मौसम शनास होने का वही बहाना बना है उदास होने का, बदन को काढ़ लिया ज़ख्म के गुलाबो से तो शौक़ पूरा किया ख़ुश लिबास होने का, फ़ज़ा महकने लगे रौशनी झलकने लगे तो ये निशाँ है तेरे आस पास होने का, गुलो के बीच वो चेहरा खिला तो हर तितली तमाशा करने लगी बदहवास होने का, उसे भी शौक़ था बेवजह दिल दुखाने का सो हमने खेल रचाया उदास होने का, नये सफ़र पे रवाना तो हम भी हो जाते बस इंतज़ार था मौसम के रास होने का, नज़र में खाक़ हुए हम भी जब से - [अना से तर्क ए अना तक सफ़र किया जाए...](https://bazmeshayari.com/ana-se-tark-e-ana-tak-safar/): बहुत कठिन ही सही मगर किया जाए अना से तर्क ए अना तक सफ़र किया जाए, जब अपनी बात पे रहना है तुम्हे और हमें तो फिर मुकालमा तो मुख़्तसर किया जाए, तेरी जुदाई के दिन काँटे से बेहतर है ज़माने भर के दुखो को बसर किया जाए, है उससे तर्क ए ताअल्लुक़ का फ़ैसला ऐ दिल फिर ये फ़ैसला तो बहुत सोच कर किया जाए, गुज़ारा जाए कोई धूप में झुलसता दिन फिर ऐसा हो कि ऐतराज़ मेरे रंग पर किया जाए, चटख तो सकती है बुनियाद उसके घर की भी वो जो ये चाहता है कि मुझे दरबदर - [मैं जो महका तो मेरी शाख़ जला दी उसने...](https://bazmeshayari.com/main-jo-mahka-to-meri-shaakh/): मैं जो महका तो मेरी शाख़ जला दी उसने सब्ज़ मौसम में मुझे ज़र्द हवा दी उसने, पहले एक लम्हे की जंज़ीर से बाँधा मुझको और फिर वक़्त की रफ़्तार बढ़ा दी उसने, जानता था कि मुझे मौत सुकूं बख्शेगी वो सितमगर था सो जीने की दुआ दी उसने, जिसके होने से थीं साँसे मेरी दोगुनी वो जो बिछड़ा तो मेरी उम्र घटा दी उसने..!! - [नग्मो से भरे दरिया थे रवां गीतों से भरी हरियाली थी...](https://bazmeshayari.com/nagmo-se-bhare-dariya-the-ravan-geeto-se/): इस देस का रंग अनोखा था इस देस की बात निराली थी नग्मो से भरे दरिया थे रवां गीतों से भरी हरियाली थी, उस शहर से हम आ जाएँगे अश्को के दीप जलाएँगे ये दर्द भी आने वाला था ये बात भी होने वाली थी, वो रौशन गलियाँ याद आएँ वो फूल वो कलियाँ याद आएँ सुन्दर मन छलियाँ याद आएँ, हर आँख मधुर मतवाली थी, किस बस्ती में आ पहुँचे हम हर गाम पे मिलते है सौ गम फिर चल उस नगरी में हमदम हर शाम जहाँ उजियाली थी, वो बाम ओ दर वो रहगुज़र, दिल खाक़ बसर जाँ - [एक वा'दा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं...](https://bazmeshayari.com/ek-wada-hai-kisi-ka-jo-wafa-hota-nahi/): एक वा’दा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं वर्ना इन तारों भरी रातों में क्या होता नहीं, जी में आता है उलट दें उन के चेहरे से नक़ाब हौसला करते हैं लेकिन हौसला होता नहीं, शम्अ जिस की आबरू पर जान दे दे झूम कर वो पतंगा जल तो जाता है फ़ना होता नहीं, अब तो मुद्दत से रह ओ रस्म ए नज़ारा बंद है अब तो उन का तूर पर भी सामना होता नहीं, हर शनावर को नहीं मिलता तलातुम से ख़िराज हर सफ़ीने का मुहाफ़िज़ नाख़ुदा होता नहीं, हर भिखारी पा नहीं सकता मक़ाम ए ख़्वाजगी हर - [मेरे नग़्मात को अंदाज़ ए नवा याद नहीं...](https://bazmeshayari.com/mere-nagmat-ko-andaz-e-nava-yaad-nahi/): है दुआ याद मगर हर्फ़ ए दुआ याद नहीं मेरे नग़्मात को अंदाज़ ए नवा याद नहीं, मैं ने पलकों से दर ए यार पे दस्तक दी है मैं वो साइल हूँ जिसे कोई सदा याद नहीं, मैं ने जिन के लिए राहों में बिछाया था लहू हम से कहते हैं वही अहद ए वफ़ा याद नहीं, कैसे भर आईं सर ए शाम किसी की आँखें कैसे थर्राई चराग़ों की ज़िया याद नहीं, सिर्फ़ धुँधलाए सितारों की चमक देखी है कब हुआ कौन हुआ किस से ख़फ़ा याद नहीं, ज़िंदगी जब्र ए मुसलसल की तरह काटी है जाने किस जुर्म - [जाते जाते मुझे इल्ज़ाम तो देते जाओ...](https://bazmeshayari.com/jaate-jaate-mujhe-ilzam-to/): जाते जाते मुझे इल्ज़ाम तो देते जाओ दिल के रिश्ते को कोई नाम तो देते जाओ, दम निकल जाए न घुट कर शब ए तन्हाई में मुझको वापस दिल ए नाक़ाम तो देते जाओ, मैं किसी और का एहसान नहीं ले सकता मेरी क़िस्मत मेरा अंज़ाम तो देते जाओ, फूल महकाऊँ कि दामन में सजाऊँ काँटे मेरे हिस्से का मुझे काम तो देते जाओ, जाते जाते मुझे इल्ज़ाम तो देते जाओ दिल के रिश्ते को कोई नाम तो देते जाओ..!! - [वो इस अंदाज़ की मुझसे मोहब्बत चाहता है...](https://bazmeshayari.com/wo-is-andaz-ki-mujhse-mohabbat/): वो इस अंदाज़ की मुझसे मोहब्बत चाहता है मेरे हर ख़्वाब पर अपनी हुकूमत चाहता है, मेरे हर लफ़्ज़ में जो बोलता है मुझसे बढ़ कर मेरे हर लफ़्ज़ की मुझसे वज़ाहत चाहता है, बहाना चाहिए उसको भी अब तर्क ए वफ़ा का मैं ख़ुद उससे करूँ कोई शिकायत चाहता है, उसे मालूम है मेरे परों में दम नहीं है मेरा सय्याद अब मुझ से बग़ावत चाहता है, वो कहता है कि मैं उसकी ज़रूरत बन चुका हूँ तो गोया वो मुझे हस्ब ए ज़रूरत चाहता है, कभी उस के सवालों से मुझे लगता है ऐसे कि जैसे वो ख़ुदा - [आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते...](https://bazmeshayari.com/aankhe-mujhe-talwo-se-wo/): आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते अरमान मेरे दिल के निकलने नहीं देते, ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते सच है कि हमीं दिल को सँभलने नहीं देते, किस नाज़ से कहते हैं वो झुँझला के शब ए वस्ल तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते, परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले क्यूँ हमको जलाते हो कि जलने नहीं देते, हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़ ए तमन्ना दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते, दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त हम वो हैं कि कुछ मुँह - [देसों में सब से अच्छा हिन्दोस्तान मेरा...](https://bazmeshayari.com/deso-me-sabse-achcha-hindustan-mera/): देसों में सब से अच्छा हिन्दोस्तान मेरा रू ए ज़मीं पे जन्नत, जन्नत निशान मेरा, वो प्यारा प्यारा मंज़र, वो मोहनी फ़ज़ाएँ वो ऊँचे ऊँचे पर्बत वो दिलफ़ज़ा गुफाएँ, तीनों तरफ़ समुंदर, चौथी तरफ़ हिमाला है पासबान इसका, इसका बनाने वाला, ग़ुंचों का वो चटकना, फूलों का वो महकना पंछी पखेरुओं का वो सुबह दम चहकना, धीमे सुरों में गंगा ये गीत गा रही है जमुना भी अपने मुँह में ये गुनगुना रही है, गोकुल का एक ग्वाला बंसी बजा रहा है बंसी की लय में वो भी इक गीत गा रहा है, दुनिया के सारे मेवे इस गुलिस्तान में - [हुस्न ए मह गरचे ब हंगाम ए कमाल अच्छा है...](https://bazmeshayari.com/husn-e-mah-garche-ba-hangam/): हुस्न ए मह गरचे ब हंगाम ए कमाल अच्छा है उससे मेरा मह ए ख़ुर्शीद ज़माल अच्छा है, बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह जी में कहते है कि मुफ़्त में आये तो माल अच्छा है, उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक वो समझते है कि बीमार का हाल अच्छा है, देखिए पाते है उश्शाक़ बुतों से क्या फैज़ ? एक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है, क़तरा दरिया में जो मिल जाए तो दरिया हो जाए काम अच्छा है वो जिसका कि मआल अच्छा है, हमको मालूम है - [तेरी ख़ुशियों का सबब यार कोई और है न...](https://bazmeshayari.com/teri-khushiyo-ka-sabab/): तेरी ख़ुशियों का सबब यार कोई और है न दोस्ती मुझ से और प्यार कोई और है न ? जो तेरे हुस्न पे मरते हैं बहुत से होंगे पर तेरे दिल का तलबगार कोई और है न ? तू मेरे अश्क न देख, और फक़त इतना बता मैं नहीं हूँ तेरा दिलदार कोई और है न ? इस लिए भी तुझे दुनियाँ से अलग चाहता हूँ तू कोई और है, संसार कोई और है न …?? - [ये चुभन अकेलेपन की, ये लगन उदास शब से...](https://bazmeshayari.com/ye-chubhan-akelepan-ki/): ये चुभन अकेलेपन की, ये लगन उदास शब से मैं हवा से लड़ रहा हूँ, तुझे क्या बताऊँ कब से ? ये सहर की साज़िशे थी, कि इन्तेकाम ए शब था मुझे ज़िन्दगी का सूरज, ना बचा सका गज़ब से, तेरे नाम से शिफ़ा हो, कोई ज़ख्म वो अता कर मेरे नामाबर मिले तो, उसे कहना ये अदब से, वो जवां रुतों की शामे कहाँ खो गई है मोहसिन मैं तो बुझ के रह गया हूँ, वो बिछड़ गया है जब से..!! ~मोहसिन नक़वी - [जिनके घरो में आज भी चूल्हा नहीं जला...](https://bazmeshayari.com/jinke-gharo-me-aaj-chulha-nahi/): जिनके घरो में आज भी चूल्हा नहीं जला खाना गर हम उनको खिलाएँ तो ईद है, पानी नहीं नसीब है कितनो को देखिए प्यासे लबो की प्यास बुझाएँ तो ईद है, जिनके लबो की छीन ली हालात ने हँसी मुस्कान उन लबो पे सजाएँ तो ईद है, वक़्त ने कितनो को कर दिया है बे मकीं प्यार से मकाँ उनका बनाएँ तो ईद है, बेरहम ज़माने ने दिए ज़ख्म जिन्हें गहरे मरहम उनके ज़ख्मो पे लगाएँ तो ईद है..!! - [मुबारक़ हो ! अहल ए वतन क्या ख़ूब...](https://bazmeshayari.com/mubarak-ho-ahl-e-watan/): मुबारक़ हो ! अहल ए वतन क्या ख़ूब इज्ज़त बख्शी है आलमी अखबारों ने   सोने की चिड़िया को भी इन लोगो ने खड़ा कर दिया भूखे नंगो की क़तारो में   खुदगर्ज़ी में आईन ए वतन बदल डाले इन नये ज़म्हुरियत के अलमबरदारो ने   सील दिए हर लब जो थे सच बोलने वाले दौर ए ज़म्हुरियत के ज़दीद पैरोकारो ने..!! ~नवाब ए हिन्द - [आया ही नहीं कोई बोझ अपना उठाने को...](https://bazmeshayari.com/aaya-hi-nahi-koi-bojh-uthane-ko/): आया ही नहीं कोई बोझ अपना उठाने को कब तक मैं छुपा रखता इस ख़्वाब ख़ज़ाने को ? देखा नहीं रुख़ करते जिस तर्फ़ ज़माने को जी चाहता है अक्सर उस सम्त ही जाने को, ये शग़्ल ए ज़बानी भी बेसर्फ़ा नहीं आख़िर सौ बात बनाता हूँ एक बात बनाने को, इस कुंज ए तबीअत की मुमकिन है हवा बदले झोंका कोई आ जाए पत्ते ही उड़ाने को, राज़ी न हुआ मैं भी मानूस मनाज़िर पर तैयार न था वो भी कुछ और दिखाने को, जैसा कि समझते हो वैसा तो नहीं कुछ भी ये सारा तमाशा है एक वहम - [अब इस मकाँ में नया कोई दर नहीं करना...](https://bazmeshayari.com/ab-is-maqan-me-naya-koi/): अब इस मकाँ में नया कोई दर नहीं करना ये काम सहल बहुत है मगर नहीं करना, ज़रा ही देर में क्या जाने क्या हो रात का रंग सो अब क़याम सर ए रहगुज़र नहीं करना, बयाँ तो कर दूँ हक़ीक़त उस एक रात की सब प शर्त ये है किसी को ख़बर नहीं करना, रफ़ूगरी को ये मौसम है साज़गार बहुत हमें जुनूँ को अभी जामा दर नहीं करना, ख़बर है गर्म किसी क़ाफ़िले के लुटने की ये वाक़िआ है तो सैर ओ सफ़र नहीं करना..!! ~अहमद महफूज़ - [छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ...](https://bazmeshayari.com/chhodo-ab-us-charag-ka/): छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ अपना तो सब के हाथों ख़सारा बहुत हुआ, क्या बेसबब किसी से कहीं ऊबते हैं लोग बावर करो कि ज़िक्र तुम्हारा बहुत हुआ, बैठे रहे कि तेज़ बहुत थी हवा ए शौक़ दश्त ए हवस का गरचे इरादा बहुत हुआ, आख़िर को उठ गए थे जो एक बात कह के हम सुनते हैं फिर उसी का इआदा बहुत हुआ, मिलने दिया न उससे हमें जिस ख़याल ने सोचा तो इस ख़याल से सदमा बहुत हुआ, अच्छा तो अब सफ़र हो किसी और सम्त में ये रोज़ ओ शब का जागना सोना बहुत - [सवाद ए शाम न रंग ए सहर को देखते हैं...](https://bazmeshayari.com/sawad-e-sham-n-rang-e-sahar/): सवाद ए शाम न रंग ए सहर को देखते हैं बस एक सितारा ए वहशत असर को देखते हैं, किसी के आने की जिससे ख़बर भी आती नहीं न जाने कब से उसी रहगुज़र को देखते हैं, ख़ुदा गवाह कि आईना ए नफ़स ही में हम ख़ुद अपनी ज़िंदगी ए मुख़्तसर को देखते हैं, तो क्या बस एक ठिकाना वही है दुनिया में वो दर नहीं तो किसी और दर को देखते हैं, सुना है शहर का नक़्शा बदल गया ‘महफ़ूज़’ तो चल के हम भी ज़रा अपने घर को देखते हैं..!! ~अहमद महफूज़ - [लोग कहते थे वो मौसम ही नहीं आने का...](https://bazmeshayari.com/log-kahte-the-wo-mausam/): लोग कहते थे वो मौसम ही नहीं आने का अब के देखा तो नया रंग है वीराने का, बनने लगती है जहाँ शेर की सूरत कोई ख़ौफ़ रहता है वहीं बात बिगड़ जाने का, हमको आवारगी किस दश्त में लाई है कि अब कोई इम्काँ ही नहीं लौट के घर जाने का, दिल के पतझड़ में तो शामिल नहीं ज़र्दी रुख़ की रंग अच्छा नहीं इस बाग़ के मुरझाने का, खा गई ख़ून की प्यासी वो ज़मीं हमको ही शौक़ था कूचा ए क़ातिल की हवा खाने का..!! ~अहमद महफूज़ - [किसी से क्या कहे सुने अगर गुबार हो गए...](https://bazmeshayari.com/kisi-se-kya-kahe-sune/): किसी से क्या कहे सुने अगर गुबार हो गए हम ही हवा की ज़द में थे हम ही शिकार हो गए, सियाह दश्त ख़ार से कहाँ दो चार हो गए कम शौक पैरहन तमाम तार तार हो गए, यहाँ जो दिल में दाग था वही तो एक चराग़ था वो रात ऐसा गुल हुआ कि शर्मसार हो गए, अज़ीज़ क्यूँ न जान से हो शिकस्त ए आईना हमें वहाँ तो एक अक्स था यहाँ हज़ार हो गए, हमें तो एक उम्र से पड़ी है अपनी जान की अभी जो साहिलों पे थे कहाँ से पार हो गए..!! ~अहमद महफूज़ - [अब वो झोंके कहाँ सबा जैसे आग है शहर की हवा जैसे](https://bazmeshayari.com/ab-wo-jhonke-kahan-saba-jaise/): अब वो झोंके कहाँ सबा जैसे आग है शहर की हवा जैसे, शब सुलगती है दोपहर की तरह चाँद, सूरज से जल बुझा जैसे, मुद्दतों बाद भी ये आलम है आज ही तू जुदा हुआ जैसे इस तरह मंज़िलों से हूँ महरूम मैं शरीक़े सफ़र न था जैसे, अब भी वैसी है दूरी ए मंज़िल साथ चलता हो रास्ता जैसे..!! - [दोस्ती को आम करना चाहता है...](https://bazmeshayari.com/dosti-ko-aam-karna-chahta-hai/): दोस्ती को आम करना चाहता है ख़ुद को नीलाम करना चाहता है, बेंच आया है घटा के हाथ सूरज दोपहर को शाम करना चाहता है, नौकरी पे बस नहीं जान पे तो होगा अब वो कोई काम करना चाहता है, उम्र भर ख़ुद से रहा नाराज़ लेकिन दूसरों को राम करना चाहता है, बेचता है सच भरे बाज़ार में वो ज़हर पी कर नाम करना चाहता है, मक़ता बे रंग कह कर महफ़िल में वो हुज्जत इतमाम करना चाहता है..!! - [मिलते है दोस्त क़िस्मत से ज़माने में...](https://bazmeshayari.com/milte-hai-dost-qismat-se/): मिलते है दोस्त क़िस्मत से ज़माने में हर एक होता नहीं क़ाबिल ए ऐतबार ज़माने में, ख़ुलूस के रिश्तों को जो निभाते है इखलास से पाते है वही खुशियाँ जहाँ भर की ज़माने में, खो देते है जो पुरखुलुस दोस्तों को बे ऐतबारी मे रहते है वो सदा बे सुकुन तिश्ना बाम ज़माने में, निभा कर तो देखो एक बार वफ़ा से दोस्ती का रिश्ता जान दे कर भी निभा देंगे रिश्ता वफ़ा का ज़माने में..!! - [हम एक ख़ुदा के बन्दे है और एक जहाँ में बसते है](https://bazmeshayari.com/hum-ek-khuda-ke-bande-hai/): हम एक ख़ुदा के बन्दे है और एक जहाँ में बसते है, रब भी जब चाहे हम साथ रहे फिर क्यों आपस में लड़ते है ? नफ़रत न हो किसी भी मज़हब से हो प्यार हमें बेहद सबसे, न दिल से किसी का सोंचे बुरा ना बोले बुरा हम अपने लब से, नफ़रत न हो दुनियाँ वालो से ना गोरो से ना कालो से, ना उनसे जो दुनियाँ छोड़ चले और ना अब आने वालो से, नफ़रत न हो किसी ज़ुबानो से किसी कौम के भी इंसानों से, उड़ते पंछी परवानो से ना धरती के सभी हैवानो से, हम सबसे - [झूठी हँसी तेरा मुस्कुराना झूठा...](https://bazmeshayari.com/jhuthi-hansi-tera-muskurana/): झूठी हँसी तेरा मुस्कुराना झूठा यार तेरा तो हर एक बहाना झूठा, कैसे ऐतबार करूँ फिर से तुझ पे तेरी दोस्ती झूठी तेरी याराना झूठा, तुझको क्या फ़र्क कोई जिये या मरे तेरा फ़िक्र ए फ़ाका यानि बेमानी झूठा, तेरा क्या ता’अल्लुक़ गम ए तन्हाई से तेरा पल पल अफ़सुर्दा बताना झूठा हमारी बर्बादी का रंज़ और तू करे झूठे अश्क तेरे मातम मनाना झूठा..!! - [आज के माहौल में इंसानियत बदनाम है...](https://bazmeshayari.com/aaj-ke-mahaul-me-insaniyat/): आज के माहौल में इंसानियत बदनाम है ये इनाद ए बाहमी का ही फ़क़त अंजाम है, हक़ शनासी का चलन हम में नहीं बाक़ी रहा सुब्ह अपनी पुर अलम है पुर ख़तर हर शाम है, हैफ़ बर्बादी ए गुलशन अपने ही हाथों हुई मुफ़्त में बाद ए ख़िज़ाँ के सर पे क्यूँ इल्ज़ाम है ? धुंधली धुंधली सी फ़ज़ा है मेहर और इख़्लास की अब रिफ़ाक़त आश्ती और दोस्ती गुमनाम है, तपते सहरा से तो बच कर आ गए थे हम मगर अब क़दम कैसे बढ़ाएँ पुर ख़तर हर गाम है, क्या गिरानी और अर्ज़ानी की हम बातें करें पानी - [तुख़्म ए नफ़रत बो रहा है आदमी...](https://bazmeshayari.com/tukhm-e-nafrat-bo-raha-hai/): तुख़्म ए नफ़रत बो रहा है आदमी आदमियत खो रहा है आदमी, ज़िंदगी का नाम है जेहद ए मुदाम सो रहा है सो रहा है आदमी, आगही है शर्त जीने के लिए फिर भी ग़ाफ़िल हो रहा है आदमी, चल सका न राह पर अस्लाफ़ की नक़्श ए पा अब खो रहा है आदमी, काशिफ़ ए ज़ात ए ख़ुदा था सरबसर अब नहीं है जो रहा है आदमी, अपने ही आ’माल पर पछता के अब रो रहा है रो रहा है आदमी, क़ंद गुफ़्तारी ऐ ‘मोहसिन’ अब कहाँ ज़हर आसा हो रहा है आदमी..!! ~दाऊद मोहसिन - [ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो...](https://bazmeshayari.com/zindagi-ye-to-nahi-tujhko/): ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो कुछ न कुछ हम ने तेरा क़र्ज़ उतारा ही न हो, दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी चौंक उठता हूँ कहीं तू ने पुकारा ही न हो, कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर सोचता हूँ तेरे आँचल का किनारा ही न हो, ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझको दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो, शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो..!! ~जाँ - [ज़िंदगी तुझ को भुलाया है बहुत दिन हमने...](https://bazmeshayari.com/zindagi-tujhko-bhulaya-hai/): ज़िंदगी तुझ को भुलाया है बहुत दिन हमने वक़्त ख़्वाबों में गँवाया है बहुत दिन हमने, अब ये नेकी भी हमें जुर्म नज़र आती है सब के ऐबों को छुपाया है बहुत दिन हमने, तुम भी इस दिल को दुखा लो तो कोई बात नहीं अपना दिल आप दुखाया है बहुत दिन हमने, मुद्दतों तर्क ए तमन्ना पे लहू रोया है इश्क़ का क़र्ज़ चुकाया है बहुत दिन हमने, क्या पता हो भी सके इसकी तलाफ़ी कि नहीं शायरी तुझ को गँवाया है बहुत दिन हमने..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [अगर सफ़र में मेरे साथ मेरा यार चले...](https://bazmeshayari.com/agar-safar-me-mere-sath/): अगर सफ़र में मेरे साथ मेरा यार चले तवाफ़ करता हुआ मौसम ए बहार चले, लगा के वक़्त को ठोकर जो ख़ाकसार चले यक़ीं के क़ाफ़िले हमराह बेशुमार चले, नवाज़ना है तो फिर इस तरह नवाज़ मुझे कि मेरे बाद मेरा ज़िक्र यहाँ बार बार चले, ये जिस्म क्या है, कोई पैरहन उधार का है यहीं संभाल के पहना और यहीं उतार चले, ये जुगनुओं से भरा आसमां जहाँ तक है वहाँ तलक तेरी नज़रों का इक़्तिदार चले, यही तो एक तमन्ना है इस मुसाफ़िर की जो तुम नहीं तो सफ़र में तुम्हारा प्यार चले..!! ~अलोक श्रीवास्तव - [बूढ़ा टपरा, टूटा छप्पर और उस पर बरसातें सच..](https://bazmeshayari.com/boodha-tapra-tuta-chhappar/): बूढ़ा टपरा, टूटा छप्पर और उस पर बरसातें सच उसने कैसे काटी होंगी, लंबी लंबी रातें सच, लफ़्जों की दुनियादारी में आँखों की सच्चाई क्या ? मेरे सच्चे मोती झूठे, उसकी झूठी बातें, सच, कच्चे रिश्ते, बासी चाहत, और अधूरा अपनापन मेरे हिस्से में आई हैं ऐसी भी सौग़ातें, सच, जाने क्यों मेरी नींदों के हाथ नहीं पीले होते पलकों से लौटी हैं कितने सपनों की बारातें, सच, धोखा खूब दिया है खुद को झूठे मूठे किस्सों से याद मगर जब करने बैठे याद आई हैं बातें सच..!! ~आलोक श्रीवास्तव - [ये नफ़रतो की सदाएँ, वतन का क्या होगा ?](https://bazmeshayari.com/ye-nafrato-kee-sadayen/): ये नफ़रतो की सदाएँ, वतन का क्या होगा ? हवा में आग बही, तो चमन का क्या होगा ? सफर नसीब मुसाफिर से ये सवाल न कर कहाँ सुकूं मिलेगा थकन का क्या होगा ? किसी के पास इबादत का आज वक्त नहीं हमारे बाद यहाँ फ़िक्र ओ फन का क्या होगा ? मिटा तो देंगे ये उम्मीद की लकीर मगर मेरी जमीन और तुम्हारे गगन का क्या होगा ? यही ख्याल तो दामन को थाम लेता है हम उठ गए तो तेरी अंजुमन का क्या होगा ? ~आलोक श्रीवास्तव - [ले गया दिल में दबा कर राज़ कोई...](https://bazmeshayari.com/le-gaya-dil-me-daba-kar/): ले गया दिल में दबा कर राज़ कोई पानियों पे लिख गया आवाज़ कोई, बाँध कर मेरे परो में मुश्किलों को हौसलों को दे गया परवाज़ कोई, नाम से जिसके है ये पहचान मेरी मुझमें उस जैसा भी हो अंदाज़ कोई, जिनका तारा था वो आँखे खो गई है अब कहाँ करता है मुझ पे नाज़ कोई, रोज़ उसको अपने अंदर खोजता हूँ रोज़ आना दिल से एक आवाज़ कोई..!! ~आलोक श्रीवास्तव - [सता लें हमको दिलचस्पी जो है उनकी सताने में...](https://bazmeshayari.com/sata-le-hamko-dilchaspi-jo-hai/): सता लें हमको दिलचस्पी जो है उनकी सताने में हमारा क्या वो हो जाएँगे रुस्वा ख़ुद ज़माने में, लड़ाएगी मेरी तदबीर अब तक़दीर से पंजा नतीज़ा चाहे जो कुछ हो मुक़द्दर आज़माने में, जिसे भी देखिए है गर्दिश ए हालात से नाला सुकुन ए दिल नहीं हासिल किसी को इस ज़माने में, वो गुलचीं हो कि बिजली सबकी आँखों में खटकते है यही दो चार तिनके जो है मेरे आशियाने में, है कुछ लोगो की खसलत नौ ए इंसा की दिल आज़ारी मज़ा मिलता है उनको दूसरो का दिल दुखाने में, अज़ब दस्तूर ए दुनियाँ ए मुहब्बत है, अरे तौबा - [हिज़रतो का ज़माना भी क्या ज़माना है...](https://bazmeshayari.com/hizrato-ka-zamana-bhi-kya/): हिज़रतो का ज़माना भी क्या ज़माना है उन्ही से दूर है जिनके लिए कमाना है, ख़ुशी ये है कि मेरे घर से फोन आया है सितम ये है कि मुझे खैरियत बताना है, हमें ये बात बहुत देर में समझ आई वही तो जाल बिछा है जहाँ भी दाना है, हमें जला नहीं सकती है धूप हिज़रत की हमारे सर पे ज़रूरत का शामियाना है, नमाज़ ईद की पढ़ कर मैं ढूँढता ही रहा कहीं दिखे कोई अपना गले लगाना है, वहीँ वहीँ लिए फिरती है गर्दिश ए दौराँ जहाँ जहाँ भी लिखा मेरा आब ओ दाना है..!! ~सय्यद सरोश - [समझ रहे थे कि अपनी सुधर गई दुनियाँ...](https://bazmeshayari.com/samjh-rahe-the-ki-apni-sudhar/): समझ रहे थे कि अपनी सुधर गई दुनियाँ हमें तो मुफ़्त में बदनाम कर गई दुनियाँ, मुतालबों से नहीं मिल सकी नजात कभी हवस के ज़िंदा तक़ाज़ों से भर गई दुनियाँ, हर एक आँख में चढ़ता हुआ अना का नशा हर एक हर्फ़ ए वफ़ा से मुकर गई दुनियाँ, असीर कर के तबाही के मुझ को दलदल में बताए कौन ये मुझ को किधर गई दुनियाँ, वो क्या हुए मेरे पुर कैफ़ पुर सुकूँ लम्हे मुझे तलाश है जिस की किधर गई दुनियाँ, कटी हुई है हर एक शाख़ पेड़ से ‘मोहसिन’ लो बर्ग ए ख़ुश्क सी अब के बिखर - [बीते रिश्ते तलाश करती है...](https://bazmeshayari.com/bite-rishte-talash-karti-hai/): बीते रिश्ते तलाश करती है ख़ुशबू गुंचे तलाश करती है, जब गुज़रती है उस गली से सबा ख़त के पुर्ज़े तलाश करती है, अपने माज़ी की जुस्तज़ू में बहार पीले पत्ते तलाश करती है, एक उम्मीद बार बार आ कर अपने टुकड़े तलाश करती है, बूढ़ी पगडंडी शहर तक आ कर अपने बेटे तलाश करती है..!! ~गुलज़ार - [अश्क ओ खूं घुलते है तब दीदा ए तर बनती है...](https://bazmeshayari.com/ashk-o-khoon-ghulte-hai/): अश्क ओ खूं घुलते है तब दीदा ए तर बनती है दास्ताँ इश्क़ में मरने से अमर बनती है, चीख़ पड़ता है मुसव्विर सभी रंगों के साथ कैनवस पर मेरी तस्वीर अगर बनती है, इतना आसान नहीं होता है दिन का आना डूब जाते है सितारे तो सहर बनती है, सबको हासिल तो है बीनाई की दौलत लेकिन देखने वाली तो मुश्किल से नज़र बनती है, टकटकी बाँध के बैठे है वही रातो में तेरी तस्वीर दीवारों पे जिधर बनती है, पूछते फिर रहे है शहर में अब तो जानी यार ! टूटी हुई तक़दीर किधर बनती है ? ~उमर - [सभी कहें मेरे गम ख़्वार के अलावा भी...](https://bazmeshayari.com/sabhi-kahen-mere-gamkhwar-ke/): सभी कहें मेरे गम ख़्वार के अलावा भी कोई तो बात करो यार के अलावा भी, बहुत से ऐसे सितमगर थे अब जो याद नहीं किसी हबीब दिल ए आज़ार के अलावा भी, ये क्या कि तुम भी सरेराह हाल पूछते हो कभी मिलो हमें बाज़ार के अलावा भी, उजाड़ घर में ये ख़ुशबू कहाँ से आई है कोई तो है दर ओ दीवार के अलावा भी, सो देख कर तेरे रुखसार ओ लब यकीं आया कि फूल खिलते है गुलज़ार के अलावा भी, कभी हमसे भी आ कर मिलो जो वक़्त मिले हमरा वज़ूद है अश’आर के अलावा भी..!! - [हर मुलाक़ात में लगते हैं वो बेगाने से...](https://bazmeshayari.com/har-mulaqat-me-lagte-hai/): हर मुलाक़ात में लगते हैं वो बेगाने से फ़ाएदा क्या है भला ऐसों के याराने से, कुछ जो समझा तो मुझे सब ने ही आशिक़ समझा बात ये ख़ूब निकाली मेरे अफ़्साने से, ज़िंदगी अपनी नज़र आने लगी सिर्फ़ सराब कभी गुज़रे जो दिल ए ज़ार के वीराने से, एक पल भी न ठहर पाओगे ऐ संगज़नो कोई पत्थर कभी लौट आया जो दीवाने से, तुम को मरना है तो मरना मेरे गुल होने पर शम्अ’ कहती रही शबभर यही परवाने से, फिर न देखा तुझे ऐ ‘जोश’ सुकूँ से बैठा जब से उठा है तू इस शोख़ के काशाने - [तुम हो जब मेरे लिए हैं दो जहाँ मेरे लिए...](https://bazmeshayari.com/tum-ho-jab-mere-liye/): तुम हो जब मेरे लिए हैं दो जहाँ मेरे लिए ये ज़मीं मेरे लिए ये आसमाँ मेरे लिए, इस तरह जज़्बात ए आज़ादी बहल जाएँगे क्या बन रहा है क्यूँ क़फ़स में आशियाँ मेरे लिए, मैं चला जाऊँ न गुलशन छोड़ कर क़ब्ल अज़ बहार क्यूँ गिरीं सारे चमन पर बिजलियाँ मेरे लिए , रो रहा हूँ आज मैं सारे जहाँ के वास्ते रोएगा कल देखना सारा जहाँ मेरे लिए, इज़्तिराब ए शौक़ से क्या क्या हुई हैं लग़्ज़िशें इल्तिफ़ात ए यार ने जब इम्तिहाँ मेरे लिए, है मोहब्बत कब रहीन ए राह ओ रस्म ए ताहिरी बंदगी है बेनियाज़ - [सर जिस पे न झुक जाए उसे दर नहीं कहते...](https://bazmeshayari.com/sar-jis-pe-na-jhuk-jaaye/): सर जिस पे न झुक जाए उसे दर नहीं कहते हर दर पे जो झुक जाए उसे सर नहीं कहते, का’बे में मुसलमान को कह देते हैं काफ़िर बुतख़ाने में काफ़िर को भी काफ़िर नहीं कहते, रिंदों को डरा सकते हैं क्या हज़रत ए वाइ’ज़ जो कहते हैं अल्लाह से डर कर नहीं कहते, का’बे ही में हर सज्दे को कहते हैं इबादत मयख़ाने में हर जाम को साग़र नहीं कहते, हर बार नए शौक़ से है अर्ज़ ए तमन्ना सौ बार भी हम कह के मुकर्रर नहीं कहते, मयख़ाने के अंदर भी वो कहते नहीं मयख़्वार जो बात कि - [मैं दहशतगर्द था मरने पे बेटा बोल सकता है...](https://bazmeshayari.com/main-dahshatgard-tha-marne-pe/): मैं दहशतगर्द था मरने पे बेटा बोल सकता है हुकूमत के इशारे पे तो मुर्दा बोल सकता है, यहाँ पर नफ़रतों ने कैसे कैसे गुल खिलाये हैं लुटी अस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है, हुकूमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है, कई चेहरे अभी तक मुँहज़बानी याद हैं इसको कहीं तुम पूछ मत लेना ये गूंगा बोल सकता है, बहुत सी कुर्सियाँ इस मुल्क में लाशों पे रखी हैं ये वो सच है जिसे झूठे से झूठा बोल सकता है, सियासत की कसौटी पर परखिये मत वफ़ादारी किसी दिन इंतक़ामन - [मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है...](https://bazmeshayari.com/muhabbat-karne-walo-me/): मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है, तवायफ़ की तरह अपने ग़लत कामों के चेहरे पर हुकूमत मंदिर ओ मस्जिद का पर्दा डाल देती है, हुकूमत मुँह भराई के हुनर से ख़ूब वाक़िफ़ है ये हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है, कहाँ की हिजरतें कैसा सफ़र कैसा जुदा होना किसी की चाह पैरों में दुपट्टा डाल देती है, ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती जुलती है कहीं भी शाख़े गुल देखे तो झूला डाल देती है, भटकती है हवस दिन रात सोने की दुकानों - [ये संसद है यहाँ भगवान का भी बस नहीं चलता...](https://bazmeshayari.com/ye-sansad-hai-yahan-bhagwan/): ये संसद है यहाँ भगवान का भी बस नहीं चलता जहाँ पीतल ही पीतल हो वहाँ पारस नहीं चलता, यहाँ पर हारने वाले की जानिब कौन देखेगा सिकन्दर का इलाक़ा है यहाँ पोरस नहीं चलता, दरिन्दे ही दरिन्दे हों तो किसको कौन देखेगा जहाँ जंगल ही जंगल हो वहाँ सरकस नहीं चलता, हमारे शहर से गंगा नदी हो कर गुज़रती है हमारे शहर में महुए से निकला रस नहीं चलता, कहाँ तक साथ देंगी ये उखड़ती टूटती साँसें बिछड़ कर अपने साथी से कभी सारस नहीं चलता, ये मिट्टी अब मेरे साथी को क्यों जाने नहीं देती ये मेरे साथ - [अजब दुनिया है नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं..](https://bazmeshayari.com/azab-duniyan-hai-naa-shayar/): अजब दुनिया है नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी चादर उठाते हैं, तुम्हारे शहर में मय्यत को सब काँधा नहीं देते हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं, इन्हें फ़िरक़ापरस्ती मत सिखा देना कि ये बच्चे ज़मीं से चूमकर तितली के टूटे पर उठाते हैं, समुन्दर के सफ़र से वापसी का क्या भरोसा है तो ऐ साहिल, ख़ुदा हाफ़िज़ कि हम लंगर उठाते हैं, ग़ज़ल हम तेरे आशिक़ हैं मगर इस पेट की ख़ातिर क़लम किस पर उठाना था क़लम किसपर उठाते हैं, बुरे चेहरों की जानिब देखने की हद - [उनसे मिलिए जो यहाँ फेर बदल वाले हैं...](https://bazmeshayari.com/unse-miliye-jo-yahan/): उनसे मिलिए जो यहाँ फेर बदल वाले हैं हमसे मत बोलिए हम लोग ग़ज़ल वाले हैं, कैसे शफ़्फ़ाफ़ लिबासों में नज़र आते हैं कौन मानेगा की ये सब वही कल वाले हैं, लूटने वाले उसे क़त्ल न करते लेकिन उसने पहचान लिया था की बग़ल वाले हैं, अब तो मिल जुल के परिंदों को रहना होगा जितने तालाब हैं सब नील कमल वाले हैं, यूँ भी एक फूस के छप्पर की हक़ीक़त क्या थी अब उन्हें ख़तरा है जो लोग महल वाले हैं, बेकफ़न लाशों के अम्बार लगे हैं लेकिन फ़ख्र से कहते हैं हम ताजमहल वाले हैं..!! ~मुनव्वर राना - [हर एक आवाज़ अब उर्दू को फ़रियादी बताती है..](https://bazmeshayari.com/har-ek-awaz-ab-urdu-ko/): हर एक आवाज़ अब उर्दू को फ़रियादी बताती है यह पगली फिर भी अब तक ख़ुद को शहज़ादी बताती है, कई बातें मुहब्‍बत सबको बुनियादी बताती है जो परदादी बताती थी वही दादी बताती है, जहाँ पिछले कई बरसों से काले नाग रहते हैं वहाँ एक घोंसला चि‍ड़‍ियों का था दादी बताती है, अभी तक यह इलाक़ा है रवादारी के क़ब्‍ज़े में अभी फ़‍िरक़ापरस्‍ती कम है आबादी बताती है, यहाँ वीरानियों की एक मुद्दत से हुकूमत है यहाँ से नफ़रतें गुज़री है बरबादी बताती है, लहू कैसे बहाया जाय यह लीडर बताते हैं लहू का ज़ायक़ा कैसा है यह खादी - [चराग़ अपनी थकन की कोई सफ़ाई न दे...](https://bazmeshayari.com/charag-apni-thakan-ki/): चराग़ अपनी थकन की कोई सफ़ाई न दे वो तीरगी है कि अब ख़्वाब तक दिखाई न दे, मसर्रतों में भी जागे गुनाह का एहसास मेरे वजूद को इतनी भी पारसाई न दे, बहुत सताते हैं रिश्ते जो टूट जाते हैं ख़ुदा किसी को भी तौफ़ीक़ ए आश्नाई न दे, मैं सारी उम्र अँधेरों में काट सकता हूँ मेरे दीयो को मगर रौशनी पराई न दे, अगर यही तेरी दुनिया का हाल है मालिक तो मेरी क़ैद भली है मुझे रिहाई न दे, दुआ ये माँगी है सहमे हुए मुअर्रिख़ ने कि अब क़लम को ख़ुदा सुर्ख़ रौशनाई न दे..!! - [एक टूटी हुई ज़ंजीर की फ़रियाद हैं हम...](https://bazmeshayari.com/ek-tuti-hui-zanjir-ki/): एक टूटी हुई ज़ंजीर की फ़रियाद हैं हम और दुनिया ये समझती है कि आज़ाद हैं हम, क्यूँ हमें लोग समझते हैं यहाँ परदेसी एक मुद्दत से इसी शहर में आबाद हैं हम, काहे का तर्क ए वतन काहे की हिजरत बाबा इसी धरती की इसी देश की औलाद हैं हम, हम भी तामीर ए वतन में हैं बराबर के शरीक दर ओ दीवार अगर तुम हो तो बुनियाद हैं हम, हम को इस दौर ए तरक़्क़ी ने दिया क्या ‘मेराज’ कल भी बर्बाद थे और आज भी बर्बाद हैं हम..!! ~मेराज फ़ैज़ाबादी - [जिस्म का बोझ उठाए हुए चलते रहिए...](https://bazmeshayari.com/zism-ka-bojh-uthaye-hue/): जिस्म का बोझ उठाए हुए चलते रहिए धूप में बर्फ़ की मानिंद पिघलते रहिए, ये तबस्सुम तो है चेहरों की सजावट के लिए वर्ना एहसास वो दोज़ख़ है कि जलते रहिए, अब थकन पाँव की ज़ंजीर बनी जाती है राह का ख़ौफ़ ये कहता है कि चलते रहिए, ज़िंदगी भीक भी देती है तो क़ीमत ले कर रोज़ फ़रियाद का अंदाज़ बदलते रहिए..!! ~मेराज फ़ैज़ाबादी - [दुनियाँ कहीं जो बनती है मिटती ज़रूर है...](https://bazmeshayari.com/duniyan-kahin-jo-banti-hai/): दुनियाँ कहीं जो बनती है मिटती ज़रूर है परदे के पीछे कोई न कोई ज़रूर है, जाते है लोग जा के फिर आते नहीं कभी दीवार के उस पार कोई बस्ती ज़रूर है, मुमकिन नहीं कि दर्द ए मुहब्बत अयाँ न हो खिलती है जब कली तो महकती ज़रूर है, ये जानते हुए कि पिघलता है रात भर ये शमअ का ज़िगर है कि जलती ज़रूर है, नागिन ही जानिए उसे दुनियाँ है जिसका नाम लाख आस्तीं में पालिए डसती ज़रूर है, जाँ दे भी ख़रीदो तो दुनियाँ न आये हाथ ये मुश्त ए खाक़ कहने को सस्ती ज़रूर है..!! - [तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए...](https://bazmeshayari.com/tu-gazal-ban-ke-utar/): तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए मुंतज़िर दिल की मुनाजात मुकम्मल हो जाए, उम्र भर मिलते रहे फिर भी न मिलने पाए इस तरह मिल कि मुलाक़ात मुकम्मल हो जाए, दिन में बिखरा हूँ बहुत रात समेटेगी मुझे तू भी आ जा तो मेरी ज़ात मुकम्मल हो जाए, नींद बन कर मेरी आँखों से मेरे ख़ूँ में उतर रतजगा ख़त्म हो और रात मुकम्मल हो जाए, मैं सरापा हूँ दुआ तू मेरा मक़सूद ए दुआ बात यूँ कर कि मेरी बात मुकम्मल हो जाए, अब्र आँखों से उठे हैं तेरा दामन मिल जाए हुक्म हो तेरा तो - [हाल ए दिल पे ही शायर बुनते है गज़ल...](https://bazmeshayari.com/haal-e-dil-pe-hi-shayar/): हाल ए दिल पे ही शायर बुनते है गज़ल जो बात दिल की समझते है वो सुनते है गज़ल, लिख दे जो मचल कर दास्ताँ ए दिल कोई कहने वाले यहाँ उसे ही तो कहते है गज़ल, दर्द जब अश्को से बयाँ न होने पाए ऐसे हालात को बयाँ करने को लिखते है गज़ल, क्या करना किसी बदगुमाँ दिल पे मर के अब मरते नहीं किसी पे हम जीते है गज़ल, कोई भी नशा रहता ही नहीं दो पल भी अब तो दीवान ए मीर से दीवाने पीते है गज़ल..!! - [दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह...](https://bazmeshayari.com/dard-se-mera-daman-bhar-de/): दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह, मैनें तुझसे चाँद सितारे कब माँगे रौशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह, सूरज सी एक चीज़ तो हम सब देख चुके सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह, या धरती के ज़ख़्मों पर मरहम रख दे या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह..!! ~क़तील शिफ़ाई - [बिखरे बिखरे सहमे सहमे रोज़ ओ शब देखेगा कौन...](https://bazmeshayari.com/bikhre-bikhre-sahme-sahme/): बिखरे बिखरे सहमे सहमे रोज़ ओ शब देखेगा कौन लोग तेरे जुर्म देखेंगे सबब देखेगा कौन ? हाथ में सोने का कासा ले के आए हैं फ़क़ीर इस नुमाइश में तेरा दस्त ए तलब देखेगा कौन ? ला उठा तेशा चट्टानों से कोई चश्मा निकाल सब यहाँ प्यासे हैं तेरे ख़ुश्क लब देखेगा कौन ? दोस्तों की बेग़रज़ हमदर्दियाँ थक जाएँगी जिस्म पर इतनी ख़राशें हैं कि सब देखेगा कौन ? शायरी में ‘मीर’ ओ ‘ग़ालिब’ के ज़माने अब कहाँ शोहरतें जब इतनी सस्ती हों अदब देखेगा कौन ?? ~मेराज फ़ैज़ाबादी - [ये विसाल ओ हिज़्र का मसअला तो...](https://bazmeshayari.com/ye-visal-o-hizr-ka-masala/): ये विसाल ओ हिज़्र का मसअला तो मेरी समझ में न आ सका कभी कोई मुझको न पा सका कभी मैं किसी को न पा सका, कई बस्तियों को उलट चुका कोई ताब इसकी न ला सका मगर आँधियों का ये सिलसिला तेरा नक्श ए पा न मिटा सका, मेरी दास्ताँ भी अज़ीब है वो क़दम क़दम मेरे साथ था जिसे राज़ ए दिल न बता सका जिसे दाग़ ए दिल न दिखा सका, न ही बिजलियाँ न ही बारिशें न ही दुश्मनों की वो साजिशें भला क्या सबब है बता ज़रा जो तू आज भी नहीं आ सका, कभी - [हम ग़ज़ल में तेरा चर्चा नहीं होने देते...](https://bazmeshayari.com/ham-gazal-me-tera/): हम ग़ज़ल में तेरा चर्चा नहीं होने देते तेरी यादों को भी रुस्वा नहीं होने देते, कुछ तो हम ख़ुद भी नहीं चाहते शोहरत अपनी और कुछ लोग भी ऐसा नहीं होने देते, अज़मते अपने चराग़ों की बचाने के लिए हम किसी घर में उजाला नहीं होने देते, आज भी गाँव में कुछ कच्चे मकानों वाले घर में हम साए के फ़ाक़ा नहीं होने देते, ज़िक्र करते हैं तेरा नाम नहीं लेते हैं हम समुंदर को जज़ीरा नहीं होने देते, मुझ को थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़ मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते..!! ~मेराज फ़ैज़ाबादी - [मेरे थके हुए शानों से बोझ उतर तो गया...](https://bazmeshayari.com/mere-thake-hue-shano-se/): मेरे थके हुए शानों से बोझ उतर तो गया बहुत तवील था ये दिन मगर गुज़र तो गया, लगा के दाव पे साँसों की आख़िरी पूँजी वो मुतमइन है चलो हारने का डर तो गया, कसी गुनाह की परछाइयाँ थीं चेहरे पर समझ न पाया मगर आइने से डर तो गया, ये और बात कि काँधों पे ले गए हैं उसे किसी बहाने से दीवाना आज घर तो गया..!! ~मेराज फ़ैज़ाबादी - [थकी हुई मामता की क़ीमत लगा रहे हैं...](https://bazmeshayari.com/thaki-hui-mamta-ki/): थकी हुई मामता की क़ीमत लगा रहे हैं अमीर बेटे दुआ की क़ीमत लगा रहे हैं, मैं जिन को उँगली पकड़ के चलना सिखा चुका हूँ वो आज मेरे असा की क़ीमत लगा रहे हैं, मेरी ज़रूरत ने फ़न को नीलाम कर दिया है तो लोग मेरी अना की क़ीमत लगा रहे हैं, मैं आँधियों से मुसालहत कैसे कर सकूँगा चराग़ मेरे हवा की क़ीमत लगा रहे हैं, यहाँ पे ‘मेराज’ तेरे लफ़्ज़ों की आबरू क्या ये लोग बाँग ए दरा की क़ीमत लगा रहे हैं..!! ~मेराज फ़ैज़ाबादी - [तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं...](https://bazmeshayari.com/tum-pucho-aur-main-naa/): तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं, किस को ख़बर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं सावन आया लेकिन अपनी क़िस्मत में बरसात नहीं, टूट गया जब दिल तो फिर ये साँस का नग़्मा क्या मा’नी गूँज रही है क्यूँ शहनाई जब कोई बारात नहीं, ग़म के अँधियारे में तुझको अपना साथी क्यूँ समझूँ ? तू फिर तू है मेरा तो साया भी मेरे साथ नहीं, माना जीवन में औरत एक बार मोहब्बत करती है लेकिन मुझ को ये तो बता दे क्या तू - [आज कुछ बात है जो ज़िद पे अड़े हैं कुत्ते...](https://bazmeshayari.com/aaj-kuch-baat-hai-jo/): आज कुछ बात है जो ज़िद पे अड़े हैं कुत्ते जाने क्यूँ अपने ही मालिक पे चढ़े हैं कुत्ते, बज़्म अदबी तो नज़ाक़त से शराफ़त से भी उस मुहल्ले से मुहल्ले के लड़े हैं कुत्ते, ये तो अच्छा है सनद् इनको नहीं मिल पाया वरना एल.एल.बी. एल.एल.एम. पढ़े हैं कुत्ते, देर तक दूर तक आई जो यहाँ बदबू ऐसा लगता है कि बहुत पास सड़े हैं कुत्ते, आदमी आदमी का साथ भले दे न दे यूँ वफादारी में हर मील जड़े हैं कुत्ते, यार मालिक को बचाना है, मुसीबत भारी बाँध कर पट्टा अदालत में खड़े हैं कुत्ते, वोट की - [ज़रीदे में छपी है एक ग़ज़ल दीवान जैसा है...](https://bazmeshayari.com/zaride-me-chhapi-hai/): ज़रीदे में छपी है एक ग़ज़ल दीवान जैसा है ग़ज़ल का फ़न अभी भी रेत के मैदान जैसा है, मिला मैं उससे हाँ साया मेरा बढ़ता रहा आगे सफ़र में हमसफ़र भी आजतक हैरान जैसा है, नहीं दिखते उछलते, खेलते, हंसते हुए बच्चे मोहल्ला इस नई तहज़ीब में शमशान जैसा है, नज़र को देखकर ये दाद भी अच्छी नहीं लगती मुकर्रर लफ़्ज़ तेरे होंठ पे एक दान जैसा है, नई बस्ती, नये मौसम मगर हूँ कौल का पक्का यहां पे गुफ़्तगू करना मुझे अपमान जैसा है, फिसल जाता है पल भर में चमक को देखकर पीली तेरा ईमान भी लगता - [ज़िन्दगी बस एक ये लम्हा मुझे भी भा गया...](https://bazmeshayari.com/zindagi-bas-ek-ye-lamha/): ज़िन्दगी बस एक ये लम्हा मुझे भी भा गया आज बेटे के बदन पर कोट मेरा आ गया, भोर की पहली किरन बरगद तले झोंका नया जिस्म सारा ओस की बूंदों से यूँ नहला गया, हूँ बहुत ही खुश बुढ़ापे में बहू बेटों के संग चाहतों का एक नया मौसम मुझे हर्षा गया, दुश्मनी मुझको विरासत में मिली थी, खेत भी क़ातिलों से मिलके लौटा गांवभर में छा गया, ये अलग है खिल नहीं पाया चमन पूरी तरह मेरा जादू शाख़ पर कुछ सुर्खियां तो ला गया, बेवकूफी जल्दबाजी में चुना सरदार था खेत की ही मेड़ जैसा खेत को - [समझता खूब है वो भी बयान की कीमत...](https://bazmeshayari.com/samjhta-khoob-hai-wo-bhi/): समझता खूब है वो भी बयान की कीमत चुका रहा है जो अब भी ज़ुबान की कीमत, इसी मुकाम पे समझा तमाम रिश्तों को लगा रहा हूँ जब अपने मकान की कीमत, बड़ा ग़ुरूर, बड़ी हैसियत, बड़ी बातें अकाल हो तो समझते हैं धान की कीमत, किसी ने माना किसी ने कभी नहीं माना गिराई फिर भी सभी ने पुरान की कीमत, नहीं चला सके एक तीर भी निशाने पर वही लगाते हैं अक्सर कमान की कीमत, लहू बहाओ भले रोज़ रोज़ कितना ही तुम्हें चुकाना ही होगा क़ुरान की कीमत, तुम्हारे वास्ते एक वोट हैं महज़ अब भी लगा - [ज़िन्दगी दी है तो जीने का हुनर भी देना...](https://bazmeshayari.com/zindagi-dee-hai-to-jine-ka/): ज़िन्दगी दी है तो जीने का हुनर भी देना पाँव बख्शे है तो तौफ़ीक ए सफ़र भी देना, गुफ़्तगू तू ने सिखाई है कि मैं गूँगा था अब मैं बोलूँगा तो बातों में असर भी देना, मैं तो इस खाना बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन अगली नस्ले तो भटके उन्हें घर भी देना, ज़ुल्म और सब्र का ये खेल मुक़म्मल हो जाए उसको खंज़र जो दिया है मुझे सर भी देना..!! ~मेराज फ़ैज़ाबादी - [काँटे ही चुभन दे ज़रूरी तो नहीं...](https://bazmeshayari.com/kaante-hi-chubhan-de/): काँटे ही चुभन दे ज़रूरी तो नहीं फूल भी नश्तर चभोते है, बारिश ही भिगोए तन मन ज़रूरी तो नहीं आँसू भी दामन भिगोते है, तूफान ही डुबोए कश्ती ज़रूरी तो नहीं माझी भी नाव डुबोते है, हमेशा साथ हो कारवाँ ज़रूरी तो नहीं रास्ते भी हमसफ़र होते है, हर मुसाफ़िर को मिले मंज़िल ज़रूरी तो नहीं कुछ ताउम्र मुसाफ़िर ही रहते है, दिल की बात पहुँचे लबो तक ज़रूरी तो नहीं ख़ामोश लम्हे भी बोलते है, गुम्बदो की ही हो पूजा ज़रूरी तो नहीं नीव के पत्थर भी इबादत के क़ाबिल होते है..!! - [दुश्मन मेरी ख़ुशियों का ज़माना ही नहीं था...](https://bazmeshayari.com/dushman-meri-khushiyo-ka/): दुश्मन मेरी ख़ुशियों का ज़माना ही नहीं था तुमने भी कभी अपना तो जाना ही नहीं था, क्या करते अकेले में सजा कर महफ़िल जब शहर में किसी ने पहचाना ही नहीं था, दिल ने तो बहुत चाहा मगर किस तरह जीते ? ज़िन्दगी के वास्ते पास अपने कोई बहाना ही नहीं था, मुड़ मुड़ के देखता रहा मैं उम्र भर मगर तुम आये नहीं, तुम्हे तो आना ही नहीं था, अब झुक कर मेरी लाश को झिंझोड़ रही हो क्या ? जैसे कि तेरी दुनियाँ से मुझे जाना ही नहीं था..!! - [ज़ख्म ए तन्हाई में ख़ुशबू ए हिना किसकी थी...](https://bazmeshayari.com/zakhm-e-tanhai-me/): ज़ख्म ए तन्हाई में ख़ुशबू ए हिना किसकी थी साया दीवार पे मेरा था, सदा किसकी थी ? आँसूओ से ही सही भर गया दामन मेरा हाथ तो मैंने उठाए थे, दुआ किसकी थी ? मेरी आहों की ज़बां कोई समझता कैसे ज़िन्दगी इतनी दुखी मेरे सिवा किसकी थी ? छोड़ दी किसके लिए तूने ये दुनियाँ ए फ़ानी जुस्तज़ू सी तुझे हर वक़्त बता किसकी थी ? उसकी रफ़्तार से लिपटी रहती मेरी आँखे उसने मुड़ कर भी न देखा कि वफ़ा किसकी थी..!! ~मुज़फ़्फ़र वारसी - [ना जाने कैसी तक़दीर पाई है...](https://bazmeshayari.com/naa-jaane-kaisi-taqdeer/): ना जाने कैसी तक़दीर पाई है जो आया आज़मा के चला गया, कल तक गले लगाने वाला भी आज बस हाथ हिला के चला गया, क्या अपना कहे उसे जो हमें रोता देख मुस्कुरा के चला गया, हमने पूछा कि कब आओगे वापस बस हल्का सा सर हिला के चला गया, वो मेरा जिसे मैं सुकून कहता था मेरी ज़िन्दगी में आग लगा के चला गया, ये कैसा चारासाज़ मिला हमें जो इलाज़ के नाम पर रोग लगा के चला गया..!! - [कभी राहो में मिली होगी तू...](https://bazmeshayari.com/kabhi-raaho-me-mili-hogi/): कभी राहो में मिली होगी तू तुझे मैंने कभी देखा तो होगा, हर दिल कुछ कहता है इस दिल ने भी कुछ कहा तो होगा, कुछ अरमान निकले होंगे इस दिल से कुछ तुमने सुना तो होगा, याद कभी आई तो होगी मेरी तेरा दिल भी कभी तड़पा तो होगा, आशियाना कभी बन न सका हमारा तेरा महल भी कभी टूटा तो होगा, कभी देखा तो होगा तुमने भी मुझे पलट के दिल तुम्हारा दोबारा कभी धड़का तो होगा, क्या कहे तेरी ज़ालिमाना अदाओं को इन अदाओ से किसी का दम निकला तो होगा..!! - [सफ़र है धूप का इसमें क़याम थोड़ी है...](https://bazmeshayari.com/safar-hai-dhoop-ka/): सफ़र है धूप का इसमें क़याम थोड़ी है बला है इश्क़ ये बच्चों का काम थोड़ी है, किसी को वस्ल है बोझल कोई फ़िराक़ में ख़ुश दिलों के खेल में कोई निज़ाम थोड़ी है, हमारे दिल में धड़कता है नाम उस का अभी है ये शुरू ए मोहब्बत तमाम थोड़ी है, जो अहल ए इश्क़ हैं मंज़िल का ग़म नहीं करते ये ख़ास लोगों का रस्ता है आम थोड़ी है, हम अपने मन की करेंगे बुरा लगे कि भला हमारा दिल है तुम्हारा ग़ुलाम थोड़ी है, तुम्हारी याद जो आई तो आ गए मिलने वरना तुम से हमें कोई काम - [तनाव में जब आ जाए तो धागे टूट जाते है...](https://bazmeshayari.com/tanav-me-jab-aa-jaaye/): तनाव में जब आ जाए तो धागे टूट जाते है ज़रा सी बात पर पुराने रिश्ते टूट जाते है, तुम्हे इस बात पर हैरत कि टूटा है हमारा दिल मुक़ाबिल जब के हो पत्थर तो शीशे टूट जाते है, गुज़रते वक़्त से चीजें पुरानी हो ही जाती है दिलो में मैल पड़ती है तो जज़्बे टूट जाते है, हज़ारों ख्वाहिशे तरतीब पाती है ख्यालो में मगर जब आँख खुलती है तो सपने टूट जाते है, उमड़ आते है झुर्रियो में हज़ारों दुःख ज़माने के गुज़र के उम्र के हिस्से से चेहरे टूट जाते है, ना जाने क्यों तुम्हारी याद आती - [अंधेरा ज़ेहन का सम्त ए सफ़र जब खोने लगता है...](https://bazmeshayari.com/andhera-zehan-ka-samt/): अंधेरा ज़ेहन का सम्त ए सफ़र जब खोने लगता है किसी का ध्यान आता है उजाला होने लगता है, वो जितनी दूर हो उतना ही मेरा होने लगता है मगर जब पास आता है तो मुझ से खोने लगता है, किसी ने रख दिए ममता भरे दो हाथ क्या सर पर मेरे अंदर कोई बच्चा बिलक कर रोने लगता है, मोहब्बत चार दिन की और उदासी ज़िंदगी भर की यही सब देखता है और ‘कबीरा’ रोने लगता है, समझते ही नहीं नादान कै दिन की है मिल्कियत पराए खेतों पे अपनों में झगड़ा होने लगता है, ये दिल बच कर - [दुनियाँ जिसे कहते है जादू का खिलौना है...](https://bazmeshayari.com/duniyan-jise-kahte-hai/): दुनियाँ जिसे कहते है जादू का खिलौना है मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है, अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम हर वक़्त आये रोना तो बेकार का रोना है, बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने ? किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है, गम हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी है फिर रास्ता ही रास्ता है हँसना है, रोना है..!! ~निदा फाज़ली - [कोई दर्द कोई ख़ुशी कोई अरमान अब नहीं...](https://bazmeshayari.com/koi-dard-koi-khushi-koi/): कोई दर्द कोई ख़ुशी कोई अरमान अब नहीं ज़िस्म तो है मगर जान अब नहीं, जिस कदर था साथ वो उस कदर जुदा हुआ कोई फ़ासलो के भी दरमियान अब नहीं, है सफ़र वही, है रस्ते भी वही मेरे साथ तेरे कदमो के निशान अब नहीं, इश्क़ के जूनून में एक बागपन तो था अब गिला है कि कोई इम्तिहान अब नहीं, कौन साथ देता है यहाँ मौत के सिवा इतना वफ़ादार तो इन्सान अब नहीं..!! - [ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा...](https://bazmeshayari.com/zindagi-yun-hui-basar/): ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा काफ़िला साथ और सफ़र तन्हा, अपने साये से चौक जाते है उम्र गुज़री है इस कदर तन्हा, रात भर बोलते है सन्नाटे रात काटे कोई किधर तन्हा, दिन गुज़रता नहीं है लोगो में रात होती नहीं बसर तन्हा, हमने दरवाज़े तक तो देखा था फिर न जाने गए किधर तन्हा..!! ~गुलज़ार - [काँटो की चुभन पे फूलो का मज़ा भी...](https://bazmeshayari.com/kaanto-kee-chubhan-pe/): काँटो की चुभन पे फूलो का मज़ा भी दिल दर्द के मौसम में रोया भी हँसा भी, आने का सबब याद न जाने की ख़बर है वो दिल में रहा और उसे तोड़ गया भी, हर एक से मंज़िल का पता पूछ रहा है गुमराह मेरे साथ हुआ रहनुमा भी, दोस्तों कभी अपनों से जो गम हुए हासिल कुछ याद रहा उनमे कुछ भूल गया भी..!! - [कुछ भी हो वो अब दिल से जुदा हो नहीं सकते...](https://bazmeshayari.com/kuch-bhi-ho-wo-ab/): कुछ भी हो वो अब दिल से जुदा हो नहीं सकते हम मुजरिम ए तौहीन ए वफ़ा हो नहीं सकते, ऐ मौज ए हवादिस तुझे मालूम नहीं क्या हम अहल ए मोहब्बत हैं फ़ना हो नहीं सकते, इतना तो बता जाओ ख़फ़ा होने से पहले वो क्या करें जो तुम से ख़फ़ा हो नहीं सकते, एक आप का दर है मेरी दुनिया ए अक़ीदत ये सज्दे कहीं और अदा हो नहीं सकते, अहबाब पे दीवाने ‘असद’ कैसा भरोसा ये ज़हर भरे घूँट रवा हो नहीं सकते..!! ~असद भोपाली - [जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई...](https://bazmeshayari.com/jab-zindagi-sukun-se/): जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई उन की निगाह और भी मासूम हो गई, हालात ने किसी से जुदा कर दिया मुझे अब ज़िंदगी से ज़िंदगी महरूम हो गई, क़ल्ब ओ ज़मीर बेहिस ओ बेजान हो गए दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द से महरूम हो गई, उन की नज़र के कोई इशारे न पा सका मेरे जुनूँ की चारों तरफ़ धूम हो गई, कुछ इस तरह से वक़्त ने लीं करवटें ‘असद’ हँसती हुई निगाह भी मग़्मूम हो गई..!! ~असद भोपाली - [तुम दूर हो तो प्यार का मौसम न आएगा...](https://bazmeshayari.com/tum-door-ho-to-pyar/): तुम दूर हो तो प्यार का मौसम न आएगा अब के बरस बहार का मौसम न आएगा, चूमूँगा किसकी ज़ुल्फ़ घटाओं को देख कर एक जुर्म ए ख़ुश गवार का मौसम न आएगा, छलके शराब बर्क़ गिरे या जलें चराग़ ज़िक्र ए निगाह ए यार का मौसम न आएगा, वादा ख़िलाफ़ियों को तरस जाएगा यक़ीं रातों को इंतिज़ार का मौसम न आएगा, तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी हो जाएगी तवील एहसास के निखार का मौसम न आएगा..!! ~असद भोपाली - [ज़िंदगी का हर नफ़स मम्नून है तदबीर का...](https://bazmeshayari.com/zindagi-ka-har-nafas/): ज़िंदगी का हर नफ़स मम्नून है तदबीर का वाइज़ो धोखा न दो इंसान को तक़दीर का, अपनी सन्नाई की तुझ को लाज भी है या नहीं ऐ मुसव्विर देख रंग उड़ने लगा तस्वीर का, आप क्यूँ घबरा गए ये आप को क्या हो गया ? मेरी आहों से कोई रिश्ता नहीं तासीर का, दिल से नाज़ुक शय से कब तक ये हरीफ़ाना सुलूक देख शीशा टूटा जाता है तेरी तस्वीर का, हर नफ़स की आमद ओ शुद पर ये होती है ख़ुशी एक हल्क़ा और भी कम हो गया ज़ंजीर का, फ़र्क़ इतना है कि तू पर्दे में और मैं - [गर हक़ चाहते हो तो फिर जंग लड़ो...](https://bazmeshayari.com/gar-haq-chahte-ho-to-fir/): गर हक़ चाहते हो तो फिर जंग लड़ो गुहार लगाने से कहाँ ये निज़ाम बदलेगा, छाँव ढूँढ़ते हो, बड़े परेशां धूप से हो दरख़्त लगाओ तो ये इंतजाम बदलेगा, हमेशा यूँ ही रहेंगे तख़्तनशी देखो हुक्मरानों का यहाँ फ़क़त नाम बदलेगा, अब कोई क़िरदार नया तलाश करो तो इस कहानी का अब अंज़ाम बदलेगा, पोशाक ज़रा कीमती तुम पहन के आओ फिर देखना साक़ी तुम्हारा ज़ाम बदलेगा, ये दौर सौदेबाज़ी है इसका ख्याल रखना चेहरा देख कर हर बार यहाँ ईनाम बदलेगा, जगह इबादत की बदल देने से यकीं जानो ना अल्लाह बदला है, ना कभी राम बदलेगा..!! - [जाने क्यूँ अब शर्म से चेहरे गुलाब नहीं होते...](https://bazmeshayari.com/jaane-kyun-ab-sharm-se/): जाने क्यूँ अब शर्म से चेहरे गुलाब नहीं होते जाने क्यूँ अब मस्त मौला मिजाज़ नहीं होते, पहले बता दिया करते थे दिल की बातें जाने क्यूँ अब चेहरे खुली क़िताब नहीं होते, सुना है बिन कहे दिल की बात समझ लेते थे गले लगते ही दोस्त हालात समझ लेते थे, तब ना फेसबुक था ना समार्ट फोन ना ट्विटर एक ख़त से ही दिलो के जज़्बात समझ लेते थे, सोचता हूँ हम कहाँ से कहाँ आ गए व्यावहारिकता सोचते सोचते भावनाओं को खा गए, अब भाई भाई से समस्या का समाधान कहाँ पूछता है ? अब बेटा बाप से - [मुफ़लिसी में दिन बिताते है यहाँ...](https://bazmeshayari.com/muflisi-me-din-bitate-hai/): मुफ़लिसी में दिन बिताते है यहाँ फिर भी सपने हम सजाते है यहाँ, मज़हबी बातें उठा कर लोग कुछ आपसी झगड़े बढ़ाते है यहाँ, दूसरो के गम को है कम आँकते अपने गम में छटपटाते है यहाँ, झूठी बातों का ढिंढोरा पिट कर सच से कैसे मुँह छुपाते है यहाँ, ज़िन्दगी भर साथ रह कर भी अलग रिश्ते इस तरह भी निभाते है यहाँ, अपने गिरेबाँ में कोई झाँकता नहीं बस गैरो पे सब मुस्कुराते है यहाँ..!! - [झूठी बाते झूठे लोग, सहते रहेंगे सच्चे लोग...](https://bazmeshayari.com/jhuthi-baaten-jhuthe-log/): झूठी बाते झूठे लोग, सहते रहेंगे सच्चे लोग हरियाली पर बोलेंगे, सावन के सब अँधे लोग, दो कौड़ी में महँगे है, किरदारों के सस्ते लोग मेरी गुज़ारिश क्या सुनते ? ऊँचे कद के छोटे लोग, गैर तो आँसू पोछेंगे, धोखा देंगे अपने लोग एक जगह कम ही मिलते है, इतने सारे अच्छे लोग, इस जीवन में घूम चुके आधी दुनियाँ पूरे लोग बरसो में फिर देखेंगे भोले भाले प्यारे लोग, सदियों पहले होते थे अपनी धुन के पक्के लोग हर महफ़िल में करते है ओछी हरकत ओछे लोग..!! - [न मिली छाँव कहीं, यूँ तो कई शज़र मिले...](https://bazmeshayari.com/na-mili-chhavn-kahi-yun/): न मिली छाँव कहीं, यूँ तो कई शज़र मिले वीरान ही मिले सफ़र में जो भी शहर मिले, मंज़िल मिले न मिले मुझे कोई परवाह नहीं मुझे तलाश है जिसकी उसको ख़बर मिले, हर गुनाह इन्सान के चेहरे पर दर्ज़ रहता है देखना अगर किसी रोज़ आईने से नज़र मिले, छोटी सी बात का लोग फ़साना बना देते है अब कैसे यहाँ किसी से कोई खुल कर मिले, सबको मिला कुछ न कुछ ख़ास क़ुदरत से फूलो को मिली ख़ुशबू, परिंदों को पर मिले, बहुत मुश्किल से मिलता है कोई चाहने वाला खोना मत, तुम्हे कोई शख्स ऐसा अगर मिले..!! - [रौनक तुम्हारे दम से है लैल ओ नहार की...](https://bazmeshayari.com/raunak-tumhare-dam-se/): रौनक तुम्हारे दम से है लैल ओ नहार की तुम आबरू हो आमद ए फ़सल ए बाहर की, लफ्ज़ो में हम बयाँ नहीं कर पाएँगे कभी कैसे सहर हुई है शब ए इंतज़ार की, आ जा कि तेरे अहद ए वफ़ा का भरम रहे रह जाए आबरू भी मेरे ऐतबार की, हर मौज़ पर लिखा है मेरा हाल जान ए मन क्या कैफ़ियत बताऊँ दिल ए बेक़रार की, हम तुम से दूर रह के तुम्हारे है आज भी हमने तो ऐसी रित निभाई है प्यार की, अहल ए चमन की आँख से आँसू निकल पड़े मौसम ने रुखसती जो सुनाई - [हर रिश्ता यहाँ बस चार दिन की कहानी है...](https://bazmeshayari.com/har-rishta-yahan-bas/): हर रिश्ता यहाँ बस चार दिन की कहानी है अंज़ाम ए वफ़ा का सिला आँखों से बहता पानी है, उफ्फ ये इश्क़ के किस्से ये दोस्ती के नग्मे रेत की दीवारे है सब एक दिन ढह ही जानी है, लुटाओ जो लुटा सको मुस्कुराहटे तुम यहाँ उधार की है ये ज़िन्दगी और साँसे आनी जानी है, पानी पर खींची लकीरें है या ये तकदीरे है ना ये बनती है कभी ना रहती कोई निशानी है, हर रिश्ता यहाँ बस चार दिन की कहानी है अंज़ाम ए वफ़ा का सिला आँखों से बहता पानी है..!! - [तलब की राहों में सारे आलम नए नए से...](https://bazmeshayari.com/talab-ki-raaho-me-saare/): तलब की राहों में सारे आलम नए नए से शजर हजर लोग शहर मौसम नए नए से, चमक रहा था फ़लक पे सूरज नया नया सा लुटा चुकी थी ख़ज़ाने शबनम नए नए से, हैं अब भी आँखों के दीदबानों में अपनी वो दिन लगे दियार ए सहर को जब हम नए नए से, तमव्वुजों की रगों में शोरिश नई नई सी लहू के झगड़े बदन में पैहम नए नए से, पुराने होते हुए सहीफ़े दरख़्त इंसाँ ये चाँद सूरज सितारे हर दम नए नए से, कभी तो आएँगे शाख़ ए दिल पर गुलाब ताज़ा मिलेंगे ‘असद’ हमें भी मौसम - [सुख़नवरी का बहाना बनाता रहता हूँ...](https://bazmeshayari.com/sukhanwari-ka-bahana/): सुख़नवरी का बहाना बनाता रहता हूँ तेरा फ़साना तुझी को सुनाता रहता हूँ, मैं अपने आप से शर्मिंदा हूँ न दुनिया से जो दिल में आता है होठों पे लाता रहता हूँ, पुराने घर की शिकस्ता छतों से उकता कर नए मकान का नक़्शा बनाता रहता हूँ, मेरे वजूद में आबाद हैं कई जंगल जहाँ मैं हूँ की सदाएँ लगाता रहता हूँ, मेरे ख़ुदा यही मसरूफ़ियत बहुत है मुझे तेरे चराग़ जलाता बुझाता रहता हूँ..!! ~असद बदायुनी - [सियाह रात से हम रौशनी बनाते हैं...](https://bazmeshayari.com/siyah-raat-se-ham-raushni/): सियाह रात से हम रौशनी बनाते हैं पुरानी बात को अक्सर नई बनाते हैं, कल एक बच्चे ने हमसे कहा बनाओ घर सो हम ने कह दिया ठहरो अभी बनाते हैं, हम एक और ही मंज़र की ताक में हैं मियाँ ये धूप छाँव के नक़्शे सभी बनाते हैं, मुसव्विरान ए फ़ना अपने कैनवस पे कभी न कोई शहर न कोई गली बनाते हैं, हम उस दयार में ज़िंदा हैं जिस के सारे लोग कभी फ़तीला कभी लबलबी बनाते हैं..!! ~असद बदायुनी - [शाख़ से फूल से क्या उस का पता पूछती है...](https://bazmeshayari.com/shakh-se-fool-se-kya-uska/): शाख़ से फूल से क्या उसका पता पूछती है या फिर इस दश्त में कुछ और हवा पूछती है, मैं तो ज़ख़्मों को ख़ुदा से भी छुपाना चाहूँ किस लिए हाल मेरा ख़ल्क़ ए ख़ुदा पूछती है, चश्म ए इंकार में इक़रार भी हो सकता था छेड़ने को मुझे फिर मेरी अना पूछती है, तेज़ आँधी को न फ़ुर्सत है न ये शौक़ ए फ़ुज़ूल हाल ग़ुंचों का मोहब्बत से सबा पूछती है, किसी सहरा से गुज़रता है कोई नाक़ा सवार और मिज़ाज उसका हवा सब से जुदा पूछती है..!! ~असद बदायुनी - [भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ ?](https://bazmeshayari.com/bhookh-hai-to-sabr-kar/): भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ ? आजकल दिल्ली में है ज़ेर ए बहस ये मुदद्आ, मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ, गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ, क्या वज़ह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहाँ लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुँआ, आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला, इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो जब तलक - [परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं...](https://bazmeshayari.com/parinde-ab-bhi-par-tole/): परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं हवा में सनसनी घोले हुए हैं, तुम्हीं कमज़ोर पड़ते जा रहे हो तुम्हारे ख़्वाब तो शोले हुए हैं, ग़ज़ब है सच को सच कहते नहीं वो क़ुरान ओ उपनिषद् खोले हुए हैं, मज़ारों से दुआएँ माँगते हो अक़ीदे किस क़दर पोले हुए हैं, हमारे हाथ तो काटे गए थे हमारे पाँव भी छोले हुए हैं, कभी किश्ती, कभी बतख़, कभी जल सियासत के कई चोले हुए हैं, हमारा क़द सिमट कर मिट गया है हमारे पैरहन झोले हुए हैं, चढ़ाता फिर रहा हूँ जो चढ़ावे तुम्हारे नाम पर बोले हुए हैं..!! ~दुष्यंत कुमार - [इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है...](https://bazmeshayari.com/is-nadi-ki-dhaar-se-thandi/): इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है, एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है, एक खँडहर के हृदय सी एक जंगली फूल सी आदमी की पीर गूँगी ही सही गाती तो है, एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है, निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी पत्थरों से ओट में जा जा के बतियाती तो है, दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर - [कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं...](https://bazmeshayari.com/kaise-manzar-samne-aane/): कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं, अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं, वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको क़ायदे क़ानून समझाने लगे हैं, एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं, मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने उस तरफ़ जाने से क़तराने लगे हैं, मौलवी से डाँट खा कर अहले मक़तब फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं, अब नई तहज़ीब के पेश ए नज़र हम आदमी को भूल कर खाने लगे हैं..!! ~दुष्यंत कुमार - [मैंने तो बहुत देखे अपने भी पराये भी...](https://bazmeshayari.com/maine-to-bahut-dekhe/): मैंने तो बहुत देखे अपने भी पराये भी कुछ ज़िन्दगी भी देखी कुछ मौत के साये भी, इस दिल में तुम्हे रखा था मैंने बड़े दिल से पर तुमने मेरे दिल पर इल्ज़ाम लगाए भी, मिल जाए ख़ुदा मुझसे ये इल्तज़ा रहेगी शिकवे है बहुत उसके मुझसे तो बताये भी, इन्सान की ज़न्नत में क़िस्मत न बदलती है वो ख़ुद को मिटाए और वो ख़ुद को बनाये भी, इस बुत से क़सम खाई उस बुत से रहम माँगा हर बुत ने अपनी मुझे हर चाल दिखाई भी, हर एक समय दिल में रंगते नसीम बाक़ी वो ख़ुद को जलाये भी - [फ़तह की सुन के ख़बर, प्यार जताने आए...](https://bazmeshayari.com/fatah-ki-sun-ke-khabar/): फ़तह की सुन के ख़बर, प्यार जताने आए रूठे हुए थे हमसे यार रिश्तेदार मनाने आए, अच्छे दिन आए तो मैंने गज़ब तमाशा देखा मेरे दुश्मन भी मुझको गले लगाने आए, आज वो मेरे दुश्मन का पता पूछ रहे थे जैसे मुझसे ना मिलने वो, मिलने के बहाने आए, फूल ही फूल खिले जिन दोस्तों की बदौलत दुआ है उनके हिस्से में नेमतो के खज़ाने आए, रो दिए वो भी, मुझे धोखा देने के बाद याद जब उनको मेरी वफ़ाओ के फ़साने आए..!! - [नसीबो पर नहीं चलते नजीरों पर नहीं चलते...](https://bazmeshayari.com/nasibo-par-nahi-chalte/): नसीबो पर नहीं चलते, नजीरों पर नहीं चलते जो सचमुच में बड़े है वो लकीरों पर नहीं चलते, नियम, क़ानून, जितने है गरीबो के लिए है नियम क़ानून भी अक्सर अमीरों पर नहीं चलते, चलेंगे हिन्दुओ पर भी, चलेंगे मुस्लिमो पर भी जो मज़हब के शिकंज़े है क़बीरो पर नहीं चलते, समन्दर ने बनाए है जज़ीरे अपने सीने पर समन्दर के नियम लेकिन जज़ीरो पर नहीं चलते, कोई जादू हो दौलत का, कोई टोना हो शोहरत का ये जादू और टोने भी फ़कीरो पर नहीं चलते..!! - [फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आये सवालो की तरह...](https://bazmeshayari.com/falsafe-ishq-me-pesh/): फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आये सवालो की तरह हम परेशाँ ही रहे अपने ख्यालो की तरह, शीशागर बैठे रहे ज़िक्र ए मसीहा ले कर और हम टूट गए काँच के प्यालो की तरह, जब भी अंज़ाम ए मुहब्बत ने पुकारा ख़ुद को वक़्त ने पेश किया हमें मिशालो की तरह, ज़िक्र जब होगा मुहब्बत में तबाही का कहीं याद हम आएँगे दुनियाँ को हवालो की तरह..!! - [हकीक़त में नहीं कुछ भी दिखा है...](https://bazmeshayari.com/haqiqat-me-nahi-kuch/): हकीक़त में नहीं कुछ भी दिखा है क़िताबो में मगर सब कुछ लिखा है, मुझे समझा के वो मज़हब का मतलब डर ओ लालच में आए दिन बिका है, जो रात और दिन पढ़ा करते हो पोथी कभी उनका असर ख़ुद पर दिखा है ? जब हाथो से नहीं कुछ कर सका वो तो बोला यही तो क़िस्मत में लिखा है, असल में रीढ़ ही उसकी सलामत नहीं वो सदियों से इसी फन पे टिका है..!! - [बसा बसाया शहर अब बंजर लग रहा है...](https://bazmeshayari.com/basa-basaya-shahar-ab/): बसा बसाया शहर अब बंजर लग रहा है चारो ओर उदासियो का मंज़र लग रहा है, जाने अंजाने से लोग क़ातिल हो जैसे हर एक कि साँसों में खंज़र लग रहा है, बड़ी मुश्किलों से बनाया था बरसो में अब काटने को दौड़ता हुआ घर लग रहा है, कौन बचेगा, कैसे बचेगा ख़ुदा ही जाने ? हर कोने में बिखरा सा ज़हर लग रहा है, शायद ईमान कमज़ोर हो चुका है हमारा इसी लिए तो हर लम्हा अब डर लग रहा है..!! - [रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है...](https://bazmeshayari.com/roz-jab-raat-ko-barah-ka/): रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है यातनाओं के अँधेरे में सफ़र होता है, कोई रहने की जगह है मेरे सपनो के लिए वो घरौंदा ही सही, मिट्टी का भी घर होता है, सर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी एक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है, ऐसा लगता है कि उड़कर भी कहाँ पहुँचेंगे हाथ में जब कोई टूटा हुआ पर होता है, सैर के वास्ते सड़को पे निकल आते थे अब तो आकाश से पथराव का डर होता है..!! ~दुष्यंत कुमार - [आँसू हो, उदासी हो और ख़ामोश चीत्कार हो...](https://bazmeshayari.com/aansoo-ho-udasi-ho/): आँसू हो, उदासी हो और ख़ामोश चीत्कार हो गज़ल कहनी हो तो पहले किसी से प्यार हो, कलम लिखती हो हर दुकानदार ग़ालिब होता गज़ल के लिए ज़रूरी है कि इश्क़ में हार हो, पहले चाँद मिले फिर बादल छीन ले जाए उसे गज़ल की अगवानी के लिए बस अंधकार हो, जो आदमी ख़ुश है वो गज़ल कह नहीं सकता तुम ख़ुद देख लो ग़ालिब हो कि गुलज़ार हो, हज़ारों लब वाह वाह कहे जा रहे थे दिल तोड़ने वाले के लिए दिल में आभार हो..!! - [क्या करेंगे आप मेरे दिल का मंज़र देख कर](https://bazmeshayari.com/kya-karenge-aap-mere-dil-ka/): क्या करेंगे आप मेरे दिल का मंज़र देख कर ख़ामखा हैरान होंगे एक समन्दर देख कर, ये अमीरों की है बस्ती, है अलग इनका चलन लोग मिलते है गले लोगो का पैकर देख कर, साथ चलने का किया था आपने जब फ़ैसला रुक गए फिर क्यूँ भला राहों में पत्थर देख कर ? जान पाया यूँ भी होती है इबादत या ख़ुदा रक्स करते तितलियों को कुछ गुलो पर देख कर, आप बेशक़ ढेर सारे दोस्त रखिए ठीक है पर भरोसा कीजिए थोड़ा संभल कर देख कर, गर चराग़ो ने है की हर हाल में जलने की ज़िद्द आँधियों ने - [हमने सुना था फ़रिश्ते जान लेते है...](https://bazmeshayari.com/hamne-suna-tha-farishte/): हमने सुना था फ़रिश्ते जान लेते है खैर छोड़ो ! अब तो इन्सान लेते है, इश्क़ ने ऐसी शिनाख्त बख्शी है अब तो दूर से ही लोग पहचान लेते है, ग़ुरबत यूँ रक्साँ है हमारी बस्ती में बेच कर ज़िस्म यहाँ लोग समान लेते है, दीन तो बड़ी अनमोल चीज है ख़ुदा की यहाँ लोग अब उसका भी दान लेते है, इन आँखों ने लाखो में चुना है उसको यूँ कि लोग रेत से हीरा जैसे छान लेते है, शहर ए मुनाफ़िक़ से तंग आ गया हूँ मैं आओ किसी गाँव में कच्चा मकान लेते है, बख्शीश जब है तेरे - [खुद ही जवाब देता खुद सवाल करता है](https://bazmeshayari.com/khud-hi-jawab-deta-khud-sawal/): खुद ही जवाब देता खुद सवाल करता है जमाना तेरा मेरे मौला कमाल करता है, भूले से भी पूछ लेता है हाल ए दिल हमारा हमको लगता है कि हमारा ख़्याल करता है, मरने भी नहीं देता बसर करने भी नहीं देता ये जमाना भी जीना कैसे मुहाल करता है, जाने किस की दुआ से चल रहा है ये जहाँ ज़माना ज़ुल्म ओ सितम बेमिसाल करता है, हक़ बयानी की गोया खाई है कसम बशर हर सू हर बार हर बात गोलमाल करता है..!! - [अमीरों को मिलती है हर जगह इज्ज़त](https://bazmeshayari.com/amiro-ko-milti-hai-har-jagah/): अमीरों को मिलती है हर जगह इज्ज़त ये ग़ुरबत हम गरीबो को कहाँ इज्ज़त पाने देती है, झोलियाँ हमारी भरी रहती है सदा गमो से ये ग़ुरबत हम गरीबो को कहाँ इशरत पाने देती है, पसीने की जगह हम खून बहाया करते है ये ग़ुरबत हम गरीबो को कहाँ उजरत पाने देती है, टूटे फूटे घरो में गुज़रती है अपनी ज़िन्दगी ये ग़ुरबत हम गरीबो को कहाँ आलीशान इमारत पाने देती, दोस्ती प्यार वफ़ा सब फक़त दिखावे होते है ये ग़ुरबत हम गरीबो को कहाँ किसी की उल्फ़त पाने देती है, हर कोई चला जाता है यूँ ही रूठ कर - [इतना एहसान तो हम पर वो ख़ुदारा करते](https://bazmeshayari.com/itna-ehsan-to-ham-par/): इतना एहसान तो हम पर वो ख़ुदारा करते अपने हाथो से ज़िगर चाक हमारा करते, हमको तो दर्द ए जुदाई से ही मर जाना था चंद रोज़ और न क़ातिल को इशारा करते, ले के जाते न अगर साथ वो यादे अपनी याद करते उन्हें और वक़्त गुज़ारा करते, ज़िन्दगी मिलती जो सौ बार हमें दुनियाँ में हम तो हर बार इसे आप पे वारा करते, जोश धुंधलाता न हरगिज़ ये मेरा शीशा ए दिल गर्द उसकी जो वो अगर रोज़ उतारा करते..!! ~ए जी जोश - [खून में डूबी सियासत नहीं देखी जाती...](https://bazmeshayari.com/khoon-me-dubi-siyasat/): खून में डूबी सियासत नहीं देखी जाती हमसे अब देश की हालत नहीं देखी जाती, उनके चेहरों से उठाना ही पड़ेगा पर्दा जिन शरीफ़ो से शराफ़त नहीं देखी जाती, ऐसा लगता है पलट आया है दौर ए यूसुफ़ भाई से भाई की सूरत नहीं देखी जाती, हमको तलवार उठाना ही पड़ेगा शायद बेगुनाहों की शहादत नहीं देखी जाती, पी लिया जिसने भी दरिया ए वफ़ा का पानी उस क़बीले में अदावत नहीं देखी जाती, हम तो बेताब फ़िदा होते है किरदारों पर दिल के बाज़ारों में दौलत नहीं देखी जाती..!! ~बेताब हल्लौरी - [आ जाओ मैं लोरी गा के सुना देता हूँ...](https://bazmeshayari.com/aa-jaao-mai-lori-gaa-ke/): आ जाओ मैं लोरी गा के सुना देता हूँ चाँद अपना है उसे छत पे बुला लेता हूँ, तुम भटके हुए मुसाफ़िर हो तो क्या हुआ बैठो तुम्हे थोड़ा पानी ही पिला देता हूँ, कुछ ख़ास नहीं मेरे पास जो तुम्हे दे सकूँ चलो तुम्हे तुम्हारा रास्ता ही बता देता हूँ, सताता है जब भी ये दर्द ए जानाँ मुझको थोड़ा सा लिखता हूँ और गुनगुना लेता हूँ, हर तरफ जल रहे है ये जो चिराग़ नफरतों के कुछ तुम बुझाओ और कुछ मैं बुझा देता हूँ..!! - [दरिन्दे खून बहने का इंतज़ार करेंगे...](https://bazmeshayari.com/darinde-khoon-bahne-ka/): दरिन्दे खून बहने का इंतज़ार करेंगे भरे पेट वाले अब भूखो पे वार करेंगे, वतन में क़त्ल ए आम की तैयारी है कुछ लोग नफ़रत का कारोबार करेंगे, जो हमेशा से वतन ही जलाते आए है वही अब फिर शहर को रेगज़ार करेंगे, पहले वतन की ज़मीं को ज़ख्मी करेंगे और फिर आसमां को तार तार करेंगे, मगर हम तो इनसे न कभी बात करेंगे और न कभी अब इनका ऐतबार करेंगे..!! ~दर्पन कानपुरी - [हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे](https://bazmeshayari.com/har-ek-rooh-me-ek-gam/): हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे ये ज़िन्दगी तो कोई बद्दुआ लगे है मुझे, पसंद ए ख़ातिर ए अहल ए वफ़ा है मुद्दत से ये दिल का दाग़ जो ख़ुद भी भला लगे है मुझे, जो आँसू में कभी रात भीग जाती है बहुत क़रीब वो आवाज़ ए पा लगे है मुझे, मैं सो भी जाऊँ तो मेरी बंद आँखों में तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे, मैं जब भी उस के ख़यालों में खो सा जाता हूँ वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे, मैं सोचता था कि लौटूँगा अजनबी की - [हर वक़्त किसी को मुकम्मल नज़ारा नहीं मिलता](https://bazmeshayari.com/har-waqt-kisi-ko-muqammal/): हर वक़्त किसी को मुकम्मल नज़ारा नहीं मिलता उम्मीद जब रखो तो कहीं किनारा नहीं मिलता, वफाओं के किस्से तो बस किताबों में रह गए साफ नीयत के आदमी को सहारा नहीं मिलता, गम न कर कि रह गए तेरे अरमां कुछ अधूरे ख्वाहिशें छूट भी जाती है हक़ सारा नहीं मिलता, जो शय है मयस्सर तुझे उसे सीने से लगा ले यूँ हाथ आसमां में उठाने से सितारा नहीं मिलता, लोग करीब आएँगे भी तो मतलब की ही खातिर हर किसी को ज़िंदगी मे शख्स प्यारा नहीं मिलता, हुनरमंद बनने की खातिर देनी पड़ती है कुर्बानियाँ यूँ ही तो - [हर शख्स का जीना यहाँ आसान नहीं है...](https://bazmeshayari.com/har-shakhs-ka-jina-yahan/): हर शख्स का जीना यहाँ आसान नहीं है मुश्किल से मिले वो जो परेशान नहीं है, हर शख्स से रखो न तुम उम्मीद ए वफ़ा हर शख्स यहाँ पेशे से इन्सान नहीं है, वो शहर बसाया जो कभी पुरखो ने मेरे अब उस शहर में मेरी कोई पहचान नहीं है, होने को तो हो सकता है हो जाए मुहब्बत ऐसा भी मगर होने का इम्कान नहीं है, उस शख्स से अच्छे की तवक्को नहीं साहब जो अपनी ही गलती पे पशेमान नहीं है, माँ बाप की इज्ज़त न लगे दाँव पे जिससे उस मुहब्बत से मुझे कोई भी नुकसान नहीं - [हर एक शख़्स परेशान ओ दर बदर सा लगे](https://bazmeshayari.com/har-ek-shakhs-pareshan/): हर एक शख़्स परेशान ओ दर बदर सा लगे ये शहर मुझको तो यारो कोई भँवर सा लगे, अब उसके तर्ज़ ए तजाहुल को क्या कहे कोई वो बेख़बर तो नहीं फिर भी बेख़बर सा लगे, हर एक ग़म को ख़ुशी की तरह बरतना है ये दौर वो है कि जीना भी एक हुनर सा लगे, नशात ए सोहबत ए रिंदाँ बहुत ग़नीमत है कि लम्हा लम्हा पुर आशोब ओ पुरख़तर सा लगे, किसे ख़बर है कि दुनिया का हश्र क्या होगा ? कभी कभी तो मुझे आदमी से डर सा लगे, वो तुंद वक़्त की रौ है कि पाँव - [रोज़मर्रा वही सब ख़बर देख कर...](https://bazmeshayari.com/rozmarra-wahi-sab-khabar/): रोज़मर्रा वही सब ख़बर देख कर अब तो पत्थर हुआ ये ज़िगर देखिए, सड़के चलने लगी आदमी रुक गया हो गया यूँ अपाहिज़ सफ़र देखिए, सारा आकाश अब इनके सीने में है काट कर इन परिंदों के पर देखिए, मैं हकीक़त न कह दूँ कही आप से रात दिन मुझको खाता ये डर देखिए, धूप आती है न इनमे अब ठंडी हवा खिड़कियाँ हो गई यूँ बेअसर देखिए..!! - [ज़िन्दगी का बोझ उठाना पड़ेगा...](https://bazmeshayari.com/zindagi-ka-bojh-uthana/): ज़िन्दगी का बोझ उठाना पड़ेगा गर ज़िन्दा हो तो दिखाना पड़ेगा, लगने लगे जो मसला ये ज़िन्दगी तो ख़ुद से ही सुलझाना पड़ेगा, ज़िन्दगी है ज़िन्दगी में कभी कभी तुम्हे रोते हुए भी मुस्कुराना पड़ेगा, कर ले कमाई वक़्त रहते हुए नहीं तो उम्र भर पछताना पड़ेगा, कैसे ज़िन्दा रहना है जहाँ में तुम्हे हुनर ये ख़ुद को सिखाना पड़ेगा, मज़बूरी में या ख़ुशी से ही सही हर फ़र्ज़ तुम्हे अपना निभाना पड़ेगा, उजड़ा उजड़ा हुआ जँचता ही नहीं दिल की बगिया को भी सजाना पड़ेगा..!! - [अश्क जब हम बहाने लगते हैं...](https://bazmeshayari.com/ashk-jab-ham-bahane-lagte-hai/): अश्क जब हम बहाने लगते हैं कितने ही गम ठिकाने लगते हैं आईना ले के निकले जब जब हम लोग चेहरे छुपाने लगते हैं हम जहां पहुंचे फिर वहां से अब लौटने में ज़माने लगतें हैं जिक्र होता है मेरे कत्ल का जब वो क्यूं नज़रें चुराने लगते हैं आग बुझती है उनके अश्कों से मेरे ख़त जब जलाने लगते हैं तूने हमसे छुपाया है कुछ तो तेरे जिक्र पे सब मुस्कुराने लगते हैं अनमना सा मन और ये अलगरजी ऐसे थोड़ी निशाने लगते हैं मेरे मरने की खबर भी उनको उनसे न मिलने के बहाने लगते हैं बाप को - [तमाम उम्र कटी उसकी मेज़बानी में](https://bazmeshayari.com/tamam-umr-kati-uski/): तमाम उम्र कटी उसकी मेज़बानी में बिछड़ गया था कभी जो भरी जवानी में, हमारे होने तलक सब को मुश्किलात रहें हमारे बाद सभी ख़ुश रहे कहानी में, ख्याल, ख़्वाब, तेरी याद हम उठा लाये मिली न चीज कोई और जब निशानी में, फुसूं था ऐसा कोई उसकी मुस्कराहट में दो चार दिन तो रहे हम भी ख़ुश गुमानी में, सवाल याद नहीं पर जवाब अज़बर है तुम्हारे जैसे हज़ारों है राजधानी में, शिकस्त खुर्दा हूँ लेकिन ख़बर ये रखता हूँ गँवाएँ बैठा है क्या क्या तू कामरानी में, ज़माना यूँ ही नहीं हम ख्याल है मेरा कि उसके साथ - [किसी कमज़ोर की जब भी दुआएँ गूँज उठती है](https://bazmeshayari.com/kisi-kamzor-ki-jab/): किसी कमज़ोर की जब भी दुआएँ गूँज उठती है अबाबीलों के लश्कर से फज़ाएँ गूँज उठती है, ख़ामोशी में भी रह कर भी गूँजते है गूँजने वाले जुबां ख़ामोश रहती है अदाएँ गूँज उठती है, अगरचे दास्ताँ के मरकज़ी किरदार बदले है सदाएँ हक़ से अब भी कर्बलाएँ गूँज उठती है, मैं अपनी ज़ात के गुम्बद में जब आवाज़ देता हूँ तो मेरी ज़ात में तेरी ज़फाएँ गूँज उठती है, चिरागों को जलाने का इरादा जब भी करते है कहीं नज़दीक ही सरकश हवाएँ गूँज उठती है, अगर हम हद में रहने की कोई कोशिश करें तबीयत में हज़ारों इन्तेहाएँ - [तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है](https://bazmeshayari.com/tu-is-qadar-mujhe/): तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है, जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकार वो शख्स मुझको बहुत बदनसीब लगता है, हदूद ए ज़ात से बाहर निकल के देख ज़रा ना कोई गैर, ना कोई रक़ीब लगता है, ये दोस्ती, ये मरासिम, ये चाहते ये खुलूस कभी कभी ये सब कुछ अजीब लगता है, उफक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा मुझे चिराग ए दयार ए हबीब लगता है, ना जाने कब कोई तूफान आयेगा यारो बुलंद मौज से साहिल क़रीब लगता है..!! ~जाँ निसार अख्तर - [मुश्किल चाहे लाख हो लेकिन एक दिन तो हल होती है](https://bazmeshayari.com/mushkil-chahe-laakh-ho/): मुश्किल चाहे लाख हो लेकिन एक दिन तो हल होती है ज़िन्दा लोगों की दुनिया में अक्सर हलचल होती है, जीना है तो मरने का ये ख़ौफ़ मिटाना लाज़िम है डरे हुए लोगों की समझो मौत तो पल पल होती है, कफ़न बाँध कर निकल पड़े तो मुश्किल या मजबूरी क्या कहीं पे काँटे कहीं पे पत्थर कहीं पे दलदल होती है, जिस बस्ती में नफ़रत को परवान चढ़ाया जायेगा सँभल के रहना उस बस्ती की हवा भी क़ातिल होती है, इतना लूटा, इतना छीना, इतने घर बरबाद किये लेकिन मन की ख़ुशी कभी क्या इनसे हासिल होती है ? - [हमें कुछ पता नहीं है हम क्यूँ बहक रहे हैं ?](https://bazmeshayari.com/hame-kuch-pata-nahi-hai/): हमें कुछ पता नहीं है हम क्यूँ बहक रहे हैं ? रातें सुलग रही हैं दिन भी दहक रहे हैं, जब से है तुमको देखा हम इतना जानते हैं तुम भी महक रहे हो हम भी महक रहे हैं, बरसात भी नहीं पर बादल गरज रहे हैं सुलझी हुई हैं ज़ुल्फ़ें और हम उलझ रहे हैं, मदमस्त एक भंवरा क्या चाहता कली से तुम भी समझ रहे हो हम भी समझ रहे हैं, अब भी हसीन सपने आंखों में पल रहे हैं पलकें हैं बंद फिर भी आँसू निकल रहे हैं, नींदें कहाँ से आए इस दर पे करवटें हैं - [लेना देना ही क्या फिर ऐसे यारो से ?](https://bazmeshayari.com/lena-dena-hi-kya/): लेना देना ही क्या फिर ऐसे यारो से ? सुख दुःख भी जब बाँटने हो दीवारों से, ज़िस्म के हर एक रोग से वाकिफ़ हूँ मैं अब इतना मिलना जुलना है बीमारों से, तोहफ़े में एक फूल नहीं भेजा था जिसे आज उसके जनाज़े को भर दिया हारो से, दुश्मन की हर चाल का अंदाज़ा है मुझे डर लगता है लेकिन अपने रिश्तेदारों से, लहज़ा मीठा पर बाते उसकी कड़वी थी कीड़े निकले उसके दिए शक्कर पारो से..!! - [हिज़ाब तेरे चेहरे पर मैं सजा दूँ...](https://bazmeshayari.com/hizab-tere-chahre-par/): हिज़ाब तेरे चेहरे पर आ मैं सजा दूँ बाग़ ए इरम की तुझे मैं हूर बना दूँ,   कभी दाग़ आये न आँचल में तेरी आ अपने रूह के दामन में छुपा दूँ,   हो अगर जो कभी राहे दुश्वार तेरी राहो में तेरी अपनी पलके बिछा दूँ,   आज़माना जो चाहे तू इश्क़ हमारा कह के देख ख़ुद को सूली चढ़ा दूँ,   वार कर के सब तुम पे ऐ ज़रीन आ तुझे मैं हर एक दर्द की दवा दूँ..!! ~नवाब ए हिन्द - [अब ज़िन्दगी पे हो गई भारी शरारतें...](https://bazmeshayari.com/ab-zindagi-pe-ho-gai-bhaari/): अब ज़िन्दगी पे हो गई भारी शरारतें तन्हाइयो ने छीन ली सारी शरारतें, होंठो के गुलिस्तान पे लाली न जब रही आँखों ने खेल खेल में हारी शरारतें, कुछ तो गले का तौक है यादों की राह में कुछ आँसूओ में है अभी ज़ारी शरारतें, सीने से आरज़ूओ के मौसम गुज़र गए बस रह गई है दर्द की मारी शरारतें, उड़ने न पाए देखना आह ओ फ़ुगा की धुल हों जो कभी गुमान पे तारी शरारतें, दुश्मनों में इश्क का इम्कान अब कहाँ हमने गम ए जहाँ पे है वारी शरारतें..!! - [जब दुश्मनों के चार सू लश्कर निकल पड़े...](https://bazmeshayari.com/jab-dushmano-ke-chaar/): जब दुश्मनों के चार सू लश्कर निकल पड़े हम भी कफ़न बाँध के सर पर निकल पड़े, जिन दोस्तों पे नाज़ था हमको बहुत मियाँ उनकी ही आस्तीन में खंज़र निकल पड़े, बाहर के दुश्मनोसे तो महफूज़ थे मगर दुश्मन हमारे घर के ही अंदर निकल पड़े, सहराओ में ढूँढते है दुआओं के वास्ते शायद कोई फ़कीर कलंदर निकल पड़े, उस कौम का वज़ूद नहीं कुछ जहान में गद्दार जिसमे कौम का रहबर निकल पड़े, हम तुम्हारी याद में रो दे तो आज भी आँखों से आँसूओ का समन्दर निकल पड़े..!! - [मुमकिन ही न थी ख़ुद से शनासाई यहाँ तक...](https://bazmeshayari.com/mumkin-hi-na-thi-khud-se/): मुमकिन ही न थी ख़ुद से शनासाई यहाँ तक ले आया मुझे मेरा तमाशाई यहाँ तक, रस्ता हो अगर याद तो घर लौट भी जाऊँ लाई थी किसी और की बीनाई यहाँ तक, शायद तह ए दरिया में छुपा था कहीं सहरा मेरी ही नज़र देख नहीं पाई यहाँ तक, महफ़िल में भी तन्हाई ने पीछा नहीं छोड़ा घर में न मिला मैं तो चली आई यहाँ तक, सहरा है तो सहरा की तरह पेश भी आए आया है इसी शौक़ में सौदाई यहाँ तक, एक खेल था और खेल में सोचा भी नहीं था जुड़ जाएगा मुझ से वो - [वो एक लम्हा मुहब्बत भरा तेरे साथ...](https://bazmeshayari.com/wo-ek-lamha-muhabbat-bhara/): वो एक लम्हा मुहब्बत भरा तेरे साथ ज़िन्दगी भर की ख़ुशियों पर भारी है, हम ही नहीं दिल भी आजतक तेरा है इस पर आज भी तेरी ही दावेदारी है, इश्क़ ज़िन्दगी जीने का सलीक़ा है बेवकूफ़ है जो कहते है इश्क़ बीमारी है, क़िस्मत वालो को इश्क़ आज़माता है हमें इश्क़ आज़माएँ ये आरज़ू हमारी है, इश्क़ ही है जो खुले आसमान सा है बाक़ी तो जहाँ में बंधन है, चारदीवारी है, ये कशमकश, ये तड़प यही तो इश्क है वरना मज़ा ही क्या जिसमे ना बेक़रारी है..!! - [तेरी सूरत निगाहों में फिरती रहे...](https://bazmeshayari.com/teri-surat-nigaho-me-firti/): तेरी सूरत निगाहों में फिरती रहे इश्क़ तेरा सताए तो मैं क्या करूँ ? कोई इतना तो आ कर बता दे मुझे जब तेरी याद आए तो मैं क्या करूँ ? मैंने ख़ाक ए नशेमन को बोसे दिए और ये कह के भी दिल को समझा लिया, आशियाना बनाना मेरा काम था कोई बिजली गिराए तो मैं क्या करूँ ? मैंने माँगी थी ये मस्जिदों में दुआ मैं जिसे चाहता हूँ वो मुझको मिले, जो मेरा फ़र्ज़ था मैंने पूरा किया अब ख़ुदा ही न चाहे तो मैं क्या करूँ ? शौक़ पीने का मुझको ज्यादा न था तर्क ए - [अब शौक़ से कि जाँ से गुज़र जाना चाहिए...](https://bazmeshayari.com/ab-shauq-se-ki-jaan-se/): अब शौक़ से कि जाँ से गुज़र जाना चाहिए बोल ऐ हवा ए शहर किधर जाना चाहिए ? कब तक इसी को आख़िरी मंज़िल कहेंगे हम कू ए मुराद से भी उधर जाना चाहिए, वो वक़्त आ गया है कि साहिल को छोड़ कर गहरे समुंदरों में उतर जाना चाहिए, अब रफ़्तगाँ की बात नहीं कारवाँ की है जिस सम्त भी हो गर्द ए सफ़र जाना चाहिए, कुछ तो सुबूत ए ख़ून ए तमन्ना कहीं मिले है दिल तही तो आँख को भर जाना चाहिए, या अपनी ख़्वाहिशों को मुक़द्दस न जानते या ख़्वाहिशों के साथ ही मर जाना चाहिए..!! - [नाज़ उसके उठाता हूँ रुलाता भी मुझे है...](https://bazmeshayari.com/naaz-uske-uthata-hoo/): नाज़ उसके उठाता हूँ रुलाता भी मुझे है ज़ुल्फो में सुलाता भी, जगाता भी मुझे है, आता है बहुत उसपे मुझे गुस्सा भी लेकिन प्यार उसपे कभी टूट के आता भी मुझे है, दर पे है मेरी जान के जो पीछे पड़ा है वो दुश्मन ए जाँ दोस्तों भाता भी मुझे है, अंजान बना रहता है बेज़ार देख कर वहशत में वो तन्हाई में पाता भी मुझे है, गर आए ज़फ़ा करने पे, तौबा मेरी तौबा ! वो किस्से वफ़ाओं के सुनाता भी मुझे है, ज़न्नत की कोई सैर कराता है रफीको दोज़ख में मगर खींच कर लाता भी मुझे - [वफ़ा ए वादा नहीं वादा ए दिगर भी नहीं...](https://bazmeshayari.com/wafa-e-wada-nahi-wada-e-digar/): वफ़ा ए वादा नहीं वादा ए दिगर भी नहीं वो मुझसे रूठे तो थे लेकिन इस क़दर भी नहीं, बरस रही है हरीम ए हवस में दौलत ए हुस्न गदा ए इश्क़ के कासे में एक नज़र भी नहीं, न जाने किस लिए उम्मीदवार बैठा हूँ एक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं, निगाह ए शौक़ सर ए बज़्म बेहिजाब न हो वो बेख़बर ही सही इतने बेख़बर भी नहीं, ये अहद ए तर्क ए मोहब्बत है किस लिए आख़िर ? सुकून ए क़ल्ब उधर भी नहीं इधर भी नहीं..!! ~फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - [लोग सह लेते थे हँस कर कभी बेज़ारी भी...](https://bazmeshayari.com/log-sah-lete-the/): लोग सह लेते थे हँस कर कभी बेज़ारी भी अब तो मश्कूक हुई अपनी मिलन सारी भी, वार कुछ ख़ाली गए मेरे तो फिर आ ही गई अपने दुश्मन को दुआ देने की होशियारी भी, उम्र भर किस ने भला ग़ौर से देखा था मुझे वक़्त कम हो तो सजा देती है बीमारी भी, किस तरह आए हैं इस पहली मुलाक़ात तलक और मुकम्मल है जुदा होने की तैयारी भी, ऊब जाता हूँ ज़ेहानत की नुमाइश से तो फिर लुत्फ़ देता है ये लहजा मुझे बाज़ारी भी, उम्र बढ़ती है मगर हम वहीं ठहरे हुए हैं ठोकरें खाईं तो कुछ - [कुछ क़दम और मुझे जिस्म को ढोना है यहाँ...](https://bazmeshayari.com/kuch-qadam-aur-mujhe-zism/): कुछ क़दम और मुझे जिस्म को ढोना है यहाँ साथ लाया हूँ उसी को जिसे खोना है यहाँ, भीड़ छट जाएगी पल में ये ख़बर उड़ते ही अब कोई और तमाशा नहीं होना है यहाँ, ये भँवर कौन सा मोती मुझे दे सकता है बात ये है कि मुझे ख़ुद को डुबोना है यहाँ, क्या मिला दश्त में आ कर तेरे दीवाने को घर के जैसा ही अगर जागना सोना है यहाँ, कुछ भी हो जाए न मानूँगा मगर जिस्म की बात आज मुजरिम तो किसी और को होना है यहाँ, यूँ भी दरकार है मुझ को किसी बीनाई का - [कुछ रोज़ से रोज़ शाम बस यूँ ही ढल जाती है](https://bazmeshayari.com/kuch-roz-se-shaam/): कुछ रोज़ से रोज़ शाम बस यूँ ही ढल जाती है बीती हुई यादो की शमाँ मेरे सिरहाने जल जाती है, चेहरा तो छुपा लेता है मेरी हर के तकलीफ़ को दर्द और ख़ामोशी मगर आँखों में पिघल जाती है, मैं बीते कल को तलाश करता हूँ मौजूदा आज में और इन्ही कोशिशो में रोज़ तारीख़ बदल जाती है, एक आरज़ू है मेरे दिल में कि ऐसा मुक़ाम आए ज़िन्दगी में अपनी भी कोई एक ऐसी शाम आए, जब अपना हर कोई अपने क़रीब नज़र आए हमने देखे है जो भी ख़्वाब वो हकीक़त बन जाए, बस यही ख्यालात लिए - [शाम आई तिरी यादों के सितारे निकले...](https://bazmeshayari.com/shaam-aai-teri-yaado/): शाम आई तिरी यादों के सितारे निकले रंग ही ग़म के नहीं नक़्श भी प्यारे निकले, एक मौहूम तमन्ना के सहारे निकले चाँद के साथ तिरे हिज्र के मारे निकले, कोई मौसम हो मगर शान-ए-ख़म-ओ-पेच वही रात की तरह कोई ज़ुल्फ़ सँवारे निकले, रक़्स जिन का हमें साहिल से बहा लाया था वो भँवर आँख तक आए तो किनारे निकले, वो तो जाँ ले के भी वैसा ही सुबुक-नाम रहा इश्क़ के बाब में सब जुर्म हमारे निकले, इश्क़ दरिया है जो तेरे वो तही-दस्त रहे वो जो डूबे थे किसी और किनारे निकले, धूप की रुत में कोई छाँव - [ताज़ा मोहब्बतों का नशा जिस्म-ओ-जाँ में है..](https://bazmeshayari.com/taza-mohabbato-ka-nasha/): ताज़ा मोहब्बतों का नशा जिस्म-ओ-जाँ में हैफिर मौसम-ए-बहार मिरे गुल्सिताँ में है, इक ख़्वाब है कि बार-ए-दिगर देखते हैं हमइक आशना सी रौशनी सारे मकाँ में है, ताबिश में अपनी महर-ओ-मह-ओ-नज्म से सिवाजुगनू सी ये ज़मीं जो कफ़-ए-आसमाँ में है, इक शाख़-ए-यासमीन थी कल तक ख़िज़ाँ-असरऔर आज सारा बाग़ उसी की अमाँ में है, ख़ुशबू को तर्क कर के न लाए चमन में रंगइतनी तो सूझ-बूझ मिरे बाग़बाँ में है, लश्कर की आँख माल-ए-ग़नीमत पे है लगीसालार-ए-फ़ौज और किसी इम्तिहाँ में है, हर जाँ-निसार याद-दहानी में मुंहमिकनेकी का हर हिसाब दिल-ए-दोस्ताँ में है, हैरत से देखता है समुंदर मिरी तरफ़कश्ती - [तेरे साथ सफ़र मैं कुछ इस तरह करता रहा...](https://bazmeshayari.com/tere-sath-safar-main-kuch-is-tarah/): तेरे साथ सफ़र मैं कुछ इस तरह करता रहा दूर हो कर भी महसूस तुम्हे हरदम करता रहा, मैं किस्से रूहानी मुहब्बत के लिखता ही रहा मैं हर किस्से में तेरा ही ज़िक्र करता रहा, प्यार का दरिया मेरे अंदर निरंतर बहता रहा तेरी मुहब्बत में मैं हर पल सँवरता ही रहा, तेरा गुस्सा, तेरा दर्द और तेरी नज़र अंदाज़ी सब सहकर भी मैं तुझ पर ऐतबार करता रहा, तू हर रोज़ मेरे सपनो में आ मुझे सताता रहा मैं मुहब्बत का हर गम सहकर मुस्कुराता रहा, तुम्हे सोचना फ़िर तुम्हे लिखना आदत बन गई रूहानी किस्सों में मैं तेरे - [आंधियाँ भी चले और दीया भी जले...](https://bazmeshayari.com/aandhiyan-bhi-chale-aur-diya-bhi/): आंधियाँ भी चले और दीया भी जले होगा कैसे भला आसमां के तले ? अब भरोसा करे भी तो किस पर करे अब तो अपना ही साया हमें ही छले, दिन में आदर्श की बात हमसे करे वो बने भेड़िया ख़ुद जहाँ दिन ढले, आवरण सा चढ़ा है सभी पर कोई और भीतर से सारे हुए खोखले, ज़िन्दगी की ख़ुशी बाँटने से बढ़े तो सभी के दिलो में है क्यों फ़ासले ? कुछ बुरा कुछ भला है सभी को मिला दूसरो की कोई बात फिर क्यों खले..?? - [ज़मी सूखी है और पानी के भी लाले है...](https://bazmeshayari.com/zami-sukhi-hai-aur-pani-ke-bhi/): ज़मी सूखी है और पानी के भी लाले है इन्सान ही आज इन्सान के निवाले है जिनके दिलो में खून ख़राबे बसे हुए है निज़ाम ए दुनियाँ अब उन्ही के हवाले है जो कर के बेआबरू घरो को फूँक देते है वही लोग आज बस्तियों के रखवाले है उम्र भर इक़रार उल्फ़त कर न सके उनका दावा है कि वो बड़े दिलवाले है, हुनर ये नये ज़माने के हमें नहीं आते हम तो सीधे सादे लोग वही पुराने है..!! - [बदनाम मेरे प्यार का अफ़साना हुआ है...](https://bazmeshayari.com/badnam-mere-pyar-ka-afsana/): बदनाम मेरे प्यार का अफ़साना हुआ है दीवाने भी कहते है कि दीवाना हुआ है, रिश्ता था तभी तो किसी बेदर्द ने तोड़ा अपना था तभी तो कोई बेगाना हुआ है, बादल की तरह आ के बरस जाए एक दिन दिल उसके होते हुए भी वीराना हुआ है, बजते है ख्यालो में तेरी याद के घूँघरू कुछ दिन से मेरा घर भी परी खाना हुआ है, मौसम ने बनाया है निगाहो को शराबी जिस फूल को देखू वही पैमाना हुआ है, तन्हाई ज़िन्दगी की सज़ा हो गई है दोस्तों ! अब घर भी मेरा जैसे कोई मयखाना हुआ है, बेरुखी - [अज़ब मअमूल है आवारगी का...](https://bazmeshayari.com/azab-maamul-hai-aawargi-ka/): अज़ब मअमूल है आवारगी का गिरेबाँ झाँकती है हर गली का, न जाने किस तरह कैसे ख़ुदा ने भरोसा कर लिया था आदमी का ? अभी इस वक़्त है जो कुछ है वरना कोई लम्हा नहीं मौजूदगी का, मुझे तुमसे बिछड़ने के एवज़ में वसीला मिल गया है शायरी का, ज़मीं है रक्स में सूरज की ज़ानिब छुपा कर ज़िस्म आधा तीरगी का, मैं एक ही सतह पर ठहरूँगा कैसे ? उतरता चढ़ता पानी हूँ नदी का, मैं मिट्टी गूँध कर ये सोचता हूँ मुझे फन आ गया कूज़ागरी का, खटक जाऊँगा सोफे को तुम्हारे मैं बन्दा बैठने वाला हूँ - [हादसे ज़ीस्त की तौक़ीर बढ़ा देते हैं...](https://bazmeshayari.com/hadse-zist-ki-taukir/): हादसे ज़ीस्त की तौक़ीर बढ़ा देते हैं ऐ ग़म ए यार तुझे हम तो दुआ देते हैं, तेरे इख़्लास के अफ़्सूँ तिरे वादों के तिलिस्म टूट जाते हैं तो कुछ और मज़ा देते हैं, कू ए महबूब से चुपचाप गुज़रने वाले अरसा ए ज़ीस्त में एक हश्र उठा देते हैं, हाँ यही ख़ाक बसर सोख़्ता सामाँ ऐ दोस्त तेरे क़दमों में सितारों को झुका देते हैं, सीना चाकान ए मोहब्बत को ख़बर है कि नहीं शहर ए ख़ूबाँ के दर ओ बाम सदा देते हैं, हम ने उस के लब ओ रुख़्सार को छू कर देखा हौसले आग को गुलज़ार - [हैरतों के सिलसिले सोज़ ए निहाँ तक आ गए..](https://bazmeshayari.com/hairato-ke-silsile-soz/): हैरतों के सिलसिले सोज़ ए निहाँ तक आ गए हम नज़र तक चाहते थे तुम तो जाँ तक आ गए, नामुरादी अपनी क़िस्मत गुमराही अपना नसीब कारवाँ की ख़ैर हो हम कारवाँ तक आ गए, उनकी पलकों पर सितारे अपने होंटों पे हँसी क़िस्सा ए ग़म कहते कहते हम कहाँ तक आ गए, ज़ुल्फ़ में ख़ुशबू न थी या रंग आरिज़ में न था आप किस की आरज़ू में गुल्सिताँ तक आ गए, रफ़्ता रफ़्ता रंग लाया जज़्बा ए ख़ामोश ए इश्क़ वो तग़ाफ़ुल करते करते इम्तिहाँ तक आ गए, ख़ुद तुम्हें चाक ए गरेबाँ का शुऊ’र आ जाएगा तुम - [मैंने कहा कि दिल में तो अरमान हैं बहुत...](https://bazmeshayari.com/maine-kaha-ki-dil-me/): मैंने कहा कि दिल में तो अरमान हैं बहुत उस ने कहा कि आप तो नादान हैं बहुत, मैंने कहा कि मुझ को है जन्नत की आरज़ू उस ने कहा कि वाक़िफ़ ए ईमान हैं बहुत, मैंने कहा कि महका हुआ एक गुलाब हूँ उस ने कहा ज़मीं पे गुलिस्तान हैं बहुत, मैंने कहा कि मेरी पनाहों में आइए उस ने कहा कि मेरे निगहबान हैं बहुत, मैंने कहा कि एक मुरस्सा ग़ज़ल हूँ मैं उस ने कहा कि ऐसे तो दीवान हैं बहुत, मैंने कहा कि तर्क ए वफ़ा से हूँ शर्मसार उस ने कहा कि हम भी पशेमान - [मैं तकिए पर सितारे बो रहा हूँ...](https://bazmeshayari.com/main-takiye-par-sitare/): मैं तकिए पर सितारे बो रहा हूँ जन्म दिन है अकेला रो रहा हूँ, किसी ने झाँक कर देखा न दिल में कि मैं अंदर से कैसा हो रहा हूँ ? जो दिल पर दाग़ हैं पिछली रुतों के उन्हें अब आँसुओं से धो रहा हूँ, सभी परछाइयाँ हैं साथ लेकिन भरी महफ़िल में तन्हा हो रहा हूँ, मुझे इन निस्बतों से कौन समझा मैं रिश्ते में किसी का जो रहा हूँ ? मैं चौंक उठता हूँ अक्सर बैठे बैठे कि जैसे जागते में सो रहा हूँ, किसे पाने की ख़्वाहिश है कि ‘साजिद’ मैं रफ़्ता रफ़्ता ख़ुद को खो - [मुहताज हमसफ़र की मसाफ़त न थी मेरी...](https://bazmeshayari.com/muhtaz-hamsafar-ki-masafat/): मुहताज हमसफ़र की मसाफ़त न थी मेरी सब साथ थे किसी से रिफ़ाक़त न थी मेरी, हक़ किस से माँगता कि मकीनों के साथ साथ दीवार ओ बाम ओ दर को ज़रूरत न थी मेरी, सच बोल के भी देख लिया उनके सामने लेकिन उन्हें पसंद सदाक़त न थी मेरी, मैं जिनपे मर मिटा था वो काग़ज़ के फूल थे रस्मी मुकालमे थे मोहब्बत न थी मेरी, जो दूसरों के दुख थे वही मेरे दुख भी थे कुछ ऐसी मुख़्तलिफ़ भी हिकायत न थी मेरी, बस कुछ उसूल थे जो ब हर हाल थे अज़ीज़ जानम किसी से वर्ना अदावत - [मुझे ऐसा लुत्फ़ अता किया कि जो हिज़्र था न विसाल था..](https://bazmeshayari.com/mujhe-aisa-lutf-ataa-kiya/): मुझे ऐसा लुत्फ़ अता किया कि जो हिज्र था न विसाल था मेरे मौसमों के मिज़ाज दाँ तुझे मेरा कितना ख़याल था, किसी और चेहरे को देख कर तेरी शक्ल ज़ेहन में आ गई तेरा नाम ले के मिला उसे मेरे हाफ़िज़े का ये हाल था, कभी मौसमों के सराब में कभी बाम ओ दर के अज़ाब में वहाँ उम्र हम ने गुज़ार दी जहाँ साँस लेना मुहाल था, कभी तू ने ग़ौर नहीं किया कि ये लोग कैसे उजड़ गए कोई ‘मीर’ जैसा गिरफ़्ता दिल तेरे सामने की मिसाल था, तेरे बा’द कोई नहीं मिला जो ये हाल देख - [मेरे ख़्वाबों में यादों मे हो सिर्फ तुम...](https://bazmeshayari.com/mere-khwabo-me-yaado-me/): मेरे ख़्वाबों में यादों मे हो सिर्फ तुमऔर ज़हन ओ ख़्यालों में हो सिर्फ तुम, कुछ नहीं है तलब मेरी इस के सिवारब से हर दम सवालों में सिर्फ तुम, शब की ज़ुल्मत में भी है तसव्वुर तेरादिन के रंगीन उजालों में हो सिर्फ तुम, मेरे ख़्वाबों में यादों मे हो सिर्फ तुमऔर ज़हन ओ ख़्यालों में हो सिर्फ तुम, कुछ नहीं है तलब मेरी इस के सिवारब से हर दम सवालों में सिर्फ तुम, शब की ज़ुल्मत में भी है तसव्वुर तेरादिन के रंगीन उजालों में हो सिर्फ तुम, कोरा कोरा है हर इक वरक़ ज़ीस्त काआरज़ू की किताबों - [ठोकरें खा के सँभलना नहीं आता है मुझे...](https://bazmeshayari.com/thokare-khaa-ke-sambhlna-nahi/): ठोकरें खा के सँभलना नहीं आता है मुझे चल मेरे साथ कि चलना नहीं आता है मुझे, अपनी आँखों से बहा दे कोई मेरे आँसू अपनी आँखों से निकलना नहीं आता है मुझे, अब तेरी गर्मी ए आग़ोश ही तदबीर करे मोम हो कर भी पिघलना नहीं आता है मुझे, शाम कर देता है अक्सर कोई ज़ुल्फ़ों वाला वर्ना वो दिन हूँ कि ढलना नहीं आता है मुझे, कितने दिल तोड़ चुका हूँ इसी बेहुनरी से जाल में फँस के निकलना नहीं आता है मुझे, बीच दरिया के मैं दरिया तो बदल सकता हूँ अपनी कश्ती को बदलना नहीं आता - [तू मुझ को जो इस शहर में लाया नहीं होता...](https://bazmeshayari.com/tu-mujhko-jo-is-shahar-me/): तू मुझ को जो इस शहर में लाया नहीं होता मैं बे सर ओ सामाँ कभी रुस्वा नहीं होता, उस की तो ये आदत है किसी का नहीं होता फिर इस में अजब क्या कि हमारा नहीं होता, कुछ पेड़ भी बे-फ़ैज़ हैं इस राहगुज़र के कुछ धूप भी ऐसी है कि साया नहीं होता, ख़्वाबों में जो एक शहर बना देता है मुझको जब आँख खुली हो तो वो चेहरा नहीं होता, किस की है ये तस्वीर जो बनती नहीं मुझसे मैं किस का तक़ाज़ा हूँ कि पूरा नहीं होता, मैं शहर में किस शख़्स को जीने की दुआ - [तुम कुछ भी करो होश में आने के नहीं हम...](https://bazmeshayari.com/tum-kuch-bhi-karo-hosh-me/): तुम कुछ भी करो होश में आने के नहीं हम हैं इश्क़ घराने के ज़माने के नहीं हम, हम और मोहब्बत के सिवा कुछ नहीं करते वो रूठ गया है तो मनाने के नहीं हम, दरिया है मोहब्बत तो मिले जिस्म का मैदान एक जिस्म प्याले में समाने के नहीं हम, हम पर भी कभी अपनी हलाकत की नज़र डाल सच जान कि जान अपनी बचाने के नहीं हम, कितना ही करे शोर यहाँ आ के ज़माना तुझ पर से मगर ध्यान हटाने के नहीं हम, ये जिस्म फ़क़त एक तरफ़ का है मुसाफ़िर जा कर फिर उसी जिस्म में - [तुम्हें उससे मोहब्बत है तो हिम्मत क्यूँ नहीं करते...](https://bazmeshayari.com/tumhe-usse-mohabbat-hai-to/): तुम्हें उससे मोहब्बत है तो हिम्मत क्यूँ नहीं करते किसी दिन उसके दर पे रक़्स ए वहशत क्यूँ नहीं करते ? इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँ नहीं करते ? तुम्हारे दिल पे अपना नाम लिखा हमने देखा है हमारी चीज़ फिर हमको इनायत क्यूँ नहीं करते ? मेरे दिल की तबाही की शिकायत पर कहा उसने तुम अपने घर की चीज़ों की हिफ़ाज़त क्यूँ नहीं करते ? बदन बैठा है कब से कासा ए उम्मीद की सूरत सो दे कर वस्ल की ख़ैरात रुख़्सत क्यूँ नहीं करते ? - [राह ए इश्क़ के हर मोड़ पे परेशानियाँ होंगी...](https://bazmeshayari.com/raah-e-ishq-ke-har-mod-pe/): राह ए इश्क़ के हर मोड़ पे परेशानियाँ होंगी बहारे ना सही मगर सदा ही वीरानियाँ होंगी, कहीं गम थाम लेगा और कही लाचारियाँ होंगी तमन्नाओं की बस्ती में बहुत दुश्वारियाँ होंगी, भड़क उठी ये कैसी आग मेरे दिल की बस्ती में मेरे सीने में ही शायद कहीं चिंगारियाँ होंगी, सुनो ! तुम सोच कर राह ए मुहब्बत में क़दम रखना यहाँ मंज़िल से पहले राह में रुस्वाइयाँ होंगी..!! - [पास आओ एक इल्तज़ा सुन लो...](https://bazmeshayari.com/paas-aao-ek-iltaza-sun-lo/): पास आओ एक इल्तज़ा सुन लो प्यार है तुमसे बेपनाह सुन लो, एक तुम्ही को ख़ुदा से माँगा है जब भी माँगी कोई दुआ सुन लो, इब्तदा इश्क़ की हुई तुमसे तुम हो चाहत की इन्तेहा सुन लो, बिन तेरे जी नहीं सकते हम लौट आओ मेरी सदा सुन लो, देख लो ज़िन्दगी अधूरी है न रहो और अब जुदा सुन लो, तुम सिर्फ तुम हो ज़िन्दगी मेरी सच है ये ज़रीन बा ख़ुदा सुन लो..!! - [मुहब्बत जो हकीकी हो तो क़िस्मत ही सँवर जाती...](https://bazmeshayari.com/muhabbat-jo-haqiqi-ho-to/): मुहब्बत जो हकीकी हो तो क़िस्मत ही सँवर जाती मुहब्बत जो मिजाज़ी हो तो उलझन औद कर आती, सुना है लैला मजनू का तो क़िस्सा जो मिजाज़ी था वो क़िस्सा गर हकीकी होता तो शोहरत न हो पाती, मुहब्बत गर मिजाज़ी हो तो दीवानगी ही दीवानगी मुहब्बत गर हकीकी हो तो दीवानगी नहीं लाती, हमारी ज़िन्दगी तो बस मुहब्बत ही मुहब्बत है हकीकी या मिजाज़ी हो ये अपना रंग दिखलाती, किसी की आरज़ू में अपनी चाहत भी मिटा देना यही नवाब की हसरत यही उल्फ़त भी सिखलाती..!! - [मेरा दिल बुराई से तू साफ़ कर दे...](https://bazmeshayari.com/mera-dil-burai-se-tu-saaf/): मेरा दिल बुराई से तू साफ़ कर दे ऐ देने वाले मुझे माफ़ कर दे,   मेरी तरफ से हुई है खताएँ ऐबों पर सत्तारी का एक लिहाफ़ कर दे,   तेरी तरफ़ से हुई है अताएँ नेमतों पर शुक्र का एक गिलाफ़ कर दे,   दुनियाँ भी बनाएँ लोगो को मनाएँ आखिरत भी मेरी तू एह्दाफ़ कर दे,   ना दुखाएँ नवाब दिल किसी का ऐसे हमारे तू औसाफ़ कर दे..!! - [राहें वही खड़ी थी मुसाफ़िर भटक गया...](https://bazmeshayari.com/raahe-wahi-khadi-thi-musafir/): राहें वही खड़ी थी मुसाफ़िर भटक गया एक लफ्ज़ आते आते लबो तक अटक गया, जिस पेड़ की वो छाँव में खेला बड़ा हुआ क्या रोग लग गया कि उसी से लटक गया, दिल से उतर गया वो जो चाहे जिधर गया कानपुर गया हो कि फिर कटक गया, किसको जला रहे हो मेरा हाथ थाम कर लगता है कोई हाथ तेरा भी झटक गया, जिसको नवाब लफ्ज़ मेरा हर अजीज़ था क्यूँ उसको आज लफ्ज़ ए मुहब्बत खटक गया..!! - [ये सच है कि हम लोग बहुत आसानी में रहें...](https://bazmeshayari.com/ye-sach-hai-ki-ham-log/): ये सच है कि हम लोग बहुत आसानी में रहें पर नाम वही कर गए जो बख्त गिरानी में रहे, उसकी याद कितनी देर तक साथ रही क्या कहे गम था तो घर हो कर भी ला मकानी में रहे, हम अपने जीवन में कभी भी न हुए तस्लीम हम सदा किसी मुक़म्मल मिसाल के सानी में रहे, अपनी ज़ुबान हमें अज़ीज़ और न अपनी ज़मीं गुलामी से हम निकले तो ज़िन्दानी में रहे, वो मेरा सोचता तो है मगर किसी और के बाद यानि कि हम एक मौहूम से यानि में रहे, थक हार के शल हो भी गया - [कोई अज़्म ओ इरादा नहीं चाहिए..](https://bazmeshayari.com/koi-azm-o-irada-nahi-chahiye/): कोई अज़्म-ओ-इरादा, नहीं चाहिएआपसे कोई वादा, नहीं चाहिए, आपकी रुह में, इश्क़ बनकर रहूँइससे कुछ भी ज़ियादा, नहीं चाहिए ~ आँचल सक्सैना - [तू कभी आ देख कभी साथ तों चल...](https://bazmeshayari.com/tu-kabhi-aa-dekh-kabhi-saath/): तू कभी आ देख कभी साथ तों चलमेरे तसव्वुर की दुनियाँ बहुत हसीन है, यहाँ हवा जो चलती है गुनगुनाती हैयहाँ जो फूल खिलते है मुस्कुराते है, यहाँ जितने परिंदे चहेक रहें हैमोहब्बत का नग़मा गुनगुना रहें है, यहाँ का मौसम बहुत हसीन हैकभी रिमझिम कभी मस्त ठंडी हवाएं..!! - [कभी दादी कभी नानी से अलग कर दिए गए...](https://bazmeshayari.com/kabhi-dadi-kabhi-naani-se/): कभी दादी कभी नानी से अलग कर दिए गए बच्चे परियों की कहानी से अलग कर दिए गए, कच्ची उम्रो में हमें काम पर लगा दिया गया हम वो बच्चे जो जवानी से अलग कर दिए गए, जंग लड़ने के लिए सीन में लाये गए हम अमन होते ही कहानी से अलग कर दिए गए, हम वो अल्फाज़ जिन्हें ठीक से समझा न गया जब भी लिखे गए मानी से अलग कर दिए गए, पहले दुनियाँ ने सिखाया हमें तैराकी का फन तैरना आया तो पानी से अलग कर दिए गए, चिड़िया घर ने किया जंगल को नगर में आबाद - [कुछ ख़ुद भी थे अफ़सुर्दा से...](https://bazmeshayari.com/kuch-khud-bhi-the-afsurda/): कुछ ख़ुद भी थे अफ़सुर्दा से कुछ लोग भी हमसे रूठ गए, कुछ ख़ुद भी ज़ख्म के आदी थे कुछ शीशे हाथ से टूट गए, कुछ ख़ुद भी थे हस्सास बहुत कुछ अपने मुक़द्दर रूठ गए, कुछ ख़ुद भी इतने मोहतात न थे कुछ लोग भी हमको लूट गए, कुछ तल्ख़ हकीक़तें थी इतनी कि ख़्वाब ही सारे टूट गए..!! ~दानिश मलिक - [काम इस दिल की तबाही से लिया क्या जाए...](https://bazmeshayari.com/kaam-is-dil-ki-tabahi-se/): काम इस दिल की तबाही से लिया क्या जाए सोचता हूँ कि ख़राबे में किया क्या जाए ? ऐ किसी याद की खिड़की से गुज़रते मौसम क्या दिया जाए तुझे और लिया क्या जाए ? इस गिरेबाँ को किसी मौज में आ कर मैंने चाक अगर कर ही लिया है तो सिया क्या जाए ? तेरी ख्वाहिश कि किसी आखिरी दरवाज़े पर मरना मुमकिन ना रहे गर तो ज़िया क्या जाए ? ~मक़सूद वफ़ा - [इश्क़ सहरा है कि दरियाँ कभी सोचा तुमने...](https://bazmeshayari.com/ishq-sahra-hai-ki-dariya/): इश्क़ सहरा है कि दरियाँ कभी सोचा तुमने तुझसे क्या है मेरा नाता कभी सोचा तुमने ? हाँ मैं तन्हा हूँ ये इक़रार भी करता हूँ मगर किसने किया है तन्हा कभी सोचा तुमने ? ये अलग बात है कि जताया नहीं मैंने तुझको वरना कितना तुझको है चाहा कभी सोचा तुमने ? तुझे आवाज़ लिखा, फूल लिखा, प्यार लिखा मैंने क्या क्या तुझे लिखा कभी सोचा तुमने ? मुतमअईन हूँ तुझे लफ्ज़ो की हरारत दे कर मैंने तुम्हे कितना सोचा ज़रीन कभी सोचा तुमने ?? - [दोस्तों ! आज दिल में छुपे कुछ राज़ बयाँ करता हूँ...](https://bazmeshayari.com/dosto-aaj-dil-me-chhupe-kuch/): दोस्तों ! आज मैं दिल में छुपे कुछ राज़ बयाँ करता हूँ दुःख से जुड़े ग़ुरबत के दिनों के लम्हात बयाँ करता हूँ, वो दिन भी क्या दिन थे जब हम भूख से लड़ा करते थे एक बार नहीं हर बार हर रोज़ पल पल मरा करते थे, वो लम्हे जब माँ बड़े प्यार से सर को सहलाया करती थी ख़ुद भूखी रह कर भी माँ हम सबको खिलाया करती थी, बाबा भी जब आते तो दीवारों से लिपट कर रोया करते थे मेहनत से कमाए हुए सिक्को को आँसूओ से धोया करते थे, छोटी छोटी बातों में बड़ी बड़ी - [एक मंज़र यूं नजर आया कि मैं भी डर गया...](https://bazmeshayari.com/ek-manzar-yun-nazar-aaya/):   एक मंज़र यूं नजर आया कि मैं भी डर गया हाथ में रोटी थी जिसके वो भिखारी मर गया, हादसा तो हो नहीं सकता कि सीधी बात थी मौत का आया फ़रिश्ता काम अपना कर गया, पर समझ में ये न आया लाश उसकी देख कर कि भूख उसकी मर गई या भूख से वो मर गया..!! - [वो मुहब्बत गई वो फ़साने गए...](https://bazmeshayari.com/wo-muhabbat-gayi-wo-fasane/): वो मुहब्बत गई वो फ़साने गए जो खज़ाने थे अपने खज़ाने गए, चाहतो का वो दिलकश ज़माना गया सारे मौसम थे कितने सुहाने गए, रेत के वो घरौंदे कहीं गुम हुए अपने बचपन के सारे ठिकाने गए, वो गुलेले तो फिर भी बना ले मगर अब वो नज़रे गई अब वो नज़ारे गए, अपने नामो के सारे शज़र कट गए वो परिंदे गए आशियाने गए, ज़िद्द में सूरज को तकने की वो ज़ुर्रते यार आज़ाद अब वो ज़माने गए..!! ~अज़ीज़ आज़ाद - [दिल जब घबराये तो ख़ुद को एक क़िस्सा सुना देना...](https://bazmeshayari.com/dil-jab-ghabraye-to-khud-ko/): दिल जब घबराये तो ख़ुद को एक क़िस्सा सुना देना ज़िन्दगी कितनी भी मुश्किल क्यूँ ना हो मुस्कुरा देना, आसानी से सब कुछ हासिल हो तो उसकी कद्र कहाँ ? ज़रूरी है कुछ पाने के लिए कुछ गँवा देना, ज़ाहिर है मुसीबतों में साथ कोई अपना नहीं रहता चुप रहना बेशक़ आँख से एक क़तरा बहा देना, शिकायतें सिर्फ दिल मैला करती है और कुछ नहीं आसान है गले मिल कर कभी सब कुछ भूला देना, बीते हुए दुआर की बातें याद कर क्या हासिल प्यारे क्या ज़रूरी है कल की याद में अपने आज को सज़ा देना ? कुछ - [तस्वीर का रुख एक नहीं दूसरा भी है...](https://bazmeshayari.com/tasvir-ka-rukh-ek-nahi/): तस्वीर का रुख एक नहीं दूसरा भी है खैरात जो देता है वही लूटता भी है, ईमान को अब लेके किधर जाइएगा आप बेक़ार है ये चीज, कोई पूछता भी है ? बाज़ार चले आये वफ़ा भी, ख़ुलूस भी अब घर में बचा क्या है कोई सोचता भी है ? वैसे तो ज़माने के बहुत तीर खाये हैं पर इनमे कोई तीर है जो फूल सा भी है, इस दिल ने फ़ितरत किसी बच्चे सी पाई है पहले जिसे खो दे उसे फिर ढूँढता भी है..!! - [यही कम नहीं है ज़िन्दगी के लिए...](https://bazmeshayari.com/yahi-kam-nahi-hai-zindagi-ke-liye/): यही कम नहीं है ज़िन्दगी के लिए यहाँ चैन मिल जाए दो घड़ी के लिए, दिल ए ज़ार यहाँ कौन है तेरा ? तू क्यूँ तड़पता है यूँ किसी के लिए, कितने सामाँ कर लिए पैदा हमने इतनी छोटी सी ज़िन्दगी के लिए, अब तो ऐसा घेरा है गम ए दुनियाँ ने कि लब तरस ही गए हँसी के लिए..!! - [आपसे किसने कहा स्वर्णिम शिखर बनकर दिखो...](https://bazmeshayari.com/aapse-kisne-kaha/): आपसे किसने कहा स्वर्णिम शिखर बनकर दिखो शौक दिखने का है तो फिर नींव के अंदर दिखो, चल पड़ो तो गर्द बनकर आसमानों पर लिखो और अगर बैठो कहीं पर तो मील का पत्थर दिखो, सिर्फ़ देखने के लिए दिखना कोई दिखना नहीं आदमी हो तुम अगर तो आदमी बनकर दिखो, ज़िंदगी की शक्ल जिसमें टूटकर बिखरे नहीं पत्थरों के शहर में वो आईना बनकर दिखो, तुम्हे महसूस होगी तब हर एक दिल की जलन जब किसी धागे सा जलकर मोम के भीतर दिखो, एक जुगनू ने कहा मैं भी तुम्हारे साथ हूँ वक़्त की इस धुँध में तुम रोशनी - [जब तलक लगती नहीं है बोलियाँ मेरे पिता...](https://bazmeshayari.com/jab-talak-lagti-nahi-hai-boliyan/): जब तलक लगती नहीं है बोलियाँ मेरे पिता तब तलक उठती नहीं है डोलिया मेरे पिता, आज भी पगड़ी मिलेगी बेकसी के पाँव में ठोकरों में आज भी है पसलियाँ मेरे पिता, बेघरो का आसरा थे जो कभी बरसात में उन दरख्तों पर गिरी है बिजलियाँ मेरे पिता, आग से कैसे बचाएँ खुबसूरत ज़िन्दगी एक माचिस में कई है तीलियाँ मेरे पिता, जब तलक ज़िन्दा रहेगी जाल बुनने की प्रथा तब तलक फँसती रहेंगी मछलियाँ मेरे पिता, जिसका जी चाहे नचाएँ और एक दिन फूँक दे हम नहीं है काठ की वो पुतलियाँ मेरे पिता, मैंने बचपन में खिलौना तक - [ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है...](https://bazmeshayari.com/ae-sanam-wasl-ki-tadbiro-se/): ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है वही होता है जो मंज़ूर ए ख़ुदा होता है, नहीं बचता नहीं बचता नहीं बचता आशिक़ पूछते क्या हो शब ए हिज्र में क्या होता है, बेअसर नाले नहीं आप का डर है मुझको अभी कह दीजिए फिर देखिए क्या होता है, क्यूँ न तश्बीह उसे ज़ुल्फ़ से दें आशिक़ ए ज़ार वाक़ई तूल ए शब ए हिज्र बला होता है, यूँ तकब्बुर न करो हम भी हैं बंदे उसके सज्दे बुत करते हैं हामी जो ख़ुदा होता है, ‘बर्क़’ उफ़्तादा वो हूँ सल्तनत ए आलम में ताज ए सर इज्ज़ - [क़मर की वो ख़ुर्शीद तस्वीर है गले में...](https://bazmeshayari.com/qamar-ki-wo-khurshid-tasveer-hai/): क़मर की वो ख़ुर्शीद तस्वीर है गले में सितारों की ज़ंजीर है, कहाँ पा ए जानाँ कहाँ मेरा सर ये तालेअ् ये क़िस्मत ये तक़दीर है, ख़फ़ा आप से आप होते हो क्यूँ ? बता दो जो कुछ मेरी तक़्सीर है, न खोलो ख़त उस का धड़कता है दिल ख़ुदा जाने क्या इस में तहरीर है, नुमायाँ है क़ौस ए क़ुज़ह अब्र में मिसी पर लिखौटे की तहरीर है, मुनासिब है कुछ खा के मर जाओ ‘बर्क़’ यही दर्द ए फ़ुर्क़त की तदबीर है..!! ~मिर्ज़ा रज़ा बर्क़ - [किस तरह मिलें कोई बहाना नहीं मिलता...](https://bazmeshayari.com/kis-tarah-mile-koi-bahana-nahi/): किस तरह मिलें कोई बहाना नहीं मिलता हम जा नहीं सकते उन्हें आना नहीं मिलता, फिरते हैं वहाँ आप भटकती है यहाँ रूह अब गोर में भी हम को ठिकाना नहीं मिलता, बदनाम किया है तन ए अनवर की सफ़ा ने दिल में भी उसे राज़ छुपाना नहीं मिलता, दौलत नहीं काम आती जो तक़दीर बुरी हो क़ारून को भी अपना ख़ज़ाना नहीं मिलता, आँखें वो दिखाते हैं निकल जाए अगर बात बोसा तो कहाँ होंठ हिलाना नहीं मिलता, ताक़त वो कहाँ जाएँ तसव्वुर में जो ऐ ‘बर्क़’ बरसों से हमें होश में आना नहीं मिलता ~मिर्ज़ा रज़ा बर्क़ - [घर जब बना लिया तेरे दर पर कहे बग़ैर...](https://bazmeshayari.com/ghar-jab-bana-liya/): घर जब बना लिया तेरे दर पर कहे बग़ैर जानेगा अब भी तू न मेरा घर कहे बग़ैर, कहते हैं जब रही न मुझे ताक़त ए सुख़न जानू किसी के दिल की मैं क्यूँकर कहे बग़ैर, काम उससे आ पड़ा है कि जिसका जहान में लेवे न कोई नाम सितमगर कहे बग़ैर, जी में ही कुछ नहीं है हमारे वगरना हम सर जाए या रहे न रहें पर कहे बग़ैर, छोड़ूँगा मैं न उस बुत ए काफ़िर का पूजना छोड़े न ख़ल्क़ गो मुझे काफ़र कहे बग़ैर, मक़्सद है नाज़ ओ ग़म्ज़ा वले गुफ़्तुगू में काम चलता नहीं है दशना - [वो जिस का अक्स लहू को जगा दिया करता...](https://bazmeshayari.com/wo-jiska-aks-lahoo-ko-jaga-diya/): वो जिस का अक्स लहू को जगा दिया करता मैं ख़्वाब ख़्वाब में उस को सदा दिया करता, क़रीब आती जो तारीख़ उस के मिलने की वो अपने वादे की मुद्दत बढ़ा दिया करता, मैं ज़िंदगी के सफ़र में था मश्ग़ला उसका वो ढूँढ ढूँढ के मुझ को गँवा दिया करता, उसे समेटता मैं जब भी एक नुक़्ते में वो मेरे ध्यान में तितली उड़ा दिया करता, उसी के गाँव की राहों में बैठ कर हर रोज़ मैं दिल का हाल हवा को सुना दिया करता, मुझे वो आँख में रख कर ‘शुमार’ पिछली शब अजब ख़ुमार में पलकें गिरा - [अब तो बस ये जान है मौला बाक़ी झूठी शान है मौला...](https://bazmeshayari.com/ab-to-bas-ye-jaan-hai-maula/): अब तो बस ये जान है मौला बाक़ी झूठी शान है मौला, गम का कोई निशाँ नहीं है आँसू तो एहसान है मौला, आख़िर तू ये कब बोलेगा सबसे बड़ा ईमान है मौला, बच जाओगे दुनियाँ से तुम दुनियाँ का दीवान है मौला, ज़न्नत की क्या मन्नत करना पास में क़ब्रिस्तान है मौला, हर सू मेरे ख़ुदा ही बसते कौन यहाँ इन्सान है मौला, ये दुनियाँ रंगीन बनी थी रंगत ही अरमान है मौला, सबसे सच्ची इस दुनियाँ में बस बच्चो की मुस्कान है मौला..!! - [क्या आँधियाँ बड़ी आने वाली है....](https://bazmeshayari.com/kya-aandhiyan-badi-aane-wali-hai/): क्या आँधियाँ बड़ी आने वाली है क्या कुछ बुरा होने वाला है ? इन्सान पहले से कुछ नहीं सीखा क्या क्या ये फिर से जानवर होने वाला है ? यहाँ तो भाई का भाई अपना नहीं रहा फिर यह कौन है जो किसी का होने वाला है ? किस को क्या मिलेगा इस नफ़रत की जंग में ? मुझे तो लगता है यहाँ हर कोई रोने वाला है, मानवता, भाईचारा, प्रेम की बात कीजिए ऐसा मत बोलिए जो आपस में लड़ाने वाला है..!! - [क्या बताते हैं इशारात तुम्हें क्या मा'लूम...](https://bazmeshayari.com/kya-batate-hai-siharaat-tumhe/): क्या बताते हैं इशारात तुम्हें क्या मा’लूम कितने मश्कूक हैं हालात तुम्हें क्या मा’लूम ? ये उलझते हुए जज़्बात तुम्हें क्या मा’लूम हैं यही बाइ’स ए आफ़ात तुम्हें क्या मा’लूम ? एक आँगन को फ़क़त अपने सजाने के लिए कितनी झीलें हैं मुहिम्मात तुम्हें क्या मा’लूम ? राज़ हस्ती का है क्या मक़्सद ए हस्ती क्या है हल तलब हैं ये सवालात तुम्हें क्या मा’लूम ? एक खनकती हुई मिट्टी हो जिला बख़्शी है कितनी प्यारी है ये सौग़ात तुम्हें क्या मा’लूम ? दिन गुज़रता है किसी और बहाने से मगर कैसे कटती है मेरी रात तुम्हें क्या मा’लूम ? - [उसके नज़दीक ग़म ए तर्क ए वफ़ा कुछ भी नहीं...](https://bazmeshayari.com/uske-nazdik-gam-e-tark-e-wafa/): उसके नज़दीक ग़म ए तर्क ए वफ़ा कुछ भी नहीं मुतमइन ऐसा है वो जैसे हुआ कुछ भी नहीं, अब तो हाथों से लकीरें भी मिटी जाती हैं उसको खो कर तो मेरे पास रहा कुछ भी नहीं, चार दिन रह गए मेले में मगर अब के भी उसने आने के लिए ख़त में लिखा कुछ भी नहीं, कल बिछड़ना है तो फिर अहद ए वफ़ा सोच के बाँध अभी आग़ाज़ ए मोहब्बत है गया कुछ भी नहीं, मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने तू समझता है मुझे तुझसे गिला कुछ भी नहीं, ऐ ‘शुमार’ आँखें - [उसकी चाह में नाम नहीं आने वाला...](https://bazmeshayari.com/uski-chaah-me-naam-nahi-aane/): उसकी चाह में नाम नहीं आने वाला अब मेरा अंजाम नहीं आने वाला, हुस्न से काम पड़ा है आख़िरी साँसों में और वो किसी के काम नहीं आने वाला, मेरी सदा पर वो नज़दीक तो आएगा लेकिन ज़ेर ए दाम नहीं आने वाला, एक झलक से प्यास का रोग बढ़ेगा और इससे मुझे आराम नहीं आने वाला, इश्क़ के नाम पे तेरा रंग न बदले यार तुझ पर कुछ इल्ज़ाम नहीं आने वाला, काम को बैठे हैं और सर पर आई शाम लगता है अब काम नहीं आने वाला, क्यूँ बेकार उस शख़्स का रस्ता देखते हो वो तो ‘शुमार’ - [ज़िन्दगी से एक दिन मौसम खफ़ा हो जाएँगे...](https://bazmeshayari.com/zindagi-se-ek-din-mausam-khafa/): ज़िन्दगी से एक दिन मौसम खफ़ा हो जाएँगे रंग ए गुल और बू ए गुल दोनों हवा हो जाएँगे, आँख से आँसू निकल जाएँगे और टहनी से फूल वक़्त बदलेगा तो सब क़ैदी रिहा हो जाएँगे फूल से ख़ुशबू बिछड़ जाएगी सूरज से किरन साल से दिन वक़्त से लम्हे जुदा हो जाएँगे, कितने पुरउम्मीद कितने खूबसूरत है ये लोग क्या ये सब बाज़ू ये सब चेहरे फ़ना हो जाएँगे..!! ~अहमद मुश्ताक़ - [कभी बहार का मौसम नया दिखाई दे...](https://bazmeshayari.com/kabhi-bahar-ka-mausam-naya/): कभी बहार का मौसम नया दिखाई दे गुलाब बातें करें और सबा दिखाई दे, शब ए जुनूँ है कोई मो’जिज़ा दिखाई दे किसी मकाँ का कोई दर खुला दिखाई दे, मैं चाहूँ तिश्नालबी क्या से क्या दिखाई दे तमाम जू ए रवाँ आबला दिखाई दे, तमाम शब के अँधेरे लें इंतिक़ाम अगर चराग़ छीनने वाली हवा दिखाई दे, हिसार ए तीरा शबी पर नज़र जमाए रहो अजब नहीं कि कोई रास्ता दिखाई दे, बताए कौन हमें कर्ब ज़र्द मौसम का शजर में कोई तो पत्ता हरा दिखाई दे, तू मेरे ज़ेहन पे छा जाए ख़ुशबुओं की तरह मैं फूल देखूँ - [मरीज़ ए इश्क़ का मर्ज़ वो बुखार बताते हैं...](https://bazmeshayari.com/mariz-e-ishq-ka-marz-wo/): मरीज़ ए इश्क़ का मर्ज़ वो बुखार बताते हैं शख़्स एक है पर क़ातिल बेशुमार बताते हैं, नशा छलकता है उनकी निगाहों में हरदम इन मयकदों के नशे को वो खुमार बताते हैं, इख़्तियार नहीं अपनी खिलाफ़त जताने का और मेरी ख़ामोशी को वो इक़रार बताते हैं, सुना है कहीं मोहब्बत के सौदे किए जाते हैं और इन पैसों के सट्टे को ये बाज़ार बताते हैं, नज़रे ही काफ़ी होती हैं इश्क़ पढ़ने के लिए लफ़्ज़ों में किए हुए को वो इज़हार बताते हैं, बड़ा सुकून मिला है उससे मुलाकात होने पे और ये लोग आशिक़ को बेक़रार बताते हैं, - [ज़िंदगी दर्द की कहानी है चश्म ए अंजुम में भी तो पानी है...](https://bazmeshayari.com/zindagi-dard-ki-kahani-hai/): ज़िंदगी दर्द की कहानी है चश्म ए अंजुम में भी तो पानी है, बेनियाज़ाना सुन लिया ग़म ए दिल मेहरबानी है मेहरबानी है, वो भला मेरी बात क्या माने उसने अपनी भी बात मानी है ? शोला ए दिल है ये कि शोला ए साज़ या तेरी शोला ए जवानी है, वो कभी रंग वो कभी ख़ुशबू गाह गुल गाह रातरानी है, बन के मासूम सबको ताड़ गई आँख उसकी बड़ी सियानी है, आपबीती कहो कि जगबीती हर कहानी मेरी कहानी है, दोनों आलम हैं जिसके ज़ेर ए नगीं दिल उसी ग़म की राजधानी है, हम तो ख़ुश हैं तेरी - [अचानक दिलरुबा मौसम का दिल आज़ार हो जाना...](https://bazmeshayari.com/achanak-dilruba-mausam-ka-dil/): अचानक दिलरुबा मौसम का दिल आज़ार हो जाना दुआ आसाँ नहीं रहना सुख़न दुश्वार हो जाना, तुम्हें देखें निगाहें और तुम को ही नहीं देखें मोहब्बत के सभी रिश्तों का यूँ नादार हो जाना, अभी तो बेनियाज़ी में तख़ातुब की सी ख़ुशबू थी हमें अच्छा लगा था दर्द का दिलदार हो जाना, अगर सच इतना ज़ालिम है तो हमसे झूट ही बोलो हमें आता है पतझड़ के दिनों गुलबार हो जाना, अभी कुछ अन-कहे अल्फ़ाज़ भी हैं कुंज ए मिज़्गाँ में अगर तुम इस तरफ़ आओ सबा रफ़्तार हो जाना, हवा तो हमसफ़र ठहरी समझ में किस तरह आए हवाओं - [अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं...](https://bazmeshayari.com/abhi-kuch-aur-karishme-gazal-ke/): अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं ‘फ़राज़’ अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं, जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान ए सफ़र कुछ और दूर ज़रा साथ चल के देखते हैं, रह ए वफ़ा में हरीफ़ ए ख़िराम कोई तो हो सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं, तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं, ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में जो लालचों से तुझे मुझको जल के देखते हैं, ये क़ुर्ब क्या है कि यक जाँ हुए न दूर रहे - [कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता...](https://bazmeshayari.com/kabhi-kisi-ko-muqammal-jahan/): कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता, तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो जहाँ उमीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता, कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता, ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता, चराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता..!! ~निदा फाज़ली - [ज़रा सी देर थी बस एक दिया जलाना था...](https://bazmeshayari.com/zara-see-der-thi-bas-ek-diya/): ज़रा सी देर थी बस एक दिया जलाना था और इसके बाद फ़क़त आँधियों को आना था, मैं घर को फूँक रहा था बड़े यक़ीन के साथ कि तेरी राह में पहला क़दम उठाना था, वरना कौन उठाता ये जिस्म ओ जाँ के अज़ाब ये ज़िंदगी तो मोहब्बत का एक बहाना था, ये कौन शख़्स मुझे किर्चियों में बाँट गया ये आइना तो मेरा आख़िरी ठिकाना था, पहाड़ भाँप रहा था मेरे इरादे को वो इस लिए भी कि तेशा मुझे उठाना था, बहुत सँभाल के लाया हूँ एक सितारे तक ज़मीन पर जो मेरे इश्क़ का ज़माना था, मिला - [डूब कर भी न पड़ा फ़र्क़ गिराँ जानी में...](https://bazmeshayari.com/doob-kar-bhi-na-pada-farq/): डूब कर भी न पड़ा फ़र्क़ गिराँ जानी में मैं हूँ पत्थर की तरह बहते हुए पानी में, ये मोहब्बत तो बहुत बा’द का क़िस्सा है मियाँ मैंने उस हाथ को पकड़ा था परेशानी में, रफ़्तगाँ तुम ने अबस ढोंग रचाया वर्ना इश्क़ को दख़्ल नहीं मौत की अर्ज़ानी में, ये मोहब्बत भी विलायत की तरह रखती है हालत ए हाल में ये हालत ए हैरानी में, इस लिए जल के कभी राख नहीं होता दिल ये कभी आग में होता है कभी पानी में, एक मोहब्बत ही पे मौक़ूफ़ नहीं है ‘ताबिश’ कुछ बड़े फ़ैसले हो जाते हैं नादानी - [दी है वहशत तो ये वहशत ही मुसलसल हो जाए...](https://bazmeshayari.com/dee-haiwahshat-to-ye-wahshat/): दी है वहशत तो ये वहशत ही मुसलसल हो जाए रक़्स करते हुए अतराफ़ में जंगल हो जाए, ऐ मेरे दश्त मिज़ाजो ये मेरी आँखें हैं इनसे रूमाल भी छू जाए तो बादल हो जाए, चलता रहने दो मियाँ सिलसिला दिलदारी का आशिक़ी दीन नहीं है कि मुकम्मल हो जाए, हालत ए हिज्र में जो रक़्स नहीं कर सकता उसके हक़ में यही बेहतर है कि पागल हो जाए, मेरा दिल भी किसी आसेबज़दा घर की तरह ख़ुद ब ख़ुद खुलने लगे ख़ुद ही मुक़फ़्फ़ल हो जाए, डूबती नाव में सब चीख़ रहे हैं ‘ताबिश’ और मुझे फ़िक्र ग़ज़ल मेरी - [गर्म रफ़्तार है तेरी ये पता देते हैं...](https://bazmeshayari.com/garm-raftar-hai-teri-ye/): गर्म रफ़्तार है तेरी ये पता देते हैं दम बदम लौ तेरे नक़्श ए कफ़ ए पा देते हैं, हिज्र से करते हैं नाशाद हमें वस्ल से शाद ख़ुद मरज़ देते हैं और आप शिफ़ा देते हैं, दिल की तुम बात समझते हो ज़बाँ गो न हिले ख़ूब सुनते हो जो चुपके से सदा देते हैं, कम न समझें मेरी आहों के शरारों को हुज़ूर आग अभी सारे ज़माने में लगा देते हैं, तुमने एहसान किया है कि नमक छिड़का है अब मुझे ज़ख़्म ए जिगर और मज़ा देते हैं, उन की तक़दीर में है मेरे लहू में भरना ख़ून - [कोई नई चोट फिर से खाओ ! उदास लोगो...](https://bazmeshayari.com/koi-nayi-chot-fir-se/): कोई नई चोट फिर से खाओ ! उदास लोगो कहा था किसने कि मुस्कुराओ ! उदास लोगो, गुज़र रही है गली से फिर मातमी हवाएँ किवाड़ खोलो दिए बुझाओ ! उदास लोगो, जो रात मक़्तल में बाल खोले उतर रही थी वो रात कैसी रही सुनाओ ! उदास लोगो ? कहाँ तलक बाम ओ दर चराग़ां किए रखोगे बिछड़ने वालों को भूल जाओ ! उदास लोगो, उजाड़ जंगल डरी फ़ज़ा हाँफती हवाएँ यहीं कहीं बस्तियाँ बसाओ ! उदास लोगो, ये किस ने सहमी हुई फ़ज़ा में हमें पुकारा ये किसने आवाज़ दी के आओ ! उदास लोगो, ये जाँ गँवाने - [जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना...](https://bazmeshayari.com/jo-chal-sako-to-koi-aisi/): जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना मुझे गुमाँ भी ना हो और तुम बदल जाना, ये शोलगी हो बदन की तो क्या किया जाये सो लाजमी है तेरे पैरहन का जल जाना, तुम्हीं करो कोई दरमाँ, ये वक्त आ पहुँचा कि अब तो चारागरों का भी हाथ मल जाना, अभी अभी जो जुदाई की शाम आई थी हमें अजीब लगा ज़िन्दगी का ढल जाना, सजी सजाई हुई मौत ज़िन्दगी तो नहीं मुअर्रिखों ने मकाबिर को भी महल जाना, ये क्या कि तू भी इसी साअते जवाल में है कि जिस तरह है सभी सूरजों को ढल जाना, - [किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं...](https://bazmeshayari.com/kitabo-me-mere-fasane/): किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं नादां हैं गुज़रे ज़माने ढूँढते हैं, जब वो थे तलाश ए ज़िंदगी भी थी अब तो मौत के ठिकाने ढूँढते हैं, कल ख़ुद ही अपनी महफ़िल से निकाला था आज हुए से दीवाने ढूँढते हैं, मुसाफ़िर बेख़बर हैं तेरी आँखों से तेरे शहर में मैख़ाने ढूँढते हैं, तुझे क्या पता ऐ सितम ढाने वाले हम तो रोने के बहाने ढूँढते हैं, उनकी आँखों को यूँ ना देखो ’फ़राज़’ नए तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं..!! ~अहमद फ़राज़ - [अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौन...](https://bazmeshayari.com/ab-ke-rut-badlito-khushboo/): अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौन ज़ख़्म फूलों की तरह महकेंगे पर देखेगा कौन ? देखना सब रक़्स ए बिस्मल में मगन हो जाएँगे जिस तरफ़ से तीर आयेगा उधर देखेगा कौन ? वो हवस हो या वफ़ा हो बात महरूमी की है लोग तो फल फूल देखेंगे शजर देखेगा कौन ? हम चिराग़ ए शब ही जब ठहरे तो फिर क्या सोचना रात थी किस का मुक़द्दर और सहर देखेगा कौन ? आ फ़सील ए शहर से देखें ग़नीम ए शहर को शहर जलता हो तो तुझ को बाम पर देखेगा कौन ? ~अहमद फ़राज़ - [इस तरह मोहब्बत में दिल पे हुक्मरानी है...](https://bazmeshayari.com/is-tarah-muhabbat-me-dil/): इस तरह मोहब्बत में दिल पे हुक्मरानी है दिल नहीं मेरा गोया उनकी राजधानी है, घास के घरौंदे से ज़ोर आज़माई क्या ? आँधियाँ भी पगली हैं बर्क़ भी दिवानी है, शायद उनके दामन ने पोंछ दीं मेरी आँखें आज मेरे अश्कों का रंग ज़ाफ़रानी है, पूछते हो क्या बाबा क्या हुआ दिल ए ज़िंदा वो मेरा दिल ए ज़िंदा आज आँ जहानी है, ‘कैफ़’ तुझ को दुनिया ने क्या से क्या बना डाला यार अब तेरे मुँह पर रंग है न पानी है..!! ~कैफ़ भोपाली - [बेतकल्लुफ़ मेरा है जान बनाता है मुझे...](https://bazmeshayari.com/betakalluf-mera-hai-jaan-batata/): बेतकल्लुफ़ मेरा है जान बनाता है मुझे सामने तेरे कहाँ बोलना आता है मुझे, वो उदासी कि बिखरने से नहीं बच सकता और तेरा लम्स कि चुनता चला जाता है मुझे, अब मेरे लौट के आने का कोई वक़्त नहीं यूँ भी अब घर से सिवा कौन बुलाता है मुझे, गीत ही सिर्फ़ लबों पर हो तो आ जाए भी नींद वो कोई और कहानी भी सुनाता है मुझे, क़त्अ कर के भी तअ’ल्लुक़ वो कहाँ चैन से है इसके अस्बाब ओ दलाएल भी गिनाता है मुझे, ख़ुद से वो कौन से शिकवे हैं कि जाते ही नहीं अपने जैसों - [एक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हमने...](https://bazmeshayari.com/ek-din-khud-ko-apne-paas/): एक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हमने पहले यार बनाया फिर समझाया हमने, ख़ुद भी आख़िर कार उन्ही वा’दों से बहले जिनसे सारी दुनिया को बहलाया हमने, भीड़ ने यूँही रहबर मान लिया है वर्ना अपने अलावा किस को घर पहुँचाया हमने, मौत ने सारी रात हमारी नब्ज़ टटोली ऐसा मरने का माहौल बनाया हमने, घर से निकले चौक गए फिर पार्क में बैठे तन्हाई को जगह जगह बिखराया हमने, इन लम्हों में किसकी शिरकत कैसी शिरकत उसे बुला कर अपना काम बढ़ाया हमने, दुनिया के कच्चे रंगों का रोना रोया फिर दुनिया पर अपना रंग जमाया हमने, जब - [बरसों जुनूँ सहरा सहरा भटकाता है...](https://bazmeshayari.com/barso-junoon-sahra-bhatkata-hai/): बरसों जुनूँ सहरा सहरा भटकाता है घर में रहना यूँही नहीं आ जाता है, प्यास और धूप के आदी हो जाते हैं हम जब तक दश्त का खेल समझ में आता है, आदत थी सो पुकार लिया तुम को वर्ना इतने कर्ब में कौन किसे याद आता है, मौत भी एक हल है तो मसाइल का लेकिन दिल ये सुहुलत लेते हुए घबराता है, एक तुम ही तो गवाह हो मेरे होने के आईना तो अब भी मुझे झुटलाता है, उफ़ ये सज़ा ये तो कोई इंसाफ़ नहीं कोई मुझे मुजरिम ही नहीं ठहराता है, कैसे कैसे गुनाह किए हैं - [काश ! तुम मेरी होती तो क्या गज़ब ज़िन्दगी होती](https://bazmeshayari.com/kash-tum-meri-hoti/): काश ! तुम मेरी होती तो क्या गज़ब ज़िन्दगी होती फिर ना ज़िन्दगी में हमारी कभी कोई कमी होती, तुमने सिर्फ़ शिकवे, गिले ही पढ़े मेरे अश’आरो में कभी उनमे छुपे प्यार पढ़े होते तो तुम्हे ख़ुशी होती, माना तुम्हे ख़ुदा ने नवाज़ा है ज़र ए इर्तिफा ए हुस्न से जो करते हम पे भी इनायत तो दिल में रौशनी होती, बुरी आदत है मयकशी मगर कितनो को ज़िन्दा रखा ना होती शराब तो सोचो फिर कितनी ख़ुदकुशी होती..!! - [वो बड़े बनते हैं अपने नाम से](https://bazmeshayari.com/wo-bade-bante-hai/): वो बड़े बनते हैं अपने नाम से हम बड़े बनते है अपने काम से, वो कभी आग़ाज़ कर सकते नहीं ख़ौफ़ लगता है जिन्हें अंजाम से, एक नज़र महफ़िल में देखा था जिसे हम तो खोए है उसी में शाम से, दोस्ती चाहत वफ़ा इस दौर में काम रख ऐ दोस्त अपने काम से, जिन से कोई वास्ता तक है नहीं क्यूँ वो जलते है हमारे नाम से ? उस के दिल की आग ठंडी पड़ गई मुझको शोहरत मिल गई इल्ज़ाम से, महफ़िलों में ज़िक्र मत करना मेरा आग लग जाती है मेरे नाम से..!! ~सिराज फ़ैसल ख़ान - [ख़्वाब के फूलों की ताबीरें कहानी हो गईं](https://bazmeshayari.com/khwab-ke-phoolo-ki/): ख़्वाब के फूलों की ताबीरें कहानी हो गईं ख़ून ठंडा पड़ गया आँखें पुरानी हो गईं, जिस का चेहरा था चमकते मौसमों की आरज़ू उस की तस्वीरें भी औराक़ ए ख़िज़ानी हो गईं, दिल भर आया काग़ज़ ए ख़ाली की सूरत देख कर जिन को लिखना था वो सब बातें ज़बानी हो गईं, जो मुक़द्दर था उसे तो रोकना बस में न था उन का क्या करते जो बातें ना गहानी हो गईं, रह गया ‘मुश्ताक़’ दिल में रंग ए याद ए रफ़्तगाँ फूल महँगे हो गए क़ब्रें पुरानी हो गईं..!! ~अहमद मुश्ताक़ - [अज़ीब कर्ब में गुज़री जहाँ जहाँ गुज़री](https://bazmeshayari.com/azib-karb-me-guzri/): अज़ीब कर्ब में गुज़री जहाँ जहाँ गुज़री अगरचे चाहने वालो के दरमियाँ गुज़री, तमाम उम्र चिराग़ ए उम्मीद जलाते रहे तमाम उम्र उम्मीदों के दरमियाँ गुज़री, गुज़र गई जो तेरे साथ वो यादगार रही बिना तेरे जो गुज़री, वबाल ए जाँ गुज़री, मुझे सुकूं मयस्सर नहीं तो क्या गम है ? गुलो की उम्र तो काँटो के दरमियाँ गुज़री, अज़ीब चीज है ये गर्दिश ए हालात मोहसिन कभी ज़मीं तो कभी मिस्ल ए आसमां गुज़री..!! ~मोहसिन नकवी - [तेरी यादें तेरी बातें तेरी ख़ामोशी तेरा फ़िक्र](https://bazmeshayari.com/teri-yaaden-teri-baaten/): तेरी यादें, तेरी बातें, तेरी ख़ामोशी, तेरा फ़िक्र तेरा ज़िक्र, अब सब कुछ आसान सा लगता है, तू मुझ में रहे या मैं तुझ में रहूँ एक ही बात है यूँ तेरा छोड़ के जाना मुझे नादान सा लगता है, कुछ बोलते नहीं लब ये तेरे ख़ामोश से रहते है वो लफ्ज़ ज़िन्दा तो है मगर बेज़ुबान सा लगता है, क्या खोया, क्या पाया, क्या से क्या हुए इश्क़ में जाने क्या ज़ुल्म हुआ, दिल ये बेज़ान सा लगता है, अब कुछ होश नहीं रहता, न कुछ ख़बर है रहती तेरी यादो में खोया मेरा ये दिल हैरान सा लगता - [गम से वो मेरे आशना न हुआ कभी](https://bazmeshayari.com/gam-se-wo-mere/): गम से वो मेरे आशना न हुआ कभी और दुःख मेरा मुझ से जुदा न हुआ कभी, ज़िन्दगी के सफ़र में साथ चलता रहा मगर शनासाई हो कर भी वो शनासा न हुआ कभी, ज़ख्मो पे उसने मरहम न रखा कभी यूँ उस दर्द का कोई मदावा न हुआ कभी, आशियाने में रह कर भी सायेबा न मिला कभी हिस्से में उसके भी सुख न आया कभी, गुज़रे बहुत मराहिल ज़िन्दगी के सफ़र में मगर न कर सका मुहब्बत का इज़हार कभी..!! - [अंज़ाम नहीं मिलता, उन्वान नहीं मिलता](https://bazmeshayari.com/anzam-nahi-milta-unwan/): अंज़ाम नहीं मिलता, उन्वान नहीं मिलता कम इश्क़ के दरिया में तूफ़ान नहीं मिलता, रोते है लिपट के वो मजबूरियाँ कह कह के शायद उन्हें हम जैसा नादान नहीं मिलता, शायद ये वफ़ाओ का मेरी ही सिला है कि हम जैसा शहर भर में बदनाम नहीं मिलता, मेरी ये तमन्ना है अब मौत मिले लेकिन साँसों की ये ज़िद्द उनका पैगाम नहीं मिलता, मैं भूल कर भी उसे जी लूँ मुश्किल है मगर यारो ख़ुद को जो दगा दे वो ईमान नहीं मिलता..!! - [मेरी एक छोटी सी कोशिश तुम्हे पाने के लिए](https://bazmeshayari.com/meri-ek-chhoti-si-koshish/): मेरी एक छोटी सी कोशिश तुम्हे पाने के लिए बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए, रेत मेरी उम्र, मैं बच्चा, निराले मेरे खेल मैंने दीवारे उठाई ही है गिराने के लिए, वक़्त होंठो से मेरे वो भी खुरच के ले गया एक तबस्सुम जो था दुनियाँ को दिखाने के लिए, आसमां ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से इतनी बारिश, महज़ एक शोले को बुझाने के लिए, छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए, देर तक हँसता रहा उन पर हमारा बचपना तजरुबे आये - [अधूरे ख़्वाब की अनोखी ताबीर होती है](https://bazmeshayari.com/adhure-khwab-ki-anokhi/): अधूरे ख़्वाब की अनोखी ताबीर होती है हर हाथों में मुहब्बत की लकीर होती है, जरूरी तो नहीं होता क़त्ल हथियार से हो निगाह ए यार भी अज़ब शमशीर होती है, मुहब्बत की राह में हायल अपने ही रहते है हमारे पैरो में रिश्तो की जंज़ीर होती है, अक्सर हार जाते है सिकंदर भी, खिलाड़ी भी यानि जो जीत होती है वही तक़दीर होती है, मुहब्बत ख़ुदफ़रामोशी, मुहब्बत ख़्वाब ए जज़ीरा नहीं फिर ख़त्म चाहत की तफ़सीर होती है, रखा ऐसा सहर नवाब मुहब्बत में ख़ुदा ने गरूर बे नियाज़ी वगरना कहाँ असीर होती है..!! - [मौत तो एक दिन आनी ही है](https://bazmeshayari.com/maut-to-ek-din-aani-hi/): मौत तो एक दिन आनी ही है ज़िन्दगी जो मिली फ़ानी ही है, शख्स वो है अक्लमंद ओ दाना जिस ने कुछ फ़िक्र की ठानी है, बाद पछताने से हो भला क्या जान कर के भी मन मानी ही है, हाय ! अफ़सोस करने की नौबत अदल के दिन पशेमानी ही है, आँसू जब नदामत के निकले मगफिरत, दरगुज़र होनी ही है, तौबा का दर हमेशा खुला पर शर्त बस हिस रहे इतनी ही है, जब नसीहत बड़ो की सुने तब गाड़ी पटरी पे भी लानी ही है, ख़ूब अच्छे अमल कर यहाँ तू खैर से झोली भी भरनी ही - [किसी दिन तो तू भी मुहब्बत हक़ीक़ी कर के देख](https://bazmeshayari.com/kisi-din-to-tu/): किसी दिन तो तू भी मुहब्बत हक़ीक़ी कर के देख कैसे जीते है तेरे बगैर तू भी तो हम पर मर के देख, यूँ कश्ती ए दिल के किनारे बैठ तू अंदाज़ा न लगा किसी दिन इसकी गहराइयो में उतर कर के देख, मुरझाई हुई सी तू एक दिन गुलो सा खिल जाएगी एक बार महबूब की बाँहों में तू बिखर कर के देख, पिघल कर तो देख किसी के प्यार में मोम की तरह किसी के इंतज़ार में दीये की तरह जल कर के देख, समझ आ जाएगी तुझे भी धड़कनो की सदा ज़रीन किसी दिन इश्क़ की गली - [ऐसे मौसम में भला कौन जुदा होता है](https://bazmeshayari.com/aise-mausam-me-bhala/): ऐसे मौसम में भला कौन जुदा होता है जैसे मौसम में तू हर रोज़ खफ़ा होता है, रोज़ छीन जाता है जीने का सहारा हमसे रोज़ आँखों से कोई ख़्वाब दफ़ा होता है, आओ तारिक गुज़रगाहो में ढूँढ़ें उनको जिनकी पलकों पे मुहब्बत का दीया होता है, और बढ़ जाता है नादान मुहब्बत पे यकीं जब किसी बात पे वो शख्स खफ़ा होता है, तुमको मालूम है दुनियाँ में फ़कीरो का ज़रीन उनका और कोई भी नहीं सिर्फ़ ख़ुदा होता है..!! - [तेरे और मेरे बारे में जो मशहूर एक कहानी है](https://bazmeshayari.com/tere-aur-mere-baare/): तेरे और मेरे बारे में जो मशहूर एक कहानी है वही कहानी अब ज़माने के ज़हन से मिटानी है, हमारे बारे में जो तुम पूछती फिरती हो गैरो से ये कोई खैरियत आगाही नहीं ये बदगुमानी है, किया है राह ए मुहब्बत में खाक़ ख़ुद को मैंने हमारी तरह भला कब तुमने खाक़ छानी है ? बला की चमक आई है मेरे शेरो में क्यूँ कि स्याह शब में भी मैंने चादर गज़ल की तानी है, एक सवाल नामा है ये ज़िन्दगी अपनी ज़रीन और उस पे अपनी तबीयत भी इम्तेहानी है, टूटे दिल के अल्फाज़ ज़रीन तेरी मेहरबानी हैं - [मैं सुबह बेचता हूँ, मैं शाम बेचता हूँ](https://bazmeshayari.com/main-subah-bechta-hoo/): मैं सुबह बेचता हूँ, मैं शाम बेचता हूँ नहीं मैं महज़ अपना काम बेचता हूँ, इन बूढ़े दरख्तों को बेज़ान न समझो मैं अभी तक पिता का नाम बेचता हूँ, हुई सस्ती ये दुनियाँ, महँगा रहा मैं अब दे इश्तिहार नया दाम बेचता हूँ, सियासत का शौक़ जो पाला है मैंने कभी रहीम तो कभी राम बेचता हूँ, मुफ़लिसी भी क्या क्या रंग दिखाती है मुँह से लगा हुआ मैं ज़ाम बेचता हूँ..!! - [पेड़ मुझे तब हसरत से देखा करते थे](https://bazmeshayari.com/ped-mujhe-tab-hasrat-se/): पेड़ मुझे तब हसरत से देखा करते थे जब मैं जंगल में पानी लाया करता था, थक जाता था बादल साया करते करते और फिर मैं बादलो पे साया करता था, बैठा रहता था मैं साहिल पे सारा दिन दरियाँ भी मुझसे जान छुड़ाया करता था, बिन्त ए सहरा रूठा करती थी मुझ से मैं सहरा से जब रेत चुराया करता था..!! - [शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा](https://bazmeshayari.com/shor-karunga-aur-na/): शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा ख़ामोशी से अपना रोना रो लूँगा, सारी उम्र इसी ख्वाहिश में गुज़री है दस्तक होगी और दरवाज़ा खोलूँगा, तन्हाई में ख़ुद से बातें करनी है मेरे मुँह में जो आएगा वही बोलूँगा, रात बहुत है तुम चाहो तो सो जाओ मेरा क्या मैं दिन में भी सो लूँगा, तुमको दिल की बात बतानी है लेकिन आँखे बंद करो तो मुट्ठी खोलूँगा..!! - [थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का](https://bazmeshayari.com/thak-gaya-hai-musalsal/): थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का और अब भी है मेरे शाने पे सर उदासी का, वो कौन कीमियागर था के जो बिखेर गया तेरे गुलाब से चेहरे पे ज़र उदासी का, मेरे वजूद के खि़ल्वतक़दे में कोई तो था जो रख गया है दीया ताक़ पर उदासी का, मैं तुझसे कैसे कहूँ ऐ यार ए मेहरबां मेरे के तू ही इलाज़ है मेरी हर उदासी का, ये अब जो आग का दरिया मेरे वजूद में है यही तो पहले पहल था शरार उदासी का, ना जाने आज कहाँ खो गया सितार ए शाम वो मेरा दोस्त, मेरा हमसफ़र - [दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला](https://bazmeshayari.com/dost-ban-kar-bhi-nahi/): दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला, अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मेरा सख़्त नादिम है मुझे दाम में लाने वाला, सुबह दम छोड़ गया निकहत ए गुल की सूरत रात को ग़ुंचा ए दिल में सिमट आने वाला, क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से वो जो एक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला, तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला, मुंतज़िर किस का हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं कौन आएगा यहाँ कौन है आने वाला, क्या ख़बर - [कर्ब हरे मौसम को तब तक सहना पड़ता है](https://bazmeshayari.com/karb-hare-mausam-ko/): कर्ब हरे मौसम को तब तक सहना पड़ता है पतझड़ में तो पात को आख़िर झड़ना पड़ता है, कब तक औरो के साँचे में ढलते जाएँगे ? किसी जगह तो हमको आख़िर उड़ना पड़ता है, सिर्फ़ अँधेरे ही से दीये की जंग नहीं होती तेज़ हवाओं से भी तो उसको लड़ना पड़ता है, सही सलामत आगे बढ़ते रहने की खातिर कभी कभी तो ख़ुद भी पीछे हटना पड़ता है, शेर कहे तो अक्ल ओ जुनूँ की सरहद पर रुक के अल्फाज़ में जज्बो के नगों को जड़ना पड़ता है, ज़िन्दगी जीना इतना भी आसान नहीं आज़ाद साँसों में रेज़ा रेज़ा - [कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए](https://bazmeshayari.com/kaise-kahe-kya-kahe/): कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए हम अल्फाज़ ढूँढ़ते रहे, वो बात अपनी कह गए, लोगो ने क्या कुछ न कहा, सब गँवारा कर लिया हम इश्क़ की खातिर ज़माने के सितम भी सह गए, बाक़ी न रही कोई तमन्ना न कुछ आरज़ू अपनी सैलाब कुछ ऐसा चला कि अरमान भी सारे बह गए, गुलशन में तो गवाह है हर शज़र उस तूफ़ान का शाखों पे अब बस सहमे हुए से चंद पत्ते ही रह गए, बड़ी उम्मीद से हमने गढ़े थे जो महल सपनो के वो इमारत खंडहर बनी, खंडहर भी आख़िर ढह गए..!! - [दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें](https://bazmeshayari.com/dukh-fasana-nahi-ki/): दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें, आज तक अपनी बेकली का सबब ख़ुद भी जाना नहीं कि तुझ से कहें, बे तरह हाल ए दिल है और तुझ से दोस्ताना नहीं कि तुझ से कहें, एक तू हर्फ़ ए आश्ना था मगर अब ज़माना नहीं कि तुझ से कहें, क़ासिदा हम फ़क़ीर लोगों का एक ठिकाना नहीं कि तुझ से कहें, ऐ ख़ुदा दर्द ए दिल है बख़्शिश ए दोस्त आब ओ दाना नहीं कि तुझ से कहें, अब तो अपना भी उस गली में ‘फ़राज़’ आना जाना नहीं कि तुझ - [जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए](https://bazmeshayari.com/jungle-kaat-diye-aur/): जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए अपने घरो के चिराग़ लोगो ने ख़ुद बुझा दिए, चाँद छुआ मंगल पर भी बस पहुँचने ही वाले है मगर ज़मीं पे चलना न आया सागर सुखा दिए, मगर कुछ ऐसे भी हुनरदां निकले कि ज़मीं को ही मंगल कर दिया और सभी मंगल भूला दिए, जाने किन किन खज़ानो से ख़ुदा ने नवाज़ा था न जाने किस ख्याल से सभी खज़ाने लुटा दिए, ज़मीं की क्या बात कहें हवस के मारे इन्साँ ने धूल और धुएँ में तमाम आसमाँ तक उड़ा दिए..!! ~दर्पन कानपुरी - [पगडंडी पर छाँवो जैसा कुछ नहीं दिखता](https://bazmeshayari.com/pagdandi-par-chhanvo-jaisa/): पगडंडी पर छाँवो जैसा कुछ नहीं दिखता गाँवों में अब गाँवों जैसा कुछ नहीं दिखता, कथनी सबकी कड़वी कड़वी, करनी टेढ़े मेढ़े बरक़त और दुआओं जैसा कुछ नहीं दिखता, बिछुआ, पैरी, लाल महावर, रुनझुन करती पायल गोरी के गोरे गोरे पाँवो जैसा कुछ नहीं दिखता, राधा, मुनिया, धनिया, सीता जींस पहनती है अब उन शोख़ अदाओं जैसा कुछ नहीं दिखता, बरगद, ईमली, महुआ, पीपल, शीशम, नीम के अब शीतल मंद हवाओ जैसा कुछ नहीं दिखता, जब से पंचायत में सियासत की गहरी पैठ हुई तबसे इनमे ग्राम सभाओ जैसा कुछ नहीं दिखता..!! - [सीधे सादे से है कुछ पेंच ओ ख़म नहीं रखते](https://bazmeshayari.com/sidhe-saade-se-hai-kuch/): सीधे सादे से है कुछ पेंच ओ ख़म नहीं रखते जी भर आता है तो रो लेते है गम नहीं रखते, खुली क़िताब है हम, पर्दादारी नहीं है कोई जो कहना है साफ़ कह देते है, भ्रम नहीं रखते, दर्द किसी का हो छलकती है आँख अपनी भी हो दुआ या कि मुहब्बत हो कम नहीं रखते, दुश्मनी, नफ़रत, गिला या कि शिकवा दिल में रखने वाले छुपा के रखते है, हम नहीं रखते, ख़ुश हो लेते है हम याद कर के मुरव्व्ते उनकी संगदिली को भूल जाते है, आँख नम नहीं रखते..!! - [चीखते है दर ओ दीवार नहीं होता मैं](https://bazmeshayari.com/chikhte-hai-dar-o-deewar/): चीखते है दर ओ दीवार नहीं होता मैं आँख खुलने पे भी बेदार नहीं होता मैं, ख़्वाब देखना हो सफ़र करना या रोना हो मुझ में ख़ूबी है बेज़ार नहीं होता मैं, अब भला अपने लिए बनना सँवरना कैसा ख़ुद से मिलना हो तो तैयार नहीं होता मैं, कौन आएगा भला मेरी अयादत के लिए बस इसी खौफ़ से बीमार नहीं होता मैं, मंज़िल ए इश्क़ पे निकला तो कहा रस्ते ने हर किसी के लिए हमवार नहीं होता मैं, तेरी तस्वीर से तस्कीन नहीं होती मुझे तेरी आवाज़ से सरशार नहीं होता मैं, लोग कहते है मैं कि मैं - [क़ुबूल है अब तो ज़िन्दगी का हर तोहफ़ा](https://bazmeshayari.com/qubul-hai-ab-to/): क़ुबूल है अब तो ज़िन्दगी का हर तोहफ़ा मैंने ख्वाहिशो का नाम बताना छोड़ दिया, जो दिल के क़रीब है वही मेरे अजीज़ है मैंने अब गैरो पे हक़ जाताना छोड़ दिया, जो समझ ही न सके हाल ए दिल मेरा मैंने अब उन्हें ज़ख्म दिखाना छोड़ दिया, जो गुज़रती है इस दिल पे वही हकीक़त है मैंने दिखावे के लिए मुस्कुराना छोड़ दिया, जो महसूस ही न करे सके कैफ़ियत मेरी मैंने उनके साथ वक़्त बिताना छोड़ दिया, फ़ितरत में ही हो शुमार जिनके नाराज़गी मैंने अब उन्हें बार बार मानना छोड़ दिया, गर कोई होगा अपना तो मिलेगा - [जुबां कड़वी, हलक सूखा, हैं साँसे मुनज़मिद मेरी](https://bazmeshayari.com/zuban-kadwi-halak-sukha/): जुबां कड़वी, हलक सूखा, हैं साँसे मुनज़मिद मेरी ज़हर ने किया क्या आख़िर ज़रा सी चासनी दे कर, बने मेरी भला क्यूँ कर गुलों से फूलो कलियों से डसा है मुझको बहारो ने फ़रेब ए ज़िन्दगी दे कर, इनायत ये कैसी की है मुझ पे इन कुंद साँपों ने लो देखो बन गया पत्थर मैं अपनी सादगी दे कर..!! - [अज़ब क़ातिब है इन्साँ में फ़रावानी नहीं भरता](https://bazmeshayari.com/azab-qatib-hai-insa/): अज़ब क़ातिब है इन्साँ में फ़रावानी नहीं भरता दगाबाज़ी तो भरता है वफ़ादारी नहीं भरता, भरोसा था तभी तो साथ तेरा दे रहा था मैं ज़रा भी शक़ अगर होता तो मैं हामी नहीं भरता, बहुत ख़ुद्दार होना भी अना का एक पहलू है घड़े का मुँह अगर उल्टा हो तो पानी नहीं भरता, कोई तो है यक़ीनन जिसने ये मेला लगाया है खिलौना कैसा भी हो ख़ुद ब ख़ुद चाभी नहीं भरता..!! - [गम ए तन्हाई में राहत ए दिल का सबब है](https://bazmeshayari.com/gam-e-tanhai-me/): गम ए तन्हाई में राहत ए दिल का सबब है एक ये चंचल सी हवा और अँधेरी रात, कौन बेगाना है और कौन मेरा अपना है सब का अंदाज़ है यकज़ा और अँधेरी रात, मौत तो बर हक़ है एक दिन आनी है महव ए गुफ़्तार हूँ ख़ुद से और अँधेरी रात, मंज़िल की तरह खफ़ा आज की शब चाँद भी है गवाह फ़लक के है बादल और अँधेरी रात, तुम तो क्या मेरी ज़ात भी मेरी तलाश में है मगर गुमशुदा अयनी नवाब है और अँधेरी रात..!! - [सहराओं से आने वाली हवाओं में रेत है](https://bazmeshayari.com/sahraaon-se-aane-wali/): सहराओं से आने वाली हवाओं में रेत है हिज़रत करूँगा गाँव से गाँवो में रेत है, ऐ कैस तेरे दश्त को इतनी दुआएं दें कुछ भी नहीं है मेरी दुआओं में रेत है, सहराओं से हो के बाग़ में आया हूँ सैर को हाथों में फूल है मेरे पांवो में रेत है, मुद्दत से मेरी आँख में एक ख़्वाब है मुकीम पानी में पेड़ पेड़ की छावों में रेत है, मुझ सा कोई फ़कीर नहीं है कि जिसके पास कशकोल रेत का है सदाओं में रेत है..!! - [ये एक बात समझने में रात हो गई है](https://bazmeshayari.com/ye-ek-baat-samjhne/): ये एक बात समझने में रात हो गई है मैं उससे जीत गया हूँ कि मात हो गई है ! मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा मेरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है, बिछड़ के न ख़ुश रह सकूँगा सोचा था तेरी जुदाई ही वजह ए निशात हो गई है, बदन में एक तरफ़ दिन तुलू मैंने किया बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है, जंगल की तरफ़ चल पड़ा था छोड़ के घर ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है..!! - [यहाँ किसे ख़बर है कि ये उम्र बस](https://bazmeshayari.com/yahan-kise-khabar-hai/): यहाँ किसे ख़बर है कि ये उम्र बस इसी पे गौर करने में कट रही है, कि ये उदासियाँ किस सबब से बस हमसे ही लिपट रही है, दुःख तो ये है कि उसके हो कर भी हम उसको छूने से डर रहे है, अज़ीब दुःख है कि हमारे हिस्से की आग भी अब औरो में बट रही है, मैं उसको हर रोज़ बस यही एक झूठ सुनने को फोन करता हूँ, सुनो ! यहाँ ज़रूर कोई मसला है आज भी तुम्हारी आवाज़ कट रही है, दूर सहराओं में पेड़ो के सूखने और सब्ज़ होने से क्या किसी को ? - [वो जो दिख रहा है सच हो ये ज़रूरी तो नहीं है](https://bazmeshayari.com/wo-jo-dikh-raha/): वो जो दिख रहा है सच हो ये ज़रूरी तो नहीं है वो जो तुम कहते हो हक़ हो ज़रूरी तो नहीं है, अगर अधूरी रहे कहानी तो रहने दो अधूरी ही हमेशा पूरी हो हर कहानी ये ज़रूरी तो नहीं है, जब फिराक़ ही है हासिल इस ज़िन्दगी का तो हर बार ही हो वस्ल ये ज़रूरी तो नहीं है, जो ढल रहा है अगर सूरज तो ढलने दो उसे शब ओ रोज़ हो रौशनी कोई ज़रूरी तो नहीं है, कम हो रही है अब मेरे इन आँखों की बिनाई याद रहे हर चेहरा ओ शख्स ज़रूरी तो नहीं - [संगदिल कहाँ किसी का गमगुसार करते है](https://bazmeshayari.com/sangdil-kahan-kisi-ka/): संगदिल कहाँ किसी का गमगुसार करते है ये मुर्दा ज़मीर कब मज़लूमो से प्यार करते है, ना फ़िक्र ए आलम, न खौफ़ ए परवरदिगार ये सरमाया ए मुल्क को भी तार तार करते है, हो जाए जो काबिज़ आईन ओ अदलिया पे तो फिर सब फ़ैसले भी दिल फ़िगार करते है, हाथों में आते ही तीर निहत्थो पे वार करते है ये भरे पेट वाले ही भूखो का शिकार करते है, माँ कह कर जो खाते है कसमे सुबह ओ शाम वही नालायक फिर जमीं को शर्मसार करते है, दावा ये कि बेगैरती आँखों से डर गई दुनियाँ झूठे,हम कहाँ - [जो पूछती हो तो सुनो ! कैसे बसर होती है](https://bazmeshayari.com/jo-puchti-ho-to/): जो पूछती हो तो सुनो ! कैसे बसर होती है रात खैरात की, सदके की सहर होती है, साँस भरने भर को तो जीना नहीं कहते दिल भी दुखता है और आस्तीं तर होती है, जागती आँखों में चुभते है काँच के ख़्वाब रात कुछ यूँ हम दीवानों की बसर होती है, गम ए हिज़्र दुश्मन ए जाँ दिल को ढूँढता है लम्हे भर की भी तुमसे जुदाई अगर होती है, एक मरकज़ की तलाश, ना मालूम खुश्बू कभी मंज़िल, कभी तम्हीद ए सफ़र होती है, दिल ए नायाब को आख़िर छुपाये तो कहाँ ? बारिश ए संग तो यहाँ - [ये न पूछो कि कैसा ये हिन्दुस्तान होना चाहिए](https://bazmeshayari.com/ye-naa-pucho-ki-kaisa/): ये न पूछो कि कैसा ये हिन्दुस्तान होना चाहिए खत्म पहले मज़हब का घमासान होना चाहिए, इन्सान को अब तक मयस्सर नहीं इंसा होना अब तो मयस्सर इन्सान को इन्सान होना चाहिए, गर तुम चाहते हो कि ये वतन ये हिन्दुस्तान न मरे तो यहाँ न कोई हिन्दू, न मुसलमान होना चाहिए, ज़मीं पे मुश्किलों के सिवा कुछ भी दिखता ही नहीं इतनी बड़ी ज़मीं पे कुछ तो आसान होना चाहिए, मुहब्बत तो दुनियाँ में किसी को भी मिल सकती है दिल में बस प्यार का एक तूफान होना चाहिए, सदियों से इन्सान ज़मीं पर कभी बैठा ही नहीं थोड़ा - [आँख में पानी रखो होंठों पे चिंगारी रखो](https://bazmeshayari.com/aankh-me-paani-rakho/): आँख में पानी रखो होंठों पे चिंगारी रखो ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो, राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो, एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तो दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो, आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में कूच का ऐलान होने को है तैयारी रखो, ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो, ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी - [ये आसमां ज़रूरी है तो ज़मीं भी ज़रूरी है](https://bazmeshayari.com/ye-aasmaa-zaruri-hai-to/): ये आसमां ज़रूरी है तो ज़मीं भी ज़रूरी है ज़िन्दगी के वास्ते कुछ कमी भी ज़रूरी है, हर जगह मुस्कुराना भी वाज़िब नहीं होता कभी कभी तो आँखों में नमी भी ज़रूरी है, चुप रहे तो लोग समझेंगे ख़तावार तुमको यारो वक़्त बेवक्त बात करना भी ज़रूरी है, शराफ़त से नहीं बनते हर काम आज कल कभी कभी तो लहज़े में गरमी भी ज़रूरी है, गर हलचल न हो तो जीने का मज़ा ही क्या ? यारो खटपट के वास्ते दुश्मनी भी ज़रूरी है, हर बात पे सर झुकाना अच्छा नहीं होता गर आफतों से बचना है तो नहीं भी - [चेहरा देखें तेरे होंठ और पलकें देखे](https://bazmeshayari.com/chehra-dekhen-tere-honth/): चेहरा देखें तेरे होंठ और पलकें देखे दिल पे आँखे रखे और तेरी साँसे देखें, सुर्ख लबो से सब्ज़ दुआएँ फूटी है पीले फूलो तुमको नीली आँखे देखे, साल होने को आया है वो कब लौटेगा ? आओ खेत की सैर को निकले गूँचे देखे, थोड़ी देर में जंगल हमको आक़ करेगा बरगद देखे या बरगद की शाखें देखे ? तू चाहे तो क्या कुछ नहीं कर सकता है ? चल साथ चलें और दुनियाँ की आँखे देखे, हम तेरे होंठों की लर्ज़िश कब भूले है पानी में पत्थर फेंकें और लहरें देखे..!! - [न नींद और न ख़्वाब से आँख भरनी है](https://bazmeshayari.com/naa-neend-aur-naa/): न नींद और न ख़्वाब से आँख भरनी है कि तुझे देख कर हसरत पूरी करनी है, किसी दरख्त की हिद्दत में दिन गुज़ारना है किसी चिराग़ की छाँव में रात करनी है, वो फूल और किसी शाख पर नहीं खिलता वो ज़ुल्फ़ सिर्फ़ मेरे हाथों से सँवरनी है, तमाम ना ख़ुदा साहिल से दूर हो जाएँ अब समन्दर से अकेले में बात करनी है, हमारे गाँव का हर फूल अब मरने वाला है अब इस गली से वो ख़ुशबू नहीं गुज़रनी है..!! - [अज़ीब ख़्वाब था उसके बदन पे काई थी](https://bazmeshayari.com/azib-khwab-tha-uske-badan/): अज़ीब ख़्वाब था उसके बदन पे काई थी वो एक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी, वो एक चरागकदा जिसमे कुछ नहीं था मेरा जो जल रही थी वो कंदील भी पराई थी, न जाने कितने परिंदों ने उसमे शिरकत की कल एक पेड़ की तकरीब रौ नुमाई थी, हवाओं आओ अब मेरे गाँव की तरफ़ देखो जहाँ पे अब रेत पड़ी है पहले यहाँ तराई थी, सिपाह ए सल्तनत ने ख़ेमे लगा दिए है वहाँ जहाँ पे कभी मैंने निशानी तेरी दबाई थी, गले मिला था कभी दुःख भरे दिसम्बर से तब मेरे वज़ूद के अंदर भी धुंध - [ख़ुद हो गाफ़िल तो अक्सर ये भी भूल जाते है](https://bazmeshayari.com/khud-ho-gafil-to-aksar/): ख़ुद हो गाफ़िल तो अक्सर ये भी भूल जाते है कि ख़ुदा सब देख रहा है वो अंजान नहीं है, चाहे तुम कण कण में कहो या ज़र्रे ज़र्रे में ना हो वो मौज़ूद ऐसा तो कोई मकान नहीं है, अपना ही वादा वफ़ा नहीं करते ये बदबख्त आख़िर है तो इन्सान ही कोई हैवान नहीं है, तुझे अपना कहने से भी अब कतराने लगे है मगर एक तू है जो अब भी पशेमान नहीं है, वाकिफ़ थे तेरी हरकतों से पहले से ही हम गिर गया जो कुछ और मेयार तो हैरान नहीं है, वक़्त तो लगा तेरे शराफ़त - [बड़े बड़े शहरों की अब यही पहचान है](https://bazmeshayari.com/bade-bade-shaharo-ki/): बड़े बड़े शहरों की अब यही पहचान है ऊँची इमारतें और छोटे छोटे इन्सान है, अहल ए शहर हो चुका है तंगदिल यहाँ हर शख्स ख़ुद के हालात से परेशान है, दौड़ते भागते ही ज़िस्म देखने को मिले पल भर का न यहाँ किसी को आराम है, मोबाइल में क़ैद हुआ पड़ा है बचपन पार्क और गलियाँ यहाँ सभी सुनसान है, धुँआ, मिट्टी और भीड़ में धक्का मुक्की ये सब इनको मिले अनमोल वरदान है, यूँ तो कहने को आबादी बड़ी शहरों की पर हर एक अपने ही पड़ोसी से अंजान है, देखने को तो चहल पहल है इन शहरों - [काली रात के सहराओं में नूर सिपारा लिखा था](https://bazmeshayari.com/kaali-raat-ke-sahraao-me/): काली रात के सहराओं में नूर सिपारा लिखा था जिस ने शहर की दीवारों पर पहला ना’रा लिखा था, लाश के नन्हे हाथ में बस्ता और एक खट्टी गोली थी ख़ून में डूबी इक तख़्ती पर ग़ैन ग़ुबारा लिखा था, आख़िर हम ही मुजरिम ठहरे जाने किन किन जुर्मों के फ़र्द ए अमल थी जाने किस की नाम हमारा लिखा था, सब ने माना मरने वाला दहशतगर्द और क़ातिल था माँ ने फिर भी क़ब्र पे उसकी राज दुलारा लिखा था..!! ~अहमद सलमान - [शबनम है कि धोखा है कि झरना है कि तुम हो](https://bazmeshayari.com/shabnam-hai-ki-dhokha-hai/): शबनम है कि धोखा है कि झरना है कि तुम हो दिल दश्त में एक प्यास तमाशा है कि तुम हो, एक लफ़्ज़ में भटका हुआ शायर है कि मैं हूँ एक ग़ैब से आया हुआ मिस्रा है कि तुम हो, दरवाज़ा भी जैसे मेरी धड़कन से जुड़ा है दस्तक ही बताती है पराया है कि तुम हो, एक धूप से उलझा हुआ साया है कि मैं हूँ एक शाम के होने का भरोसा है कि तुम हो, मैं हूँ भी तो लगता है कि जैसे मैं नहीं हूँ तुम हो भी नहीं और ये लगता है कि तुम हो..!! - [जिस से मिल बैठे लगी वो शक्ल पहचानी हुई](https://bazmeshayari.com/jis-se-mil-baithe/): जिस से मिल बैठे लगी वो शक्ल पहचानी हुई आज तक हमसे यही बस एक नादानी हुई, सैकड़ों पर्दे उठा लाए थे हम बाज़ार से गुत्थियाँ कुछ और उलझीं और हैरानी हुई, हम तो समझे थे कि उस से फ़ासले मिट जाएँगे ख़ुद को ज़ाहिर भी किया लेकिन पशेमानी हुई, क्या बताएँ फ़िक्र क्या है और क्या है जुस्तुजू हाँ तबीअत दिन ब दिन अपनी भी सैलानी हुई, क्यूँ खिलौने टूटने पर आब दीदा हो गए अब तुम्हें हम क्या बताएँ क्या परेशानी हुई..?? ~आशुफ़्ता चंगेज़ी - [मैंने दुनियाँ से, मुझसे दुनियाँ ने](https://bazmeshayari.com/maine-duniya-se-mujhse/): मैंने दुनियाँ से, मुझसे दुनियाँ ने सैकड़ो बार बेवफ़ाई की, आसमां चूमता है मेरे क़दम दाद दीजिए शिकश्तापाई की, आज वो टूट कर मिला मुझसे ये शुरुआत है जुदाई की, खुले रहते है सारे दरवाज़े कोई सूरत नहीं रिहाई की, मेरे कमरे में दो परिंदों ने इन्तेहाँ कर दी बेहयाई की..!! - [दिल चाहे कि आज कुछ सुनहरा लिखूँ](https://bazmeshayari.com/dil-chahe-ki-aaj/): दिल चाहे कि आज कुछ सुनहरा लिखूँ मैं ज़ात पे मेरी एक पैरा लिखूँ, मैं लिखूँ हयात सारी एक ही गज़ल में समन्दर लिखूँ और फिर सेहरा लिखूँ, तवील मुद्दत तक कोई पढ़ता रहे मुझे मैं हकीक़त लिखूँ और फिर ठहर जा लिखूँ, ख्याल ओ हालात क्या है अपने आजकल मैं क़ल्ब लिखूँ और फिर चेहरा लिखूँ, समझ आ ना सकूं किसी ना फ़हम को इसलिए मैं शऊर लिखूँ और फिर गहरा लिखूँ, अदावतें तो है हसदकारो को हमसे बहुत मैं हाल आप लिखूँ और फिर पहरा लिखूँ..!! - [उधर की शय इधर कर दी गई है](https://bazmeshayari.com/udhar-ki-shay-idhar/): उधर की शय इधर कर दी गई है ज़मीं ज़ेर ओ ज़बर कर दी गई है, ये काली रात है दो-चार पल की ये कहने में सहर कर दी गई है, तआरुफ़ को ज़रा फैला दिया है कहानी मुख़्तसर कर दी गई है, न पूछो कैसे गुज़री उम्र सारी ज़रा में उम्र भर कर दी गई है, इबादत में बसर करनी थी लेकिन ख़राबों में बसर कर दी गई है, कई ज़र्रात बाग़ी हो चुके हैं सितारों को ख़बर कर दी गई है, वो मेरी हमक़दम होने न पाई जो मेरी हमसफ़र कर दी गई है, हमारी जुगनुओं से दुश्मनी - [तुम साथ चले थे तो मेरे साथ चला दिन](https://bazmeshayari.com/tum-saath-chale-the-to/): तुम साथ चले थे तो मेरे साथ चला दिन तुम राह से बिछड़े थे कि बस डूब गया दिन, जो तुम से महक जाए एक ऐसी न मिली रात जो तुम से चमक जाए एक ऐसा न मिला दिन, एक रंगी ए हालात से पथरा गईं आँखें जिस तरह कटी रात उसी तरह कटा दिन, वो और मसाफ़त थी जिसे झेल चुके हम ये और मसाफ़त है जिसे झेल रहा दिन..!! ~अहमद हमेश - [न घर है कोई न सामान कुछ रहा बाक़ी](https://bazmeshayari.com/naa-ghar-hai-koi/): न घर है कोई, न सामान कुछ रहा बाक़ी नहीं है कोई भी दुनिया में सिलसिला बाक़ी, ये खेल ख़त्म करो, इक़्तिदार का ये खेल कि है क़रीब अजल के तेरा गला बाक़ी, मक़ाम ए इबरत ए फ़ानी से कौन है महफ़ूज़ कि कौन हाकिम ए अस्बाब रह गया बाक़ी ? सुकूत ए मर्ग के रस्ते पे कुछ नहीं था मगर कोई चला ही कहाँ था कि कब रुका बाक़ी ? ये कैसा आलम ए वीरान है नज़र से परे न दिन बचा है न ही रात का सिरा बाक़ी, बहुत न थोड़ा सर ए आम ज़िंदगी का शोर कि - [किस तवक़्क़ो' पे क्या उठा रखिए ?](https://bazmeshayari.com/kis-tavaqqo-pe-kya/): किस तवक़्क़ो’ पे क्या उठा रखिए ? दिल सलामत नहीं तो क्या रखिए ? लिखिए कुछ और दास्तान ए दिल और ज़माने को मुब्तला रखिए, सर में सौदा रहे मोहब्बत का पाँव में ख़ाक की अना रखिए, बूँद भर आब क्या मुक़द्दर है ! अब्र रखिए तो कुछ हवा रखिए, इस से पहले कोई जलाने आए आप अपना ही घर जला रखिए, क़ब्ल ए इंसाफ़ चल बसा मुल्ज़िम अब अदालत से क्या रवा रखिए ? जान जानी है जब अबस ही ‘हमेश’ फिर तो दुनिया से फ़ासला रखिए..!! ~अहमद हमेश - [किस को मालूम है क्या होगा नज़र से पहले](https://bazmeshayari.com/kis-ko-malum-hai/): किस को मालूम है क्या होगा नज़र से पहले होगा कोई भी जहाँ ज़ात ए बशर से पहले ? कौन इस राज़ से है मावरा क्या जानते हो कौन मौजूद सदफ़ में था गुहर से पहले ? राहत ए वस्ल है क्या ? रात का आराम है क्या ? गोया जाग उठते हैं हम लोग सहर से पहले..!! ~अहमद हमेश - [क़दम रखता है जब रास्तो पे यार आहिस्ता आहिस्ता](https://bazmeshayari.com/qadam-rakhta-hai-jab/): क़दम रखता है जब रास्तो पे यार आहिस्ता आहिस्ता तो छट जाता है सब गर्द ओ ग़ुबार आहिस्ता आहिस्ता, भरी आँखों से हो के दिल में जाना सहल थोड़ी है चढ़े दरियाओं को करते है पार आहिस्ता आहिस्ता, नज़र आता है तो यूँ देखता जाता हूँ मैं उसको कि चल पड़ता है जैसे क़ारोबार आहिस्ता आहिस्ता, इधर कुछ औरतें दरवाजों पर दौड़ी हुई आई उधर घोड़ो से उतरे शहसवार आहिस्ता आहिस्ता, किसी दिन कारखाना ए गज़ल में काम निकलेगा पलट आएँगे सब बेरोज़गार अहिस्ता आहिस्ता, तेरा पैकर ख़ुदा ने भी तो फ़ुर्सत में बनाया था बनाएगा तेरे ज़ेवर भी सुनार - [सवालो के बदले लहज़े ऐसे...](https://bazmeshayari.com/sawalo-ke-badle-lahze/): सवालो के बदले लहज़े ऐसे कि हमें जानते ही न हो जैसे, मिजाज़ मौसम भी न बदले वो आजकल बदल गए ऐसे, न वो ख़ुलूस रहा न मुरौवत न वो हमदर्द रहे पहले जैसे, ख्याल ए यार था जो पहले यकायक बदल गया है ऐसे, रकीब तो खैर गैर थे नवाब दोस्त भी तो ना रहे दोस्तों जैसे..!! ~नवाब ए हिन्द - [फ़ुगा है या दुआ है कौन जाने...](https://bazmeshayari.com/fuga-hai-ya-dua/): फ़ुगा है या दुआ है कौन जाने सदाए दर्द क्या है कौन जाने ? ख़िरद पहना न दे जब तक मआ’नी कोई क्या बोलता है कौन जाने ? पता तो अपनी मंज़िल का है सबको किधर से रास्ता है कौन जाने ? मेरी आंखे जिसे देखती है अक्सर हया है या अदा है कौन जाने ? हँसना आदत में है शुमार या कि गम छुपाने की अदा है कौन जाने ? जुनूं से आगही तक ज़िन्दगी का कहाँ तक सिलसिला है कौन जाने ? सर ए आईना ख़ुद को देखता हूँ पस ए आईना क्या है कौन जाने ?? ~नवाब - [खफ़ा मत हो अभी तो प्यार के दिन है](https://bazmeshayari.com/khafa-mat-ho-abhi-to/): खफ़ा मत हो अभी तो प्यार के दिन है इब्तिदा ए मुहब्बत में अभी मल्हार के दिन है, क्यूँ अभी से बाहम नफ़रत के बीज बोयें ? अभी तो फ़सल ए गुल नौ बहार के दिन है, क्या वजह है कि तू बिछड़ना चाहता है ? अभी तो मिल कर अपने इक़रार के दिन है, गैर से शिकवा गिला वो भी यारो से अपने ऐसे भी बाहम कहाँ तकरार के दिन है ? दिल ने छोड़ी नहीं तेरी उम्मीद अब तक काट ही लेंगे गर कठिन इंतज़ार के दिन है, प्यार करते है तुमसे दीवानगी की हद तक क्या हुआ - [जितने हरामखोर थे क़ुर्ब ओ जवार में](https://bazmeshayari.com/jitne-haramkhor-the-kurb/): जितने हरामखोर थे क़ुर्ब ओ जवार में परधान बनके आ गए अगली क़तार में, दीवार फाँदने में यूँ जिनका रिकॉर्ड था वे चौधरी बने हैं उमर के उतार में, फ़ौरन खजूर छाप के परवान चढ़ गई जो भी ज़मीन ख़ाली पड़ी थी कछार में, बंजर ज़मीन पट्टे में जो दे रहे हैं आप ये रोटी का टुकड़ा है मियादी बुख़ार में, जब दस मिनट की पूजा में घंटों गुज़ार दें समझो कोई ग़रीब फँसा है शिकार में..!! ~अदम गोंडवी - [आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे](https://bazmeshayari.com/aankh-par-patti-rahe/): आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे अपने शाह ए वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे पढ़ने को मिले उन्हें टेलीप्राम्प्टर की आँख सोचने को कोई बाबा पौने दो आँख वाला रहे तालिब ए शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे आए दिन अख़बार में प्रियजनों का घोटाला रहे एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए चार छै चमचे रहें माइक रहे और माला रहे..!! ~अदम गोंडवी - [ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी](https://bazmeshayari.com/ye-amiro-se-hamari/): ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी फिर कहाँ से बीच में मस्ज़िद ओ मंदिर आ गए ? जिनके चेहरे पर लिखी थी जेल की ऊँची फ़सील वो ओढ़ कर रामनामी संसद का अन्दर आ गए, देखना, सुनना व सच कहना इन्हें भाता नहीं यहाँ कुर्सियों पर अब वही बापू के बन्दर आ गए, कल तलक जो हाशिए पर भी न आते थे नज़र आजकल बाज़ार में उनके कलेंडर आ गए..!! ~ अदम गोंडवी - [शब ए हिज्राँ की तवालत से घबरा गया हूँ मैं](https://bazmeshayari.com/shab-e-hizraan-kee-talawat-se/): शब ए हिज्राँ की तवालत से घबरा गया हूँ मैं उसके अंदाज़ ए मुहब्बत से घबरा गया हूँ मैं, तू सराब ही सही मगर नज़र तो आ मुझको कि प्यास की शिद्दत से घबरा गया हूँ मैं, खिज़ां की तल्खियाँ सहने को तन्हा पत्ते छोड़ गए शज़र को अपनों की ऐसी ही हालत से घबरा गया हूँ मैं, कोई पहचान न सकेगा किसी को बरोज़ ए हश्र तेरे बाद तसव्वुर ए क़यामत से घबरा गया हूँ मैं, ख़ुदकुशी तो किसी मसले का हल नहीं है नवाब ये और बात कि खलुत से घबरा गया हूँ मैं..!! - [कुछ बात है कि आज ख्याल ए यार आया](https://bazmeshayari.com/kuch-baat-hai-ki-aaj-khyal/): कुछ बात है कि आज ख्याल ए यार आया एक बार नहीं बल्कि बार बार आया, भूल चुका था सब चोटें मैं इस दिल की ये क्या कि फिर वो ज़ख्म फ़िगार आया, वो ज़माने की साज़िश, वो अपनों का सितम कुछ नहीं बस याद एक एक वार आया, बताये तो कोई जा कर उस सितमगर को चलते चलते यहाँ तक उसका तलबगार आया, नवाब न कर जीत की लगन अब तू न जाने कब का है तू अपना दिल हार आया..!! - [न जाने कैसा जादू कर गई है तेरी मुक़द्दस आँखे](https://bazmeshayari.com/na-jaane-kaisa-jaadoo-kar-gai/): न जाने कैसा जादू कर गई है तेरी मुक़द्दस आँखे तेरे सिवा और किसी की तरफ़ अब देखा जाता नहीं, नशे में चूर कर गई है, ये तेरी मुक़द्दस आँखे जब तक देख न लूँ तुझे, चैन मुझे कही आता नहीं, रंगीन दिलकश अंदाज़ रखती है तेरी मुक़द्दस आंखे जिसको शायरी में बयान मुझसे तो किया जाता नहीं, इश्क़ ए जुनून है मेरे इस दिल का तेरी ये मुक़द्दस आँखे किसी और का तसव्वुर भी अब मेरे दिल में आता नहीं, ये समन्दर से भी गहरी है तेरी मुक़द्दस आँखे डूब चुका हूँ उस गहराई में बाहर अब निकला जाता - [भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे](https://bazmeshayari.com/bhala-gamo-se-kahan-haar/): भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे हम आँसुओं की तरह मुस्कुराने वाले थे, हम ही ने कर दिया ऐलान ए गुमरही वर्ना हमारे पीछे बहुत लोग आने वाले थे, उन्हें तो ख़ाक में मिलना ही था कि मेरे थे ये अश्क कौन से ऊँचे घराने वाले थे, उन्हें क़रीब न होने दिया कभी मैं ने जो दोस्ती में हदें भूल जाने वाले थे, मैं जिन को जान के पहचान भी नहीं सकता कुछ ऐसे लोग मेरा घर जलाने वाले थे, हमारा अलमिया ये था कि हमसफ़र भी हमें वही मिले जो बहुत याद आने वाले थे, ‘वसीम’ कैसी - [उदास एक मुझी को तो कर नही जाता](https://bazmeshayari.com/udas-ek-mujhi-ko/): उदास एक मुझी को तो कर नही जाता वह मुझसे रुठ के अपने भी घर नही जाता, वह दिन गये कि मुहबबत थी जान की बाज़ी किसी से अब कोई बिछडे तो मर नही जाता, तुमहारा प्यार तो सांसों मे सांस लेता है जो होता नशा तो एक दिन उतर नही जाता, पुराने रिश्तों की बेग़रिज़यां न समझेगा वह अपने ओहदे से जब तक उतर नही जाता, ‘वसीम’ उसकी तडप है, तो उसके पास चलो कभी कुआं किसी प्यासे के घर नही जाता..!! ~वसीम बरेलवी - [भरोसा कैसे करे कोई अब तिज़ारत के हवालो का ?](https://bazmeshayari.com/bharosa-kaise-kare-koi/): भरोसा कैसे करे कोई अब तिज़ारत के हवालो का ? न रहा सत्ता का यकीं हमको, न सत्ता के दलालों का, दिखाई भी नहीं देता कही अब तो उगता हुआ सूरज, अँधेरा तल्ख़ हो चला अब तो सवालो ही सवालो का, ख़ुद को कल रात ख़्वाबो में ज़रा हँसते हुए जो देखा बाद एक मुद्दत के नज़र आया मुझे चेहरा उजालो का, इब्तिदा से इन्तेहा तक हर तस्वीर नंगी, लफ्ज़ भी नंगे किसी कोठे से भी बदतर हो गया हुलिया रिसालो का, अपने तीखे सवालो से भला उन्हें अब कौन डराएगा मीडिया हाउस ही जब बन गए है अड्डा दलालों - [अपने थके हुए दस्त ए तलब से माँगते है](https://bazmeshayari.com/apne-thake-hue-dast/): अपने थके हुए दस्त ए तलब से माँगते है जो माँगते नहीं रब से वो सब से माँगते है, वो भीख माँगता है हाकिमों के लहज़े में हम अपने बच्चो का हक़ भी अदब से माँगते है, मेरे ख़ुदा उन्हें तौफ़ीक ए खुदशनासी दे चराग हो के उजाला जो शब से माँगते है, वो बादशाह इधर मुड़ के देखता ही नहीं हम अपने हिस्से की खैरात कब से माँगते है, मैं शाहज़ादा ए ग़ुरबत, अमीर ए दस्त ए अना ये लोग क्या मेरे नाम ओ नसब से माँगते है ? ~मेराज फैज़ाबादी - [जो होने वाला है वो हादसा दिखाई तो दे](https://bazmeshayari.com/jo-hone-wala-hai-wo-hadsa/): जो होने वाला है वो हादसा दिखाई तो दे कोई चराग जलाओ हवा दिखाई तो दे, तेरी गली से मैं उठ के चला तो जाऊँ मगर तेरी गली से कोई रास्ता दिखाई तो दे, मैं अपनी आँखों की बिनाई शौप दूँ उसको किसी ग़रीब के घर में दीया दिखाई तो दे, क़रीब आने की कोशिश मैं करूँ तो लेकिन हमारे बीच कोई फ़ासला दिखाई तो दे, ~मेराज फ़ैज़ाबादी - [क्या सरोकार अब किसी से मुझे...](https://bazmeshayari.com/kya-sarokar-ab-kisi/): क्या सरोकार अब किसी से मुझे वास्ता था तो था बस तुझी से मुझे, बेहिसी का भी अब नहीं एहसास क्या क्या न हुआ बेरुखी से मुझे, मौत की आरज़ू भी कर के देखूँ क्या उम्मीदें है ज़िन्दगी से मुझे ? फिर किसी पर भी ऐतबार आये यूँ उतारो न अपने जी से मुझे, तेरा गम भी न हो तो क्या जीना कुछ तसल्ली है दर्द ही से मुझे, कितना पुरकार हो गया हूँ कि था ! वास्ता तो है तेरी सादगी से मुझे, कर गए मुझको किस क़दर तबाह मेरे दुश्मन अंदाज़ ए दोस्ती से मुझे..!!   - [रखा न अब कहीं का दिल ए बेक़रार ने](https://bazmeshayari.com/rakha-na-ab-kahin-ka-dil-e-beqarar-ne/): रखा न अब कहीं का दिल ए बेक़रार ने बर्बाद कर दिया ग़म ए बे इख़्तियार ने, दिल तो कभी का नज़्र किया जाँनिसार ने एक जाँ है वो भी आप का सदक़ा उतारने, इस फ़ित्नागर को जीत लिया हार मान कर क्या क्या मज़ा दिया हमें इस जीत हार ने, पहलू बदल बदल के मज़े दर्द के लिए वो करवटें दिखाईं दिल ए बेक़रार ने, अब ख़्वाब में भी दीद को आँखें तरस गईं बे ख़्वाब कर दिया ग़म ए शब ज़िंदादार ने, वो फ़स्ल ए गुल में दिल को जला कर चले गए इस मर्तबा तो आग लगा - [तमन्ना दो दिलों की एक ही मालूम होती है](https://bazmeshayari.com/tamanna-do-dilo-ki/): तमन्ना दो दिलों की एक ही मालूम होती है अब उनकी हर ख़ुशी अपनी ख़ुशी मालूम होती है, दिलों पर सब के एक अफ़्सुर्दगी मालूम होती है तेरी महफ़िल में ये किसकी कमी मालूम होती है, समझ की चाल चल जाता है दीवाना मोहब्बत का बज़ाहिर वो भी एक दीवानगी मालूम होती है, बजा हँसता है गर हँसता है कोई मेरे जीने पर मुझे ख़ुद ज़िंदगी अपनी हँसी मालूम होती है, जहाँ क़ुदरत किसी से फेर लेती है नज़र अपनी वहीं इंसान की बेमाएगी मालूम होती है, यक़ीं मोहकम अज़ाएम आहनी सई ओ अमल पैहम उन्हीं से आदमी की ज़िंदगी - [तर्क ए ग़म गवारा है और न ग़म का यारा है](https://bazmeshayari.com/tark-e-gam-ganvara/): तर्क ए ग़म गवारा है और न ग़म का यारा है अब तो दिल की हर धड़कन आ’लम ए आश्कारा है, हम जैसे बेसहारों को आपका सहारा है आप ही को दुख सुख में उम्र भर पुकारा है, मौज ख़ुद सफ़ीना है बहर ख़ुद किनारा है नाख़ुदा से क्या मतलब जब ख़ुदा हमारा है, हो चला यक़ीन जब से वो हसीं हमारा है ये ख़ुश ए’तिमादी भी एक बड़ा सहारा है, ये तो कहिए क्या उसको आप छोड़ सकते हैं जिसने मरते मरते भी आप ही को पुकारा है, लुत्फ़ ए बंदगी तुमसे और मेरी ज़िंदगी तुमसे तुम नहीं तो - [रंगों की आड़ में खुनी खेल, ये इंसानियत क्या जाने ?](https://bazmeshayari.com/rango-ki-aad-me-khooni-khel/): रंगों की आड़ में खुनी खेल, ये इंसानियत क्या जाने ? हरा, भगवा में डूबे हुए केसरिया का मोल क्या जाने ? ज़मीने बाँटते फिरते है, आसमान को बाँटे तो माने अलग किए इन्सान बड़े, अब परिंदों को छाँटें तो माने, इंसानी लिबास देख कर ऐ हिन्दू मुस्लिम करने वालो वक़्त ए मौलूद आदम क्या ? मज़हब पहचानो तो माने, उस खून का मज़हब क्या ? जो तुमको चढ़ाया जाता है गैर मज़हबी खून कभी तुम डॉक्टर को लौटाओ तो माने, जो ईद का भी है, करवा चौथ का भी उस चाँद से सीखो नफ़रत मिटा कर, पैगाम ए मुहब्बत - [इश्क़ कर के मुक़र गई होगी...](https://bazmeshayari.com/ishq-kar-ke-muqar/): इश्क़ कर के मुक़र गई होगी वो तो लड़की है डर गई होगी, आदतें सब ख़राब कर के मेरी आप वो ख़ुद सुधर गई होगी, कर के वादे भूला दिए होंगे खा के कसमे मुक़र गई होगी, उसकी बस एक अदा ही महफ़िल में सबको दीवाना कर गई होगी, रूबरू है पर इश्तियाक़ नहीं नियत शौक़ भर गई होगी, मैं था पत्थर वो काँच की गुड़ियाँ टूट कर ही बिखर गई होगी, मैं जो उससे बिछड़ा हूँ यक़ीनन वो तो जीते जी मर गई होगी..!! - [बाद मरने के मेरे किसी केलब पे तो मेरा नाम होगा](https://bazmeshayari.com/baad-marne-ke-mere-kisi-ke/): बाद मरने के मेरे किसी केलब पे तो मेरा नाम होगा मातम होगा कहीं, कहीं शहनाइयों का एहतिमाम होगा, कहीं कोई रोएगा याद कर कर के मेरी वफाओं को कही किसी के सुर्ख लबो पे ख़ुशबूओ का जाम होगा, दौलत अपनी हाथों में ले कर भी अगर ढूँढेगा कोई तो न मिलेंगे हम कहीं, क़ीमत हमारी न कोई दाम होगा, जब कम होगा शबाब ए उल्फ़त किसी पे नवाब हमें कर याद वो तड़पेगा और ये मुआमला सरेआम होगा, - [आग बहते हुए पानी में लगाने आई](https://bazmeshayari.com/aag-bahte-hue-paani/): आग बहते हुए पानी में लगाने आई तेरे ख़त आज मैं दरिया में बहाने आई, फिर तेरी याद नए ख़्वाब दिखाने आई चाँदनी झील के पानी में नहाने आई, दिन सहेली की तरह साथ रहा आँगन में रात दुश्मन की तरह जान जलाने आई, मैं ने भी देख लिया आज उसे ग़ैर के साथ अब कहीं जा के मेरी अक़्ल ठिकाने आई, ज़िंदगी तो किसी रहज़न की तरह थी ‘अंजुम’ मौत रहबर की तरह राह दिखाने आई..!! ~अंजुम रहबर - [होना नहीं अब उसने मेहरबान छोड़ दे](https://bazmeshayari.com/hona-nahi-ab-usne-mehrban/): होना नहीं अब उसने मेहरबान छोड़ दे उसके लिए तू चाहे ये जहान छोड़ दे, कितनी उठाए हमने मशक्त तेरे लिए कितने अकेले झेले थे तूफान छोड़ दे, हम सा भी कोई मुफ़लिस ओ नादार न होगा जिसको कोई भी इश्क़ के दौरान छोड़ दे, तुम इतने दिल फ़रेब नहीं इत्तिफ़ाक से कि कोई तुमको देख कर ईमान छोड़ दे, तुमसे न चल सकेगा मुहब्बत का कारोबार ऐ दोस्त ! किराये की है दुकान छोड़ दे, क्यूँ सिगरेटो से जी को जलाते हो आजतक इसमें सेहत का है तेरी नुक़सान छोड़ दे, गर देखनी हो हिज़्र में जाँ बाज़ियाँ मेरी - [یہ اسمِ محمدؐ تو رحمت کا خزانہ ہے](https://bazmeshayari.com/ye-ism-e-mohammad/): یہ اسمِ محمدؐ تو رحمت کا خزانہ ہےاس نورِ مبارک سے روشن یہ زمانہ ہے واللہ محمدؐ سے ہیں دونوں جہاں قائمیہ قول حقیقت ہے ، ہرگز نہ فسانہ ہے نبیوں کے گھرانے میں اعلیٰ ہے سبھی سے یہنازاں ہے خدا جس پر احمؐد کا گھرانہ ہے یہ عشقِ محمدؐ ہی سب کچھ ہے مری خاطر دل میرا حقیقت میں احمدؐ کا دِوانہ ہے اسلام مُعظم ہے دنیا کے مذاہب میںاس قول کا قائل تو اب سارا زمانہ ہے اے شاہِ اُمم سن لیں کچھ میری زبانی بھیبرسوں سے مرے لب پر جاری جو ترانہ ہے اک بار مرے آقا - [पढ़ती रहती हूँ मैं सारी चिट्ठियाँ...](https://bazmeshayari.com/padhti-rahti-hoon-main/): पढ़ती रहती हूँ मैं सारी चिट्ठियांरात है और है तुम्हारी चिट्ठियां, आओ तो पढ़ कर सुनाऊँगी तुम्हेंलिख रखी हैं ढेर सारी चिट्ठियां, लिख तो रखी हैं मगर भेजी नहींहै अभी तक वो कुवांरी चिट्ठियां, हम नज़र आयेंगे एक एक हर्फ़ मेंजब जलाओगे हमारी चिट्ठियां, डांटते अंजुम है मुझ को घर के लोगसब ने पढ़ ली है तुम्हारी चिट्ठियां..!! ~ अंजुम रहबर - [वो जो दिल के क़रीब होते है...](https://bazmeshayari.com/wo-jo-dil-ke-qarib-hote-hai/): वो जो दिल के क़रीब होते है लोग वो भी अज़ीब होते है, पढ़ना लिखना जो जानते न हो शहर में वो अदीब होते है, हर बीमारी के जो मुआलिज़ हो दिल के कब वो तबीब होते है, ज़िन्दगी बसर कर चुके हम लोग आजकल बस ग़रीब होते है, जिनकी सुनते है कारवाँ वाले काफिलो के नकीब होते है, अहल ए दुनिया को जो मयस्सर हो कब हमें वो नसीब होते है, फ़ितना परवर जो दोस्त हो नवाब वो दर हक़ीक़त रकीब होते है..!! - [हम वक़्त ए मौत को तो हरगिज़ टाल न पाएँगे](https://bazmeshayari.com/ham-waqt-e-maut-ko-to/): हम वक़्त ए मौत को तो हरगिज़ टाल न पाएँगे हम ख़ाली हाथ आए है और ख़ाली हाथ जाएँगे, जो भी है दुनियाँ में एक दिन सब फ़ना होगा जो महव ए आराइश है वो भी मिट्टी हो जाएँगे, ज़रा देखो जहाँ से शान वाले मिट गए कितने ना उनके नाम बाक़ी है न पूरे हो सके सपने, जो आजिज़ हो औरो के कभी क्या काम आएँगे अज़ाब ए क़ब्र से बचाने को बस आमाल जाएँगे, बदी वो खोटे सिक्के है जो बदनामी दिलाएँगे आखिरत में बस नेकी के सिक्के ही काम आएँगे, जो तोशे आखिरत के होंगे वही बस - [हमने कैसे यहाँ गुज़ारी है....](https://bazmeshayari.com/hamne-kaise-yahan-guzari-hai/): हमने कैसे यहाँ गुज़ारी है अश्क खुनी है आह ज़ारी है, हम ही पागल थे जान दे बैठे उनको तो ज़िन्दगी प्यारी है, मुस्कुराना तो मेरी फ़ितरत है खून ए दिल खिलवतो में ज़ारी है, रास्ते बंद कर दे ये सब का दिल को उसकी गली भी प्यारी है, बाक़ी दुनिया के गम भी, गम होंगे तेरी फुर्क़त, सभी पे भारी है, क़त्ल ए दिल को ज़माने बीत गए कैसी अब तक ये बेक़रारी है ? उसने देखा था मुझको परदे से वो नशा, आज तक भी तारी है..!! - [याद आता है मुझे छोड़ के जाने वाला](https://bazmeshayari.com/yaad-aata-hai-mujhe-chhod-ke/): याद आता है मुझे छोड़ के जाने वाला मेरी हर शाम को रंगीन बनाने वाला, आज रो कर वो हसीं पलकें भिगो देता है मेरे हालात पे दुनियाँ को हँसाने वाला, ये न सोचा था कभी तुम भी बदल सकते हो कैसे अपना लिया हर रंग ज़माने वाला ? मुझको महसूर किया यार तेरी ज़ुल्फो ने वरना मैं था न किसी दाम में आने वाला, हाथ से हाथ झटक कर ये कहा था उसने ढूँढ लेना कोई, अब सीने से लगाने वाला, जिसने भी दीद लड़ाई वही बिस्मिल ठहरा सोच कर आँख लड़ाए, आँख लड़ाने वाला, हाँ यही शख्स मेरी - [मैंने माना कि तुम ज़ालिम नहीं हो मगर](https://bazmeshayari.com/maine-mana-ki-tum/): मैंने माना कि तुम ज़ालिम नहीं हो मगर क्या मालूम था कि हम तुमसे डर जाएँगे, तेरी याद सताती रही जो रात भर मुझे शब ए हिज़्र से बिछड़ के किधर जाएँगे, तेरी तहरीर जो पड़ी है मेरे सिरहाने उन वरकों के लफ्ज़ो पर बिखर जाएँगे, यादों की गारों में जो बिखरे अल्फाज़ उन लफ्ज़ो की रौनक में ठिठुर जाएँगे, क़ब्ल इससे कि दाद सुनो तुम हमसे इसी वास्ते हम तुमसे मुकर जाएँगे..!! - [बात करते है यहाँ क़तरे भी समन्दर की तरह](https://bazmeshayari.com/baat-karte-hai-yahan-qatre-bhi/): बात करते है यहाँ क़तरे भी समन्दर की तरह अब लोग ईमान बदलते है कैलेंडर की तरह, कोई मंज़िल न कोई राह, ना मक़सद ही कोई है ये लोकतंत्र भी यतीमो के मुक़द्दर की तरह, अब तो वही लोग बचा सकते है इस कश्ती को डूब सकते है जो लोग मंझधार में लंगर की तरह, मैंने ख़ुशबू सा बसाया था जिसे अपने तन मन में वही बैठा है मेरे पहलू में किसी खंज़र की तरह, मेरा ये दिल झील के पानी की तरह काँपा था उसने बात ही कुछ यूँ उछाली कंकर की तरह, जिनकी ठोकरों से कभी किले काँप - [क्यूँ रवा रखते हो मुझसे सर्द मेहरी बे सबब](https://bazmeshayari.com/kyun-ranva-rakhte-ho/): क्यूँ रवा रखते हो मुझसे सर्द मेहरी बे सबब बीच में लाना पड़े थाना कचहरी बे सबब, मैंने उस रुख से इसे जितना अलग रखा अबस आँख थी गुस्ताख़ मेरी जा के ठहरी बे सबब, ना किसी पायल की छन छन ना दस्तक कोई कर रही है वार गहरे ये रात गहरी बे सबब, पेड़ से रिश्ता है उसका और ज़मीं के साथ भी दे रही फिर भी दुहाई है गिलहरी बे सबब, अपने हक़ के वास्ते सब ही वहाँ मौज़ूद थे आ गया ज़द में मगर नवाब शहरी बे सबब, सच को सुनने का भला कब हौसला इनमे रहा - [दुनियाँ में करने पड़ते है इतने समझौते](https://bazmeshayari.com/duniya-me-karne-padte/): दुनियाँ में करने पड़ते है इतने समझौते कि मौत से पहले कई बार मर जाते है हम, ज़िन्दगी में ऐसे ऐसे हालातो से गुज़रते है कि जो नहीं चाहते वो भी कर जाते है हम, आवारगी का ख़्वाब पाल कर कुँवारेपन में शादी के बाद अचानक ही ठहर जाते है हम, रिश्तो में इस कदर साज़िशो को झेलते है कि अपनों को देख कर भी डर जाते है हम, हम ख़ुद अपना दर्द किसी से कह नहीं पाते कितने गम दिल में लिए ही मर जाते है हम..!! ~नवाब ए हिन्द - [बस इतनी बात पे बीबी खफ़ा है शौहर से](https://bazmeshayari.com/bas-itni-si-baat-bibi-khafa-hai/): बस इतनी बात पे बीबी खफ़ा है शौहर से कि माँ के हाथ पे ला कर दिहाड़ी रखता है, अभी तो क़ब्रे भी यहाँ महफूज़ ना रही नवाब किसी को दफ़न जो करता है, झाड़ी रखता है, उतारा शीशे में उसने, फ़रेब दे के मुझे वो एक शख्स जो ख़ुद को अनाड़ी रखता है, बना लिया है जो कच्चा मकाँ किसी ने यहाँ वो झोपड़ा भी अगर है तो माड़ी रखता है, कभी नवाब के मन को टटोल कर तो देखो ये दिल का मोम है, चेहरा पहाड़ी रखता है..!! - [राब्ता ज़िस्म का जब रूह से कट जाता है](https://bazmeshayari.com/rabta-zism-ka-jab/): राब्ता ज़िस्म का जब रूह से कट जाता है आदमी मुख्तलिफ़ हालात में बँट जाता है, देख कर साहिल दरिया का सकूत पैहम चढ़ के आया हुआ तूफ़ान भी पलट जाता है, आईना देख कर होता है तौहम का असीर क़द तो वही होता है पर आदमी घट जाता है, कोई ख़ुशबू गम ए हालात को मिलती होगी साँप बन के जो रग ए जाँ से लिपट जाता है, फिर उसे मिलती नहीं मंज़िल ए मक़सूद कभी जादा ए इश्क़ से एक गाम जो हट जाता है, दिल भी क्या शय है भला देता है सारे मज़मून और एक लफ्ज़ - [उम्र कहते है जिसे साँसों की एक जंज़ीर है](https://bazmeshayari.com/umr-kahte-hai-jise-saanso-ki/): उम्र कहते है जिसे साँसों की एक जंज़ीर है चश्म ए बीना में हर के लम्हा नई तस्वीर है, ज़िन्दगी इनआम की सूरत में एक ताज़ीर है जो कभी देखा न था उस ख़्वाब की ताबीर है, जो पस ए पर्दा है उसको चाहे जो कह लीजिए पेश जो आए यहाँ, वही इन्सान की तक़दीर है, कोई मंज़र यूँ नहीं जिसका कि पस मंज़र नहीं ज़ात का इज़हार गोया ज़ात की तशहीर है, रात खाएफ़ है कि तहलील सहर हो जाएगी सुबह को ये फिक्र ला हक़ शाम दामन गीर है..!! - [दस्तरस में न हो हालात तो फिर क्या कीजिए](https://bazmeshayari.com/dastras-me-na-ho-halaat/): दस्तरस में न हो हालात तो फिर क्या कीजिए वक़्त दिखलाए करिश्मात तो फिर क्या कीजिए, साहब ए वक़्त है जो उनकी तबीयत चाहे ज़ुल्म को कह दे मुक़ाफात तो फिर क्या कीजिए, तीरगी गम ए हस्ती का तसलसुल टूटे चलिए ये कट भी गई रात तो फिर क्या कीजिए, ज़िन्दा रहने के लिए शर्त ए तहम्मुल ठहरी उस पे क़ायल न हुई ज़ात तो फिर क्या कीजिए, ज़ीस्त के लम्हों को रखता है सजा कर शायर माँग ले कोई हिसाबात तो फिर क्या कीजिए..!! - [हमें कोई गम न था, गम ए आशिकी से पहले](https://bazmeshayari.com/hame-koi-gam-n-tha/): हमें कोई गम न था, गम ए आशिकी से पहले न थी दुश्मनी किसी से, तेरी दोस्ती से पहले, ये है मेरी बदनसीबी, तेरा क्या कुसूर इसमें ? तेरे गम ने मार डाला, मुझे जिंदगी से पहले, मेरा प्यार जल रहा है, ऐ चाँद आज छुप जा कभी प्यार कर हमें भी, तेरी चाँदनी से पहले, ये अज़ीब इम्तेहान है, कि तुम्ही को भूलना है मिले कब थे इस तरह हम, तुम्हे बेदिली से पहले, हमें कोई गम न था, गम ए आशिकी से पहले न थी दुश्मनी किसी से, तेरी दोस्ती से पहले, ~फैयाज़ हाशमी - [जाने क्यूँ आजकल तुम्हारी कमी अखरती है बहुत](https://bazmeshayari.com/jaane-kyun-aajkal/): जाने क्यूँ आजकल तुम्हारी कमी अखरती है बहुत यादो के बंद कमरे में ज़िन्दगी सिसकती है बहुत, पनपने ही नहीं देता कभी बेदर्द सी ख्वाहिश को महसूस तुम्हे जो करने की कोशिश करती है बहुत, दावे करती है ये ज़िन्दगी जो हर दिन तुझे भुलाने के किसी न किसी बहाने से याद तुझे करती है बहुत, आहट से भी चौक जाए, मुस्कुराने से भी कतराए जाने क्यूँ अब ये ज़िन्दगी जीने से डरती है बहुत..!! - [ये सोचा नहीं है कि किधर जाएँगे...](https://bazmeshayari.com/ye-socha-nahi-hai-ki/): ये सोचा नहीं है कि किधर जाएँगे मगर हम अब यहाँ से गुज़र जाएँगे, इसी खौफ़ से रातों को नींद आती नहीं कि हम ख़्वाब देखेंगे तो डर जाएँगे, डराता बहुत है ये समन्दर हमें समन्दर में एक दिन उतर जाएँगे, जो रोकेंगी रास्ता कभी ये मंज़िले तो घड़ी दो घड़ी को ठहर जाएँगे, कहाँ देर तक रात ठहरती है कोई उसी तरह ये दिन भी गुज़र जाएँगे, इसी खुशगुमानी ने तन्हा किया है जिधर हम जाएँगे, हमसफ़र जाएँगे, बदलता है सब कुछ कभी न कभी एक दिन ये सितारे भी बिखर जाएँगे..!! ~आलम खुर्शीद - [भीतर भीतर आग भरी है बाहर बाहर पानी है](https://bazmeshayari.com/bhitar-bhitar-aag-bhari/): भीतर भीतर आग भरी है बाहर बाहर पानी है तेरी मेरी, मेरी तेरी सब की यही कहानी है, ये हलचल, ये खेल तमाशे सब रोटी की माया है पेट भरा है तो फिर प्यारे ऋतु हर एक सुहानी है, इल्म का कोई मान नहीं दौलत का बस सम्मान यहाँ गर दौलत है पास तुम्हारे तो मैली चादर धानी है, ये हिन्दू है, वो मुस्लिम है, ये सिख वो ईसाई है सब के सब है ये वो पर कोई न यहाँ हिन्दुस्तानी है, जिसके कारण गले कटे और लोगो के ईमान बिके इस छोटी सी कुर्सी की तो अदभुत बड़ी कहानी - [ऐ मेरी क़ौम के लोगो ज़रा होशियार हो जाओ](https://bazmeshayari.com/ae-meri-qaum-ke-logo/): ऐ मेरी क़ौम के लोगो ज़रा होशियार हो जाओउठो अब नींद से जागो के अब बेदार हो जाओ, भूलाकर मसलकी झगड़े गले सब को लगाना हैअगर सच्चे मुसलमाँ हो तो एक मरकज़ आना है, ख़ुदा का है करम हम पर के हम ईमान वाले हैंनबी के उम्मती हैं और हम क़ुरआन वाले हैं, हम ही ने बद्र के मैदां में दुश्मन को पछाड़ा थाज़रा सा याद कर लो हमने ख़ैबर को उखाड़ा था, जो मुमकिन ही नहीं था हमने मुमकिन कर के दिखलायाहमारे हौसलों को देखकर फ़िरऔन थर्राया, मुसलमानों ख़ुदा के वास्ते अब एक हो जाओरसूल ए पाक की राहों - [कुछ चलेगा ज़नाब, कुछ भी नहीं...](https://bazmeshayari.com/kuch-chalega-zanab-kuch/): कुछ चलेगा ज़नाब, कुछ भी नहीं चाय, कॉफ़ी, शराब, कुछ भी नहीं, चुप रहे तो कली लगे वो होंठ हँस पड़े तो गुलाब कुछ भी नहीं, जो ज़मीं पर है सब हमारा है सब है अच्छा, ख़राब कुछ भी नहीं, इन अमीरों की सोच तो ये है हम गरीबो के ख़्वाब कुछ भी नहीं, मन की दुनियाँ में सब ही उरियाँ है दिल के आगे हिज़ाब कुछ भी नहीं, उम्र अब अपनी अस्ल शक्ल में आ क्रीम, पाउडर, खिज़ाब कुछ भी नहीं, ज़िन्दगी भर का लेन देन अना और हिसाब ओ क़िताब कुछ भी नहीं..!! ~अना क़ासमी - [हर रिश्ता यहाँ बस चार दिन की कहानी है](https://bazmeshayari.com/har-rishta-yahan-bas-chaar-din/): हर रिश्ता यहाँ बस चार दिन की कहानी है अंज़ाम ए वफ़ा आँखों से बहता हुआ पानी है, उफ़्फ़ ये इश्क़ के किस्से ये दोस्ती के नग्मे रेत की दीवारें है एक दिन तो ढह जानी है, लुटाओ जो लुटा सको मुस्कुराहटे तुम यहाँ उधार की ज़िन्दगी और साँसे आनी जानी है, पानी पर खींची लकीरें है या ये तक़दीरें है ना बनती कभी न रहती कोई निशानी है, हर रिश्ता यहाँ बस चार दिन की कहानी है अंज़ाम ए वफ़ा आँखों से बहता हुआ पानी है..!! - [जी चाहे तो शीशा बन जा, जी चाहे पैमाना बन जा](https://bazmeshayari.com/jee-chahe-to-shisha/): जी चाहे तो शीशा बन जा, जी चाहे पैमाना बन जा शीशा पैमाना क्या बनना ? मय बन जा मैख़ाना बन जा, मय बन कर मैख़ाना बन कर मस्ती का अफ़साना बन जा मस्ती का अफ़साना बन कर हस्ती से बेगाना बन जा, हस्ती से बेगाना होना, मस्ती का अफ़साना बनना इस होने से इस बनने से अच्छा है दीवाना बन जा, दीवाना बन जाने से दीवाना हो जाना अच्छा है दीवाना होने से अच्छा खाक़ ए दर ए जानाना बन जा, खाक़ ए दर ए जानाना क्या है ? अहल ए दिल की आँख का सुरमा शमा के दिल - [घने बादलो से जो कभी थोड़ी धूप निकलती रहती](https://bazmeshayari.com/ghane-baadlo-se-jo-kabhi/): घने बादलो से जो कभी थोड़ी धूप निकलती रहती आसरे उम्मीद के मुमकिन है ज़िन्दगी चलती रहती, हुस्न ओ अदा के बाज़ार में सुकून जो मिलता अगर तलाश ए वफ़ा में मुहब्बत ना शहर बदलती रहती, धोखा फ़ितरत है इंसानी, क्या और सबूत दूँ हर खूबसुरत चीज पर क्यूँ नज़र फ़िसलती रहती, मैख़ाने के पास घर हो तो क्या बात है सुरूर ए हवा से ही ये तबीयत बहलती रहती, आफ़ताब की किरनो से तो हमने निभा लिया लेकिन चाँदनी की आँच से ज़िन्दगी पिघलती रहती, जो मिटा कर वज़ूद रौशन हो जाती महफ़िले शबनम ना बनती आस सुबह तक - [उनका दावा, मुफ़लिसी का मोर्चा...](https://bazmeshayari.com/unka-daava-muflisi-ka/): उनका दावा, मुफ़लिसी का मोर्चा सर हो गया पर हकीक़त ये है मौसम और बदतर हो गया, बंद कल को क्या किया मुखिया के खेतो में बेगार अगले दिन ही एक होरी और बेघर हो गया, जब हुई नीलाम कोठे पर किसी की आबरू फिर अहिल्या का सरापा ज़िस्म पत्थर हो गया, रंग रोगन से पुता, पहलू में लेकिन दिल नहीं आज का इन्सान भी काग़ज का पैकर हो गया, माफ़ करिए, सच कहूँ तो आज हिन्दुस्तान में कोख़ ही ज़रखेज़ है अहसास बंज़र हो गया..!! ~अदम गोंडवी - [सियासी महाभारत में इसके पात्र...](https://bazmeshayari.com/siyasi-mahabharat-me/): सियासी महाभारत में इसके पात्र सारे आ गए योगगुरु भागे कहीं तो कहीं अन्ना हजारे आ गए, ठाकरे जो भी कहे वही तो बॉलीवुड दोहराएगा इस लिए पण्डाल में सारे फ़िल्मी सितारे आ गए, बाबा के चरणों में है सभी खाते विदेशी बैंक के कैसे कैसे भक्त गण जमुना जी के किनारे आ गए, आडवानी, अडानी, गडकरी आये तो पर्दा उठ गया सौदागर है ये सारे ही वोट के दामन पसारे आ गए..!! ~अदम गोंडवी - [शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर...](https://bazmeshayari.com/shaam-ko-jis-waqt/): शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं मुस्कुरा देते है बच्चे और मर जाता हूँ मैं, जानता हूँ रेत पर वो चिलचिलाती धूप है जाने किस उम्मीद में फिर भी उधर जाता हूँ मैं, सारी दुनियाँ से अकेले जूझ लेता हूँ कभी और कभी अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं, ज़िन्दगी जब मुझ से मजबूती की रखती है उम्मीद फ़ैसले की उस घड़ी में क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं ? आपके रस्ते है आसां आपकी मंज़िल है क़रीब ये डगर कुछ और ही है जिस डगर जाता हूँ मैं..!! ~राजेश रेड्डी - [कुछ अधूरी हसरतें अश्क ए रवाँ में...](https://bazmeshayari.com/kuch-adhuri-hasraten/): कुछ अधूरी हसरतें अश्क ए रवाँ में बह गए क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दत ए गम सह गए, गुफ़्तगू में फूल झड़ते थे जिनके कभी होंठ से यादों के कारवाँ अब ख़ार बन दिल में चुभ कर रह गए, जब मिले हम से कभी एक अज़नबी की तरह पर तिरछी निगाहों से वो मेरे दिल की कहानी कह गए, यूँ तो वस्ल के हर लम्हे यादों के नग़मे बन गए वही नग़मे अब घुट के सोंज़ ओ साज़ दिल में रह गए, जिस दिल के आईने में सिर्फ़ उसका ही अक्स था तोड़ डाला शीशा ए दिल, हम - [तुम्हे पूजता था दीया वो बुझा दूँ....](https://bazmeshayari.com/tumhe-pujta-tha-diya/): तुम्हे पूजता था दीया वो बुझा दूँ तुम्हारे बिना भी दुनियाँ बसा दूँ, सुनो इश्क़ में अब यही चाहता हूँ मुझे तुम भुलाओ तुम्हे मैं भूला दूँ, अगर है लकीरे तेरे नाम की तो यही आरज़ू अब इन्हें मैं मिटा दूँ, कभी तू मिला था इबादत के बदले यही सोचता हूँ अब दुआ में भूला दूँ, सारी यादे वो वादे जी दिल में है मेरे उन्हें एक पल में मैं दिल से हटा दूँ, मिले जो समन्दर कोई राह में तो तेरी याद को मैं नदी सा बहा दूँ, गुमाँ था मुझे कि यही रस्म होगी वफ़ा ही मिलेगी अगर - [ज़माना आया है बेहिजाबी का आम...](https://bazmeshayari.com/zamana-aaya-hai-behizabi/): ज़माना आया है बेहिजाबी का आम दीदार ए यार होगा सुकूत था पर्दादार जिसका वो राज़ अब आश्कार होगा, गुज़र गया अब वो दौर साक़ी कि छुप के पीते थे पीने वाले बनेगा सारा जहान मयख़ाना हर कोई बादा ख़्वार होगा, कभी जो आवारा ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगे बरहना पाई वही रहेगी मगर नया ख़ार ज़ार होगा, सुना दिया गोश ए मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर जो अहद सहराइयों से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा, निकल के सहरा से जिस ने रूमा की सल्तनत को उलट दिया था सुना है ये क़ुदसियों - [जाने किस करनी का फल होगा...](https://bazmeshayari.com/jaane-kis-karni-ka-fal/): जाने किस करनी का फल होगा कैसी फिजा, कैसे मौसम में जागे हम ? शहरों से सेहराओ तक टहनी टहनी हर सिम्त झूल रही लाशें ज़िन्दा पत्तो की, क्या इसी दिन और नज़्ज़ारे की खातिर चैन ओ सुकूं छोड़ जंगल जंगल भागे हम ? कैसे जलती तपती इस दोपहरी में कोई प्यासा पंछी नहर किनारे उतरेगा ? तेज़ नुकीले खंज़र और तलवारों के दरमियाँ हो जैसे कोई फँसे हुए धागे हम जब अपनी ही यहाँ कोई पहचान नहीं तो हमसाए को कैसे अब पहचाने हम ? चप्पे चप्पे पर तो चुनवा दी है दीवारे कैसे देखे और क्या देखे इनके - [ना मस्ज़िदे ना शिवाले तलाश करते है...](https://bazmeshayari.com/naa-maszide-naa-shiwale/): ना मस्ज़िदे ना शिवाले तलाश करते है ये भूखे पेट निवाले तलाश करते है, हमारी सादा दिली देखो इस ज़माने में दुखो को बाँटने वाले तलाश करते है, मुझे तो इस पे ताअज्ज़ुब है अक्ल के अंधे दीये बुझा के उजाले तलाश करते है, किसी के काम न आये कभी ज़माने में और अपने चाहने वाले तलाश करते है, राह ए वफ़ा में अभी दो क़दम चले भी नहीं अभी से पाँव के छाले तलाश करते है, निगाह रखते है साक़ी वो तेरी आँखों पर सुकूं ए दिल जो प्याले तलाश करते है..!! ~हनीफ राही - [तुम्हारे हिज़्र में है ज़िन्दगी दुश्वार....](https://bazmeshayari.com/tumhare-hizr-me-hai/): तुम्हारे हिज़्र में है ज़िन्दगी दुश्वार बरसो से तुम्हे मालूम क्या तुम हो समन्दर पार बरसों से, चले आओ तुम्हारे बिन न जीते है न मरते है बनी है ज़िन्दगी जैसे गले का हार बरसों से, कभी दुनियाँ से हम हारे, कभी तुमसे, कभी ख़ुद से हमारी इश्क़ में होती रही है हार बरसों से, निकलना कश्ती ए उम्मीद तूफानों से मुश्किल है एक ऐसे नाख़ुदा के हाथ है पतवार बरसों से, इसी मिल्लत के गहवारे को हिन्दुस्तान कहते है कहीं रौशन शिवाले और कहीं मीनार बरसों से, दिन रात किस की मुन्तज़िर रहती है ये आँखे ये किस की - [राहत ए जाँ से तो ये दिल का वबाल...](https://bazmeshayari.com/rahat-e-jaan-se-to/): राहत ए जाँ से तो ये दिल का वबाल अच्छा है उस ने पूछा तो है इतना तेरा हाल अच्छा है, माह अच्छा है बहुत ही न ये साल अच्छा है फिर भी हर एक से कहता हूँ कि हाल अच्छा है, तेरे आने से कोई होश रहे या न रहे अब तलक तो तेरे बीमार का हाल अच्छा है, ये भी मुमकिन है तेरी बात ही बन जाए कोई उसे दे दे कोई अच्छी सी मिसाल अच्छा है, दाएँ रुख़्सार पे आतिश की चमक वजह ए जमाल बाएँ रुख़्सार की आग़ोश में ख़ाल अच्छा है, आओ फिर दिल के - [किस ओर ये सफ़र है, संभल जाइए...](https://bazmeshayari.com/kis-or-ye-safar/): किस ओर ये सफ़र है, संभल जाइए कौन कब किस डगर है, संभल जाइए, नेक रस्ते पे चलते हुए आज कल हर आदमी दर ब बदर है, संभल जाइए, चाहे कहिए सड़क इसको या एक नदी इस कदर ये रह गुज़र है, संभल जाइए, क्या गिनना ? दर्द कितने दिए आपने ये कोई शराफ़त नहीं है, संभल जाइए, जान सस्ती मगर चीजे महँगी यहाँ बाक़ी सब बेअसर है, संभल जाइए…!! - [तसव्वुर में भी जिसकी जुस्तुजू करता है...](https://bazmeshayari.com/tasavvur-me-bhi-jiski/): तसव्वुर में भी जिसकी जुस्तुजू करता है दिल मेरा उसी से हिज्र में भी गुफ़्तुगू करता है दिल मेरा, नदामत से गुनाहों पर जो रोती हैं कभी आँखें इन्ही पाकीज़ा अश्कों से वुज़ू करता है दिल मेरा, तेरी यादों के ख़ंजर ज़ेहन को जब चाक करते हैं उसे झूठी तसल्ली से रफ़ू करता है दिल मेरा, जसारत देखने की जिस को कोई भी नहीं करता उसी से दो दो बातें रूबरू करता है दिल मेरा, गुज़ारे थे जो मदहोशी के आलम में कभी ‘साहिल’ उन्ही लम्हों की फिर से आरज़ू करता है दिल मेरा..!! ~अब्दुल हफ़ीज़ साहिल - [हासिल हुई जब से आरज़ी शोहरते...](https://bazmeshayari.com/haasil-hui-jab-se/): हासिल हुई जब से आरज़ी शोहरते माल ओ ज़र के नशे में चूर हो गया, पा के ऊँचा रूतबा वो दूर हो गया बेटा ना रहा अब वो हुज़ूर हो गया, माँ बाप को समझने लगा है एक बोझ कहता है ढोते ढोते मज़दूर हो गया, क़ाबिल बनाने में ख़ूँ पानी कर दिया रिश्ता खून वाला उसे नामंज़ूर हो गया, इल्ज़ाम देता है वो जलते है देख कर इल्ज़ाम देना अब उसका दस्तूर हो गया..!! - [रोज़मर्रा वही एक ख़बर देखिए...](https://bazmeshayari.com/rozmarra-wahi-ek-khabar/): रोज़मर्रा वही एक ख़बर देखिए अब तो पत्थर हुआ काँचघर देखिए, सड़के चलने लगी आदमी रुक गया हो गया यूँ अपाहिज़ सफ़र देखिए, सारा आकाश अब इनके सीने में है काट कर इन परिंदों के पर देखिए, मैं हकीक़त न कह दूँ कही आपसे मुझको खाता है हरदम ये डर देखिए, धूप आती है इनमे न ठंडी हवाएँ खिड़कियाँ भी हो गई बेअसर देखिए..!! - [एक निहत्थे आदमी के हाथ में क़िस्मत...](https://bazmeshayari.com/ek-nihatthe-aadmi-ke/): एक निहत्थे आदमी के हाथ में क़िस्मत ही काफी है हवाओं का रुख बदलने के लिए चाहत ही काफी है, ज़रूरत ही नहीं अहसासों को अल्फाज़ की कोई समंदर की तरह अहसासों में शिद्दत ही काफी है, मुबारक़ हो तुम्हे शहर वालो जीने के अंदाज़ शहरों में हमें तो हमारे गाँवों में मरने की बस राहत ही काफी है, नफ़रत को हथियार बना कर इंसानियत मिटाने वालो तुम जैसो से निपटने के लिए एक क़ुदरत ही काफी है, मुफ़लिस की क़िस्मत में पक्की दीवार नहीं तो क्या ? उसके लिए छप्पर, झोपड़े,खपरैल की छत ही काफी है..!! - [आदमी केवल वहम में तानता है...](https://bazmeshayari.com/aadmi-kewal-vaham-me/): आदमी केवल वहम में तानता है शर्तियाँ औकात वो अपनी जानता है, रहनुमाई झूठ की कर ले मगर वो वक़्त की सच्चाइयाँ पहचानता है, जानता है हश्र उसके बाद का भी गन्दगी में पैर बरबस ही सानता है, चार दिन का है तमाशा ए ज़िन्दगी मस्तियाँ फिर भी हमेशा छानता है, है उसे मालूम शिखरों की ढलाने वो बुलंदी की हसरते यूँ ही ठानता है, कोई नहीं छोटा कभी ख़ुद से यहाँ पर अफ़सोस कोई ख़ुद को ख़ुदा मानता है..!! - [क़ुदरत का करिश्मा भी क्या बेमिसाल है](https://bazmeshayari.com/qudrat-ka-karishma-bhi/): क़ुदरत का करिश्मा भी क्या बेमिसाल है चेहरे सफ़ेद काले पर खून सबका लाल है, हिन्दू है यहाँ कोई, तो कोई मुसलमान है कितना फरेबकार ये मज़हब का जाल है, क़ायम न हो सके यकज़हती हमारे मुल्क में सदा दूरी बने रहे ये सियासत की चाल है, ज़मीं पे इन्सान ने बसा तो ली है बस्तियां पर इंसानियत का आज भी जग में अकाल है, दिन ईद का है, आ के गले से लगा ले मुझे हर होली पे जैसे तू मुझे मलता गुलाल है..!! - [ये क़ुदरत भी अब तबाही की हुई शौक़ीन](https://bazmeshayari.com/ye-qudrat-bhi-ab/): ये क़ुदरत भी अब तबाही की हुई शौक़ीन लगती है ऐ दौर ए ज़दीद साज़िश तेरी बहुत संगीन लगती है, अदब, तहज़ीब, रिश्तो की नहीं है फ़िक्र अब कोई आजकल दुनियाँ ख़ुद पसंदी में हुई तल्लीन लगती है, हर एक शख्स अब यहाँ हैरान है ज़ायका ए ज़िन्दगी से ये कभी खट्टी, कभी मीठी तो कभी नमकीन लगती है, अँधेरा ए गम दिल के तहखानो में उनके क़ैद रहते है जिनकी ज़िन्दगी देखने में अक्सर बहुत रंगीन लगती है, ख़ुदा, मज़हब, ज़मीं, इन्सान तक तो तक़सीम कर डाले फ़ज़ा इस मुल्क की अब तो बहुत ग़मगीन लगती है..!! - [बात अब करते है क़तरे भी समंदर...](https://bazmeshayari.com/baat-ab-karte-hai/): बात अब करते है क़तरे भी समंदर की तरह लोग ईमान बदलते है कलेंडर की तरह, कोई मंज़िल न कोई राह न मकसद कोई है ये जनतंत्र यतीमो के मुक़द्दर की तरह, बस वही लोग बचा सकते है इस कश्ती को डूब सकते है जो मंझधार में लंगर की तरह, मैंने ख़ुशबू सा बसाया था जिसे तन मन में मेरे पहलू में वही बैठा है खंज़र की तरह, मेरा दिल झील के पानी की तरह काँपा था तुमने वो बात उछाली थी जो कंकर की तरह, जिनकी ठोकर से किले काँप के ढह जाते थे कल की आँधी में उड़े - [हम प्यास के मारों का इस तरह गुज़ारा है](https://bazmeshayari.com/ham-pyas-ke-maaro-ka/): हम प्यास के मारों का इस तरह गुज़ारा है आँखों में नदी लेकिन हाथो में किनारा है, दो चार क़दम चल कर दो चार घड़ी रुकना मंज़िल भी तुम्हारी है रस्ता भी तुम्हारा है, पलकों के नशेमन से होंठों के गुलिस्ताँ तक कुछ हुस्न तुम्हारा है कुछ इश्क़ हमारा है, फूलों के महकने का कोई तो सबब होगा या ज़ुल्फ़ परेशाँ है या लब का इशारा है, बर्फ़ाब सी दुनियाँ में बस इश्क़ को थामे रख ये आग का दरियाँ ही तिनके का सहारा है, ऐ पीर ए मुगाँ तेरे मयखाने में तो हम ने एक मय ही नहीं पी - [ये दिल टूट न जाए इस बात पर...](https://bazmeshayari.com/ye-dil-tut-na/): ये दिल टूट न जाए इस बात पर एक तरफ़ा ही ज़ोर लगाया मैंने, मेरे दिल की आवाज़ सुन सको इस क़दर ख़ुद को रुलाया मैंने, शिकस्ता ए दिल लिए फिरता रहा पर कभी फ़ायदा नहीं उठाया मैंने, कोई ऊँगली न उठ सके ज़माने में तुम्हे इस क़दर अच्छा बताया मैंने, तुम से, सब से, और ना जाने कब से अपना दर्द ए दिल यूँ छुपाया मैंने, खत्म ए मुहब्बत हुई आख़िर तुम पे तुम पे ख़ुद को इतना लुटाया मैंने..!! - [क्यूँ खौफ़ इस क़दर है तुम्हे हादसात का ?](https://bazmeshayari.com/kyun-khauf-is-qadar/): क्यूँ खौफ़ इस क़दर है तुम्हे हादसात का ? एक दिन ख़ुदा दिखाएगा रास्ता निज़ात का, ये तजरुबा बताता है मुझको इस हयात का भरता नहीं है ज़ख्म कभी कड़वी बात का, यहाँ बन्दे है सब ख़ुदा के ही बनाये हुए हुज़ूर फिर झगड़ा ही बे सबब है यहाँ ज़ात पात का, रूठे हुए सनम को मनाऊँ भला मैं किस तरह ? जब उसको ऐतबार ही नहीं मेरी किसी बात का, ऐसा असर कहाँ है किसी और की दुआओं में ? जैसा शरफ़ हासिल हुआ है माँ के खिदमात का, राह ए हक़ पे चलना भी नहीं आसान है इतना - [वो एक लफ़्ज़ जो बेसदा जाएगा....](https://bazmeshayari.com/wo-ek-lafz-jo-besada/): वो एक लफ़्ज़ जो बेसदा जाएगा वही मुद्दतों तक सुना जाएगा, कोई है जो मेरे तआक़ुब में है मुझे मेरा चेहरा दिखा जाएगा, वो एक शख़्स जो दुश्मन ए जाँ सही मगर फिर भी अपना कहा जाएगा, जलेगी कोई मिशअल ए जाँ अभी मगर फिर अंधेरा सा छा जाएगा, नफ़ी ए जुरअत ए हक़ नुमाई सही मगर कब किसी से कहा जाएगा, यहाँ एक शजर मुंतज़िर सा भी है अब आख़िर कहाँ तक चला जाएगा ? मैं वो मिशअल ए नीम शब हूँ ‘अमीर’ जिसे कल का सूरज बुझा जाएगा..!! ~अमीर क़ज़लबाश - [मुक़द्दर ने कहाँ कोई नया पैग़ाम लिखा है](https://bazmeshayari.com/muqaddar-ne-kahan-koi/): मुक़द्दर ने कहाँ कोई नया पैग़ाम लिखा है अज़ल ही से वरक़ पर दिल के तेरा नाम लिखा है, क़दम में जानिब ए मंज़िल बढ़ाऊँ क्या कि क़िस्मत ने जहाँ आग़ाज़ लिखा था वहीं अंजाम लिखा है, शिकायत क्या करूँ साक़ी से मैं उसके तग़ाफ़ुल की मेरे होंठो के हिस्से ही में ख़ाली जाम लिखा है, हमें हैं मुंतख़ब रोज़ ए अज़ल से दर्द की ख़ातिर हमारे नामा ए क़िस्मत में हर इल्ज़ाम लिखा है, मुसलसल ग़म मुसलसल दर्द से तंग आ के ऐ ‘साहिल’ हम ऐसे अहल ए फ़ुर्क़त ने सहर को शाम लिखा है..!! - [शरीक ए आलम ए कैफ़ ओ सुरूर....](https://bazmeshayari.com/shariq-e-alam-e/): शरीक ए आलम ए कैफ़ ओ सुरूर मैं भी था कि रात जश्न में तेरे हुज़ूर मैं भी था, अज़ीब वक़्त था दुनियाँ क़रीब थी मेरे गज़ब ये था तेरे दामन से दूर मैं भी था, गमो के घेरे में जब रक्स कर रही थी हयात तमाश बीं की तरह बे शुऊर मैं भी था, न रुकना राह में शर्त ए सफ़र में शामिल था थकन से वरना बहुत चूर चूर मैं भी था, उतर रहा था लहू किस बला का आँखों में तेरे ख़याल में उस दम ज़रूर मैं भी था, गुज़रते वक़्त ने पहरे बैठा दिए मुझ पर - [मुझे तन्हाई के ग़म से बचा लेते तो...](https://bazmeshayari.com/mujhe-tanhaai-ke-gam/): मुझे तन्हाई के ग़म से बचा लेते तो अच्छा था सफ़र में हमसफ़र अपना बना लेते तो अच्छा था, शिकस्त ए फ़ाश का ग़म ज़िंदगी जीने से बदतर है झुकाने की बजाए सर कटा लेते तो अच्छा था, कभी अश्कों पे इतना ज़ब्त भी अच्छा नहीं होता ये चश्मा फिर ज़रर देगा बहा लेते तो अच्छा था, भला क्या फ़ाएदा अब क़ब्र पे आँसू बहाने से अगर माँ बाप की पहले दुआ लेते तो अच्छा था, शिकायत से भला ‘साहिल’ हुआ है फ़ाएदा किस का ? ग़म ए दिल गर हँसी में तुम छुपा लेते तो अच्छा था..!! - [सुबह तक मैं सोचता हूँ शाम से...](https://bazmeshayari.com/subah-tak-sochta-hoon/): सुबह तक मैं सोचता हूँ शाम से जी रहा है कौन मेरे नाम से, शहर में सच बोलता फिरता हूँ मैं लोग ख़ाइफ़ हैं मेरे अंजाम से, रात भर जागेगा चौकीदार एक और सब सो जाएँगे आराम से, सौ बरस का हो गया मेरा मज़ार अब नवाज़ा जाऊँगा इनआम से, साथ लाऊँगा थकन बेकार की घर से बाहर जा रहा हूँ काम से, नाम ले उसका सफ़र आग़ाज़ कर दूर रख दिल को ज़रा औहाम से, ज़िंदगी की दौड़ में पीछे न था रह गया वो सिर्फ़ दो एक गाम से..!! ~अमीर क़ज़लबाश - [नदी के पार उजाला दिखाई देता है](https://bazmeshayari.com/nadi-ke-paar-ujala/): नदी के पार उजाला दिखाई देता है मुझे ये ख़्वाब हमेशा दिखाई देता है, बरस रही हैं अक़ीदत की बदलियाँ लेकिन शुऊर आज प्यासा दिखाई देता है, चराग़ ए मंज़िल ए फ़र्दा जलाएगा एक रोज़ वो राहगीर जो तन्हा दिखाई देता है, तेरी निगाह ने हल्का सा नक़्श छोड़ा था मगर ये ज़ख़्म तो गहरा दिखाई देता है, किसी ख़याल की मिश्अल किसी सदा का चराग़ हर एक सम्त अंधेरा दिखाई देता है, ‘अमीर’ पूछ रहा हूँ ग़म ए ज़माना से हमारे घर में तुझे क्या दिखाई देता है..!! ~अमीर क़ज़लबाश - [ज़बाँ है मगर बे ज़बानों में है....](https://bazmeshayari.com/zaban-hai-magar-be/): ज़बाँ है मगर बे ज़बानों में है नसीहत कोई उसके कानों में है, चलो साहिलों की तरफ़ रुख़ करें अभी तो हवा बादबानों में है, ज़मीं पर हो अपनी हिफ़ाज़त करो ख़ुदा तो मियाँ आसमानों में है, न जाने ये एहसास क्यूँ है मुझे वो अब तक मेरे पासबानों में है, सजा तो लिए हम ने दीवार ओ दर उदासी अभी तक मकानों में है, हवा रुख़ बदलती रहे भी तो क्या परिंदा तो अपनी उड़ानों में है..!! ~अमीर क़ज़लबाश - [वो सर फिरी हवा थी सँभलना पड़ा मुझे](https://bazmeshayari.com/wo-sar-firi-hawa/): वो सर फिरी हवा थी सँभलना पड़ा मुझे मैं आख़िरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे, महसूस कर रहा था उसे अपने आस पास अपना ख्याल ख़ुद ही बदलना पड़ा मुझे, सूरज ने छुपते छुपते उजागर किया तो था लेकिन तमाम रात पिघलना पड़ा मुझे, मौज़ू ए गुफ़्तुगू थी मेरी ख़ामोशी कहीं जो ज़हर पी चुका था उगलना पड़ा मुझे, कुछ दूर तक तो जैसे कोई मेरे साथ था फिर अपने साथ आप ही चलना पड़ा मुझे..!! ~अमीर क़ज़लबाश - [सुना है ये जहाँ अच्छा था पहले...](https://bazmeshayari.com/suna-hai-ye-jahan/): सुना है ये जहाँ अच्छा था पहले ये जो अब दश्त है दरिया था पहले, जो होता कौन आता इस जहाँ में किसे दुनिया का अंदाज़ा था पहले, बड़ी तस्वीर लटका दी है अपनी जहाँ छोटा सा आईना था पहले, समझ में कुछ नहीं आता अब उसकी वो जो औरों को समझाता था पहले, किया ईजाद जिस ने भी ख़ुदा को वो ख़ुद को कैसे बहलाता था पहले, बहुत कुछ भी नहीं काफ़ी यहाँ अब बहुत थोड़े से चल जाता था पहले, ये दीवारें तो हैं इस दौर का सच खुला हर दिल का दरवाज़ा था पहले..!! ~राजेश रेड्डी - [न जिस्म साथ हमारे न जाँ हमारी तरफ़](https://bazmeshayari.com/na-jism-saath-hamare/): न जिस्म साथ हमारे न जाँ हमारी तरफ़ है कुछ भी हम में हमारा कहाँ हमारी तरफ़, खड़े हैं प्यासे अना के इसी भरोसे पर कि चल के आएगा एक दिन कुआँ हमारी तरफ़, बिछड़ते वक़्त वो तक़्सीम कर गया मौसम बहार उसकी तरफ़ है ख़िज़ाँ हमारी तरफ़, इसी उमीद पे किरदार हम निभाते रहे कि रुख़ करेगी कभी दास्ताँ हमारी तरफ़, कहाँ कहाँ न छुपे बस्तियाँ जला के मगर जहाँ जहाँ गए आया धुआँ हमारी तरफ़, लगा के जान की बाज़ी जिसे बचाया था खिंची हुई है उसी की कमाँ हमारी तरफ़, उछाल देते हैं पत्थर ख़ला में हम - [चलो वो इश्क़ नहीं चाहने की आदत है](https://bazmeshayari.com/chalo-wo-ishq-nahi/): चलो वो इश्क़ नहीं चाहने की आदत है पर क्या करें हमें एक दूसरे की आदत है, तू अपनी शीशागरी का ना कर हुनर ज़ाया मैं आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है, मैं क्या कहूँ कि मुझे सब्र क्यूँ नहीं आता मैं क्या करूँ कि तुझे देखने की आदत है, तेरे नसीब मैं ऐ दिल सदा की महरूमी ना वो सखी ना तुझे माँगने की आदत है, विसाल में भी वही फिराक़ का आलम कि उसको नींद और मुझे रत जगे की आदत है, ये मुश्किलें हो तो कैसे रास्ते तय हो ? मैं ना सुबूर और उसे सोचने - [मेरे दिल में जब कोई मलाल होता है...](https://bazmeshayari.com/mere-dil-me-jab/): मेरे दिल में जब कोई मलाल होता है तुम क्या जानो मेरा कैसा हाल होता है, मेरी हर सोच में तुम होते हो शुमार मुझे फक़त तुम्हारा ही ख्याल होता है, अज़नबी हो कर भी अपने से लगते हो क्या मुहब्बत में ऐसा भी कमाल होता है ? ये दिल के सौदे भी अज़ीब होते है इनके आगे तो नवाब भी कंगाल होता है, मैं जब भी कोई तस्वीर बनाता हूँ मेरे हर तस्वीर में तुम्हारा जमाल होता है, तेरा दर्द संभाल के रखेंगे हम ऐसे जैसे ग़रीब की गठरी में कोई लाल होता है..!! - [ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊँ...](https://bazmeshayari.com/ye-kab-chaha-ki-main/): ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊँ बस अपने आप को मंज़ूर हो जाऊँ, नसीहत कर रही है अक़्ल कब से कि मैं दीवानगी से दूर हो जाऊँ, न बोलूँ सच तो कैसा आईना मैं जो बोलूँ सच तो चकना चूर हो जाऊँ, है मेरे हाथ में जब हाथ तेरा अजब क्या है जो मैं मग़रूर हो जाऊँ, बहाना कोई तो ऐ ज़िंदगी दे कि जीने के लिए मजबूर हो जाऊँ, सराबों से मुझे सैराब कर दे नशे में तिश्नगी के चूर हो जाऊँ, मेरे अंदर से गर दुनिया निकल जाए मैं अपने आप में भरपूर हो जाऊँ..!! ~राजेश - [शख्सियत ए लख्त ए ज़िगर कहला...](https://bazmeshayari.com/shaksiyat-e-lakhte-jigar/): शख्सियत ए लख्त ए ज़िगर कहला न सका ज़न्नत के धनी क़दमों को मैं सहला न सका, दूध पिलाया जिसने छाती से निचोड़ कर मैं निकम्मा एक गिलास पानी पिला न सका, हूँ बुढ़ापे का सहारा अहसास दिला न सका सीने पे सुलाने वाली को मखमल पे सुला न सका, बहू के डर से भूखी ही सो गई एक बार माँग कर मैं सुकूं के दो निवाले तक उसे खिला न सका, उन बूढ़ी आँखों से मैं नज़रे कभी मिला न सका दर्द वो सहती रही मैं जुबां तक हिला न सका, जो हर रोज़ ही ममता के नए रंग - [ग़मों का सैलाब आया ज़रूर है...](https://bazmeshayari.com/gamo-ka-sailab-aya-zarur-hai/): ग़मों का सैलाब आया ज़रूर है कुछ खोया तो कुछ पाया ज़रूर है, एक तुम हो जो दर्द समझते ही नहीं पर मेरी आँखों ने तो बताया ज़रूर है, मौसम सुहाना क्यूँ जब तू पास नहीं ऐसे मौसमो ने हमें सताया ज़रूर है, तुमसे इश्क़ का इज़हार नहीं किया पर इस दिल में तुम्हे बसाया ज़रूर है, एक तुम्हे ही देखने को बेक़रार है आँखे इन धड़कनो को भी समझाया ज़रूर है, माना कि तुमने ही दी है तमाम खुशियाँ मगर सच ये भी है कि रुलाया ज़रूर है..!! - [लिख लिख के आँसुओं से दीवान कर](https://bazmeshayari.com/likh-likh-ke-aansoo/): लिख लिख के आँसुओं से दीवान कर लिया है अपने सुख़न को अपनी पहचान कर लिया है, आख़िर हटा दीं हम ने भी ज़ेहन से किताबें हम ने भी अपना जीना आसान कर लिया है, दुनिया में आँखें खोली हैं मूँदने की ख़ातिर आते ही लौटने का सामान कर लिया है, सब लोग इस से पहले कि देवता समझते हमने ज़रा सा ख़ुद को इंसान कर लिया है, जिन नेकियों पे चल कर अज्दाद कितने ख़ुश थे हमने उन्ही पे चल कर नुक़सान कर लिया है, हर बार अपने दिल की बातें ज़बाँ पे ला कर हम ने मुसीबतों को - [जो नेकी कर के फिर दरिया में...](https://bazmeshayari.com/jo-neqi-kar-ke-dariya/): जो नेकी कर के फिर दरिया में उसको डाल जाता है वो जब भी दुनिया से जाता है तो माला माल जाता है, सँभल कर ही क़दम रखना बयाबान ए मोहब्बत में यहाँ से जो भी लौटता है बड़ा बेहाल जाता है, कभी भूखे पड़ोसी की ख़बर तो ली नहीं उसने मगर करने वो उमरा और हज हर साल जाता है, मनाऊँ हर बरस जश्न ए विलादत किस लिए आख़िर यहाँ हर साल मेरी उम्र का एक साल जाता है, है दुनिया तक ही अपनी दस्तरस में दौलत ए दुनिया फ़क़त हमराह अपने नामा ए आमाल जाता है, बिना देखे - [कुछ परिंदों को तो बस दो चार...](https://bazmeshayari.com/kuch-parindo-ko-to/): कुछ परिंदों को तो बस दो चार दाने चाहिए कुछ को लेकिन आसमानों के खज़ाने चाहिए, दोस्तों का क्या है वो तो यूँ भी मिल जाते हैं मुफ़्त रोज़ एक सच बोल कर दुश्मन कमाने चाहिएँ, तुम हक़ीक़त को लिए बैठे हो तो बैठे रहो ये ज़माना है इसे हर दिन फ़साने चाहिएँ, रोज़ इन आँखों के सपने टूट जाते हैं तो क्या ? रोज़ इन आँखों में फिर सपने सजाने चाहिएँ, बारहा ख़ुश हो रहे हैं क्यूँ इन्ही बातों पे लोग बारहा जिन पे उन्हें आँसू बहाने चाहिएँ..!! ~राजेश रेड्डी - [लेता हूँ उस का नाम भी आह ओ बुका...](https://bazmeshayari.com/leta-hoon-uska-naam/): लेता हूँ उस का नाम भी आह ओ बुका के साथ कितना हसीन रिश्ता है मेरा ख़ुदा के साथ, उस की क़ुबूलियत में कोई शक नहीं रहा भेजे हैं हम ने अश्क भी अब के दुआ के साथ, बुझते हुए चराग़ को हाथों में ले लिया इस बार बाज़ी जीत ली मैं ने हवा के साथ, आ के बचा ले मौत मुझे ज़िंदगी से तू कितनी गुज़ारूँ और मैं इस बेवफ़ा के साथ, तूफ़ाँ में मुझ को बनना पड़ा उस के दस्त ओ पा ‘साहिल’ वगर्ना बनती न थी ना ख़ुदा के साथ..!! ~अब्दुल हफ़ीज़ साहिल क़ादरी - [मेरे दिन की तरह रौशन मेरी हर...](https://bazmeshayari.com/mere-din-ki-tarah/): मेरे दिन की तरह रौशन मेरी हर रात होती है दुआ माँ की हर एक मौसम में मेरे साथ होती है, अजब दस्तूर है ये भी इज़हार ए मोहब्बत का ज़बाँ ख़ामोश रहती है नज़र से बात होती है, तलाश ए रिज़्क़ में जब भी कभी घर से निकलता हूँ मेरे हमराह पैहम गर्दिश ए हालात होती है, भला इल्ज़ाम कोई दुश्मनी पर क्या रखा जाए ? कि अब तो दोस्ती ही बाइस ए सदमात होती है, रहूँ मैं कोई आलम कोई हालत में मगर ‘साहिल’ मेरे पेश ए नज़र तो बस ख़ुदा की ज़ात होती है..!! ~अब्दुल हफ़ीज़ साहिल - [आख़िर वो मेरे क़द की भी हद...](https://bazmeshayari.com/aakhir-wo-mere-qad-ki/): आख़िर वो मेरे क़द की भी हद से गुज़र गया कल शाम में तो अपने ही साये से डर गया, मुठ्ठी में बंद किया हवा बच्चो के खेल में जुगनू के साथ उसका उजाला भी मर गया, कुछ ही बरस के बाद तो उससे मिला था मैं देखा जो मेरा अक्स तो आईना डर गया, ऐसा नहीं कि गम ने बढ़ा ली हो अपनी उम्र मौसम ख़ुशी का वक़्त से पहले गुज़र गया, लिखना मेरे मज़ार के कुतबे पे ये हरूफ़ मरहूम ज़िन्दगी की हिरासत में मर गया..!! ~क़तील शिफ़ाई - [इस दिल में आह, आँखों में नाले है...](https://bazmeshayari.com/is-dil-me-aah/): इस दिल में आह, आँखों में नाले है हमें न सताओ हम तुम्हारे चाहने वाले है, मुहब्बत भरे ख़त जो लिखे थे तुमने वो अपनी जान की तरह हम ने संभाले है, कभी वस्ल हुआ तो दिखाएँगे तुम्हे हमारे इस दिल में हिज़्र के जितने छाले है, अंजाने में तुमसे प्यार कर बैठे क्या इल्म था कि तुम्हारे इतने चाहने वाले है, हमने तो जिस किसी को दोस्त जाना है उसी ने हमारे लिए नफरतों के नाग पाले है, वक़्त ए आख़िर तो आ के मिल जाओ यूँ लगता है हम दुनियाँ से जाने वाले है..!! - [चलो अब यूँ भी आज़माए कभी...](https://bazmeshayari.com/chalo-ab-yun-bhi/): चलो अब यूँ भी आज़माए कभी तुम कह दो तो भूल जाए कभी, ज़िस्म मुर्दा हुआ तो ये जाना चैन मर कर भी हम न पाए कभी, कोई सूरत कभी न देख सकें ज़ख्म आँखों को अब लगाये कभी, अब तो आँखे भी वा नहीं करती हाथ पहले भी कब मिलाए कभी, अपनी दुनियाँ का तुम भरम रखना अपनी दुनियाँ से हम तो जाए कभी, नवाब मंदिरनुमा से इस दिल में बुत बनाये है फिर गिराए कभी..!! - [आहिस्ता चल ऐ ज़िन्दगी....](https://bazmeshayari.com/aahista-chal-ae-zindagi/): आहिस्ता चल ऐ ज़िन्दगी अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाक़ी है, कुछ दर्द मिटाना बाक़ी है कुछ फर्ज़ निभाना बाक़ी है, रफ़्तार में तेरे चलने से कुछ रूठ गए, कुछ छूट गए, रूठों को मनाना बाक़ी है रोतों को हँसाना बाक़ी है, कुछ हसरतें अभी अधूरी है कुछ काम भी और ज़रूरी है, ख्वाहिशे जो घुट गई इस दिल में उनको दफनाना बाक़ी है, कुछ रिश्ते बन के टूट गए कुछ जुड़ते जुड़ते छूट गए, आहिस्ता चल ऐ ज़िन्दगी अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाक़ी है..!! - [इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी](https://bazmeshayari.com/insan-me-haiwan-yahan/): इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहाँ भी, ख़ूँख़्वार दरिंदों के फ़क़त नाम अलग हैं हर शहर बयाबान यहाँ भी है वहाँ भी, हिन्दू भी सुकूँ से है मुसलमाँ भी सुकूँ से इंसान परेशान यहाँ भी है वहाँ भी, रहमान की रहमत हो कि भगवान की मूरत हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहाँ भी, उठता है दिल ओ जाँ से धुआँ दोनों तरफ़ ही ये ‘मीर’ का दीवान यहाँ भी है वहाँ भी..!! ~निदा फ़ाज़ली - [अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो](https://bazmeshayari.com/azib-saneha-mujh-par/): अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो मैं अपने साए से कल रात डर गया यारो, हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुँदला हर एक ज़ख़्म मेरे दिल का भर गया यारो, भटक रही थी जो कश्ती वो ग़र्क़ ए आब हुई चढ़ा हुआ था जो दरिया उतर गया यारो, वो कौन था वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे सुना है आज कोई शख़्स मर गया यारो, मैं जिस को लिखने के अरमान में जिया अब तक वरक़ वरक़ वो फ़साना बिखर गया यारो..!! ~शहरयार - [बीच सफ़र में छोड़ गया हमसफ़र...](https://bazmeshayari.com/bich-safar-me-chhod-gaya/): बीच सफ़र में छोड़ गया हमसफ़र हमसफ़र ना रहा इतना दर्द दिया हमदर्द ने कि हमदर्द हमदर्द ना रहा, तेरे गाल के तिल ने लगवाई इतनी तोहमते कलंक सा लगने लगा अब तिल तिल ना रहा, दिल में दफ़न हुए मेरे दिल के सब अरमां यादो का क़ब्र बन गया दिल, दिल दिल ना रहा..! वो छोड़ गया इस दर ओ मकान को जब से बस मकान ही लगता है ये घर अब घर ना रहा, कुछ इस तरह से ज़ख्म दिया मेरे अपनों ने अब तो मेरे इलाज़ का कोई दवा या मरहम ना रहा, कुछ यूँ बंद कर - [अगर तू साथ चल पड़ता सफ़र...](https://bazmeshayari.com/agar-tu-saath-chal-padta/): अगर तू साथ चल पड़ता सफ़र आसान हो जाता ख़ुशी से उम्र भर जीने का एक सामान हो जाता, न जा कर क्यूँ जताता है जो जाना था चला जाता बहुत होता तो ये होता कि मैं हैरान हो जाता, जो मेरी सिम्त तू दो गाम भी हँस कर चला आता मैं तेरे और तू मेरे लिए ईमान हो जाता, ख़ुशी से मुझ पे फिर क्या जाने गुज़र जानी थी हमीद घड़ी भर को भी तू मुझ पर जो कुर्बान हो जाता..!! ~अबरार हामिद - [तू अपनी खूबियाँ ढूँढ कमियां निकालने के लिए लोग हैं](https://bazmeshayari.com/tu-apni-khubiyan-dhoondh/): तू अपनी खूबियाँ ढूँढ कमियां निकालने के लिए लोग हैं, अगर रखना ही है कदम तो आगे रख पीछे खींचने के लिए लोग हैं, सपने देखने ही हैं तो ऊंचे देख नीचा दिखाने के लिए लोग हैं, अपने अंदर जुनून की चिंगारी भड़का, जलने के लिए लोग हैं, अगर बनानी है तो यादें बना बातें बनाने के लिए लोग हैं, प्यार करना है तो खुद से कर दुश्मनी करने के लिए लोग हैं, रहना है तो बच्चा बनकर रह समझदार बनाने के लिए लोग हैं, भरोसा रखना है तो ख़ुद पर रख शक करने के लिए लोग हैं, तू बस - [ज़नाब शेख़ की हर्ज़ा सराई ज़ारी है](https://bazmeshayari.com/janab-shekh-ki-harza/): ज़नाब शेख़ की हर्ज़ा सराई ज़ारी है इधर से ज़ुल्म उधर से दुहाई ज़ारी है, बिछड़ गया हूँ मगर याद करता रहता हूँ क़िताब छोड़ चुका हूँ पढ़ाई ज़ारी है, तेरे अलावा कहीं और भी मुलव्वस है तेरी वफ़ा से उनकी बेवफ़ाई ज़ारी है, वो क्यूँ कहेंगे कि दोनों में अम्न हो जाए हमारी जंग से जिनकी कमाई ज़ारी है, अज़ीब ख़ब्त ए मसीहाई है कि हैरत है मरीज़ मर भी चुका है दवाई ज़ारी है..!! - [हिज्र की शब घड़ी घड़ी दिल से यही...](https://bazmeshayari.com/hizr-ki-shab-ghadi/): हिज्र की शब घड़ी घड़ी दिल से यही सवाल है जिसके ख़याल में हूँ गुम उसको भी कुछ ख़याल है ? हाय री बेबसी शौक़ ए दिल का अजीब हाल है उसका जवाब सुन चुका फिर भी वही सवाल है, ख़्वाब ओ फ़ुसूँ नहीं तो क्या दिल ये जुनूँ नहीं तो क्या ख़ल्वत ए दोस्त और तू तेरा कहाँ ख़याल है ? मैं तेरे दर को छोड़ दूँ शर्त ए वफ़ा को तोड़ दूँ सोच ख़ुद अपने दिल में तू क्या ये मेरी मजाल है ? शर्म सी नज़र दिल की है उठती नहीं निगाह ए शौक़ इश्क़ की मंज़िलों - [ऐ लिखने वाले आख़िर तू ही क्यूँ...](https://bazmeshayari.com/ae-likhne-wale-aakhir/): ऐ लिखने वाले आख़िर तू ही क्यूँ लिखता है ? है ये दर्द सबको फिर तुझे ही क्यूँ दिखता है ? माँग के नहीं मिले तो ख़रीद कर के देख ले सस्ता या फिर महँगा हर कोई तो बिकता है, गए जाने वाले, चले जाएँगे सब आने वाले भी उम्र भर सफ़र में आख़िर कौन यहाँ टिकता है ? भला क्या खेले कोई यहाँ मुहब्बत की बाज़ी ? ना आँखे रोती है, न तो अब ये दिल सिसकता है, गर हो साहूकार तो सीना तान कर चला करो भला यूँ चोरो की तरह साहूकार कब झिझकता है..?? - [अब अपने दीदा ओ दिल का भी ए'तिबार](https://bazmeshayari.com/ab-apne-deeda-o/): अब अपने दीदा ओ दिल का भी ए’तिबार नहीं उसी को प्यार किया जिस के दिल में प्यार नहीं, नहीं कि मुझ को तबीअ’त पे इख़्तियार नहीं हर एक जाम से पी लूँ वो बादा ख़्वार नहीं, हर एक गाम पे काँटों की हैं कमीं गाहें शबाब आह शगूफ़ों की रहगुज़ार नहीं, भरी हुई है वो काम ओ दहन में तल्ख़ी ए ज़ीस्त कि लब पे जाम ए मोहब्बत भी ख़ुशगवार नहीं, न मेरे अश्कों से दामन पे तेरे आएगी आँच ये शो’ला रू हैं मगर फ़ितरत ए शरार नहीं, कहीं छुपाए से छुपती भी है हक़ीक़त ए ग़म वो - [ये दिल आवेज़ी ए हयात न हो](https://bazmeshayari.com/ye-dil-aavezi-e-hayat-na/): ये दिल आवेज़ी ए हयात न हो अगर आहंग ए हादसात न हो, तेरी नाराज़गी क़ुबूल मगर ये भी क्या भूल कर भी बात न हो, ज़ीस्त में वो घड़ी न आए कि जब हाथ में मेरे तेरा हाथ न हो, हँसने वाले रुला न औरों को सुबह तेरी किसी की रात न हो, इश्क़ भी काम की है चीज़ अगर यही बस दिल की काएनात न हो, कौन उस की जफ़ा की लाए ताब गाहे ब गाहे जो इल्तिफ़ात न हो, रिंद कुछ कर रहे हैं सरगोशी ज़िक्र ए साक़ी से ख़ुशसिफ़ात न हो..!! - [आरज़ू को दिल ही दिल में घुट के...](https://bazmeshayari.com/aarzoo-ko-dil-hi/): आरज़ू को दिल ही दिल में घुट के रहना आ गया और वो ये समझे कि मुझ को रंज सहना आ गया, पूछता कोई नहीं अब मुझ से मेरा हाल ए दिल शायद हाल ए दिल अब मुझ को कहना आ गया, सब की सुनता जा रहा हूँ और कुछ कहता नहीं वो ज़बाँ हूँ अब जिसे दाँतों में रहना आ गया, ज़िंदगी से क्या लड़ें जब कोई भी अपना नहीं हो के लहरों के रुख़ पर हम को बहना आ गया, लाख पर्दे इज़्तिराब ए शौक़ पर डाले मगर फिर वो एक मचला हुआ आँसू बरहना आ गया, पी - [जताए हक़ न कैसे हम भला इक़रार पे...](https://bazmeshayari.com/jataye-haq-na-kaise/): जताए हक़ न कैसे हम भला इक़रार पे उनके हमें फिर भी नाज़ होता है हसीं इंकार पे उनके, ख़बर उनको भी तो होगी कभी हालात की अपने हमें तो फ़ुर्सत लुटानी है हर एक इतवार पे उनके, भले रूठे रहे हमसे वो सालो साल तक लेकिन नमी ये आँखों की न जाए कभी रुखसार पे उनके, अगर करना है तो या ख़ुदा इतना ही करम करना रहे फक़त हक़ हमारा ही सदा दीदार पे उनके, छुपा कर हाल ए दिल हमसे वो कब तक जी लेंगे एक दिन उतर आएँगे फ़रिश्ते भी इज़हार पे उनके..!! - [इतना एहसान तो हम पर वो ख़ुदारा करते](https://bazmeshayari.com/itna-ehsan-to-ham-par-2/): इतना एहसान तो हम पर वो ख़ुदारा करते अपने हाथों से जिगर चाक हमारा करते, हमको तो दर्द ए जुदाई से ही मर जाना था चंद रोज़ और न क़ातिल को इशारा करते, ले के जाते न अगर साथ वो यादें अपनी याद करते उन्हें और वक़्त गुज़ारा करते, ज़िंदगी मिलती जो सौ बार हमें दुनिया में हम तो हर बात इसे आप पे वारा करते, ‘धुँदलाता न हरगिज़ ये मेरा शीशा ए दिल गर्द उस की वो अगर रोज़ उतारा करते..!! - [ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना](https://bazmeshayari.com/zindagi-di-hai-to/): ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़ ए सफ़र भी देना, गुफ़्तुगू तू ने सिखाई है कि मैं गूँगा था अब मैं बोलूँगा तो बातों में असर भी देना, मैं तो इस ख़ाना बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना, ज़ुल्म और सब्र का ये खेल मुकम्मल हो जाए उस को ख़ंजर जो दिया है मुझे सर भी देना..!! - [इस बहते हुए लहू में मुझे तो](https://bazmeshayari.com/is-bahte-hue-lahoo/): इस बहते हुए लहू में मुझे तो बस इन्सान नज़र आ रहा है लानत हो तुम पे तुम्हे ही हिन्दू मुसलमां नज़र आ रहा है, ऐसी नफ़रत और हैवानियत से सियासत ही बड़ी ख़ुश है वरना तो खलकत में हर कोई ही परेशां नज़र आ रहा है, ये जो बने है एक दूसरे की जाँ के दुश्मन जल्लाद नहीं है मुझे तो इस भीड़ में हर कोई ही बेगुनाह नज़र आ रहा है, शौक़ ए आतिशबाज़ी महज़ तुम्हारी तफरीह का सामां है वरना जिधर देखो जलता हुआ हिन्दोस्तां नज़र आ रहा है, - [किस सिम्त चल पड़ी है खुदाई मेरे ख़ुदा](https://bazmeshayari.com/kis-simt-chal-padi/): किस सिम्त चल पड़ी है खुदाई मेरे ख़ुदा नफ़रत ही अब दे रही है दिखाई मेरे ख़ुदा, अम्न ओ अमां से ख़ाली दुनिया क्यूँ हो गई ? तू ने तो न थी दुनिया ऐसी बनाई मेरे ख़ुदा, ज़ेहनो पे अब सवार बस फ़िक्र ए म’आश है मिल जाए काश ! भूख से रिहाई मेरे ख़ुदा, जिसका भी जितना भी यहाँ चलता है ज़ोर क़यामत है हर उस शख्स ने ढहाई मेरे ख़ुदा, बिन्त ए हव्वा की आहें जो दामन बचाते निकले तुझे भी तो देती होंगी वो आहें सुनाई मेरे ख़ुदा, फ़ितना ओ शर है क्यूँ कर इतना उरूज़ पर - [जिसने भी मुहब्बत का गीत गया है](https://bazmeshayari.com/jisne-bhi-muhabbat-ka/): जिसने भी मुहब्बत का गीत गया है ज़िन्दगी का लुत्फ़ उसने ही उठाया है, मौसम गर्मी का हो कि सर्दी का हो प्रेमियों ने तो सदा ही जश्न मनाया है, ज़िन्दगी के दौड़ में वही अव्वल आया है जिस किसी ने भी दमख़म दिखाया है, वो माने चाहे न माने है ये उसकी मर्ज़ी हमने तो सब कुछ ही उसी पे लुटाया है, कौन समझ पाया है मुहब्बत को ज़माने में प्रेमियों पे सदा ही ज़माने ने ज़ुल्म ढाया है, इन्सान सीख न पाया मिल जुल के रहना जबकि हर दौर में पीर पैगम्बर ने सिखाया है, - [दुनिया में यूँ भी हमने गुज़ारी है ज़िन्दगी](https://bazmeshayari.com/duniya-me-yun-bhi/): दुनिया में यूँ भी हमने गुज़ारी है ज़िन्दगी अपनी कहाँ है जैसे उधारी है ज़िन्दगी, आवाज़ मुझको ना दे ऐ गुज़रे वक़्त सुन मुश्किल से हमने अपनी सवारी है ज़िन्दगी, कोई ख़ुशी भी पहलू में ई नहीं कभी मेरी नज़र में अब भी कुँवारी है ज़िन्दगी, सोचो तो जी रहे है तुम्हारे ही वास्ते जब चाहो माँग लेना तुम्हारी है ज़िन्दगी, हर एक तन्हा छोड़ के कहता है अलविदा कितनी ये बदनसीब, बेचारी है ज़िन्दगी, कैसा ये बोझ दिल पे तेरे है ज़रा बता ऐ यार आज इतनी क्यूँ भारी है ज़िन्दगी..?? - [संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है](https://bazmeshayari.com/sansar-ki-har-shay/): संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है एक धुंध से आना है एक धुंध में जाना है, ये राह कहाँ से है ये राह कहाँ तक है ? ये राज़ कोई राही समझा है न जाना है, एक पल की पलक पर है ठहरी हुई ये दुनिया एक पल के झपकने तक हर खेल सुहाना है, क्या जाने कोई किस पर किस मोड़ पर क्या बीते इस राह में ऐ राही हर मोड़ बहाना है, हम लोग खिलौना हैं एक ऐसे खिलाड़ी का जिस को अभी सदियों तक ये खेल रचाना है..!! ~साहिर लुधियानवी - [मर चुका हूँ कई बार फिर भी कई..](https://bazmeshayari.com/mar-chuka-hoo-kai/): मर चुका हूँ कई बार फिर भी कई बार मरना है मरने से पहले ज़िन्दगी को रग रग में भरना है, अज़ब शर्त है समन्दर की कहता है किनारे पर पहुँचना है तो ज़ेर ए समन्दर कश्ती से उतरना है, ताउम्र गया रोज़ उनकी गली में मैं क़यामत है उनकी गली से अभी भी कई दफ़ा गुज़रना है, जहाँ हर रोज़ मैं जाता रहा हूँ यारो वहाँ भी पहुँचने के लिए अभी न जाने क्या क्या करना है, जिनको तालीम दी मैंने, तहज़ीब दे कर सुधारा वही कह रहे है तुम्हे अभी बहुत कुछ सुधरना है..!! - [घबराने से मसले हल नहीं होते](https://bazmeshayari.com/ghabrane-se-masle-hal/): घबराने से मसले हल नहीं होते जो आज है वो कल नहीं होते, याद रखना हमेशा इस बात को कीचड़ में सब कमल नहीं होते, फ़ायदा पहुँचाएँ जो ज़िस्मो को मीठे अक्सर वो फल नहीं होते, जुगत भी लगानी पड़ती है सदा रस्ते तो कभी सरल नहीं होते, दर्द की सर्द हवा से बनते है जो वो ठोस कभी तरल नहीं होते, नफ़रत की खाद से जो उगे पेड़ मीठे कभी उनके फल नहीं होते, जो आपको आपसे ज्यादा समझे ऐसे लोग दरअसल नहीं होते..!! - [बात इधर उधर तो बहुत घुमाई जा..](https://bazmeshayari.com/baat-idhar-udhar-to/): बात इधर उधर तो बहुत घुमाई जा सकती है पर सच्चाई भला कब तक छुपाई जा सकती है ? खून से बना कर माँ बच्चे को जो पिलाती है उस दूध की क़ीमत कैसे चुकाई जा सकती है ? सहरा की प्यास तो समन्दर बुझा सकता है पर समन्दर की प्यास कैसे बुझाई जा सकती है ? नहीं हल निकलता गर तोप और बंदूक से लड़ाई प्यार से भी तो सुलझाई जा सकती है, खींच दी है दिलो में गर दीवार मज़हब ने उससे कोई खिड़की भी तो बनाई जा सकती है, बेबस पे ज़ुल्म देख कर गर कुछ कर - [अब मुहब्बत का इरादा बदल जाना भी...](https://bazmeshayari.com/ab-muhabbat-ka-irada/): अब मुहब्बत का इरादा बदल जाना भी मुश्किल है उन्हें खोना भी मुश्किल,उन्हें पाना भी मुश्किल है, ज़रा सी बात पर आँखे भिगो कर बैठ जाते है वो उन्हें तो अपने दिल का हाल बताना भी मुश्किल है, यहाँ लोगो ने दिल ओ चेहरे पे इतने परदे डाल रखे है किसी के दिल में क्या है नज़र आना भी मुश्किल है, सोचता हूँ कभी ख़्वाबो में तो उनसे मुलाक़ात होगी पर यहाँ तो उनके बिना नींद आना भी मुश्किल है, गैरो से गिला क्या करे अब ख़ुद का ही आलम ये है हाल ए ज़िन्दगी ख़ुद का ख़ुद को समझाना - [रह के मक्कारों में मक्कार हुई है दुनिया](https://bazmeshayari.com/rah-ke-makkaro-me/): रह के मक्कारों में मक्कार हुई है दुनिया मेरे दुश्मन की तरफ़दार हुई है दुनिया, पाक दामन थी ये जब तक थी मेरे हुजरे में छोड़ के मुझको गुनहगार हुई है दुनिया, ऐन मुमकिन है के बदनाम मुझे भी कर दे मेरी शोहरत से जो बेज़ार हुई है दुनिया, तू नहीं था तो ये रौनक़ भी कहाँ थी पहले तेरे आने से ही गुलज़ार हुई है दुनिया, अपनी पलकों से झटकते हुए कुछ ख़्वाबों को ले के अंगड़ाइयाँ बेदार हुई है दुनिया, कुछ दिनों से ये ख़बर गूँज रही है ‘मोहसिन’ एक शाइ’र की तलबगार हुई है दुनिया..!! ~मोहसिन आफ़ताब - [ऐसा अपनापन भी क्या जो अज़नबी](https://bazmeshayari.com/aisa-apnapan-bhi-kya/): ऐसा अपनापन भी क्या जो अज़नबी महसूस हो साथ रह कर भी गर मुझे तेरी कमी महसूस हो, आग ख़ुद बस्ती में लगा कर बोलते हो यूँ जलो कि दूर से देखने वालों को तो रौशनी महसूस हो, भीड़ के लोगो सुनो, ये हुक्म है दरबार ए आम का गर भूख से भी गिरो तो ऐसे गिरो बंदगी महसूस हो, नाम था उसका बगावत इसी लिए उसे क़ातिलो ने क़त्ल भी ऐसे किया कि क़त्ल ख़ुदकुशी महसूस हो, शाख ए शज़र पे बैठे परिंदे कह रहे थे कानो में ये कैसी रिहाई है जिसमे हर घड़ी बेबसी महसूस हो ? - [गर्मी ए हसरत ए नाकाम से जल जाते हैं](https://bazmeshayari.com/garmi-e-hasrat-e-naqam/): गर्मी ए हसरत ए नाकाम से जल जाते हैं हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं, शम्अ’ जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं, बच निकलते हैं अगर आतिश ए सय्याल से हम शोला ए आरिज़ ए गुलफ़ाम से जल जाते हैं, ख़ुदनुमाई तो नहीं शेवा ए अरबाब ए वफ़ा जिनको जलना हो वो आराम से जल जाते हैं, रब्त ए बाहम पे हमें क्या न कहेंगे दुश्मन आश्ना जब तेरे पैग़ाम से जल जाते हैं, जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ जाने क्यूँ - [गरेबाँ दर गरेबाँ नुक्ता आराई भी होती है](https://bazmeshayari.com/gareban-dar-gareban-nuqta/): गरेबाँ दर गरेबाँ नुक्ता आराई भी होती है बहार आए तो दीवानों की रुस्वाई भी होती है, हम उन की बज़्म तक जा ही पहुँचते हैं किसी सूरत अगरचे राह में दीवार ए तन्हाई भी होती है, बिखरती है वही अक्सर ख़िज़ाँ-परवर बहारों में चमन में जो कली पहले से मुरझाई भी होती है, बनाम ए कुफ्र ओ ईमाँ बेमुरव्वत हैं जहाँ दोनों वहाँ शैख़ ओ बरहमन की शनासाई भी होती है, चमकती है कोई बिजली तो शम ए रहगुज़र बन कर निगाह ए बरहम इन की कुछ तो शर्माई भी होती है, ‘क़तील’ उस दम भी रहता है यही - [इस नहीं का कोई इलाज नहीं](https://bazmeshayari.com/is-nahi-ka-koi/): इस नहीं का कोई इलाज नहीं रोज़ कहते हैं आप आज नहीं, कल जो था आज वो मिज़ाज नहीं इस तलव्वुन का कुछ इलाज नहीं, आइना देखते ही इतराए फिर ये क्या है अगर मिज़ाज नहीं, ले के दिल रख लो काम आएगा गो अभी तुम को एहतियाज नहीं, हो सकें हम मिज़ाज दाँ क्यूँकर हमको मिलता तेरा मिज़ाज नहीं, चुप लगी लाल ए जाँ फ़ज़ा को तेरे इस मसीहा का कुछ इलाज नहीं, दिल ए बेमुद्दआ ख़ुदा ने दिया अब किसी शय की एहतियाज नहीं, खोटे दामों में ये भी क्या ठहरा ? दिरहम ए दाग़’ का रिवाज नहीं, - [जो दिख रहा है उसी के अंदर जो...](https://bazmeshayari.com/jo-dikh-raha-hai/): जो दिख रहा है उसी के अंदर जो अनदिखा है वो शायरी है, जो कह सका था वो कह चुका हूँ जो रह गया है वो शायरी है, ये शहर सारा तो रौशनी में खिला पड़ा है सो क्या लिखूँ मैं ? वो दूर जंगल की झोंपड़ी में जो एक दिया है वो शायरी है, दिलों के माबैन गुफ़्तुगू में तमाम बातें इज़ाफ़तें हैं, तुम्हारी बातों का हर तवक़्क़ुफ़ जो बोलता है वो शायरी है, तमाम दरिया जो एक समुंदर में गिर रहे हैं तो क्या अजब है, वो एक दरिया जो रास्ते में ही रह गया है वो शायरी - [बूढ़ा टपरा टूटा छपरा और उस पर बरसातें सच](https://bazmeshayari.com/boodha-tapara-tuta-chhapra/): बूढ़ा टपरा, टूटा छपरा और उस पर बरसातें सच उसने कैसे काटी होगी, लंबी लंबी राते सच ? अल्फाज़ की दुनियादारी में आँखों की सच्चाई क्या ? मेरे सच्चे मोती झूठे, उसकी झूठी बातें सच, कच्चे रिश्ते, बासी चाहत, और अधूरा अपनापन मेरे हिस्से में आई है ऐसी भी सौगाते सच, जाने क्यूँ मेरी नींदों के हाथ नहीं पीले होते पलकों से लौटी है कितने सपनो की बरातें सच, धोखा ख़ूब दिया है ख़ुद को झूठे मूठे किस्सों से याद मगर जब करने बैठे याद आई है बातें सच..!! ~आलोक श्रीवास्तव - [गँवाई किस की तमन्ना में ज़िन्दगी मैं ने](https://bazmeshayari.com/ganvai-kis-ki-tamanna/): गँवाई किस की तमन्ना में ज़िन्दगी मैं ने वो कौन है जिसे देखा नहीं कभी मैं ने, तेरा ख्याल तो है पर तेरा वज़ूद नहीं तेरे लिए तो ये महफ़िल सजाई थी मैं ने, तेरे अदम को गँवारा न था वज़ूद मेरा सो अपनी बीख कनी में कमी न की मैं ने, हैं मेरे ज़ात से मंसूब सद फ़साना ए इश्क़ और एक सतर भी अब तक नहीं लिखी मै ने, ख़ुद अपने इशवा ओ अंदाज़ का शहीद हूँ मैं ख़ुद अपनी ज़ात से बरती है बेरुखी मैं ने, ख़राश नगमा से सीना छिला हुआ है मेरा फुगाँ कि तर्क - [अज़ाब ए हिज़्र बढ़ा लूँ अगर इजाज़त हो](https://bazmeshayari.com/azab-e-hizr-badha/): अज़ाब ए हिज़्र बढ़ा लूँ अगर इजाज़त हो एक और ज़ख्म खा लूँ अगर इजाज़त हो, तुम्हारे आरिज़ ओ लब की जुदाई के दिन है मैं जाम मुँह से लगा लूँ अगर इजाज़त हो, तुम्हारा हुस्न तुम्हारे ख्याल का चेहरा शबाहतों में छुपा लूँ अगर इजाज़त हो, तुम्ही से है मेरे हर ख़्वाब ए शौक़ का रिश्ता एक और ख़्वाब कमा लूँ अगर इजाज़त हो, थका दिया है तुम्हारे फ़िराक ने मुझको कहीं मैं ख़ुद को गिरा लूँ अगर इजाज़त हो, बराए नाम बनाम ए शब ए विसाल यहाँ शब ए फ़िराक मना लूँ अगर इजाज़त हो..!! ~जौन एलिया - [पानी के उतरने में अभी वक़्त लगेगा](https://bazmeshayari.com/paani-ke-utarne-me/): पानी के उतरने में अभी वक़्त लगेगा हालात सँवरने में अभी वक़्त लगेगा, मच्छर से, कोरोना से अभी लोग मरेंगे इफ़्लास से मरने में अभी वक़्त लगेगा, जो लोग आकाओं से डरते है अभी तक अल्लाह से डरने में उन्हें वक़्त लगेगा, शायद नहीं बदलेगा यहाँ तर्ज़ ए हुकुमत शायद कि सुधरने में अभी वक़्त लगेगा, ऐ अहल ए वतन तुम कभी मायूस न होना पुर ज़ख्मो को भरने में अभी वक़्त लगेगा, मुफ़लिस ओ शरीफ़ यूँ ही मरते रहेंगे बदकारो को मरने में अभी वक़्त लगेगा..!! ~नवाब ए हिन्द - [फ़सुर्दगी का मुदावा करें तो कैसे करें](https://bazmeshayari.com/farsudgi-ka-mudawa-kare/): फ़सुर्दगी का मुदावा करें तो कैसे करें वो लोग जो तेरे क़ुर्ब ए जमाल से भी डरें, एक ऐसी राह पे डाला है तेरे ग़म ने कि हम किसी भी शक्ल को देखें तो रुक के आह भरें, ये क्या कि बेसबब आए क़ज़ा जवानी में ये क्यूँ न हो कि तुम्हारी किसी अदा पे मरें ? शब ए अलम के भी होते हैं कुछ न कुछ आदाब तड़पने वाले सहर तक तो इंतिज़ार करें, उस एक बात के बा’द अब हज़ार बात करो ये दिल के ज़ख़्म हैं यारो भरें भरें न भरें ! सुबूत ए इश्क़ की ये - [एक जाम खनकता जाम कि साक़ी...](https://bazmeshayari.com/ek-zaam-khanakta-zaam/): एक जाम खनकता जाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है एक होश रुबा इनआ’म कि साक़ी रात गुज़रने वाली है, वो देख सितारों के मोती हर आन बिखरते जाते हैं अफ़्लाक पे है कोहराम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है, गो देख चुका हूँ पहले भी नज़ारा दरिया नोशी का एक और सला ए आम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है, ये वक़्त नहीं है बातों का पलकों के साए काम में ला इल्हाम कोई इल्हाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है, मदहोशी में एहसास के ऊँचे ज़ीने से गिर जाने दे इस वक़्त न मुझ को थाम कि साक़ी - [दूर तक छाए थे बादल और कहीं..](https://bazmeshayari.com/door-tak-chhaye-the/): दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था, सुर्ख़ आहन पर टपकती बूँद है अब हर ख़ुशी ज़िंदगी ने यूँ तो पहले हम को तरसाया न था, क्या मिला आख़िर तुझे सायों के पीछे भाग कर ऐ दिल ए नादाँ तुझे क्या हम ने समझाया न था ? उफ़ ये सन्नाटा कि आहट तक न हो जिसमें मुख़िल ज़िंदगी में इस क़दर हम ने सुकूँ पाया न था, ख़ूब रोए छुप के घर की चार दीवारी में हम हाल ए दिल कहने के क़ाबिल कोई हमसाया न था, हो - [जो हम पे गुज़रे थे रंज़ सारे, जो ख़ुद पे...](https://bazmeshayari.com/jo-ham-pe-guzre/): जो हम पे गुज़रे थे रंज़ सारे, जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे जब अपनी अपनी मुहब्बतों के अज़ाब झेले तो लोग समझे, वो जिन दरख्तों की छाँव में से मुसाफिरों को उठा दिया था उन्ही दरख्तों पे अगले मौसम जो फल न उतरे तो लोग समझे, उस एक कच्ची सी उम्र वाली के फ़लसफ़े को कोई न समझा जब उस के कमरे से लाश निकली, ख़ुतूत निकले तो लोग समझे, वो ख़्वाब थे ही चम्बेलियों से सो सब ने हाकिम की कर ली बैअत फिर एक चम्बेली की ओट में से जो साँप निकले तो लोग समझे, वो - [नसीम ए सुबह गुलशन में गुलो से खेलती होगी](https://bazmeshayari.com/nasim-e-subah-gulshan/): नसीम ए सुबह गुलशन में गुलो से खेलती होगी किसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी, तुम्हे दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुज़रिम हूँ नज़र आख़िर नज़र है बे इरादा उठ गई होगी, मज़ा आ जाएगा महशर में कुछ सुनने सुनाने का ज़ुबां होगी हमारी और कहानी आप की होगी, सर ए महफ़िल बता दूँगा सर ए महशर दिखा दूँगा हमारे साथ तुम होगे ये दुनियाँ देखती होगी, यही आलम रहा पर्दानशीनो का तो ज़ाहिर है ख़ुदाई आप से होगी न बंदगी हम से होगी..!! ~सीमाब अकबराबादी - [किस एहतियात से उसने नज़र बचाई है](https://bazmeshayari.com/kis-ehtiyat-se-usne/): किस एहतियात से उसने नज़र बचाई है ज़माना अब भी समझता है आशनाई है, मेरे अज़ीज़ है इसका इलाज़ ना मुमकिन यह चोट वो है जो अपनों से मैंने खाई है, ये दिन भी देख लिया आपकी मुहब्बत में हमारी ही चीज अब हमारी नहीं पराई है, ख़ामोशी का मतलब है ख़ुदकशी करना और एक लफ्ज़ भी बोलो तो बे वफ़ाई है, ये चंद अश’आर जो लोगो को याद है तेरे ऐ मेरे दोस्त ! फक़त यही तो तेरी कमाई है..!! ~हसीब सोज़ - [उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर](https://bazmeshayari.com/umr-bhar-chalte-rahe/): उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर परवरिश पाई है अपने ख़ून ही की धार पर, चाहने वाले की एक ग़लती से बरहम हो गया फ़ख़्र था कितना उसे ख़ुद प्यार के मेआ’र पर, रात गहरी मेरी तन्हाई का सागर और फिर तेरी यादों के सुलगते दीप हर मंझधार पर, शाम आई और सब शाख़ों की गलियाँ सो गईं मौत का साया सा मंडलाने लगा अश्जार पर, ख़ल्वत ए शब में ये अक्सर सोचता क्यूँ हूँ कि चाँद नूर का बोसा है गोया रात के रुख़्सार पर, साल ए नौ आता है तो महफ़ूज़ कर लेता हूँ मैं - [जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी](https://bazmeshayari.com/jis-taraf-chahoon-pahunch/): जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी मैं तो आवाज़ हूँ आवाज़ की हिजरत कैसी ? सुनने वालों की समाअत गई गोयाई भी क़िस्सा गो तूने सुनाई थी हिकायत कैसी ? हम जुनूँ वाले हैं हम से कभी पूछो प्यारे दश्त कहते हैं किसे दश्त की वहशत कैसी ? आप के ख़ौफ़ से कुछ हाथ बढ़े हैं लेकिन दस्त ए मजबूर की सहमी हुई बैअत कैसी ? फिर नए साल की सरहद पे खड़े हैं हम लोग राख हो जाएगा ये साल भी हैरत कैसी ? और कुछ ज़ख़्म मेरे दिल के हवाले मेरी जाँ ये मोहब्बत है मोहब्बत में - [किए वादों का निभाना बाक़ी है](https://bazmeshayari.com/kiye-waado-ka-nibhana/): किए वादों का निभाना बाक़ी है और अभी उनको मनाना बाक़ी है, मुझे अपना भी समझना बाक़ी है और उनका भी संभलना बाक़ी है, ये तो सबको है पता हम उनके है ये बात बस उनको बताना बाक़ी है, हमने तो सोच समझ कर वोट दिया अब बस उनका चोट लगाना बाक़ी है, न जान सके सेवक है या शासक है ? हम सबको ये बात समझना बाक़ी है, उनकी ज़ुल्फो में उलझ कर देख लिया अब उनके दिल में उलझना बाक़ी है, फूल जो तुमने चाहे वो खिल तो गए पर लबो पे मुस्कान का खिलना बाक़ी है, करने - [बात करते है ख़ुशी की भी तो रंज़ के साथ](https://bazmeshayari.com/baat-karte-hai-khushi-ki/): बात करते है ख़ुशी की भी तो रंज़ के साथ वो हँसाते भी है ऐसा कि रुला देते है, मैंने माँगा जो कभी दूर से दिल डर डर कर उसने धमका के कहा पास तो आ देते है, आ के बाज़ार ए मुहब्बत में ज़रा सैर करो लोग क्या करते है, क्या लेते है, क्या देते है ? इसको कहते है यही बाद हवाई है जवाब ख़त के पुर्ज़े मेरी ज़ानिब वो उड़ा देते है, फूल से गाल अबस रखते हो तुम ज़ेर ए नक़ाब ताज़गी के लिए फूलों को हवा देते है..!! - [कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को](https://bazmeshayari.com/kabhi-kaha-na-kisi/): कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को न जाने कैसे ख़बर हो गई ज़माने को, दुआ बहार की मांगी तो इतने फूल खिले कहीं जगह न रही मेरे आशियाने को, मेरी लहद पे पतंगों का ख़ून होता है हुज़ूर शमाँ न लाया करें जलाने को, सुना है ग़ैर की महफ़िल में तुम न जाओगे कहो तो आज सजा लूं ग़रीब ख़ाने को, दबा के क़ब्र में सब चल दिए दुआ न सलाम ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को ? अब आगे इसमें तुम्हारा भी नाम आएगा जो हुक्म हो तो यहीं छोड़ दूं फ़साने को ? - [साथ चलते आ रहे हैं पास आ सकते नहीं](https://bazmeshayari.com/saath-chalte-aa-rahe/): साथ चलते आ रहे हैं पास आ सकते नहीं एक नदी के दो किनारों को मिला सकते नहीं, देने वाले ने दिया सब कुछ अजब अंदाज से सामने दुनिया पड़ी है और उठा सकते नहीं, उसकी भी मजबूरियाँ हैं, मेरी भी मजबूरियाँ हैं रोज मिलते हैं मगर घर में बता सकते नहीं, आदमी क्या है गुजरते वक्त की तस्वीर है जाने वाले को सदा देकर बुला सकते नहीं, किस ने किस का नाम ईंट पे लिखा है खून से इश्तिहारों से ये दीवारें छुपा सकते नहीं, उसकी यादों से महकने लगता है सारा बदन प्यार की खुशबू को सीने में - [हुस्न ए मह गरचे बहंगाम ए कमाल अच्छा है](https://bazmeshayari.com/husn-e-mah-garche/): हुस्न ए मह गरचे बहंगाम ए कमाल अच्छा है उससे मेरा मह ए ख़ुर्शीद जमाल अच्छा है, बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है, और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया साग़र ए जम से मेरा जाम ए सिफ़ाल अच्छा है, बेतलब दें तो मज़ा उसमें सिवा मिलता है वो गदा जिसको न हो ख़ू ए सवाल अच्छा है, उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है, देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या - [जुज़ तेरे कोई भी दिन रात न जाने मेरे](https://bazmeshayari.com/juz-tere-koi-bhi/): जुज़ तेरे कोई भी दिन रात न जाने मेरे तू कहाँ है मगर ऐ दोस्त पुराने मेरे ? तू भी ख़ुशबू है मगर मेरा तजस्सुस बेकार बर्ग ए आवारा की मानिंद ठिकाने मेरे, शम्अ की लौ थी कि वो तू था मगर हिज्र की रात देर तक रोता रहा कोई सिरहाने मेरे, ख़ल्क़ की बेख़बरी है कि मेरी रुस्वाई लोग मुझ को ही सुनाते हैं फ़साने मेरे, लुट के भी ख़ुश हूँ कि अश्कों से भरा है दामन देख ग़ारत गर ए दिल ये भी ख़ज़ाने मेरे, आज एक और बरस बीत गया उसके बग़ैर जिस के होते हुए होते - [यकुम जनवरी है नया साल है](https://bazmeshayari.com/yakum-janwari-hai-naya/): यकुम जनवरी है नया साल है दिसम्बर में पूछूँगा क्या हाल है, बचाए ख़ुदा शर की ज़द से उसे बेचारा बहुत नेक आमाल है, बताने लगा रात बूढ़ा फ़क़ीर ये दुनिया हमेशा से कंगाल है, है दरिया में कच्चा घड़ा सोहनी किनारे पे गुमसुम महिवाल है, मैं रहता हूँ हर शाम शिकवा ब लब मेरे पास दीवान ए ‘इक़बाल’ है..!! ~अमीर क़ज़लबाश - [ज़िन्दगी की कशमकश से परेशान बहुत है](https://bazmeshayari.com/zindagi-ki-kashmaksh-se/): ज़िन्दगी की कशमकश से परेशान बहुत है दिल को न उलझाओ ये नादान बहुत है, यूँ सामने आ जाने पर कतरा के गुज़रना वादे से मुकर जाना उसे आसान बहुत है, यादें भी है, तल्खी भी है, और है मुहब्बत तू ने जो दिया दर्द का सामान बहुत है, अश्क कभी, लहू कभी, आँख से बरसे बेदाग़ मुहब्बत का ये अंज़ाम बहुत है, तूने तो सुना होगा मेरे दिल का धड़कना छू कर भी देख लेना ये बेज़ुबान बहुत है, बहुत तड़प लिए अब तुमसे बिछड़ कर पा जाएँ खोने वाले को अरमान बहुत है..!! - [गिले फ़ुज़ूल थे अहद ए वफ़ा के होते हुए](https://bazmeshayari.com/gile-fuzul-the-ahad/): गिले फ़ुज़ूल थे अहद ए वफ़ा के होते हुए सो चुप रहा सितम ए नारवां के होते हुए, ये क़ुर्बतों में अजब फ़ासले पड़े कि मुझे है आशना की तलब आशना के होते हुए, वो हिलागर हैं जो मजबूरियाँ शुमार करें चिराग़ हम ने जलायें हवा के होते हुये, न कर किसी पे भरोसा के कश्तियाँ डूबीं हैं ख़ुदा के होते हुये नाख़ुदा के होते हुये, किसे ख़बर है कि कासा ब दस्त फिरते हैं बहुत से लोग सरों पर हुमा के होते हुए, “फ़राज़” ऐसे भी लम्हें कभी कभी आये कि दिल गिरिफ़्ता रहा दिलरुबा के होते हुए..!! ~अहमद - [किसी दरबार की आमीन भरी खल्वत में](https://bazmeshayari.com/kisi-darbar-ki-aamin/): किसी दरबार की आमीन भरी खल्वत में ऐन मुमकिन है तुम्हे मेरा पता मिल जाए, ये भी हो सकता है मैं तुमको मिलूँ या न मिलूँ लेकिन इस खोज़ में ख़ुद तुमको ख़ुदा मिल जाए, सख्त बुझदिल है कि जो इश्क़ में थक जाते है मैं तो हाँ ! तुमसे बिछड़ कर भी तुम्हारा रहूँगा, कहीं साँसे भी बन जाऊँगा घुटते हुए सीनों की कही तड़पते हुए दिलो के लिए सहारा रहूँगा..!! क्या कलीमी से भला इश्क़ कलामी कम है ? बादशाही न सही ! दिल की गुलामी कम है ? क्या कम है कि तुम्हे देखूँ, दिखे पूरी दुनियाँ - [महफ़िले ख़्वाब हुई रह गए तन्हा चेहरे](https://bazmeshayari.com/mahfile-khwab-hui-rah/): महफ़िले ख़्वाब हुई रह गए तन्हा चेहरे वक़्त ने छीन लिए कितने शनासा चेहरे, सारी दुनियाँ के लिए एक तमाशा चेहरे दिल तो पर्दे में रहे हो गए रुस्वा चेहरे, तुम वो बेदर्द कि मुड़ कर भी न देखा उनको वरना करते रहे क्या क्या न तकाज़ा चेहरे, कितने हाथों ने तराशे ये हसीं ताज़ महल झाँकते है दर ओ दीवार से क्या क्या चेहरे, सोए पत्तो की तरह जागती कलियों की तरह खाक़ में गुम तो कभी खाक़ से पैदा चेहरे, ख़ुद ही वीरानी ए दिल ख़ुद ही चराग ए महफ़िल कभी महरूम ए तमन्ना कभी शैदा चेहरे, खाक़ - [दिल से उतर जाने में एक लम्हा लगता है](https://bazmeshayari.com/dil-se-utar-jane-me/): दिल से उतर जाने में एक लम्हा लगता है दिल के बदल जाने में एक लम्हा लगता है, देखना ख्याल रहे क़ायम अपना हाल रहे यूँ कि पिघल जाने में एक लम्हा लगता है, यूँ कभी तो सदियाँ भी कम लगें और कभी ख़ुद को आज़माने में एक लम्हा लगता है, सोचते रहें तो फिर वक़्त ठहर जाता है वरना गुज़र जाने में एक लम्हा लगता है, बहुत देख भाल के चलना पड़ता है यहाँ नहीं तो फ़िसल जाने में एक लम्हा लगता है..!! - [दर्द कई होते है दिल में छुपाने के लिए](https://bazmeshayari.com/dard-kai-hote-hai/): दर्द कई होते है दिल में छुपाने के लिए सब के सब आँसू नहीं होते दिखाने के लिए, उम्र तन्हा काट दी वादा निभाने के लिए अहद बाँधा था किसी ने आज़माने के लिए, कुछ दीये दीवार पर रखे हैं वक़्त ए इंतज़ार कुछ दीये लाया हूँ पलकों पे सज़ाने के लिए, लोग ज़ेर ए खाक़ भी तो डूब ही जाते है एक समन्दर ही नहीं है डूब जाने के लिए, वो बज़ाहिर मिला तो था एक लम्हे को मगर उम्र सारी चाहिए उसको भुलाने के लिए, कोई गम हो, कोई दुःख हो या कि दर्द हो मुस्कुराना पड़ ही - [ऐ यक़ीनों के ख़ुदा शहर ए गुमाँ...](https://bazmeshayari.com/ae-yaqino-ke-khuda-shahar/): ऐ यक़ीनों के ख़ुदा शहर ए गुमाँ किस का है नूर तेरा है चराग़ों में धुआँ किस का है ? क्या ये मौसम तेरे क़ानून के पाबंद नहीं मौसम ए गुल में ये दस्तूर ए ख़िज़ाँ किस का है ? राख के शहर में एक एक से मैं पूछता हूँ ये जो महफ़ूज़ है अब तक ये मकाँ किस का है ? मेरे माथे पे तो ये दाग़ नहीं था पहले आज आईने में उभरा जो निशाँ किस का है ? वही तपता हुआ सहरा वही सूखे हुए होंठ फ़ैसला कौन करे आब ए रवाँ किस का है ? चंद - [उस गुल को भेजना है मुझे ख़त...](https://bazmeshayari.com/us-gul-ko-bhejna-hai/): उस गुल को भेजना है मुझे ख़त सबा के हाथ इस वास्ते लगा हूँ चमन की हवा के हाथ, बर्ग ए हिना ऊपर लिखो अहवाल ए दिल मेरा शायद कि जा लगे वो किसी मीरज़ा के हाथ, आज़ाद हो रहा हूँ दो आलम की क़ैद से मीना लगा है जब से कि कुछ बेनवा के हाथ, मरता हूँ मीरज़ाइ ए गुल देख हर सहर सूरज के हाथ चुनरी तो पंखा सबा के हाथ, ‘मज़हर’ छुपा के रख दिल ए नाज़ुक को अपने तू ये शीशा बेचना है किसी मीरज़ा के हाथ..!! ~मज़हर मिर्ज़ा जान ए जानाँ - [मैंने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा है](https://bazmeshayari.com/maine-muddat-se-koi-khwab/): मैंने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा है रात खिलने का गुलाबों से महक आने का, ओस की बूंदों में सूरज के समा जाने का चाँद सी मिट्टी के ज़र्रों से सदा आने का, शहर से दूर किसी गाँव में रह जाने का खेत खलियानों में बाग़ों में कहीं गाने का, सुबह घर छोड़ने का देर से घर आने का बहते झरनों की खनकती हुई आवाज़ों का, चहचहाती हुई चिड़ियों से लदी शाख़ों का नर्गिसी आँखों में हँसती हुई नादानी का, मुस्कुराते हुए चेहरे की ग़ज़ल ख़्वानी का तेरा हो जाने तेरे प्यार में खो जाने का, तेरा कहलाने का - [हाए लोगों की करम फ़रमाइयाँ...](https://bazmeshayari.com/haay-logo-ki-karam/): हाए लोगों की करम फ़रमाइयाँ तोहमतें बदनामियाँ रुस्वाइयाँ, ज़िंदगी शायद इसी का नाम है दूरियाँ, मजबूरियाँ, तन्हाइयाँ, क्या ज़माने में यूँ ही कटती है रात करवटें, बेताबियाँ, अंगड़ाइयाँ, क्या यही होती है शाम ए इंतिज़ार आहटें, घबराहटें, परछाइयाँ, एक रिंद ए मस्त की ठोकर में हैं शाहियाँ, सुल्तानियाँ, दाराइयाँ, एक पैकर में सिमट कर रह गईं ख़ूबियाँ, ज़ेबाइयाँ, रानाइयाँ, रह गईं एक तिफ़्ल ए मकतब के हुज़ूर हिकमतें, आगाहियाँ, दानाइयाँ, ज़ख़्म दिल के फिर हरे करने लगीं बदलियाँ, बरखा, रुतें, पुरवाइयाँ, दीदा ओ दानिस्ता उन के सामने लग़्ज़िशें, नाकामियाँ, पसपाइयाँ, मेरे दिल की धड़कनों में ढल गईं चूड़ियाँ, मौसीक़ियाँ, शहनाइयाँ, - [फूल,खुशबू, कली की बात करें](https://bazmeshayari.com/fool-khushboo-kali-ki-baat/): फूल,खुशबू, कली की बात करें प्यार की, आशिकी की बात करें मौत का खौफ़ भूल कर यारो क्यूँ न हम ज़िन्दगी की बात करें दुश्मनी से हुआ न कुछ हासिल अब चलो दोस्ती की बात करें ज़िन्दगी इसको तो नही कहते हर समय बेबसी की बात करें मंजिलें किस तरह मिलें यारो रात-दिन हम उसी की बात करें चाहते हो सुकूँ मिले गर तो ग़ुम हुई उस ख़ुशी की बात करें चाहता है सुखनवर यही या रब सब मेरी शायरी की बात करें..!! - [क्या ज़माना था कि हम रोज़ मिला करते थे](https://bazmeshayari.com/kya-zamana-tha-ki-ham/): क्या ज़माना था कि हम रोज़ मिला करते थे रात भर चाँद के हमराह फिरा करते थे, जहाँ तन्हाइयाँ सर फोड़ के सो जाती हैं इन मकानों में अजब लोग रहा करते थे, कर दिया आज ज़माने ने उन्हें भी मजबूर कभी ये लोग मेरे दुख की दवा करते थे, देख कर जो हमें चुप चाप गुज़र जाता है कभी उस शख़्स को हम प्यार किया करते थे, इत्तिफ़ाक़ात ए ज़माना भी अजब हैं नासिर आज वो देख रहे हैं जो सुना करते थे..!! - [जब से तेरी हर बात में रहने लगे](https://bazmeshayari.com/jab-se-teri-har-baat-me/): जब से तेरी हर बात में रहने लगे दुश्मन मेरे औक़ात में रहने लगे, ये बात भी उनको गँवारा कैसे हो ? हम जो तेरे दिन रात में रहने लगे, अब है ख़ुदा हाफिज़ तेरे इस इश्क़ का आशिक़ भी अब जज़्बात में रहने लगे, कोई क़यामत सी उठी है शहर में कुछ लोग अब सदमात में रहने लगे, मशहूर थे कल तक सखी के नाम से अब जाने क्यूँ खैरात में रहने लगे..!! - [कहानी दर्द ओ गम की ज़िन्दगी से...](https://bazmeshayari.com/kahani-dard-o-gam-ki/): कहानी दर्द ओ गम की ज़िन्दगी से क्या कहता ? सबब ए रंज़ ओ गम जो है उसी से क्या कहता ? गिला तो मुझ को भी करना था प्यास का लेकिन जो ख़ुद ही सूख गई उस नदी से क्या कहता ? जब मेरे अपने ही मुझ को समझ न पाए कभी तो मैं अपना हाल किसी अज़नबी से क्या कहता ? शब ए हिज़्र के अंधेरो ने मुझ को बहुत सताया है भला बात शब ए वस्ल की चाँदनी से क्या कहता ? तमाम शहर में फ़रेब और झूठ का राज था शायद मैं अपने गम की हकीक़त - [दिल की बस्ती पे किसी दर्द का साया...](https://bazmeshayari.com/dil-ki-basti-pe-kisi-dard-ka/): दिल की बस्ती पे किसी दर्द का साया भी नहीं ऐसा वीरानी का मौसम कभी आया भी नहीं, हम किसी और ही आलम में रहा करते हैं अहल ए दुनिया ने जहाँ आके सताया भी नहीं, हम पे इस आलम ए ताज़ा में गुज़रती क्या है तुम ने पूछा भी नहीं हम ने बताया भी नहीं, कब से हूँ ग़र्क़ किसी झील की गहराई में राज़ ए अय्याम मगर अक़्ल ने पाया भी नहीं, बेज़मीनी का ये दुख और ज़मीं भी अपनी बेबसी ऐसी कि नुक्ता ये उठाया भी नहीं, बेजिहत उठते हुए ठोकरें खाते ये क़दम रहबर मेरा मुझे - [फ़िराक़ ओ वस्ल से हट कर कोई रिश्ता...](https://bazmeshayari.com/firaq-o-vasl-se-hat-kar/): फ़िराक़ ओ वस्ल से हट कर कोई रिश्ता हमारा हो बग़ैर उस के भी शायद ज़िंदगी हमको गवारा हो, निकल आए जो हम घर से तो सौ रस्ते निकल आए अबस था सोचना घर में कोई ग़ैबी इशारा हो, न इस ढब की भी ज़ुल्मत हो कि सब मिल कर दुआ माँगें कोई जुगनू ही आ निकले न गर कोई सितारा हो, ज़ियाँ की ज़द पे दुनिया में कई लोग और भी होंगे तो फिर ऐ नामुरादी तू मेरे ग़म का सहारा हो, तक़ाबुल कसरत ओ क़िल्लत का कुछ मअनी नहीं रखता अंधेरा चीर कर निकले अगरचे एक शरारा हो, - [किया इश्क था जो बाइसे रुसवाई बन गया](https://bazmeshayari.com/kiya-ishq-tha-jo-baaise/): किया इश्क था जो बाइसे रुसवाई बन गया यारो तमाम शहर तमाशाई बन गया, बिन माँगे मिल गए मेरी आँखों को रतजगे मैं जब से एक चाँद का शैदाई बन गया, देखा जो उसका दस्त ए हिनाई करीब से अहसास गूँजती हुई शहनाई बन गया, बरहम हुआ था मेरी किसी बात पर कोई वो हादसा ही वजह ए शानासाई बन गया, करता रहा जो रोज़ मुझे उस से बदगुमाँ वो शख्स भी अब उसका तमन्नाई बन गया, वो तेरी भी तो पहली मुहब्बत न थी क़तील फिर क्या हुआ अगर कोई हरजाई बन गया..!! ~क़तील शिफ़ाई - [तजुर्बे के दम पर दीवानों ने कहा था...](https://bazmeshayari.com/tazrube-ke-dam-par-deewano/): तजुर्बे के दम पर दीवानों ने कहा था इश्क़ बुरा है मगर जुनूँ ए इश्क़ में ये बात मुझे समझ आई नहीं, उसके बेरुखी के सबब हो गई तन्हाइयों से दोस्ती बाद बज़्म ए जानाँ हमने कोई महफ़िल सजाई नहीं, दुनियाँ की नज़र में हमारा हो कर भी जो हमारा नहीं उस ला हासिल तमन्ना को खोने में कोई बुराई नहीं, एक एक कर के राख हो गई उसकी याद ए रफ़्तगाँ फक़त एक उसकी तस्वीर हमने बटुए से हटाई नहीं..!! ~नवाब ए हिन्द - [बस एक बार किसी ने गले लगाया था](https://bazmeshayari.com/bas-ek-baar-kisi-ne-gale/): बस एक बार किसी ने गले लगाया था फिर उस के बाद न मैं था न मेरा साया था, गली में लोग भी थे मेरे उसके दुश्मन लोग वो सब पे हँसता हुआ मेरे दिल में आया था, उस एक दश्त में सौ शहर हो गए आबाद जहाँ किसी ने कभी कारवाँ लुटाया था, वो मुझसे अपना पता पूछने को आ निकले कि जिनसे मैंने ख़ुद अपना सुराग़ पाया था, मेरे वजूद से गुलज़ार हो के निकली है वो आग जिस ने तेरा पैरहन जलाया था, मुझी को ताना ए ग़ारत गरी न दे प्यारे ये नक़्श मैंने तेरे हाथ - [किस सिम्त चल पड़ी है खुदाई ऐ मेरे ख़ुदा](https://bazmeshayari.com/kis-simt-chal-padhi-hai/): किस सिम्त चल पड़ी है खुदाई ऐ मेरे ख़ुदा नफ़रत ही दे रही है दिखाई ऐ मेरे ख़ुदा, अम्न ओ आमाँ से ख़ाली दुनियाँ क्यूँ हो गई ? तू ने तो न थी ऐसी बनाई ऐ मेरे ख़ुदा, ज़हनो पे अब सवार बस फ़िक्र ए मआश है मिल जाए काश भूक से रिहाई ऐ मेरे ख़ुदा, जिसका भी जितना भी यहाँ चलता है ज़ोर उन सब ने क़यामत ही है बरपाई ऐ मेरे ख़ुदा, बिन्त ए हव्वा की आहें जो दामन बचाते निकलें तुझे भी तो देती ही होंगी सुनाई ऐ मेरे ख़ुदा, फ़ितना ओ शर है क्यूँ कर इतना - [कर्ब ए फ़ुर्क़त रूह से जाता नहीं...](https://bazmeshayari.com/karb-e-furqat-rooh/): कर्ब ए फ़ुर्क़त रूह से जाता नहीं हल कोई ग़म का नज़र आता नहीं, काश होता इल्म ये इंसान को जो गुज़र जाता है पल आता नहीं, मिट गया शिकवे से लुत्फ़ ए इंतिज़ार अब हमें वो राह दिखलाता नहीं, हम वफ़ाएँ कर के भी हैं शर्मसार वो जफ़ाएँ कर के शरमाता नहीं, दर्द वो इनआ’म है ‘साहिल’ कि जो हर किसी इंसाँ को रास आता नहीं..!! ~अब्दुल हफ़ीज़ साहिल क़ादरी - [एहसास ए इश्क़ दिल की पनाहों में...](https://bazmeshayari.com/ehsas-e-ishq-dil-ki/): एहसास ए इश्क़ दिल की पनाहों में आ गया बादल सिमट के चाँद की बाहोँ में आ गया, इज़हार ए इश्क़ मैं ने किसी से नहीं किया और बेसबब जहाँ की निगाहों में आ गया, वो मुस्कुरा के देख रहे हैं मेरी तरफ़ इतना असर तो अब मेरी आहों में आ गया, क्या पूछते हो अज़्म ए सफ़र की करामातें मंज़िल का नक़्श ख़ुद मेरी राहों में आ गया, हैं इब्तिदाई मरहले ये इश्क़ के अभी ‘साहिल’ ये सोज़ क्यूँ तेरी आहों में आ गया..!! ~अब्दुल हफ़ीज़ साहिल क़ादरी - [हक़ीर जानता है इफ्तिखार माँगता है](https://bazmeshayari.com/haqir-jaanta-hai-iftikhar/): हक़ीर जानता है इफ्तिखार माँगता है वो ज़हर बाँटता है और प्यार माँगता है, ज़लील कर के रख दिया जिसने ख़ुद ही गैरो के बीबी का हक़ वो ख़्वार मांगता है, कर दिया हवाले उसके वतन की लाज गिरेबाँ जो सब के ही तार तार माँगता है, बिछा रखा है जिसने सबकी राह में काँटे सिले में लोगो से फूलो का हार माँगता है, ख़ुद के वायदे भी अपने जो निभा न सका माफ़ी तक ना कभी वो शर्मसार माँगता है, छीन कर मुफलिसों के मुँह का निवाला फिर वो अमीर ए शहर ऐतबार माँगता है, अहल ए सियासत के - [कर्ब ए फ़ुर्क़त रूह से जाता नहीं...](https://bazmeshayari.com/karb-e-furqat-ruh-se/): कर्ब ए फ़ुर्क़त रूह से जाता नहीं हल कोई ग़म का नज़र आता नहीं, काश होता इल्म ये इंसान को जो गुज़र जाता है वो पल आता नहीं, मिट गया शिकवे से लुत्फ़ ए इंतिज़ार अब हमें वो राह दिखलाता नहीं, हम वफ़ाएँ कर के भी हैं शर्मसार वो जफ़ाएँ कर के भी शरमाता नहीं, दर्द वो इनआ’म है ‘साहिल’ कि जो हर किसी इंसाँ को रास आता नहीं..!! ~अब्दुल हफ़ीज़ साहिल क़ादरी - [ये बेड़ियाँ मेरे पाँव में तुम पहना तो रहे हो](https://bazmeshayari.com/ye-bediyan-mere-paanv-me/): ये बेड़ियाँ मेरे पाँव में तुम पहना तो रहे हो फिर अहद भी ख़ुद ही तोड़ के जा रहे हो, पलकों की मुंडेरों पे परिंदों को उड़ाओ तस्लीम किया तुम मुझे समझा तो रहे हो, पछतावा न हो कल, क़दम सोच के लेना जज़्बात में उल्फ़त की क़सम खा तो रहे हो, समझाया था कल कितना मगर बाज़ न आये क्या होगा अभी माना कि पछता तो रहे हो, रहने भी अभी दीजिए अश्को का तक़ल्लुफ़ जब जानते हो दिल पे सितम ढा तो रहे हो, अब एक नये तर्ज़ ए रिफाक़त पे अमल हो तुम बीच में लोगों के - [हालात ए ज़िन्दगी से हुए मज़बूर...](https://bazmeshayari.com/haalaat-e-zindagi-se-hue/): हालात ए ज़िन्दगी से हुए मज़बूर क्या करे ? ज़ख्म ए ज़िगर भी हो गए नासूर क्या करे ? जहाँ में जिन पे नाज़ था हमको बहुत यारो ! मानिंद ए दुनियाँ हो गए मगरूर क्या करे ? बच्चे भी अब हमारा कहा मानते नहीं आया बुढ़ापा और हो गए मा’ज़ूर क्या करे ? हम जिनके वास्ते दुनियाँ में बदनाम हो गए वो लोग आज हो गए बड़े मशहूर क्या करे ? दौलत अगर है पास तो सब के अज़ीज़ है दौर ए ज़दीद का है यही दस्तूर क्या करे ? जब पास से मिलने को कुछ भी नहीं रहा - [आँखें यूँ बरसीं पैराहन भीग गया...](https://bazmeshayari.com/aankhe-yun-barsi-pairahan/): आँखें यूँ बरसीं पैरहन भीग गया तेरे ध्यान में सारा सावन भीग गया, ख़ुश्क महाज़ो बढ़ के मुझे सलामी दो मेरे लहू की छींटों से रन भीग गया, तुम ने मय पी चूर चूर मैं नश्शे में किस ने निचोड़ा किस का दामन भीग गया, क्या नमनाक हँसी दीवार ओ दर पर थी बचा खुचा सब रंग ओ रोग़न भीग गया, सजनी की आँखों में छुप कर जब झाँका बिन होली खेले ही साजन भीग गया..!! ~मुसव्विर सब्ज़वारी - [ये तसव्वुर का वार झूठा है...](https://bazmeshayari.com/ye-tasavvur-ka-vaar-jhutha-hai/): ये तसव्वुर का वार झूठा है ख़्वाब झूटे हैं सार झूठा है, फूल तुम तोड़ लाए शाख़ों से क्या बहारों से प्यार झूठा है ? आँखों में कुछ ज़बान पर कुछ है तेरा किरदार यार झूठा है, सारी गुस्ताख़ियाँ रहीं क़ायम उस पे रुत्बा वक़ार झूठा है, लापता हूँ मैं घर नहीं कोई चिट्ठी झूठी है तार झूठा है, मौत से तेज़ दौड़ किस की है ? उम्र पर शहसवार झूठा है, धूप के शूल बिखरे हैं हर सूँ चाँदनी का ख़ुमार झूठा है, आँखों में रख हुनर तकल्लुम का लफ़्ज़ों पर ऐतबार झूठा है, बार ए ख़ातिर है हम - [ये न समझो ये ख्याल है मेरा...](https://bazmeshayari.com/ye-naa-samjho-ye-khyal-hai/): ये न समझो ये ख्याल है मेरा जो सुनाता हूँ वो हाल है मेरा, ऐसा गम हूँ मैं अपनी दुनिया में ख़ुद से मिलना मुहाल है मेरा, जिसको समझा गया उरूज़ मेरा दर हकीक़त वो ज़वाल है मेरा, क्या करूँ गैर से गिले शिकवे जिस में अटका वो जाल है मेरा, ये मुहब्बत कभी मुहब्बत थी जो बचा अब उबाल है मेरा, गर ये मैं हूँ तो फिर कहाँ तुम हो कितना सादा ये सवाल है मेरा..!! - [सारे मौसम बदल गए शायद...](https://bazmeshayari.com/saare-mausam-badal-gaye/): सारे मौसम बदल गए शायद और हम भी सँभल गए शायद, झील को कर के माहताब सुपुर्द अक्स पा कर बहल गए शायद, एक ठहराव आ गया कैसा ? ज़ाविए ही बदल गए शायद, अपनी लौ में तपा के हम ख़ुद को मोम बन कर पिघल गए शायद, काँपती लौ क़रार पाने लगी झोंके आ कर निकल गए शायद, हम हवा से बचा रहे थे जिन्हें उन चराग़ों से जल गए शायद, अब के बरसात में भी दिल ख़ुश है हिज्र के ख़ौफ़ टल गए शायद, साफ़ होने लगे सभी मंज़र अश्क आँखों से ढल गए शायद, बारिश ए संग - [ज़िंदा रहने की ये तरकीब निकाली मैं ने](https://bazmeshayari.com/zinda-rahne-ki-ye-tarqib/): ज़िंदा रहने की ये तरकीब निकाली मैं ने अपने होने की ख़बर सब से छुपा ली मैं ने, जब ज़मीं रेत की मानिंद सरकती पाई आसमाँ थाम लिया जान बचा ली मैं ने, अपने सूरज की तमाज़त का भरम रखने को नर्म छाँव में कड़ी धूप मिला ली मैं ने, मरहला कोई जुदाई का जो दरपेश हुआ तो तबस्सुम की रिदा ग़म को ओढ़ा ली मैं ने, एक लम्हे को तेरी सम्त से उठा बादल और बारिश की सी उम्मीद लगा ली मैं ने, बा’द मुद्दत मुझे नींद आई बड़े चैन की नींद ख़ाक जब ओढ़ ली जब ख़ाक बिछा - [बहुत कुछ मेहनतों से एक ज़रा...](https://bazmeshayari.com/bahut-kuch-mehnaton-se/): बहुत कुछ मेहनतों से एक ज़रा इज़्ज़त कमाई है अंधेरे झोंपड़े में रौशनी जुगनू से आई है, तसद्दुक़ ज़िंदगी फ़ाक़ों पे उसके अहद ए हाज़िर में कि जिसने जान दे कर आबरू अपनी बचाई है, हमें इंकार है बातिल परस्तों की क़यादत से हमारी ज़िंदगी की हर तमन्ना कर बलाई है, ख़ुद अपने शहर में अपना शनासाई नहीं कोई न जाने जुस्तुजू अपनी ये किस मंज़िल पे लाई है, अजब दस्तूर है साहिल कि इस अहद ए तरक़्क़ी में भलाई में बुराई और बुराई में भलाई है..!! ~अब्दुल हफ़ीज़ साहिल क़ादरी - [मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते](https://bazmeshayari.com/manzil-pe-naa-pahunche-use/): मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते, एक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना एक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते, कम हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र में तूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते, बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्या और बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते..!! ~नवाज़ देवबंदी - [बेकार जब दुआ है दवा क्या करेगी आज](https://bazmeshayari.com/bekar-jab-duaa-hai-dawa-kya/): बेकार जब दुआ है दवा क्या करेगी आज ऐसे में ज़िंदगी भी वफ़ा क्या करेगी आज ? ये दौर सख़्त ओ तल्ख़ कलामी का दौर है लहजों की नर्म तर्ज़ ए अदा क्या करेगी आज ? कल तक बहुत ग़ुरूर में फिरती थी ज़िंदगी अब मौत सामने है बता क्या करेगी आज ? ज़ब्त ए ग़म ए फ़िराक़ की दिल में कहाँ सकत ज़ालिम के रूठने की अदा क्या करेगी आज..!! ~नवाज़ देवबंदी - [सामने तू है लम्हा लम्हा मेरे...](https://bazmeshayari.com/saamne-tu-hai-lamha-lamha/): सामने तू है लम्हा लम्हा मेरे और ज़मीं आसमां की दूरी है, कोई मंतक, कोई दलील नहीं तू ज़रूरी तो बस ज़रूरी है, जैसे क़िस्मत पे इख़्तियार नहीं ये मुहब्बत भी ला शु’ऊरी है, कौन सीखा है सिर्फ़ बातों से सब को एक हादसा ज़रूरी है, एक बस तू ही रही मेरी हसरत बाक़ी हर आरज़ू तो पूरी है, लिखते लिखते अरसा गुज़र गया मगर दास्ताँ आज भी अधूरी है..!! - [उदास दिल है कि उनकी नज़र नहीं होती](https://bazmeshayari.com/udas-dil-hai-ki-unki-nazar/): उदास दिल है कि उनकी नज़र नहीं होती बग़ैर शम्स के ताब ए क़मर नहीं होती, कुछ ऐसे लोग भी दुनिया में हम ने देखे हैं समा भी जाते हैं दिल में ख़बर नहीं होती, उठो तो दस्त ब साग़र चलो तो शीशा ब दोश ये मयकदा है यहाँ यूँ गुज़र नहीं होती, कभी कभी मुझे उन का ख़याल आता है कभी कभी मुझे अपनी ख़बर नहीं होती, शब ए हयात है साग़र में डूब जा ऐ दिल ये ऐसी रात है जिस की सहर नहीं होती..!! - [बेवजह कहीं आना जाना क्या](https://bazmeshayari.com/bewajah-kahin-aana-jana-kya/): बेवजह कहीं आना जाना क्या बिन बात के मुस्कुराना क्या हर शख्स दानिशमंद मिलेगा यहाँ किसी को समझाना क्या दर्द तुम्हारा कम न कर सके ज़ख्म उसको दिखलाना क्या दौलत और जवानी ठहरे कब आरज़ी चीजो पे इतराना क्या ज़िन्दगी फ़रेबी मौत है सच्ची फिर मरने से घबराना क्या..?? - [धरती पर जब ख़ूँ बहता है बादल...](https://bazmeshayari.com/dharti-par-jab-khoon-bahta-hai/): धरती पर जब ख़ूँ बहता है बादल रोने लगता है देख के शहरों की वीरानी जंगल रोने लगता है, लाख करे वो ज़ब्त का दा’वा वक़्त ए रुख़्सत सब बेकार आँखें चाहें रोएँ न रोएँ काजल रोने लगता है, बेटी की ज़िद के आगे माँ चुप हो जाती है लेकिन नंगे सर की महरूमी पर आँचल रोने लगता है, ख़ुश्बू ख़ुश्बू लिपटे रहना साँपों की मजबूरी है वर्ना अपनी बे क़दरी पर संदल रोने लगता है, तुझ से बिछड़ कर ग़ैर के आगे रोए हों तो हम मुजरिम दिल का क्या है दिल पागल है पागल रोने लगता है..!! ~नवाज़ - [दिल धड़कता है तो आती हैं सदाएँ तेरी](https://bazmeshayari.com/dil-dhadakta-hai-to-aati-hai/): दिल धड़कता है तो आती हैं सदाएँ तेरी मेरी साँसों में महकने लगीं साँसें तेरी, चाँद ख़ुद महव ए तमाशा था फ़लक पर उस दम जब सितारों ने उतारीं थीं बलाएँ तेरी, शे’र तो रोज़ ही कहते हैं ग़ज़ल के लेकिन आ कभी बैठ के तुझ से करें बातें तेरी, ज़ेहन ओ दिल तेरे तसव्वुर से घिरे रहते हैं मुझ को बाहोँ में लिए रहती हैं यादें तेरी, क्यूँ मेरा नाम मेरे शे’र लिखे हैं इन में चुग़लियाँ करती हैं मुझ से ये किताबें तेरी, बेख़बर ओट से तू झाँक रहा हो हम को और हम चुपके से तस्वीर बना - [उदासी का ये पत्थर आँसुओं से नम...](https://bazmeshayari.com/udasi-ka-ye-patthar-aansooon/): उदासी का ये पत्थर आँसुओं से नम नहीं होता हज़ारों जुगनुओं से भी अँधेरा कम नहीं होता, कभी बरसात में भी शादाब बेलें सूख जाती हैं हरे पेड़ों के गिरने का कोई मौसम नहीं होता, बहुत से लोग दिल को इस तरह महफूज़ रखते हैं कोई बारिश हो ये कागज़ ज़रा भी नम नहीं होता, बिछुड़ते वक़्त कोई बदगुमानी दिल में आ जाती उसे भी ग़म नहीं होता, मुझे भी ग़म नहीं होता, ये आँसू हैं इन्हें फूलों में शबनम की तरह रखना ग़ज़ल एहसास है एहसास का मातम नहीं होता..!! ~बशीर बद्र - [दो चार क्या हैं सारे ज़माने के बावजूद](https://bazmeshayari.com/do-chaar-kya-hai-saare-zamaane/): दो चार क्या हैं सारे ज़माने के बावजूद हम मिट नहीं सकेंगे मिटाने के बावजूद, ये राज़ काश बाद ए मुख़ालिफ़ तू जान ले क्यूँ जल रहे हैं तेरे बुझाने के बावजूद, अब भी बहुत ग़ुरूर है एक हाथ पर उसे एक हाथ हादसे में गँवाने के बावजूद, बुज़दिल था मुस्तहिक़ था मैं मुझको सज़ा मिली बख़्शा न उस ने हाथ उठाने के बावजूद, ख़्वाबों के शौक़ में कहीं आँखें गँवा न दें हम सो रहे हैं नींद न आने के बावजूद..!! ~नवाज़ देवबंदी - [हाल ए दिल सब से छुपाने में...](https://bazmeshayari.com/haal-e-dil-sab-se-chhupane/): हाल ए दिल सब से छुपाने में मज़ा आता है आप पूछें तो बताने में मज़ा आता है, रौशनी बोझ सी लगती है शब ए हिज्राँ में हाँ मगर दिल को जलाने में मज़ा आता है, जिसके कुछ तार उलझ जाते हैं दिल की सूरत बस उसी साज़ पे गाने में मज़ा आता है, जाँ बचाने का तसव्वुर भी बुरा लगता है इश्क़ में जान गँवाने में मज़ा आता है, याद कर कर के वो गर्मी की भरी दोपहरें पहली बारिश में नहाने में मज़ा आता है..!! ~नवाज़ देवबंदी - [बड़ा बेशर्म ज़ालिम है, बड़ी बेहिस...](https://bazmeshayari.com/bada-besharm-zalim-hai/): बड़ा बेशर्म ज़ालिम है, बड़ी बेहिस फ़ितरत है उसको कहाँ पता हया क्या ? क्या शराफ़त है, हमें तो ज़ुल्म सहने के लिए भेजा गया शायद जहाँ देखो वहाँ पे मुल्क में ग़ुर्बत है मुसीबत है, ऐसा बाज़ार बना डाला जहाँ हर चीज बिकती है यहाँ अद्ल बिकता है कि रक्कासा अदालत है, ये मुल्क ए हिन्दुस्तान यकज़हती की निशानी था रहा करते है हम जिसमे वहाँ वहशत ही वहशत है, तरक्क़ी तो ज़रा देखो, मिले आटा भी कतारों में मगर दावा मुसलसल ये कमज़र्फों की फ़ितरत है, जहाँ माँ बाप बच्चे बेचने पर हुए है आज आमादा नहीं मालूम - [कहीं पड़े न मोहब्बत की मार होली में](https://bazmeshayari.com/kahin-pade-naa-mohabbat-ki/): कहीं पड़े न मोहब्बत की मार होली में अदा से प्रेम करो दिल से प्यार होली में, गले में डाल दो बाँहों का हार होली में उतारो एक बरस का ख़ुमार होली में, मिलो गले से गले बार बार होली में लगा के आग बढ़ी आगे रात की जोगन, नए लिबास में आई है सुब्ह की मालन नज़र नज़र है कुँवारी अदा अदा कमसिन, हैं रंग रंग से सब रंग-बार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में, हवा हर एक को चल फिर के गुदगुदाती है नहीं जो हँसते उन्हें छेड़ कर हंसाती है, हया गुलों को - [अगर आज भी बोली ठोली न होगी](https://bazmeshayari.com/agar-aaj-bhi-boli-tholi-naa/): अगर आज भी बोली ठोली न होगी तो होली ठिकाने की होली न होगी, बड़ी गालियाँ देगा फागुन का मौसम अगर आज ठट्ठा ठिठोली न होगी, वो खोलेंगे आवारा मौसम के झोंके जो खिड़की शराफ़त ने खोली न होगी, है होली का दिन कम से कम दोपहर तक किसी के ठिकाने की बोली न होगी, अभी से न चक्कर लगा मस्त भँवरे कली ने अभी आँख खोली न होगी ये बोटी परी बन के उड़ने लगेगी ज़रा घोलिए फिर से घोली न होगी, इसी जेब में होगी फ़ित्ने की पुड़िया ज़रा फिर टटोलो टटोली न होगी, ‘नज़ीर’ आज आएँगे मिलने - [दिल में उठती है मसर्रत की लहर होली में](https://bazmeshayari.com/dil-me-uthti-hai-masarrat-ki/): दिल में उठती है मसर्रत की लहर होली में मस्तियाँ झूमती हैं शाम ओ सहर होली में, सारे आलम की फ़ज़ा गूँजती है नग़्मों से कैफ़ ओ मस्ती के बरसते हैं गुहर होली में, दुश्मन और दोस्त सभी मलते हैं आपस में गुलाल सारे बेकार हुए तेग़ ओ तबर होली में, मोहतसिब मस्त है और हज़रत ए वाइज़ सरशार मयकदा बन गया है ऐश नगर होली में, किस की मख़मूर निगाहों ने पिलाए साग़र मस्त ओ बे ख़ुद हुए सब अहल ए नज़र होली में, आज क्यूपिड भी लिए हाथों में पिचकारी है उस से बच कर भला जाओगे किधर - [ये नूर उतरेगा आख़िर ग़ुरूर उतरेगा](https://bazmeshayari.com/ye-noor-utrega-aakhir/): ये नूर उतरेगा आख़िर ग़ुरूर उतरेगा जनाब उतरेगा बंदा हुज़ूर उतरेगा, जो चढ़ गया है वो ऊपर नहीं निकलने का उतर ही जाएगी फिर वो ज़ुरूर उतरेगा, ज़मीन सोख़्ता सामाँ है ख़ाक कर देगी नशा गुमान तकब्बुर सुरूर उतरेगा, वजूद पञ्चमहाभूत में उतर लेगा हुनर उलूम अदा का उबूर उतरेगा, ख़ला में ताहिर ए दरमादा बोलता होगा जहाँ सवाब रुकेंगे क़ुसूर उतरेगा..!! ~संजय चतुर्वेदी - [समंदरों में हमारा निशान फैला है](https://bazmeshayari.com/samandaro-me-hamara-nishan/): समंदरों में हमारा निशान फैला है पलट के देख मुए आसमान फैला है, मुक़ाबला है ख़ुराफ़ात का अँधेरों से हद ए उलूम के आगे बयान फैला है, किसी जमाल ए हुनर का कोई निशाँ होता यज़िदियो का ये ख़ाली मकान फैला है, जिसे डिबेट बताते हैं मीडिया वाले वहाँ ग़ुरूर खड़ा है गुमान फैला है, किसू के बाप का हिंदोस्तान क्या पूछो ? सबू के बाप का सारा जहान फैला है..!! ~संजय चतुर्वेदी - [तबीब हो के भी दिल की दवा नहीं करते](https://bazmeshayari.com/tabib-ho-ke-bhi-dil-ki/): तबीब हो के भी दिल की दवा नहीं करते हम अपने ज़ख़्मों से कोई दग़ा नहीं करते, परिंदे उड़ने लगे हैं ग़ुरूर के तेरे हवा में काग़ज़ी पर से उड़ा नहीं करते, नकेल डालनी है नफ़्स के इरादों पर बिना लगाम के घोड़े थमा नहीं करते, दुआ को हाथ उठाते नहीं हर इक के लिए तो ये भी सच है कि हम बद्दुआ नहीं करते, ये सुर्ख़ आँधियाँ क्या ‘चाँद’ का बिगाड़ेंगी बुलंद पेड़ हवा से गिरा नहीं करते..!! ~चाँद अकबराबादी - [दो चार गाम राह को हमवार देखना](https://bazmeshayari.com/do-chhar-gaam-raah-ko/): दो चार गाम राह को हमवार देखना फिर हर क़दम पे एक नई दीवार देखना, आँखों की रौशनी से है हर संग आईना हर आइने में ख़ुद को गुनहगार देखना, हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी जिसको भी देखना हो कई बार देखना, मैदाँ की हार जीत तो क़िस्मत की बात है टूटी है किस के हाथ में तलवार देखना, दरिया के इस किनारे सितारे भी फूल भी दरिया चढ़ा हुआ हो तो उस पार देखना, अच्छी नहीं है शहर के रस्तों से दोस्ती आँगन में फैल जाए न बाज़ार देखना..!! ~निदा फ़ाज़ली - [दुनिया की रिवायात से बेगाना नहीं हूँ](https://bazmeshayari.com/duniya-ki-riwayat-se-begana/): दुनिया की रिवायात से बेगाना नहीं हूँ छेड़ो न मुझे मैं कोई दीवाना नहीं हूँ, इस कसरत ए ग़म पर भी मुझे हसरत ए ग़म है जो भर के छलक जाए वो पैमाना नहीं हूँ, रूदाद ए ग़म ए इश्क़ है ताज़ा मेरे दम से उनवान ए हर अफ़्साना हूँ अफ़्साना नहीं हूँ, इल्ज़ाम ए जुनूँ दें न मुझे अहल ए मोहब्बत मैं ख़ुद ये समझता हूँ कि दीवाना नहीं हूँ, मैं क़ाएल ए ख़ुद्दारी ए उल्फ़त सही लेकिन आदाब ए मोहब्बत से तो बेगाना नहीं हूँ, है बर्क़ ए सर ए तूर से दिल शोला ब दामाँ शम ए - [यही हाल रहा साक़ी तेरे मयखानों का](https://bazmeshayari.com/yahi-haal-raha-saaqi-tere/): यही हाल रहा साक़ी तेरे मयखानों का तो ढेर लग जाएगा टूटे हुए पैमानों का, क़हत दुनियाँ में है अब ऐसे मुसलमानों का ज़ोर जो तोड़ दिया करते थे तूफानों का, कोई खालिद है न तारीक है, न इब्न ए कासिम अब रास्ता साफ़ है बढ़ते हुए शैतानो का, जिस जगह चाहो जहाँ चाहो बहा दो इसको खून इस दौर में सस्ता है मुसलमानों का, जिनके होते हुए लूट जाए ग़रीबों के मकाँ मर्सियाँ आओ पढ़े ऐसे निगहबानो का..!! - [अब तरसते हो कि बच्चे मेरे बोले उर्दू](https://bazmeshayari.com/ab-taraste-ho-ki-bachche-mere/): अब तरसते हो कि बच्चे मेरे बोले उर्दू उन्हें अफरंग बनाने की ज़रूरत क्या थी ? आज रोते हो कि अल्लाह मदद को आये आख़िर असनाम बनाने की ज़रूरत क्या थी ? काश ! अपनों से निभाते तो निभाए जाते हाथ गैरों से मिलाने की ज़रूरत क्या थी ? था बड़ा ज़ोम तुम्हे अपने हसीं चेहरे पर फिर भला हमसे छिपाने की ज़रूरत क्या थी ? - [औरों की प्यास और है और उसकी...](https://bazmeshayari.com/auro-ki-pyas-aur-hai-aur/): औरों की प्यास और है और उसकी प्यास और कहता है हर गिलास पे बस एक गिलास और, ख़ुद को कई बरस से ये समझा रहे हैं हम काटी है इतनी उम्र तो दो चार मास और, पहले ही कम हसीन कहाँ था तुम्हारा ग़म पहना दिया है उस को ग़ज़ल का लिबास और, टकरा रही है साँस मेरी उस की साँस से दिल फिर भी दे रहा है सदा और पास और, अल्लाह उस का लहजा ए शीरीं कि क्या कहूँ वल्लाह उस पे उर्दू ज़बाँ की मिठास और, बाँधा है अब नक़ाब तो फिर कस के बाँध ले - [जंग जितनी हो सके दुश्वार होनी चाहिए](https://bazmeshayari.com/jung-jitni-ho-sake-dushwar/): जंग जितनी हो सके दुश्वार होनी चाहिए जीत हासिल हो तो लज़्ज़तदार होनी चाहिए, एक आशिक़ कल सलामत शहर में देखा गया ये ख़बर तो सुर्ख़ी ए अख़बार होनी चाहिए, कह रही है आजकल ग़ज़लें किसी के इश्क़ में वो कि जो ख़ुद ज़ीनत ए अशआर होनी चाहिए, इश्क़ दोनों ने किया था ख़ुदकुशी बस मैं करूँ वो भी मरने के लिए तय्यार होनी चाहिए, दिल की नादानी ही बस काफ़ी नहीं है इश्क़ में अक़्ल भी थोड़ी बहुत बीमार होनी चाहिए, प्यार है तो हाथ उस का थाम अपने हाथ में जंग है तो हाथ में तलवार होनी चाहिए..!! - [अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रखा है...](https://bazmeshayari.com/agarche-zor-hawaao-ne-daal/): अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रखा है मगर चराग़ ने लौ को सँभाल रखा है, मोहब्बतों में तो मिलना है या उजड़ जाना मिज़ाज ए इश्क़ में कब ए’तिदाल रखा है, हवा में नशा ही नशा फ़ज़ा में रंग ही रंग ये किस ने पैरहन अपना उछाल रखा है, भले दिनों का भरोसा ही क्या रहें न रहें सो मैं ने रिश्ता ए ग़म को बहाल रखा है, हम ऐसे सादा दिलों को वो दोस्त हो कि ख़ुदा सभी ने वादा ए फ़र्दा पे टाल रखा है, हिसाब ए लुत्फ़ ए हरीफ़ाँ किया है जब तो खुला कि दोस्तों ने - [वो हँस के देखती होती तो उस से बात...](https://bazmeshayari.com/wo-hans-ke-dekhti-hoti-to/): वो हँस के देखती होती तो उस से बात करते कोई उम्मीद भी होती तो उससे बात करते, हम स्टेशन से बाहर आए इस अफ़सोस के साथ वो लड़की अजनबी होती तो उससे बात करते, हमारे जाम आधी हौसला अफ़ज़ाई कर पाए अगर उस ने भी पी होती तो उससे बात करते तवज्जोह से बहुत शरमाती है आवाज़ अपनी अगर वो सो रही होती तो उससे बात करते, किसी से बात करना इतना मुश्किल भी नहीं था किसी ने बात की होती तो उससे बात करते, ये ख़ामोशी भी क्या है गुफ़्तुगू की इंतिहा है कोई बात अनकही होती तो - [उड़ते हैं गिरते हैं फिर से उड़ते हैं](https://bazmeshayari.com/udte-hai-girte-hai-fir-se/): उड़ते हैं गिरते हैं फिर से उड़ते हैं उड़ने वाले उड़ते उड़ते उड़ते हैं, कोई उस बूढे पीपल से कह आओ पिंजरे में हम ख़ूब मज़े से उड़ते हैं, हाए वो चिड़िया उड़ मैना उड़ के झगड़े और फिर साबित करना बकरे उड़ते हैं, पिंजरे में दाना पानी सब रक्खा है और परिंदे भूखे प्यासे उड़ते हैं, देख रहे हैं हम भी जवानी के मौसम बंद हवा में कैसे दुपट्टे उड़ते हैं, इस तोते का पिंजरा खोलो फिर देखो कैसे इस तोते के तोते उड़ते हैं..!! ~चराग़ शर्मा - [तितली से दोस्ती न गुलाबों का शौक़ है](https://bazmeshayari.com/titli-se-dosti-na-gulabo-ka/): तितली से दोस्ती न गुलाबों का शौक़ है मेरी तरह उसे भी किताबों का शौक़ है, वर्ना तो नींद से भी नहीं कोई ख़ास रब्त आँखों को सिर्फ़ उसके ख़्वाबों का शौक़ है, हम आशिक़ ए ग़ज़ल हैं तो मग़रूर क्यों न हों ? आख़िर ये शौक़ भी तो नवाबों का शौक़ है, उस शख़्स के फ़रेब से वाक़िफ़ हैं हम मगर कुछ अपनी प्यास को ही सराबों का शौक़ है, गिरने दो ख़ुद सँभलने दो ऐसे ही चलने दो ये तो ‘चराग़’ ख़ाना ख़राबों का शौक़ है..!! ~चराग़ शर्मा - [तारीफ़ उस ख़ुदा की जिसने जहाँ बनाया](https://bazmeshayari.com/tarif-us-khuda-ki-jisne/): तारीफ़ उस ख़ुदा की जिसने जहाँ बनाया कैसी हसीं ज़मीं बनाई क्या आसमां बनाया, मिट्टी से बेल बूटे क्या ख़ुश नुमा उगाया पहना के सब्ज़ ख़िलअत उनको जवाँ बनाया, ख़ुश रंग और ख़ुशबू गुल फूल हैं खिलाएँ इस खाक़ के खंडहर को क्या गुलिस्ताँ बनाया, मेवे लगाये क्या क्या ख़ुश ज़ायका रसीले चखने से जिनके मुझको शीरीं दहाँ बनाया, सूरज बना के तूने रौनक जहाँ को बख्शी रहने को फिर हमारे महफूज़ मकाँ बनाया, प्यासी ज़मीं के मुँह में मीना का टपकाया पानी और बादलों को तू ने मीना का निशाँ बनाया, ये प्यारी प्यारी चिड़ियाँ फिरती है जो चहकती - [जी भर कर रोने को करता है दिल...](https://bazmeshayari.com/jee-bhar-kar-rone-ko-karta-hai/): जी भर कर रोने को करता है दिल आज पलकें भिगोने को करता है दिल, नहीं मालूम कुछ भी सबब इसका बस दुखी होने को करता है दिल, किसी की याद सता रही है बहुत शब गए भी न सोने को करता है दिल, क्या ही खून रुलाता है गम ए हिज्राँ में तन्हाई में फूट के रोने को करता है दिल, कोई हद भी है सितम ज़रीफ़ी की ? हनूज़ चाक गिरेबानी करने को करता है दिल, जिस के नाम पर चिढ जाते है हम अक्सर उसी पर जान छिडकने को करता है दिल..!! - [इलाज़ ए शीशा ए दिल करूँ मिले...](https://bazmeshayari.com/ilaz-e-shisha-e-dil-karoon/): इलाज़ ए शीशा ए दिल करूँ मिले जो शीशा गर कोई कोई मिला नहीं इधर, मिलेगा क्या उधर कोई ? डगर पे इश्क़ ए नामुराद की चला था बे खतर घसीट, लूट ले चला मिला था चश्म ए तर कोई, नवीद हो कि हम तुम्हारा शहर छोड़ जाएँगे बसे थे जिस के हुक्म पर चला है रूठ कर कोई, शिकस्ता दिल की धज्जियाँ समेट ले, गिला न कर कि उस गली में मुन्तज़िर अब भी बाम पर कोई, चले जो ऐतमाद से, रहे जो मुस्तक़िल मिजाज़ बनेगे हम भी इश्क़ में हवाला मोतबर कोई, समझ ले हौसला तलब है खेल - [जब इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी...](https://bazmeshayari.com/jab-ikkis-baras-guzre/): जब इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी ए कामिल को तब जा के कहीं हमको ‘ग़ालिब’ का ख़याल आया, तुर्बत है कहाँ उस की मस्कन था कहाँ उसका अब अपने सुख़न परवर ज़ेहनों में सवाल आया, सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है, उर्दू के तअ’ल्लुक़ से कुछ भेद नहीं खुलता ये जश्न ये हंगामा ख़िदमत है कि साज़िश है, जिन शहरों में गूँजी थी ग़ालिब की नवा बरसों उन शहरों में अब उर्दू बेनाम ओ निशाँ ठहरी, आज़ादी ए कामिल का एलान हुआ जिस दिन मा’तूब ज़बाँ ठहरी ग़द्दार ज़बाँ - [वो इंसाँ जो शिकार ए गर्दिश ए अय्याम...](https://bazmeshayari.com/wo-insaan-jo-shikar/): वो इंसाँ जो शिकार ए गर्दिश ए अय्याम होता है भला करता है दुनिया का मगर बदनाम होता है, जो देखो ग़ौर से हर शे’र एक इल्हाम होता है सभी अशआ’र से ज़ाहिर कोई पैग़ाम होता है, दहल जाते हैं दिल कलियों के गुलशन थरथराता है चमन में जब कोई ताइर असीर ए दाम होता है, ख़िरद हाइल हुआ करती है जब भी राह ए उल्फ़त में जुनून ए इश्क़ ए सादिक़ मुफ़्त में बदनाम होता है, जब आ जाता है ग़ालिब ज़ोर ए बातिल हक़परस्तों पर निज़ाम ए जब्र से हरसू बपा कोहराम होता है, ये दुनिया है अजब - [सूरमाओं को सर ए आम से डर लगता है](https://bazmeshayari.com/soormaaon-ko-sar-e-aam-se/): सूरमाओं को सर ए आम से डर लगता है अब इंक़लाब को अवाम से डर लगता है, हमीं हैं ज़ेर ए बहस और हमीं ख़ुदा ए बहस फिर हमें किसलिए अंजाम से डर लगता है, वज़ीफ़ाख़ोर रवायत ने मार डाला है हुनर को गर्दिश ए अय्याम से डर लगता है, हमारे वर्ग से संघर्ष गया शक़ आया जैसे अखरोट को बादाम से डर लगता है, हमीं हैं रश्क़ ए मलाइक हमीं नबी अव्वल हमीं को नींद में इल्हाम से डर लगता है..!! ~संजय चतुर्वेदी - [ज़िक्र उस परीवश का और फिर...](https://bazmeshayari.com/ziqr-us-pariwash-ka-aur/): ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयां अपना बन गया रकीब आख़िर था जो राज़दां अपना, मय वो क्यूँ बहुत पीते बज़्म ए ग़ैर में, या रब आज ही हुआ मंज़ूर उनको इम्तेहाँ अपना, मंज़र एक बुलन्दी पर और हम बना सकते अरश से उधर होता काश के मकां अपना, दे वो जिस कदर ज़िल्लत हम हंसी में टालेंगे बारे आशना निकला उनका पासबां अपना, दर्द ए दिल लिखूं कब तक, जाऊं उन को दिखला दूं उंगलियां फ़िगार अपनी ख़ामा ख़ूंचकां अपना, घिसते घिसते मिट जाता आप ने अबस बदला नंग ए सिजदा से मेरे संग ए आसतां, अपना, ता - [दर्द मिन्नत कश ए दवा न हुआ...](https://bazmeshayari.com/dard-minnat-kash-e-dawa/): दर्द मिन्नत कश ए दवा न हुआ मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ, जमा करते हो क्यूँ रकीबों को ? एक तमाशा हुआ गिला न हुआ हम कहाँ क़िस्मत आज़माने जाएँ तू ही जब ख़ंजर आज़मा न हुआ, कितने शरीं हैं तेरे लब कि रकीब गालियाँ खा के बे मज़ा न हुआ, है ख़बर गरम उनके आने की आज ही घर में बोरीया न हुआ, क्या वो नमरूद की ख़ुदायी थी बन्दगी में मेरा भला न हुआ, जान दी, दी हुयी उसी की थी हक तो यह है कि हक अदा न हुआ, ज़ख़्म गर दब गया, लहू न - [यहाँ किसी को आवाज़ कहाँ उठाने...](https://bazmeshayari.com/yahan-kisi-ko-aawaz/): यहाँ किसी को आवाज़ कहाँ उठाने देता है कोई ज़रा सी आवाज़ करो तो गला दबा देता है हर कोई, प्यास से मरते हुए को पानी की बूँद नहीं मिलती ज़रा सी आग लग जाए तो हवा देता है हर कोई, जिसके पास कुछ नहीं उसे कुछ नहीं मिलता ख़ाली बर्तन को पीछे खिसका देता है हर कोई, ये जुमला बड़ा मशहूर है ज़माने भर में कि जिसके पास है उसे ही सहारा देता है हर कोई, नसीहत करने वाले लाखो मिल जाते है लेकिन ज़रूरत पड़ने पर किनारा कर लेता है हर कोई, तुम काम आए तो ये तुम्हारी - [तेरी हर बात चल कर भी यूँ मेरे जी से आती है](https://bazmeshayari.com/teri-har-baat-chal/): तेरी हर बात चल कर भी यूँ मेरे जी से आती है कि जैसे याद की ख़ुशबू किसी हिचकी से आती है, कहाँ से और आएगी अक़ीदत की वो सच्चाई जो जूठे बेर वाली सरफिरी सबरी से आती है, बदन से तेरे आती है मुझे ऐ माँ वही ख़ुशबू जो एक पूजा के दीपक में पिघलते घी से आती है, उसी ख़ुशबू के जैसी है महक पहली मुहब्बत की जो दुल्हन की हथेली पर रची मेहँदी से आती है, हज़ारों खुशबुएँ दुनियाँ में है पर उस से छोटी है किसी भूखे को जो सिकती हुई रोटी से आती है, मेरे - [समझे वही इसको जो हो दीवाना...](https://bazmeshayari.com/samjhe-wahi-isko-jo/): समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का अकबर ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का, गर शैख़ ओ बहरमन सुनें अफ़साना किसी का माबद न रहे काबा ओ बुतख़ाना किसी का, अल्लाह ने दी है जो तुम्हे चाँद सी सूरत रौशन भी करो जाके सियहख़ाना किसी का, अश्क आँखों में आ जाएँ एवज़ नींद के साहब ऐसा भी किसी शब सुनो अफ़साना किसी का, इशरत जो नहीं आती मेरे दिल में, न आए हसरत ही से आबाद है वीराना किसी का, करने जो नहीं देते बयां हालत ए दिल को सुनिएगा लब ए ग़ौर से अफ़साना किसी का, कोई - [कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में...](https://bazmeshayari.com/kahan-le-jaaoon-dil/): कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है यहाँ परियों का मजमा है, वहाँ हूरों की महफ़िल है, इलाही कैसी कैसी सूरतें तूने बनाई हैं ? हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है, ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है, मेरा दिल है, जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर अरे तू कौन है, हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है, हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है..!! ~अकबर इलाहाबादी - [ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को...](https://bazmeshayari.com/gazalon-ka-hunar-apni/): ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएँगे रोएँगे बहुत लेकिन आँसू नहीं आएँगे, कह देना समुंदर से हम ओस के मोती हैं दरिया की तरह तुझ से मिलने नहीं आएँगे, वो धूप के छप्पर हों या छाँव की दीवारें अब जो भी उठाएँगे मिलजुल के उठाएँगे, जब साथ न दे कोई आवाज़ हमें देना हम फूल सही लेकिन पत्थर भी उठाएँगे..!! ~बशीर बद्र - [ये जो हासिल हमें हर शय की फ़रावानी है](https://bazmeshayari.com/ye-jo-hasil-hame/): ये जो हासिल हमें हर शय की फ़रावानी है ये भी तो अपनी जगह एक परेशानी है, ज़िंदगी का ही नहीं ठोर ठिकाना मालूम मौत तो तय है कि किस वक़्त कहाँ आनी है, कोई करता ही नहीं ज़िक्र वफ़ादारी का इन दिनों इश्क़ में आसानी ही आसानी है, कब ये सोचा था कभी दोस्त कि यूँ भी होगा तेरी सूरत तेरी आवाज़ से पहचानी है, चैन लेने ही नहीं देती किसी पल मुझको रोज़ ए अव्वल से मेरे साथ जो हैरानी है, ये भी मुमकिन है कि आबादी हो इससे आगे ये जो ता हद्द ए नज़र फैलती वीरानी - [बुझ गई आँख तेरा इंतज़ार करते करते](https://bazmeshayari.com/bujh-gayi-aankh-tera-intazar/): बुझ गई आँख तेरा इंतज़ार करते करते टूट गए हम एक तरफ़ा प्यार करते करते, क़यामत है इज़हार करने की अदा उसकी कर देती है इंकार वो इज़हार करते करते, इतना भी आसां नहीं ज़िस्म के पार जाना लोग डूबे ही है ये ज़िस्म पार करते करते, न जाने कब बिछड़ गए तुझ से ऐ ज़िन्दगी ख़्वाब पूरे होने का ऐतबार करते करते, ज़माना ये कि गर लिख दूँ कागज़ पे सच हर्फ़ बौखला जाते है तकरार करते करते..!! ~दर्पन कानपुरी - [ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते](https://bazmeshayari.com/ye-aur-baat-hai/): ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते जो ज़ख़्म तू ने दिए हैं भरा नहीं करते, हज़ार जाल लिए घूमती फिरे दुनिया तेरे असीर किसी के हुआ नहीं करते, ये आइनों की तरह देख भाल चाहते हैं कि दिल भी टूटें तो फिर से जुड़ा नहीं करते, वफ़ा की आँच सुख़न का तपाक दो इनको दिलों के चाक रफ़ू से सिला नहीं करते, जहाँ हो प्यार ग़लत फ़हमियाँ भी होती हैं सो बात बात पे यूँ दिल बुरा नहीं करते, हमें हमारी अनाएँ तबाह कर देंगी मुकालमे का अगर सिलसिला नहीं करते, जो हम पे गुज़री है जानाँ - [थे ख़्वाब एक हमारे भी और तुम्हारे भी](https://bazmeshayari.com/the-khwab-ek-hamare/): थे ख़्वाब एक हमारे भी और तुम्हारे भी पर अपना खेल दिखाते रहे सितारे भी, ये ज़िंदगी है यहाँ इस तरह ही होता है सभी ने बोझ से लादे हैं कुछ उतारे भी, सवाल ये है कि आपस में हम मिलें कैसे हमेशा साथ तो चलते हैं दो किनारे भी, किसी का अपना मोहब्बत में कुछ नहीं होता कि मुश्तरक हैं यहाँ सूद भी ख़सारे भी, बिगाड़ पर है जो तन्क़ीद सब बजा लेकिन तुम्हारे हिस्से के जो काम थे सँवारे भी, बड़े सुकून से डूबे थे डूबने वाले जो साहिलों पे खड़े थे बहुत पुकारे भी, जैसे रेल में - [तेरा ये लुत्फ़ किसी ज़ख़्म का उन्वान न हो](https://bazmeshayari.com/tera-ye-lutf-kisi/): तेरा ये लुत्फ़ किसी ज़ख़्म का उन्वान न हो ये जो साहिल सा नज़र आता है तूफ़ान न हो, क्या बला शहर पे टूटी है ख़ुदा ख़ैर करे यूँ सर ए शाम कोई दश्त भी वीरान न हो, रंग ख़ुश्बू से जुदा हो तो बिखर जाता है देखने वाले मेरे हाल पे हैरान न हो, बात बनती है तो फिर आप ही बन जाती है इतनी मायूस मुक़द्दर से मेरी जान न हो, सीख इस शहर में जीने का सलीक़ा ‘अमजद’ कोई मरता है मरे, आप का नुक़सान न हो..!! ~अमजद इस्लाम अमजद - [वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे...](https://bazmeshayari.com/wo-gazal-walo-ka-usloob/): वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे चाँद कहते हैं किसे ख़ूब समझते होंगे, इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे, मैं समझता था मोहब्बत की ज़बाँ ख़ुशबू है फूल से लोग उसे ख़ूब समझते होंगे, देख कर फूल के औराक़ पे शबनम कुछ लोग तेरा अश्कों भरा मक्तूब समझते होंगे, भूल कर अपना ज़माना ये ज़माने वाले आज के प्यार को मायूब समझते होंगे..!! ~बशीर बद्र - [जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे...](https://bazmeshayari.com/jahan-ped-par-chaar-daane/): जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे हज़ारों तरफ़ से निशाने लगे, हुई शाम यादों के एक गाँव में परिंदे उदासी के आने लगे, घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख यहाँ आते आते ज़माने लगे, कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे, वहीं ज़र्द पत्तों का कालीन है गुलों के जहाँ शामियाने लगे, पढाई लिखाई का मौसम कहाँ किताबों में ख़त आने-जाने लगे..!! ~बशीर बद्र - [है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र...](https://bazmeshayari.com/hai-azib-shahar-ki/): है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बदमिज़ाज सी शाम है, यूँही रोज़ मिलने की आरज़ू बड़ी रख रखाव की गुफ़्तुगू ये शराफ़तें नहीं बेग़रज़ इसे आप से कोई काम है, कहाँ अब दुआओं की बरकतें वो नसीहतें वो हिदायतें ये मुतालबों का ख़ुलूस है ये ज़रूरतों का सलाम है, वो दिलों में आग लगाएगा मैं दिलों की आग बुझाऊंगा उसे अपने काम से काम है मुझे अपने काम से काम है, न उदास हो न मलाल कर किसी बात का न ख़याल कर कई साल बा’द मिले हैं हम तेरे - [वहशतें बिखरी पड़ी है जिस तरफ़ भी...](https://bazmeshayari.com/wahshate-bikhri-padi-hai/): वहशतें बिखरी पड़ी है जिस तरफ़ भी जाऊँ मैं घूम फिर आया हूँ अपना शहर तेरा गाँव मैं, किस को रास आया है इतनी देर तक का जागना वो जो मिल जाए तो उसको भी यही समझाऊँ मैं, अब तो आँखों में उतर आई है दिल की वहशतें आईना देखूँ तो अपने आप से डर जाऊँ मैं, कुछ तो बता ऐ मातमी रातों की धुँधली चाँदनी ! भूलने वाले को आख़िर किस तरह याद आऊँ मैं, अब कहाँ वो दिल के सहरा में बहलता ही न था अब तो अपने घर की तन्हाई से भी घबराऊँ मैं, याद कर के - [क्या शर्त ए मुहब्बत है, क्या शर्त...](https://bazmeshayari.com/kya-shart-e-muhabbat/): क्या शर्त ए मुहब्बत है, क्या शर्त ए ज़माना है ! आवाज़ भी ज़ख़्मी है मगर गीत भी गाना है उस पार उतरने की उम्मीद बहुत कम है कश्ती भी पुरानी है तूफां को भी आना है, समझे या न समझे वो अंदाज़ ए मुहब्बत को मक़सद आँखों से उसे हाल ए दिल सुनाना है, भोली सी अदा कोई फिर इश्क़ की ज़िद्द पर है फिर आग का दरिया है और डूब के जाना है..!! - [काँटो का एक मकान मेरे पास रह गया](https://bazmeshayari.com/kaanto-ka-ek-maqan/): काँटो का एक मकान मेरे पास रह गया एक फूल सा निशान मेरे पास रह गया, सामान तू ने रख लिया जाते हुए तमाम लेकिन तेरा ध्यान मेरे पास रह गया, जाते हुए यकीन की दौलत वो ले गया एक वहम और गुमान मेरे पास रह गया, सूरज चला गया मुझे सहरा में छोड़ के किरनो का सायेबां मेरे पास रह गया, हमको भुलाने पर है कहाँ उसको इख़्तियार कितना हसीन गुमान मेरे पास रह गया..!! - [मुश्किल दिन भी आए लेकिन फ़र्क़....](https://bazmeshayari.com/mushkil-din-bhi-aaye/): मुश्किल दिन भी आए लेकिन फ़र्क़ न आया यारी में हम ने पूरी जान लगाई उस की ताबेदारी में, बेईमानी करते तो फिर शायद जीत के आ जाते चाहे हार के वापस आए खेले अपनी बारी में, मीठे मीठे होंठ हिलाए कड़वी कड़वी बातें की कीकर और गुलाब लगाया उस ने एक कियारी में, तेरी जानिब उठने वाली आँखों का रुख़ मोड़ लिया हम ने अपने ऐब दिखाए तेरी पर्दादारी में, जाने अब वो किस के साथ निकलता होगा रातों को जाने कौन लगाता होगा दो घंटे तय्यारी में..!! ~दानिश नक़वी - [दश्त की धूप है जंगल की घनी रातें हैं](https://bazmeshayari.com/dasht-ki-dhoop-hai/): दश्त की धूप है जंगल की घनी रातें हैं इस कहानी में बहर हाल कई बातें हैं, गो तेरे साथ मेरा वक़्त गुज़र जाता है शहर में और भी लोगों से मुलाक़ातें हैं, जितने अशआर हैं उन सब पे तुम्हारा हक़ है जितनी नज़्में हैं मिरी नींद की सौग़ातें हैं, क्या कहानी को इसी मोड़ प रुकना होगा रौशनी है न समुंदर है न बरसातें हैं..!! ~जावेद नासिर - [दूर होते हुए क़दमों की ख़बर जाती है](https://bazmeshayari.com/door-hote-hue-qadmo-ki/): दूर होते हुए क़दमों की ख़बर जाती है ख़ुश्क पत्ते को लिए गर्द ए सफ़र जाती है, पास आते हुए लम्हात पिघल जाते हैं अब तो हर चीज़ दबे पाँव गुज़र जाती है, रात आ जाए तो फिर तुझ को पुकारूँ या रब मेरी आवाज़ उजाले में बिखर जाती है, दोस्तो तुम से गुज़ारिश है यहाँ मत आओ इस बड़े शहर में तन्हाई भी मर जाती है..!! ~जावेद नासिर - [उसे बेचैन कर जाऊँगा मैं भी...](https://bazmeshayari.com/use-bechain-kar-jaaoounga/): उसे बेचैन कर जाऊँगा मैं भी ख़मोशी से गुज़र जाऊँगा मैं भी, मुझे छूने की ख़्वाहिश कौन करता है कि पल भर में बिखर जाऊँगा मैं भी, बहुत पछताएगा वो बिछड़ कर ख़ुदा जाने किधर जाऊँगा मैं भी, ज़रा बदलूंगा इस बे मंज़री को फिर उसके बाद मर जाऊँगा मैं भी, किसी दीवार का ख़ामोश साया पुकारे तो ठहर जाऊँगा मैं भी, पता उस का तुम्हें भी कुछ नहीं है यहाँ से बेख़बर जाऊँगा मैं भी..!! ~अमीर क़ज़लबाश - [महफ़िलें लुट गईं जज़्बात ने दम...](https://bazmeshayari.com/mahfile-loot-gai-jazbat/): महफ़िलें लुट गईं जज़्बात ने दम तोड़ दिया साज़ ख़ामोश हैं नग़्मात ने दम तोड़ दिया, हर मसर्रत ग़म ए दीरोज़ का उन्वान बनी वक़्त की गोद में लम्हात ने दम तोड़ दिया, अनगिनत महफ़िलें महरूम ए चराग़ाँ हैं अभी कौन कहता है कि ज़ुल्मात ने दम तोड़ दिया, आज फिर बुझ गए जल जल के उमीदों के चराग़ आज फिर तारों भरी रात ने दम तोड़ दिया, जिनसे अफ़्साना ए हस्ती में तसलसुल था कभी उन मोहब्बत की रिवायात ने दम तोड़ दिया, झिलमिलाते हुए अश्कों की लड़ी टूट गई जगमगाती हुई बरसात ने दम तोड़ दिया, हाए आदाब - [चेहरे पे सारे शहर के गर्द ए मलाल है...](https://bazmeshayari.com/chehre-pe-saare-shahar-ke/): चेहरे पे सारे शहर के गर्द ए मलाल है जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है, उलझन घुटन हिरास तपिश कर्ब इंतिशार वो भीड़ है के साँस भी लेना मुहाल है, आवारगी का हक़ है हवाओं को शहर में घर से चराग़ ले के निकलना मुहाल है, बे चेहरगी की भीड़ में गुम है हर एक वजूद आईना पूछता है कहाँ ख़द्द ओ ख़ाल है, जिनमें ये वस्फ़ हो कि छुपा लें हर एक दाग़ उन आइनों की आज बड़ी देख भाल है, परछाइयाँ क़दों से भी आगे निकल गईं सूरज के डूब जाने का अब एहतिमाल - [जो वफ़ा का रिवाज रखते हैं...](https://bazmeshayari.com/jo-wafa-ka-riwaz-rakhte-hai/): जो वफ़ा का रिवाज रखते हैं साफ़ सुथरा समाज रखते हैं, क़ाबिल ए रहम हैं वो इंसाँ जो ख़ाहिश ए तख़्त ओ ताज रखते हैं, भेज कर हम जहेज़ पर ला’नत अहल ए ग़ुर्बत की लाज रखते हैं, दिल कुशादा भी हैं उन्ही के जो सर पे ग़ुर्बत का ताज रखते हैं, बरकत अल्लाह देता है ‘साहिल’ लाख हम कम अनाज रखते हैं..!! ~अब्दुल हफ़ीज़ साहिल क़ादरी - [इलाज ए ज़ख़्म ए दिल होता है...](https://bazmeshayari.com/ilaz-e-zakhme-dil/): इलाज ए ज़ख़्म ए दिल होता है ग़मख़्वारी भी होती है मगर मक़्तल की मेरे ख़ूँ से गुलकारी भी होती है, वही क़ातिल वही मुंसिफ़ अदालत उसकी वो शाहिद बहुत से फ़ैसलों में अब तरफ़दारी भी होती है, ये है तुर्फ़ा तमाशा कर्बला ए अस्र ए हाज़िर का घरों में क़ातिलों के अब अज़ादारी भी होती है, तअल्लुक़ उन से टूटा था न टूटा है न टूटेगा बहुत मज़बूत ज़ंजीर ए वफ़ादारी भी होती है, वो मेरा दोस्त है ‘मंज़ूर’ लेकिन जब भी मिलता है ख़ुलूस ए दिल में शामिल कुछ रियाकारी भी होती है..!! ~मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद - [ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से न जोड़ा जाए](https://bazmeshayari.com/khwab-ka-rishta-haqiqat/): ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से न जोड़ा जाए आईना है इसे पत्थर से न तोड़ा जाए, अब भी भर सकते हैं मयख़ाने के सब जाम ओ सुबू मेरा भीगा हुआ दामन जो निचोड़ा जाए, हर क़दम मरहला ए मर्ग ए तमन्ना है मगर ज़िंदगी फिर भी तेरा साथ न छोड़ा जाए, आओ फिर आज कुरेदें दिल ए अफ़सुर्दा की राख आओ सोई हुई यादों को झिंझोड़ा जाए, हो वो तौबा के हो साग़र के हो पैमान ए वफ़ा कुछ न कुछ आज तो मयख़ाने में तोड़ा जाए, ज़ुल्फ़ ओ रुख़ आज भी उनवान ए ग़ज़ल हैं ‘मंज़ूर’ रुख़ उधर गर्दिश - [दुनियाँ में शातिर नहीं अब शरीफ़...](https://bazmeshayari.com/duniyan-me-shatir-nahi/): दुनियाँ में शातिर नहीं अब शरीफ़ लटकते है अब सच्चो की बात छोड़ो वो तो सर पटकते है, पहले मरते थे लोग और भटकती थी रूहें यारो पर अब तो मरती है रूहें और लोग भटकते है, नहीं है किसी को गँवारा किसी का आगे बढ़ना हमेशा अपने ही बन के रोड़ा राहो में अटकते है, देख कर आती है हमें घिन मक्कार अफसरानो से जो पाते है हज़ारों लाखो मगर रिश्वत भी झटकते है, अब बदल गया है यहाँ इंसान कुछ इस तरह से कि दिल में आए हुए नेक ख्यालात भी खटकते है..!! - [रंग ए नफ़रत तेरे दिल से उतरता है...](https://bazmeshayari.com/rang-e-nafrat-tere/): रंग ए नफ़रत तेरे दिल से उतरता है कभी ? एक रवैया है मुरव्वत, उसे बरता है कभी ? खिज़र बन के जो मुझे पार लगा देता है मेरी कश्ती में वो सुराक़ भी करता है कभी, काँच पर बाल जो पड़ जाए निकलता है कभी ? फूल अगर दिल में खिला हो बिखरता है कभी ? लोग तो नाम कमाने में लगे रहते है आदमी काम से ज़िन्दा हो तो मरता है कभी, वो उभरता है मेरी याद से मोती की तरह तो टूटते तारे की मानिंद गुज़रता है कभी, सुखनवर को खून से सींचना पड़ता है लफ्ज़ो को - [यहाँ मरने की दुआएँ क्यूँ मांगूँ ?](https://bazmeshayari.com/yahan-marne-ki-duaayen/): यहाँ मरने की दुआएँ क्यूँ मांगूँ ? यहाँ जीने की तमन्ना कौन करे ? ये दुनियाँ हो या कि वो दुनियाँ अब ख्वाहिश ए दुनियाँ कौन करे ? जब कश्ती साबित ओ सालिम थी तब साहिल की तमन्ना किस को थी ? अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर भला साहिल की तमन्ना कौन करे ? दिल में जो आग लगाईं थी तुमने उनको तो है बुझाया अश्को से, जो अश्को ने भड़काई है अब उस आग को ठंडा अब कौन करे ? दुनियाँ ने हमें छोड़ा जज़्बी कर के तो छोड़ न दे क्यूँ इस दुनियाँ को ? इस दुनियाँ को - [मैं जब भी कोई अछूता कलाम लिखता हूँ](https://bazmeshayari.com/main-jab-bhi-koi-achhuta/): मैं जब भी कोई अछूता कलाम लिखता हूँ तो पहले एक गज़ल तेरे नाम लिखता हूँ, बदन की आँच से संवला गए है पैरहन मैं फिर भी सुबह के चेहरे पे शाम लिखता हूँ, चले तो टूटे चट्टानें, रुके तो आग लगे शमीम ए गुल को नाज़ुक खिराम लिखता हूँ, घटाएँ झूम के बरसीं झुलस गई खेती ये हादसा है ब सद ए एहतिराम लिखता हूँ, ज़मीं प्यासी है बूढ़ा गगन भी भूखा है मैं अपने अहद के किस्से तमाम लिखता हूँ, चमन को औरो ने लिखा है मयकदा बर दोश मैं फूल फूल को आतिश ब जाम लिखता हूँ, - [काम उसके सारे ही सय्याद वाले है...](https://bazmeshayari.com/kaam-uske-saare-hi/): काम उसके सारे ही सय्याद वाले है मगर मैं उसे बहेलिया नहीं लिखता सर्दियाँ जितनी हो सब सह लेता हूँ कमज़र्फ धूप को अर्ज़ियाँ नहीं लिखता शहर भी अब मुझे याद नहीं करता गाँव भी हमको चिठ्ठियाँ नहीं लिखता सफ़हे सादा ही छोड़ दिया करता हूँ मगर कभी मैं तल्खियाँ नहीं लिखता..!! - [हमसे तो किसी काम की बुनियाद न होवे](https://bazmeshayari.com/hamse-to-kisi-kaam-ki/): हम से तो किसी काम की बुनियाद न होवे जब तक कि उधर ही से कुछ इमदाद न होवे, हम को भी नहीं चैन तेरे ग़मज़ों से दिलबर जब तक कि नया एक सितम ईजाद न होवे, ऐ आह ज़रा उठियो तो आहिस्ता कि वो जो थोड़ा सा असर है कहीं बर्बाद न होवे, दी थी ये दुआ किस ने मिरे दिल को इलाही उजड़े ये घर ऐसा कि फिर आबाद न होवे, देखा न किसी वक़्त मैं हँसते हुए उसको ये भी कोई दिल है जो कभी शाद न होवे, भूले से भी भूलो न कभी ग़ैरों का तुम - [हम न निकहत हैं न गुल हैं जो महकते...](https://bazmeshayari.com/ham-nikhat-hai-na-gul/): हम न निकहत हैं न गुल हैं जो महकते जावें आग की तरह जिधर जावें दहकते जावें, ऐ ख़ुशा मस्त कि ताबूत के आगे जिसके आब पाशी के बदल मय को छिड़कते जावें, जो कोई आवे है नज़दीक ही बैठे है तेरे हम कहाँ तक तेरे पहलू से सरकते जावें, ग़ैर को राह हो घर में तेरे सुब्हान अल्लाह और हम दूर से दर को तेरे तकते जावें, वक़्त अब वो है कि एक एक ‘हसन’ हो के ब तंग सब्र ओ ताब ओ ख़िरद ओ होश खिसकते जावें..!! ~मीर हसन - [अपने घर की चारदीवारी में अब...](https://bazmeshayari.com/apne-ghar-ki-chaardeewari/): अपने घर की चारदीवारी में अब लिहाफ़ में भी सिहरन होती है जिस दिन से किसी को गुर्बत में सड़को पर ठिठुरते देखा है, पहले छोटी छोटी ख़ुशियों को सब मिल कर साथ मनाते थे आज कल छोटे छोटे आँगन में रिश्तो को सिमटते देखा है, तुम आज भी मेरे अपने हो शायद इन्सान हो और ज़माने के वरना यहाँ मौसम से पहले हमने अपनों को बदलते देखा है, किस बात पे तू इतराता है ? यहाँ वक़्त से बड़ा तो कुछ भी नहीं कभी तारों से जगमग आसमाँ में सितारों को टूटते देखा है..!! - [ज़िस्म क्या है ? रूह तक सब कुछ....](https://bazmeshayari.com/zism-kya-hai-ruh-tak/): ज़िस्म क्या है ? रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिए आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिए, जो बदल सकते है इस देश की तकदीर को उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिए, जल रहा है देश, ये बहला रहे है कौम को किस तरह अश्लील है संसद की भाषा देखिए, मत्स्यगंधा फिर होगी किसी ऋषि का शिकार दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिए..!! ~अदम गोंडवी - [कुछ ग़म ए जानाँ कुछ ग़म ए दौराँ](https://bazmeshayari.com/kuch-gam-e-jaanaan/): कुछ ग़म ए जानाँ कुछ ग़म ए दौराँ दोनों मेरी ज़ात के नाम एक ग़ज़ल मंसूब है उससे एक ग़ज़ल हालात के नाम, मौज ए बला दीवार ए शहर पे अब तक जो कुछ लिखती रही मेरी किताब ए ज़ीस्त को पढ़िए दर्ज हैं सब सदमात के नाम, गिरते ख़ेमे जलती तनाबें आग का दरिया ख़ून की नहर ऐसे मुनज़्ज़म मंसूबों को दूँ कैसे आफ़ात के नाम, उस की गली से मक़्तल ए जाँ तक मस्जिद से मयख़ाने तक उलझन प्यास ख़लिश तन्हाई कर्बज़दा लम्हात के नाम, सहरा ज़िंदाँ तौक़ सलासिल आतिश ज़हर और दार ओ रसन क्या क्या हमने - [अँधेरा सफ़र है ख़बरदार रहना...](https://bazmeshayari.com/andhera-safar-hai-khabardar/): अँधेरा सफ़र है ख़बरदार रहना लुटेरा शहर है ख़बरदार रहना, गला काटतें है बड़ी सादगी से ये इनका हुनर है ख़बरदार रहना, गज़ल कह रहे हो जो कम काफ़ियो की कठिन ये बहर है ख़बरदार रहना, हुई बर्फ़ बारी ये ठंडी हवाएँ उसी का असर है ख़बरदार रहना, यहाँ सल्तनत है घनी तीरगी की जो तंग ए नज़र है ख़बरदार रहना..!! - [जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये...](https://bazmeshayari.com/jo-dalhauji-na-kar/): जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे, सुरा व सुंदरी के शौक़ में डूबे हुए रहबर दिल्ली को रंगीलेशाह का हम्माम कर देंगे, ये वंदेमातरम् का गीत गाते हैं सुबह उठकर मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगना दाम कर देंगे, सदन को घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे अगली योजना में घूसख़ोरी आम कर देंगे..!! ~अदम गोंडवी - [यूँ बे दर्द बन कर ना रहा कीजिए...](https://bazmeshayari.com/yun-bedard-ban-kar/): यूँ बेदर्द बन कर ना रहा कीजिए मेरे मर्ज़ की भी तो कोई दवा कीजिए, आप मुहब्बत लिए घूमते है अगर इस दिल के लिए भी दुआ कीजिए, दर्द दे कर किसी को भूलना ही है तो यादो में फिर यूँ ना फिरा कीजिए, यहाँ काँटो से बच कर चले या नहीं बेवफाओं से बच कर चला कीजिए, जान ओ दिल से है जो आप ही के लिए इस कदर तो न उसको छला कीजिए, मिले मुझको तसल्ली और ख़ुद को सुकूं अब इतना तो ग़रीब का भला कीजिए..!! - [घर में ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है](https://bazmeshayari.com/ghar-me-thande-chulhe/): घर में ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है ? भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारिन सी ये सुबह ए फ़रवरी बीमार पत्नी से भी पीली है, बग़ावत के कमल खिलते है दिल के सूखे दरिया में मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चो की पनीली है, सुलगते ज़िस्म की गर्मी का फिर एहसास कैसे हो ? मुहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है..!! ~अदम गोंडवी - [वो शख़्स कि मैं जिस से मोहब्बत नहीं...](https://bazmeshayari.com/wo-shakhs-ki-main-jis-se/): वो शख़्स कि मैं जिस से मोहब्बत नहीं करता हँसता है मुझे देख के नफ़रत नहीं करता, पकड़ा ही गया हूँ तो मुझे दार पे खींचो सच्चा हूँ मगर अपनी वकालत नहीं करता, क्यूँ बख़्श दिया मुझ से गुनहगार को मौला मुंसिफ़ तो किसी से भी रिआ’यत नहीं करता, घर वालों को ग़फ़लत पे सभी कोस रहे हैं चोरों को मगर कोई मलामत नहीं करता, किस क़ौम के दिल में नहीं जज़्बात ए बराहीम किस मुल्क पे नमरूद हुकूमत नहीं करता ? देते हैं उजाले मेरे सज्दों की गवाही मैं छुप के अँधेरे में इबादत नहीं करता, भूला नहीं मैं - [वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो...](https://bazmeshayari.com/wo-dil-hi-kya-tere-milne-ki/): वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करे मैं तुझ को भूल के ज़िंदा रहूँ ख़ुदा न करे, रहेगा साथ तेरा प्यार ज़िंदगी बन कर ये और बात मेरी ज़िंदगी वफ़ा न करे, ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में ख़ुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे, सुना है उस को मोहब्बत दुआएँ देती है जो दिल पे चोट तो खाए मगर गिला न करे, अगर वफ़ा पे भरोसा रहे न दुनिया को तो कोई शख़्स मोहब्बत का हौसला न करे, बुझा दिया है नसीबों ने मेरे प्यार का चाँद कोई दिया मेरी पलकों - [उसे मना कर ग़ुरूर उस का बढ़ा न देना](https://bazmeshayari.com/use-mana-kar-gurur-us-ka/): उसे मना कर ग़ुरूर उस का बढ़ा न देना वो सामने आए भी तो उस को सदा न देना, ख़ुलूस को जो ख़ुशामदों में शुमार कर लें तुम ऐसे लोगों को तोहफ़तन भी वफ़ा न देना, वो जिस की ठोकर में हो सँभलने का दर्स शामिल तुम ऐसे पत्थर को रास्ते से हटा न देना, सज़ा गुनाहों की देना उस को ज़रूर लेकिन वो आदमी है तुम उस की अज़्मत घटा न देना, जहाँ रिफ़ाक़त हो फ़ित्ना पर्दाज़ मौलवी की बहिश्त ऐसी किसी को मेरे ख़ुदा न देना, ‘क़तील’ मुझ को यही सिखाया मेरे नबी ने कि फ़त्ह पा कर - [नेक लोगो में मुझे नेक गिना जाता है](https://bazmeshayari.com/nek-logo-me-mujhe-nek/): नेक लोगो में मुझे नेक गिना जाता है गुनाहगार गुनाहगार समझते है मुझे मैं तो ख़ुद बाज़ार में बिकने को आया हूँ लोग है कि ख़रीदार समझते है मुझे मैं बदलते हुए हालात में ढल जाता हूँ देखने वाले अदाकार समझते है मुझे, वो जो उस पार है इस पार जानते है जो इस पार है उस पार समझते है मुझे..!! - [दिल सोज़ से खाली है, निगह पाक नहीं है](https://bazmeshayari.com/dil-soz-se-khaali-hai/): दिल सोज़ से खाली है, निगह पाक नहीं है फिर इसमें अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है, है ज़ौक ए तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिनहां ग़ाफ़िल ! तू निरा साहब ए अदराक नहीं है, वोह आंख कि है सुरमा ए अफ़रंग से रौशन पुरकार ओ सुख़नसाज़ है, नमनाक नहीं है, क्या सूफ़ी व मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूं की उनका सर ए दामन भी अभी चाक नहीं है, कब तक रहे महकूमी ए अंजुम में मेरी ख़ाक या मैं नहीं या ग़र्दिश ए अफ़लाक नहीं है, बिजली हूं नज़र कोह ए बयाबां पे है मेरी मेरे लिए शायां - [अफ़लाक से आता है नालों का जवाब...](https://bazmeshayari.com/aflaq-se-aata-hai-naalo-ka/): अफ़लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर, अहवाल ए मुहब्बत में कुछ फ़रक नहीं ऐसा सोज़ ओ तब ओ ताब अव्वल, सोज़ ओ तब ओ ताब आख़िर, मैं तुझको बताता हूँ तकदीर ए उमस कया है शमशीर ए सनां अव्वल, ताऊस ओ रबाब आख़िर, मैख़ाना ए यूरोप के दसतूर निराले हैं लाते हैं सुरूर अव्वल, देते हैं शराब आख़िर, क्या दबदबा ए नादिर, क्या शौकत ए तैमूरी हो जाते हैं सब दफ़तर गरके मये नाब आख़िर, था ज़ब्त बहुत मुश्किल इस मील मुआनी का कह डाले कलन्दर ने इसरार ए किताब - [अब भला छोड़ के घर क्या करते...](https://bazmeshayari.com/ab-bhala-chhod-ke-ghar/): अब भला छोड़ के घर क्या करते शाम के वक़्त सफ़र क्या करते, तेरी मसरूफ़ियतें जानते हैं अपने आने की ख़बर क्या करते, जब सितारे ही नहीं मिल पाए ले के हम शम्स ओ क़मर क्या करते, वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का था साए फैला के शजर क्या करते, ख़ाक ही अव्वल ओ आख़िर ठहरी कर के ज़र्रे को गुहर क्या करते, राय पहले से बना ली तू ने दिल में अब हम तेरे घर क्या करते, इश्क़ ने सारे सलीक़े बख़्शे हुस्न से कस्ब ए हुनर क्या करते..!! ~परवीन शाकिर - [तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बाद](https://bazmeshayari.com/tune-dekha-hai-kabhi/): तूने देखा है कभी एक नज़र शाम के बाद कितने चुपचाप से लगते हैं शजर शाम के बाद, इतने चुप चाप कि रस्ते भी रहेंगे ला इल्म छोड़ जाएँगे किसी रोज़ नगर शाम के बाद, मैं ने ऐसे ही गुनह तेरी जुदाई में किए जैसे तूफ़ाँ में कोई छोड़ दे घर शाम के बाद, शाम से पहले वो मस्त अपनी उड़ानों में रहा जिस के हाथों में थे टूटे हुए पर शाम के बाद, रात बीती तो गिने आबले और फिर सोचा कौन था बाइस ए आग़ाज़ ए सफ़र शाम के बाद, तू है सूरज तुझे मालूम कहाँ रात का - [हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें](https://bazmeshayari.com/haadso-ki-zad-pe-hai-to/): हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें ? तुम ने मेरे घर न आने की क़सम खाई तो है आँसुओं से भी कहो आँखों में आना छोड़ दें, प्यार के दुश्मन कभी तू प्यार से कह के तो देख एक तेरा दर ही क्या हम तो ज़माना छोड़ दें, घोंसले वीरान हैं अब वो परिंदे ही कहाँ एक बसेरे के लिए जो आब ओ दाना छोड़ दें..!! ~वसीम बरेलवी - [अनोखी वज़अ है सारे ज़माने से निराले हैं](https://bazmeshayari.com/anokhi-vazaa-hai-saare-zamane-se/): अनोखी वज़अ है सारे ज़माने से निराले हैं ये आशिक कौन सी बस्ती के या रब ! रहने वाले हैं ? इलाज़ ए दर्द में भी दर्द की लज़्ज़त पे मरता हूँ जो थे छालों में काँटे नोक ए सूज़न से निकाले हैं, फला फूला रहे या रब ! चमन मेरी उम्मीदों का ज़िगर का ख़ून दे दे कर ये बूटे मैंने पाले हैं, रुलाती है मुझे रातों को ख़ामोशी सितारों की निराला इश्क़ है मेरा, निराले मेरे नाले हैं, न पूछो मुझसे लज़्ज़त ख़ानुमां बरबाद रहने की नशेमन सैंकड़ों मैंने बनाकर फूंक डाले हैं, नहीं बेगानगी अच्छी रफ़ीक ए - [अजब वायज़ की दींदारी है या रब !](https://bazmeshayari.com/azab-wayaz-ki-deedari-hai/): अजब वायज़ की दींदारी है या रब ! अदावत है इसे सारे जहाँ से, कोईअब तक न यह समझा, कि इंसा कहाँ जाता है ? आता है कहाँ  से ? वहीं से रात को ज़ुलमत मिली है चमक तारे ने पायी है जहाँ से, हम अपनी दरदमन्दी का फ़साना सुना करते हैं अपने राज़दां से, बड़ी बारीक हैं वायज़ की चालें लरज़ जाता है आवाज़े अज़ां से..!! ~अल्लामा इक़बाल - [दरोग़ के इम्तिहाँ कदे में सदा यही...](https://bazmeshayari.com/darog-ke-imtihan-kade-me/): दरोग़ के इम्तिहाँ कदे में सदा यही कारोबार होगा जो बढ़ के ताईद ए हक़ करेगा वही सज़ावार ए दार होगा, बिला ग़रज़ सादा सादा बातों से डाल दें रस्म दोस्ती की जो सिलसिला इस तरह चलेगा वो लाज़िमन पाएदार होगा, चलो मोहब्बत की बेख़ुदी के हसीन ख़ल्वत कदे में बैठें अजीब मसरूफ़ियत रहेगी न ग़ैर होगा न यार होगा, तेरे गुलिस्ताँ की आबरू है महक तेरी इन्फ़िरादियत की तू कस्मपुर्सी से बुझ भी जाए तो ग़ैरत ए नौ बहार होगा, जहाँ न तू हो न कोई हमदर्द हो न कोई शरीफ़ दुश्मन मैं सोचता हूँ मुझे वो माहौल किस - [मिलना न मिलना एक बहाना है और बस](https://bazmeshayari.com/milna-na-milna-ek-bahana-hai/): मिलना न मिलना एक बहाना है और बस तुम सच हो बाक़ी जो है फ़साना है और बस, लोगों को रास्ते की ज़रूरत है और मुझे एक संग ए रहगुज़र को हटाना है और बस, मसरूफ़ियत ज्यादा नहीं है मेरी यहाँ मिट्टी से एक चराग़ बनाना है और बस, सोए हुए तो जाग ही जाएँगे एक दिन जो जागते हैं उन को जगाना है और बस, तुम वो नहीं हो जिन से वफ़ा की उम्मीद है तुम से मेरी मुराद ज़माना है और बस, फूलों को ढूँढता हुआ फिरता हूँ बाग़ में बाद ए सबा को काम दिलाना है और - [सुख़न वरी का बहाना बनाता रहता हूँ](https://bazmeshayari.com/sukhan-vari-ka-bahana/): सुख़न वरी का बहाना बनाता रहता हूँ तेरा फ़साना तुझी को सुनाता रहता हूँ, मैं अपने आप से शर्मिंदा हूँ न दुनिया से जो दिल में आता है होंठों पे लाता रहता हूँ, पुराने घर की शिकस्ता छतों से उकता कर नए मकान का नक़्शा बनाता रहता हूँ, मेरे वजूद में आबाद हैं कई जंगल जहाँ मैं हू की सदाएँ लगाता रहता हूँ, मेरे ख़ुदा यही मसरूफ़ियत बहुत है मुझे तेरे चराग़ जलाता बुझाता रहता हूँ..!! ~असअ’द बदायुनी - [मसरूफ़ियत उसी की है फ़ुर्सत उसी...](https://bazmeshayari.com/masrufiyat-usi-ki-hai/): मसरूफ़ियत उसी की है फ़ुर्सत उसी की है इस सरज़मीन ए दिल पे हुकूमत उसी की है, मिलता है वो भी तर्क ए तअल्लुक़ के बावजूद मैं क्या करूँ कि मुझको भी आदत उसी की है, जो उम्र उस के साथ गुज़ारी उसी की थी बाक़ी जो बच गई है मसाफ़त उसी की है, होता है हर किसी पे उसी का गुमाँ मुझे लगता है हर किसी में शबाहत उसी की है, लिखूँ तो उसके इश्क़ को लिखना है शायरी सोचूँ तो ये सुख़न भी इनायत उसी की है, दर ए आस्ताँ कोई हो ब ज़ाहिर सर ए सुजूद लेकिन - [जिस सर को ग़ुरूर आज है याँ ताजवरी...](https://bazmeshayari.com/jis-sar-ko-gurur-aaj-hai/): जिस सर को ग़ुरूर आज है याँ ताजवरी का कल उस पे यहीं शोर है फिर नौहागरी का, शर्मिंदा तेरे रुख़ से है रुख़्सार परी का चलता नहीं कुछ आगे तेरे कब्क ए दरी का, आफ़ाक़ की मंज़िल से गया कौन सलामत अस्बाब लुटा राह में याँ हर सफ़री का, ज़िंदाँ में भी शोरिश न गई अपने जुनूँ की अब संग मुदावा है इस आशुफ़्ता सरी का, हर ज़ख़्म ए जिगर दावर ए महशर से हमारा इंसाफ़ तलब है तेरी बेदाद गरी का, अपनी तो जहाँ आँख लड़ी फिर वहीं देखो आईने को लपका है परेशाँ नज़री का, सद मौसम - [पी ली तो कुछ पता न चला वो सुरूर था](https://bazmeshayari.com/pee-li-to-kuchh-pata-na-chala/): पी ली तो कुछ पता न चला वो सुरूर था वो उस का साया था कि वही रश्क ए हूर था, कल मैं ने उस को देखा तो देखा नहीं गया मुझ से बिछड़ के वो भी बहुत ग़म से चूर था, रोया था कौन कौन मुझे कुछ ख़बर नहीं मैं उस घड़ी वतन से कई मील दूर था, शाम ए फ़िराक़ आई तो दिल डूबने लगा हम को भी अपने आप पे कितना ग़ुरूर था, चेहरा था या सदा थी किसी भूली याद की आँखें थीं उस की यारो कि दरिया ए नूर था, निकला जो चाँद आई महक - [ये है तो सब के लिए हो ये ज़िद्द हमारी है](https://bazmeshayari.com/ye-hai-to-sab-ke-liye-ho/): ये है तो सब के लिए हो ये ज़िद्द हमारी है इस एक बात पे दुनिया से जंग जारी है, उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है, मैं क़तरा हो के भी तूफ़ाँ से जंग लेता हूँ मुझे बचाना समुंदर की ज़िम्मेदारी है, इसी से जलते हैं सहरा ए आरज़ू में चराग़ ये तिश्नगी तो मुझे ज़िंदगी से प्यारी है, कोई बताए ये उस के ग़ुरूर ए बेजा को वो जंग मैं ने लड़ी ही नहीं जो हारी है, हर एक साँस पे पहरा है बेयक़ीनी का ये ज़िंदगी तो नहीं - [अज़ब कर्ब में गुज़री, जहाँ जहाँ गुज़री](https://bazmeshayari.com/azab-karb-me-guzari-jahan-jahan/): अज़ब कर्ब में गुज़री, जहाँ जहाँ गुज़री अगरचे चाहने वालों के दरम्याँ गुज़री, तमाम उम्र चराग ए उम्मीद जलाते रहे तमाम उम्र उम्मीदों के दरम्याँ गुज़री, गुज़र गई जो तेरे साथ वो यादगार रही बिना तेरे जो गुज़री वबाल ए जाँ गुज़री, मुझे सुकूं मयस्सर नहीं तो क्या गम है गुलों की उम्र तो काँटों के दरम्याँ गुज़री, अज़ब चीज है ये गर्दिश ए हालात मोहसिन कभी ज़मीं तो कभी मस्ल ए आसमां गुज़री..!! ~मोहसिन नक़वी - [खंज़र से करो बात न तलवार से पूछो](https://bazmeshayari.com/khanzar-se-karo-baat-na/): खंज़र से करो बात न तलवार से पूछो मैं क़त्ल हुआ कैसे मेरे यार से पूछो, फर्ज़ अपना मसीहा ने अदा कर दिया लेकिन किस तरह कटी रात ये बीमार से पूछो, कुछ भूल हुई है तो सज़ा भी कोई होगी सब कुछ मैं बता दूँगा ज़रा प्यार से पूछो, आँखों ने तो चुप रह के भी रुदाद सुना दी क्यूँ खुल न सके ये लब इज़हार से पूछो, रौनक है मेरे घर में तसव्वुर ही से जिस के वो कौन था ये इन दर ओ दीवार से पूछो..!! - [नाम लिखते है तेरा और मिटा देते है...](https://bazmeshayari.com/naam-likhte-hai-tera-aur/): नाम लिखते है तेरा और मिटा देते है यूँ इस दिल को मुहब्बत की सज़ा देते है, उम्र भर जिन को प्यार न करना आया आज वही लोग हम को दरस ए वफ़ा देते है, हमने सीखा नहीं प्यार में रुसवा करना दिल तो क्या चीज है हम जान भी लुटा देते है, कितना ख़ुश रंग था वो प्यार का मौसम यारो याद आते है वो लम्हे तो रुला देते है, उसके आने की झूठी तसल्ली मत दो ये दिलासे तो मेरा दर्द बढ़ा देते है..!! - [ज़ख़्म का मरहम दर्द का अपने दरमाँ...](https://bazmeshayari.com/zakhm-ka-marham-dard-ka/): ज़ख़्म का मरहम दर्द का अपने दरमाँ बेच के आए हैं हम लम्हों का सौदा कर के सदियाँ बेच के आए हैं, बिकने पर जब आ ही गए थे ऊँचे मोल तो बिकते हम हम को हमारे रहबर लेकिन अर्ज़ां बेच के आए हैं, मेंह क्यूँ बरसे ख़ुश्क ज़मीं पर कैसे हो मक़्बूल ए दुआ जब ख़ुद बारिश माँगने वाले नदियाँ बेच के आए हैं, भूक की ये शिद्दत भी आख़िर क्या से क्या कर देती है मजबूरन कल बच्चों की हम गुड़ियाँ बेच के आए हैं, ~नवाज़ देवबंदी - [मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल...](https://bazmeshayari.com/mustakil-mahrumiyon-par-bhi/): मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल माना नहीं लाख समझाया कि इस महफ़िल में अब जाना नहीं, ख़ुद फ़रेबी ही सही क्या कीजिए दिल का इलाज तू नज़र फेरे तो हम समझें कि पहचाना नहीं, एक दुनिया मुंतज़िर है और तेरी बज़्म में इस तरह बैठे हैं हम जैसे कहीं जाना नहीं, जी में जो आती है कर गुज़रो कहीं ऐसा न हो कल पशेमाँ हों कि क्यूँ दिल का कहा माना नहीं, ज़िंदगी पर इस से बढ़ कर तंज़ क्या होगा ‘फ़राज़’ उस का ये कहना कि तू शाएर है दीवाना नहीं..!! ~~अहमद फ़राज़ - [क्या ऐसे कम सुख़न से कोई गुफ़्तुगू करे](https://bazmeshayari.com/kya-aise-kam-sukhan-se/): क्या ऐसे कम सुख़न से कोई गुफ़्तुगू करे जो मुस्तक़िल सुकूत से दिल को लहू करे, अब तो हमें भी तर्क ए मरासिम का दुख नहीं पर दिल ये चाहता है कि आग़ाज़ तू करे, तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी ख़ुद को गँवा के कौन तेरी जुस्तुजू करे, अब तो ये आरज़ू है कि वो ज़ख़्म खाइए ता ज़िंदगी ये दिल न कोई आरज़ू करे, तुझ को भुला के दिल है वो शर्मिंदा ए नज़र अब कोई हादसा ही तेरे रू ब रू करे, चुप चाप अपनी आग में जलते रहो ‘फ़राज़’ दुनिया तो अर्ज़ ए हाल से - [धरती पर जब ख़ूँ बहता है बादल रोने...](https://bazmeshayari.com/dharti-par-jab-khoon/): धरती पर जब ख़ूँ बहता है बादल रोने लगता है देख के शहरों की वीरानी जंगल रोने लगता है, लाख करे वो ज़ब्त का दा’वा वक़्त ए रुख़्सत सब बेकार आँखें चाहें रोएँ न रोएँ काजल रोने लगता है, बेटी की ज़िद के आगे माँ चुप हो जाती है लेकिन नंगे सर की महरूमी पर आँचल रोने लगता है, ख़ुश्बू ख़ुश्बू लिपटे रहना साँपों की मजबूरी है वर्ना अपनी बेक़दरी पर संदल रोने लगता है, तुझ से बिछड़ कर ग़ैर के आगे रोए हों तो हम मुजरिम दिल का क्या है दिल पागल है पागल रोने लगता है..!! ~नवाज़ देवबंदी - [नशात ए ग़म भी मिला रंज ए शाद मानी](https://bazmeshayari.com/nashaat-e-gam-bhi-mila/): नशात ए ग़म भी मिला रंज ए शाद मानी भी मगर वो लम्हे बहुत मुख़्तसर थे फ़ानी भी, खुली है आँख कहाँ कौन मोड़ है यारो दयार ए ख़्वाब की बाक़ी नहीं निशानी भी, रगों में रेत की इक और तह जमी देखो कि पहले जैसी नहीं ख़ून में रवानी भी, भटक रहे हैं तआ’क़ुब में अब सराबों के मिला न जिन को समुंदर से बूँद पानी भी, ज़मीं भी हम से बहुत दूर होती जाती है डरा रही है ख़लाओं की बे करानी भी, तवील होने लगी हैं इसी लिए रातें कि लोग सुनते सुनाते नहीं कहानी भी..!! - [मशअल ए दर्द फिर एक बार जला ली](https://bazmeshayari.com/mashal-e-dard-fir-ek-baar/): मशअल ए दर्द फिर एक बार जला ली जाए जश्न हो जाए ज़रा धूम मचा ली जाए, ख़ून में जोश नहीं आया ज़माना गुज़रा दोस्तो आओ कोई बात निकाली जाए, जान भी मेरी चली जाए तो कुछ बात नहीं वार तेरा न मगर एक भी ख़ाली जाए, जो भी मिलना है तेरे दर ही से मिलना है उसे दर तेरा छोड़ के कैसे ये सवाली जाए ? वस्ल की सुब्ह के होने में है कुछ देर अभी दास्ताँ हिज्र की कुछ और बढ़ा ली जाए..!! ~शहरयार - [नहीं रोक सकोगे जिस्म की इन परवाजों](https://bazmeshayari.com/nahi-rok-sakogezism-ki/): नहीं रोक सकोगे जिस्म की इन परवाजों को बड़ी भूल हुई जो छेड़ दिया कई साज़ों को, कोई नया मकीन नहीं आया तो हैरत क्या कभी तुमने खुला छोड़ा ही नहीं दरवाज़ों को, कभी पार भी कर पाएँगी सुकूत के सहरा को दरपेश है कितना और सफ़र आवाज़ों को, मुझे कुछ लोगों की रुस्वाई मंज़ूर नहीं नहीं आम किया जो मैं ने अपने राज़ों को, कहीं हो न गई हो ज़मीन परिंदों से ख़ाली खुले आसमान पर देखता हूँ फिर बाज़ों को..!! ~शहरयार - [छोटी छोटी बातों पर परिवार बदलते देखे](https://bazmeshayari.com/chhoti-chhoti-baaton-par/): छोटी छोटी बातों पर परिवार बदलते देखे वक़्त ए ज़रूरत सब यार बदलते देखे, अब तो यकीन उठ सा गया है ज़माने से अक्सर अपनों के किरदार बदलते देखे, जितना दिया ख़ुदा ने उतनी हवस बढ़ी हर रोज़ लोगो के व्यापार बदलते देखे, ख़बरों में छपना था नापाक इरादों को ज़र की बदौलत अख़बार बदलते देखे..!! - [वही फिर मुझे याद आने लगे हैं...](https://bazmeshayari.com/wahi-fir-mujhe-yaad-aane/): वही फिर मुझे याद आने लगे हैं जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं, वो हैं पास और याद आने लगे हैं मोहब्बत के होश अब ठिकाने लगे हैं, सुना है हमें वो भुलाने लगे हैं तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं, हटाए थे जो राह से दोस्तों की वो पत्थर मेरे घर में आने लगे हैं, ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझको ये कहने में मुझको ज़माने लगे हैं, हवाएँ चलीं और न मौजें ही उठी अब ऐसे भी तूफ़ान आने लगे हैं, क़यामत यक़ीनन क़रीब आ गई है ‘ख़ुमार’ अब तो मस्जिद में जाने लगे - [हादसों का शहर है संभल जाइए](https://bazmeshayari.com/haadso-ka-shahar-hai/): हादसों का शहर है संभल जाइए कौन कब किस डगर है संभल जाइए, नेक रस्ते पे चलते हुए आज कल यहाँ आदमी दर ब दर है संभल जाइए, चाहे कहिए सड़क इसको या एक नदी इस कदर रह गुज़र है संभल जाइए, दर्द कितने दिए है आपने मुझे ये कोई शराफ़त नहीं है संभल जाइए, जान सस्ती मगर चीजे महँगी यहाँ बाक़ी सब बे असर है संभल जाइए..!! - [क्यूँ ज़मीं है आज प्यासी इस तरह ?](https://bazmeshayari.com/kyun-zamin-hai-aaj-pyasi/): क्यूँ ज़मीं है आज प्यासी इस तरह ? हो रही नदियाँ सियासी इस तरह, जान की परवाह किसे है आजकल फैली हुई है हर सू उदासी इस तरह, रो रहे है माँ बाप क्यूँ तन्हाइयों में ? बढ़ रही क्यूँ ये बदहवासी इस तरह ? कौन जाने कब मिले इसकी दवा ? हो रही इन्सान की तलाशी इस तरह, क्यूँ न ख़ुश रहे सब लोग इस जहाँ में दूर हो हम सबकी उदासी इस तरह..!! - [लगा जब अक्स ए अबरू देखने दिलदार...](https://bazmeshayari.com/laga-jab-aks-e-abroo-dekhne/): लगा जब अक्स ए अबरू देखने दिलदार पानी में बहम हर मौज से चलने लगी तलवार पानी में, नहाना मत तू ऐ रश्क ए परी ज़िन्हार पानी में हबाब ऐसा न हो शीशा बने एक बार पानी में, सुना ऐ बहर ए ख़ूबी तेरी अठखेली से चलने की उड़ाई रफ़्ता रफ़्ता मौज ने रफ़्तार पानी में, झलक इस तेरे कफ़्श ए पुश्त ए माही की अगर देखे करे क़ालिब तही माही भी फिर लाचार पानी में, नहीं लख़्त ए जिगर ये चश्म में फिरते कि मर्दुम ने चराग़ अब कर के रौशन छोड़े हैं दो चार पानी में, लब ए - [मेरे ख़ुदा मुझे वो ताब ए नय नवाई दे](https://bazmeshayari.com/mere-khuda-mujhe-wo/): मेरे ख़ुदा मुझे वो ताब ए नय नवाई दे मैं चुप रहूँ भी तो नग़्मा मेरा सुनाई दे, गदा ए कू ए सुख़न और तुझ से क्या माँगे यही कि मम्लिकत ए शेर की ख़ुदाई दे, निगाह ए दहर में अहल ए कमाल हम भी हों जो लिख रहे हैं वो दुनिया अगर दिखाई दे, छलक न जाऊँ कहीं मैं वजूद से अपने हुनर दिया है तो फिर ज़र्फ़ ए किबरियाई दे, मुझे कमाल ए सुख़न से नवाज़ने वाले समाअतों को भी अब ज़ौक़ ए आश्नाई दे, नुमू पज़ीर है ये शोला ए नवा तो इसे हर आने वाले ज़माने - [किस के नाम लिखूँ जो अलम गुज़र रहे हैं](https://bazmeshayari.com/kis-ke-naam-likhoon-jo-alam/): किस के नाम लिखूँ जो अलम गुज़र रहे हैं मेरे शहर जल रहे हैं मेरे लोग मर रहे हैं, कोई ग़ुंचा हो कि गुल हो कोई शाख़ हो शजर हो वो हवा ए गुलिस्ताँ है कि सभी बिखर रहे हैं, कभी रहमतें थीं नाज़िल इसी ख़ित्ता ए ज़मीं पर वही ख़ित्ता ए ज़मीं है कि अज़ाब उतर रहे हैं, वही ताएरों के झुरमुट जो हवा में झूलते थे वो फ़ज़ा को देखते हैं तो अब आह भर रहे हैं, बड़ी आरज़ू थी हम को नए ख़्वाब देखने की सो अब अपनी ज़िंदगी में नए ख़्वाब भर रहे हैं, कोई और - [मैं कैसे जियूँ गर ये दुनिया हर आन...](https://bazmeshayari.com/main-kaise-jiyoon-gar-ye-duniya/): मैं कैसे जियूँ गर ये दुनिया हर आन नई तस्वीर न हो ये आते जाते रंग न हों और लफ़्ज़ों की तनवीर न हो, ऐ राह ए इश्क़ के राही सुन चल ऐसे सफ़र की लज़्ज़त में तेरी आँखों में नए ख़्वाब तो हों पर ख़्वाबों की ताबीर न हो, घर आऊँ या बाहर जाऊँ हर एक फ़ज़ा में मेरे लिए एक झूठी सच्ची चाहत हो रस्मों की कोई ज़ंजीर न हो, जैसे ये मेरी अपनी सूरत मेरे सामने हो और कहती हो मेरे शायर तेरे साथ हूँ मैं मायूस न हो दिलगीर न हो, कोई हो तो मोहब्बत ऐसी - [परिंदों के चोंच भर लेने से...](https://bazmeshayari.com/parindo-ke-chonch-bhar-lene-se/): परिंदों के चोंच भर लेने से कभी सागर सूखा नहीं करते, हवाओं के रुख सूखे पत्तो से अपना रास्ता पूछा नहीं करते, गुमान है जिन्हें कि वो बुझा देंगे फूकों से हमें, कोई बता दे उन्हें, कि ख़ुद के ख़ूँ से जलने वाले चिराग़ यूँ ही बुझा नहीं करते..!! - [क़िस्मत का लिखा मिटा नहीं सकते...](https://bazmeshayari.com/qismat-ka-likha-mita-nahi/): क़िस्मत का लिखा मिटा नहीं सकते अनहोनी को होनी बना नहीं सकते, ज़माने में हस्ब ए आरज़ू किसी को चाह तो सकते है मगर पा नहीं सकते, जो रखते है दिल के दरीचों को बंद वो ख़ुद किसी दिल में समा नहीं सकते, चाहे जितनी शिद्दत से तराश ले कोई किसी पत्थर को हीरा बना नहीं सकते, हकीक़त ये भी है कि इश्क़ और सुकूं कभी दिल में एक साथ समा नहीं सकते..!! - [वही आँगन वही खिड़की वही दर...](https://bazmeshayari.com/wahi-aangan-wahi-khidki/): वही आँगन वही खिड़की वही दर याद आता है अकेला जब भी होता हूँ मुझे घर याद आता है, मेरी बेसाख़्ता हिचकी मुझे खुल कर बताती है तेरे अपनों को गाँव में तो अक्सर याद आता है, जो अपने पास हों उन की कोई क़ीमत नहीं होती हमारे भाई को ही लो बिछड़ कर याद आता है, सफलता के सफ़र में तो कहाँ फ़ुर्सत कि कुछ सोचें मगर जब चोट लगती है मुक़द्दर याद आता है, मई और जून की गर्मी बदन से जब टपकती है नवम्बर याद आता है दिसम्बर याद आता है..!! ~आलोक श्रीवास्तव - [वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम ए ज़र...](https://bazmeshayari.com/vatan-ko-kuchh-nahi-khatra/): वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम ए ज़र है ख़तरे में हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर है ख़तरे में, जो बैठा है सफ़ ए मातम बिछाए मर्ग ए ज़ुल्मत पर वो नौहागर है ख़तरे में वो दानिश वर है ख़तरे में, अगर तशवीश लाहक़ है तो सुलतानों को लाहक़ है न तेरा घर है ख़तरे में न मेरा घर है ख़तरे में, जहाँ ‘इक़बाल’ भी नज़्र ए ख़त ए तनसीख़ हो ‘जालिब’ वहाँ तुझ को शिकायत है तेरा जौहर है ख़तरे में..!! ~हबीब जालिब - [न ज़रूरत है दवा की न दुआ की दोस्तों !](https://bazmeshayari.com/naa-zarurat-hai-dawa-ki/): न ज़रूरत है दवा की न दुआ की दोस्तों ! दिल की गहराई से ज्यादा दर्द के फोड़े गए, रहनुमाओं की साजिशें सबको दिखाई दे गई क़ाफ़िले जब बंद गलियों की तरफ़ मोड़े गए, एक अदद सूरज को अपने साथ लाने के लिए सारे लोग उस अंधेर नगरी की तरफ़ दौड़े गए, आज हर किरचे में अपनी शक्ल आती है नज़र जाने किस अंदाज़ से ये आईने तोड़े गए..!! - [दौर ए ज़दीद में गुनाह ओ सवाब बिकते है](https://bazmeshayari.com/daur-e-zadid-me-gunaah/): दौर ए ज़दीद में गुनाह ओ सवाब बिकते है वतन में अब जुबां, क़लम ज़नाब बिकते है, पहले मुफ़लिस ओ मज़बूर बिका करते थे आज कल हर सू इज्ज़त ए माअब बिकते है, बे ज़मीर ओ बेईमानो की गन्दी सियासत में अदल,मुंसिफ़ ए मुंसिफाँ के ख़िताब बिकते है, शैख़ ओ वाइज़, वज़ीर, ख़तीब ओ क़ातिब सहाफ़ी,शायर सब यहाँ पर ज़नाब बिकते है..!! ~नवाब ए हिन्द - [ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम](https://bazmeshayari.com/ye-aur-baat-door-rahe/): ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम बच कर चले हमेशा मगर क़ाफ़िलों से हम, होने को फिर शिकार नई उलझनों से हम मिलते हैं रोज़ अपने कई दोस्तों से हम, बरसों फ़रेब खाते रहे दूसरों से हम अपनी समझ में आए बड़ी मुश्किलों से हम, मंज़िल की है तलब तो हमें साथ ले चलो वाक़िफ़ हैं ख़ूब राह की बारीकियों से हम, जिन के परों से सुब्ह की ख़ुशबू के रंग हैं बचपन उधार लाए हैं उन तितलियों से हम, गुज़रे हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो पर्दे हटाए देखें उन्हें खिड़कियों से हम, अब तो हमारे - [ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं](https://bazmeshayari.com/ye-sochna-galat-hai-ki/): ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बेख़बर नहीं, अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया मैं आप का रहूँगा मगर उम्र भर नहीं, आ ही गए हैं ख़्वाब तो फिर जाएँगे कहाँ आँखों से आगे उन की कोई रहगुज़र नहीं, कितना जिएँ कहाँ से जिएँ और किस लिए ये इख़्तियार हम पे है तक़दीर पर नहीं, माज़ी की राख उलटीं तो चिंगारियाँ मिलीं बेशक किसी को चाहो मगर इस क़दर नहीं..!! ~आलोक श्रीवास्तव - [आ जाए वो मिलने तो मुझे ईद मुबारक](https://bazmeshayari.com/aa-jaaye-wo-milne-to-mujhe/): आ जाए वो मिलने तो मुझे ईद मुबारक मत आए ब हर हाल उसे ईद मुबारक, ऐसा हो सब इंसान हों ख़ुश इतने कि हर रोज़ एक दूसरे से कहता फिरे ईद ए मुबारक, हाँ मुझ से जिसे जिससे मुझे जो भी गिला हो आबाद रहे शाद रहे ईद ए मुबारक, तन्हाई सी तन्हाई कि दीवार भी शश्दर अब खुल के कहे या न कहे ईद ए मुबारक, सरगोशी ने पत्थर को सबक़ याद दिलाया पानी ने लिखा आईने पे ईद ए मुबारक, तुम जो मेरे शेरों के मुख़ातिब थे न होगे आख़िर में तुम्हें सिर्फ़ तुम्हे ईद मुबारक..!! ~इदरीस - [एक तारीख़ मुक़र्रर पे तो हर माह मिले](https://bazmeshayari.com/ek-tarikh-muqarrar-pe-to/): एक तारीख़ मुक़र्रर पे तो हर माह मिले जैसे दफ़्तर में किसी शख़्स को तनख़्वाह मिले, रंग उखड़ जाए तो ज़ाहिर हो प्लस्तर की नमी क़हक़हा खोद के देखो तो तुम्हें आह मिले, जमा थे रात मेरे घर तेरे ठुकराए हुए एक दरगाह पे सब रांदा ए दरगाह मिले, मैं तो एक आम सिपाही था हिफ़ाज़त के लिए शाहज़ादी ये तेरा हक़ था तुझे शाह मिले, एक उदासी के जज़ीरे पे हूँ अश्कों में घिरा मैं निकल जाऊँ अगर ख़ुश्क गुज़रगाह मिले, एक मुलाक़ात के टलने की ख़बर ऐसे लगी जैसे मज़दूर को हड़ताल की अफ़वाह मिले, घर पहुँचने की - [हर एक हज़ार में बस पाँच सात हैं...](https://bazmeshayari.com/har-ek-hazaar-me-bas/): हर एक हज़ार में बस पाँच सात हैं हम लोग निसाब ए इश्क़ पे वाजिब ज़कात हैं हम लोग, दबाओ में भी जमात कभी नहीं बदली शुरू दिन से मोहब्बत के साथ हैं हम लोग, जो सीखनी हो ज़बान ए सुकूत बिस्मिल्लाह ख़मोशियों की मुकम्मल लुग़ात हैं हम लोग, कहानियों के वो किरदार जो लिखे न गए ख़बर से हज़्फ़ शुदा वाक़िआत हैं हम लोग, ये इंतिज़ार हमें देख कर बनाया गया ज़ुहूर ए हिज्र से पहले की बात हैं हम लोग, किसी को रास्ता दे दें किसी को पानी न दें कहीं पे नील कहीं पर फ़ुरात हैं हम - [खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े](https://bazmeshayari.com/khel-dono-ka-chale-teen-ka/): खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े सीढ़ियाँ आती रहें साँप का ख़ाना न पड़े, देख मेमार परिंदे भी रहें घर भी बने नक़्शा ऐसा हो कोई पेड़ गिराना न पड़े, मेरे होंठों पे किसी लम्स की ख़्वाहिश है शदीद ऐसा कुछ कर मुझे सिगरेट को जलाना न पड़े, इस तअल्लुक़ से निकलने का कोई रास्ता दे इस पहाड़ी पे भी बारूद लगाना न पड़े, नम की तर्सील से आँखों की हरारत कम हो सर्दख़ानों में कोई ख़्वाब पुराना न पड़े, रब्त की ख़ैर है बस तेरी अना बच जाए इस तरह जा कि तुझे लौट के आना - [तू काश मिले मुझको अकेली तो बताऊँ](https://bazmeshayari.com/tu-kaash-mile-mujhko/): तू काश मिले मुझको अकेली तो बताऊँ सुलझे मेरी क़िस्मत की पहेली तो बताऊँ, आने से तेरे पहले ख़बर दे दी हवा ने आँखों पे मेरे रख तू हथेली तो बताऊँ, महके हैं तेरे जिस्म की ख़ुशबू से फ़ज़ाएँ नाराज़ न हों चम्पा चमेली तो बताऊँ, क्यों तेरे मुक़द्दर में नहीं मेरी मोहब्बत दिखलाए तू बेरंग हथेली तो बताऊँ, वीरानियाँ तन्हाइयाँ मौसम है ख़िज़ाँ का अनवार करो दिल की हवेली तो बताऊँ, चेहरे पे मेरे राज़ टटोला न करो तुम हमराज़ बने आँख नशीली तो बताऊँ, इज़हार ए मोहब्बत की तलब दिल में लिए हूँ तन्हा जो मिले तेरी सहेली - [रास्ते की धूल ने पैरों को ज़ख़्मी कर दिया](https://bazmeshayari.com/raaste-ki-dhool-ne-pairon-ko/): रास्ते की धूल ने पैरों को ज़ख़्मी कर दिया बहर से माही अलग करना मुझे आता नहीं, बैठ जाऊँ दो घड़ी आराम से यारो कहीं ज़िंदगी के दश्त में ऐसा कोई साया नहीं, ख़्वाब सा सुंदर बदन था बिस्तर ए कमख़ाब पर रात भर फिर भी मेरे दिल ने सुकूँ पाया नहीं, छा गई है ख़ामुशी की बर्फ़ मेरे ज़ेहन पर कल्पना के देश में सूरज कभी मरता नहीं, नर्म जिस्मों की ख़ुशी आँखों में भर कर रात को सब्ज़ा ए ख़ुद रौ पे ‘अख़्तर’ मैं कभी सोया नहीं..!! ~एहतिशाम अख्तर - [ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के साए में ज़िंदगी गुज़ारी है](https://bazmeshayari.com/zulf-o-rukh-ke-saaye-me/): ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के साए में ज़िंदगी गुज़ारी है धूप भी हमारी है छाँव भी हमारी है, ग़मगुसार चेहरों पर ए’तिबार मत करना शहर में सियासत के दोस्त भी शिकारी है, मोड़ लेने वाली है, ज़िंदगी कोई शायद अब के फिर हवाओं में एक बेक़रारी है, हाल ख़ूँ में डूबा है कल न जाने क्या होगा अब ये ख़ौफ ए मुस्तक़बिल ज़ेहन ज़ेहन तारी है, मेरे ही बुज़ुर्गों ने सर बुलंदियाँ बख़्शीं मेरे ही क़िबले पर मश्क़ ए संग बारी है, एक अजीब ठंडक है इसके नर्म लहजे में लफ़्ज़ लफ़्ज़ शबनम है बात बात प्यारी है, कुछ तो पाएँगे - [और सब भूल गए हर्फ़ ए सदाक़त लिखना](https://bazmeshayari.com/aur-sab-bhool-gaye/): और सब भूल गए हर्फ़ ए सदाक़त लिखना रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना, लाख कहते रहें ज़ुल्मत को न ज़ुल्मत लिखना हमने सीखा नहीं प्यारे ब इजाज़त लिखना, न सिले की न सताइश की तमन्ना हमको हक़ में लोगों के हमारी तो है आदत लिखना, हमने जो भूल के भी शह का क़सीदा न लिखा शायद आया इसी ख़ूबी की बदौलत लिखना, इससे बढ़ कर मेरी तहसीन भला क्या होगी पढ़ के ना ख़ुश हैं मेरा साहब ए सरवत लिखना, दहर के ग़म से हुआ रब्त तो हम भूल गए सर्व क़ामत को जवानी को क़यामत लिखना, कुछ - [अपनों ने वो रंज दिए हैं बेगाने याद आते हैं](https://bazmeshayari.com/apno-ne-wo-ranz-diye-hai/): अपनों ने वो रंज दिए हैं बेगाने याद आते हैं देख के उस बस्ती की हालत वीराने याद आते हैं, उस नगरी में क़दम क़दम पे सर को झुकाना पड़ता है उस नगरी में क़दम क़दम पर बुतख़ाने याद आते हैं, आँखें पुरनम हो जाती हैं ग़ुर्बत के सहराओं में जब उस रिमझिम की वादी के अफ़्साने याद आते हैं, ऐसे ऐसे दर्द मिले हैं नए दयारों में हमको बिछड़े हुए कुछ लोग पुराने याराने याद आते हैं, जिनके कारन आज हमारे हाल पे दुनिया हँसती है कितने ज़ालिम चेहरे जाने पहचाने याद आते हैं, यूँ न लुटी थी गलियों - [अफ़सोस तुम्हें कार के शीशे का हुआ है](https://bazmeshayari.com/afsos-tumhe-kaar-ke-shishe-ka/): अफ़सोस तुम्हें कार के शीशे का हुआ है परवाह नहीं एक माँ का जो दिल टूट गया है, होता है असर तुम पे कहाँ नाला ए ग़म का बरहम जो हुई बज़्म ए तरब इसका गिला है, फ़िरऔन भी नमरूद भी गुज़रे हैं जहाँ में रहता है यहाँ कौन यहाँ कौन रहा है, तुम ज़ुल्म कहाँ तक तह ए अफ़्लाक करोगे ये बात न भूलो कि हमारा भी ख़ुदा है, आज़ादी ए इंसान के वहीं फूल खिलेंगे जिस जा पे ज़हीर आज तेरा ख़ून गिरा है, ता चंद रहेगी ये शब ए ग़म की सियाही रस्ता कोई सूरज का कहीं - [आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह](https://bazmeshayari.com/aag-hai-faili-hui-kaali/): आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह बद दुआएँ हैं लबों पर अब दुआओं की जगह, इंतिख़ाब ए अहल ए गुलशन पर बहुत रोता है दिल देख कर ज़ाग़ ओ ज़ग़्न को ख़ुश नवाओं की जगह, कुछ भी होता पर न होते पारा पारा जिस्म ओ जाँ राहज़न होते अगर उन रहनुमाओं की जगह, लुट गई इस दौर में अहल ए क़लम की आबरू बिक रहे हैं अब सहाफ़ी बेश्याओ की जगह, कुछ तो आता हम को भी जाँ से गुज़रने का मज़ा ग़ैर होते काश जालिब आश्नाओं की जगह..!! ~हबीब जालिब - [ये किस रश्क ए मसीहा का मकाँ है](https://bazmeshayari.com/ye-kis-rashq-e-masiha-ka/): ये किस रश्क ए मसीहा का मकाँ है ज़मीं याँ की चहारुम आसमाँ है, ख़ुदा पिन्हाँ है आलम आश्कारा निहाँ है गंज वीराना अयाँ है, दिल ए रौशन है रौशनगर की मंज़िल ये आईना सिकंदर का मकाँ है, तकल्लुफ़ से बरी है हुस्न ए ज़ाती क़बा ए गुल में गुलबूटा कहाँ है, पसीजेगा कभी तो दिल किसी का हमेशा अपनी आहों का धुआँ है, ब रंग ए बू हूँ गुलशन में मैं बुलबुल बग़ल ग़ुंचे के मेरा आशियाँ है, शगुफ़्ता रहती है ख़ातिर हमेशा क़नाअ’त भी बहार ए बेख़िज़ाँ है, चमन की सैर पर होता है झगड़ा कमर मेरी है - [वतन नसीब कहाँ अपनी क़िस्मतें होंगी](https://bazmeshayari.com/vatan-nasib-kahan-apni/): वतन नसीब कहाँ अपनी क़िस्मतें होंगी जहाँ भी जाएँगे हम साथ हिजरतें होंगी, कभी तो साहिब ए दीवार ओ दर बनेंगे हम कभी तो सर पे हमारे नई छतें होंगी, ये अश्क तेरे मेरे राएगाँ न जाएँगे उन्हीं चराग़ों से रौशन मोहब्बतें होंगी, तेरी अदा में है इंकार भी इजाज़त भी जो हम मिलेंगे तो दूरी न क़ुर्बतें होंगी, अमल दुरुस्त करें अपने रहनुमाए किराम कहूँगा साफ़ तो सब को शिकायतें होंगी, हम उन के सामने सच बोलने के मुजरिम हैं हमीं पे वक़्त की सारी इनायतें होंगी, हमें तो अपने मसाइल का हल भी है दरकार तुम्हारे पास तो - [दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता...](https://bazmeshayari.com/dil-me-rakhta-hai-na/): दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे फिर भी एक शख्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे, रात का वक़्त है सूरज है मेरा राह नुमा देर से दूर से ये कौन बुलाता है मुझे, मेरी इन आँखों को ख़्वाबों से पशेमानी है नींद के नाम से जो हौल सा आता है मुझे, तेरा मुंकिर नहीं ऐ वक़्त मगर देखना है बिछड़े लोगों से कहाँ कैसे मिलाता है मुझे, क़िस्सा ए दर्द में ये बात कहाँ से आई मैं बहुत हँसता हूँ जब कोई सुनाता है मुझे..!! ~शहरयार - [हिज़्र के मौसम में ये बारिश का बरसना...](https://bazmeshayari.com/hizr-ke-mausam-me-ye-barish/): हिज़्र के मौसम में ये बारिश का बरसना कैसा ? एक सहरा में समन्दर का गुज़रना कैसा ? ऐ मेरे दिल न परेशां हो तन्हा हो कर वो तेरे साथ चला कब था, बिछड़ना कैसा ? लोग तो कहते है गुलशन की तबाही देखो मैं तो वीरान सा जंगल था, उजड़ना कैसा ? देखने में तो कोई दर्द नहीं दुःख भी नहीं फिर ये आँखों में अश्को का उभरना कैसा ? बेवफ़ा कहने की ज़ुर्रत भी न करना उन्हें उसने इक़रार किया कब था, मुकरना कैसा ? - [ज़ुल्फ़, अँगड़ाई, तबस्सुम, चाँद, आईना...](https://bazmeshayari.com/zulf-angdaai-tabassum-chaand/): ज़ुल्फ़, अँगड़ाई, तबस्सुम, चाँद, आईना, गुलाब भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इन सब का शबाब, पेट के भूगोल में उलझा हुआ है हर आदमी इस अहद में किसको फुरसत है पढ़े दिल की क़िताब, इस सदी की तिश्नगी का ज़ख़्म होंठों पर लिए बेयक़ीनी के सफ़र में ज़िंदगी है एक अज़ाब, डाल पर मज़हब की पैहम खिल रहे दंगों के फूल सभ्यता रजनीश के हम्माम में है बेनक़ाब, चार दिन फुटपाथ के साए में रहकर देखिए डूबना आसान है आँखों के सागर में जनाब..!! ~अदम गोंडवी - [तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है](https://bazmeshayari.com/teer-par-teer-lagaao/): तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है सीना किस का है मेरी जान जिगर किस का है, ख़ौफ़ ए मीज़ान ए क़यामत नहीं मुझको ऐ दोस्त तू अगर है मेरे पल्ले में तो डर किस का है, कोई आता है अदम से तो कोई जाता है सख़्त दोनों में ख़ुदा जाने सफ़र किस का है, छुप रहा है क़फ़स ए तन में जो हर ताइर ए दिल आँख खोले हुए शाहीन ए नज़र किस का है, नाम ए शाइर न सही शेर का मज़मून हो ख़ूब फल से मतलब हमें क्या काम शजर किस का है, सैद करने - [न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के...](https://bazmeshayari.com/naa-mahalon-ki-bulandi-se-2/): न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से, कि अब मर्क़ज़ में रोटी है, मुहब्बत हाशिए पर है उतर आई ग़ज़ल इस दौर में कोठी के ज़ीने से, अदब का आईना उन तंग गलियों से गुज़रता है जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से, बहार ए बेकिराँ में ता क़यामत का सफ़र ठहरा जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से, अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है सँजो कर रखे अज़दाद की विरासत को क़रीने से..!! ~अदम गोंडवी - [चाँद है ज़ेर ए क़दम सूरज खिलौना...](https://bazmeshayari.com/chaand-hai-zer-e-nazar/): चाँद है ज़ेर ए क़दम सूरज खिलौना हो गया हाँ, मगर इस दौर में क़िरदार बौना हो गया, शहर के दंगों में जब भी मुफलिसों के घर जले कोठियों की लॉन का मंज़र सलोना हो गया, ढो रहा है आदमी काँधे पे ख़ुद अपनी सलीब जिंदगी का फ़लसफ़ा जब बोझ ढोना हो गया, यूँ तो आदम के बदन पर भी था पत्तों का लिबास रूह उरियाँ क्या हुई मौसम घिनौना हो गया, अब किसी लैला को भी इक़रार ए महबूबी नहीं इस अहद में प्यार का सिंबल तिकोना हो गया..!! ~अदम गोंडवी - [क्यूँ पत्थर को दिल में बसाए बैठे हो ?](https://bazmeshayari.com/kyun-patthar-ko-dil-me/): क्यूँ पत्थर को दिल में बसाए बैठे हो ? वो अपना था ही नहीं जिसे अपना बनाए बैठे हो, दवा मौजूद है मगर ज़ख्मो को सजाए बैठे हो क्यूँ दर्द के चरागों से दिल को जलाए बैठे हो ? वो सदा ही तुम्हे नजर अंदाज करता रहता है जिसकी चौखट पे तुम नज़रे जमाए बैठे हो, क्यूँ किताब ए दिल के पन्नों में तस्वीर छुपाए बैठे हो क्यूँ यादों की गर्दिशों में ख़ुद को रुलाए बैठे हो ? क्यूँ मुहब्बत का रोग दिल को लगाए बैठे हो क्यूँ किताब ए माझी के पीछे एक नाम छुपाए बैठे हो ? क्यूँ - [धड़कन धड़कन यादों की बारात...](https://bazmeshayari.com/dhadkan-dhadkan-yaadon-ki/): धड़कन धड़कन यादों की बारात अकेला कमरा मैं और मेरे ज़ख़्मी एहसासात अकेला कमरा, गए दिनों की तस्वीरों के बुझते हुए नुक़ूश ताज़ा तर्क ए तअल्लुक़ के सदमात अकेला कमरा, दोश ए हवा पर उड़ने वाले ख़िज़ाँ के आख़िरी पत्ते अपनी अकेली जान ग़म ए हालात अकेला कमरा, आख़िरी शब के चाँद से करना बालकनी में बातें उस के शहर में होटल की ये रात अकेला कमरा, मेरी सिसकती आवाज़ों से गूँजती हैं दीवारें सुनता है दिन रात मरे नग़्मात अकेला कमरा, सब सामान बहम हैं ‘साजिद’ लिखने लिखाने के ख़ून ए जिगर और आँसू दिल की दवात अकेला कमरा..!! - [आज सीलिंग फैन से लटकी हुई है](https://bazmeshayari.com/aaj-sealing-fain-se-latki-hui-hai/): आज सीलिंग फैन से लटकी हुई है ये मुहब्बत किस कदर भटकी हुई है, गैरो के कंधो पर उठी है माँ की अर्थी भाइयो में इस क़दर खटकी हुई है, कौन गलती मान ले झुक जाए पहले बात तो इस बात पर अटकी हुई है, लाज़ सिर खोले खड़ी है देहरी पर आज फिर तौहीन घूँघट की हुई है, ऐ ख़ुशी तू साथ क्या देगी हमारा लहर कब कोई किसी तट की हुई है, जो सदी इंसानियत के नाम पर थी वो सदी मक्कार लम्पट की हुई है…!! - [ढूँढ़ते क्या हो इन आँखों में कहानी मेरी](https://bazmeshayari.com/dhoondhte-kya-ho-in-aankhon-me/): ढूँढ़ते क्या हो इन आँखों में कहानी मेरी ख़ुद में गुम रहना तो आदत है पुरानी मेरी, भीड़ में भी तुम्हें मिल जाऊँगा आसानी से खोया खोया हुआ रहना है निशानी मेरी, मैं ने एक बार कहा था कि बहुत प्यासा हूँ तब से मशहूर हुई तिश्ना दहानी मेरी, यही दीवार ओ दर ओ बाम थे मेरे हमराज़ इन्ही गलियों में भटकती थी जवानी मेरी, तू भी इस शहर का बासी है तो दिल से लग जा तुझ से वाबस्ता है एक याद पुरानी मेरी, कर्बला दश्त ए मोहब्बत को बना रक्खा है क्या ग़ज़ल गोई है क्या मर्सिया ख़्वानी - [भूख के एहसास को शेर ओ सुख़न...](https://bazmeshayari.com/bhookh-ke-ehsas-ko/): भूख के एहसास को शेर ओ सुख़न तक ले चलो या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो, जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ़ हो गई उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो, मुझको नज़्म ओ ज़ब्‍त की तालीम देना बाद में पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो, गंगाजल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है तिश्नगी को वोदका के आचरन तक ले चलो, ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो..!! ~अदम गोंडवी - [आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है जिंदगी](https://bazmeshayari.com/aap-kahte-hai-saraapa/): आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है जिंदगी हम ग़रीबों की नज़र में क़हर है जिंदगी, भुखमरी की धूप में कुम्हला गई अस्मत की बेल मौत के लम्हात से भी तल्ख़तर है जिंदगी, डाल पर मज़हब की पैहम खिल रहे दंगों के फूल ख़्वाब के साए में फिर भी बेख़बर है ज़िंदगी, रोशनी की लाश से अब तक जिना करते रहे ये वहम पाले हुए शम्स ओ क़मर है ज़िंदगी, दफ़्न होता है जहाँ आ कर नई पीढ़ी का प्यार शहर की गलियों का वो गंदा असर है ज़िंदगी..!! ~अदम गोंडवी - [हर शख्स को अल्लाह की रहमत नहीं...](https://bazmeshayari.com/har-shakhs-ko-allah-ki/): हर शख्स को अल्लाह की रहमत नहीं मिलती हाँ रिज्क तो मिल जाता है बरक़त नहीं मिलती, किस लिए तुम्हारी शमशीरे नियामों में पड़ी है बिना तलवार उठाये तो शुजाअत नहीं मिलती अब अपने ही अपनों के गले के काट रहे है दिलों में अब वो पहली सी मुहब्बत नहीं मिलती, रश्क़ ओ हसद ने इस क़दर किया हमें गाफ़िल भाई को भाई से मिलने की फ़ुर्सत नहीं मिलती..!! - [वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई...](https://bazmeshayari.com/wo-jiske-haath-me-chhale-hai/): वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है, इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है, कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है, रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है..!! ~अदम गोंडवी - [न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के...](https://bazmeshayari.com/naa-mahalon-ki-bulandi-se/): न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से, कि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है उतर आई ग़ज़ल इस दौर में कोठी के ज़ीने से, अदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से, बहार ए बेकिराँ में ताक़यामत का सफ़र ठहरा जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से, अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है सँजो कर रक्खें धूमिल की विरासत को क़रीने से..!! ~अदम गोंडवी - [बज़ाहिर प्यार की दुनियाँ में जो नाकाम...](https://bazmeshayari.com/bazaahir-pyar-ki-duniyan-me/): बज़ाहिर प्यार की दुनियाँ में जो नाकाम होता है कोई रूसो कोई हिटलर कोई खय्याम होता है, ज़हर देते हैं उसको हम कि ले जाते हैं सूली पर यही हर दौर के मंसूर का अंजाम होता है, जुनून ए शौक में बेशक लिपटने को लिपट जाएँ हवाओं में कहीं महबूब का पैगाम होता है, सियासी बज़्म में अक्सर ज़ुलेखा के इशारों पर हकीकत ये है कि युसुफ आज भी नीलाम होता है..!! ~अदम गोंडवी - [मुझे हयात के साँचों में ढालने वाले...](https://bazmeshayari.com/mujhe-hayat-ke-saancho-me/): मुझे हयात के साँचों में ढालने वाले कहाँ गए वो समुंदर खंगालने वाले, लुढ़क रहा हूँ ढलानों से प्यार के मैं तो न आएँ राह में मुझको सँभालने वाले, हमारे शौक़ ए फ़रावाँ ने डस लिया हमको कि आस्तीं में थे हम साँप पालने वाले, हवा में फेंक न मुझ को समझ के खेल कोई तुझी को आ के लगूँगा उछालने वाले, ज़रा सा काम हूँ मैं फिर भी नामुकम्मल हूँ यहाँ मिले हैं सभी मुझ को टालने वाले, कुआँ हवस का था गहरा कुछ इस क़दर अख़्तर कि ख़ुद ही गिर गए मुझ को निकालने वाले..!! ~एहतिशाम अख्तर - [सितमगरों के सितम की उड़ान कुछ...](https://bazmeshayari.com/sitamgaro-ke-sitam-ki-udaan/): सितमगरों के सितम की उड़ान कुछ कम है अभी ज़मीं के लिए आसमान कुछ कम है, जो इस ख़याल को भूले तो मारे जाओगे कि अपनी सम्त क़यामत का ध्यान कुछ कम है, हमारे शहर में सब ख़ैर ओ आफ़ियत है मगर यही कमी है कि अम्न ओ अमान कुछ कम है, बना रहा है फ़लक भी अज़ाब मेरे लिए तेरी ज़मीन पे क्या इम्तिहान कुछ कम है ? अभी शुमार के क़ाबिल हैं ज़ख़्म ए दिल मेरे अभी वो दुश्मन ए जाँ मेहरबान कुछ कम है, इधर तो दर्द का प्याला छलकने वाला है मगर वो कहते हैं ये - [कोई बचने का नहीं सब का पता जानती है](https://bazmeshayari.com/koi-bachne-ka-nahi-sab-ka/): कोई बचने का नहीं सब का पता जानती है किस तरफ़ आग लगाना है हवा जानती है, उजले कपड़ों में रहो या कि नक़ाबें डालो तुम को हर रंग में ये ख़ल्क़ ए ख़ुदा जानती है, रोक पाएगी न ज़ंजीर न दीवार कोई अपनी मंज़िल का पता आह ए रसा जानती है, टूट जाऊँगा बिखर जाऊँगा हारूँगा नहीं मेरी हिम्मत को ज़माने की हवा जानती है, आप सच बोल रहे हैं तो पशेमाँ क्यूँ हैं ? ये वो दुनिया है जो अच्छों को बुरा जानती है, आँधियाँ ज़ोर दिखाएँ भी तो क्या होता है गुल खिलाने का हुनर बाद ए - [हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत...](https://bazmeshayari.com/hindu-ya-muslim-ke-ahsas/): हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेड़िए, हम में कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए, ग़लतियाँ बाबर की थी, जुम्‍मन का घर फिर क्‍यों जले ? ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए, हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए, छेड़िए एक जंग, मिल जुल कर गरीबी के खिलाफ़ साहब ऐसे वक़्त में मजहबी नग़मात को मत छेड़िए..!! ~अदम गोंडवी - [नूर ए नज़र, चाँद, और आफ़ताब है बच्चे](https://bazmeshayari.com/noor-e-nazar-chaand-aur/): नूर ए नज़र, चाँद, और आफ़ताब है बच्चे रौशन चेहरे लिए खुली क़िताब है बच्चे, स्कूल की यूनिफार्म में सज कर निकलते है तो ऐसा लगता है खिलता गुलाब है बच्चे, गंगा, जमुना,सतलज सरीखे कितने नायाब है सच कहूँ तो रावी, झेलम, चिनाब है बच्चे, अपनी मासूमियत और मस्ती की राजधानी में फ़रेब से दूर मन मर्ज़ी के नबाब है बच्चे, छोटी छोटी खुशियाँ पर जब ये खिलखिलाते है ऐसा लगता है मधुर धुन ए रबाब है बच्चे, नफरती दुनियाँ में किस किस ने फ़रिश्ते देखे है ? कितना सही और उम्दा जवाब है बच्चे..!! - [ज़ुल्म के तल्ख़ अंधेरो के तलबगार हो तुम](https://bazmeshayari.com/zulm-ke-talkh-andhero-ke/): ज़ुल्म के तल्ख़ अंधेरो के तलबगार हो तुम ये इल्म है कि नफ़रत के मददगार हो तुम, जिसके हर लफ्ज़ में एक मौत नज़र आती है दौर ए ज़दीद में खूँखार सा अख़बार हो तुम, घर घर में ज़राइम को पनाह दिया है तुम ने फक़त मेरे नहीं वतन के भी गुनाहगार हो तुम, आज मैं कहता हूँ कल ये दुनियाँ भी कहेगी लालच ओ हसद की गुलामी से बेज़ार हो तुम, ~नवाब ए हिन्द - [मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ...](https://bazmeshayari.com/main-jise-odhta-bichhata-hoon/): मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ, एक जंगल है तेरी आंखों में मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ, तू किसी रेल सी गुज़रती है मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ, हर तरफ़ ऐतराज़ होता है मैं अगर रौशनी में आता हूँ, एक बाज़ू उखड़ गया जबसे और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ, मैं तुझे भूलने की कोशिश में आज कितने क़रीब पाता हूँ, कौन ये फ़ासला निभाएगा मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूं..!! ~दुष्यंत कुमार - [कुछ देर का है रोना, कुछ देर की हँसी है](https://bazmeshayari.com/kuch-der-ka-hai-rona-kuch/): कुछ देर का है रोना, कुछ देर की हँसी है कहीं ठहरती नहीं इसी का नाम ज़िन्दगी है, कुछ देर का है मिलना, कुछ देर का बिछड़ना कुछ पल की धूप है तो कुछ पल की चाँदनी है, कहीं जान हो ज़रूरी तो क्यूँ वक़्त से न पहुंचे ? जो काम है हमारे वही तो असली बंदगी है, इन्सान को ये चाहिए हर पल को खुल के जिए जो भी ख़ुदा ने बख्शा समझो कि मेहर की है, मुझे इस ज़िन्दगी से कोई शिकवा गिला नहीं है मुझे भी मिला था मौका, मैंने ही देर की है..!! - [पा सके न सुकूं जो जीते जी वो मर के...](https://bazmeshayari.com/paa-saken-n-sukun-jo/): पा सके न सुकूं जो जीते जी वो मर के कहाँ पाएँगे शहर के बेचैन परिंदे फिर लौट के शहर में आएँगे, ज़न्नत का दावा और खौफ़ ए ज़हन्नुम ये सब बातें है जिसको जो पाना खोना है यही पाएँगे यहीं लुटाएँगे, हर साज़िश ए सियासी ऐश ए दुनियाँ की खातिर है इंसानियत का तकाज़ा फक़त इन्सान की खातिर है, इस दश्त ए जहाँ का आज ये कैसा कायदा क़ानून है क़ैद हो चुके है नेक सलाखों में हत्यारे मुल्क बचाएँगे..!! - [नहीं होती अगर बारिश तो पत्थर हो...](https://bazmeshayari.com/nahi-hoti-agar-barish-to/): नहीं होती अगर बारिश तो पत्थर हो गए होते ये सारे लहलहाते खेत बंज़र हो गए होते, तेरे दामन ने सरे शहर हो सैलाब से रोका नहीं तो मेरे ये आँसू समंदर हो गए होते, तुम्हे अहल ए सियासत ने कहीं का भी नहीं रखा हमारे साथ रहते तो सुखनवर हो गए होते, अगर आदाब कर लेते तो मसनद मिल गई होती अगर लहज़ा बदल लेते गवर्नर हो गए होते..!! ~मुनव्वर राना - [सहर ने अंधी गली की तरफ़ नहीं देखा](https://bazmeshayari.com/sahar-ne-andhi-gali-ki-taraf/): सहर ने अंधी गली की तरफ़ नहीं देखा जिसे तलब थी उसी की तरफ़ नहीं देखा, क़लक़ था सब को समुंदर की बेक़रारी का किसी ने मुड़ के नदी की तरफ़ नहीं देखा, कचोके के देती रहीं ग़ुर्बतें मुझे लेकिन मेरी अना ने किसी की तरफ़ नहीं देखा, सफ़र के बीच ये कैसा बदल गया मौसम कि फिर किसी ने किसी की तरफ़ नहीं देखा, तमाम उम्र गुज़ारी ख़याल में जिस के तमाम उम्र उसी की तरफ़ नहीं देखा, यज़ीदियत का अंधेरा था सारे कूफ़े में किसी ने सिब्त ए नबी की तरफ़ नहीं देखा, जो आईने से मिला आईने - [ये जो पल है ये पिछले पल से भी भारी है](https://bazmeshayari.com/ye-jo-pal-hai-ye-pichle-pal-se/): ये जो पल है ये पिछले पल से भी भारी है हमसे पूछो हमने ज़िन्दगी कैसे गुज़ारी है, ये दुनियाँ आज तक कौन जीत सका है ? ये जिसने भी जीती है उसने भी हारी है, इधर उनकी वो यादें अब भी ताज़ा है उधर उनकी बातों में अब दुनियादारी है, जो दगा देने में बहुत ज्यादा माहिर है दिल्ली पे उसी की मजबूत दावेदारी है, जहाँ अश्क कहकहे ज़ख्म कई मौसम मिले समझ लेना बस वही रुदाद हमारी है..!! ~दर्पन कानपुरी - [हमारे दिल पे जो ज़ख़्मों का बाब लिखा है](https://bazmeshayari.com/hamare-dil-pe-jo-zakhmo-ka/): हमारे दिल पे जो ज़ख़्मों का बाब लिखा है इसी में वक़्त का सारा हिसाब लिखा है, कुछ और काम तो हम से न हो सका लेकिन तुम्हारे हिज्र का एक एक अज़ाब लिखा है, सुलूक नश्तरों जैसा न कीजिए हम से हमेशा आप को हम ने गुलाब लिखा है, तेरे वजूद को महसूस उम्र भर होगा तेरे लबों पे जो हम ने जवाब लिखा है, हुआ फ़साद तो इस में नहीं किसी का क़ुसूर हवा ए शहर ने मौसम ख़राब लिखा है, अगर यक़ीन नहीं तो उठाइए तारीख़ हमारा नाम ब सद आब ओ ताब लिखा है..!! ~मंज़र भोपाली - [एक मकाँ और बुलंदी पे बनाने न दिया](https://bazmeshayari.com/ek-maqaan-aur-bulandi-pe/): एक मकाँ और बुलंदी पे बनाने न दिया हमको परवाज़ का मौक़ा ही हवा ने न दिया, तू ख़ुदा बन के मिटाएगा हमें ही एक दिन सर तेरे दर पे इसी डर ने झुकाने न दिया, मुत्तहिद होने का जज़्बा था सभी में लेकिन मुत्तहिद होने का मौक़ा ही हवा ने न दिया, तुम पे छा जाते शजर बनते जो नन्हे पौधे तुम ने अच्छा ही किया पाँव जमाने न दिया, वो तो आमादा था बंदों की शिकायत सुन कर कुछ फ़रिश्तों ने ज़मीं पर उसे आने न दिया, आप डरते हैं कि खुल जाए न असली चेहरा इस लिए - [आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई](https://bazmeshayari.com/aankhe-bhar-aai-kisi-se-jo/): आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई ख़ुश्क मौसम था मगर टूट के बरसात हुई, दिन भी डूबा कि नहीं ये मुझे मालूम नहीं जिस जगह बुझ गए आँखों के दिए रात हुई, कोई हसरत कोई अरमाँ कोई ख़्वाहिश ही न थी ऐसे आलम में मेरी ख़ुद से मुलाक़ात हुई, हो गया अपने पड़ोसी का पड़ोसी दुश्मन आदमिय्यत भी यहाँ नज़्र ए फ़सादात हुई, इसी होनी को तो क़िस्मत का लिखा कहते हैं जीतने का जहाँ मौक़ा था वहीं मात हुई, इस तरह गुज़रा है बचपन कि खिलौने न मिले और जवानी में बुढ़ापे से मुलाक़ात हुई..!! ~मंज़र भोपाली - [मैंने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है](https://bazmeshayari.com/maine-ae-dil-tujhe-sine-se/): मैंने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है और तू है कि मेरी जान को आया हुआ है, बस इसी बोझ से दोहरी हुई जाती है कमर ज़िंदगी का जो ये एहसान उठाया हुआ है, क्या हुआ गर नहीं बादल ये बरसने वाला ये भी कुछ कम तो नहीं है जो ये आया हुआ है, राह चलती हुई इस राहगुज़र पर अजमल हम समझते हैं क़दम हमने जमाया हुआ है, हम ये समझे थे कि हम भूल गए हैं उसको आज बे तरह हमें याद जो आया हुआ है, वो किसी रोज़ हवाओं की तरह आएगा राह में जिस - [शाम अपनी बेमज़ा जाती है रोज़...](https://bazmeshayari.com/shaam-apni-bemaza-jaati-hai/): शाम अपनी बेमज़ा जाती है रोज़ और सितम ये है कि आ जाती है रोज़, कोई दिन आसाँ नहीं जाता मेरा कोई मुश्किल आज़मा जाती है रोज़, मुझ से पूछे कोई क्या है ज़िंदगी मेरे सर से ये बला जाती है रोज़, जाने किस की सुर्ख़रूई के लिए ख़ूँ में ये धरती नहा जाती है रोज़, गीत गाते हैं परिंदे सुब्ह ओ शाम या समाअ’त चहचहा जाती है रोज़, देखने वालों को ‘अजमल’ ज़िंदगी रंग कितने ही दिखा जाती है रोज़..!! ~अजमल सिराज - [सुनी है चाप बहुत वक़्त के गुज़रने की](https://bazmeshayari.com/suni-hai-chaap-bahut-waqt-ke/): सुनी है चाप बहुत वक़्त के गुज़रने की मगर ये ज़ख़्म कि हसरत है जिसके भरने की, हमारे सर पे तो ये आसमान टूट पड़ा घड़ी जब आई सितारों से माँग भरने की, गिरह में दाम तो रखते हैं ज़हर खाने को ये और बात कि फ़ुर्सत नहीं है मरने की, बहुत मलाल है तुझ को न देख पाने का बहुत ख़ुशी है तेरी राह से गुज़रने की, बताओ तुम से कहाँ राब्ता किया जाए कभी जो तुम से ज़रूरत हो बात करने की..!! ~अजमल सिराज - [अकेले रहने की सजा कबूल कर गलती...](https://bazmeshayari.com/akele-rahne-ki-saza-qubul/): अकेले रहने की सजा कबूल कर गलती तुमने की है मुझ पर यूँ ऐतबार न करने में भी तुमने ही भूल की है, कभी ये भी एहसास हुआ ख्याल ओ ख्वाबों में तुझे भूल जाएंगे तेरी जिद में ज़िन्दगी हमने फिजूल की है, न जाने कौन सा लम्हा तेरे लिए करार ए सबब होगा बस वही सबब समझने में हमने बार बार भूल की है, हमें भरोसा था कि एक दिन वापस लौट के आ जाएगा ज़िन्दगी की किताब में हमने तेरी तस्वीर कबूल की है, कई दिनों तक अपनी आँखे खुली रखी तेरे इंतजार में मेरा दिल कह रहा - [ख़्वाब दिखाने वाले से होशियार रहो](https://bazmeshayari.com/khwab-dikhane-wale-se/): ख़्वाब दिखाने वाले से होशियार रहो जादूगर की चालो से होशियार रहो, गाफ़िल ज़रा हुए तो सर कट जाएगा लकड़ी की इन ढालो से होशियार रहो, जाने कब ये ऊँगली काट के ले जाएँ हाथ मिलाने वालो से होशियार रहो, आज़ादी के पंख जकड़ने वाली है इस मकड़ी के जालो से होशियार रहो..!! ~मंज़र भोपाली - [मुझको अपने बैंक की क़िताब दीजिए](https://bazmeshayari.com/mujhe-apne-bank-ki-kitab/): मुझको अपने बैंक की क़िताब दीजिए देश की तबाही का हिसाब दीजिए, गाँव गाँव ज़ख़्मी फिजाएँ हो गई ज़हरीली घर की हवाएँ हो गई, महँगी शराब से दवाएँ हो गई जाइए आवाम को जवाब दीजिए देश की तबाही का हिसाब दीजिए, लोग जो ग़रीब थे हक़ीर हो गए आप तो ग़रीब से अमीर हो गए यानि हुज़ूर बेज़मीर हो गए ख़ुद को बेज़मीरी का ख़िताब दीजिए देश की तबाही का हिसाब दीजिए, जेब है आवाम की सफाई कीजिए लूट के गरीबो की भलाई कीजिए कुछ तो निगाहों को हिजाब दीजिए देश की तबाही का हिसाब दीजिए, कैसी कैसी देखो योजनायें - [जिसे हो ख्वाहिश ए दुनियाँ उसे...](https://bazmeshayari.com/jise-ho-khwahish-e-duniyan/): जिसे हो ख्वाहिश ए दुनियाँ उसे संसार मिल जाए मुझे तो फक़त तुम और तुम्हारा प्यार मिल जाए, तुम्हारे नाम मैं लिख दूँ चाँद, सितारा और सूरज मुझे नसीब लिखने का अगर अधिकार मिल जाए, मुझे कोयल नहीं भाये, मुझे बुलबुल नहीं भाये तुम्हारे बोल सुनने को अगर एक बार मिल जाए, ना कश्ती की, न साहिल की हो मुझे ख्वाहिश तुम्हारे प्यार की गहरी गर मुझे मंझधार मिल जाए, ना जीने की, ना मरने की फ़िक्र बाक़ी रहे कोई तुम्हारे चाँद सी सूरत का अगर दीदार मिल जाए..!! - [सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको](https://bazmeshayari.com/saari-basti-me-ye-jaadoo/): सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको, सदियों का रत जगा मेरी रातों में आ गया मैं एक हसीन शख़्स की बातों में आ गया, जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए, गुस्ताख हवाओं की शिकायत न किया कर उड़ जाए दुपट्टा तो खनक ओढ़ लिया कर, तुम पूछो और में न बताउ ऐसे तो हालात नहीं एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं, रात के सन्नाटे में हमने क्या क्या धोखे खाए हैं अपना ही जब दिल - [दुनियाँ बदल गई है, ज़माना बदल गया है](https://bazmeshayari.com/duniyan-badal-gai-hai/): दुनियाँ बदल गई है, ज़माना बदल गया है यहाँ जीने का अंदाज़ पुराना बदल गया है, दोस्त अहबाब सारे ख़ुद गर्ज़ बने है जब से वक़्त के साथ साथ ही याराना बदल गया है, दौर में ज़दीद में खून के रिश्ते पानी हो रहे है हर एक रिश्ता ख़ुद से ही बेगाना हो गया है, फिर ये न कहना कि लैला तंग थी मजनू से एक गलत फ़हमी है सब बयाना बदल गया है, जब इश्क़ वही है तो आशिक़ न हो क्यूँ कर सुन बे अक्ल के अंधे अब ज़माना बदल गया है, हर एक दिल हुस्न के आगे - [अब दावत पे भी बारात पे भी टैक्स लगेगा](https://bazmeshayari.com/ab-dawat-pe-bhi-baarat-pe-bhi/): अब दावत पे भी बारात पे भी टैक्स लगेगा अब शादी की रसुमात पे भी टैक्स लगेगा, अब यार की मुलाक़ात पे भी टैक्स लगेगा अब इज़हार की हर बात पे भी टैक्स लगेगा, अहसान ज़रा सोच के तुम करना किसी पे अब बे लौस इनायात पे भी टैक्स लगेगा, अब अपने असासे कभी ज़ाहिर नहीं करना अब इन तोहफ़े मराआत पे भी टैक्स लगेगा, मस्ज़िद का तक़द्दुस भी नहीं अब रहेगा वो अब सभी फर्ज़ इबादात पे भी टैक्स लगेगा, बातें करेगा गैर मुनासिब जो भी यहाँ पर उसकी हर एक सवालात पे भी टैक्स लगेगा, अब इश्क़ मुहब्बत - [गूँगे लफ़्ज़ों का ये बेसम्त सफ़र मेरा है](https://bazmeshayari.com/gunge-lafzon-ka-ye-besamt/): गूँगे लफ़्ज़ों का ये बेसम्त सफ़र मेरा है गुफ़्तुगू उसकी है लहजे में असर मेरा है, मैं ने खोए हैं यहाँ अपने सुनहरे शब ओ रोज़ दर ओ दीवार किसी के हों ये घर मेरा है, मेरा अस्लाफ़ से रिश्ता तो न तोड़ ऐ दुनिया सब महल तेरे हैं लेकिन ये खंडहर मेरा है, आती जाती हुई फ़सलों का मुहाफ़िज़ हूँ मैं फल तो सब उस की अमानत हैं शजर मेरा है, मेरे आँगन के मुक़द्दर में अँधेरा ही सही एक चराग़ अब भी सर ए राहगुज़र मेरा है, दूर तक दार ओ रसन दार ओ रसन दार ओ रसन - [भीड़ में कोई शनासा भी नहीं छोड़ती है](https://bazmeshayari.com/bhid-me-koi-shanasa-bhi-nahi/): भीड़ में कोई शनासा भी नहीं छोड़ती है ज़िंदगी मुझको अकेला भी नहीं छोड़ती है, आफ़ियत का कोई गोशा भी नहीं छोड़ती है और दुनिया मेरा रस्ता भी नहीं छोड़ती है, मुझको रुस्वा भी बहुत करती है शोहरत की हवस और शोहरत मेरा पीछा भी नहीं छोड़ती है, हम को दो घूँट की ख़ैरात ही दे दो वर्ना प्यास पागल हो तो दरिया भी नहीं छोड़ती है, आबरू के लिए रोती है बहुत पिछले पहर एक औरत कि जो पेशा भी नहीं छोड़ती है, डूबने वाले के हाथों में ये पागल दुनिया एक टूटा हुआ तिनका भी नहीं छोड़ती है, - [इंसान को वक़्त के हिसाब से चलना पड़ता है](https://bazmeshayari.com/insan-ko-waqt-ke/): इंसान को वक़्त के हिसाब से चलना पड़ता है बाद ठोकर ही सही आख़िर संभलना पड़ता है, हमदर्द बने अपने जब औक़ात बताने लगते है उम्मीदों के झूठे ख़्वाबों से निकलना पड़ता है, जब ईमां ओ ज़मीर का सौदा आम हो जाता है नुकसान हक़ बोलने वालों को उठाना पड़ता है…!! - [सरहदों पर है अपने जवानों का गम](https://bazmeshayari.com/sarhadon-par-hai-apne/): सरहदों पर है अपने जवानों का गम और बस्ती में जलते मकानों का गम, फिर से ये गंदी सियासत हवा दे गई हमने देखा है जलती दुकानों का गम, बस्तियाँ जल गई,कारवां भी लूट गए और वो रह गए सुनाते बेगानों का गम, देखले कोई मज़लूमों का दिल चीर कर इस ज़मीं को तो है आसमानों का गम…!! - [जिस तरह चढ़ता है उसी तरह उतरता है](https://bazmeshayari.com/jis-tarah-chadhta-hai/): जिस तरह चढ़ता है उसी तरह उतरता है चोटियों पर सदा के लिए कौन ठहरता है ? बहुत गुरूर न कर अपने आप पर ऐ नादां मिट्टी का खिलौना है टूट कर बिखरता है, हर हाल में ख़ुश रहता हूँ बस ये सोच कर वक़्त चाहे जैसा भी हो एक रोज़ गुजरता है, खौफ़ नहीं मुझको दरिया की गहराई से जिसमे डूबने का हुनर हो वो ही उभरता है, हालात से लड़ता रहूँगा मैं तब तक तन्हा ही जब तक बिगड़ा मुक़द्दर नहीं सँवरता है…!! - [दुख और तरह के हैं दुआ और तरह की](https://bazmeshayari.com/dukh-aur-tarah-ke-hai/): दुख और तरह के हैं दुआ और तरह की और दामन ए क़ातिल की हवा और तरह की, दीवार पे लिखी हुई तहरीर है कुछ और देती है ख़बर ख़ल्क़ ए ख़ुदा और तरह की, किस दाम उठाएँगे ख़रीदार कि इस बार बाज़ार में है जिंस ए वफ़ा और तरह की, बस और कोई दिन कि ज़रा वक़्त ठहर जाए सहराओं से आएगी सदा और तरह की, हम कू ए मलामत से निकल आए तो हमको रास आई न फिर आब ओ हवा और तरह की…!! ~इफ़्तिख़ार आरिफ़ - [ऐ वक़्त ज़रा थम जा ये कैसी रवानी है](https://bazmeshayari.com/ae-waqt-zara-tham-jaa/): ऐ वक़्त ज़रा थम जा ये कैसी रवानी है आँखों में अभी बाक़ी एक ख्वाब ए जवानी है, क्या क़िस्सा सुनाएँ हम उस उम्र ए गुरेज़ा का फुर्सत है बहुत थोड़ी और लम्बी कहानी है, एक राज़ है सीने में रखा नहीं जाता अब आ कर कभी सुन जाओ एक बात पुरानी है, सच्चे थे तेरे वायदे सच्चे है बहाने भी बस हमको शिकायत की आदत ही पुरानी है, जो कुछ भी कहा तुमने तुमको ही ख़बर होगी हमने तो सुना जो कुछ दुनिया की जुबानी है, गुज़री जो बिना तेरे उस उम्र का अफ़साना होंठों की ख़ामोशी है आँखों - [दिल भी बुझा हो शाम की परछाइयाँ भी हों](https://bazmeshayari.com/dil-bhi-bujha-ho/): दिल भी बुझा हो शाम की परछाइयाँ भी हों मर जाइये जो ऐसे में तन्हाइयाँ भी हों, आँखों की सुर्ख़ लहर है मौज ए सुपरदगी ये क्या ज़रूर है कि अब अंगड़ाइयाँ भी हों, हर हुस्न ए सादा लौ न दिल में उतर सका कुछ तो मिज़ाज ए यार में गहराइयाँ भी हों, दुनिया के तज़किरे तो तबियत ही ले बुझे बात उस की हो तो फिर सुख़न आराइयाँ भी हों, पहले पहल का इश्क़ अभी याद है फ़राज़ दिल ख़ुद ये चाहता है के रुस्वाइयाँ भी हों…!! ~अहमद फराज़ - [उनसे मिलिए जो यहाँ फेर बदल वाले है](https://bazmeshayari.com/unse-miliye-jo-yahan-2/): उनसे मिलिए जो यहाँ फेर बदल वाले है हमसे मत बोलिए हम लोग गज़ल वाले है, कैसे शफ़्फ़ाफ लिबासों में नज़र आते है कौन मानेगा कि ये सब वही कल वाले है, लूटने वाले उसे क़त्ल न करते लेकिन उसने पहचान लिया था कि बगल वाले है, अब तो मिलजुल के परिंदों को रहना होगा जितने तालाब है सब नील कमल वाले है, यूँ भी फ़ूस के छप्पर की हक़ीक़त क्या थी अब उन्हे ख़तरा है जो लोग महल वाले है, बे कफ़न लाशों के अम्बार लगे है लेकिन फ़ख्र से कहते है वो हम ताजमहल वाले है…!! - [नज़र फ़रेब ए क़ज़ा खा गई तो क्या होगा](https://bazmeshayari.com/nazar-fareb-e-qaza-khaa/): नज़र फ़रेब ए क़ज़ा खा गई तो क्या होगा हयात मौत से टकरा गई तो क्या होगा ? ब ज़ोम ए होश तजल्ली की जुस्तुजू बे सूद जुनूँ की ज़द पे ख़िरद आ गई तो क्या होगा ? नई सहर के बहुत लोग मुंतज़िर हैं मगर नई सहर भी जो कजला गई तो क्या होगा ? न रहनुमाओं की मजलिस में ले चलो मुझको मैं बेअदब हूँ गर हँसी आ गई तो क्या होगा ? शबाब ए लाला ओ गुल को पुकारने वालो ख़िज़ाँ सरिश्त बहार आ गई तो क्या होगा ? ख़ुशी छनी है तो ग़म का भी एतिमाद - [चाँद पर बस्तियाँ तो बसा लोगे...](https://bazmeshayari.com/chaand-par-bastiyan-to/): चाँद पर बस्तियाँ तो बसा लोगे मगर चाँदनी कहाँ से लाओगे ? सलब कर लीं समाअतें सबकी किस को अब दास्ताँ सुनाओगे ? छीन ली है शहर भर की गोयाई फिर अब सदाएं कहाँ से पाओगे ? सब की आँखें निकाल दी तुमने अब ये आँखें किसे दिखाओगे ? हर सू बोये नफ़रतों के कीकर तो फिर गुलाब कहाँ से पाओगे ? बे तहाशा ख़ुदा तो बन बैठें हैं सोचो इतने सज़्दे कहाँ से लाओगे ?? - [धड़कते साँस लेते रुकते चलते मैंने देखा है](https://bazmeshayari.com/dhadkate-saans-lete-rukte/): धड़कते साँस लेते रुकते चलते मैंने देखा है कोई तो है जिसे अपने मे पलते मैंने देखा है, तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों मे ख़्वाब रौशन है तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढलते मैंने देखा है, न जाने कौन है जो ख़्वाब में आवाज़ देता है ख़ुद अपने आप को नींदो में चलते मैंने देखा है, मेरी खामोशियों में तैरती हैं तेरी ही आवाज़े तेरे सीने मे अपना दिल मचलते मैंने देखा है, बदल जाएगा सब कुछ बादलों से धूप चटखेगी बुझी आँखों में कोई ख़्वाब जलते मैंने देखा है, मुझे मालूम है उनकी दुआएँ साथ चलती है सफ़र की - [आज ज़रा फुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया](https://bazmeshayari.com/aaj-zara-fursat-paai-thi/): आज ज़रा फुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया बंद गली के आख़िरी घर को आज फिर आबाद किया, खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया, बड़े बड़े गम खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में छोटी छोटी खुशियों से ही हमने दिल को शाद किया, बात बहुत मामूली सी थी उलझ गई तकरारों में एक ज़रा सी ज़िद्द ने आख़िर दोनों को बर्बाद किया, दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया…!! ~निदा फ़ाज़ली - [दुख दर्द के मारों से मेरा ज़िक्र न करना](https://bazmeshayari.com/dukh-dard-ke-maaron-se/): दुख दर्द के मारों से मेरा ज़िक्र न करना घर जाऊँ तो यारों से मेरा ज़िक्र न करना, वो मेरी कहानी को गलत रंग न दे दें अफ़साना निगारों से मेरा ज़िक्र न करना, शायद वो मेरे हाल पे बे साख्ता रो दें इस बार बहारों से मेरा ज़िक्र न करना, ले जाएंगे गहराई में तुमको भी बहा कर दरिया के किनारों से मेरा ज़िक्र न करना, वो शख़्स मिले तो उसे हर बात बताना तुम सिर्फ़ इशारों से मेरा ज़िक्र न करना..!! ~वसी शाह - [दयार ए नूर में तीरा शबों का साथी हो](https://bazmeshayari.com/dayaar-e-noor-me-teera/): दयार ए नूर में तीरा शबों का साथी हो कोई तो हो जो मेरी वहशतों का साथी हो, मैं उससे झूठ भी बोलूँ तो मुझसे सच बोले मेरे मिज़ाज के सब मौसमों का साथी हो, मैं उसके हाथ न आऊँ वो मेरा हो के रहे मैं गिर पड़ूँ तो मेरी पस्तियों का साथी हो, वो मेरे नाम की निस्बत से मोतबर ठहरे गली गली मेरी रुस्वाइयों का साथी हो, करे कलाम जो मुझसे तो मेरे लहजे में मैं चुप रहूँ तो मेरे तेवरों का साथी हो, मैं अपने आप को देखूँ वो मुझको देखे जाए वो मेरे नफ़्स की गुमराहियों - [बस्ती भी समुंदर भी बयाबाँ भी मेरा है](https://bazmeshayari.com/basti-bhi-samndar-bhi/): बस्ती भी समुंदर भी बयाबाँ भी मेरा है आँखें भी मेरी ख़्वाब ए परेशाँ भी मेरा है, जो डूबती जाती है वो कश्ती भी है मेरी जो टूटता जाता है वो पैमाँ भी मेरा है, जो हाथ उठे थे वो सभी हाथ थे मेरे जो चाक हुआ है वो गिरेबाँ भी मेरा है, जिसकी कोई आवाज़ न पहचान न मंज़िल वो क़ाफ़िला ए बे सर ओ सामाँ भी मेरा है, वीराना ए मक़तल पे हिजाब आया तो इस बार ख़ुद चीख़ पड़ा मैं कि ये उनवाँ भी मेरा है, वारफ़्तगी ए सुब्ह ए बशारत को ख़बर क्या अंदेशा ए सद - [अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है](https://bazmeshayari.com/apni-tasveer-ko-aankhon/): अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है एक नज़र मेरी तरफ़ भी तेरा जाता क्या है ? मेरी रुस्वाई में वो भी हैं बराबर के शरीक मेरे क़िस्से मेरे यारों को सुनाता क्या है ? पास रह कर भी न पहचान सका तू मुझको दूर से देख के अब हाथ हिलाता क्या है ? ज़ेहन के पर्दों पे मंज़िल के हयूले न बना ग़ौर से देखता जा राह में आता क्या है ? ज़ख़्म ए दिल जुर्म नहीं तोड़ भी दे मोहर ए सुकूत जो तुझे जानते हैं उन से छुपाता क्या है ? सफ़र ए शौक़ में क्यूँ - [अहल ए मोहब्बत की मजबूरी बढ़ती जाती है](https://bazmeshayari.com/ahal-e-mohabbat-ki/): अहल ए मोहब्बत की मजबूरी बढ़ती जाती है मिट्टी से गुलाब की दूरी बढ़ती जाती है, मेहराबों से महल सरा तक ढेरों ढेर चराग़ जलते जाते हैं बेनूरी बढ़ती जाती है, कारोबार में अब के ख़सारा और तरह का है काम नहीं बढ़ता मज़दूरी बढ़ती जाती है, जैसे जैसे जिस्म तशफ़्फ़ी पाता जाता है वैसे वैसे क़ल्ब से दूरी बढ़ती जाती है, गिर्या ए नीम शबी की नेमत जब से बहाल हुई हर लहज़ा उम्मीद ए हुज़ूरी बढ़ती जाती है॥ ~इफ़्तिख़ार आरिफ़ - [अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया](https://bazmeshayari.com/azaab-ye-bhi-kisi/): अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया कि एक उम्र चले और घर नहीं आया, उस एक ख़्वाब की हसरत में जल बुझीं आँखें वो एक ख़्वाब कि अब तक नज़र नहीं आया, करें तो किस से करें ना रसाइयों का गिला सफ़र तमाम हुआ हमसफ़र नहीं आया, दिलों की बात बदन की ज़बाँ से कह देते ये चाहते थे मगर दिल इधर नहीं आया, अजीब ही था मेरे दौर ए गुमरही का रफ़ीक़ बिछड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया, हरीम ए लफ़्ज़ ओ मआनी से निस्बतें भी रहीं मगर सलीक़ा ए अर्ज़ ए हुनर नहीं आया॥ - [अज़ाब ए वहशत ए जाँ का सिला न माँगे कोई](https://bazmeshayari.com/azaab-e-wahshat-e-jaan-ka/): अज़ाब ए वहशत ए जाँ का सिला न माँगे कोई नए सफ़र के लिए रास्ता न माँगे कोई, बुलंद हाथों में ज़ंजीर डाल देते हैं अजीब रस्म चली है दुआ न माँगे कोई, तमाम शहर मुकर्रम बस एक मुजरिम मैं सो मेरे बाद मेरा ख़ूँ बहा न माँगे कोई, कोई तो शहर ए तज़ब्ज़ुब के साकिनों से कहे न हो यक़ीन तो फिर मोजिज़ा न माँगे कोई, अज़ाब ए गर्द ए ख़िज़ाँ भी न हो बहार भी आए इस एहतियात से अज्र ए वफ़ा न माँगे कोई॥ ~इफ़्तिख़ार आरिफ़ - [मज़लूमों के हक़ मे अब आवाज़...](https://bazmeshayari.com/mazlumo-ke-haq-me/): मज़लूमों के हक़ मे अब आवाज़ उठाये कौन ? जल रही बस्तियाँ,आह ओ सोग मनाये कौन ? कौन करे पासदारी अब बेत अल मुक़दस की ? सलाहुद्दीन अयुबी सा अब मुज़ाहिद लाये कौन ? बस एक मज़म्मती बयान और कुछ नहीं उम्मत ए मुसलमां को अब आ कर जगाये कौन ? क्यूँ नहीं कोई झिंझोड़ता उन मुर्दा ज़मीरों को आलम ए अरब ख़मोश है अब ये ज़ुल्म मिटाये कौन ? - [ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं](https://bazmeshayari.com/thik-hai-khud-ko/): ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं, हो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाद देखने वाले हाथ मलते हैं, है वो जान अब हर एक महफ़िल की हम भी अब घर से कम निकलते हैं, क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में जो भी ख़ुश है हम उससे जलते हैं, है उसे दूर का सफ़र दरपेश हम सँभाले नहीं सँभलते हैं, तुम बनो रंग तुम बनो ख़ुश्बू हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं, मैं उसी तरह तो बहलता हूँ और सब जिस तरह बहलते हैं, है अजब फ़ैसले का सहरा भी चल न पड़िए तो - [ज़ुल्म की हद ए इंतेहा को मिटाने का वक़्त है](https://bazmeshayari.com/zulm-ki-had-e-inteha-ko/): ज़ुल्म की हद ए इंतेहा को मिटाने का वक़्त है अब मज़लूमों का साथ निभाने का वक़्त है, वो जो सोये हुए हैं ख़्वाब ए ख़रगोश की नींद उन मुर्दा ज़मीरों को फिर से जगाने का वक़्त है, वो जो बने बैठे हैं आज ठेकेदार सारे आलम के उनकी ठेकेदारी फिर आज़माने का वक़्त है, वो जिन्हें परवाह नहीं किसी के जीने मरने की उन्हे मौत का एहसास याद दिलाने का वक़्त है, क्यूँ डरे सहमे जिये हम मौत के खौफ़ से ? आँखों मे आँख डाल ज़ुर्रत दिखाने का वक़्त है, शहादत अगर नसीब है तो ज़हे नसीब अपने - [कभी झूठे सहारे ग़म में रास आया...](https://bazmeshayari.com/kabhi-jhuthe-sahare-gam-me/): कभी झूठे सहारे ग़म में रास आया नहीं करते ये बादल उड़ के आते हैं मगर साया नहीं करते, यही काँटे तो कुछ ख़ुद्दार हैं सेहन ए गुलिस्ताँ में कि शबनम के लिए दामन तो फैलाया नहीं करते, वो ले लें गोशा ए दामन में अपने या फ़लक चुन ले मेरी आँखों में आँसू बार बार आया नहीं करते, सलीक़ा जिन को होता है ग़म ए दौराँ में जीने का वो यूँ शीशे को हर पत्थर से टकराया नहीं करते, जो क़ीमत जानते हैं गर्द ए राह ए ज़िंदगानी की वो ठुकराई हुई दुनिया को ठुकराया नहीं करते, क़दम मयख़ाना - [पैगम्बरों की राह पर चल कर न देखना](https://bazmeshayari.com/paigambaron-ki-raah-par/): पैगम्बरों की राह पर चल कर न देखना या फिर चलो तो राह के पत्थर न देखना, पढ़ते चलो वो इस्म की शहर ए तिलस्म है गर ख़ैर चाहते हो, पलट कर न देखना, पहली नज़र ही मे उसे जी भर के देख लो तहज़ीब ए आशिक़ी है मुकर्रर न देखना, ये क्या की ख़्वाब देखना सूरज के रात भर और दिन की रौशनी मे कभी घर न देखना, जिस वक़्त अपनी फ़तह का परचम करो बुलंद हारी हुई सिपाह को हँस कर न देखना॥ - [एक पल के लिए एक घड़ी के लिए](https://bazmeshayari.com/ek-pal-ke-liye-ek-ghadi-ke-liye/): एक पल के लिए एक घड़ी के लिए वक़्त रुकता ही नहीं किसी के लिए, रात कितनी भी काली हो तारीक़ हो एक दीया ही बहुत है रौशनी के लिए, साज़ ओ आवाज़ और शायरी ही नहीं ख़ून ए दिल भी चाहिए नगमगी के लिए, फ़ितनागर फ़ितनागर ही है चारो तरफ बस कोई मूसा ही नहीं सामरी के लिए, हिचकियाँ सिसकियाँ अश्क आह फुगाँ हम छुपाते ही रहे है आप ही के लिए, ज़िंदगी की हक़ीक़त करे क्या बयां है मुसलसल जहद हर किसी के लिए, हम तो दिल वाले है दिल की सुनते है बस मंतकीं ही चाहिए मंतकीं - [गमों का लुत्फ़ उठाया है खुशी...](https://bazmeshayari.com/gamon-ka-lutf-uthaya-hai/): गमों का लुत्फ़ उठाया है खुशी का जाम बाँधा है तलाश ए दर्द से मंज़िल का हर एक गाम बाँधा है, तवाफ़ ए आरज़ू मुमकिन नहीं अब गैर की हमदम मेरे जज़्बों ने तो फ़क़त तेरे नाम का एहराम बाँधा है, कहीं पर शोख़ जुमलों ने सुकूँ छिना है लोगो का कहीं पर ख़मोश चीख़ों ने कोई कोहराम बाँधा है, गुमाँ के वस्त में इमकान होने से ज़रा पहले वफ़ा के ज़ायचे में हमने इश्क़ का अंजाम बाँधा है, वो लम्हा जिसके सीने पर उदासी राख़ मिलती है उसी की रौशनी से अब वक़्त ने इल्हाम बाँधा है, तेरी फ़ितरत - [आँख से टूट कर गिरी थी नींद](https://bazmeshayari.com/aankh-se-tut-kar-giri-thi/): आँख से टूट कर गिरी थी नींद वो जो मदहोश हो चुकी थी नींद, मेरी आँखों के क्यूँ झरोके तक आ के चुप चाप सी खड़ी थी नींद ? किस ने छेड़ा हवा के लहजे में ? कैसी ख़ामोश सी पड़ी थी नींद, नीली आँखों की कर रहा था मैं जब तिलावत तो जल गई थी नींद, कितनी पुरलुत्फ़ थीं मेरी रातें उन दिनों जब हरी भरी थी नींद, चाँद मेरे सिरहाने बैठा था और बग़ल में खड़ी हुई थी नींद, जब तलक मैं किवाड़ करता बंद ‘साजिद’ कुछ दूर जा चुकी थी नींद॥ ~साजिद हमीद - [नक़ाब चेहरों पे सजाये हुए आ जाते है](https://bazmeshayari.com/naqab-chehro-pe-sajaaye-hue/): नक़ाब चेहरों पे सजाये हुए आ जाते है अपनी करतूत छुपाये हुए आ जाते है, घर निकले कोई औरत तो हवस के पैकर हर तरफ घात लगाये हुए आ जाते है, जब भी यारों की इनायत का चर्चा हो तो हम ज़ख्म सीनों पे सजाये हुए आ जाते है, काम करने पे इन्हे मौत नज़र आती है क्या ? वो लोग जो कशकोल उठाये हुए आ जाते है, मेरी महफिल मे मेरे नारे लगाते हुए लोग नफ़रतें दिल मे छुपाये हुए आ जाते है, मैं ज़माने का सताया हूँ मेरे दर पे यूँ नहीं सब ज़माने के सताये हुए आ - [कहीं पे सूखा कहीं चारों सिम्त पानी है](https://bazmeshayari.com/kahin-pe-sukha-kahin-pe/): कहीं पे सूखा कहीं चारों सिम्त पानी है गरीब लोगों पे क़ुदरत की मेहरबानी है, हर एक शख्स की अपनी अज़ब कहानी है ये लग रहा है कि अब सर से ऊपर पानी है, वो लोग भी तो महल पे महल बनाते रहे जिन्हें ख़बर थी कि ये क़ायनात फ़ानी है, लगी हुई है उसी की तलाश में दुनियाँ पता है जिसका न जिसकी कोई निशानी है, ये और बात है कि हम साथ साथ रहते है दिलों में दुश्मनी लेकिन बहुत पुरानी है..!! - [यूँ अपनी गज़लों में न जताता कि...](https://bazmeshayari.com/yun-apni-gazalon-me-na/): यूँ अपनी गज़लों में न जताता कि मोहब्बत क्या है गर मिलते तो कर के दिखाता कि मोहब्बत क्या है, कैसे सीने से लगा लूँ मैं तुझे, तू किसी और की है काश !मेरी होती तो मैं बताता कि मोहब्बत क्या है, ख़ूब समझाता मैं तुझे तेरी ही मिसालें दे दे कर तुझ में भी मैं एहसास जगाता कि मोहब्बत क्या है, दीवानों के मानिंद बना देता मैं हालत तेरी फिर तुझे ख़ुद समझ आता कि मोहब्बत क्या है, इश्क़ की आग खद ओ खाल भी गम कर देती तुझे आईना याद दिलाता कि मोहब्बत क्या है, ये तो अक्सर - [आयत ए हिज्र पढ़ी और रिहाई पाई](https://bazmeshayari.com/ayat-e-hizr-padhi-aur/): आयत ए हिज्र पढ़ी और रिहाई पाई हमने दानिस्ता मुहब्बत में जुदाई पाई, जिस्म ओ इस्म था जो किसी शब न खुला इश्क़ वो ज़र था कि लगता था खुदाई पाई, यार ता उम्र तेरा हिज्र संभाले रखा तूने क्या चीज भला मुझ में पराई पाई ? इश्क़ वो क़र्ज़ कि जो रूह के हिस्से आया उम्र भर कटती रही साँस की पाई पाई, जिन दिनों ख़ाक उड़ाती थी हवाएँ बन में उन दिनों हम ने मुहब्बत में कमाई पाई..!! - [लाई है किस मक़ाम पे ये ज़िंदगी मुझे](https://bazmeshayari.com/laai-hai-kis-muqam-pe/): लाई है किस मक़ाम पे ये ज़िंदगी मुझे महसूस हो रही है ख़ुद अपनी कमी मुझे, देखो तुम आज मुझ को बुझाते तो हो मगर कल ढूँढती फिरेगी बहुत रौशनी मुझे, तय कर रहा हूँ मैं भी ये राहें सलीब की आवाज़ ऐ हयात न देना अभी मुझे, सूखे शजर को फेंक दूँ कैसे निकाल कर देता रहा है साया शजर जो कभी मुझे, क्यूँ कर रही है मुझ से सवालात ज़िंदगी कह दो जवाब की नहीं फ़ुर्सत अभी मुझे, क्या चाहता था वक़्त पे लिखना न पूछिए हुर्मत क़लम की अपनी बचानी पड़ी मुझे, दिलदारियाँ भी रह गईं पर्दे - [ख़ुशी ने मुझको ठुकराया है दर्द ओ गम ने पाला है](https://bazmeshayari.com/khushi-ne-mujhko-thukraya/): ख़ुशी ने मुझको ठुकराया है दर्द ओ गम ने पाला है गुलो ने बे रुखी की है तो काँटों ने संभाला है, मोहब्बत में ख़याल ए साहिल ओ मंज़िल है नादानी जो इन राहों में लुट जाए वही तक़दीर वाला है, जहाँ भर को मता ए लाला ओ गुल बख़्शने वालो हमारे दिल का काँटा भी कभी तुम ने निकाला है, किनारों से मुझे ऐ ना ख़ुदाओ दूर ही रखना वहाँ ले कर चलो तूफ़ाँ जहाँ से उठने वाला है, चराग़ाँ कर के दिल बहला रहे हो क्या जहाँ वालो अंधेरा लाख रौशन हो उजाला फिर उजाला है, नशेमन ही - [दरबार ए वतन में जब एक दिन सब...](https://bazmeshayari.com/darbar-e-watan-me-jab/): दरबार ए वतन में जब एक दिन सब जाने वाले जाएँगे कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे,कुछ अपनी जज़ा ले जाएँगे, ऐ ख़ाक नशीनो उठ बैठो वो वक़्त क़रीब आ पहुँचा है जब तख़्त गिराए जाएँगे जब ताज उछाले जाएँगे, अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं जो दरिया झूम के उठे हैं तिनकों से न टाले जाएँगे, कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो, बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएँगे, ऐ ज़ुल्म के मातो लब खोलो चुप रहने वालो चुप कब तक कुछ हश्र तो उन से - [सज़ा पे छोड़ दिया, कुछ जज़ा पे छोड़ दिया](https://bazmeshayari.com/saza-pe-chhod-diya/): सज़ा पे छोड़ दिया, कुछ जज़ा पे छोड़ दिया हर एक काम को अब मैंने ख़ुदा पे छोड़ दिया, वो मुझको याद रखेगा या फिर भूल जाएगा उसी का काम था उसकी रज़ा पे छोड़ दिया, अब उसकी मर्ज़ी जलाए या फिर बुझाए रखे चिराग़ हमने जला कर हवा पे छोड़ दिया, उस से बात भी करते तो किस तरह करते ये मसला था अना का, अना पे छोड़ दिया, इसी लिए तो वो कहते है बे वफ़ा हमको कि हम ने सारा ज़माना वफ़ा पे छोड़ दिया..!! - [उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ](https://bazmeshayari.com/usko-jaate-hue-dekha-tha/): उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ रोकते किस तरह वो शख़्स हमारा था कहाँ, थी कहाँ रब्त में उस के भी कमी कोई मगर मैं उसे प्यारा था पर जान से प्यारा था कहाँ, बेसबब ही नहीं मुरझाए थे जज़्बों के गुलाब तू ने छू कर ग़म ए हस्ती को निखारा था कहाँ, बीच मझंदार में थे इस लिए हम पार लगे डूबने के लिए कोई भी किनारा था कहाँ, आख़िर ए शब मेरी पलकों पे सितारे थे कई लेकिन आने का तेरे कोई इशारा था कहाँ, ये तमन्ना थी कि हम उस पे लुटा दें हस्ती ऐ - [जब भी तुझ को याद किया...](https://bazmeshayari.com/jab-bhi-tujh-ko-yaad-kiya/): जब भी तुझ को याद किया ख़ुद को ही नाशाद किया, दिल की बस्ती उजड़ी तो दर्द से उसे आबाद किया, अदावत मैं हम नाक़ाम रहे मुहब्बत ने हमें बर्बाद किया, ख़ुद ही अपना चैन लुटा कर मैंने तक़दीर से फ़रियाद किया, डोर साँसों की ज़ंजीर थी एक हिचकी ने हमें आज़ाद किया, वो रूठ के ख़ुद ही लौट आया जब सितम नया कोई इज़ाद किया, इश्क़ ओ अक्ल दोनों में नवाब मैंने क़ायम एक अल्हाद किया..!! - [दर्द अब वो नहीं रहें जो ऐ दिल ए नादां पहले था](https://bazmeshayari.com/dard-ab-wo-nahi-rahe-jo/): दर्द अब वो नहीं रहें जो ऐ दिल ए नादां पहले था खुले सर पर मेरे भी कभी कोई सायेबान पहले था, तुम्हारे गुमशुदा जो ख़्वाब है मैं सब ढूँढ लाऊँगा मगर क्या इनआम वही है, जो ऐलान पहले था ? सफ़ेदी आ गई है बालो में न वो है बात पहले सी न अब जज़्बात में उठता है जो तूफ़ान पहले था, पढ़े लिखो ने आ कर गाँव का हुलिया बदल डाला वहां पर घर बन गए पक्के, जहाँ मैंदान पहले था, तबीयत अब जा कर कहीं संभली है मुश्किल से तौबा मेरा हाल वो जो इश्क़ के दौरान - [देखोगे हमें रोज़ मगर बात न होगी](https://bazmeshayari.com/dekhoge-hamen-roz-magar/): देखोगे हमें रोज़ मगर बात न होगी एक शहर में रह कर भी मुलाक़ात न होगी, कहना है जो कह डालो अभी वक़्त है बाक़ी कल हम तो होंगें मगर सूरत ए हालात न होगी, जो पूछना है तुमको अभी पूछ लो वरना कल शहर में फिर रस्म ए सवालात न होगी, दिन इतने होंगें तवील हिज्र के लोगो तड़पोगे सर ए शाम मगर रात न होगी, ये सोच के भी दिल तड़प उठता है बिछड़ेंगे इस तरह कि कभी मुलाक़ात न होगी..!! - [इश्क़ मैंने लिख डाला क़ौमीयत के ख़ाने में](https://bazmeshayari.com/ishq-maine-likh-daala/): इश्क़ मैंने लिख डाला क़ौमीयत के ख़ाने में और तेरा दिल लिखा शहरियत के ख़ाने में, मुझको तजरबों ने ही बाप बन के पाला है सोचता हूँ क्या लिखूँ वलदियत के ख़ाने में, मेरा साथ देती है मेरे साथ रहती है मैंने लिखा तन्हाई ज़ौजिय्यत के ख़ाने में, दोस्तों से जा कर जब मशवरा किया तो फिर मैंने कुछ नहीं लिखा हैसियत के ख़ाने में, इम्तिहाँ मोहब्बत का पास कर लिया मैंने अब यही मैं लिखूँगा अहलियत के ख़ाने में, जब से आप मेरे हैं फ़ख़्र से मैं लिखता हूँ नाम आप का अपनी मिलकियत के ख़ाने में..!! ~आमिर अमीर - [नदी में बहते थे नीलम ज़मीन धानी थी](https://bazmeshayari.com/nadee-me-bahte-the-neelam/): नदी में बहते थे नीलम ज़मीन धानी थी तुम्हारे वायदे की रंगत जो आसमानी थी, वफ़ा को दे गई धोखा क़तार कसमों की नई थी डार मगर कुंज तो पुरानी थी, वहां तो आज भी खिलते है धड़कनों के महाज़ जहाँ निगाह ने पहली शिकस्त मानी थी, सरों पे तेरी मुहब्बत का सायेबां भी न था जब आफ़ताब ए क़यामत ने धूप तानी थी, बदन मिलाप को बेताब और रूहों पर न मिलने वाले सितारों की हुक्मरानी थी, मैं वो दीया भी हवाओं के नज़दीक कर बैठा जो मेरे पास तेरी आख़िरी निशानी थी, तमाम वुसअ’तें गहराइयों में डूब गई - [माना कि यहाँ अपनी शनासाई भी कम है](https://bazmeshayari.com/maana-ki-yahan-apni-shanasaai/): माना कि यहाँ अपनी शनासाई भी कम है पर तेरे यहाँ रस्म ए पज़ीराई भी कम है, हाँ ताज़ा गुनाहों के लिए दिल भी है बेताब और पिछले गुनाहों की सज़ा पाई भी कम है, कुछ कार ए जहाँ जाँ को ज़ियादा भी लगे हैं कुछ अब के बरस याद तेरी आई भी कम है, कुछ ग़म भी मयस्सर हमें अब के हैं ज़ियादा कुछ ये कि मसीहा की मसीहाई भी कम है, कुछ ज़ुल्म ओ सितम सहने की आदत भी है हमको कुछ ये है कि दरबार में सुनवाई भी कम है..!! ~ज़िया ज़मीर - [राहत ए वस्ल बिना हिज्र की शिद्दत के बग़ैर](https://bazmeshayari.com/rahat-e-vasl-bina-hizr-ki/): राहत ए वस्ल बिना हिज्र की शिद्दत के बग़ैर ज़िंदगी कैसे बसर होगी मोहब्बत के बग़ैर, अब के ये सोच के बीमार पड़े हैं कि हमें ठीक होना ही नहीं तेरी अयादत के बग़ैर, इश्क़ के मारों को आदाब कहाँ आते हैं तेरे कूचे में चले आए इजाज़त के बग़ैर, हम से पूछो तो कि हम कैसे हैं ऐ हमवतनो अपने यारों के बिना अपनी मोहब्बत के बग़ैर, मुल्क तो मुल्क घरों पर भी है क़ब्ज़ा उसका अब तो घर भी नहीं चलते हैं सियासत के बग़ैर, अक्स किस का ये उतर आया है आईने में कौन ये देख रहा - [कोई ज़ब्त दे न जलाल दे...](https://bazmeshayari.com/koi-zabt-de-na-jalal-de/): कोई ज़ब्त दे न जलाल दे मुझे सिर्फ़ इतना कमाल दे, मुझे अपनी राह पे डाल दे कि ज़माना मेरी मिसाल दे, तेरी रहमतों का नज़ूल हो मुझे मेहनतों के सिला मिले, माल ओ ज़र की हवस न हो मुझे तू बस रिज्क ए हलाल दे, मेरे ज़हन में तेरी फ़िक्र हो मेरी हर साँस में तेरा ज़िक्र हो, तेरा खौफ़ ही मेरी निज़ात हो बाक़ी खौफ़ दिल से निकाल दे, तेरी बारगाह में ऐ मेरे ख़ुदा मेरी रोज़ ओ शब है यही दुआ, तू रहीम है तू करीम है मुझे हर मुश्किलों से निकाल दे..!! - [मैं ख्याल हूँ किसी और का मुझे सोचता...](https://bazmeshayari.com/main-khyal-hoon-kisi-aur-ka/): मैं ख्याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है सर ए आईना मेरा अक्स है पस ए आईना कोई और है, मैं किसी के दस्त ए तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़ ए दुआ में हूँ मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है, अजब ऐतिबार ओ बे ऐतिबारी के दरमियान है ज़िंदगी मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है, मेरी रौशनी तेरे ख़द्द ओ ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है, तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी - [हर एक बात न क्यूँ ज़हर सी हमारी लगे](https://bazmeshayari.com/har-ek-baat-na-kyun/): हर एक बात न क्यूँ ज़हर सी हमारी लगे कि हमको दस्त ए ज़माना से ज़ख़्मकारी लगे, उदासियाँ हों मुसलसल तो दिल नहीं रोता कभी कभी हो तो ये कैफ़ियत भी प्यारी लगे, बज़ाहिर एक ही शब है फ़िराक़ ए यार मगर कोई गुज़ारने बैठे तो उम्र सारी लगे, इलाज इस दिल ए दर्द आश्ना का क्या कीजे कि तीर बन के जिसे हर्फ़ ए ग़मगुसारी लगे, हमारे पास भी बैठो बस इतना चाहते हैं हमारे साथ तबीअत अगर तुम्हारी लगे, फ़राज़ तेरे जुनूँ का ख़याल है वर्ना ये क्या ज़रूर वो सूरत सभी को प्यारी लगे..!! ~अहमद फ़राज़ - [ज़िन्दा है जब तक मुझे बस गुनगुनाने है](https://bazmeshayari.com/zinda-hai-jab-tak/): ज़िन्दा है जब तक मुझे बस गुनगुनाने है क्यूँकि गीत तेरे नाम के बड़े ही सुहाने है, है सज़्दा, कभी रुकूअ, तो क़याम कभी ये सब तो बस तुमसे मिलने के बहाने है, कुछ लोग है कि पहचान से भी है आरी एक आप है कि हाल ए दिल भी जाने है, मुझको इन बादलों की चाल ये बताती है तूने इन्हें आज खाकशारों पे बरसाने है, हम तो समझ बैठे थे दुनिया को सब कुछ बाद इसके आने अभी और भी ज़माने है, दौर ए ऐतबार ओ बे ऐतबारी के दरमियाँ हम तो बस तुझे ही अपना सबकुछ माने - [हमने उसकी आँखे पढ़ ली...](https://bazmeshayari.com/hamne-uski-aankhe-padh/): हमने उसकी आँखे पढ़ ली छुपा कोई चेहरा है शायद ! वो हर बात पे हँस देती है ज़ख्म बहुत गहरा है शायद ! गुमसुम यादें घायल माज़ी सालो से है सखियाँ उसकी, कच्ची नींद उचट जाती है ख़्वाबो पे पहरा है शायद ! शहर जला क्यूँ घर बिखरा ? पगली आकाश से पूछ रही है, कौन उसे जा कर ये समझाए ये आसमान बहरा है शायद ! सारी उलझन, सब बेचैनी और जो धुँधला धुँधला गम है, आँसू बन कर बह जाने दो ये पलकों पे ठहरा है शायद..!! - [कितना बुलंद मर्तबा पाया हुसैन ने](https://bazmeshayari.com/kitna-buland-martba-paya/): कितना बुलंद मर्तबा पाया हुसैन ने राह ए ख़ुदा में घर को लुटाया हुसैन ने, कैसे बयाँ हो हज़रत ए शब्बीर का मुक़ाम बे हद बुलंद मर्तबा पाया हुसैन ने, छोड़ी न वक़्त ए नज़अ भी शब्बीर ने नमाज़ सज़दे में रख के सर को कटाया हुसैन ने, जारी थी लब ए हुसैन पे तिलावत क़ुरआन की कलाम ए ख़ुदा इस हाल में सुनाया हुसैन ने, आल ए नबी की शान ए तिलावत तो देखिये नेज़े की नोक पे क़ुरआन सुनाया हुसैन ने, करबल की खाक़ पे निसार जाऊँ मैं बार बार खून ए रसूल इसको पिलाया हुसैन ने, चेहरे - [हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे](https://bazmeshayari.com/ham-taraste-hi-taraste-hi/): हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे वो फ़लाने से फ़लाने से फ़लाने से मिले, ख़ुद से मिल जाते तो चाहत का भरम रह जाता क्या मिले आप जो लोगो के मिलाने से मिले, माँ की आग़ोश में कल मौत की आग़ोश में आज हम को दुनियाँ में ये दो वक़्त सुहाने से मिले, कभी लिखवाने गए ख़त कभी पढ़वाने गए हम हसीनों से इसी हिले ओ बहाने से मिले, एक नया ज़ख्म मिला एक नई उम्र मिली जब किसी शहर में कुछ यार पुराने से मिले, एक हम ही नहीं फिरते है लिए क़िस्सा ए गम उनके ख़ामोश - [ये मुहब्बतों के किस्से भी अज़ीब होते है](https://bazmeshayari.com/ye-muhabbaton-ke-qisse/): ये मुहब्बतों के किस्से भी अज़ीब होते है बेवफ़ा ही इसमें अक्सर अज़ीज़ होते है, चाहों में कोई और, बाँहों में कोई और ऐसे आशिक़ ओ माशूक़ बदनसीब होते है, कर तो लेते है तस्लीम ख़ुदा इश्क़ में लोग दरअसल दुश्मन ए जाँ वही रकीब होते है, चंद दिनों तक रहते है ये खुशियों के साये बाद ताउम्र गम आशिको के क़रीब होते है, कोशिशे लाख करो रोकने की अश्को को पर यादो के लम्हे अश्को के मुज़ीब होते है, मुफलिसों से कौन करता है सच्ची दोस्ती जितनी पास हो दौलत उतने हबीब होते है, न पैदा होते है और - [आदम की जात होकर इल्म बिसरा रहे हो](https://bazmeshayari.com/aadam-ki-jaat-ho-kar/): आदम की जात होकर इल्म बिसरा रहे हो क्यूँ मज़लूम ओ गरीब को बेवजह सता रहे हो ? छोड़ आई अपने माँ बाप का घर तुम्हारे लिए और तुम ही उसे इस कदर रुला रहे हो, ईंट पत्थर के मकाँ को घर भी वही बनाएगी जिसकी ख्वाहिशों को तुम दफना रहे हो, जानते हो क़ैद मे है एक परिंदा और तुम क़फ़स के दायरे घटाते जा रहे हो, यूँ तो मुल्क मे सब ही अमन के मुरीद हैं फिर हर बात पे क्यूँ हिन्दू मुस्लिम गा रहे हो..!! - [दूर कर देगा कभी साथ नहीं होने देगा](https://bazmeshayari.com/door-kar-dega-kabhi-saath/): दूर कर देगा कभी साथ नहीं होने देगा ये वक़्त बेदर्द मुलाक़ात नहीं होने देगा, गम की वो आँख में सौगात लिए फिरता है दर्द की कोई भी बरसात नहीं होने देगा, उसने सीखा है कोई कता क़लामी का हुनर इस लिए ढंग से कभी बात नहीं होने देगा, तूने सौंपी है जिसे एक अँधेरी नगरी वो तेरे दिन को कभी रात नहीं होने देगा, तुमको मालूम है फ़ितरत है मगर ख़ुश गोई अपने लहजे को कभी धात नहीं होने देगा, हमने सोचा था कि आसान रहेगी मंज़िल पर हरीफ़ ऐसा है बदज़ात नहीं होने देगा, दिल अज़ीब चीज है - [इंसानी सोच का मौसम बदलता रहता है](https://bazmeshayari.com/insani-soch-ka-mausam/): इंसानी सोच का मौसम बदलता रहता है फ़ितूरी दिमाग बेकाम भी चलता रहता है, ज़रा सी ओट ही बचाती है उसको बुझने से हवा के दरमियाँ भी दीया जलता रहता है, चल पड़े वही पहुँचते है अपनी मंज़िल तक सफ़र को टालते रहने से टलता रहता है, आलम ए ज़म्हुरियत में अब सोचना है शेरो को दहाड़ने से भी जंगल दहलता रहता है..!! - [आरज़ी ताक़तें तुम्हारी है पर ख़ुदा हमारा है](https://bazmeshayari.com/aarzi-taaqte-tumhari-hai/): आरज़ी ताक़तें तुम्हारी है पर ख़ुदा हमारा है अपने अक्स पर न इतराओ आईना हमारा है, तेरी रज़ा की खातिर गुलामी का बोझ न ढोयेंगे क्यों कि आबरू से मरने का फ़ैसला हमारा है, ज़िन्दगी भर तो कोई भी जंग लड़ नहीं सकता एक दिन तुम भी टूट जाओगे तजरुबा हमारा है, अपनी बेतरतीब रहनुमाई पर गुरुर मत करना क्यों कि तुम से बहुत आगे नक्श ए पा हमारा है, गैरत ए जिहाद अपनी ज़ख्म खा कर ही जागेगी बेशक पहला वार तुम कर लो दूसरा हमारा है..!! - [उम्र तमाम गुज़र जाती है आशियाँ बनाने में](https://bazmeshayari.com/umr-tamam-guzar-jati-hai/): उम्र तमाम गुज़र जाती है आशियाँ बनाने में ज़ालिम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में, और जाम टूटेंगे इस शराब ख़ाने में मौसमों के आने में मौसमों के जाने में, हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में, फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती कौन साँप रखता है उसके आशियाने में, दूसरी कोई लड़की ज़िंदगी में आएगी कितनी देर लगती है उसको भूल जाने में..!! ~बशीर बद्र - [मैं सुन रहा हूँ जो दुनियाँ सुना रही है मुझे](https://bazmeshayari.com/main-sun-raha-hoon-jo/): मैं सुन रहा हूँ जो दुनियाँ सुना रही है मुझे हँसी तो अपनी ख़ामोशी पे आ रही है मुझे, मेरे वजूद की मिट्टी में ज़र नहीं कोई ये एक चराग की लौ जगमगा रही है मुझे, ये कैसे ख़्वाब की ख्वाहिश में घर से निकला हूँ कि दिन में चलते हुए नींद आ रही है मुझे, कोई सहारा मुझे कब संभाल सकता है मेरी ज़मीन अगर डगमगा रही है मुझे, मैं इस जहान में खुश हूँ मगर कोई आवाज़ नए जहान की जानिब बुला रही है मुझे..!! - [कैसी महफ़िल है ज़ालिम तेरे शहर में...](https://bazmeshayari.com/kaisi-mahfil-hai-zalim/): कैसी महफ़िल है ज़ालिम तेरे शहर में यहाँ हर कोई ही डूबा हुआ है ज़हर में, एक बच्ची तलक तो यहाँ महफूज़ नहीं इन वहशी और उन दरिंदो के क़हर में, खेल तो बस चलता सियासत का यहाँ डूबते है सिर्फ़ हम ही यहाँ हर लहर में, ज़िस्म क्या हर एक रूह तक में ज़ख्म है जिधर देखो भेड़िये ही भेड़िये है हर नज़र में, उस पर सियासी चाल की अपनी ग़ज़ल हर एक सुनाता है शफ़क़ अपनी ही बहर में..!! - [चेहरे की हसी भी दिखावट सी हो रही है...](https://bazmeshayari.com/chehre-ki-hasi-bhi-dikhwat/): चेहरे की हसी भी दिखावट सी हो रही है असल ज़िन्दगी भी बनावट सी हो रही है, अनबन बढ़ती जा रही है रिश्तो में भी अब अपनों से भी बग़ावत सी हो रही है, पहले ऐसा था नहीं जैसा हूँ मैं आज कल मेरी कहानी कोई कहावत सी हो रही है, दूरियाँ बढ़ती ही जा रही है मंज़िल से मेरी चलते चलते भी थकावट सी हो रही है, शब्द कम पड़ रहे है मेरी बातों में भी ख़ामोशी की जैसे मिलावट सी हो रही है, और मशवरे की भी आदत न रही लोगो में अब गुज़ारिश भी शिकायत सी हो - [सच ये है कि बेकार का ही हमें गम...](https://bazmeshayari.com/sach-ye-hai-ki-bekar-ka/): सच ये है कि बेकार का ही हमें गम होता है जैसा हम चाहे दुनियाँ में वो बहुत कम होता, ढलता हुआ सूरज, फैला जंगल रास्ता गुम हमारे दिल से पूछो कैसा आलम होता है, गैरो को कहाँ फ़ुर्सत किसी को दुःख दे सबब तो हर बार ही कोई हमदम होता है, ज़ख्म देने वाले दस्त हमने देखे है आँखों से हाँ ज़माने वालो से सुना है मरहम होता है..!! - [अमूमन मेरी हसरत को चाहत का...](https://bazmeshayari.com/amuman-meri-hasrat-ko/): अमूमन मेरी हसरत को चाहत का नाम दे गये लोग जीश्त को इन्तेहा ए आशिकी का पैग़ाम दे गये लोग, क्या खूब चली थी वो दौर ए दीदार ओ इश्क की मगर रिश्तों के शक्ल में जिम्मेदारियां तमाम दे गये लोग, जुबान से तो यूँ कभी कोई झूठा वादा न किया मगर – बस एक को ख़ास बनाने में मुझे बदनाम दे गये लोग, अब जो खलाओं पे चलने की आदत न रही मुझको नासूर ए ज़ख्म मेरे तलवों को सर ए आम दे गये लोग, वो सुबह मेरी होती थी हर रोज़ गुलफ़ामों के भीड़ में तन्हाई के इस - [ख़्वाबो को मेरे प्यार की ताबीर बख्श दे](https://bazmeshayari.com/khwabo-ko-mere-pyar-ki/): ख़्वाबो को मेरे प्यार की ताबीर बख्श दे दिल को मेरे इश्क़ की ज़ागीर बख्श दे, कब से ज़ेर ए खिज़ा है ये मेरी ज़िन्दगी अब मौसम ए बहार को तौक़ीर बक्श दे, फ़ैली हुई है आँख में जो शाम ए ज़िन्दगी उस दास्ताँ ए इश्क़ को तनवीर बख्श दे, मैं थक गया हूँ इश्क़ में आँखों से बोलते अब तो लबो को प्यार की तहरीर बख्श दे, बारिश की बूँद बूँद से लिपटी है उसकी याद यादों के गुलिस्ताँ की तस्वीर बख्श दे, भटका सके न कोई भी मंज़िल से ऐ ख़ुदा मेरे गुमाँ को नवाब की तक़दीर बख्श - [उलझे काँटों से कि खेले गुल ए तर से...](https://bazmeshayari.com/uljhe-kaanto-se-ki-khele/): उलझे काँटों से कि खेले गुल ए तर से पहले फ़िक्र ये है कि सबा आए किधर से पहले, जाम ओ पैमाना ओ साक़ी का गुमाँ था लेकिन दीदा ए तर ही था याँ दीदा ए तर से पहले, अब्र ए नैसाँ की न बरकत है न फ़ैज़ान ए बहार क़तरे गुम हो गए ता’मीर ए गुहर से पहले, जम गया दिल में लहू सूख गए आँखों में अश्क थम गया दर्द ए जिगर रंग ए सहर से पहले, क़ाफ़िले आए तो थे नारों के परचम ले कर सर निगूँ हो गई हर आह असर से पहले, ख़ून ए सर - [वही हुस्न ए यार में है वही लाला ज़ार में है](https://bazmeshayari.com/wahi-husn-e-yaar-me-hai/): वही हुस्न ए यार में है वही लाला ज़ार में है वो जो कैफ़ियत नशे की मय ए ख़ुशगवार में है, ये चमन की आरज़ू है कोई लूट ले चमन को ये तमाम रंग ओ निकहत तेरे इख़्तियार में है, तेरे हाथ की बुलंदी में फ़रोग़ ए कहकशाँ है ये हुजूम ए माह ओ अंजुम तेरे इंतिज़ार में है, बस उसी को तोड़ना है ये जुनून ए नफ़अ ख़ोरी यही एक सर्द ख़ंजर दिल ए रोज़गार में है, अभी ज़िंदगी हसीं है अभी ज़िक्र ए मौत कैसा अभी फूल खिल रहे हैं अभी तो कनार में है, अभी मयकदा जवाँ - [वही है वहशत वही है नफ़रत आख़िर...](https://bazmeshayari.com/wahi-hai-wahshat-wahi-hai/): वही है वहशत वही है नफ़रत आख़िर इस का क्या है सबब ? इंसाँ इंसाँ बहुत रटा है इंसाँ इंसाँ बनेगा कब ? वेद उपनिषद पुर्ज़े पुर्ज़े गीता क़ुरआँ वरक़ वरक़ राम ओ कृष्न ओ गौतम ओ यज़्दाँ ज़ख़्म रसीदा सब के सब, अब तक ऐसा मिला न कोई दिल की प्यास बुझाता जो यूँ मयख़ाना चश्म बहुत हैं बहुत हैं यूँ तो साक़ी लब, जिस की तेग़ है दुनिया उस की जिस की लाठी उस की भैंस सब क़ातिल हैं सब मक़्तूल हैं सब मज़लूम हैं ज़ालिम सब ख़ंजर ख़ंजर क़ातिल अबरू दिलबर हाथ मसीहा होंट लहू लहू है - [वही दर्द है वही बेबसी तेरे गाँव में मेरे...](https://bazmeshayari.com/wahi-dard-hai-wahi-bebasi/): वही दर्द है वही बेबसी तेरे गाँव में मेरे शहर में बे गमो की भीड़ में आदमी तेरे गाँव में मेरे शहर में, यहाँ हर क़दम पे सवाल है वहां हर क़दम पे मलाल है बड़ी उलझनों में है ज़िन्दगी तेरे गाँव में मेरे शहर में, किसे दोस्त अपना बनाएँ हम किसे हाल ए दिल सुनाएँ हम ? सभी गैर है सभी अज़नबी तेरे गाँव में मेरे शहर में, है सभी की अपनी ज़रूरते कोई कैसे बाँटे मोहब्बतें ? न ख़ुलूस है न है दोस्ती तेरे गाँव में मेरे शहर में, न वो हुस्न है न हिज़ाब है न वो - [थे ख़्वाब एक हमारे भी और तुम्हारे भी](https://bazmeshayari.com/the-khwab-ek-hamare-bhi-aur/): थे ख़्वाब एक हमारे भी और तुम्हारे भी पर अपना खेल दिखाते रहे सितारे भी, ये ज़िन्दगी है यहाँ इस तरह ही होता है सभी ने बोझ लादे है कुछ ने उतारे भी, सवाल ये है कि आपस में हम मिले कैसे ? हमेशा साथ तो चलते है दो किनारे भी, किसी का अपना मोहब्बत में कुछ नहीं होता कि मुश्तरक है यहाँ सूद भी ख़सारे भी, बिगाड़ पर है तन्कीद सब बजा लेकिन तुम्हारे हिस्से के जो काम थे सँवारे भी, बड़े सुकून से डूबे थे डूबने वाले जो साहिलों पे खड़े थे बहुत पुकारे भी, कि जैसे रेल - [ख़ुशी जानते हैं न ग़म जानते हैं...](https://bazmeshayari.com/khushi-jaante-hai-na-gam/): ख़ुशी जानते हैं न ग़म जानते हैं जो उनकी रज़ा हो वो हम जानते हैं, जो कुछ चार तिनकों को हम जानते हैं वो गुलचीन ओ सय्याद कम जानते हैं, तुम्हारे ही जल्वों की हम रौशनी को तजल्ली ए दैर ओ हरम जानते हैं, मैं क़ातिल न महशर में समझूँ भी तो क्या तुम्हें सब ख़ुदा की क़सम जानते हैं, मेरे ख़ाक ए दिल का पता भी नहीं है वो इतने सितम को भी कम जानते हैं, ख़ुदा को ख़ुदा हम समझते हैं वाइ’ज़ मगर हाँ सनम को सनम जानते हैं, करेंगे न अर्ज़ ए तमन्ना कि हम ख़ुद मोहब्बत - [ये मरहले भी मोहब्बत के बाब में आए](https://bazmeshayari.com/ye-marhale-bhi-mohabbat-ke/): ये मरहले भी मोहब्बत के बाब में आए बिछड़ गए थे जो हमसे वो ख़्वाब में आए, वो जिसकी राह में हमने बिछाए ग़ुंचा ओ गुल उसी मकान से पत्थर जवाब में आए , न जिसको दस्त ए हिनाई का तेरे लम्स मिले कहाँ से बू ए वफ़ा उस गुलाब में आए, तुम्हारे हुस्न ए नज़र से हैं मोतबर हम भी जो हम किसी निगह ए इंतिख़ाब में आए, अगरचे मिस्ल है आब ए रवाँ के रेग ए सराब कहाँ से शोरिश ए दरिया सराब में आए, तेरे ख़याल का पैकर सजा है सीने में हम इस तरह तेरी चश्म - [उसे भुला के भी यादों के सिलसिले न गए](https://bazmeshayari.com/use-bhula-ke-bhi-yaado-ke/): उसे भुला के भी यादों के सिलसिले न गए दिल ए तबाह तेरे उससे राब्ते न गए, किताब ए ज़ीस्त के उनवाँ बदल गए लेकिन निसाब ए जाँ से कभी उस के तज़्किरे न गए, मुझे तो अपनी ही सादा दिली ने लूटा है कि मेरे दिल से मुरव्वत के हौसले न गए, मैं चाँद और सितारों के गीत गाता रहा मेरे ही घर से अँधेरों के क़ाफ़िले न गए, रईस जुरअत ए इज़हार मेरा विर्सा है क़सीदे मुझ से किसी शाह के लिखे न गए..!! ~रईस वारसी - [तेरे पैकर सी कोई मूरत बना ली जाएगी](https://bazmeshayari.com/tere-paikar-si-koi/): तेरे पैकर सी कोई मूरत बना ली जाएगी दिल के बहलाने की ये सूरत निकाली जाएगी, कौन कह सकता था ये क़ौस ए क़ुज़ह को देख कर एक ही आँचल में ये रंगत समा ली जाएगी, काग़ज़ी फूलों से जब मानूस होंगी तितलियाँ आशिक़ी की रस्म दुनिया से उठा ली जाएगी, आइने में बाल पड़ जाए तो जा सकता नहीं रेत की दीवार तो फिर से बना ली जाएगी, हम जो कार ए आज़री में बेहुनर ठहरे तो क्या उनकी सूरत शेर के क़ालिब में ढाली जाएगी, ख़ुद परस्ती के नशे में जिनको है ज़ोम ए जमाल आइना देखें तो - [ग़म के हर एक रंग से मुझको शनासा कर](https://bazmeshayari.com/gam-ke-har-ek-rang-se/): ग़म के हर एक रंग से मुझको शनासा कर गया वो मेरा मोहसिन मुझे पत्थर से हीरा कर गया, घूरता था मैं ख़ला में तो सजी थीं महफ़िलें मेरा आँखों का झपकना मुझको तन्हा कर गया, हर तरफ़ उड़ने लगा तारीक सायों का ग़ुबार शाम का झोंका चमकता शहर मैला कर गया, चाट ली किरनों ने मेरे जिस्म की सारी मिठास मैं समुंदर था वो सूरज मुझ को सहरा कर गया, एक लम्हे में भरे बाज़ार सोने हो गए एक चेहरा सब पुराने ज़ख़्म ताज़ा कर गया, मैं उसी के राब्ते में जिस तरह मल्बूस था यूँ वो दामन खींच - [ग़म है वहीं प ग़म का सहारा गुज़र गया](https://bazmeshayari.com/gam-hai-wahi-pa-gam/): ग़म है वहीं प ग़म का सहारा गुज़र गया दरिया ठहर गया है किनारा गुज़र गया, बस ये सफ़र हयात का इतनी सी ज़िंदगी क्यूँ इतनी जल्दी रास्ता सारा गुज़र गया, वो जिस की रौशनी से चमकना था बख़्त को किस आसमान से वो सितारा गुज़र गया, क्या ज़िक्र उस घड़ी का कड़ी थी कि सहल थी जो वक़्त जिस तरह भी गुज़ारा गुज़र गया, तफ़्हीम ए दोस्ती में बड़ी भूल हो गई फिर दूर से ही दोस्त हमारा गुज़र गया, कर के यक़ीन फिर से कि मैं मुश्किलों में हूँ ठहरा नहीं वो शख़्स दोबारा गुज़र गया, एक वक़्त - [दिल के बहलाने का सामान न समझा जाए](https://bazmeshayari.com/dil-ke-bahlane-ka-samaan/): दिल के बहलाने का सामान न समझा जाए मुझको अब इतना भी आसान न समझा जाए, मैं भी दुनिया की तरह जीने का हक़ माँगती हूँ इसको ग़द्दारी का एलान न समझा जाए, अब तो बेटे भी चले जाते हैं हो कर रुख़्सत सिर्फ़ बेटी को ही मेहमान न समझा जाए, मेरी पहचान को काफ़ी है अगर मेरी शनाख़्त मुझको फिर क्यूँ मेरी पहचान न समझा जाए, मैं ने ये कब कहा रूही कि मेरे जीवन में मेरे साईं को मेरी जान न समझा जाए..!! ~रेहाना रूही - [मैं एक काँच का पैकर वो शख़्स पत्थर था](https://bazmeshayari.com/main-ek-kaanch-ka-paikar-wo/): मैं एक काँच का पैकर वो शख़्स पत्थर था सो पाश पाश तो होना मेरा मुक़द्दर था, तमाम रात सहर की दुआएँ माँगी थीं खुली जो आँख तो सूरज हमारे सर पर था, चराग़ ए राह ए मोहब्बत ही बन गए होते तमाम उम्र का जलना अगर मुक़द्दर था, फ़सील ए शहर पे कितने चराग़ थे रौशन सियाह रात का पहरा दिलों के अंदर था, अगरचे ख़ानाबदोशी है ख़ुशबुओं का मिज़ाज मेरा मकान तो कल रात भी मोअत्तर था, समुंदरों के सफ़र में वो प्यास का आलम कि फ़र्श ए आब पे एक कर्बला का मंज़र था, इसी सबब तो - [ख़ुद आगही का अजब रोग लग गया है](https://bazmeshayari.com/khud-aagahi-ka-azab-rog/): ख़ुद आगही का अजब रोग लग गया है मुझे कि अपनी ज़ात पे धोका तेरा हुआ है मुझे, पुकारती है हवाओं की नग़्मगी तुझको सुकूत झील का आवाज़ दे रहा है मुझे, अजीब ज़ौक़ ए मोहब्बत अता किया तूने वजूद ए संग भी तहज़ीब ए आईना है मुझे, मैं अपने नाम से ना आश्ना सही लेकिन तुम्हारे नाम से हर शख़्स जानता है मुझे, मैं अपने घर के दिए भी भुलाए बैठा हूँ तेरे ख़याल ने ये हौसला दिया है मुझे, कहाँ ये फ़ुर्सत ए काविश कि तुझको याद करूँ शुऊर ए ज़ात का दरपेश मरहला है मुझे, रईस शेर - [सबब ए चश्म ए तर कैसे बताऊँ तुझे ?](https://bazmeshayari.com/sabab-e-chashm-e-tar-kaise/): सबब ए चश्म ए तर कैसे बताऊँ तुझे ? ज़ख़्म ए दिल ओ जाँ कैसे दिखाऊं तुझे ? तू सोचता है मेरे आँसू है ख़ुशी के आँसू ग़म में रोया हूँ बार बार कैसे समझाऊँ तुझे ? चुप हूँ मेरे चुप रहने का सबब तो समझ हर बात बताई नहीं जाती कैसे बताऊँ तुझे ? तू भी आजकल ख़ामोश रहने लगा है तू ही बता मेरे हमदम कैसे हंसाऊँ तुझे ? खुली फ़ज़ा है पयामी हवा है और तू है खलने लगी है दूरी नज़दीक कैसे बुलाऊँ तुझे ? गुजरा हुआ वक़्त भी लौट कर आया है कभी तेरा आज - [दिल किस के तसव्वुर में जाने...](https://bazmeshayari.com/dil-kis-ke-tasavvur-me/): दिल किस के तसव्वुर में जाने रातों को परेशाँ होता है ये हुस्न ए तलब की बात नहीं होता है मेरी जाँ होता है, हम तेरी सिखाई मंतिक़ से अपने को तो समझा लेते हैं एक ख़ार खटकता रहता है सीने में जो पिन्हाँ होता है, फिर उनकी गली में पहुँचेगा फिर सहव का सज्दा कर लेगा इस दिल पे भरोसा कौन करे हर रोज़ मुसलमाँ होता है, वो दर्द कि उसने छीन लिया वो दर्द कि उसकी बख़्शिश था तन्हाई की रातों में इंशा अब भी मिरा मेहमाँ होता है..!! ~इब्न ए इंशा - [दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब...](https://bazmeshayari.com/dil-hizr-ke-dard-se-bojhal-hai/): दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो इस बात से हम को क्या मतलब ये कैसे हो ये क्यूँ कर हो, एक भीख के दोनों कासे हैं एक प्यास के दोनो प्यासे हैं हम खेती हैं तुम बादल हो हम नदियाँ हैं तुम सागर हो, ये दिल है कि जलते सीने में एक दर्द का फोड़ा अल्लहड़ सा ना गुप्त रहे ना फूट बहे कोई मरहम हो कोई निश्तर हो, हम साँझ समय की छाया हैं तुम चढ़ती रात के चन्द्रमाँ हम जाते हैं तुम आते हो फिर मेल की सूरत क्यूँ कर हो, - [दिल इश्क़ में बे पायाँ सौदा हो तो ऐसा हो](https://bazmeshayari.com/dil-ishq-me-be-payaan-sauda/): दिल इश्क़ में बे पायाँ सौदा हो तो ऐसा हो दरिया हो तो ऐसा हो सहरा हो तो ऐसा हो, एक ख़ाल ए सुवैदा में पहनाई ए दो आलम फैला हो तो ऐसा हो सिमटा हो तो ऐसा हो, ऐ क़ैस ए जुनूँ पेशा इंशा को कभी देखा वहशी हो तो ऐसा हो रुस्वा हो तो ऐसा हो, दरिया ब हुबाब अंदर तूफ़ाँ ब सहाब अंदर महशर ब हिजाब अंदर होना हो तो ऐसा हो, हमसे नहीं रिश्ता भी हमसे नहीं मिलता भी है पास वो बैठा भी धोखा हो तो ऐसा हो, वो भी रहा बेगाना हम ने भी - [वो एक रात की गर्दिश में इतना हार गया](https://bazmeshayari.com/wo-ek-raat-ki-gardish-me/): वो एक रात की गर्दिश में इतना हार गया लिबास पहने रहा और बदन उतार गया, हसब नसब भी किराए पे लोग लाने लगे हमारे हाथ से अब ये भी कारोबार गया, उसे क़रीब से देखा तो कुछ शिफ़ा पाई कई बरस मेरे जिस्म से बुख़ार गया, तुम्हारी जीत का मतलब है जंग फिर होगी हमारे हार का मतलब है इंतिशार गया, तू एक साल में एक साँस भी न जी पाया मैं एक सज्दे में सदियाँ कई गुज़ार गया..!! ~हसीब सोज़ - [ख़ुद को इतना जो हवादार समझ रखा है](https://bazmeshayari.com/khud-ko-itna-jo-hawadar/): ख़ुद को इतना जो हवादार समझ रखा है क्या हमें रेत की दीवार समझ रखा है, हमने किरदार को कपड़ों की तरह पहना है तुम ने कपड़ों ही को किरदार समझ रखा है, मेरी संजीदा तबीअत पे भी शक है सब को बाज़ लोगों ने तो बीमार समझ रखा है, उसको ख़ुद्दारी का क्या पाठ पढ़ाया जाए भीख को जिसने पुरस्कार समझ रखा है, तू किसी दिन कहीं बे मौत न मारा जाए तू ने यारों को मददगार समझ रखा है..!! ~हसीब सोज़ - [दर्द आसानी से कब पहलू बदल कर...](https://bazmeshayari.com/dard-aasaani-se-kab-pahlu/): दर्द आसानी से कब पहलू बदल कर निकला आँख का तिनका बहुत आँख मसल कर निकला, तेरे मेहमान के स्वागत का कोई फूल थे हम जो भी निकला हमें पैरों से कुचल कर निकला, शहर की आँखें बदलना तो मेरे बस में न था ये किया मैं ने कि मैं भेस बदल कर निकला, मेरे रस्ते के मसाइल थे नोकिले इतने मेरे दुश्मन भी मेरे पैरों से चल कर निकला, डगमगाने ने दिए पाँव रवादारी ने मैं शराबी था मगर रोज़ सँभल कर निकला..!! ~हसीब सोज़ - [फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था](https://bazmeshayari.com/faasle-aise-bhi-honge-ye-kabhi/): फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था, वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार सू मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था, रात भर पिछली सी आहट कान में आती रही झाँक कर देखा गली में कोई भी आया न था, मैं तेरी सूरत लिए सारे ज़माने में फिरा सारी दुनिया में मगर कोई तेरे जैसा न था, आज मिलने की ख़ुशी में सिर्फ़ मैं जागा नहीं तेरी आँखों से भी लगता है कि तू सोया न था, ये सभी वीरानियाँ उस के जुदा - [जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख...](https://bazmeshayari.com/jina-mushkil-hai-ki-aasaan/): जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो, फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सर ए मिंबर है किस के है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो, ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुम ने क्यूँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो, इन चराग़ों के तले ऐसे अँधेरे क्यूँ है तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो, तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह कहाँ लाए हैं ये - [गर मयकश हूँ तो जाम का मै तलबगार हूँ](https://bazmeshayari.com/gar-maykash-hoon-to-jaam-ka/): गर मयकश हूँ तो जाम का मै तलबगार हूँ शिकस्तादिल हूँ मगर गम का खरीदार हूँ, काफिलों की बेरूखी से डर क्यूँ लगे मुझे ? मुद्दत से हूँ सफर मे मंजिल का पैरोकार हूँ, हर शब इंतजार मे गुजरी अपनी अब तक इस खामोश सी सहर का मै कुसूरवार हूँ, महफिल मे तेरा ये तगाफुल भी देखा हमने यूँ कहने को सबकी नजर मे रसूखदार हूँ, ये खुदगरजी के तौर तरीके आते नही हमे सर ए राह लुटने का मै ही तो जिम्मेदार हूँ, अश्क जो सूख चले थे फिर वो बहते कैसे इस बज्म ए जश्न मे फकत मै - [ज़ब्त ए ग़म पर ज़वाल क्यों आया](https://bazmeshayari.com/zabt-e-gam-par-jawal-kyo/): ज़ब्त ए ग़म पर ज़वाल क्यों आया शिद्दतों में उबाल क्यों आया ? गुल से खिलवाड़ कर रही थी हवा दिल को तेरा ख़याल क्यों आया ? इश्क़ तो हिज्र की अलामत है वस्ल का फिर सवाल क्यों आया ? ऐसा बदली ने क्या किया आख़िर सूरज इतना निढाल क्यों आया ? सूनी आँखों में क्या मिला तुमको झील जैसा ख़याल क्यों आया ? उम्र भर आईने पे रखी नज़र अक्स में फिर ये बाल क्यों आया ? यूँही पागल हवा के छूने से तुझमें दरिया उछाल क्यों आया ? इश्क़ तुम को नहीं हुआ तो कहो शायरी में कमाल - [ये किन ख़यालों में खो रहे हो नई है...](https://bazmeshayari.com/ye-kin-khyalo-me-kho-rahe-ho/): ये किन ख़यालों में खो रहे हो नई है बुनियाद ए आशियाना चमन की तामीर इस तरह हो कि रश्क तुम पर करे ज़माना, ये जान लो किस मक़ाम पर हो चुना है किस रहगुज़र को तुमने उठो कि तहज़ीब ए नौ ने बढ़ कर बदल दिया दहर का फ़साना, तुम्हारे अज़्म ओ अमल में पिन्हाँ फ़रोग़ ए आलम की क़ुव्वतें हैं बदल दो तदबीर से मुक़द्दर हनूज़ हालात का निशाना, जो दिल में मंज़िल की आरज़ू है तो सीख लो तुम ऐ नौजवानो हर एक आफ़त का रुख़ बदलना हर एक मुसीबत पर मुस्कुराना, तुम्हें ख़बर है कि अहद - [रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई](https://bazmeshayari.com/rahne-ko-sada-dahar-me-aata/): रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई, डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई, एक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई, माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे रात ढले शम्अ बुझाता नहीं कोई, साक़ी से गिला था तुम्हें मयख़ाने से शिकवा अब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोई, हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई, अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क - [वो दिल नवाज़ है लेकिन नज़र शनास नहीं](https://bazmeshayari.com/wo-dil-nawaz-hai-lekin/): वो दिल नवाज़ है लेकिन नज़र शनास नहीं मेरा इलाज मेरे चारागर के पास नहीं, तड़प रहे हैं ज़बाँ पर कई सवाल मगर मेरे लिए कोई शायान ए इल्तिमास नहीं, तेरे जिलौ में भी दिल काँप काँप उठता है मेरे मिज़ाज को आसूदगी भी रास नहीं, कभी कभी जो तेरे क़ुर्ब में गुज़ारे थे अब उन दिनों का तसव्वुर भी मेरे पास नहीं, गुज़र रहे हैं अजब मरहलों से दीदा ओ दिल सहर की आस तो है ज़िंदगी की आस नहीं, मुझे ये डर है तेरी आरज़ू न मिट जाए बहुत दिनों से तबीअ’त मेरी उदास नहीं..!! ~नासिर काज़मी - [वो इस अदा से जो आए तो क्यूँ भला न...](https://bazmeshayari.com/wo-is-ada-se-jo-aaye-to/): वो इस अदा से जो आए तो क्यूँ भला न लगे हज़ार बार मिलो फिर भी आश्ना न लगे, कभी वो ख़ास इनायत कि सौ गुमाँ गुज़रीं कभी वो तर्ज़ ए तग़ाफ़ुल कि महरमाना लगे, वो सीधी सादी अदाएँ कि बिजलियाँ बरसें वो दिल बराना मुरव्वत कि आशिक़ाना लगे, दिखाऊँ दाग़ ए मोहब्बत जो नागवार न हो सुनाऊँ क़िस्सा ए फ़ुर्क़त अगर बुरा न लगे, बहुत ही सादा है तू और ज़माना है अय्यार ख़ुदा करे कि तुझे शहर की हवा न लगे, बुझा न दें ये मुसलसल उदासियाँ दिल को वो बात कर कि तबीअ’त को ताज़ियाना लगे, जो - [वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए](https://bazmeshayari.com/wo-sahilo-pe-gaane-wale/): वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए ? वो सुब्ह आते आते रह गई कहाँ जो क़ाफ़िले थे आने वाले क्या हुए ? मैं उन की राह देखता हूँ रात भर वो रौशनी दिखाने वाले क्या हुए ? ये कौन लोग हैं मेरे इधर उधर वो दोस्ती निभाने वाले क्या हुए ? वो दिल में खुबने वाली आँखें क्या हुईं वो होंट मुस्कुराने वाले क्या हुए ? इमारतें तो जल के राख हो गईं इमारतें बनाने वाले क्या हुए ? अकेले घर से पूछती है बे कसी तेरा दिया जलाने वाले क्या हुए ? - [जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर...](https://bazmeshayari.com/jab-bhi-is-shahar-me-kamare-se/): जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला मेरे स्वागत को हर एक जेब से खंजर निकला, तितलियों फूलों का लगता था जहाँ पर मेला प्यार का गाँव वो बारूद का दफ़्तर निकला, डूब कर जिसमे उबर पाया न मैं जीवन भर एक आँसू का वो कतरा तो समुंदर निकला, मेरे होठों पे दुआ उसकी जुबाँ पे ग़ाली जिसके अन्दर जो छुपा था वही बाहर निकला, ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर इतराता रहा मेरा सब रूप वो मिट्टी की धरोहर निकला, वो तेरे द्वार पे हर रोज़ ही आया लेकिन नींद टूटी तेरी जब हाथ से अवसर - [ये आरज़ू थी तुझे गुल के रूबरू करते](https://bazmeshayari.com/ye-aarzoo-thi-tujhe-gul-ke/): ये आरज़ू थी तुझे गुल के रूबरू करते हम और बुलबुल ए बेताब गुफ़्तुगू करते, पयाम्बर न मयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ ज़बान ए ग़ैर से क्या शरह ए आरज़ू करते, मेरी तरह से मह ओ मेहर भी हैं आवारा किसी हबीब की ये भी हैं जुस्तुजू करते, हमेशा रंग ए ज़माना बदलता रहता है सफ़ेद रंग हैं आख़िर सियाह मू करते, लुटाते दौलत ए दुनिया को मय कदे में हम तिलाई साग़र ए मय नुक़रई सुबू करते, हमेशा मैं ने गरेबाँ को चाक चाक किया तमाम उम्र रफ़ूगर रहे रफ़ू करते, जो देखते तेरी ज़ंजीर ए ज़ुल्फ़ का आलम - [कुछ भी था सच के तरफ़दार हुआ...](https://bazmeshayari.com/kuch-bhi-tha-sach-ke-tarafdaar/): कुछ भी था सच के तरफ़दार हुआ करते थे तुम कभी साहब ए किरदार हुआ करते थे, सुनते हैं ऐसा ज़माना भी यहाँ गुज़रा है हक़ उन्हें मिलता जो हक़दार हुआ करते थे, तुझको भी ज़ोम सा रहता था मसीहाई का और हम भी तेरे बीमार हुआ करते थे, एक नज़र रोज़ कहीं जाल बिछाए रखती और हम रोज़ गिरफ़्तार हुआ करते थे, हमको मालूम था आना तो नहीं तुझको मगर तेरे आने के तो आसार हुआ करते थे, इश्क़ करते थे फ़क़त पास ए वफ़ा रखने को लोग सच मुच के वफ़ादार हुआ करते थे, आईना ख़ुद भी सँवरता - [मुसाफ़िर भी सफ़र में इम्तिहाँ देने से...](https://bazmeshayari.com/musafir-bhi-safar-me/): मुसाफ़िर भी सफ़र में इम्तिहाँ देने से डरते हैं मोहब्बत क्या करेंगे वो जो जाँ देने से डरते हैं, तेरी यादों के मौसम भी तुझे रुस्वा नहीं करते सुलगते हैं दिल ओ जाँ और धुआँ देने से डरते हैं, शरीक ए ज़िंदगी है एतिबार ए ज़िंदगी वर्ना मकाँ मालिक किराए पर मकाँ देने से डरते हैं, बुज़ुर्गों की कोई सुनता नहीं है इस ज़माने में बड़े छोटों के बारे में ज़बाँ देने से डरते हैं , मेरे क़ातिल की मेरे घर से ही इमदाद होती है मेरे भाई मेरे हक़ में बयाँ देने से डरते हैं..!! ~नवाज़ देवबंदी - [नींदों का बोझ पलकों पे ढोना पड़ा मुझे](https://bazmeshayari.com/neendon-ka-bojh-palkon-pe/): नींदों का बोझ पलकों पे ढोना पड़ा मुझे आँखों के इल्तिमास पे सोना पड़ा मुझे, ता उम्र अपने काँधों पे बे गोर बे कफ़न अपनी अना की लाश को ढोना पड़ा मुझे, कमज़र्फ़ ना ख़ुदाओं के एहसाँ से बच गया हालाँ कि कश्तियों को डुबोना पड़ा मुझे, वो मेरी बेबसी पे कुछ इतना हँसा नवाज़ हँसने के एहतिराम में रोना पड़ा मुझे..!! ~नवाज़ देवबंदी - [सच बोलने के तौर तरीक़े नहीं रहे](https://bazmeshayari.com/sach-bolne-ke-taur-tarike/): सच बोलने के तौर तरीक़े नहीं रहे पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे, वैसे तो हम वही हैं जो पहले थे दोस्तो हालात जैसे पहले थे वैसे नहीं रहे, ख़ुद मर गया था जिन को बचाने में पहले बाप अब के फ़साद में वही बच्चे नहीं रहे, दरिया उतर गया है मगर बह गए हैं पुल उस पार आने जाने के रस्ते नहीं रहे, सर अब भी कट रहे हैं नमाज़ों में दोस्तो अफ़्सोस तो ये है कि वो सज्दे नहीं रहे..!! ~नवाज़ देवबंदी - [हर गम से मुस्कुराने का हौसला मिलता है](https://bazmeshayari.com/har-gam-se-muskurane/): हर गम से मुस्कुराने का हौसला मिलता है ये दिल ही तो है जो गिरता और संभलता है, जलते दिल की रौशनी में तुम ढूँढ लो मंज़िल चिराग़ को देखो जो बड़े शौक से जलता है, दर्द भरी दुनियाँ में ख़ुद को पत्थर बना डालो ऐसा दिल न रखो जो मुहब्बत में पिघलता है, तुम समझ लेना उम्मीदों की शहनाइयाँ उसे कोई आह गर तुम्हारे दिल से निकलता है, किसी की याद सताए तो शाम का दिल देखो जो अपनी सुबह के लिए कई रंग बदलता है, ज़िन्दगी शय है जीने की जी लो ऐ दोस्तों ! लाख रौशनी हो - [एक ही धरती हम सब का घर जितना...](https://bazmeshayari.com/ek-hi-dharti-ham-sab-ka/): एक ही धरती हम सब का घर जितना तेरा उतना मेरा दुख सुख का ये जंतर मंतर जितना तेरा उतना मेरा, गेहूँ चावल बाँटने वाले झूटा तौलें तो क्या बोलें यूँ तो सब कुछ अंदर बाहर जितना तेरा उतना मेरा, हर जीवन की वही विरासत आँसू सपना चाहत मेहनत साँसों का हर बोझ बराबर जितना तेरा उतना मेरा, साँसें जितनी मौजें उतनी सब की अपनी अपनी गिनती सदियों का इतिहास समुंदर जितना तेरा उतना मेरा, ख़ुशियों के बटवारे तक ही ऊँचे नीचे आगे पीछे दुनिया के मिट जाने का डर जितना तेरा उतना मेरा..!! ~निदा फ़ाज़ली - [दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है](https://bazmeshayari.com/duniya-jise-kahte-hai-2/): दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है, अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है, बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है, ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है हर गाम पे पहरा है फिर भी इसे खोना है, ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है, आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को - [वो मेरे घर नहीं आता मैं उसके घर नहीं जाता](https://bazmeshayari.com/wo-mere-ghar-nahi/): वो मेरे घर नहीं आता मैं उसके घर नहीं जाता मगर इन एहतियातों से ताअल्लुक़ मर नहीं जाता, बुरे अच्छे हो जैसे भी हों सब रिश्ते यहीं के हैं किसी को साथ दुनियाँ से कोई ले कर नहीं जाता, घरों की तरबीयत क्या आ गई टीवी के हाथों में कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता, खुले थे शहर में सौ दर मगर एक हद के अन्दर ही कहाँ जाता अगर मैं लौट के फिर घर नहीं जाता, मुहब्बत के ये आँसूं है इन्हें आँखों में रहने दो शरीफों के घरों का मसअला बाहर नहीं जाता, वसीम उस - [जब लहजे बदल जाएँ तो वज़ाहतें कैसी ?](https://bazmeshayari.com/jab-lahje-badal-jaayen/): जब लहजे बदल जाएँ तो वज़ाहतें कैसी ? नई मयस्सर हो जाएँ तो पुरानी चाहतें कैसी ? वस्ल में गुज़रे लम्हे हैं अनमोल यादें हिज़्र में सुख, खुशियाँ, राहतें कैसी ? लोग बदल जाते हैं दिल भर जाने पे भी ला हासिल तलाश, चेहरों में शबाहतें कैसी ? हर फ़र्द ही बना है ख़ुद साख्ता पारसा यहाँ दुनियाँ दिखावे के लिए हों तो इबादतें कैसी ?? - [सोच के ख़ुद ही बताएं ये बताने वाले](https://bazmeshayari.com/soch-ke-khud-hi/): सोच के ख़ुद ही बताएं ये बताने वाले तूने सीखे हैं जो अंदाज़ ज़माने वाले, आधे रस्ते से पलटने की अज़ीयत क्या है तूने सोचा ही नहीं हाथ छुड़ाने वाले, तुझ पे उस वक़्त खुलेगा कि अज़ीयत क्या है तुझ से जब रूठ गए तुझको मनाने वाले, तू जो कहता था कि तू वक़्त बदल देगा क्या ले के आ सकता है तू दिन वो सुहाने वाले ? दुःख पुराना मैं नए लोगों से कैसे बांटूं ? काश ! मिल जाए कहीं लोग वो पुराने वाले..!! - [दिल ए बेताब की मुझको हिमायत अब नहीं करनी](https://bazmeshayari.com/dil-e-betab-ki/): दिल ए बेताब की मुझको हिमायत अब नहीं करनी मुझे आज़ाद रहना हैं मुहब्बत अब नहीं करनी, गिला शिकवा जो करता हूँ तो अपने रूठ जाते हैं मुझे ख़ामोश रहना है, शिकायत अब नहीं करनी, ज़रा सी चोट लगती है ये दिल फिर टूट जाता है शिकस्ता दिल को रहने दो मरम्मत अब नहीं करनी, शराफ़त ओढ़ रखी थी बहुत कुछ सह लिया अब तक बुरे बन जाएँगे हम भी रियायत अब नहीं करनी, नहीं कुछ भी हुआ हासिल लुटा कर प्यार की दौलत कभी बे फैज़ लोगों से रफ़ाक़त अब नहीं करनी..!! - [कैसे होता है मुमकिन ये गवारा करना](https://bazmeshayari.com/kaise-hota-hai-mumkin/): कैसे होता है मुमकिन ये गवारा करना दिल में बसे हुए लोगो से किनारा करना, कुछ मुहब्बत के भी क़ानून हुआ करते हैं किस को मंज़ूर है चाहत में ख़सारा करना, ज़िन्दगी होती है मीरास मुहब्बत दिल की यूँ नहीं होता है नफ़रत में गुज़ारा करना, उसकी बख्शीश का भी इम्कान तो होता होगा जिस किसी शख्स की आदत है कफारा करना, जान हाज़िर है मुनव्वर जो तू क़ातिल समझे जब ज़रूरत हो तो हल्का सा इशारा करना..!! - [मगरूर परिंदों को ये ऐलान गया है](https://bazmeshayari.com/magrur-parindon-ko-ye/): मगरूर परिंदों को ये ऐलान गया है सय्याद नशेमन का पता जान गया है, यानि जिसे दीमक लगी जाती थी वो मैं था अब आ के मेरा मेरी तरफ ध्यान गया है, शीशे में भले उसने मेरी नक़ल उतारी ख़ुश हूँ कि मुझे कोई तो पहचान गया है, अब बात तेरी कुन पर है कुछ कर मेरे मौला एक शख्स तेरे दर से परेशान गया है, ये नाम ओ नसब जा के ज़माने को बताओ दरवेश तो दस्तक से ही पहचान गया है..!! - [सब की कहानी एक तरफ़ है...](https://bazmeshayari.com/sabki-kahani-ek-taraf/): सबकी कहानी एक तरफ़ है मेरा क़िस्सा एक तरफ़ एक तरफ़ सैराब हैं सारे और मैं प्यासा एक तरफ़, एक तरफ़ तुम्हें जल्दी है उसके दिल में घर करने की एक तरफ़ वो कर देता है रफ़्ता रफ़्ता एक तरफ़, मेरी मर्ज़ी थी मैं ज़र्रे चुनता या लहरें चुनता उसने सहरा एक तरफ़ रखा और दरिया एक तरफ़, मैं ने अब तक जितने भी लोगों में ख़ुद को बाँटा है बचपन से रखता आया हूँ तेरा हिस्सा एक तरफ़, जब से उस ने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ़ उसका कमरा एक तरफ़ है बाक़ी दुनिया एक तरफ़, यूँ - [ख़ाली हाथ ही जाना है क्या खोना क्या पाना है](https://bazmeshayari.com/khaali-hath-hi-jaana/): ख़ाली हाथ ही जाना है क्या खोना क्या पाना है चाहे जितने नाते जोड़ें एक दिन टूट ही जाना है, जाने कितने किरदारों से मिल कर बनी कहानी है पन्ना पन्ना पढ़ता चल ये दुनियाँ एक अफसाना है, उसकी आँख में थोड़े आँसूं मेरी याद के रहतें हैं हो सकता है भूल गया हो दिल भी तो बहलाना है, जाने क्या क्या भूल गए हम तू ही तू बस याद रहा तुझे भूलाने की कोशिश है जोग तो एक बहाना है, यादों को पलटा तो ये जाना बीच के पन्ने गायब है तेरे पास तो होंगे ही फिर क्या पढ़ना - [ज़िन्दगी भर अज़ाब सहने को](https://bazmeshayari.com/zindagi-bhar-azaab-sahne/): ज़िन्दगी भर अज़ाब सहने को दिल मिला है उदास रहने को, एक चुप के हज़ारहा मफ़हूम और क्या रह गया है कहने को ? चाँद जिसकी जबीं पे झुकता हो वो तरसती है एक गहने को, आसमां से उतर पड़ा सूरज चलते दरिया के साथ बहने को, घर में तुम भी रहा करो मोहसिन घर बनाते है लोग रहने को..!! - [अदाएँ हश्र जगाएँ वो इतना दिलकश है](https://bazmeshayari.com/adayen-hashr-jagayen-wo/): अदाएँ हश्र जगाएँ वो इतना दिलकश है ख्याल हर्फ़ न पाएँ वो इतना दिलकश है, बहिश्ती गूंचों से गूंधा गया सुराही बदन गुलाब ख़ुशबू चुराएँ वो इतना दिलकश है, बना के ख़ुश हुआ इतना कि अब भी लेता है ख़ुदा ख़ुद अपनी बलाएँ वो इतना दिलकश है, क़दम इरम में धरे ख़ुश क़दम तो हूर ओ गुलाम चिराग़ घी के जलाएं वो इतना दिलकश है, जिन्होंने साया भी देखा वो हूर का घूँघट मुहाल है कि उठाएँ वो इतना दिलकश है, ख़ुदा ने इसलिए उसे बहिश्त से भेजा फ़रिश्ते करते खताएँ वो इतना दिलकश है, चमन को जाए तो दस - [ये जो दीवाने से दो चार नज़र आते है](https://bazmeshayari.com/ye-jo-deewane-se/): ये जो दीवाने से दो चार नज़र आते है उनमे कुछ साहिब ए असरार नज़र आते है, तेरी महफ़िल का भरम रखते हैं सो जाते हैं वरना ये लोग तो बेदार नज़र आते हैं, दूर तक कोई सितारा है न कोई जुगनू मर्ग ए उम्मीद के आसार नज़र आते है, मेरे दामन में शरारों के सिवा कुछ भी नहीं आप फूलों के ख़रीदार नज़र आते है, कल जिन्हें छू नहीं सकती थी फरिश्तों की नज़र आज वो रौनक ए बाज़ार नज़र आते है, हश्र में कौन गवाही मेरी देगा सागर सब तुम्हारे ही तरफ़दार नज़र आते है..!! ~सागर सिद्दीकी   - [कभी यूँ भी आ मेरी आँख में...](https://bazmeshayari.com/kabhi-yun-bhi-aa/): कभी यूँ भी आ मेरी आँख में कि मेरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उस रात की कभी सहर न हो, वो बड़ा रहीम ओ करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे गर तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआओं में असर न हो, मेंरे बाज़ुओं में थकी थकी अभी महव ए ख़्वाब है चाँदनी न उठे सितारों की पालकी अभी आहटों का गुज़र न हो, ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँख में पिछली रात की चाँदनी न बुझे ख़राबे की रौशनी कभी बे चराग़ ये घर न हो, कभी दिन - [नये कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ...](https://bazmeshayari.com/naye-kapade-badal-kar/): नये कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए वो शख्स तो शहर ही छोड़ गया अब मैं बाहर जाऊँ किस के लिए, जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई इन जलती बलती गलियों में अब खाक़ उड़ाऊँ किस के लिए, वो शहर में था तो उसके लिए औरो से भी मिलना पड़ता था अब ऐसे वैसे लोगो के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए, अब शहर में उसका बदल ही नहीं कोई वैसा जान ए ग़ज़ल ही नहीं उन्वान ए ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुलदान सजाऊँ किस के लिए, मुद्दत - [लाख रहे शहरों में फिर भी अन्दर से देहाती थे](https://bazmeshayari.com/laakh-rahe-shaharon-me/): लाख रहे शहरों में फिर भी अन्दर से देहाती थे दिल के अच्छे लोग थे लेकिन थोड़े से जज़्बाती थे, अब भी अक्सर ख़्वाब में वो धुँधले चेहरे आते है मेरी नन्ही गुड़िया की शादी में जो नन्हे बाराती थे, अपने गिर्द लकीरें खींची और फिर उनमें क़ैद हुए इस दुनियाँ में खेल थे जितने सारे ही तबक़ाती थे, झोपड़ियों में रहने वाले उनकी फ़ितरत जान गए कभी कभी यूँ चढ़ आने वाले नाले जो बरसाती थे, जिन बादलो ने सुख बरसाया, जिनसे छाँव मिली आँखें खोल के देखा तो वो सब मौसम लम्हाती थे, जिनको बड़ा माना था मैंने - [कौन मुन्सफ़, कहाँ इंसाफ़, किधर का दस्तूर](https://bazmeshayari.com/kaun-munsaf-kahan-insaf/): कौन मुन्सफ़, कहाँ इंसाफ़, किधर का दस्तूर अब ये मिज़ान सजावट के सिवा कुछ भी नहीं, अदालत की ईमारत, ये सुतून ओ दर ओ बाम सब एक बेकार बनावट के सिवा कुछ भी नही, सच वकीलों की भी उजरत नहीं देने पाता झूठ के लाख गवाहान खड़े बोलते हैं, और हकायेक़ की जगह शहर के आली मुन्सफ़ अद्ल ओ इंसाफ़ की मिज़ान में रोज़ तौलते हैं, अब तो मुन्सफ़ के हथौड़े की धमक भी शायद ज़र की झंकार से ऊँचीं नहीं होने पाती, और कानून की गर्दन में वो ख़म आया है अब ये दस्तार से ऊँचीं नहीं होने पाती, - [अपनी ख़ुद्दारी तो पामाल नहीं कर सकते](https://bazmeshayari.com/apni-khuddari-to-pamaal/): अपनी ख़ुद्दारी तो पामाल नहीं कर सकते उस का नंबर है मगर काल नहीं कर सकते, सीम जाएगा तो फिर नक़्श उभारेंगे कोई काम दीवार पे फ़िलहाल नहीं कर सकते, रह भी सकता है तेरा नाम कहीं लिखा हुआ सारे जंगल की तो पड़ताल नहीं कर सकते, दोस्त तस्वीर बहुत दूर से खींची गई है हम उजागर ये ख़द ओ ख़ाल नहीं कर सकते, रोती आँखों पे मियाँ हाथ तो रख सकते हैं पेश अगर आप को रूमाल नहीं कर सकते, दे न दे काम की उजरत ये है मर्ज़ी उस की पेशा ए इश्क़ में हड़ताल नहीं कर सकते, - [होशियारी ये दिल ए नादान बहुत करता है](https://bazmeshayari.com/hoshiyari-ye-dil-e/): होशियारी ये दिल ए नादान बहुत करता है रंज कम सहता है पर ऐलान बहुत करता है, रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़ कम से कम रात का नुक़सान बहुत करता है, आज कल अपना सफ़र तय नहीं करता कोई हाँ सफ़र का सर ओ सामान बहुत करता है..!! - [बारहा तुझ से कहा था मुझे अपना न बना](https://bazmeshayari.com/baaraha-tujh-se-kaha/): बारहा तुझ से कहा था मुझे अपना न बना अब मुझे छोड़ के दुनिया में तमाशा न बना, एक यही गम मेरे मरने के लिए काफी है जैसा तू चाहता था मुझको मैं वैसा न बना, एक और बात पते की मैं बताऊँ तुझको आख़िरत बनती चली जाएगी, दुनिया न बना, ये ख़ुदा बन के रियायत नहीं करते हैं यारो हुस्न वालों को कभी किब्ला ओ क़ाबा न बना..!! - [अब बेवजह बेसबब दिन को रात नहीं करता](https://bazmeshayari.com/ab-bewajah-besabab-din/): अब बेवजह बेसबब दिन को रात नहीं करता फ़ुर्सत मिले भी तो किसी से बात नहीं करता, वक़्त, ऐतबार, ख़ुलूस, वफ़ा के दावेदारों को सुपुर्द सब कर देता हूँ अपनी ज़ात नहीं करता, लहज़ा नरम रख कर मिलता हूँ आजिज़ी के साथ मगर हर फ़र्द पे जाया सब जज़्बात नहीं करता, तजलील ए मुहब्बत है बेहिसों से मुहब्बत करना पत्थरों पे अयाँ अपने एहसासात नहीं करता, हार जाता हूँ सब से ही अब जान बुझ कर मैं किसी के नसीब में अब मात नहीं करता..!! - [याद ए माज़ी में जो आँखों को सज़ा दी जाए](https://bazmeshayari.com/yaad-e-maazi-me/): याद ए माज़ी में जो आँखों को सज़ा दी जाए उस से बेहतर है कि हर बात भूला दी जाए, जिस से थोड़ी सी भी उम्मीद ज़्यादा हो कभी ऐसी हर शमअ सर ए शाम बुझा दी जाए, मैंने अपनों के रवैये से ये महसूस किया दिल के आँगन में भी दीवार उठा दी जाए, मैंने यारों के बिछड़ने से ये सीखा है सबक़ अपने दुश्मन को भी जीने की दुआ दी जाए..!! - [इंसाफ़ से न महरूम अब कोई शख्स रहेगा](https://bazmeshayari.com/insaaf-se-na-mahrum/): इंसाफ़ से न महरूम अब कोई शख्स रहेगा दुनियाँ में जो जैसा करेगा, वो वैसा ही भरेगा, कागज़ की जो हो नाव वो कब तलक चलेगी ? कोह ए सितम का भी निशाँ पल में मिटेगा, हर शब के गुज़रने पर सहर हो कर रहेगी जो दुःख मिला है तो कभी सुख भी मिलेगा, शैतान के हर मकर से तुम ख़ुद को बचाना जो नेक राहों पे चलेगा बस वही ऐश करेगा, हर शाख़ पे है उल्लू क्यूँ न हो फ़िक्र चमन की गफ़लत में जो रहोगे तो ये चमन भी न बचेगा, कहीं धूप कहीं छाँव यही है असरर - [ख़ुदा से वक़्त ए दुआ हम सवाल कर बैठे](https://bazmeshayari.com/khuda-se-waqt-e/): ख़ुदा से वक़्त ए दुआ हम सवाल कर बैठे वो बुत भी दिल को ज़रा अब संभाल कर बैठे, किया है आँख की गर्दिश से पीस कर सुर्मा वो बे चले ही मुझे पाएमाल कर बैठे, तमाम उम्र परेशाँ रखा दम ए आख़िर बला से मेरी परेशाँ वो बाल कर बैठे, चले हैं तूर को मूसा मगर हमें मतलब कि हम बुतों ही में ये देखभाल कर बैठे, रवाँ हैं अश्क किसी के फ़िराक़ में या रब कोई न पुर्सिश ए वजह ए मलाल कर बैठे, बुरा हो उल्फ़त ए ख़ूबाँ का हमनशीं हम तो शबाब ही में बुरा अपना - [ख़ून से लिखता है तावीज़ ए अजल काग़ज़ पर](https://bazmeshayari.com/khoon-se-likhta-hai/): ख़ून से लिखता है तावीज़ ए अजल काग़ज़ पर वक़्त करता है अजब सिफली अमल काग़ज़ पर, रंज मिटने का नहीं फिर भी तसल्ली के लिए मिसरा ए दर्द की तरतीब बदल काग़ज़ पर, ये तख़य्युल है कि उमडा हुआ दरिया कोई मौजा ए आब ए रवाँ है कि ग़ज़ल काग़ज़ पर, कितने जज़्बे तेरी बे राह रवी ने कुचले हर्फ़ ए आवारा ज़रा देख के चल काग़ज़ पर, खेतियाँ क्या क्या उगाता हूँ सर ए दश्त ए ख़याल लहलहाता है कोई फूल न फल काग़ज़ पर, लफ़्ज़ जब आ के चमकता है सर ए नोक ए क़लम रौशनी देता - [कोई आहट कोई सरगोशी...](https://bazmeshayari.com/koi-aahat-koi-sargoshi/): कोई आहट कोई सरगोशी सदा कुछ भी नहीं घर में एक बेहिस ख़मोशी के सिवा कुछ भी नहीं, नाम एक नायाब सा लिखा था वो भी मिट गया अब हथेली पर लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं, बेछुए एक लम्स का एहसास एक ख़ामोश बात उस के मेरे बीच आख़िर था भी क्या कुछ भी नहीं ? दोस्ती कैसी वफ़ा कैसी तकल्लुफ़ बरतरफ़ आप कुछ भी हों मगर क्या दूसरा कुछ भी नहीं ? देखना ये है कि मिलने किस से पहले कौन आए मेरे घर से उस के घर का फ़ासला कुछ भी नहीं..!! ~बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन - [मत बुरा उसको कहो गरचे वो अच्छा भी नहीं](https://bazmeshayari.com/mat-bura-usko-kaho/): मत बुरा उसको कहो गरचे वो अच्छा भी नहीं वो न होता तो ग़ज़ल मैं कभी कहता भी नहीं, जानता था कि सितमगर है मगर क्या कीजे दिल लगाने के लिए और कोई था भी नहीं, जैसा बेदर्द हो वो फिर भी ये जैसा महबूब ऐसा कोई न हुआ और कोई होगा भी नहीं, वही होगा जो हुआ है जो हुआ करता है मैंने इस प्यार का अंजाम तो सोचा भी नहीं, हाए क्या दिल है कि लेने के लिए जाता है उस से पैमान ए वफ़ा जिसपे भरोसा भी नहीं, बारहा गुफ़्तुगू होती रही लेकिन मेरा नाम उसने पूछा - [ज़ख्म ए वाहिद ने जिसे ता उम्र रुलाया हो](https://bazmeshayari.com/zakhm-e-waahid-ne/): ज़ख्म ए वाहिद ने जिसे ता उम्र रुलाया हो हरगिज़ ना दुखाना दिल जो चोट खाया हो, जिसे हासिल ही नहीं उसे अहमियत क्या ? उनसे पूछो जिन्होंने पा कर भी गँवाया हो, ख़ुशनसीब नहीं यहाँ हर मुस्कुराने वाला किसे पता हँसी के पीछे क्या दर्द छुपाया हो, खौफ़ से तो हर कोई झुका दे ज़माने को बात तब है किसी ने इज्ज़त से सर झुकाया हो, ऐसा भी नहीं कि कोई निभा नहीं रहा रिश्तें तारीफ़ तो तब है जब एक तरफ़ा निभाया हो, तजुर्बा ज़िन्दगी का तुम्हे वही शख्स बताएगा जिसने अपना ही जनाज़ा काँधे पे उठाया हो..!! - [ज़िन्दगानी के काम एक तरफ़](https://bazmeshayari.com/zindgani-ke-kaam-ek/): ज़िन्दगानी के काम एक तरफ़ अक़द का इंतज़ाम एक तरफ़, हां मुहब्बत का नाम एक तरफ़ साज़ो सामां तमाम एक तरफ़, हुस्न पत्थर मिज़ाज ख़ूब रहे हुस्न का एहतराम एक तरफ़, एक तरफ़ है अदालतों की क़तार हाकिम ए बेलगाम एक तरफ़, मेरी तनहाईयां वहीं की वहीं शहर का इंतज़ाम एक तरफ़, दुश्मनों का मिज़ाज और कहीं दोस्त का इंतक़ाम एक तरफ़, साथ तेरा मिला है जब से मुझे रख दिया हर निज़ाम एक तरफ़, आक़िलों की मिसाल और सही बे ख़ुदी का कलाम एक तरफ़, लुत्फ़ क्या है ख़्याल तू ही बता रख दो गर बाद ओ जाम एक - [रिश्तों के जब तार उलझने लगते हैं](https://bazmeshayari.com/rishton-ke-jab-taar/): रिश्तों के जब तार उलझने लगते हैं आपस में घर बार उलझने लगते हैं, माज़ी की आँखों में झाँक के देखूँ तो कुछ चेहरे हर बार उलझने लगते हैं, साल में एक ऐसा मौसम भी आता है फूलों से ही ख़ार उलझने लगते हैं, घर की तन्हाई में अपने आप से हम बन कर एक दीवार उलझने लगते हैं, ये सब तो दुनिया में होता रहता है हम ख़ुद से बेकार उलझने लगते हैं, कब तक अपना हाल बताएँ लोगों को तंग आ कर बीमार उलझने लगते हैं, जब दरिया का कोई छोर नहीं मिलता कश्ती से पतवार उलझने लगते - [चमन में जब भी सबा को गुलाब पूछते हैं](https://bazmeshayari.com/chaman-me-jab-bhi/): चमन में जब भी सबा को गुलाब पूछते हैं तुम्हारी आँख का अहवाल ख़्वाब पूछते हैं, कहाँ कहाँ हुए रौशन हमारे बाद चिराग़ ? सितारे दीदा ए तर से हिसाब पूछते हैं, वो तिश्ना लब भी अज़ब हैं मौज ए सहरा से सुराग ए हब्स मिज़ाज ए सराब पूछते हैं, कहाँ बसी हैं वो यादें उजाड़ना है जिन्हें ? दिलों की बाँझ ज़मीं से अज़ाब पूछते हैं, बरस पड़ी तेरी आँखें तो फिर ये भेद खुला सवाल ख़ुद से भी अपना जवाब पूछते हैं, हवा की हमसफरी से अब और क्या हासिल ? बस अपने शहर को खाना ख़राब पूछते - [हरिस दिल ने ज़माना कसीर बेचा है](https://bazmeshayari.com/haris-dil-ne-zamana/): हरिस दिल ने ज़माना कसीर बेचा है किसी ने जिस्म किसी ने ज़मीर बेचा है, नहीं रही बशीरत की ख़ूबी इंसा में आसास ए अनस का सब ने ख़मीर बेचा है, मज़ाक उड़ा मज़हब का अहल ए इल्म ने जब से आयतों को सर ए बाज़ार बेचा है, इरम भी न मिली जिस के हसूल की खातिर समझ कर ईमां को सब ने हक़ीर बेचा है, बस एक ओहदे की ख़ातिर अमीर ए लश्कर ने मुखालफिन को एक एक तीर बेचा है, बुजुर्ग के हुआ फैज़ान का यहाँ सौदा कि पैरोकारों ने अपना ही पीर बेचा है..!! - [असर उसको ज़रा नहीं होता](https://bazmeshayari.com/asar-usko-zara-nahi/): असर उसको ज़रा नहीं होता रंज राहत फिज़ा नहीं होता, बेवफा कहने की शिकायत है तो भी वादा वफा नहीं होता, जिक़्र ए अग़ियार से हुआ मालूम हर्फ़ ए नासेह बुरा नहीं होता, तुम हमारे किसी तरह न हुए वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता, उसने क्या जाने क्या किया लेकर दिल किसी काम का नहीं होता, नारसाई से दम रुके तो रुके मैं किसी से खफ़ा नहीं होता, तुम मेरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता, हाल ए दिल यार को लिखूँ क्यूँकर ? हाथ दिल से जुदा नहीं होता, क्यूं सुने अर्ज़े मुज़तर ऐ मोमिन - [बुलंद दर्ज़ा है दुनियाँ में माँ बाप का](https://bazmeshayari.com/buland-darza-hai-duniyan/): बुलंद दर्ज़ा है दुनियाँ में माँ बाप का इनके जैसा तो कोई और प्यारा नहीं, इतने एहसान है हम पर माँ बाप के जिनका होता कभी भी उतारा नहीं, जिनका पा कर सहारा बड़ा तू हुआ उनको देता अब क्यूँ तू सहारा नहीं, कर ले जीते जी ख़िदमत तू माँ बाप की ज़िन्दगी फिर ये मिलती दोबारा नहीं, जन्म जिसने दिया कद्र उनकी तू कर ले वो भूखे है प्यासे फ़िक्र उनकी तू कर ले, गम ए ज़िन्दगी को तू ख़ुशियों से भर ले वालिदैन की ख़िदमत मन से तू कर ले..!! - [शिक़स्त ए ज़र्फ़ को पिंदार ए रिंदाना नहीं कहते](https://bazmeshayari.com/shikast-e-zarf-ko/): शिक़स्त ए ज़र्फ़ को पिंदार ए रिंदाना नहीं कहते जो मांगे से मिले हम उसको पैमाना नहीं कहते, जहाँ साक़ी के पा ए नाज़ पर सज़्दा ज़रूरी हो वो बुतखाना है उसको रिंद मयखाना नहीं कहते, जुनूं की शर्त ए अव्वल ज़ब्त है और ज़ब्त मुश्किल है जो दामन चाक कर ले उसको दीवाना नहीं कहते, जो हो जाए किसी का मुस्तकिल बे शिरकत ए ग़ैरे वो दिल काबा है उस दिल को सनमखाना नहीं कहते, निहायत शुक्रिया इस पुर्सिश ए अहवाल का लेकिन हमें आदत नहीं, हम अपना अफ़साना नहीं कहते, जहाँ हर वक़्त एक महफ़िल सजी हो तेरी - [मिलने का भी आख़िर कोई इम्कान बनाते](https://bazmeshayari.com/milne-ka-bhi-aakhir/): मिलने का भी आख़िर कोई इम्कान बनाते मुश्किल थी अगर कोई तो आसान बनाते, रखते कहीं खिड़की कहीं गुलदान बनाते दीवार जहाँ है वहाँ दालान बनाते, थोड़ी है बहुत एक मसाफ़त को ये दुनिया कुछ और सफ़र का सर ओ सामान बनाते, करते कहीं एहसास के फूलों की नुमाइश ख़्वाबों से निकलते कोई विज्दान बनाते, तस्वीर बनाते जो हम इस शोख़अदा की लाज़िम था कि मुस्कान ही मुस्कान बनाते, उस जिस्म को कुछ और समेटा हुआ रखते ज़ुल्फ़ों को ज़रा और परेशान बनाते, कुछ दिन के लिए काम से फ़ुर्सत हमें मिलती कुछ दिन के लिए ख़ुद को भी मेहमान - [दिल दे कर संगदिल को...](https://bazmeshayari.com/dil-de-kar-sangdil/): दिल दे कर संगदिल को ज़िन्दगी दुश्वार नहीं करना यूँ हर किसी से अपने इश्क़ का इजहार नहीं करना, माना बेलौस मुहब्बत तेरी नज़रों में है दो कौड़ी की पर हवस की चाह में हर किसी से प्यार नहीं करना, दिल ए नादां की खता थी हो गया एक दफा तुझसे मगर गुनाह ये मुझे हरगिज़ बार बार नहीं करना..!! - [सताते हो तुम मज़लूमों को सताओ](https://bazmeshayari.com/satate-ho-tum-mazlumon/): सताते हो तुम मज़लूमों को सताओ मगर ये समझ के ज़रा ज़ुल्म ढहाओ मज़ालिम का लबरेज़ जब जाम होगा तो हिटलर के जैसा ही अंज़ाम होगा, तुम्हे है हम को मिटाने की ख्वाहिश तो हमें भी है सर कटाने की ख्वाहिश..!! - [तक़दीर की ग़र्दिश क्या कम थी...](https://bazmeshayari.com/taqdeer-ki-gardish-kya/): तक़दीर की ग़र्दिश क्या कम थी उस पर ये क़यामत कर बैठे, बेताबी ए दिल जब हद से बढ़ी घबड़ा के मुहब्बत कर बैठे, आँखों में छलकते है आँसूं दिल चुपके चुपके रोता है, वो बात हमारे बस की न थी जिस बात की हिम्मत कर बैठे, गम हमने ख़ुशी से मोल लिया उस पर भी हुई ये नादानी, जब दिल की उम्मीदें टूट गई क़िस्मत से शिकायत कर बैठे..!! ~शकील बदायूनी - [पिछले ज़ख़्मों का इज़ाला न ही...](https://bazmeshayari.com/pichle-zakhmon-ka-izala/): पिछले ज़ख़्मों का इज़ाला न ही वहशत करेगा तुझ से वाक़िफ़ हूँ मेरी जाँ तू मोहब्बत करेगा, मैं चला जाऊँगा दुनिया से सिकंदर की तरह अगली सदियों पे मेरा नाम हुकूमत करेगा, पेश है दूसरे आलम में भी तन्हा रहना मैं ने सोचा था तू दुनिया से बग़ावत करेगा, दिल तेरी राह ए अज़िय्यत से पलटने को है क्या तू अब भी न मेरा ख़्वाब हक़ीक़त करेगा, तू मेरी मौत की तस्दीक़ नहीं कर सकता छुएगा तो मुझे और दिल मेरा हरकत करेगा, वाहिमा सहरा नवर्दी का मुदल्लल नहीं है कोई होगा मेरे दिल में तभी हिजरत करेगा, वो जो - [अज़ब रिवायत है क़ातिलों का एहतराम करो](https://bazmeshayari.com/azab-riwayat-hai-qaatilon/): अज़ब रिवायत है क़ातिलों का एहतराम करो गुनाह के बोझ से लदे काँधों को सलाम करो, पहचान गर बनानी हो तुम्हें अपनी इस भीड़ में ख़ुद को न दो तवज्जों दूसरों को बदनाम करो, कोई सिक्को का कोई कुर्सी का है गुलाम यहाँ जो आ ही गए हो तुम भी तो कुछ काम करो, गर चाहत है तुम्हे भी चाभी ए तरक्की की तो रोज़ सुबह ख़ुद से और यारों से धोखे शाम करो, यारों तुम को क्यूँ पड़ गया गैरत का दौरा अभी शाम रंगीन है महफ़िल जवाँ चलो जाम भरो..!! - [दर्द की धूप ढले ग़म के ज़माने जाएँ](https://bazmeshayari.com/dard-ki-dhoop-dhale/): दर्द की धूप ढले ग़म के ज़माने जाएँ देखिए रूह से कब दाग़ पुराने जाएँ, हम को बस तेरी ही चौखट पे पड़े रहना है तुझसे बिछ्ड़ें न किसी और ठिकाने जाएँ, अपनी दीवार ए अना आप ही कर के मिस्मार अपने रूठों को चलो आज मनाने जाएँ, जाने क्या राज़ छुपा है तेरी सालारी में तू जहाँ जाए तेरे पीछे ज़माने जाएँ, रहें गुमनाम तो बस तुझ से ही मंसूब रहें जाने जाएँ तो तेरे नाम से जाने जाएँ, देख पाएँगे उन आँखों में उदासी कैसे अपने दुखड़े न उन को सुनाने जाएँ..!! ~ज़िया ज़मीर - [धोखे पे धोखे इस तरह खाते चले गए](https://bazmeshayari.com/dhokhe-pe-dhokhe-is/): धोखे पे धोखे इस तरह खाते चले गए हम दुश्मनों को दोस्त बनाते चले गए, हर ज़ख्म ज़िंदगी का गले से लगा लिया हम ज़िंदगी से यूँ ही निभाते चले गए, वो नफ़रतों का बोझ लिए घूमते रहे हम चाहतों को उन पे लुटाते चले गए, जो ख़्वाब ज़िंदगी की हक़ीक़त न बन सका उसके ही हसीं फ़रेब में आते चले गए, दर्द ए दिल को छुपाना आसाँ न था मगर हम आड़ मे हँसी की छुपाते चले गए..!! ~रुबीना मुमताज़ रूबी - [अपनों से कोई बात छुपाई नहीं जाती](https://bazmeshayari.com/apno-se-koi-baat/): अपनों से कोई बात छुपाई नहीं जाती ग़ैरों को कभी दिल की बताई नहीं जाती, लग जाती है ग़लती से कभी आग व लेकिन ना दीदा ओ दानिस्ता बुझाई नहीं जाती, तालीम सिखाती नहीं आलिम को सलीक़ा तहज़ीब तो जाहिल को सिखाई नहीं जाती, रुख़ हवाओं का मुआफ़िक़ भी हो फिर भी तूफ़ान में क़िंदील जलाई नहीं जाती, सीधी सी है ये बात मियाँ ऐसे मुसलसल रोने से मुक़द्दर की बुराई नहीं जाती, ऐ साहिब ए तदबीर इशारों से तो हरगिज़ दीवार कराहत की गिराई नहीं जाती, मज़लूम के बहते हुए पुर जोश लहू से तस्वीर मोहब्बत की बनाई नहीं - [हमारे हाफ़िज़े बेकार हो गए साहिब](https://bazmeshayari.com/hamare-haafize-bekar-ho/): हमारे हाफ़िज़े बेकार हो गए साहिब जवाब और भी दुश्वार हो गए साहिब, उसे भी शौक़ था तस्वीर में उतरने का तो हम भी शौक़ से दीवार हो गए साहिब, तीरे लिबास के रंगों में खो गई फ़ितरत ये फूल शूल तो बेकार हो गए साहिब, गले लगा के उसे ख़्वाब में बहुत रोए और इतना रोए कि बेदार हो गए साहिब, हमारी रूह परिंदों को सौंप दी जाए कि ये बदन तो गुनाहगार हो गए साहिब, नज़र मिलाई तो एक आग ने लपेट लिया बदन जला ये तो गुलज़ार हो गए साहिब, चराग दफ्न किए थे नदीम क़ब्रों में - [तेरा लहजा तेरी पहचान मुबारक हो तुझे](https://bazmeshayari.com/tera-lahja-teri-pahchan/): तेरा लहजा तेरी पहचान मुबारक हो तुझे तेरी वहशत तेरा हैजान मुबारक हो तुझे, मैं मोहब्बत का पुजारी हूँ सो मैं जाता हूँ यानि नफ़रत का ये सामान मुबारक हो तुझे, आँख में तंज़ ओ रऊनत की चमक बाक़ी रहे लब पे ये तल्ख़ सी मुस्कान मुबारक हो तुझे, मैं दुआ करता हूँ तू शहर ए चराग़ाँ में रहे तेरा हर ख़्वाब ए गुलिस्तान मुबारक हो तुझे, तू हुकूमत का है शौक़ीन तेरा बनता है बेबसी शहर की सुल्तान मुबारक हो तुझे, मैं तो मर कर भी मेंरी जान बचा लूँगा उसे तुझ में मरता हुआ इंसान मुबारक हो तुझे, - [मुझे आरज़ू जिसकी है उसको ही ख़बर नहीं](https://bazmeshayari.com/mujhe-aarzoo-jiski-hai/): मुझे आरज़ू जिसकी है उसको ही ख़बर नहीं नज़रअंदाज़ कर दूँ ऐसी मेरी कोई नज़र नहीं, मना पाबंदियाँ हज़ार है इक़रार ए इश्क़ पर लेकिन असरार ए इश्क़ में कोई असर नहीं, कभी तो सुकूं की नींद सोए हम भी सारी रात मगर उसके जैसा तो और कोई सितमगर नहीं, आरज़ू है कि बहक जाऊँ उसकी आग़ोश में उसके दिल के सिवा और कोई मेरा घर नहीं..!! - [इस शहर में कहीं पे हमारा मकाँ भी हो](https://bazmeshayari.com/is-shahar-men-kahin/): इस शहर में कहीं पे हमारा मकाँ भी हो बाज़ार है तो हम पे कभी मेहरबाँ भी हो, जागें तो आस पास किनारा दिखाई दे दरिया हो पुरसुकून खुला बादबाँ भी हो, एक दोस्त ऐसा हो कि मेंरी बात बात को सच मानता हो और ज़रा बदगुमाँ भी हो, रस्ते में एक पेड़ हो तन्हा खड़ा हुआ और उसकी एक शाख़ पे एक आशियाँ भी हो, उससे मिले ज़माना हुआ लेकिन आज भी दिल से दुआ निकलती है ख़ुश हो जहाँ भी हो, हम उस जगह चले हैं जहाँ ये ज़मीं नहीं अच्छा हो गर वहाँ पे नया आसमाँ भी - [वतन से उल्फ़त है जुर्म अपना...](https://bazmeshayari.com/watan-se-ulfat-hai/): वतन से उल्फ़त है जुर्म अपना ये जुर्म ता ज़िन्दगी करेंगे है किस की गर्दन पे खून ए ना हक़ फ़ैसला लोग करेंगे, वतनपरस्तों को कह रहे हो वतन का दुश्मन डरो ख़ुदा से जो आज हम से खता हुई है यही खता कल सभी करेंगे, वज़ीफ़ा ख्वारों से क्या शिकायत, हज़ार दें शाह को दुआएँ मदार जिनका है नौकरी पर वो लोग तो नौकरी करेंगे, लिए जो फिरते हैं तमगा ए फन रहे है जो हम ख्याल ए रहजन हमारी आज़ादियों के दुश्मन हमारी क्या रहबरी करेंगे ? ना खौफ़ ए ज़िन्दां न दार का गम ये बात दोहरा - [घर से निकले अगर हम बहक जाएँगे](https://bazmeshayari.com/ghar-se-nikale-agar/): घर से निकले अगर हम बहक जाएँगे वो गुलाबी कटोरे छलक जाएँगे, हमने अल्फ़ाज़ को आइना कर दिया छपने वाले ग़ज़ल में चमक जाएँगे, दुश्मनी का सफ़र एक क़दम दो क़दम तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएँगे, रफ़्ता रफ़्ता हर एक ज़ख़्म भर जाएगा सब निशानात फूलों से ढक जाएँगे, नाम पानी पे लिखने से क्या फ़ाएदा लिखते लिखते तेरे हाथ थक जाएँगे, ये परिंदे भी खेतों के मज़दूर हैं लौट के अपने घर शाम तक जाएँगे, दिन में परियों की कोई कहानी न सुन जंगलों में मुसाफ़िर भटक जाएँगे..!! ~बशीर बद्र - [बसा तो लेते नया दिल में हम मकीं लेकिन](https://bazmeshayari.com/basa-to-lete-naya/): बसा तो लेते नया दिल में हम मकीं लेकिन मिला न आप से बढ़ कर कोई हसीं लेकिन, किसी के बाद ब ज़ाहिर तो कुछ नहीं बदला हमारे पाँव तले अब नहीं ज़मीं लेकिन, जहान ए इश्क़ से बाहर भी एक दुनिया है दिलाया दिल को बहुत हमने ये यकीं लेकिन, यकीं मुझे है मेरे साथ साँप कोई नहीं हर एक हाथ की होती है आस्तीन लेकिन, सब ही फ़रेब था लेकिन वो आख़िरी जुमला कभी मिलेंगे दोबारा यहीं कहीं लेकिन, ये और बात ख़ुशी साथ साथ है अबरक हमारें बीच कोई राब्ता नहीं लेकिन..!! - [मुख़्तसर बात, बात काफी है...](https://bazmeshayari.com/mukhtasar-baat-baat-kaafi/): मुख़्तसर बात, बात काफी है एक तेरा साथ, साथ काफी है, वो जो गुज़र जाए तेरे पहलू में हमको इतनी हयात काफी है, मैं हूँ तेरा और मेरा वज़ूद है तू कुल यही क़ायनात काफी है, लाख कीजिए मगर मुहब्बत में कब कोई एहतियात काफी है, अब नहीं कोई जीतने में नशा तुम से पाई जो मात काफी है..!! - [सूरज से यूँ आँख मिलाना...](https://bazmeshayari.com/suraj-se-yun-aankh/): सूरज से यूँ आँख मिलाना मुश्किल क्या नामुमकिन है, दुनियाँ से इस्लाम मिटाना मुश्किल क्या नामुमकिन है, मुशरिको को दीन सिखाना शायद मुमकिन हो लेकिन, कंकर से क़लमा पढ़वाना मुश्किल क्या ना मुमकिन है, कोई चाहे सारी उम्र लगा दे अपने माँ की ख़िदमत में लोगो, माँ की दूध का क़र्ज़ चुकाना मुश्किल क्या नामुमकिन है, पल में आना पल में जाना फ़र्श से ज़मीं से अर्श तलक, डूबता सूरज वापस लाना मुश्किल क्या नामुमकिन है, सूरज से यूँ आँख मिलाना मुश्किल क्या नामुमकिन है..!! - [इश्क़ ने बख्शी है हमें ये सौगात मुसलसल](https://bazmeshayari.com/ishq-ne-bakhshi-hai/): इश्क़ ने बख्शी है हमें ये सौगात मुसलसल तेरा ही ज़िक्र हमेशा तेरी ही बात मुसलसल,   एक मुद्दत हुई मुझे तेरे कूँचे से निकले हुए होती रहती है फिर भी मुलाकात मुसलसल,   यादों से दिल्लगी दिल की लगी बन जाती है जब तसव्वुर में गुजरती है हर रात मुसलसल,   तुम्हारी मुहब्बत में आज उस मुकाम पर हूँ जहाँ मेरी ज़ात में रहती है तेरी ज़ात मुसलसल..!! - [तअल्लुक़ तर्क करने से मोहब्बत कम...](https://bazmeshayari.com/taalluq-tark-karne-se/): तअल्लुक़ तर्क करने से मोहब्बत कम नहीं होती भड़कती है ये आतिश दिन ब दिन मद्धम नहीं होती, निभाना आश्नाई कर के मुश्किल तो नहीं लेकिन किसी से भी मोहब्बत ना गहाँ यक दम नहीं होती, तुम्हारी सोच पर हैं मुनहसिर रंगीनियाँ दिल की ये महफ़िल बेवफ़ाई से कभी दरहम नहीं होती, उतर जाए जो पूरा इम्तिहान ओ आज़माईश में वो चश्म ए दिल कभी फिर आँसुओं से नम नहीं होती, ज़माना चाहे जितने रंग ओ रुख़ बदले हक़ीक़त में निडरता मर्द ए मैदाँ मोम की मरियम नहीं होती, अजब दस्तूर है अबरार इस दुनिया ए बे पर का शिकस्ता-रंग - [पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो](https://bazmeshayari.com/pahle-janab-koi-shigufa/): पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो फिर कर का बोझ गर्दन पर डाल दो, रिश्वत को हक़ समझ के जहाँ ले रहे हों लोग है और कोई मुल्क तो उसकी मिसाल दो, औरत तुम्हारे पाँव की जूती की तरह है जब बोरियत महसूस हो घर से निकाल दो, चीनी नहीं है घर में लो मेहमान आ गए महँगाई की भट्ठी में शराफ़त उबाल दो..!! ~अदम गोंडवी - [एक बेवा की आस लगती है](https://bazmeshayari.com/ek-beva-ki-aas/): एक बेवा की आस लगती है ज़िंदगी क्यों उदास लगती है, हर तरफ़ छाई घोर तारीकी रौशनी की असास लगती है, पी रहा हूँ हनूज़ अश्क ए ग़म बहर ए ग़म को भी प्यास लगती है, लाख पहनाओ दोस्ती की क़बा दुश्मनी बे लिबास लगती है, मौत के सामने हयात असद सूरत ए इल्तिमास लगती है..!! ~असद रज़ा - [हक़ीक़तों में बदलता सराब चुभने लगा](https://bazmeshayari.com/haqiqaton-men-badalta-saraab/): हक़ीक़तों में बदलता सराब चुभने लगा जो बन सका न हक़ीक़त वो ख़्वाब चुभने लगा, सवाल सख़्त हमारा था पर ख़ुलूस बहुत तुम्हारा फूल सा लेकिन जवाब चुभने लगा, जवान बेटी जहेज़ और बढ़ती महँगाई ज़ईफ़ बाप के दिल में शबाब चुभने लगा, ज़रा सा ज़िक्र भी जिस में नहीं था मंज़िल का हमें वो राहनुमा का ख़िताब चुभने लगा, किताब ए अस्र में अग़राज़ की वजह से असद जो लिख सका न मुसन्निफ़ वो बाब चुभने लगा..!! ~असद रज़ा - [ज़बाँ कुछ और कहती है नज़र...](https://bazmeshayari.com/zaban-kuch-aur-kahti/): ज़बाँ कुछ और कहती है नज़र कुछ और कहती है मगर ये ज़िंदगी की रहगुज़र कुछ और कहती है, बयाँ ये बाग़बाँ का है उजाड़ा बाग़ आँधी ने मगर कटी हुई शाख़ ए शजर कुछ और कहती है, ये उजड़ा जिस्म ज़ख़्मी रूह और सहमी हुई लड़की ज़माना मार डालेगा अगर कुछ और कहती है, दबाव था कि लालच था लगा अख़बार ये पढ़ कर हक़ीक़त और ही कुछ थी ख़बर कुछ और कहती है, निशानी छोड़ जाती हैं असद ये उम्र की राहें मुसाफ़िर कुछ कहे गर्द ए सफ़र कुछ और कहती है..!! ~असद रज़ा - [सीनों में अगर होती कुछ प्यार की गुंजाइश](https://bazmeshayari.com/sino-men-agar-hoti/): सीनों में अगर होती कुछ प्यार की गुंजाइश हाथों में निकलती क्यूँ तलवार की गुंजाइश, पिछड़े हुए गाँव का शायद है वो बाशिंदा जो शहर में ढूंढें है ईसार की गुंजाइश, नफ़रत की तअस्सुब की यूँ रखी गईं ईंटें पैदा हुई ज़ेहनों में दीवार की गुंजाइश, पाकीज़गी रूहों की नीलाम हुई जब से जिस्मों में निकल आई बाज़ार की गुंजाइश, इस तरह खुले दिल से इक़रार नहीं करते रख लीजिए थोड़ी सी इंकार की गुंजाइश, गर अज़्म मुसम्मम हो और जेहद ए मुसलसल भी सहरा में निकल आए गुलज़ार की गुंजाइश, समझें कि न समझें वो हम ने तो असद - [बादशाहों को सिखाया है क़लंदर होना](https://bazmeshayari.com/baadshahon-ko-sikhaya-hai/): बादशाहों को सिखाया है क़लंदर होना आप आसान समझते हैं मुनव्वर होना, एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है तुमने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना, सिर्फ़ बच्चों की मोहब्बत ने क़दम रोक लिए वर्ना आसान था मेरे लिए बे घर होना, हम को मालूम है शोहरत की बुलंदी हमने क़ब्र की मिट्टी का देखा है बराबर होना, इसको क़िस्मत की ख़राबी ही कहा जाएगा आपका शहर में आना मेरा बाहर होना, सोचता हूँ तो कहानी की तरह लगता है रास्ते से मेरा तकना तेरा छत पर होना, मुझको क़िस्मत ही पहुँचने नहीं देती वर्ना एक एज़ाज़ है उस - [यहाँ शोर बच्चे मचाते नहीं हैं...](https://bazmeshayari.com/yahan-shor-bachche-machaate/): यहाँ शोर बच्चे मचाते नहीं हैं परिंदे भी अब गीत गाते नहीं हैं, वफ़ा के फ़लक पर मोहब्बत के तारे ख़ुदा जाने क्यूँ झिलमिलाते नहीं हैं, दिलासा न दे यूँ हमें शैख़ सादी दिलों में समुंदर समाते नहीं हैं विरासत में वाइ’ज़ लक़ब पाने वाले मोहल्ले की मस्जिद में जाते नहीं हैं, मुसव्विर ने तस्वीर-ए-फ़ुर्सत बना कर कहा वक़्त को हम बचाते नहीं हैं, ख़स-ओ-ख़ार से घोंसला शह कड़ी पर अबाबील क्यूँ अब बनाते नहीं हैं, हमें तुम सिखाओ तुम्हें हम सिखाएँ सभी काम तो हम को आते नहीं हैं, ये दुनिया ए दो रंग ओ रोज़ा के मंज़र कि - [सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं](https://bazmeshayari.com/sau-men-sattar-aadmi/): सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं दिल रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है ? कोठियों से मुल्क के मेआर को मत आँकिए असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है, जिस शहर में मुंतज़िम अंधे हों जल्वागाह के उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है, ये नई पीढ़ी पे निर्भर है वही जजमेंट दे फ़लसफ़ा गाँधी का मौजूँ है कि नक्सलवाद है, यह ग़ज़ल मरहूम मंटो की नज़र है दोस्तो जिसके अफ़साने में ठंडे गोश्त की रूदाद है..!! ~अदम गोंडवी - [ख़ुद्दार मेरे शहर का फाक़ो से मर गया](https://bazmeshayari.com/khuddar-mere-shahar-ka/): ख़ुद्दार मेरे शहर का फाक़ो से मर गया राशन जो आ रहा था वो अफ़सर के घर गया, चढ़ती रही मज़ार पे चादरें तो बे शुमार बाहर जो एक फ़कीर था सर्दी से मर गया, रोटी अमीर ए शहर के कुत्तों ने छीन ली फाक़ा गरीब ए शहर के बच्चों में बट गया, चेहरा बता रहा था कि मारा है भूख़ ने हाकिम ने कह दिया कि कुछ खा के मर गया..!! - [होंठों पे उसके जुम्बिश ए इंकार भी नहीं](https://bazmeshayari.com/honthon-pe-uske-jumbish/): होंठों पे उसके जुम्बिश ए इंकार भी नहीं आँखों में कोई शोख़ी ए इक़रार भी नहीं, बस्ती में कोई मूनिस ओ ग़म ख़्वार भी नहीं ग़ालिब का हाए कोई तरफ़दार भी नहीं, कश्ती बुरी तरह है भँवर में फँसी हुई लेकिन हमारे हाथ में पतवार भी नहीं, उन को सज़ाएँ दी हैं ज़माने ने बारहा मुल्ज़िम भी जो नहीं हैं गुनाहगार भी नहीं, तोहफ़ा अजब दिया है चमन को बहार ने फूलों का ज़िक्र क्या है कोई ख़ार भी नहीं, शायद तअ’ल्लुक़ात में अब इंजिमाद है पहली सी बात बात पे तकरार भी नहीं, शो पीस तो बना दिया हालात - [बिस्तर ए मर्ग पर ज़िंदगी की तलब](https://bazmeshayari.com/bistar-e-marg-par/): बिस्तर ए मर्ग पर ज़िंदगी की तलब जैसे ज़ुल्मत में हो रौशनी की तलब, कल तलक कमतरी जिन की तक़दीर थी आज उन को हुई बरतरी की तलब, उम्र भर अपनी पूजा कराता रहा अब हुई उस को भी बंदगी की तलब, चीख़ते थे बहुत हम हर एक बात पर हो गई अब मगर ख़ामुशी की तलब, प्यास दुनिया की जिस ने बुझाई सदा उस समुंदर को है तिश्नगी की तलब, चार पैसे जो आए ज़रा हाथ में उन को भी हो गई रहबरी की तलब, देख कर ये नुमाइश की दुनिया असद हम ने महसूस की सादगी की तलब..!! - [हर आह ग़म ए दिल की ग़म्माज़ नहीं होती](https://bazmeshayari.com/har-aah-gam-e-dil/): हर आह ग़म ए दिल की ग़म्माज़ नहीं होती और वाह मसर्रत का आग़ाज़ नहीं होती, जो रोक नहीं पाती अश्कों की रवानी को वो आँख ग़म ए दिल की हमराज़ नहीं होती, हर अश्क ए शहंशाही एक ताज नहीं बनता हर मलका ज़माने में मुमताज़ नहीं होती, मिलती है ख़मोशी से ज़ालिम को सज़ा यारो अल्लाह की लाठी में आवाज़ नहीं होती, एक ठोस हक़ीक़त है अल्फ़ाज़ के पैकर में ये शाइरी शाइर का एजाज़ नहीं होती, यूँ उम्र की क़ैंची ने पर मेरे कतर डाले अब लाख करूँ कोशिश परवाज़ नहीं होती, दौलत की बदौलत जो बँधती है - [हम से दीवानों को असरी आगही डसती रही](https://bazmeshayari.com/ham-se-deewanon-ko/): हम से दीवानों को असरी आगही डसती रही खोखली तहज़ीब की फ़र्ज़ानगी डसती रही, शोला ए नफ़रत तो भड़का एक लम्हे के लिए मुद्दतों फिर शहर को एक तीरगी डसती रही, मौत की नागिन से अब हरगिज़ वो डर सकता नहीं जिस को सारी उम्र ख़ुद ये ज़िंदगी डसती रही, मैं न जाने कितने जन्मों का हूँ प्यासा दोस्तो रह के दरिया में भी मुझ को तिश्नगी डसती रही, आप के होंटों पे जो मुद्दत से है छाई हुई दर्द में डूबी हुई वो ख़ामुशी डसती रही, एक तुम हो दुश्मनी भी रास आई है जिसे और एक मैं हूँ - [राहें धुआँ धुआँ हैं सफ़र गर्द गर्द है](https://bazmeshayari.com/raahen-dhuaan-dhuaan-hai/): राहें धुआँ धुआँ हैं सफ़र गर्द गर्द है ये मंज़िल ए मुराद तो बस दर्द दर्द है, अपने पड़ोसियों को भी पहचानता नहीं महसूर अपने ख़ोल में अब फ़र्द फ़र्द है, इस मौसम ए बहार में ऐ बाग़बाँ बता चेहरा हर एक फूल का क्यूँ ज़र्द ज़र्द है ? लफ़्फ़ाज़ियों का गर्म है बाज़ार किस क़दर दस्त ए अमल हमारा मगर सर्द सर्द है, कैसा तज़ाद शाख़ ए तमन्ना में है असद ख़ुद ये हरी हरी है समर ज़र्द ज़र्द है..!! ~असद रज़ा - [ग़ैरत ए इश्क़ सलामत थी अना ज़िंदा थी](https://bazmeshayari.com/gairat-e-ishq-salamat/): ग़ैरत ए इश्क़ सलामत थी अना ज़िंदा थी वो भी दिन थे कि रह ओ रस्म ए वफ़ा ज़िंदा थी, क़ैस को दोश न दो रखियो न फ़रहाद को नाम इन्ही लोगों से मोहब्बत की अदा ज़िंदा थी, शहर ए बीमार के हर कूचा ओ बाम ओ दर पर हम भी मरते थे कि जब ख़ल्क़ ए ख़ुदा ज़िंदा थी, बुझ गईं शमएँ तो दम तोड़ गए झोंके भी जिस तरह ज़हर ए रक़ाबत से हवा ज़िंदा थी, याद ए अय्याम कि सहरा ए मोहब्बत में फ़राज़ जरस ए क़ाफ़िला ए दिल की सदा ज़िंदा थी..!! ~अहमद फ़राज़ - [क्यूँ न फिर से दौर ए क़दीम में जाया जाए ?](https://bazmeshayari.com/kyun-na-fir-se-daur-e/): क्यूँ न फिर से दौर ए क़दीम में जाया जाए ? माँग कर आग घर का चूल्हा जलाया जाए, बैठ कर गली में करें सब दिल की बातें रख कर मक्के की रोटी पे साग खाया जाए, जब दरख्तों पे चढ़ के बेर खाया करते थे कोई वैसा दरख़्त फिर घर में लगाया जाए, वो तांगे की सवारी वो घोड़े की टप टप धीमे सुरों में फिर वही तराना गया जाए, मेहमान आये घर में और हो गर्मी का मौसम शक्कर और सत्तू का शरबत उनको पिलाया जाए, शाम हो तो बच्चों को घर बुलाएं आवाज़ें दे कर डाल कर - [बहुत ख़राब रहा इस दौर मे](https://bazmeshayari.com/bahut-kharab-raha-is-daur-men/): बहुत ख़राब रहा इस दौर मे एक क़ौम का अच्छा होना, रास ना आया मनहूसों को क़ौम का इतना सच्चा होना, दोस्तों अच्छा भी नहीं होता इस दिल का यूँ बच्चा होना, सोगवार होता है बारिश मे अपने मकाँ का कच्चा होना, बात बात पे हर बार सही नहीं किसी एक नाम पे चर्चा होना..!! - [धड़कनें बन के जो सीने में रहा करता था](https://bazmeshayari.com/dhadkane-ban-ke-jo/): धड़कनें बन के जो सीने में रहा करता था क्या अजब शख़्स था जो मुझ में जिया करता था, नाख़ुन ए वक़्त ने हर नक़्श खुरच डाला है मेरा चेहरा मेंरी पहचान हुआ करता था, काई होंठों पे हमा वक़्त जमी रहती थी एक दरिया मेंरी आँखों में थमा करता था, एक तलातुम था तह ए आब सुकूत ए दरिया दिल ए ख़ामोश में एक शोर रहा करता था, मुर्तइश होता था जब ख़ामा ए अंगुश्त कभी क्या क्या क़िर्तास ए ख़ला पर मैं लिखा करता था, ज़ेहन ओ दिल इस लिए सरगर्म ए अमल रहते थे रहनुमाई मेंरी हर - [किसी झूठीं वफ़ा से दिल को बहलाना नहीं आता](https://bazmeshayari.com/kisi-jhuthin-wafa-se/): किसी झूठीं वफ़ा से दिल को बहलाना नहीं आता मुझे घर काग़ज़ी फूलों से महकाना नहीं आता, मैं जो कुछ हूँ वही कुछ हूँ जो ज़ाहिर है वो बातिन है मुझे झूठे दर ओ दीवार चमकाना नहीं आता, मैं दरिया हूँ मगर बहता हूँ मैं कोहसार की जानिब मुझे दुनिया की पस्ती में उतर जाना नहीं आता, ज़र ओ माल ओ जवाहर ले भी और ठुकरा भी सकता हूँ कोई दिल पेश करता हो तो ठुकराना नहीं आता, परिंदा जानिब ए दाना हमेशा उड़ के आता है परिंदे की तरफ़ उड़ कर कभी दाना नहीं आता, अगर सहरा में हैं - [मौसम बदल गए ज़माने बदल गए](https://bazmeshayari.com/mausam-badal-gaye-zamane/): मौसम बदल गए ज़माने बदल गए लम्हों में दोस्त बरसों पुराने बदल गए, दिन भर रहे जो मेरी मुहब्बत की छांव में वो लोग धूप ढलते ही ठिकाने बदल गए, कल जिनके लफ़्ज़ लफ़्ज़ में चाहत थी प्यार था लो आज उन्ही लबों के तराने बदल गए, एक शख़्स क्या गया मेरा शहर छोड़ कर जीने के सारे ढंग पुराने बदल गए…!! - [दिल की इस दौर में क़ीमत नहीं होती शायद](https://bazmeshayari.com/dil-ki-is-daur-men/): दिल की इस दौर में क़ीमत नहीं होती शायद सब की क़िस्मत में मुहब्बत नहीं होती शायद, फ़ैसला आखिरी लम्हे में बदल सकता है हारने वालों में हिम्मत नहीं होती शायद, कौन जज़्बात को बाज़ार में ले आया है ऐसी चीजों की तिज़ारत नहीं होती शायद, भागते दौड़ते इस शहर में कुछ लोगो को ख़ुद से मिलने की भी फ़ुर्सत नहीं होती शायद, जी हुजूरी मेरी फ़ितरत में जो शामिल होती मुझ से लोगो को शिकायत नहीं होती शायद, मैं भी औरों की तरह अपने लिए जीता अगर ग़म की यूँ मुझ पे इनायत नहीं होती शायद..!! - [सफ़र ए वफ़ा की राह में मंज़िल जफा की थी](https://bazmeshayari.com/safar-e-wafa-ki/): सफ़र ए वफ़ा की राह में मंज़िल जफा की थी कागज़ का घर बना के भी ख्वाहिश हवा की थी, थी जुगनुओं के शहर में तारों से दुश्मनी मा’शूक़ चाँद था और तमन्ना सुब्ह की थी, तुम ने तो इबादत का तमाशा बना दिया चाहत नमाज़ की थी पर आदत क़ज़ा की थी, मैनें तो ज़िन्दगी को तेरे नाम लिखा था शायद मगर कुछ और ही मर्ज़ी ख़ुदा की थी, दर्द ही देना था तो पहले बता देते हम को भी अज़ल से ही तमन्ना सज़ा की थी..!! - [ऐ नए साल बता तुझ में नयापन क्या है ?](https://bazmeshayari.com/ae-naye-saal-bata/): ऐ नए साल बता तुझ में नयापन क्या है ? हर तरफ़ ख़ल्क़ ने क्यों शोर मचा रखा है, रौशनी दिन की वही तारों भरी रात वही आज हम को नज़र आती है हर एक बात वही आसमान बदला है अफ़्सोस ना बदली है ज़मीं एक हिंदिसे का बदलना कोई जिद्दत तो नहीं, अगले बरसों की तरह होंगे क़रीने तेरे किसे मालूम नहीं बारह महीने तेरे, जनवरी फ़रवरी मार्च में पड़ेगी सर्दी और अप्रैल मई जून में हो गी गर्मी, तेरा मन दहर में कुछ खोएगा कुछ पाएगा अपनी मीआद बसर कर के चला जाएगा, तू नया है तो दिखा - [भूख़ चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे](https://bazmeshayari.com/bhookh-chehre-pe-liye/): भूख़ चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे बेचते फिरते हैं गलियों में ग़ुबारे बच्चे, इन हवाओं से तो बारूद की बू आती है इन फ़ज़ाओं में तो मर जाएँगे सारे बच्चे, क्या भरोसा है समुंदर का ख़ुदा ख़ैर करे सीपियाँ चुनने गए हैं मेरे सारे बच्चे, हो गया चर्ख़ ए सितमगर का कलेजा ठंडा मर गए प्यास से दरिया के किनारे बच्चे, ये ज़रूरी है नए कल की ज़मानत दी जाए वर्ना सड़कों पे निकल आएँगे सारे बच्चे…!! ~बेदिल हैदरी - [बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं](https://bazmeshayari.com/baithen-hai-chain-se/): बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं, तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू ब हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं, अहद ए वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं, वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं, दुनिया हम अहल ए इश्क़ पे क्यूँ फेंकती है जाल हम ने तेरे फ़रेब में आना तो है नहीं, वो इश्क़ तो करेगा मगर - [आपकी याद आती रही रात भर](https://bazmeshayari.com/aapki-yaad-aati-rahi/): आपकी याद आती रही रात भर चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर, गाह जलती हुई गाह बुझती हुई शम ए ग़म झिलमिलाती रही रात भर, कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन कोई तस्वीर गाती रही रात भर, फिर सबा साया ए शाख़ ए गुल के तले कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर, जो न आया उसे कोई ज़ंजीर ए दर हर सदा पर बुलाती रही रात भर, एक उम्मीद से दिल बहलता रहा एक तमन्ना सताती रही रात भर..!! ~फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - [कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे](https://bazmeshayari.com/kashti-hawas-hawaaon-ke/): कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे खोए हुओं से मिल ये दलद्दर उतार दे, बे सम्त की उड़ान है शोख़ी शबाब की उस छत पे आज तू ये कबूतर उतार दे, मैं इतना बदमाश नहीं यानि खुल के बैठ चुभने लगी है धूप स्वेटर उतार दे, दिन रात यूँ न ख़ौफ़ का गट्ठर उठाए फिर ये बोझ अपने सर से झटक कर उतार दे, उसकी ही आब ओ ताब से रौशन हो रेग ए दिल ये तेग़ मेरे सीने के अंदर उतार दे, चेहरे से झाड़ पिछले बरस की कुदूरतें दीवार से पुराना कैलेंडर उतार दे, ये बात - [पहले जो ख़ुद माँ के आंचल में छुप...](https://bazmeshayari.com/pahle-jo-khud-maan/): पहले जो ख़ुद माँ के आंचल में छुप जाया करती थी आज वो ख़ुद किसी को आंचल में छुपाया करती है, पहले जो ऊँगली पे गरम लगने से घर को सर पे उठाया करती थी आज पूरा हाथ जल जाने पर भी खाना बनाया करती है, पहले जो छोटी छोटी बातों पे रूठ जाया करती थी आज वो बड़ी बड़ी बातों को भी ज़हन में छुपाया करती है, माँ माँ कहते हुए जो सारा दिन हो पूरे घर में खेला करती थी आज वो लफ्ज़ ए माँ सुन कर धीरे से मुस्कुराया करती है, जिसका दस बजे उठने पर भी - [इस नये साल पे ये सदा है ख़ुदा से](https://bazmeshayari.com/is-naye-saal-pe/): इस नये साल पे ये सदा है ख़ुदा से सलामत रहे वतन हर एक बला से, न पलकों पे हों गम के कोई सितारे न अधूरे रहें अब ख़्वाब कोई हमारें, या इलाही मुहब्बत दिलों में जगा दे अम्न ओ अमान का शज़र खिला दे, या इलाही रहमतों की हर सू झड़ी हो राह ए ज़िन्दगी की न कोई कड़ी हो, रहें सब रंज ओ गम सदा अब परे ही अदु के सब अज़ायेम रह जाएँ धरे ही, नवाब उरूज़ पे हो नया साल अपना सारे जहाँ में रहे राज हर हाल अपना..!! ~नवाब ए हिन्द - [एक मुसलसल से इम्तेहान में हूँ](https://bazmeshayari.com/ek-musalsal-se-imtehan/): एक मुसलसल से इम्तेहान में हूँ जब से रब मैं तेरे जहाँ में हूँ, सिर्फ़ इतना सा है क़ुसूर मेरा ! मैं नहीं वो हूँ जिस गुमाँ में हूँ, कौन पहुंचा है आसमानों तक एक ज़िद्दी सी बस उड़ान में हूँ, जिस खता ने ज़मीन पर पटका ढीठ ऐसा, उसी ध्यान में हूँ, अपने किस्से में भी यूँ लगता है मैं किसी और दास्तान में हूँ. दर ओ दीवार भी नहीं सुनते इतना तन्हा मैं उस मकान में हूँ, ज़िन्दगी एक लिहाफ़ मुक़म्मल है सर्द मौसम है खींच तान में हूँ, तोलती हैं मुझे यूँ सब नज़रें जैसे मैं जींस - [जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा..](https://bazmeshayari.com/jidhar-jaate-hai-sab/): जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता, ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता, मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता, बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती ये वो शाख़ें हैं जिनको अब शजर अच्छा नहीं लगता, ये क्यूँ बाक़ी रहे आतिश ज़नो ये भी जला डालो कि सब बेघर हों और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता..!! ~जावेद अख़्तर - [कहते हो तुम्हें हस्ब ए तमन्ना नहीं मिलता](https://bazmeshayari.com/kahte-ho-tumhe-hasb/): कहते हो तुम्हें हस्ब ए तमन्ना नहीं मिलता कम दाम लगाने से तो सौदा नहीं मिलता, वो धूप हक़ीक़त में कोई धूप नहीं है जिस से किसी इंसाँ को पसीना नहीं मिलता, ग़ुर्बत ने अता की है मुझे इल्म की दौलत मकतब नहीं जाता जो वज़ीफ़ा नहीं मिलता, सब मंसब ए फ़रहाद है तेशे के सबब से वर्ना ये उसे इश्क़ में रुत्बा नहीं मिलता, बदनाम ए ज़माना हूँ मैं सच्चाई की ख़ातिर अब तो मेंरे बच्चे को भी रिश्ता नहीं मिलता, अल्लाह ग़नी है वो जिसे चाहे नवाज़े मेहनत से हर एक शख़्स को पैसा नहीं मिलता..!! ~यासीनआतिर - [दुनियाँ ए अक़ीदत में अजब रस्म चली है](https://bazmeshayari.com/duniya-e-akidat-me/): दुनियाँ ए अक़ीदत में अजब रस्म चली है जो दश्त में मजनूँ था वो मरकज़ मे वली है, तहज़ीब ए गुलिस्ताँ का अजब रंग है यारों वो फूल है बातिन में जो ज़ाहिर में कली है, क्या तुझको पता अपनी रिहाइश का बताऊँ उस शहर में हूँ जिस मे मुहल्ला न गली है, वो दिन जो हम गरीबों का भरम तोड़ने आए उस दिन से तो ऐ मेरे ख़ुदा ये रात भली है…!! - [बे नियाज़ी के सिलसिले में हूँ](https://bazmeshayari.com/be-niyazi-ke-silsile/): बे नियाज़ी के सिलसिले में हूँ मैं कहाँ अब तेरे नशे में हूँ, हिज्र तेरा मुझे सताता है और बाक़ी तो बस मज़े में हूँ, ढूँढ मत इन उदास आँखों में ग़ौर कर तेरे क़हक़हे में हूँ, वो मुझे अब भी चाहता होगा मैं अभी तक मुग़ालते में हूँ, हर तरफ़ महफ़िलें ख़यालों की इश्क़ के शाही महकमे में हूँ, तोड़ कर ही निकाल ले कोई क़ैद मैं अपने दाएरे में हूँ, उस को मंज़िल भी मिल गई अपनी और मैं हूँ कि रास्ते में हूँ…!! - [देख लेते हैं अब उस बाम को आते जाते](https://bazmeshayari.com/dekh-lete-hai-ab/): देख लेते हैं अब उस बाम को आते जाते ये भी आज़ार चला जाएगा जाते जाते, दिल के सब नक़्श थे हाथों की लकीरों जैसे नक़्श ए पा होते तो मुमकिन था मिटाते जाते, थी कभी राह जो हमराह गुज़रने वाली अब हज़र होता है उस राह से आते जाते, शहर ए बे मेहर! कभी हमको भी मोहलत देता एक दिया हम भी किसी रुख़ से जलाते जाते, पारा ए अब्र ए गुरेज़ाँ थे कि मौसम अपने दूर भी रहते मगर पास भी आते जाते, हर घड़ी एक जुदा ग़म है जुदाई उस की ग़म की मीआद भी वो ले - [मिलने की तरह मुझ से वो पल भर नहीं मिलता](https://bazmeshayari.com/milne-ki-tarah-mujh/): मिलने की तरह मुझ से वो पल भर नहीं मिलता दिल उस से मिला जिस से मुक़द्दर नहीं मिलता, ये राह ए तमन्ना है यहाँ देख के चलना इस राह में सर मिलते हैं पत्थर नहीं मिलता, हमरंगी ए मौसम के तलबगार न होते साया भी तो क़ामत के बराबर नहीं मिलता, कहने को ग़म ए हिज्र बड़ा दुश्मन ए जाँ है पर दोस्त भी इस दोस्त से बेहतर नहीं मिलता, कुछ रोज़ नसीर आओ चलो घर में रहा जाए लोगों को ये शिकवा है कि घर पर नहीं मिलता, ~नसीर तुराबी - [वो हमसफ़र था मगर उससे हम नवाई न थी](https://bazmeshayari.com/wo-humsafar-tha-magar/): वो हमसफ़र था मगर उससे हम नवाई न थी कि धूप छांव का आलम रहा जुदाई न थी, न अपना रंज न औरों का दुख न तेरा मलाल शब ए फ़िराक़ कभी हमने यूँ गँवाई न थी, मुहब्बतों का सफ़र इस तरह भी गुज़रा था शिकस्ता दिल थे मुसाफ़िर शिकस्ता पाई न थी, अदावतें थीं, तगाफ़ुल था, रंजिशें थीं बहुत बिछड़ने वाले में सब कुछ था, बेवफ़ाई न थी, बिछड़ते वक़्त उन आँखों में थी हमारी गज़ल गज़ल भी वो जो किसी को अभी सुनाई न थी, किसे पुकार रहा था वो डूबता हुआ दिन ? सदा तो आई थी - [कितना नादान है वो मेरे दिल ए हाल से](https://bazmeshayari.com/kitna-naadaan-hai-wo/): कितना नादान है वो मेरे दिल ए हाल से ख़ुद का दिल दुखाता है ख़ुद के सवाल से, दीवारों पे ना जाने कहाँ से आ गया रंग ये दरारे थी पड़ी इस पे पहले मेरे ख़्याल से, हम ख़ुद को खाक़ में मिला कर चल दिए ख़ुशबू गैर की जो आई उसके रुमाल से, अपने सिवा कभी सोच हमारे बारे में भी हर बार ही क़त्ल होते है हम तेरे जमाल से, दर पर तेरी आ रुकी भटक कर हवाएँ भी सनम तेरी ही भीगी ज़ुल्फों के कमाल से, क्या क्या ना तुझको मिला ऐ दिल ए नादां मुहब्बत दर्द - [तेरी आँखों ने आँखों का सिसकना भी नहीं देखा](https://bazmeshayari.com/teri-aankhon-ne-aankhon/): तेरी आँखों ने आँखों का सिसकना भी नहीं देखा मुहब्बत भी नहीं देखी, तड़पना भी नहीं देखा, नहीं देखा अभी तुमने मेरी तन्हाई का मंज़र कि अपने आप से मेरा उलझना भी नहीं देखा, अभी तुमने तुम्हारे बिन मेरी हालत नही देखी अभी तुमने मेरा गम बिलकना भी नहीं देखा, अभी तुमने दुआओं में मेरे आँसू नहीं देखे ख़ुदा के सामने मेरा सिसकना भी नहीं देखा, अभी तुमने नहीं देख कोई मंज़र जुदाई का अभी पत्तों का शाखों से बिखरना भी नहीं देखा…!! - [जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो](https://bazmeshayari.com/jina-mushkil-hai-ki/): जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो हर शख़्स लगता है परेशान ज़रा देख तो लो, यूँ तो आज ये नया शहर है ख़ूब बसाया तुम ने मगर क्यूँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो, इन चिरागों के तले आज ऐसे अँधेरे क्यूँ हैं ? तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो, तुम ये कहते हो कि मैं गैर हूँ फिर भी शायद निकल आए यूँ ही कोई पहचान ज़रा देख तो लो…!! - [जवाँ हो ख़ुश अदा हो इस लिए तारीफ़ करता हूँ](https://bazmeshayari.com/javan-ho-khush-adaa/): जवाँ हो ख़ुश अदा हो इस लिए तारीफ़ करता हूँ हसीं हो दिलरुबा हो इस लिए तारीफ़ करता हूँ, अगरचे फूल शबनम चाँदनी सब खूबसूरत है तुम उन सबसे जुदा हो इस लिए तारीफ़ करता हूँ, हज़ारों हुस्न वाले मैंने इस दुनियाँ में देखे है तुम उन सब से जुदा हो इस लिए तारीफ़ करता हूँ, फ़ज़ाओं में महक तुम से ज़मीं पे तुम से शादाबी गुलिस्ताँ हो सबा हो इस लिए तारीफ़ करता हूँ…!! - [झगड़ना काहे का ? मेरे भाई पड़ी रहेगी](https://bazmeshayari.com/jhagadna-kaahe-ka-mere/): झगड़ना काहे का ? मेरे भाई पड़ी रहेगी ये बाप दादा की सब कमाई पड़ी रहेगी, अंधेरे कमरों में रक्स करती रहेंगी वहशतें और एक कोने में पारसाई पड़ी रहेगी, हवा की मन्नत करो कि घर के दीये बुझे तो उदास हो कर दीया सलाई पड़ी रहेगी, हमारी नज़रों से और ओझल अगर हुए तुम ज़माने भर की ये रोशनाई पड़ी रहेगी, तुम्हारे जाने के बाद कैसी मुहल्लेदारी ? यक़ीन कर लो बनी बनाई पड़ी रहेगी, तुम्हारे हाथों का लम्स काफ़ी है, लौट आओ मैं ठीक हो जाऊँगा, दवाई पड़ी रहेगी, बुज़ुर्ग रुख़सत हुए हैं लेकिन बरामदे में पुराने वक़्तों - [मौत भी क्या अज़ीब हस्ती है...](https://bazmeshayari.com/maut-bhi-kya-azib/): मौत भी क्या अज़ीब हस्ती है जो ज़िंदगी के लिए तरसती है, दिल तो एक शहर है जुदाई का आँख तो आँसूओं की बस्ती है, इश्क़ में भी हो मरतबे का ख़्याल ये बुलंदी नहीं है पस्ती है, हम उदासी पे अपनी हैं मगरूर हम को अपने दुखों की मस्ती है, याद आया है जाने क्या उसको ? शाम कुछ सोचती है हँसती है, हम उसे छुपाएँ या तुम्हें छुपाएँ ? बुत परस्ती तो बुत परस्ती है, बादलों पर फ़क़त नहीं मौकफ़ आँख भी टूट कर बरसती है…!! - [पिछले बरस तुम साथ थे मेरे...](https://bazmeshayari.com/pichhle-baras-tum-saath/): पिछले बरस तुम साथ थे मेरे और दिसम्बर था महके हुए दिन रात थे मेरे और दिसम्बर था, चाँदनी रात थी सर्द हवा से खिड़की बजती थी उन हाथों में हाथ थे मेरे और दिसम्बर था, बारिश की बूंदों से दिल पे दस्तक होती थी सब मौसम बरसात थे मेरे और दिसम्बर था, भीगी ज़ुल्फ़ें भीगा आँचल नींद थी आँखों में कुछ ऐसे हालात थे मेरे और दिसम्बर था, धीरे धीरे भड़क रही थी आतिशदान की आग बहके हुए जज़्बात थे मेरे और दिसम्बर था, प्यार भरी नज़रों से फ़रह जब उसने देखा था बस वो ही लम्हात थे मेरे - [ग़म ए जहाँ को शर्मसार करने वाले क्या हुए](https://bazmeshayari.com/gam-e-jahan-ko/): ग़म ए जहाँ को शर्मसार करने वाले क्या हुए वो सारी उम्र इंतिज़ार करने वाले क्या हुए ? बहम हुए बग़ैर जो गुज़र गईं वो साअतें वो एक एक पल शुमार करने वाले क्या हुए ? दुआ ए नीम शब की रस्म कैसे ख़त्म हो गई वो हर्फ़ ए जाँ पे एतिबार करने वाले क्या हुए ? कहाँ हैं वो जो दश्त ए आरज़ू में ख़ाक हो गए वो लम्हा ए अबद शिकार करने वाले क्या हुए ? तलब के साहिलों पे जलती कश्तियाँ बताएँगी शनावरी पे एतिबार करने वाले क्या हुए…!! ~इफ़्तिख़ार आरिफ़ - [हर्फ़ ए गलत न था मुझे समझा गया गलत](https://bazmeshayari.com/harf-e-galat-na-tha/): हर्फ़ ए गलत न था मुझे समझा गया गलत लिखा गया गलत कभी बोला गया गलत, मैं भी गलत न था मेरी बातें गलत न थीं मुझको मेरे कलाम को जाँचा गया गलत, मिज़ान ठीक था पलड़े दुरुस्त थे लेकिन ये कौन देखता है कि तोला गया गलत, मुझ में नहीं थे ऐब कसौटी में ऐब था मेरा था ये क़ुसूर कि परखा गया गलत, तूफ़ान के बाद अहल ए तदब्बुर को है ये फ़िक्र साहिल का क़ुसूर था कि दरिया गया गलत ? अफराद हैं गलत या गलत हैं तसव्वुरात ? या इस मुशायरे ही को ढाला गया गलत…!! - [दिल में औरों के लिए कीना ओ कद रखते हैं](https://bazmeshayari.com/dil-me-auro-ke-liye/): दिल में औरों के लिए कीना ओ कद रखते हैं वही लोग इख़्लास के पर्दे में हसद रखते हैं, आप से हाथ मिलाते हुए डर लगता है आप तो प्यार के रिश्तों में भी हद रखते हैं, ये ज़रूरी नहीं दिल उनके हों हक़ से मामूर वो जो चेहरों पे इबादत की सनद रखते हैं, क्या पता कब किसी रिश्ते का भरोसा टूटे ऐसे लोगों से न मिलिए जो हसद रखते हैं, दफ़्न हो जाए न एहसास ए मोहब्बत दिल में अब कहाँ दिल का ख़याल अहल ए ख़िरद रखते हैं, कौन होता है मुसीबत में किसी का सलीम हम - [हमेशा साथ रहने की आदत कुछ नहीं होती](https://bazmeshayari.com/hamesha-sath-rahne-ki/): हमेशा साथ रहने की आदत कुछ नहीं होती जो लम्हा मिल गए जी लो, रियाज़त कुछ नहीं होतीं, जिसे महरूमियाँ मिली हों वही जान सकता है ज़बानी हौसला, झूठी मुरव्वत कुछ नहीं होती, कई रिश्तों को जब परखा, नतीजा एक ही निकला ज़रूरत ही सब कुछ है, मुहब्बत कुछ नहीं होती, किसी ने छोड़ के जाना हो तो फिर छोड़ ही जाता है बिछड़ना हो तो फिर सदियों की मुहब्बत कुछ नहीं होती, ताअल्लुक़ टूट जाए तो सफीने डूब जाते हैं सब कहने की बातें हैं, हकीक़त कुछ नहीं होती..!! - [तेरी जुल्फें बिखरने को घटा कह दूँ तो कैसा हो ?](https://bazmeshayari.com/teri-zulfen-bikhrane-ko/): तेरी जुल्फें बिखरने को घटा कह दूँ तो कैसा हो ?   तेरी जुल्फें बिखरने को घटा कह दूँ तो कैसा हो ? तेरे आँचल के उड़ने को सबा कह दूँ तो कैसा हो ? ब ज़ाहिर चुप हो लेकिन फिर भी आँखों में है अफ़साने तेरी खामोशियों को भी सदा कह दूँ तो कैसा हो ? मेरे शिकवे शिकायत पर भी मुझ से प्यार करती हो तेरी चाहत को मैं सब से जुदा कह दूँ तो कैसा हो ? तेरी यादें मेरे दिल पर अज़ब सा शोर करती हैं तेरी यादों को गर मैं नशा कह दूँ तो कैसा - [एक पल में एक सदी का मज़ा हम से पूछिए](https://bazmeshayari.com/ek-pal-men-ek/): एक पल में एक सदी का मज़ा हम से पूछिए एक पल में एक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए, भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हम से पूछिए, आग़ाज़ ए आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम ए आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए, जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए, वो जान ही गए कि हमें उन से प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम से पूछिए, हँसने का शौक़ हम को भी था - [चौंक चौंक उठती है महलों की फ़ज़ा रात गए](https://bazmeshayari.com/chauk-chauk-uthti-hai/): चौंक चौंक उठती है महलों की फ़ज़ा रात गए चौंक चौंक उठती है महलों की फ़ज़ा रात गए कौन देता है ये गलियों में सदा रात गए, ये हक़ाएक़ की चटानों से तराशी दुनिया ओढ़ लेती है तिलिस्मों की रिदा रात गए, चुभ के रह जाती है सीने में बदन की ख़ुश्बू खोल देता है कोई बंद ए क़बा रात गए, आओ हम जिस्म की शम्ओं से उजाला कर लें चाँद निकला भी तो निकलेगा ज़रा रात गए, तू न अब आए तो क्या आज तलक आती है सीढ़ियों से तिरे क़दमों की सदा रात गए..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का](https://bazmeshayari.com/zamana-aaj-nahi-dagmaga/): ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का सम्भल भी जा कि अभी वक़्त है सम्भलने का, बहार आये चली जाये फिर चली आये मगर ये दर्द का मौसम नहीं बदलने का, ये ठीक है कि सितारों पे घूम आये हैं मगर किसे है सलिक़ा ज़मीं पे चलने का, फिरे हैं रातों को आवारा हम तो देखा है गली गली में समाँ चाँद के निकलने का तमाम नशा-ए-हस्ती तमाम कैफ़ ए वजूद वो एक लम्हा तेरे जिस्म के पिघलने का..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो](https://bazmeshayari.com/zindagi-ye-to-nahi/): ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो कुछ न कुछ हम ने तेरा क़र्ज़ उतारा ही न हो, दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी चौंक उठता हूँ कहीं तू ने पुकारा ही न हो, कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर सोचता हूँ तेरे आँचल का किनारा ही न हो, ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझ को दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो, शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ - [तुझ से बिछड़ के हम भी मुक़द्दर के हो गए](https://bazmeshayari.com/tujh-se-bichhad-ke/): तुझ से बिछड़ के हम भी मुक़द्दर के हो गए फिर जो भी दर मिला है उसी दर के हो गए, फिर यूँ हुआ कि ग़ैर को दिल से लगा लिया अंदर वो नफ़रतें थीं कि बाहर के हो गए, क्या लोग थे कि जान से बढ़ कर अज़ीज़ थे अब दिल से महव नाम भी अक्सर के हो गए, ऐ याद यार तुझ से करें क्या शिकायतें ऐ दर्द ए हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गए, समझा रहे थे मुझ को सभी नासेहान ए शहर फिर रफ़्ता रफ़्ता ख़ुद उसी काफ़र के हो गए, अब के न - [तुझे है मश्क़ ए सितम का मलाल वैसे ही](https://bazmeshayari.com/tujhe-hai-mashq-e-sitam/): तुझे है मश्क़ ए सितम का मलाल वैसे ही तुझे है मश्क़ ए सितम का मलाल वैसे ही हमारी जान थी जाँ पर वबाल वैसे ही, चला था ज़िक्र ज़माने की बेवफ़ाई का सो आ गया है तुम्हारा ख़याल वैसे ही, हम आ गए हैं तह ए दाम तो नसीब अपना वगरना उस ने तो फेंका था जाल वैसे ही, मैं रोकना ही नहीं चाहता था वार उस का गिरी नहीं मेरे हाथों से ढाल वैसे ही, ज़माना हम से भला दुश्मनी तो क्या रखता सो कर गया है हमें पाएमाल वैसे ही, मुझे भी शौक़ न था दास्ताँ सुनाने - [वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं](https://bazmeshayari.com/wo-log-hi-har-daur/): वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं, तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं, उन को न पुकारो ग़म ए दौराँ के लक़ब से जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं, हम भी तेरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं, अल्फ़ाज़ में इज़हार ए मोहब्बत के तरीक़े ख़ुद इश्क़ की नज़रों में भी मायूब रहे हैं, इस अहद ए बसीरत में भी नक़्क़ाद हमारे हर - [मेरा ख़ामोश रह कर भी उन्हें सब कुछ सुना देना](https://bazmeshayari.com/mera-khamosh-rah-kar/): मेरा ख़ामोश रह कर भी उन्हें सब कुछ सुना देना मेरा ख़ामोश रह कर भी उन्हें सब कुछ सुना देना ज़बाँ से कुछ न कहना देख कर आँसू बहा देना, नशेमन हो न हो ये तो फ़लक का मश्ग़ला ठहरा कि दो तिनके जहाँ पर देखना बिजली गिरा देना, मैं इस हालत से पहुँचा हश्र वाले ख़ुद पुकार उठे कि कोई फ़रियाद वाला आ रहा है रास्ता देना, इजाज़त हो तो कह दूँ क़िस्सा ए उल्फ़त सर ए महफ़िल मुझे कुछ तो फ़साना याद है कुछ तुम सुना देना, संबंधित : मुहब्बत के सिवा हर्फ़ ओ बयाँ से कुछ नहीं - [ऐ मेरे हम नशीं चल कहीं और चल](https://bazmeshayari.com/ae-mere-ham-nashin/): ऐ मेरे हम नशीं चल कहीं और चल ऐ मेरे हम नशीं चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं, बात होती गुलों तक तो सह लेते हम अब तो काँटों पे भी हक़ हमारा नहीं, आज आए हो तुम कल चले जाओगे ये मोहब्बत को अपनी गवारा नहीं, उम्र भर का सहारा बनो तो बनो दो घड़ी का सहारा सहारा नहीं, दी सदा दार पर और कभी तूर पर किस जगह मैं ने तुम को पुकारा नहीं ?   एक बार इसे भी ज़रूर पढ़े : एक अज़नबी ख्याल में ख़ुद से जुदा रहा   ठोकरें - [एक अजनबी ख़याल में ख़ुद से जुदा रहा](https://bazmeshayari.com/ek-ajnabi-khyal-me/): एक अजनबी ख़याल में ख़ुद से जुदा रहा एक अजनबी ख़याल में ख़ुद से जुदा रहा नींद आ गई थी रात मगर जागता रहा, संगीन हादसों में भी हँसती रही हयात पत्थर पे एक गुलाब हमेशा खिला रहा, दुनिया को उस निगाह ने दीवाना कर दिया मैं वो सितम ज़रीफ़ कि बस देखता रहा, एक बार इसे भी ज़रूर पढ़े : ऐ मेरे हम नशीं चल कहीं और चल   एक अजनबी महक सी लहू में रची रही नग़्मा सा जान ओ तन में कोई गूँजता रहा, अब जा के ये खुला कि हर एक शख़्स दोस्तो हर शख़्स को - [आइने का मुँह भी हैरत से खुला रह जाएगा](https://bazmeshayari.com/aaeene-ka-munh-bhi/): आइने का मुँह भी हैरत से खुला रह जाएगा जो भी देखेगा तुझे वो देखता रह जाएगा, हम ने सब कुछ तज दिया तेरी रिफ़ाक़त के लिए तुझ से बिछड़े तो हमारे पास क्या रह जाएगा ? मिल सकेंगे किस तरह ख़्वाबों में हम जब हिज्र से नींद हो जाएगी रुख़्सत रतजगा रह जाएगा, हम अगर तेरी रज़ा हासिल नहीं कर पाएँगे उम्र भर हम से हमारा दिल ख़फ़ा रह जाएगा, जाने वालों की कमी पूरी कभी होती नहीं आने वाले आएँगे फिर भी ख़ला रह जाएगा, मुर्तइश आवाज़ की लहरें रहेंगी देर तक साज़ चुप हो जाएँगे सैल ए - [मोहब्बत के सिवा हर्फ़ ओ बयाँ से कुछ नहीं होता](https://bazmeshayari.com/mohabbat-ke-siwa-harf/): मोहब्बत के सिवा हर्फ़ ओ बयाँ से कुछ नहीं होता हवा साकिन रहे तो बादबाँ से कुछ नहीं होता, चलूँ तो मस्लहत ये कह के पाँव थाम लेती है वहाँ जाना भी क्या हासिल जहाँ से कुछ नहीं होता, ज़रूरतमँद है सैद अफगनी मश्शाक़ हाथों की फ़क़त यकजाई ए तीर ओ कमाँ से कुछ नहीं होता, मुसलसल बारिशें भी सब्ज़ा ओ गुल ला नहीं सकतीं ज़मीं जब बेनुमू हो आसमाँ से कुछ नहीं होता, तलाफ़ी के लिए दरकार है आईना साज़ी भी शिकस्त ए शीशा पर ज़िक्र ए ज़बाँ से कुछ नहीं होता, ख़ला में तीर अंदाज़ी से क्या गुलज़ार - [जब से उनका ख्याल रखा है](https://bazmeshayari.com/jab-se-unka-khyal/): जब से उनका ख्याल रखा है दिल ने मुश्किल में डाल रखा है, उन पर दिल ये आ गया वरना उन में क्या कमाल रखा है ? अब किसी काम की कहाँ फ़ुर्सत उनका गम जो पाल रखा है, ख़ुद वो मेरे ही दिल में रहते है मुझको दिल से निकाल रखा है, ख़ुशी अपनी थी बाँट दी हम ने गम उनका था संभाल रखा है, लौट जाएँ या जाएँ उनकी गली हम ने सिक्का उछाल रखा है, ख़ुद हमारी जगह नहीं बनती घर में इतना मलाल रखा है, हम ने हर फ़ैसला मुहब्बत में रोज़ ए महशर पे टाल - [कहो तो आज दिल ए बे क़रार कैसे हो ?](https://bazmeshayari.com/kaho-to-aaj-dil/): कहो तो आज दिल ए बे क़रार कैसे हो ? शब ए अलम के सताए नज़ार कैसे हो ? हवस यही है कि पूछे वो आ के हम से कभी हमारी दीद के उम्मीद वार कैसे हो ? तड़प रहे हो लहद में कि चैन ओ राहत है ? कहो तो मुझ से कि अहल ए मज़ार कैसे हो ? न इस तरह करो पामाल दिल को आशिक़ के समंद ए नाज़ को रोको सवार कैसे हो ? हमारी राह न खोटी करो ख़ुदा के लिए हमें सताओ न सहरा के ख़ार कैसे हो ? किनारा ख़्वाब को है चश्म - [भीगा हुआ है आँचल आँखों में भी नमी है](https://bazmeshayari.com/bhiga-hua-hai-aanchal/): भीगा हुआ है आँचल आँखों में भी नमी है फैला हुआ है काजल आँखों में भी नमी है, बरसेगा आज खुल कर बेचैन ओ मुज़्तरिब हूँ छाया है ग़म का बादल आँखों में भी नमी है, कैसी अजीब हालत तारी हुई है दिल पर हूँ मुंतज़िर मुसलसल आँखों में भी नमी है, मुद्दत के बाद आया दुनिया ए दिल में कोई सहरा हुआ है जल थल आँखों में भी नमी है, ये ख़ुद सुपुर्दगी का है एक अजीब आलम ख़्वाबों का जैसे जंगल आँखों में भी नमी है, महसूस हो रहा है इक जाल में हूँ कब से ये इश्क़ - [अपने साये से भी अक्सर डर जाते है लोग](https://bazmeshayari.com/apne-saye-se-bhi/): अपने साये से भी अक्सर डर जाते है लोग जाने अनजाने में गुनाह कर जाते है लोग, लिखी होती है उम्र ए बेहिसाब भी कभी मौत के खौफ़ से कई बार मर जाते है लोग, होता नहीं आसान हर एक वादा निभाना दे कर जुबां भी अक्सर मुकर जाते है लोग, उम्रे गुज़र जाती है कभी आदतों के सुधरने में कभी एक ठोकर से भी सुधर जाते है लोग..!! - [ज़िन्दगी ने लिया है ऐसा इम्तिहाँ मेरा](https://bazmeshayari.com/zindagi-ne-liye-hai/): ज़िन्दगी ने लिया है ऐसा इम्तिहाँ मेरा सदा ही साथ रहा है गम ए दौराँ मेरा, दिन ओ रात रहता है दिल परेशाँ मेरा फक़त उस पे ही नहीं है हाल अयाँ मेरा, उस से बातें तो बहुत कहनी होती है लेकिन रूबरू साथ नहीं देता जुबां मेरा, जो शख्स मुझे सारी दुनियाँ से अजीज़ था वही लूट कर ले गया सारा जहाँ मेरा, ज़ालिम आंधियाँ हर सिम्त मंडरा रही है कहीं गिरा न दें ये आशियाँ मेरा..!! - [दुनियाँ की बुलंदी के तलबगार नहीं हैं](https://bazmeshayari.com/duniya-ki-bulandi-ke/): दुनियाँ की बुलंदी के तलबगार नहीं हैं हम अहल ए ख़िरद तेरे परस्तार नहीं हैं, बरगद की तरह क़दम अपने जमाए है हर आन जो गिर जाए वो दीवार नहीं हैं, हैं दफ़न कई नस्लें इसी खाक़ में यारों हम अहल ए वतन हैं कोई ग़द्दार नहीं हैं, जो दुश्मनों को भी यहाँ सीने से लगाएँ हम जैसे कोई साहब ए किरदार नहीं हैं, चेहरों की ये ज़र्दी है फ़क़त खौफ़ ए खुदा की आलिम ये वली अल्लाह हैं बीमार नहीं हैं..!! - [जिस वक़्त वालिदैन ने जनाज़े उठाये होंगे](https://bazmeshayari.com/jis-waqt-validain-ne/): जिस वक़्त वालिदैन ने जनाज़े उठाये होंगे उस वक़्त कितने खून के आँसू बहाए होंगे, मुंसफ सज़ा कहाँ ज़ालिमों को सुनाएगा जिसने गरीब ए शहर के सपने चुराए होंगे, दिखा अजीब शहर के हाकिम का मशगला इन्सान क़त्ल कर के कबूतर उड़ाए होंगे, ज़ालिम हवाओं से अब ये ज़रूरी है पूछना क्यूँ राह के दीये सभी उसने बुझाए होंगे ? लगनी है एक दिन उसको माँ की बद्दुआ भूखी रह कर बच्चे भी जिसने भूखे सुलाए होंगे, देते हैं वो जो मज़लूमों को पल पल अज़ीयतें कितनी ही मुश्किलों से वो लम्हें भूलाये होंगे, ऐ लोगो कहों ज़ालिमों से कभी - [बताओ दिल की बाज़ी में भला क्या बात गहरी थी ?](https://bazmeshayari.com/bataao-dil-ki-baazi/): बताओ दिल की बाज़ी में भला क्या बात गहरी थी ? कहा, यूँ तो सभी कुछ ठीक था पर मात गहरी थी, सुनो, बारिश कभी ख़ुद से कोई बढ़ के देखा है ? जवाब आया, इन आँखों की मगर बरसात गहरी थी, सुनो, पीतम ने हौले से कहा क्या कुछ बताओगे ? जवाब आया, कहा तो था मगर वो बात गहरी थी, दिया दिल का समन्दर उसने तुमने क्या किया उसका ? हमें बस डूब जाना था कि वो सौगात गहरी थी, वफ़ा का दश्त कैसा था ? बताओ तुम पे क्या बीती ? भटक जाना ही था हमको, वहां - [अपने अंदाज़ में औरों से जुदा लगते हो](https://bazmeshayari.com/apne-andaj-men-auro/): अपने अंदाज़ में औरों से जुदा लगते हो सब बला लगते हैं तुम रद ए बला लगते हो, किस क़दर मान से रोका था उसे जाने से जिसने पूछा है जवाबां मेरे क्या लगते हो ? नीची नज़रें किये, सिमटे हुए, घबराये हुए मुजस्सम ! क्या कहें इसको ? हया लगते हो, अच्छी लगती हो मुझे तुम क्या तुम्हें मैं अच्छा नामुक़म्मल था सवाल, उसने कहा लगते हो, मुझ से छीन जाओगे, दिल को ये ख़दशा भी नहीं किस ने छीनी है दुआ ? तुम तो दुआ लगते हो, क्या हो तुम ? धूप की सूरत कभी आ चुभते हो - [नाम ए मुहब्बत का यही इस्तिआरा है](https://bazmeshayari.com/naam-e-muhabbat-ka/): नाम ए मुहब्बत का यही इस्तिआरा है जो नहीं है हासिल वही होता हमारा है, माज़ी में छोड़ आये जिस मोहल्ले को दौर ए हाज़िर में वही होता गुज़ारा है, लब ए महबूब बेशक़ रहे ख़ामोश मगर आँखें समझतीं हैं कि आँखों ने पुकारा है, नाम देती है दुनियाँ जिसे शादी का यहाँ उसने भी बहुतो को मौत के घाट उतारा है..!! - [कुछ इस लिए भी तह ए आसमान मारा गया](https://bazmeshayari.com/kuch-is-liye-bhi/): कुछ इस लिए भी तह ए आसमान मारा गया मैं अपने वक़्त से पहले यहाँ उतारा गया, ये कैसे मोड़ पे ले आया उम्र का दरिया कि पहले नाव शिकस्ता थी अब किनारा गया, गुज़र रहा था मैं जब आसमां बनाते हुए कहीं से चाँद कहीं से मेरा सितारा गया, ये कार ए उम्र तो एक कार ए रायेगानी था मगर वो दिन जो तुझे देख कर गुज़ारा गया, चिराग़ बुझने लगा तो हवा ये कहने लगी कि उसके हाथ से अब आख़िरी सहारा गया, कुछ ऐसे ख्वाब मेरे गिर गए थे रास्तों में सो मैं जिधर से भी गुज़रा - [हमें ये खौफ़ था एक दिन यहीं से टूटेंगे](https://bazmeshayari.com/hamen-ye-khauf-tha/): हमें ये खौफ़ था एक दिन यहीं से टूटेंगे हमारे ख्वाब तुम्हारी तहीं से टूटेंगे, बददुआ तो नहीं है, मगर लिख लो तुम हमें जो तोड़ रहे हैं आज, वो भी टूटेंगे, तुम्हारे जैसे सितारे फ़लक से टूटते हैं हमारी पहुँच ज़मीं तक, ज़मीं से टूटेंगे, जो दे रहे है मुहब्बत में मशवरे मुझको ये सब ज़हीन किसी माह जबीं से टूटेंगे, जहाँ से मैंने लगाई है गाँठ रिश्तों में मुझे ये वहम है रिश्ते वहीँ से टूटेंगे..!! - [ये ज़हमत भी तो रफ़्ता रफ़्ता रहमत हो ही जाती है](https://bazmeshayari.com/ye-jahmat-bhi-to/): ये ज़हमत भी तो रफ़्ता रफ़्ता रहमत हो ही जाती है मुसलसल गम से गम सहने की आदत हो ही जाती है, मसीहा हो अगर तुम सा तो ज़रूरत क्या है मरहम की कि काँटों से भी तो ज़ख्मों की जराहत हो ही जाती है, ताअल्लुक़ जिन से हो गिला उन पे आया ही करता है मुहब्बत जिन से उनसे शिकायत हो ही जाती है, ये ज़रूरी तो नहीं सूरज सवा नेज़े पर आ जाए बदल जाए कोई अपना तो क़यामत हो ही जाती है..!! - [दूर ख्वाबों से मुहब्बत से किनारा कर के](https://bazmeshayari.com/door-khwabon-se-muhabbat/): दूर ख्वाबों से मुहब्बत से किनारा कर के जैसे गुजरेगी गुजारेंगे गुज़ारा कर के, अब तो दावा भी वो पहले सा नहीं है हम को क्या करें इश्क मेरी जान दोबारा कर के, कैसी उठती है कसक वही समझ सकता है जिस ने देखा हो मुहब्बत में खसारा कर के, तुम से कुछ और ताअल्लुक़ तो तो नहीं इस के सिवा ताने देते है मुझे लोग तुम्हारा कह के, जान का रोग बनेगा वही लिख देता हूँ जिसको चाहोगे बहुत जान से प्यारा कर के, तुम समझते हो भूलाने से कोई भूल सकता है ? हम ने देखा है मेरे - [लिखतें हैं दिल का हाल सुबह ओ शाम मुसलसल](https://bazmeshayari.com/likhte-hai-dil-ka/): लिखतें हैं दिल का हाल सुबह ओ शाम मुसलसल तुम आते हो बहुत याद, सुबह ओ शाम मुसलसल, थक जाते हैं कर के कोशिशे सुलझते नहीं हैं गम होते हैं कुछ यूँ नाकाम सुबह ओ शाम मुसलसल, हम लाख जतन कर लें खुल ही जाते हैं बे धड़क दिल के ये दर ओ बाम सुबह ओ शाम मुसलसल, अब तो जंग सी छिड़ गई है दिल और दिमाग की होते हैं कुछ यूँ बे आराम सुबह ओ शाम मुसलसल, मुमकिन नहीं यारो कि अब होश में आएँ पीते हैं भर भर के जाम सुबह ओ शाम मुसलसल..!! - [ज़ाब्ते और ही मिस्दाक़ पे रखे हुए हैं](https://bazmeshayari.com/zaabte-aur-hi-misdaaq/): ज़ाब्ते और ही मिस्दाक़ पे रखे हुए हैं आजकल सिदक़ ओ सफ़ा ताक़ पे रखे हुए हैं, वो जो ख़ुद मारका ए इश्क़ में उतरे भी नहीं शिकवा पस्पाई का उश्शाक़ पे रखे हुए हैं, बाँध रखे है मोहब्बत ने अज़ल से हमको सो तवज्जोह इसी मीसाक़ पे रखे हुए हैं, दख़्ल आँखों का उलझने में बहुत है लेकिन तोहमतें सब दिल ए मुश्ताक़ पे रखे हुए हैं, जाने कब सिलसिला ए ख़ैर ओ ख़बर का हो ज़ुहूर ध्यान हम अन्फ़ुस ओ आफ़ाक़ पे रखे हुए हैं, देखिए कौन सा मफ़्हूम लिया जाएगा बात कर के नज़र इतलाक़ पे रखे - [कितनी सदियाँ ना रसी की इंतिहा में खो गईं](https://bazmeshayari.com/kitni-sadiyan-naa-rasi/): कितनी सदियाँ ना रसी की इंतिहा में खो गईं बे जहत नस्लों की आवाज़ें ख़ला में खो गईं, रंग ओ बू का शौक़ आशोब ए हवा में ले गया तितलियाँ घर से निकल कर इब्तिला में खो गईं, कौन पस मंज़र में उजड़े पैकरों को देखता शहर की नज़रें लिबास ए ख़ुशनुमा में खो गईं, मुंतज़िर चौखट पे ताबीरों के शहज़ादे रहे ख़्वाब की शहज़ादियाँ क़स्र ए दुआ में खो गईं, साँप ने उनके नशेमन में बसेरा कर लिया पेड़ से चिड़ियों की महकारें फ़ज़ा में खो गईं, कोई क्या बाब ए अमाँ आफ़तज़दों पर खोलता दस्तकें गुलज़ार तूफ़ाँ की - [जो होगा सब ठीक होगा होने दो जो होना है](https://bazmeshayari.com/jo-hoga-sab-thik/): जो होगा सब ठीक होगा होने दो जो होना है मुँह देखे की बातें है सब किस ने किस को रोना है, दिल किस से दुःख बाँटे अपना किस से अपनी बात कहे दिल ही है एक जिस ने यारो दर्द मुक़म्मल ढोना है, हम भी मिट्टी तुम भी मिट्टी पुतले है सब मिट्टी के अव्वल मिट्टी आखिर मिट्टी मिट्टी ही में जाना है, मिल कर बैठे नफ़रत छोड़े प्यार वफ़ा की बात करे बाग़ ए वफ़ा में हमने यारो बीज उल्फ़त का बोना है, ऐसा काम करे ही क्यूँ हम जिसको कर के पछताए पहले दाग लगाएं क्यूँ हम - [फिर आईना ए आलम शायद कि निखर जाए](https://bazmeshayari.com/fir-aaeena-e-alam/): फिर आईना ए आलम शायद कि निखर जाए फिर अपनी नज़र शायद ताहद्द ए नज़र जाए, सहरा पे लगे पहरे और क़ुफ़्ल पड़े बन पर अब शहर बदर हो कर दीवाना किधर जाए, ख़ाक ए रह ए जानाँ पर कुछ ख़ूँ था गिरौ अपना इस फ़स्ल में मुमकिन है ये क़र्ज़ उतर जाए, देख आएँ चलो हम भी जिस बज़्म में सुनते हैं जो ख़ंदा ब लब आए वो ख़ाक बसर जाए, या ख़ौफ़ से दर-गुज़रें या जाँ से गुज़र जाएँ मरना है कि जीना है एक बात ठहर जाए..!! ~फैज़ अहमद फैज़ - [नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं](https://bazmeshayari.com/nasib-aazmane-ke-din/): नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं क़रीब उन के आने के दिन आ रहे हैं, जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है सब उन को सुनाने के दिन आ रहे हैं, अभी से दिल ओ जाँ सर ए राह रख दो कि लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं, टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं, सबा फिर हमें पूछती फिर रही है चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं, चलो फ़ैज़ फिर से कहीं दिल लगाएँ सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं..!! ~फैज़ अहमद फैज़ - [हँसी में हक़ जता कर घर जमाई छीन लेता है](https://bazmeshayari.com/hansi-me-haque-jata/): हँसी में हक़ जता कर घर जमाई छीन लेता है मेरे हिस्से की टूटी चारपाई छीन लेता है, उसे मौक़ा मिले तो पाई पाई छीन लेता है यहाँ भाई की ख़ुशियाँ उस का भाई छीन लेता है, भला फ़ुर्सत किसे है जो यहाँ रिश्तों को पहचाने ये दौर ए ख़ुद फ़रेबी आश्नाई छीन लेता है, जहालत में वो कामिल है मोअल्लिम बन गया कैसे पढ़ाता है कि बच्चों की पढ़ाई छीन लेता है ? रवा है उस को हर सरक़ा तवारुद के बहाने से कभी नज़्में कभी ग़ज़लें पराई छीन लेता है, कोई क़ाबू नहीं चलता कि उस के हुस्न - [दरख्तों से गिरे सूखे हुए पत्ते भी ये इक़रार करते हैं](https://bazmeshayari.com/darakhton-se-gire-sukhe/): दरख्तों से गिरे सूखे हुए पत्ते भी ये इक़रार करते हैं जिन्हें कल तक मुहब्बत थी वो अब इंकार करते हैं, अज़ब दस्तूर ए दुनियाँ है, यहाँ मंतक निराली है रसाई जिनकी मुश्किल हो उन्हीं से प्यार करते हैं, कभी तो ऐ ज़िन्दगी रुक जा कोई है मुन्तज़िर तेरा तेरी खातिर कज़ा से झगड़ा जो हर बार करते हैं, यहाँ से जाने वाले चले जाते मगर पीछे जो रहते हैं उन्ही को याद कर कर के वो दिन शुमार करते हैं, खिज़ां की रुत में जाते हैं पलट कर फिर नहीं आते यहाँ परिंदे भी तो फूलों से अज़ब ही - [ज़ख़्मों को रफ़ू कर लें दिल शाद करें फिर से](https://bazmeshayari.com/zakhmon-ko-rafoo-kar/): ज़ख़्मों को रफ़ू कर लें दिल शाद करें फिर से ख़्वाबों की कोई दुनिया आबाद करें फिर से, मुद्दत हुई जीने का एहसास नहीं होता दिल उन से तक़ाज़ा कर बेदाद करें फिर से, मुजरिम के कटहरे में फिर हम को खड़ा कर दो हो रस्म ए कोहन ताज़ा फ़रियाद करें फिर से, ऐ अहल ए जुनूँ देखो ज़ंजीर हुए साए हम कैसे उन्हें सोचो आज़ाद करें फिर से, अब जी के बहलने की है एक यही सूरत बीती हुई कुछ बातें हम याद करें फिर से..!! ~शहरयार - [सज सँवर कर रहा करो अच्छी लगती हो](https://bazmeshayari.com/saj-sanvar-kar-raha/): सज सँवर कर रहा करो अच्छी लगती हो झुमके, बालियाँ, पाज़ेब पहना करो अच्छी लगती हो, मुस्कुराते लब हैं तुम्हारे ख़ुशबू भरे गुलाब जैसे इन से हर वक़्त महका करो अच्छी लगती हो, कोयल को ज़ेब नहीं देता यूँ ख़ामोश रहना तुम कुछ न कुछ कहा करो अच्छी लगती हो, जुल्फें हैं तुम्हारी रिमझिम अब्रकी इन्हें यूँ खोले रखा करो अच्छी लगती हो, तुम्हारी क़ुर्बतें हैं मेरे लिए सुकून ए जाँ जानाँ मेरे पहलू में बैठा करो अच्छी लगती हो, वज़ूद है तुम्हारा जैसा क़ौस ए क़ुज़हमेरी जाँ ! तुम हर रंग को ओढ़ा करो अच्छी लगती हो, माना कि - [ख़िज़ाँ रसीदा चमन में अक्सर](https://bazmeshayari.com/khijaan-rasidaa-chaman-me/): ख़िज़ाँ रसीदा चमन में अक्सर खिला खिला सा गुलाब देखा, गज़ब का हुस्न ओ शबाब देखा ज़मीन पर मैंने माहताब देखा, किसी के रुख पे परी सा गेसू किसी के रुख पे नक़ाब देखा, वो आये मिलने यकीन कर लो कि मेरी आँखों ने ख़्वाब देखा, जो टूटी तौबा तो छलके सागर जो उनको पीते शराब देखा, न देखो रोज़ ए हिसाब या रब ज़मीं पे जितना अज़ाब देखा, मिलेगा इंसाफ़ कैसे किसी को सदाक़तों पे नक़ाब देखा..!! - [आसमान से इनायतें न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं](https://bazmeshayari.com/aasmaan-se-inayaten-naa/): आसमान से इनायतें न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं मुहब्बतों से राहतें न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं, हमें आशिक़ी में सच मिला हमें ज़िन्दगी में सब मिला मगर बेवफ़ाई की आदतें न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं, इधर तू दुआ में लगा रहा उधर मैं दुआ में लगा रहा पर मन्नतों से हाजतें न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं, थी आरज़ू कभी साहिलों पे तेरे साथ साथ हम चल सकें पर समंदरों से इजाज़तें न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं, जिस ज़िन्दगी की ख्वाहिशों में सौ रतजगो में सजूद किये उस ज़िन्दगी की बशारतें न तुझे मिलीं न मुझे - [किस क़दर साहब ए क़िरदार समझते हैं मुझे](https://bazmeshayari.com/kis-qadar-sahab-e/): किस क़दर साहब ए क़िरदार समझते हैं मुझे मुझको था ज़ो’म मेरे यार समझते हैं मुझे, अब तो कुछ और भी गहरी हैं मेरी बुनियादें अब तो घर वाले भी दीवार समझते हैं मुझे, मैं तो बाज़ार में उतरा था कि रौनक है यहाँ और ये लोग ख़रीदार समझते हैं मुझे, ऐ मेरे इश्क़ ! तेरे वास्ते ख़ुशख़बरी है अब तो बीमार भी बीमार समझते है मुझे, मेरी कोशिश है कि हो जाऊँ खड़ा हक़ के साथ और वो अपना तरफ़दार समझते हैं मुझे, कुछ तो मेरी भी तबीयत में अना शामिल है और कुछ लोग भी ख़ुद्दार समझते हैं - [बार ए गम ए हयात उठाया तो रो पड़े](https://bazmeshayari.com/baar-e-gam-ehayat/): बार ए गम ए हयात उठाया तो रो पड़े जब ज़ीस्त ने मजाक उड़ाया तो रो पड़े, रहता है सोगवार ये दिल जाने किस लिए हमको यही ख्याल जो आया तो रो पड़े, लहज़े की तल्खियाँ वो सुनी हैं कि बस हमें जब प्यार से किसी ने बुलाया तो रो पड़े, फूलों को यूँ ही देख के काँटों के दरम्याँ हमने भी गम ख़ुशी में मिलाया तो रो पड़े, तन्हाई के अँधेरे में हमने जो आज शब यादों का एक चिराग़ जलाया तो रो पड़े, ढलते ही जा रहे हैं यहाँ रफ़्तगाँ में लोग हमने भी जब किसी को भूलाया - [बताओ कौन कहता है ? मुहब्बत बस कहानी है](https://bazmeshayari.com/bataao-kaun-kahta-hai/): बताओ कौन कहता है ? मुहब्बत बस कहानी है मुहब्बत तो सहीफ़ा है, मुहब्बत आसमानी है, मुहब्बत को ख़ुदारा तुम कभी भी झूठ न समझो मुहब्बत मो’जिज़ा है, मो’जज़ों की तर्जुमानी है, मुहब्बत फूल की ख़ुशबू, मुहब्बत तितलियों का रंग मुहब्बत परबतों की झील का शफ़्फ़ाक पानी है, ज़मीं वाले बताओ किस तरह समझे मुहब्बत को ? मुहब्बत तो ज़मीं पर आसमानों की निशानी है, मुहब्बत रौशनी है, रंग है, ख़ुशबू है, नग्मा है मुहब्बत उड़ता पंछी है, मुहब्बत बहता पानी है, मुहब्बत माओं का आँचल, मुहब्बत बाप की शफ़क़त मुहब्बत हर जगह हर पल, ख़ुदा का नक्श सानी है, - [नींद नहीं आती कितनी अकेली हो गई](https://bazmeshayari.com/neend-nahi-aati-kitni/): नींद नहीं आती कितनी अकेली हो गई रफ़ू करते करते ज़िन्दगी पहेली हो गई, ये हसरतें भी ख़्वाब भी लगने लगे ऐसे चाय जैसे कप में देर की उड़ेली हो गई, सोता हूँ जागता हूँ रहती है साथ साथ ये ग़म की दुनिया पक्की सहेली हो गई, अब ढूँढने क्या जाना कन्नौज में ख़ुशबू मेरी तन्हाई की बस्ती नई नवेली हो गईं, इधर तूफ़ान आये हैं ना कोई ज़लज़ला मगर ज़र्ज़र कैसे गाँव की हवेली हो गई ? माँ बाप समझते हैं जहाँ पा लिया अगर उनकी बच्चियों की पीली हथेली हो गई, जाता हूँ कहीं भी पर पीछा नहीं - [हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो](https://bazmeshayari.com/har-ek-ghar-men/): हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो, रहेगी वादों में कब तक असीर ख़ुशहाली हर एक बार ही कल क्यूँ कभी तो आज भी हो, न करते शोर शराबा तो और क्या करते ? तुम्हारे शहर में कुछ और काम काज भी हो, हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो, बदल रहे हैं कई आदमी दरिंदों में मरज़ पुराना है इसका नया इलाज भी हो, अकेले ग़म से नई शाइरी नहीं होती ज़बान ए मीर में ग़ालिब का इम्तिज़ाज भी - [नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है](https://bazmeshayari.com/nayi-nayi-aakhen-ho/): नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है, मिलने जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं जिससे अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है, मेरे आँगन में आए या तेरे सर पर चोट लगे सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है, चाहत हो या पूजा सब के अपने अपने साँचे हैं जो मौत में ढल जाए वो पैकर अच्छा लगता है, हम ने भी सो कर देखा है नए पुराने शहरों में जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है..!! - [आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी...](https://bazmeshayari.com/aaj-zara-fursat-paai/): आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया, खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया, बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया, बात बहुत मामूली सी थी उलझ गई तकरारों में एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बरबाद किया, दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया..!! ~निदा - [मुँह की बात सुने हर कोई...](https://bazmeshayari.com/munh-ki-baat-sune/): मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन ? सदियों सदियों वही तमाशा रस्ता रस्ता लम्बी खोज लेकिन जब हम मिल जाते हैं खो जाता है जाने कौन ? वो मेरी परछाईं है या मैं उस का आईना हूँ मेरे ही घर में रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन ? जाने क्या क्या बोल रहा था सरहद प्यार किताबें ख़ून कल मेरी नींदों में छुप कर जाग रहा था जाने कौन ? किरन किरन अलसाता सूरज पलक पलक खुलती नींदें धीमे धीमे बिखर रहा है ज़र्रा ज़र्रा जाने - [हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी](https://bazmeshayari.com/har-taraf-har-jagah/): हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी, सुब्ह से शाम तक बोझ ढोता हुआ अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी, हर तरफ़ भागते दौड़ते रास्ते हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी, रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ हर नए दिन नया इंतिज़ार आदमी, घर की दहलीज़ से गेहूँ के खेत तक चलता फिरता कोई कारोबार आदमी, ज़िंदगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी..!! ~निदा फ़ाज़ली - [जो हो एक बार वो हर बार हो ऐसा नहीं होता](https://bazmeshayari.com/jo-ho-ek-baar/): जो हो एक बार वो हर बार हो ऐसा नहीं होता हमेशा एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता, हर एक कश्ती का अपना तजरबा होता है दरिया में सफ़र में रोज़ ही मंझधार हो ऐसा नहीं होता, कहानी में तो किरदारों को जो चाहे बना दीजे हक़ीक़त भी कहानी कार हो ऐसा नहीं होता, कहीं तो कोई होगा जिस को अपनी भी ज़रूरत हो हर एक बाज़ी में दिल की हार हो ऐसा नहीं होता, सिखा देती हैं चलना ठोकरें भी राहगीरों को कोई रस्ता सदा दुश्वार हो ऐसा नहीं होता..!! ~निदा फ़ाज़ली - [तुम अपने अक़ीदों के नेज़े...](https://bazmeshayari.com/tum-apne-akido-ke/): तुम अपने अक़ीदों के नेज़े हर दिल में उतारे जाते हो, हम लोग मोहब्बत वाले हैं तुम ख़ंजर क्यूँ लहराते हो ? इस शहर में नग़्मे बहने दो बस्ती में हमें भी रहने दो, हम पालनहार हैं फूलों के हम ख़ुश्बू के रखवाले हैं, तुम किस का लहू पीने आए हम प्यार सिखाने वाले हैं, इस शहर में फिर क्या देखोगे जब हर्फ़ यहाँ मर जाएगा, जब तेग़ पे लय कट जाएगी जब शेर सफ़र कर जाएगा, जब क़त्ल हुआ सुर साज़ों का जब काल पड़ा आवाज़ों का, जब शहर खंडर बन जाएगा फिर किस पर संग उठाओगे, अपने चेहरे - [तू ख़ुश है गर मुझ से जुदा होने पर](https://bazmeshayari.com/tu-khush-hai-gar/): तू ख़ुश है गर मुझ से जुदा होने पर कोई गिला नहीं फिर तेरे बे वफ़ा होने पर, जब जिस्म नहीं तेरी रूह से मुहब्बत की है तो फिर गम क्या तेरे और किसी का होने पर, है ख़ुशी कि तेरे हिस्से में गुलिस्तान आये नहीं दुःख अपने मुकीम ए सहरा होने पर, तू जो देखे मुस्कुरा कर तो जान आती है मगर जान जाती है तुम्हारे खफ़ा होने पर, जब तक थे ज़िन्दां में सब गायब थे अहबाब अब आये हैं साथ निभाने रिहा होने पर, दस्त ए ज़ालिम को तो रोकना मुमकिन है क्या कीजिए मगर आँखों से - [बेचैन बहुत फिरना घबराए हुए रहना](https://bazmeshayari.com/bechain-bahut-firna-ghabraye/): बेचैन बहुत फिरना घबराए हुए रहना एक आग सी जज़्बों की दहकाए हुए रहना, छलकाए हुए चलना ख़ुशबू लब ए लालीं की एक बाग़ सा साथ अपने महकाए हुए रहना, उस हुस्न का शेवा है जब इश्क़ नज़र आए पर्दे में चले जाना शरमाए हुए रहना, एक शाम सी कर रखना काजल के करिश्मे से एक चाँद सा आँखों में चमकाए हुए रहना, आदत ही बना ली है तुम ने तो मुनीर अपनी जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना..!! ~मुनीर नियाज़ी - [पर्बत तेरे पहलू में अगर खाई नहीं है](https://bazmeshayari.com/parbat-tere-pahlu-men/): पर्बत तेरे पहलू में अगर खाई नहीं है काहे की बुलंदी जहाँ गहराई नहीं है, अब कोई वहाँ इस लिए होता नहीं रुस्वा कूचे में तेरे कोई तमाशाई नहीं है, हज़रत जो रवादारी नज़र आप में आई क्यों आप के बच्चों में नज़र आई नहीं है, दुनिया ने तो उसमें भी कई नक़्स निकाले तस्वीर जो मैंने अभी बनवाई नहीं है, इस वास्ते भी रौशनी है बाइस ए वहशत आँखों की चराग़ों से शनासाई नहीं है, ख़ुद बाँट के आएँगे वहाँ अपनी सदा हम जिस सम्त हवाओं ने ये पहुँचाई नहीं है, शायद कि हर एक शख़्स को होती है - [सीधे साधे लोग थे पहले घर भी सादा होता था](https://bazmeshayari.com/sidhe-saadhe-log-the/): सीधे साधे लोग थे पहले घर भी सादा होता था कमरे कम होते थे और दालान कुशादा होता था, देख के वो घर गाँव वाले सोग मनाया करते थे सहन में जो दीवार उठा कर आधा आधा होता था, मुस्तक़बिल और हाल के आज़ारों के साथ निमटने को चौपालों में माज़ी की यादों का इआदा होता था, दुख चाहे जिसका भी हो वो मिल कर बाँटा जाता था ग़म तो आज के जैसे थे एहसास ज़ियादा होता था, लड़के बाले मीलों पैदल पढ़ने जाया करते थे पास है जो स्कूल वो पहले दूर उफ़्तादा होता था, थक जाता कोई तो - [मशवरे पर न कहीं धूप के चलने लग जाएँ](https://bazmeshayari.com/mashware-par-na-kahin/): मशवरे पर न कहीं धूप के चलने लग जाएँ आदमी मोम बनें और पिघलने लग जाएँ, जैसे माहौल बदल देती है मुस्कान तेरी पैरहन देख के मौसम न बदलने लग जाएँ, इस क़दर बुग़्ज़ दिलों में है कि मालूम नहीं लोग कब किसके लिए ज़हर उगलने लग जाएँ, देख कर रौनक़ ए बाज़ार में बच्चों का सब्र अब ये ख़तरा है खिलौने न मचलने लग जाएँ, हम भी गुलशन से निकल जाएँगे ख़ामोशी से नए पौदे तो ज़रा फूलने फलने लग जाएँ, मौत है भूक है कर्तब है कि क्या है जब लोग दो सुतूनों से बंधी तार पे चलने - [हर दिन है मुहब्बत का, हर रात मुहब्बत की](https://bazmeshayari.com/har-din-hai-muhabbat/): हर दिन है मुहब्बत का, हर रात मुहब्बत की हम अहल ए मुहब्बत में, हर बात मुहब्बत की, सीनों में उतरते हैं इल्हाम मुहब्बत के आँखों से बरसती है बरसात मुहब्बत की, हम दर्द के मारों का इतना सा हवाला है तन्हाई है घर अपना, और ज़ात मुहब्बत की, दौलत के ख़ुदाओं ने देखी ही नहीं शायद दामन में ग़रीबों के, बहुतात मुहब्बत की, इन ख़ाक नशीनों से रौनक है ज़माने की जो बाँटते फिरते है, खैरात मुहब्बत की, होती है मुकम्मल ये ईमान ब हर सूरत क्या जीत मुहब्बत की, क्या मात मुहब्बत की, हम लोग उठा लेगे, हर - [मुझे इल्म है तुम रास्ते से पलट जाओगे](https://bazmeshayari.com/mujhe-ilm-hai-tum/): मुझे इल्म है तुम रास्ते से पलट जाओगे फिर तुम्हारे साथ सफ़र की इब्तिदा क्या करना ? वैसे भी ये किसी और को मयस्सर होंगी ये जुल्फें, ये लब, ये तेरी अदा का क्या करना ? तुमने वफ़ा तो निभाई मगर रकीब के साथ अब बताओ ये तुम्हारी उस वफ़ा का क्या करना ? तुम न सही तुम्हारी निशानियाँ तो रख लूँ ये तेरे ख़त, तस्वीरें जला कर क्या करना ? मेरे बगैर अगर कोई तेरा आसरा नहीं माहिर इधर आ मेरे पास तुझे फिर जुदा क्या करना..?? ~माहिर - [दिलजलों से दिल्लगी अच्छी नहीं](https://bazmeshayari.com/diljalon-se-dillagi-achchi/): दिलजलों से दिल्लगी अच्छी नहीं रोने वालों से हँसी अच्छी नहीं, मुँह बनाता है बुरा क्यूँ वक़्त ए वाज़ आज वाइज़ तू ने पी अच्छी नहीं, ज़ुल्फ़ ए यार इतना न रख दिल से लगाओ दोस्ती नादान की अच्छी नहीं, बुतकदे से मयकदा अच्छा मेरा बेख़ुदी अच्छी ख़ुदी अच्छी नहीं, मुफ़लिसों की ज़िंदगी का ज़िक्र क्या मुफ़्लिसी की मौत भी अच्छी नहीं, इस क़दर खिंचती है क्यूँ ऐ ज़ुल्फ़ ए यार ले के दिल इतनी कजी अच्छी नहीं, आएँ मेरी बज़्म ए मातम में वो क्या हाथ में मेंहदी रची अच्छी नहीं, शैख़ को दे दो मय ए बेरंग ओ - [मेरी तन्हाई बढ़ाते हैं चले जाते है](https://bazmeshayari.com/meri-tanhaai-badhaate-hai/): मेरी तन्हाई बढ़ाते हैं चले जाते है हँस तालाब पे आते हैं चले जाते हैं, इसलिए अब मैं किसी को नहीं जाने देता जो मुझे छोड़ के जाते हैं चले जाते हैं, मेरी आँखों से बहा करती है उनकी ख़ुश्बू रफ़्तगाँ ख़्वाब में आते हैं चले जाते हैं, शादी ए मर्ग का माहौल बना रहता है आप आते हैं रुलाते हैं चले जाते हैं, कब तुम्हें इश्क़ पे मजबूर किया है हमने हम तो बस याद दिलाते हैं चले जाते हैं, आप को कौन तमाशाई समझता है यहाँ आप तो आग लगाते हैं चले जाते हैं, हाथ पत्थर को बढ़ाऊँ - [पानी आँख में भर कर लाया जा सकता है](https://bazmeshayari.com/paani-aankh-me-bhar/): पानी आँख में भर कर लाया जा सकता है अब भी जलता शहर बचाया जा सकता है, एक मोहब्बत और वो भी नाकाम मोहब्बत लेकिन इस से काम चलाया जा सकता है, दिल पर पानी पीने आती हैं उम्मीदें इस चश्मे में ज़हर मिलाया जा सकता है, मुझ गुमनाम से पूछते हैं फ़रहाद ओ मजनूँ इश्क़ में कितना नाम कमाया जा सकता है, ये महताब ये रात की पेशानी का घाव ऐसा ज़ख़्म तो दिल पर खाया जा सकता है, फटा पुराना ख़्वाब है मेरा फिर भी ताबिश इस में अपना आप छुपाया जा सकता है..!! ~अब्बास ताबिश - [जब से तेरा ख्याल रखा है](https://bazmeshayari.com/jab-se-tera-khyal/): जब से तेरा ख्याल रखा है दिल ने मुश्किल में डाल रखा है, आप पर दिल ये आ गया वरना आप में क्या कमाल रखा है, अब किसी काम की कहाँ फ़ुर्सत आप का गम जो पाल रखा है, ख़ुद वो मेरे ही दिल में रहते है मुझको दिल से निकाल रखा है, ख़ुशी अपनी थी बाँट दी हम ने गम तेरा था संभाल रखा है, लौट जाएँ या जाएँ उसकी गली हम ने सिक्का उछाल रखा है, ख़ुद हमारी जगह नहीं बनती घर में इतना मलाल रखा है, हम ने हर फ़ैसला मुहब्बत में रोज़ ए महशर पे टाल - [ये तमन्ना थी कि तकमील ए तमन्ना करते](https://bazmeshayari.com/ye-tamanna-thi-ki/): ये तमन्ना थी कि तकमील ए तमन्ना करते सामने तुझ को बिठा के हम तेरी पूजा करते, कुछ न होता जो मोहब्बत में तो ऐसा करते हम तेरे हुस्न से ईमान का सौदा करते, सब नमाज़ें ही एक सज्दे में अदा हो जातीं बेख़ुदी में जो दर ए यार पे सज्दा करते, इश्क़ बख़्शा था तो फिर ऐसी नज़र की होती दिल के आईने में जल्वा तेरा देखा करते, सज्दा करने को अगर मिलता तेरा नक़्श ए क़दम हरम और दैर में आ कर तुझे सज्दा करते, काश इस तरह से तकमील ए इबादत होती शौक़ ए सज्दा में क़दम - [खींच कर रात की दीवार पे मारे होते](https://bazmeshayari.com/khich-kar-raat-ki/): खींच कर रात की दीवार पे मारे होते मेरे हाथों में अगर चाँद सितारे होते, यार ! क्या जंग थी जो हार के तुम कहते हो जीत जाते तो ख़सारे ही ख़सारे होते, ये जो आँसूं हैं मेरी पलकों पे पानी जैसे उसकी आँखों से उभरते तो सितारे होते, ये जो हम लोग हैं एहसास में जलते हुए लोग हम ज़मीं ज़ाद न होते तो सितारे होते, तुमको इंकार की खू मार गई है वाहिद हर भंवर से न उलझते तो किनारे होते..!! ~वाहिद एजाज़ - [उसके नज़दीक ग़म ए तर्क ए वफ़ा](https://bazmeshayari.com/uske-najdik-gam-e/): उसके नज़दीक ग़म ए तर्क ए वफ़ा कुछ भी नहीं मुतमइन ऐसा है वो जैसे हुआ कुछ भी नहीं, अब तो हाथों से लकीरें भी मिटी जाती हैं उसको खो कर तो मेरे पास रहा कुछ भी नहीं, चार दिन रह गए मेले में मगर अब के भी उसने आने के लिए ख़त में लिखा कुछ भी नहीं, कल बिछड़ना है तो फिर अहद ए वफ़ा सोच के बाँध अभी आग़ाज़ ए मोहब्बत है गया कुछ भी नहीं, मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं, ऐ शुमार - [हो चराग़ ए इल्म रौशन ठीक से](https://bazmeshayari.com/ho-charag-e-ilm/): हो चराग़ ए इल्म रौशन ठीक से लोग वाक़िफ़ हों नई तकनीक से, इल्म से रौशन तो है उन का दिमाग़ दिल के गोशे हैं मगर तारीक से, राय उस पर मत करो क़ाएम कोई जानते जिस को नहीं नज़दीक से, मर्तबा किस का है कैसा क्या पता बाज़ आना चाहिए तज़हीक से, हाथ फैलाना मुक़द्दर बन न जाए पेट भरना छोड़ दीजे भीक से, जुड़ गया शीशा भरोसे का मगर रह गए हैं बाल कुछ बारीक से, जिसका मक़्सद अदल ओ अम्न ओ आतिशी दिल है वाबस्ता उसी तहरीक से, बेसबब राग़िब तड़प उठता है दिल दिल को समझाना - [मोड़ था कैसा तुझे था खोने वाला मैं](https://bazmeshayari.com/mod-tha-kaisa-tujhe/): मोड़ था कैसा तुझे था खोने वाला मैं रो ही पड़ा हूँ कभी न रोने वाला मैं, क्या झोंका था चमक गया तन मन सारा पता न था फिर राख था होने वाला मैं, लहर थी कैसी मुझे भँवर में ले आई नदी किनारे हाथ भिगोने वाला मैं, रंग कहाँ था फूल की पत्ती पत्ती में किरन किरन सी धूप पिरोने वाला मैं, क्या दिन बीता सब कुछ आँख में फिरता है जाग रहा हूँ मज़े में सोने वाला मैं, शहर ए ख़िज़ाँ है ज़र्दी ओढ़े खड़े हैं पेड़ मंज़र मंज़र नज़र चुभोने वाला मैं, जो कुछ है इस पार - [कभी कभी कितना नुक़सान उठाना पड़ता है](https://bazmeshayari.com/kabhi-kabhi-kitna-nuksan/): कभी कभी कितना नुक़सान उठाना पड़ता है ऐरों ग़ैरों का एहसान उठाना पड़ता है, टेढ़े मेढ़े रस्तों पर भी ख़्वाबों का पश्तारा तेरी ख़ातिर मेरी जान उठाना पड़ता है, कब सुनता है नाला कोई शोर शराबे में मजबूरी में भी तूफ़ान उठाना पड़ता है, कैसी हवाएँ चलने लगी हैं मेरे बाग़ों में फूलों को भी अब सामान उठाना पड़ता है, गुलदस्ते की ख़्वाहिश रखने वालों को अक्सर कोई ख़ार भरा गुलदान उठाना पड़ता है, याँ कोई तफ़रीक़ नहीं है शाह गदा सब को अपना बोझ दिल ए नादान उठाना पड़ता है, यूँ मायूस नहीं होते हैं कोई न कोई ग़म - [एक रात आती है एक रात जाती है](https://bazmeshayari.com/ek-raat-aati-hai/): एक रात आती है एक रात जाती है गेसुओं के साए में किस को नींद आती है, सिलसिला ग़म ए दिल का बेसबब नज़र आया शम से कोई पूछे क्यों लहू जलाती है, हुस्न से भी कुछ बढ़ कर बेनियाज़ है ये ग़म दाग़ ए दिल मोहब्बत भी गिन के भूल जाती है, नाम पड़ गया उस का कूचा ए हरम लेकिन ये गली भी ऐ ज़ाहिद मयकदे को जाती है, चलते चलते नब्ज़ ए ग़म डूबती है यूँ अक्सर एक थके मुसाफ़िर को जैसे नींद आती है, हाथ रखती जाती है यास दिल के दाग़ों पर मैं दिया जलाता - [जाग उठेंगे दर्द पुराने ज़ख़्मों की अँगनाई में](https://bazmeshayari.com/jaag-uthenge-dard-puraane/): जाग उठेंगे दर्द पुराने ज़ख़्मों की अँगनाई में दिल की चोट उभर आएगी मत निकलो पुर्वाई में, कोयल कूकी मौज ए सबा ने पाँव में घुंघरू बाँध लिए प्यार का नग़्मा छेड़ रहा है आज कोई शहनाई में, जो पहले बदनाम हुए थे उन को दुनिया भूल गई हम ने कैसे रंग भरे हैं इश्क़ तेरी रुस्वाई में, कौन तुम्हारे दुख बाँटेगा कौन ये नाज़ उठाएगा हम जिस वक़्त न होंगे जानाँ तड़पोगे तन्हाई में, आज फ़ना के पीछे पीछे ख़ाक उड़ाते फिरते हैं लोगों ने क्या देख लिया है आज तेरी सौदाई में..!! ~फ़ना बुलंदशहरी - [बा वक़्त ए शाम सूरज से हुकुमत छीन लेता है](https://bazmeshayari.com/baa-waqt-e-shaam/): बा वक़्त ए शाम सूरज से हुकुमत छीन लेता है सहर होते ही सितारों से क़यादत छीन लेता है, क़रीने सीख लो उसकी ज़मीं पे चलने फिरने के तकव्वुर करने वालों से वो क़ुव्वत छीन लेता है, कुर्सी की बुलंदी पे यूँ मगरूर न हो तू ऐ नादां वो चाहे तो फिरऔन से भी हुकुमत छीन लेता है, हर एक दाने में उसके फैज़ की मो’जिज़ा नुमाई है ना कद्रों के निवालो से वो लज्ज़त छीन लेता है, बड़ी मुश्किल से मिलती है ये सिफ़त नेकनामी की ज़रा सा बहक जाओ तो वो इज्ज़त छीन लेता है, कभी कश्ती बचा - [बहुत उदास है दिल जाने माजरा क्या है](https://bazmeshayari.com/bahut-udaas-hai-dil/): बहुत उदास है दिल जाने माजरा क्या है मेरे नसीब में गम के सिवा धरा क्या है, मैं जिनके वास्ते दुनियाँ ही छोड़ आया था वो पूछते है कि आख़िर हुआ क्या है, निभा रहा हूँ मैं दुनियाँ के रह ओ रस्म यहाँ वगरना जिस्म के सहरा में अब बचा क्या है, यहाँ तो ईद का मौसम भी अब नहीं आता ना जाने ग़र्दिश ए दौराँ को हो गया क्या है, हर एक रात मेरी ज़िन्दगी का मातम है हर एक शाम यहाँ मौत के सिवा क्या है, हमारा फ़र्ज़ तो जलना है सिर्फ़ महफ़िल में भला चराग का ख़ुशियों - [सुकुन के दिन फ़रागत की रात से भी गए](https://bazmeshayari.com/sukun-ke-din-faragat/): सुकुन के दिन फ़रागत की रात से भी गए तुझे गँवा के हम भारी कायनात से भी गए, जुदा तो हुए थे मगर दिल कभी टूटा न था जो खफ़ा हुए तो तेरे इल्तिफ़ात से भी गए, चले तो झील की गहराइयाँ थी आँखों में पलट के आये तो मौज ए फ़रात से भी गए, ख्याल था कि तुझको पा के ख़ुद को ढूंढेगे तू मिल गया तो ख़ुद अपनी ज़ात से भी गए, बिछड़ के ख़त भी न लिखे उदास यारों ने अब कभी कभी अधूरी सी बात से भी गए..!! - [कोई महबूब सितमगर भी तो हो सकता है](https://bazmeshayari.com/koi-mahbub-sitamgar-bhi/): कोई महबूब सितमगर भी तो हो सकता है फूल के हाथ में खंजर भी तो हो सकता है, एक मुद्दत से जिसे लोग ख़ुदा कहते है छु के देखो कि वो पत्थर भी तो हो सकता है, मुझको आवारगी ए इश्क़ का इल्ज़ाम न दो कोई इस शहर में बेघर भी तो हो सकता है, कैसे मुमकिन कि उसे जान के बराबर समझूँ वो मेरी जान से बढ़ कर भी तो हो सकता है, सिर्फ़ सावन ही तो नहीं आग लगाने वाला जून की तरह दिसम्बर भी तो हो सकता है, चाक दामन से मेरे मुझको बुरा मत समझो कोई - [जिसके साथ अपनी माँ की दुआ होती है](https://bazmeshayari.com/jiske-saath-apni-maan/): जिसके साथ अपनी माँ की दुआ होती है उसके मुक़द्दर में जन्नत की हवा होती है, जिन्हें माँ की गोद से अच्छा दरस मिला हो वही जानता है कि माँ की कद्र क्या होती है, औलाद ग़मों को कभी छुपा नहीं सकती माँ बच्चों की हर बात से आगाह होती है, जिन लोगो की माएँ इस दुनियाँ में नहीं है कभी उनसे पूछों कि माँ क्या होती है, जिस बेटी को माँ से हया का ज़ेवर मिला हो ज़िन्दगी की सफ़र में वो बा हया होती है, दुनियाँ ए फ़ानी में माँ की दुआ मिल जाए ऐसे औलादों के साथ - [फूल का शाख़ पे आना भी बुरा लगता है](https://bazmeshayari.com/phool-ka-shaakh-pe/): फूल का शाख़ पे आना भी बुरा लगता है तू नहीं है तो ज़माना भी बुरा लगता है, ऊब जाता हूँ ख़मोशी से भी कुछ देर के बाद देर तक शोर मचाना भी बुरा लगता है, इतना खोया हुआ रहता हूँ ख़यालों में तेरे पास मेरे तेरा आना भी बुरा लगता है, ज़ाइक़ा जिस्म का आँखों में सिमट आया है अब तुझे हाथ लगाना भी बुरा लगता है, मैंने रोते हुए देखा है अली बाबा को बाज़ औक़ात ख़ज़ाना भी बुरा लगता है, अब बिछड़ जा कि बहुत देर से हम साथ में हैं पेट भर जाए तो खाना भी - [हर घड़ी चश्म ए ख़रीदार में रहने के लिए](https://bazmeshayari.com/har-ghadi-chashm-e/): हर घड़ी चश्म ए ख़रीदार में रहने के लिए कुछ हुनर चाहिए बाज़ार में रहने के लिए, मैं ने देखा है जो मर्दों की तरह रहते थे मस्ख़रे बन गए दरबार में रहने के लिए, ऐसी मजबूरी नहीं है कि चलूँ पैदल मैं ख़ुद को गर्माता हूँ रफ़्तार में रहने के लिए, अब तो बदनामी से शोहरत का वो रिश्ता है कि लोग नंगे हो जाते हैं अख़बार में रहने के लिए..!! ~शकील आज़मी - [मुझपे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मेंरे साथ न चल](https://bazmeshayari.com/mujhpe-hai-saikdo-ilzam/): मुझपे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मेंरे साथ न चल तू भी हो जाएगा बदनाम मेंरे साथ न चल, तू नई सुबह के सूरज की है उजली सी किरन मैं हूँ एक धूल भरी शाम मेंरे साथ न चल, अपनी ख़ुशियाँ मेरे आलाम से मंसूब न कर मुझ से मत माँग मेरा नाम मेरे साथ न चल, तू भी खो जाएगी टपके हुए आँसू की तरह देख ऐ गर्दिश ए अय्याम मेरे साथ न चल, मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा शकील टूटता रहता हूँ हर गाम मेरे साथ न चल..!! ~शकील आज़मी - [परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है](https://bazmeshayari.com/paro-ko-khol-zamana/): परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है, मिला है हुस्न तो इस हुस्न की हिफ़ाज़त कर सँभल के चल तुझे सारा जहान देखता है, कनीज़ हो कोई या कोई शाहज़ादी हो जो इश्क़ करता है कब ख़ानदान देखता है, घटाएँ उठती हैं बरसात होने लगती है जब आँख भर के फ़लक को किसान देखता है, यही वो शहर जो मेरे लबों से बोलता था यही वो शहर जो मेरी ज़बान देखता है, मैं जब मकान के बाहर क़दम निकालता हूँ अजब निगाह से मुझ को मकान देखता है..!! ~शकील आज़मी - [इश्क़ से जाम से बरसात से डर लगता है](https://bazmeshayari.com/ishq-se-jaam-se/): इश्क़ से जाम से बरसात से डर लगता है यार तुम क्या हो कि हर बात से डर लगता है, इश्क़ है इश्क़ कोई खेल नहीं बच्चों का वो चला जाए जिसे मात से डर लगता है, मैं तेरे हुस्न का शैदाई नहीं हो सकता रोज़ बटती हुई ख़ैरात से डर लगता है, हम ने हालात बदलने की दुआ माँगी थी अब बदलते हुए हालात से डर लगता है, दिल तो करता है कि बारिश में नहाएँ यासिर घर जो कच्चा हो तो बरसात से डर लगता है..!! ~यासिर ख़ान इनाम - [सभी कहें मेरे ग़मख़्वार के अलावा भी](https://bazmeshayari.com/sabhi-kahen-mere-gamkhwar/): सभी कहें मेरे ग़मख़्वार के अलावा भी कोई तो बात करूँ यार के अलावा भी, बहुत से ऐसे सितमगर थे अब जो याद नहीं किसी हबीब ए दिलआज़ार के अलावा भी, ये क्या कि तुम भी सर ए राह हाल पूछते हो कभी मिलो हमें बाज़ार के अलावा भी, उजाड़ घर में ये ख़ुशबू कहाँ से आई है कोई तो है दर ओ दीवार के अलावा भी, सो देख कर तेरे रुख़्सार ओ लब यक़ीं आया कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी, कभी फ़राज़ से आ कर मिलो जो वक़्त मिले ये शख़्स ख़ूब है अशआर के अलावा - [वो दुश्मन ए जाँ जान से प्यारा भी कभी था](https://bazmeshayari.com/wo-dushman-e-jaan/): वो दुश्मन ए जाँ जान से प्यारा भी कभी था अब किस से कहें कोई हमारा भी कभी था, उतरा है रग ओ पै में तो दिल कट सा गया है ये ज़हर ए जुदाई कि गवारा भी कभी था, हर दोस्त जहाँ अब्र ए गुरेज़ाँ की तरह है ये शहर कभी शहर हमारा भी कभी था, तितली के तआक़ुब में कोई फूल सा बच्चा ऐसा ही कोई ख़्वाब हमारा भी कभी था, अब अगले ज़माने के मिलें लोग तो पूछें जो हाल हमारा है तुम्हारा भी कभी था, हर बज़्म में हम ने उसे अफ़्सुर्दा ही देखा कहते हैं - [ये जो नंग थे ये जो नाम थे मुझे खा गए](https://bazmeshayari.com/ye-jo-nang-the/): ये जो नंग थे ये जो नाम थे मुझे खा गए ये ख़याल ए पुख़्ता जो ख़ाम थे मुझे खा गए, कभी अपनी आँख से ज़िंदगी पे नज़र न की वही ज़ाविए कि जो आम थे मुझे खा गए, मैं अमीक़ था कि पला हुआ था सुकूत में ये जो लोग महव ए कलाम थे मुझे खा गए, वो जो मुझ में एक इकाई थी वो न जुड़ सकी यही रेज़ा रेज़ा जो काम थे मुझे खा गए, ये अयाँ जो आब ए हयात है इसे क्या करूँ ? कि निहाँ जो ज़हर के जाम थे मुझे खा गए, वो - [पाबंदियों से अपनी निकलते वो पा न थे](https://bazmeshayari.com/pabandiyo-se-apni-nikalte/): पाबंदियों से अपनी निकलते वो पा न थे सब रास्ते खुले थे मगर हम पे वा न थे, ये और बात शौक़ से हम को सुना गया फिर भी वही सुनाया सुना एक फ़साना थे, एक आग साएबान था सर पर तना हुआ पल पल ज़मीं सरकती थी और हम रवाना थे, दरिया में रह के कोई न भीगे तो किस तरह हम बे नियाज़ तेरी तरह ऐ ख़ुदा न थे, हरगिज़ गिला नहीं है कि तू मेहरबाँ न था कब हम भी अपने आप से बेहद ख़फ़ा न थे, क्यूँ सब्र आश्ना न हुआ ना मुराद दिल तेरे करम - [इस नाज़ इस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो](https://bazmeshayari.com/is-naaz-is-andaz/): इस नाज़ इस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो रोज़ एक ग़ज़ल हमसे कहलवाए चलो हो, रखना है कहीं पाँव तो रखो हो कहीं पाँव चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो, दीवाना ए गुल क़ैदी ए ज़ंजीर हैं और तुम क्या ठाट से गुलशन की हवा खाए चलो हो, मय में कोई ख़ामी है न साग़र में कोई खोट पीना नहीं आए है तो छलकाए चलो हो, हम कुछ नहीं कहते हैं कोई कुछ नहीं कहता तुम क्या हो तुम्हीं सब से कहलवाए चलो हो, ज़ुल्फ़ों की तो फ़ितरत ही है लेकिन मेंरे प्यारे ज़ुल्फ़ों से ज़ियादा तुम्हीं - [मुग़ालता है उरूज ओ ज़वाल थोड़ी है](https://bazmeshayari.com/mugaalta-hai-uroozo-zawal/): मुग़ालता है उरूज ओ ज़वाल थोड़ी है हमारी आँख के शीशे में बाल थोड़ी है, हमारे दिल में कबूतर नमाज़ पढ़ते हैं हमारे दिल में तअस्सुब का जाल थोड़ी है, लबादा बर्फ़ का ओढ़े हुए है ज्वालामुखी ज़मीं के लावे में अब के उबाल थोड़ी है, हैं हम हुसैनी हमें सर कटाना आता है हमारे पास यज़ीदाना चाल थोड़ी है, मेरे हबीब की तमसील ढूँढने वालो वो बेमिसाल है उसकी मिसाल थोड़ी है, हर एक शाख़ से जाड़े की बर्फ़ लिपटी है अभी दरख़्त पे पत्तों की शाल थोड़ी है, ब रोज़ ए ईद भी रोज़े के जैसी हालत है - [दिल ए नादान की बात थी और कुछ नहीं](https://bazmeshayari.com/dil-e-naadaan-ki/): दिल ए नादान की बात थी और कुछ नहीं मुहब्बत स्याह रात थी और कुछ भी नहीं, आसानियों की आस में तल्खियों के बीच गुज़री तमाम हयात थी और कुछ नहीं, एक मोड़ पे मिले थे आँखों ही आँखों में बस नज़रों की मुलाक़ात थी और कुछ नहीं, वो छोड़ के जहाँ भी गया है बस ख़ुश रहे यही रब से मुनाजात थी और कुछ नहीं..!! - [वो दर्द वो वफ़ा वो मुहब्बत तमाम शुद](https://bazmeshayari.com/wo-dard-wo-wafa/): वो दर्द वो वफ़ा वो मुहब्बत तमाम शुद लिए दिल में तेरे क़ुर्ब की हसरत तमाम शुद, ये बाद में खुलेगा कि किस किस का खून हुआ हर एक बयान खत्म अदालत तमाम शुद, तू अब तो दुश्मनी के भी क़ाबिल नहीं रहा उठती थी जो कभी वो अदावत तमाम शुद, अब रब्त एक नया मुझे आवारगी से है पाबन्दी ख्याल की आदत तमाम शुद, जायज़ थी या नहीं तेरे हक़ में थी मगर करता था जो कभी वो वक़ालत तमाम शुद, वो रोज़ रोज़ मरने का क़िस्सा हुआ तमाम वो रोज़ दिल को चीरती वहशत तमाम शुद..!! - [रिहा कर मुझे या सज़ा दे ऐ आदिल](https://bazmeshayari.com/riha-kar-mujhe-yaa/): रिहा कर मुझे या सज़ा दे ऐ आदिल कोई तो फ़ैसला तू सुना दे ऐ आदिल, यूँ असीरी में जीना तो है तौहीन मेरी चाहे मुझे दार पर चढ़ा दे ऐ आदिल, कहाँ अदल मुझको ज़मीन पर मिलेगा कोई रास्ता ही तू दिखा दे ऐ आदिल, मुझे अगली तारीख में अब या ख़ुदारा क़यामत का दिन ही बता दे ऐ आदिल, वो मुज़रिम है उसकी जगह है जेल अब तो उसे तख़्त से हटा दे ऐ आदिल, रियाया पे जो क़वानीन चल रहे हैं यहाँ वही इन हाकिमों पे चला दे ऐ आदिल, फक़त जो क़िताबों में दम ले रहे - [जब भी तुम चाहों मुझे ज़ख्म नया देते रहो](https://bazmeshayari.com/jab-bhi-tum-chaho/): जब भी तुम चाहों मुझे ज़ख्म नया देते रहो बाद में फिर मुझे सहने की दुआ देते रहो, ठीक से सोच समझ कर मुझे रुख्सत करना ये न हो बाद में रो रो कर सदा देते रहो, ठीक है मान लिया है कि खता थी मेरी जैसे तुम चाहो मैं हाज़िर हूँ सज़ा देते रहो, छोड़ जाओगे तो रो धो के संभल जाऊँगा पास रह के मुझे गम हद से सिवा देते रहो, रूठ कर वो जो तुम्हें ख़ुद ही मना लेता है तुम उसको दुआ सब से जुदा देते रहो..!! - [सौ बार चमन महका सौ बार बहार आई](https://bazmeshayari.com/sau-baar-chaman-mahka/): सौ बार चमन महका सौ बार बहार आई दुनिया की वही रौनक़ दिल की वही तन्हाई, एक लहज़ा बहे आँसू एक लहज़ा हँसी आई सीखे हैं नए दिल ने अंदाज़ ए शकेबाई, इस मौसम ए गुल ही से बहके नहीं दीवाने साथ अब्र ए बहाराँ के वो ज़ुल्फ़ भी लहराई, हर दर्द ए मोहब्बत से उलझा है ग़म ए हस्ती क्या क्या हमें याद आया जब याद तेरी आई, चरके वो दिए दिल को महरूमी ए क़िस्मत ने अब हिज्र भी तन्हाई और वस्ल भी तन्हाई, देखे हैं बहुत हम ने हंगामे मोहब्बत के आग़ाज़ भी रुस्वाई अंजाम भी रुस्वाई, - [हक़ मेहर कितना होगा बताया नहीं गया](https://bazmeshayari.com/haq-mehar-kitna-hoga/): हक़ मेहर कितना होगा बताया नहीं गया शहज़ादियों को बाम पे लाया नहीं गया, कमज़ोर सी हदीस सुना दी गई कोई इंसाफ़ का तराज़ू उठाया नहीं गया, मैं अपने साथ साथ हूँ वो अपने साथ साथ हमज़ाद आप हम को बनाया नहीं गया, प्याले में प्यास और दरीचे में चाँद था वो सो रहा था मुझ से जगाया नहीं गया, एक ख़्वाब देखने में ही हम सर्फ़ हो गए अंगार ज़िंदगी का जलाया नहीं गया, हर बार छोड़ आती हूँ दरिया में लहर को चुल्लू में भर के मुझ से उठाया नहीं गया..!! ~फ़रहत ज़ाहिद - [मुस्कुरा कर चलो खिलखिला कर चलो](https://bazmeshayari.com/muskura-kar-chalo-khilkhila/): मुस्कुरा कर चलो खिलखिला कर चलो दिल किसी का मगर ना दुखा कर चलो, जिसकी ख़ुशबू जहाँ में हमेशा रहे फूल ऐसा चमन में खिला कर चलो, जिस से सारे जहाँ में उजाला रहे दीप ऐसा कोई एक जला कर चलो, क़ामयाबी फक़त रब के हाथों में है तुम वसीलों बस आज़मा कर चलो, बंद आँखों से तुम पर करें सब यक़ीं अपना ऐसा भरोसा बना कर चलो, ज़िन्दगी ख़ूबसूरत लगेगी तुम्हें रंजिशें अपने दिल से भूला कर चलो, सरहदें नफ़रतों की मिटा कर सभी रास्ते पुर अमन के बना कर चलो, हो गए है मुक़ल्लिद जो शैतान के उन - [उसकी ख़ातिर रोना हँसना अच्छा लगता है](https://bazmeshayari.com/uski-khaatir-rona-hasna/): उसकी ख़ातिर रोना हँसना अच्छा लगता है जैसे धूप में बारिश होना अच्छा लगता है, ख़्वाब की कच्ची मलमल में जब आँखें लिपटी हों यादें ओढ़ के सोते रहना अच्छा लगता है, साँझ सवेरे खुलते हैं जब तीतरियों के पर उस मंज़र में मंज़र होना अच्छा लगता है, बारिश आ कर बरस रहेगी मौसम आने पर फिर भी अपना दर्द छुपाना अच्छा लगता है, बादल ख़ुश्बू और जोगी से आख़िर कौन कहे मुझे तुम्हारा आना जाना अच्छा लगता है..!! ~फ़रहत ज़ाहिद - [दामन ए सद चाक को एक बार सी लेता हूँ मैं](https://bazmeshayari.com/daman-e-sad-chaak/): दामन ए सद चाक को एक बार सी लेता हूँ मैं तुम अगर कहते हो तो कुछ रोज़ जी लेता हूँ मैं, बेसबब पीना मेरी आदात में शामिल नहीं मस्त आँखों का इशारा हो तो पी लेता हूँ मैं, गेसुओं का हो घना साया कि शिद्दत धूप की वो मुझे जिस रंग में रखता है जी लेता हूँ मैं, आते आते आ गए अंदाज़ जीने के मुझे अब तो ख़ून के आँसू भी पी लेता हूँ मैं..!! ~राजेन्द्र नाथ रहबर - [फ़ना के तीर हवा के परों में रखे हैं](https://bazmeshayari.com/fana-ke-teer-hawa/): फ़ना के तीर हवा के परों में रखे हैं कि हम घरों की जगह मक़बरों में रखे है, पाँव से लिपटा है ख्वाहिशों का सफ़र हमारे सर हैं कि बस खंजरों में रखे हैं, हमारे अहद का अंजाम देखे क्या हो हम आईने हैं अगर पत्थरों में रखे है, बुझा गया है कोई यूँ चिराग़ आँखों के खिज़ां के फूल ही अब मंजरों में रखे हैं, ऐ ज़िन्दगी न गुजरना हमारी गलियों से अभी हमारे जनाज़े घरों में रखे हैं, जवाज़ क्या दे अदालत को बे गुनाही का हमारे फ़ैसले दानिश्वरों में रखे हैं, हमारें सर पे हकायेक़ की धूप - [आँसूं भी जो मिल जाएँ तो मुस्काती हैं](https://bazmeshayari.com/aansoo-bhi-jo-mil/): आँसूं भी जो मिल जाएँ तो मुस्काती हैं बेटियाँ तो बड़ी मासूम हैं जज़्बाती हैं, ख़िदमत से उतर जाती हैं दिल में सब के हर नई नस्ल को तहज़ीब सीखलाती हैं, इनसे क़ायम है तक़द्दुस हमारे घर का सुबह को अपनी नमाज़ों से ये महकाती है, लोग बेटों से ही रखते है तवक्को लेकिन बेटियाँ अपनी बुरे वक़्त में काम आती हैं, बेटियाँ होती हैं पुरनूर चिरागों की तरह रौशनी करती हैं जिस घर में चली जाती हैं, अपनी ससुराल का हर ज़ख्म छुपा लेती हैं सामने माँ के जब आती हैं तो मुस्काती हैं..!! - [उसने कहा कि मुझसे तुम्हें कितना प्यार है ?](https://bazmeshayari.com/usne-kaha-ki-mujhse/): उसने कहा कि मुझसे तुम्हें कितना प्यार है ? मैंने कहा सितारों का भी कोई शुमार है, उसने कहा कि कौन तुम्हें है बहुत अज़ीज़ ? मैंने कहा कि दिल पे जिसे इख़्तियार है, उसने कहा कि कौन सा तोहफ़ा है मनपसंद ? मैंने कहा वो शाम जो अब तक उधार है, उसने कहा खिज़ां में मुलाक़ात का जवाज़ ? मैंने कहा कि क़ुर्ब का मतलब बहार है, उसने कहा कि सैकड़ों गम ज़िन्दगी में हैं मैंने कहा क्या गम है, जब गमगुसार है, उसने कहा कि साथ कहाँ तक निभाओगे ? मैंने कहा कि जितनी ये साँसों की तार - [मुझे यकीं है अब हमारा जहान बदलेगा](https://bazmeshayari.com/mujhe-yaqin-hai-ab/): मुझे यकीं है अब हमारा जहान बदलेगा ज़मीन बदलेगी और आसमान बदलेगा, ये खार बदलेंगे और खारज़ाद बदलेगा सियासतों का भी ये कारोबार बदलेगा, ख़बासतों का ये सारा ज़माना बदलेगा फ़रेब ओ मकर का कारखाना बदलेगा, खबीस लोगो का तर्ज़ ए कलाम तो देखो जलील लोगो का तर्ज़ ए खुराम तो देखो, गुरुर ओ कुब्र का सारा खुमार उतरेगा मुनाफिकत का ये सारा गुबार उतरेगा, सुराही बदलेगी मीना ओ जाम बदलेगा नज़र ये आता है सारा निज़ाम बदलेगा..!! - [तुम सोज़ ए तमन्ना क्या जानों](https://bazmeshayari.com/tum-soz-e-tamanna/): तुम सोज़ ए तमन्ना क्या जानों तुम दर्द ए मुहब्बत क्या समझों ? तुम दिल का तड़पना क्या जानों ? तुम दूर खड़े तकते ही रहे और डूबने वाले डूब गए, साहिल को तुम मंज़िल समझे तुम लज्ज़त ए दरिया क्या जानों ? सौर बार अगर तुम रूठ गए हम तुमको मना ही लेते थे मगर एक बार अगर हम रूठ गए तुम हमको मनाना भूल गए, दुनिया ए रफ़ाक़त में शायद तुम पहले पहले आये हो तुम डूबती नब्ज़ें क्या समझो ? तुम दिल का धड़कना क्या जानो ? - [आइए आसमाँ की ओर चलें](https://bazmeshayari.com/aaiye-aasmaan-ki-or/): आइए आसमाँ की ओर चलें साथ ले कर ज़मीं का शोर चलें, चाँद उल्फ़त का इस्तिआरा है जिस की जानिब सभी चकोर चलें, यूँ दबे पाँव आई तेरी याद जैसे चुपके से शब में चोर चलें, दिल की दुनिया अजीब दुनिया है अक़्ल के उस पे कुछ न ज़ोर चलें, सब्ज़ रुत छाई यूँ उन आँखों की जिस तरह नाच नाच मोर चलें, तुम भी यूँ मुझ को आ के ले जाओ जैसे ले कर पतंगें डोर चलें..!! ~हनीफ़ तरीन - [ख़िज़ाँ में ओढ़ के क़ौल ओ...](https://bazmeshayari.com/khija-men-odh-ke/): ख़िज़ाँ में ओढ़ के क़ौल ओ क़रार का मौसम बहार ढूँढ रही है बहार का मौसम, वो मेरे साथ नहीं हैं तो दिल के सहरा पर समय बिखेर रहा है बहार का मौसम, फ़रेब ख़ुद को ना देगा तो और क्या देगा ना रास आए जिसे एतिबार का मौसम, तुम्हारे क़ुर्ब की मद्धम सी एक हरारत से है ढेर राख तले इंतिज़ार का मौसम..!! ~हनीफ़ तरीन - [आँखों पर पलकों का बोझ नहीं होता](https://bazmeshayari.com/aankhon-par-palko-ka/): आँखों पर पलकों का बोझ नहीं होता दर्द का रिश्ता अपनी आन नहीं खोता, बस्ती के हस्सास दिलों को चुभता है सन्नाटा जब सारी रात नहीं होता, मन नगरी में धूम धड़क्का रहता है मेरा मैं जब मेरे साथ नहीं होता, बन जाते हैं लम्हे भी कितने संगीन वक़्त कभी जब अपना बोझ नहीं ढोता, रिश्ते नाते टूटे फूटे लगते हैं जब भी अपना साया साथ नहीं होता, दिल को हनीफ़ उधार नहीं मिलता जब तक आँखों का पथरीला दर्द नहीं रोता..!! ~हनीफ़ तरीन - [रंग पैराहन का ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम](https://bazmeshayari.com/rang-pairahan-ka-khushboo/): रंग पैराहन का ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम मौसम ए गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम, दोस्तो उस चश्म ओ लब की कुछ कहो जिस के बग़ैर गुलसिताँ की बात रंगीं है न मयख़ाने का नाम, फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमएँ जलीं फिर तसव्वुर ने लिया उस बज़्म में जाने का नाम, दिलबरी ठहरा ज़बान ए ख़ल्क़ खुलवाने का नाम अब नहीं लेते परीरू ज़ुल्फ़ बिखराने का नाम, अब किसी लैला को भी इक़रार ए महबूबी नहीं इन दिनों बदनाम है हर एक दीवाने का नाम, मोहतसिब की ख़ैर ऊँचा है उसी के फ़ैज़ - [मेरे ही लहू पर गुज़र औक़ात करो हो](https://bazmeshayari.com/mere-hi-lahoo-par/): मेरे ही लहू पर गुज़र औक़ात करो हो मुझ से ही अमीरों की तरह बात करो हो, दिन एक सितम एक सितम रात करो हो वो दोस्त हो दुश्मन को भी तुम मात करो हो, हम ख़ाकनशीं तुम सुख़न आरा ए सर ए बाम पास आ के मिलो दूर से क्या बात करो हो, हमको जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है हम और भुला दें तुम्हें क्या बात करो हो, यूँ तो कभी मुँह फेर के देखो भी नहीं हो जब वक़्त पड़े है तो मुदारात करो हो, दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़ - [मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा](https://bazmeshayari.com/mere-junoon-ka-natija/): मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा, गिरा दिया है तो साहिल पे इंतिज़ार न कर अगर वो डूब गया है तो दूर निकलेगा, उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़ हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा, यक़ीं न आए तो एक बात पूछ कर देखो जो हँस रहा है वो ज़ख़्मों से चूर निकलेगा, उस आस्तीन से अश्कों को पोछने वाले उस आस्तीन से ख़ंजर ज़रूर निकलेगा..!! ~अमीर क़ज़लबाश - [हसीं चेहरों से सूरत आश्नाई होती रहती है](https://bazmeshayari.com/hasin-chehron-se-soorat/): हसीं चेहरों से सूरत आश्नाई होती रहती है समझ लो इब्तिदाई कारवाई होती रहती है, हमारी बीवी और महँगाई दोनों हैं सगी बहनें हमारी जेब की अक्सर सफ़ाई होती रहती है, कहा मैंने कि मिलते हो बिछड़ जाने की नियत से कहा उस ने मोहब्बत में जुदाई होती रहती है, कहा मैं ने मेरी दरख़्वास्तों का क्या बना आख़िर कहा उस ने कि उन पर कारवाई होती रहती है, कहा लड़के की अम्मी ने रहेगी ख़ुश सदा बेटी कि ऊपर से भी लड़के की कमाई होती रहती है, तेरे पंद ओ नसाएह का नतीजा सिफ़्र है नासेह बुराई होती रहती - [इश्क़ का नास करोगी मुझे मालूम न था](https://bazmeshayari.com/ishq-ka-naas-karogi/): इश्क़ का नास करोगी मुझे मालूम न था मेरे पल्ले ही पड़ोगी मुझे मालूम न था, एक महीने में कमाता हूँ जो तनख़्वाह उसे ख़र्च हफ़्ते में करोगी मुझे मालूम न था, मैं ने खाई थी क़सम खाऊँगा बस रिज़्क़ ए हलाल तुम भी अहमक़ ही कहोगी मुझे मालूम न था, शेर की तरह सदा अर्ज़ करूँगा ख़ुद को तुम सदा हुक्म ही दोगी मुझे मालूम न था, जो सुनाओगी सुनूँगा मैं हमेशा लेकिन शेर तक तुम न सुनोगी मुझे मालूम न था, ज़िंदगी ही में मुझे देखना होगा ये दिन मुझ को मरहूम लिखोगी मुझे मालूम न था सारी - [हो मोमिनों को हमेशा ही पयाम ए ईद मुबारक](https://bazmeshayari.com/ho-momino-ko-hamesha/): हो मोमिनों को हमेशा ही पयाम ए ईद मुबारक गगन के पार से आया है सलाम ए ईद मुबारक, कभी भी आये न गुलशन पे मेरे गम का कोई पल खुदा करे यूँ ही रहे चलता निज़ाम ए ईद मुबारक, इबादतों में रहें रात दिन यूँ ही सदा मशरूफ़ हो मुसलमानों को ये एहतिमाम ए ईद मुबारक, अफ़क पे जैसे ही आया नज़र हिलाल का ये चाँद ज़माने में हो गया हर्फ़ ए आम ईद मुबारक, यूँ ही सजे रहें पलकों पे ख़्वाब आप के हरदम चराग खुशियों के जलाती रहें बनाम ए ईद मुबारक, हर बार ही अपनी दुआओं - [हम वो बुझदिल नहीं जो यलगार से डर जाएँगे](https://bazmeshayari.com/hum-wo-bujhdil-nahin/): हम वो बुझदिल नहीं जो यलगार से डर जाएँगे तुम ने ये समझा कि हम तलवार से डर जाएँगे, तुम जैसे कायरो को यूँ चुटकियों में मसल दें तुम ने क्या समझा कि एक वार से डर जाएँगे ? हम ने ख़ुद अपने लहू से ही तो सींचा है वतन तुम ने समझा कि हम हथियार से डर जाएँगे, हर ज़ुल्म ओ सितम का हिसाब लिख रखा है तुम ने समझा कि हम दुत्कार से डर जाएँगे, टूटेगी ख़ामोशी तो तलवारें भी चुप हो जाएँगी तुम ने समझा कि हम फटकार से डर जाएँगे, छुप कर वार करने वालों बंद - [सियासत मुफ़ादात में खो गई है](https://bazmeshayari.com/siyasat-mufadaat-me-kho/): सियासत मुफ़ादात में खो गई है हुकुमत न जाने कहाँ सो गई है ? आवामी मसायेल इन्हें तब दिखे हैं कि जब उनकी मुद्दत ख़त्म हो गई है, नये हुक्मराँ आ के ये बोलते हैं बुरी थी हुकुमत बहुत जो गई है, वो बैरूनी इम्दाद का तो बताएँ कहाँ से थी आई किधर को गई है ? म’ईशत भी अब्तर ज़रायत भी अब्तर मुसीबत नरी हर तरफ़ हो गई है, यहाँ जो भी पार्टी क़यादत में आई बहती गंगा वो फिर नहा धो गई है, दुआ है ये अहसन कि हो जाये बेहतर हमारी जो हालत तबाह हो गई है..!! - [मुझ से बेहतर तो मिल गया है तुम्हें](https://bazmeshayari.com/mujhse-behtar-to-mil/): मुझ से बेहतर तो मिल गया है तुम्हें और अल्लह से क्या गिला है तुम्हें, हम इकट्ठे नहीं रहेंगे कभी मेरे बच्चों का तो पता है तुम्हें, मैं तुम्हें देख भी नहीं सकता देखना भी तो मसअला है तुम्हें, यानी तुम इतनी ख़ूबसूरत हो छोटा बच्चा भी देखता है तुम्हें, मैं तुम्हारा अगर बता भी दूँ लोग पूछेंगे और क्या है तुम्हें, जो किसी को कभी नहीं होता कितनी आसानी से हुआ है तुम्हें..!! ~मुज़दम ख़ान - [दुनिया को शानदार का मतलब नहीं पता](https://bazmeshayari.com/duniya-ko-shandar-ka/): दुनिया को शानदार का मतलब नहीं पता मतलब हमारे यार का मतलब नहीं पता, मैं ने कहा तलाश करूँगा कहाँ तुम्हें उस ने कहा क़तार का मतलब नहीं पता, वो वक़्त पर मिले न मिले फ़ाएदे में हूँ वो यूँ कि इंतिज़ार का मतलब नहीं पता, अल्लह करे तुम आँखें दिखाओ कभी उसे जिस शख़्स को ख़ुमार का मतलब नहीं पता, बेबाक आदमी हूँ मगर हूँ तो आदमी शर्म आ रही है प्यार का मतलब नहीं पता..!! ~मुज़दम ख़ान - [किस को रौशन बना रहे हो तुम](https://bazmeshayari.com/kis-ko-raushan-bana/): किस को रौशन बना रहे हो तुम इतना जो बुझते जा रहे हो तुम लोग पागल बनाए जा चुके हैं अब नया क्या बना रहे हो तुम गाँव की झाड़ियाँ बता रही हैं शहर में गुल खिला रहे हो तुम एक तो हम उदास हैं उस पर शाइरों को बुला रहे हो तुम और किस ने तुम्हें नहीं देखा और किस के ख़ुदा रहे हो तुम फूल किस ने क़ुबूल करने हैं जब तलक मुस्कुरा रहे हो तुम..!! ~मुज़दम ख़ान - [अभी तो ज़िंदा हैं कहते हो यारा क्या होगा](https://bazmeshayari.com/abhi-to-zinda-hai/): अभी तो ज़िंदा हैं कहते हो यारा क्या होगा हमारे बाद न जाने तुम्हारा क्या होगा हमारा ख़ुद पे गुज़ारा नहीं है मुद्दत से हमारे साथ किसी का गुज़ारा क्या होगा वो मेरे साथ ग़रीबी में भी बहुत ख़ुश है शब ए सियाह जब आई सितारा क्या होगा ये देखने के लिए क्यों न एक दिन मर जाएँ हमारे साथ उसी दिन दोबारा क्या होगा वो जिस के निस्फ़ ने पागल किया है दुनिया को मैं सोचता हूँ हक़ीक़त में सारा क्या होगा हमारे नक़्श ए क़दम से क़दम मिलाओ मगर हमारा कुछ न बना तो तुम्हारा क्या होगा ज़बान - [होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी](https://bazmeshayari.com/hoti-hai-tere-naam/): होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी बरहम हुई है यूँ भी तबीअत कभी कभी, ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़ ए इज़्तिराब मिलती है ज़िंदगी में ये राहत कभी कभी, तेरे करम से ऐ अलम ए हुस्न आफ़रीं दिल बन गया है दोस्त की ख़ल्वत कभी कभी, जोश ए जुनूँ में दर्द की तुग़्यानियों के साथ अश्कों में ढल गई तेरी सूरत कभी कभी, तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमइन न था गुज़री है मुझ पे ये भी क़यामत कभी कभी, कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था यूँ भी गुज़र गई शब ए फ़ुर्क़त कभी - [वो दिलनवाज़ है लेकिन नज़रशनास नहीं](https://bazmeshayari.com/wo-dilnawaz-hai-lekin/): वो दिलनवाज़ है लेकिन नज़रशनास नहीं मेरा इलाज मेरे चारागर के पास नहीं, तड़प रहे हैं ज़बाँ पर कई सवाल मगर मेरे लिए कोई शायान ए इल्तिमास नहीं, तेरे जिलौ में भी दिल काँप काँप उठता है मेरे मिज़ाज को आसूदगी भी रास नहीं, कभी कभी जो तेरे क़ुर्ब में गुज़ारे थे अब उन दिनों का तसव्वुर भी मेरे पास नहीं, गुज़र रहे हैं अजब मरहलों से दीदा ओ दिल सहर की आस तो है ज़िंदगी की आस नहीं, मुझे ये डर है तेरी आरज़ू न मिट जाए बहुत दिनों से तबीअत मेरी उदास नहीं..!! ~नासिर काज़मी - [कुछ यादगार ए शहर ए सितमगर ही ले चलें](https://bazmeshayari.com/kuch-yaadgaare-shahare-sitamgar/): कुछ यादगार ए शहर ए सितमगर ही ले चलें आए हैं उस की गली में तो पत्थर ही ले चलें, यूँ किस तरह कटेगा कड़ी धूप का सफ़र ? सर पर ख़याल ए यार की चादर ही ले चलें, रंज ए सफ़र की कोई निशानी तो पास हो थोड़ी सी ख़ाक ए कूचा ए दिलबर ही ले चलें, ये कह के छेड़ती है हमें दिल गिरफ़्तगी घबरा गए हैं आप तो बाहर ही ले चलें, इस शहर ए बे चराग़ में जाएगी तू कहाँ आ ऐ शब ए फ़िराक़ तुझे घर ही ले चलें..!! ~नासिर काज़मी   - [झूठ का बोलना आसान नहीं होता है](https://bazmeshayari.com/jhuth-ka-bolna-aasaan/): झूठ का बोलना आसान नहीं होता है दिल तेरे बाद परेशान नहीं होता है, सब तेरे बाद यही पूछते रहते हैं मुझे अब किसी बात पे हैरान नहीं होता है, कैसे तुम भूल गए हो मुझे आसानी से ? इश्क़ में कुछ भी तो आसान नहीं होता है, हिज्र का ज़ाइक़ा लीजिये ज़रा धीरे धीरे सब की थाली में ये पकवान नहीं होता है, कोई किरदार मज़ा देता नहीं है उस का जिस कहानी का तू उन्वान नहीं होता है, होने को क्या नहीं होता है जहाँ में लेकिन तुम से मिलने का ही इम्कान नहीं होता है..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [उस ने यूँ रास्ता दिया मुझको](https://bazmeshayari.com/usne-yun-raasta-diya/): उस ने यूँ रास्ता दिया मुझको रास्ते से हटा दिया मुझको दूर करने के वास्ते ख़ुद से ख़ुद का ही वास्ता दिया मुझको मौत ही कुछ सुकून दे शायद ज़िंदगी ने थका दिया मुझको जब मेरे बाल ओ पर शिकस्ता हुए तब क़फ़स से उड़ा दिया मुझको, जिस हवा ने मुझे जलाए रखा फिर उसी ने बुझा दिया मुझको..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [उम्र भर सीने में एक दर्द दबाए रखा](https://bazmeshayari.com/umr-bhar-sine-me/): उम्र भर सीने में एक दर्द दबाए रखा एक बेनाम से रिश्ते को निभाए रखा, था मुझे वहम ओ गुमाँ कि वो फ़क़त मेरी है और उसने भी भरम मेरा बनाए रखा, आँधियाँ शर्म से हो जाएँ न पानी पानी सर यही सोच के पेड़ों ने झुकाए रखा, वैसे हर बात से रखा उसे वाक़िफ़ हम ने लेकिन अफ़्साना ए उल्फ़त को छुपाए रखा, एक रिश्ता जिसे मैं दे न सका कोई नाम एक रिश्ता जिसे ताउम्र निभाए रखा, कूज़ा-गर तुझ को बनाना ही नहीं था जब कुछ किस लिए चाक पे ता-उम्र चढ़ाए रखा..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [मैं सोज़िश ए ग़म ए दौराँ से यूँ जला ख़ामोश](https://bazmeshayari.com/main-sozish-e-gam/): मैं सोज़िश ए ग़म ए दौराँ से यूँ जला ख़ामोश कि जैसे बज़्म में जलता हो एक दिया ख़ामोश, ये और बात कि होंठों पे लफ़्ज़ बिखरे थे मगर था बोलने वालों का मुद्दआ ख़ामोश, अभी न छेड़िए ख़्वाबीदा मौसमों का मिज़ाज अभी है रात के आँचल में हर फ़ज़ा ख़ामोश, मेरी सरिश्त में ख़ामोशियों का ज़हर न घोल न रह सकेगा मिरा ज़ौक़ ए हक़नवा ख़ामोश, बदन की क़ैद में चीख़ें न घुट के मर जाएँ सिसकते कर्ब को क्यूँ तुम ने कर दिया ख़ामोश, लहकती आँख धड़कते दिलों के पास न ला गुज़र न जाए कहीं कोई हादिसा - [फ़ासला जब मुझे एहसास ए थकन बख़्शेगा](https://bazmeshayari.com/faasla-jab-mujhe-ehsas/): फ़ासला जब मुझे एहसास ए थकन बख़्शेगा पाँव को फूल भी काँटों की चुभन बख़्शेगा, कितने सूरज इसी जज़्बे से उगाए मैं ने कोई सूरज तो मेरे घर को किरन बख़्शेगा, चाहता हूँ कि कभी मुझको भी बिस्तर हो नसीब जाने किस रोज़ ख़ुदा मुझ को बदन बख़्शेगा, लोग कहते हैं कि सहरा को गुलिस्ताँ कह दो उस के बदले में वो चाँदी के समन बख़्शेगा, बेलिबासी का करें भी तो गिला किस से करें ? ज़िंदा लाशों को यहाँ कौन कफ़न बख़्शेगा ? सिर्फ़ दो चार दरख़्तों पे क़नाअ’त कैसी ? वो सखी है तो मुझे सारा चमन बख़्शेगा, - [अपनी सोचें शिकस्त ओ ख़ाम न कर](https://bazmeshayari.com/apni-sochen-shikast-o/): अपनी सोचें शिकस्त ओ ख़ाम न कर चल पड़ा है तो फिर क़याम न कर, मैं भी हस्सास दिल का मालिक हूँ सारे एहसास अपने नाम न कर, जिस्म चाहे ग़ुलाम हो जाए लेकिन ज़ेहनियत को अपनी ग़ुलाम न कर, मैं ख़ुद अपनी नज़र से गिर जाऊँ तू मेरा इतना एहतिराम न कर, तेरे पीछे ग़ुबार उड़ने लगे ख़ुद को तू इतना तेज़ गाम न कर, लोग मश्कूक हो चले आज़र अब हर एक शख़्स को सलाम न कर..!! ~मुश्ताक़ आज़र फ़रीदी - [लोग बैठे हैं यहाँ हाथों में ख़ंजर ले कर](https://bazmeshayari.com/log-baithe-hain-yahan/): लोग बैठे हैं यहाँ हाथों में ख़ंजर ले कर तुम कहाँ आ गए ये शाख़ ए गुल ए तर ले कर, भीगे भीगे से मेरे घर के दर ओ बाम मिले शायद आया था यहाँ कोई समुंदर ले कर, अब मुझे और किसी शय की तमन्ना न रही मुतमइन हूँ तेरी दहलीज़ का पत्थर ले कर, मेरी क़िस्मत में सुलगने के सिवा कुछ भी नहीं क्या करोगे भला तुम मेरा मुक़द्दर ले कर, ख़ुश्क होंठों ने मेरे जिस्म का रस चूस लिया अब कोई आए तो क्या फ़ाएदा साग़र ले कर, सीधे रस्ते कोई आता ही नहीं मेरी तरफ़ गर्दिश - [दीवाना हूँ मैं बिखरे मोती चुनता हूँ](https://bazmeshayari.com/deewana-hoon-main-bikhre/): दीवाना हूँ मैं बिखरे मोती चुनता हूँ लम्हा लम्हा जोड़ के सदियाँ बुनता हूँ, तन्हा कमरे सूना आँगन रात उदास फिर भी घर में सरगोशी सी सुनता हूँ, मुझको दीमक चाट रही है सोचों की मैं अपने अंदर ही अंदर घुनता हूँ, हँसते फूल कहाँ हैं मेरी क़िस्मत में मैं तो बस मुरझाई कलियाँ चुनता हूँ, कहने को ख़ामोश है मेरी ज़ात मगर सुनने को तो सब की बातें सुनता हूँ, आज़र एक मौहूम सी है उम्मीद अभी जिस के सहारे ख़्वाब सुनहरे बुनता हूँ..!! ~मुश्ताक़ आज़र फ़रीदी - [तेरे जहाँ से अलग एक जहान चाहता हूँ](https://bazmeshayari.com/tere-jahan-se-alag/): तेरे जहाँ से अलग एक जहान चाहता हूँ नई ज़मीन नया आसमान चाहता हूँ, बदन की क़ैद से बाहर तो जा नहीं सकता इसी हिसार में रह कर उड़ान चाहता हूँ, ख़मोश रहने पे अब दम सा घुटने लगता है मेरे ख़ुदा मैं दहन में ज़बान चाहता हूँ, कोई शजर ही सही धूप से नजात तो हो ये तुम से किस ने कहा साएबान चाहता हूँ, ये टुकड़ा टुकड़ा ज़मीनें न कर अता मुझको मैं पूरे सहन का पूरा मकान चाहता हूँ, फिर एक बार मेरी अहमियत को लौटा दे तेरी निगाह को फिर मेहरबान चाहता हूँ, मेरी तलब कोई - [अपने ही भाई को हमसाया बनाते क्यूँ हो](https://bazmeshayari.com/apne-hi-bhai-ko/): अपने ही भाई को हमसाया बनाते क्यूँ हो अपने सहन के बीच में दीवार लगाते क्यूँ हो ? एक न एक दिन तो उन्हें टूट कर बिखरना ही है ख़्वाब फिर ख़्वाब हैं, ख़्वाबों को सजाते क्यूँ हो ? कौन सुनता है यहाँ ? कौन है सुनने वाला ? ये समझते हो तो फिर आवाज़ उठाते क्यूँ हो ? ख़ुद को भूले हुए गुज़रे हैं ज़माने यारो अब मुझे तुम मेरा एहसास दिलाते क्यूँ हो ? अपने चेहरों पे जो ख़ुद आप ही पत्थर फेंकें ऐसे लोगों को तुम आईना दिखाते क्यूँ हो ? अपनी तो तक़दीर है तूफ़ानों से - [कुएँ जो पानी की बिन प्यास चाह रखते हैं](https://bazmeshayari.com/kuyen-jo-paani-ki/): कुएँ जो पानी की बिन प्यास चाह रखते हैं मगर नहंग भी दरिया की थाह रखते हैं, शहादत अपनी गवाही पे अब भी है शाहिद शहीद वो हैं जो हक़ को गवाह रखते हैं, ये जान लीजिए पहचान दोनों की है यही जो ताज राजा तो कश्कोल शाह रखते हैं, वो ख़ाक धूल चटाएँगे अपने दुश्मन को जो दिल न क़ल्ब ए अमीर ए सिपाह रखते हैं, हैं दंग अपनी ही दहशत के डर से दहशतगर्द ये काले नाग हैं दिल भी सियाह रखते हैं, जो लोग अच्छे हैं रखते हैं ठीक घर को वही ख़राब लोग तो घर को - [जब भी बैठता हूँ लिखने](https://bazmeshayari.com/jab-bhi-baithta-hoon/): जब भी बैठता हूँ लिखने कुछ लिखा जाता नहीं, एक उसके सिवा कोई मौज़ूअ मुझे याद आता नहीं, बगैर जिसके मुमकिन ही न था ये मेरा वज़ूद, बाद उसके क्या होगा सोच कर जीया जाता नहीं, माँ की अज़मत लिख सकूँ वो हुनर मुझे आता नहीं, उसके ममता का खज़ाना तो पन्नो में समाता नहीं..!! - [दूसरा फ़ैसला नहीं होता](https://bazmeshayari.com/dusra-faisla-nahi-hota/): दूसरा फ़ैसला नहीं होता इश्क़ में मशवरा नहीं होता, ख़ुद ही सौ रास्ते निकलते हैं जब कोई रास्ता नहीं होता, जब तलक रूबरू न हो कोई आइना आइना नहीं होता, अपना समझा तो कह दिया वर्ना ग़ैर से तो गिला नहीं होता, कुछ न कुछ पहले खोना पड़ता है मुफ़्त में तजरबा नहीं होता..!! ~नवाज़ देवबंदी - [वो बेवफ़ा है उसे बेवफ़ा कहूँ कैसे](https://bazmeshayari.com/wo-bewafa-hai-use/): वो बेवफ़ा है उसे बेवफ़ा कहूँ कैसे बुरा ज़रूर है लेकिन बुरा कहूँ कैसे ? जो कश्तियों को डुबोता है ला के साहिल पर तुम्ही बताओ उसे नाख़ुदा कहूँ कैसे ? ये और बात बुरे को बुरा नहीं कहता बुरा बुरा है बुरे को भला कहूँ कैसे ? वो मेरी साँसों में दिल में नज़र में ग़ज़लों में मैं अपने आप से इस को जुदा कहूँ कैसे ? जो तुझ से कहना है दुनिया से वो छुपाना है अगर ग़ज़ल न कहूँ तो बता कहूँ कैसे ? हवा की शह पे जलाता है घर ग़रीबों के नवाज़ ऐसे दिए को - [चश्म ए तर है सहाब है क्या है](https://bazmeshayari.com/chashme-tar-hai-sahaab/): चश्म ए तर है सहाब है क्या है अश्क गौहर है आब है क्या है ? मरना जीना जनाब है क्या है हरनफ़स इंक़लाब है किया है ? ज़हर फैला फ़ज़ा में नफ़रत का ये सियासत का बाब है क्या है ? जाम ए दुनिया को मुँह लगा कर देख ज़हर है या शराब है क्या है ? सिंफ़ ए नाज़ुक ये तब्सिरा कीजिए ख़ार है या गुलाब है क्या है ? हम से आलम की पूछ असलियत ये हक़ीक़त है ख़्वाब है क्या है ? कौन जान अदाओं में उसकी बचपना है शबाब है क्या है ? वो वक़ार - [ये किस ने कहा तुम कूच करो](https://bazmeshayari.com/ye-kis-ne-kaha/): ये किस ने कहा तुम कूच करो बातें न बनाओ इंशा जी ये शहर तुम्हारा अपना है इसे छोड़ न जाओ इंशा जी, जितने भी यहाँ के बासी हैं सब के सब तुमसे प्यार करें क्या उन से भी मुँह फेरोगे ये ज़ुल्म न ढाओ इंशा जी, क्या सोच के तुम ने सींची थी ये केसर क्यारी चाहत की तुम जिनको हँसाने आए थे उनको न रुलाओ इंशा जी, तुम लाख सियाहत के हो धनी एक बात हमारी भी मानो कोई जा के जहाँ से आता नहीं उस देस न जाओ इंशा जी, बिखराते हो सोना हर्फ़ों का तुम चाँदी - [खो गया है जो उस को खोने दो](https://bazmeshayari.com/kho-gaya-hai-jo/): खो गया है जो उस को खोने दो फिर नया ख़्वाब मुझ को बोने दो, सुनों ऐ बस्तियों को उजाड़ने वालो अब मदारी का खेल होने दो, ख़्वाहिशों ख़्वाब देखना छोड़ो अब नींद आई है मुझको सोने दो, रौशनाई न ख़त्म हो जाए काग़ज़ों को सियाह होने दो, हर घड़ी ये ख़याल आता है ज़िंदगी के हैं सिर्फ़ कोने दो, झूठ बुनियाद ही नहीं रखता रूबरू सच से सब को होने दो, आँसुओं से धुली ज़मीनों पर अब ज़रा धूप को भी रोने दो, चाँद क्यों जागता है साथ मेरे रात के बज रहे हैं पौने दो..!! ~चाँदनी पांडे   - [नई पोशाक पहने है पुराने ख़्वाब की हसरत](https://bazmeshayari.com/nayi-poshak-pahne-hai/): नई पोशाक पहने है पुराने ख़्वाब की हसरत मैं हँस कर टाल देती हूँ दिल ए बेताब की हसरत, मोहब्बत और क्या है एक सराब ए तिश्नगी तो है वही सहरा की चमचम में चमकते आब की हसरत, नया किरदार गढ़ कर मैं कहानी ही बदल देती मगर पूरी न हो पाई नए एक बाब की हसरत, तुम्हारी याद का गहरा तअल्लुक़ आँसुओं से है मेरी पलकों को क्या होगी किसी सैलाब की हसरत, बस इतना सोच कर इस ओर कश्ती मोड़ दी मैंने निकल जाए न क्यों कर इस दफ़ा गिर्दाब की हसरत, ज़मीं पे थक के गिर जाऊँ - [वो काश मान लेता कभी हमसफ़र मुझे](https://bazmeshayari.com/wo-kash-maan-leta/): वो काश मान लेता कभी हमसफ़र मुझे तो रास्तो के पेच का होता न डर मुझे, बेशक ये आइना मुझे जी भर सँवार दे पर देखती नहीं है अब उसकी नज़र मुझे, दीवार जो गिरी है तो इल्ज़ाम किस को दूँ ? मेरी ख़ुशी ही लाई थी साजन के घर मुझे, मायूसियों ने शक्ल की रंगत बिगाड़ दी पहचानता नहीं है मेरा ही नगर मुझे, आई थी इस तरफ़ तो क्यूँ मुझसे मिली नहीं अब के बहार लग रही है मुख़्तसर मुझे, मैं चाँदनी हूँ नूर है मुझ से जहान में दिखला रहा है कौन अँधेरे का डर मुझ..?? ~चाँदनी - [ये मोहब्बत जो मोहब्बत से कमाई हुई है](https://bazmeshayari.com/ye-mohabbat-jo-mohabbat/): ये मोहब्बत जो मोहब्बत से कमाई हुई है आग सीने में उसी ने तो लगाई हुई है, एक वही फूल मयस्सर न हुआ दामन को जिसकी ख़ुशबू मेरी रग रग में समाई हुई है, जब भी आँखों ने सजाए है तुम्हारे सपने ज़ेहन और दिल में बहुत देर लड़ाई हुई है, दिल की चौखट पे जला रखे है आँखों ने चराग़ किस की आमद की अभी आस लगाई हुई है ? उसकी यादो से मुनव्वर है मेरे दिल का जहाँ आँसूओं से मेरी आँखों की सफ़ाई हुई है, ऐ मोहब्बत तेरे चेहरे पे उदासी क्यूँ है ? जैसे एक तू - [कभी इस से कभी उस से मिला देता है](https://bazmeshayari.com/kabhi-isse-kabhi-usse/): कभी इस से कभी उस से मिला देता है मे’यार अपना क्यूँ नज़रों से गिरा देता है ? दिल न तोड़ेगा मेरा अब कभी भी वायदा कर के फिर ख़ुद ही भूला देता है, जलाता है मुहब्बत की शमअ मेरे दिल में हवा दे कर कभी ख़ुद ही बुझा देता है, हँसाता है अपनी बातों से लुभाते हुए मेरा दिल फिर न जाने क्यूँ पल भर में रुला देता है ? - [वो कौन है जो मुझ पे तअस्सुफ़ नहीं करता](https://bazmeshayari.com/wo-kaun-hai-jo/): वो कौन है जो मुझ पे तअस्सुफ़ नहीं करता पर मेरा जिगर देख कि मैं उफ़्फ़ नहीं करता, क्या क़हर है वक़्फ़ा है अभी आने में उसके और दम मेरा जाने में तवक़्क़ुफ़ नहीं करता, कुछ और गुमाँ दिल में न गुज़रे तेरे काफ़िर दम इस लिए मैं सूरा ए यूसुफ़ नहीं करता, पढ़ता नहीं ख़त ग़ैर मेरा वाँ किसी उनवाँ जबतक कि वो मज़मूँ में तसर्रुफ़ नहीं करता, दिल फ़क़्र की दौलत से मेरा इतना ग़नी है दुनिया के ज़र ओ माल पे मैं तुफ़ नहीं करता, तासाफ़ करे दिल न मय ए साफ़ से सूफ़ी कुछ सूद ओ - [मरज़ ए इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे](https://bazmeshayari.com/maraj-e-ishq-jise/): मरज़ ए इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे न दवा याद रहे और न दुआ याद रहे, तुम जिसे याद करो फिर उसे क्या याद रहे न ख़ुदाई की हो परवा न ख़ुदा याद रहे, लोटते सैकड़ों नख़चीर हैं क्या याद रहे चीर दो सीने में दिल को कि पता याद रहे, रात का वादा है बंदे से अगर बंदानवाज़ बंद में दे लो गिरह ता कि ज़रा याद रहे, क़ासिद ए आशिक़ ए सौदाज़दा क्या लाए जवाब जब न मालूम हो घर और न पता याद रहे, देख भी लेना हमें राह में और क्यूँ साहब हम से - [अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे](https://bazmeshayari.com/ab-to-ghabra-ke/): अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे ? तुम ने ठहराई अगर ग़ैर के घर जाने की तो इरादे यहाँ कुछ और ठहर जाएँगे, ख़ाली ऐ चारागरो होंगे बहुत मरहमदाँ पर मेरे ज़ख़्म नहीं ऐसे कि भर जाएँगे, पहुँचेंगे रहगुज़र ए यार तलक क्यूँ कर हम पहले जब तक न दो आलम से गुज़र जाएँगे, शोला ए आह को बिजली की तरह चमकाऊँ पर मुझे डर है कि वो देख के डर जाएँगे, हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो - [कभी नज़रे मिला के कभी झुका के लूटा](https://bazmeshayari.com/kabhi-nazaren-mila-ke/): कभी नज़रे मिला के कभी झुका के लूटा कभी हँस के तो कभी मुस्कुरा के लूटा, मौज ए तबस्सुम में डूबता गया मैं कभी गुफ्तगू की कभी शरमा के लूटा, कभी कर के इंकार कभी इक़रार से सोए हुए अरमानो को जगा जगा के लूटा, मस्ती ए अब्सार में है वो नशा वल्लाह कभी अपना के तो कभी ठुकरा के लूटा, आपके लूटने की वो बारिकियाँ वल्लाह कभी नक़ाब गिरा के कभी उठा के लूटा..!! - [धूप सरों पर और दामन में साया है](https://bazmeshayari.com/dhoop-saro-par-aur/): धूप सरों पर और दामन में साया है सुन तो सही जो पेड़ो ने फ़रमाया है, कैसे कह दूँ बीच अपने दीवार है जब छोड़ने कोई दरवाज़े तक आया है, उससे आगे जाओगे तब ही जान पाओगे मंज़िल तक तो रास्ता ही तुमको लाया है, बादल बन कर चाहे कितना ऊँचा हो पानी आख़िर मिट्टी का ही सरमाया है, आख़िर ये नाक़ाम मुहब्बत काम आई तुझको खो कर ही मैंने ख़ुद को पाया है, मुहब्बत को अपनाना कोई खेल नहीं अपने ही हाथो से अपना हाथ छुड़ाया है..!! - [बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते](https://bazmeshayari.com/bair-duniya-se-kabile/): बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते एक सच के लिए किस किस से बुराई लेते, आबले अपने ही अँगारों के ताज़ा हैं अभी लोग क्यूँ आग हथेली पे पराई लेते, बर्फ़ की तरह दिसम्बर का सफ़र होता है हम उसे साथ न लेते तो रज़ाई लेते, कितना मानूस सा हमदर्दों का ये दर्द रहा इश्क़ कुछ रोग नहीं था जो दवाई लेते, चाँद रातों में हमें डसता है दिन में सूरज शर्म आती है अँधेरों से कमाई लेते, तुम ने जो तोड़ दिए ख़्वाब हम उनके बदले कोई क़ीमत कभी लेते तो ख़ुदाई लेते..!! ~राहत इंदौरी - [ये बात फिर मुझे सूरज बताने आया है](https://bazmeshayari.com/ye-baat-fir-mujhe/): ये बात फिर मुझे सूरज बताने आया है अज़ल से मेरे तआ’क़ुब में मेरा साया है, बुलंद होती चली जा रही हैं दीवारें असीर ए दर है वो जिसने मुझे बुलाया है, मैं ला ज़वाल था मिट मिट के फिर उभरता रहा गँवा गँवा के मुझे ज़िंदगी ने पाया है, वो जिस के नैन हैं गहरे समुंदरों जैसे वो अपनी ज़ात में मुझको डुबोने आया है, मिली है उसको भी शोहरत क़तील मेरी तरह जब उस ने अपने लबों पर मुझे सजाया है..!! ~क़तील शिफ़ाई - [तेरा हाथ हाथ में हो अगर](https://bazmeshayari.com/tera-hath-hath-me/): तेरा हाथ, हाथ में हो अगर तो सफर ही असल ए हयात है, मेरे हर कदम पे हैं मंज़िलें तेरा प्यार गर मेरे साथ है, मेरी बात का मेरी हमनफस तू जवाब दे कि न दे मुझे, तेरी एक चुप में जो है छुपी वो हज़ार बातों की बात है, मेरी ज़िंदगी का हर एक पल एक तुम्हीं से तो है वाबस्ता, तेरे होंठ थिरके तो सुबह है तेरी जुल्फ बिखरे तो रात है..!! - [जाने कब किस के छलकने से हो दुनिया ग़र्क़ ए आब](https://bazmeshayari.com/jaane-kab-kis-ke/): जाने कब किस के छलकने से हो दुनिया ग़र्क़ ए आब मेरी मुट्ठी में है दरिया साग़र ओ जोश ए शबाब, दीदा ओ दिल का पियाला भी गँवा आए मज़ीद दीदा ए ख़म्मार की ख़्वाहिश में हम ख़ाना ख़राब, रक़्स ए वहशत के लिए कोई तो महवर चाहिए पाँव बेज़ंजीर हैं और ख़ेमा बेचोब ओ तनाब, अब से इन जंग ओ जदल में दानापानी के सिवा साथ में तब्ल ओ अलम हो और ताऊस ओ रबाब, मेरी बातों में भी राज़ ए आगही आ ही गया जैसे रम्ज़ ए रू ए जानाँ जैसे असरार ए किताब..!! ~अश्क अलमास - [ठीक है कि ये जहाँ मुद्दत से उर्यानी पे था](https://bazmeshayari.com/thik-hai-ki-ye/): ठीक है कि ये जहाँ मुद्दत से उर्यानी पे था पर किसे यूँ नाज़ कल तक चाक दामानी पे था, तीरगी ए आब ओ गिल ने ध्यान तोड़ा यकबयक वर्ना कल शब चाँद अपनी पूरी ताबानी पे था, डूब कर ऐसे तख़य्युल में खुला वो माहरू गाहे गाहे एक शिकन उस ख़ंदा पेशानी पे था, सब ज़ुहूर ए इब्न ए मरियम की दुआ करते रहे ध्यान उन सब का मगर तख़्त ए सुलैमानी पे था, हम हुजूम ए दहर में होते हैं ऐसे आजकल जैसे यूसुफ़ भाइयों में चाह ए कनआनी पे था..!! ~अश्क अलमास   - [दिल मेरा रक़्साँ है जब से अक़्ल इस शोरिश में है](https://bazmeshayari.com/dil-mers-raksan-hai/): दिल मेरा रक़्साँ है जब से अक़्ल इस शोरिश में है लर्ज़िश ए पा आसमाँ या ये जहाँ लर्ज़िश में है, आज से पहले ज़मीं की चाल तो ऐसी न थी तुम ज़रा रफ़्तार देखो किस क़दर गर्दिश में है, ठीक है तुझको मिला है मुझको भटकाने का काम ये मगर क्या तू तो हर दम दावत ए लग़्ज़िश में है, किस क़दर फिर एक हो जावें ज़मीन ओ आसमाँ हम ज़मीन ओ आसमाँ वाले इसी साज़िश में हैं, मुंतज़िर हैं तिश्नालब ये कौसर ओ तसनीम का एक ज़ंजीर ए कशिश भी साक़ी ए महवश में है..!! ~अश्क अलमास - [जाने क्यूँ बर्बाद होना चाहता है](https://bazmeshayari.com/jaane-kyun-barbad-hona/): जाने क्यूँ बर्बाद होना चाहता है सूरत ए फ़रहाद होना चाहता है, ज़ेहन से आख़िर में अब थक हार कर मेरा दिल आबाद होना चाहता है, आसमाँ वाले ये सुन कर हँस पड़े आदमी आज़ाद होना चाहता है, हर जगह तामीर कर के एक इरम हर कोई शद्दाद होना चाहता है, सानेहा ये है कि एक बुलबुल का दिल दामन ए सय्याद होना चाहता है, हो के मुंसिफ़ तख़्त पे अब जल्वा-गर वाक़िफ़ ए रूदाद होना चाहता है..!! ~अश्क अलमास - [मैं न कहता था कि शहरों में न जा यार मेरे](https://bazmeshayari.com/main-na-kahta-tha/): मैं न कहता था कि शहरों में न जा यार मेरे सोंधी मिट्टी ही में होती है वफ़ा यार मेरे, कोई टूटे हुए ख़्वाबों से कहाँ मिलता है हर जगह दर्द का बिस्तर न लगा यार मेरे, सिलसिला फिर से जुड़ा है तो जुड़ा रहने दे दिल के रिश्तों को तमाशा न बना यार मेरे, अपनी चाहत के शब ओ रोज़ मुकम्मल कर ले जा ये सूरज भी तेरे नाम किया यार मेरे, तुझ से मिलता हूँ तो रिश्ता कोई याद आता है सिलसिला मुझ से ज़ियादा न बढ़ा यार मेरे, ऐसा लगता है कि कुछ टूट रहा है मुझ - [आधुनिक युग में विकसित साहित्यिक विधा](https://bazmeshayari.com/adhunik-yug-ki-kavita/): आधुनिक युग की कविता 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ से विकसित हुई साहित्यिक विधा है। यह काल अक्सर औद्योगिक क्रांति, विश्व युद्धों और वैश्वीकरण के प्रभावों के संदर्भ में समझा जाता है। आधुनिक युग की कविता का उद्भव उस समय हुआ जब समाज, संस्कृति और साहित्य में बड़े परिवर्तन हो रहे थे। यह कविता परंपरागत शैली और विषयों से हटकर नए और प्रयोगात्मक तरीकों की ओर उन्मुख हुई। यहाँ आधुनिक युग की कविता के कुछ प्रमुख तत्व और प्रवृत्तियाँ दी गई हैं: 1. स्वतंत्रता और प्रयोग आधुनिक युग की कविता ने परंपरागत छंदों और शैली से - [रीति काव्य विधा व इसकी विशेषताएँ](https://bazmeshayari.com/riti-kavy-madhyakalin-kaal/): रीति काव्य मध्यकालीन काल के दौरान उभरी हिन्दी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है, जो लगभग 16वीं से 18वीं सदी के बीच अस्तित्व में आई। “रीति” का अर्थ है “आचरण” या “व्यवहार” और “काव्य” का अर्थ है “कविता”। इसलिए, रीति काव्य का अर्थ है “आचरण की कविता”। इस विधा को अलंकार (काव्य अलंकरण) और रस (सौंदर्य का स्वाद) के सिद्धांतों पर जोर देने वाली रीति स्कूल की कविता के साथ जोड़ा जाता है। रीति काव्य के कुछ प्रमुख तत्व हैं: 1. सौंदर्य और अलंकार शैली रीति काव्य अपने अत्यधिक अलंकारिक और परिष्कृत भाषा के लिए जाना जाता है। यह कविता - [भक्ति कविताएँ और इसकी विशेषताएँ](https://bazmeshayari.com/bhakti-poetries-and-its/): भक्ति कविता भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली विधा है जो मध्यकालीन काल में उभरी, आठवीं से अठारहवीं सदी के बीच। इसे भक्ति आंदोलन से जोड़ा जाता है, जिसमें कठोर रीतियों और जातिगत भेदभाव से दूर होकर व्यक्तिगत रूप से ईश्वर से जुड़ने पर जोर दिया गया। भक्ति का अर्थ है प्रेम और भक्ति, और यह कविता इसी व्यक्तिगत प्रेम और ईश्वर की भक्ति को अभिव्यक्त करती है। यहाँ भक्ति कविता के कुछ प्रमुख तत्व हैं: 1. भक्तिपूर्ण विषय भक्ति कविता व्यक्तिगत ईश्वर के प्रति भक्ति पर केंद्रित होती है, अक्सर कवि की ईश्वर से मिलन की तड़प को - [हिंदी कविता और ग़ज़लें](https://bazmeshayari.com/hindi-kavita-aur-gazals/): हिंदी कविता और ग़ज़लें हिंदी कविता और ग़ज़लें भारत की समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग हैं। सुंदर श्लोकों और गहन विषयों के माध्यम से, यह मानवीय भावनाओं और अनुभवों के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी श्रोताओं के दिलों में अपनी जगह बनाए रखती हैं। इतिहासिक विकास हिंदी कविता का इतिहास प्राचीन ग्रंथों जैसे वेदों और उपनिषदों में पाया जा सकता है, जिनमें भारतीय उपमहाद्वीप में काव्यात्मक अभिव्यक्ति के कुछ शुरुआती उदाहरण हैं। समय के साथ, हिंदी कविता विभिन्न अवधियों से गुजरी, प्रत्येक काल में अलग-अलग शैलियों और विषयों की विशेषता थी। भक्ति आंदोलन: - [दर्द ख़ामोश रहा टूटती आवाज़ रही](https://bazmeshayari.com/dard-khamosh-raha-tutati/): दर्द ख़ामोश रहा टूटती आवाज़ रही मेरी हर शाम तेरी याद की हमराज़ रही, शहर में जब भी चले ठंडी हवा के झोंके तपते सहरा की तबीअत बड़ी ना साज़ रही, आइने टूट गए अक्स की सच्चाई पर और सच्चाई हमेशा की तरह राज़ रही, एक नए मोड़ पे उसने भी मुझे छोड़ दिया जिसकी आवाज़ में शामिल मेरी आवाज़ रही, सुनता रहता हूँ बुज़ुर्गों से मैं अक्सर ताहिर वो समाअत ही रही और न वो आवाज़ रही..!! ~ताहिर फ़राज़ - [मेरे लबों पे उसी आदमी की प्यास न हो](https://bazmeshayari.com/mere-labo-pe-usi/): मेरे लबों पे उसी आदमी की प्यास न हो जो चाहता है मेरे सामने गिलास न हो, ये तिश्नगी तो मिली है हमें विरासत में हमारे वास्ते दरिया कोई उदास न हो, तमाम दिन के दुखों का हिसाब करना है मैं चाहता हूँ कोई मेरे आस पास न हो, मुझे भी दुख है ख़ता हो गया निशाना तेरा कमान खींच मैं हाज़िर हूँ तू उदास न हो, ग़ज़ल ही रह गई ताहिर फ़राज़ अपने लिए जहाँ में कोई ऐसा भी बे असास न हो..!! ~ताहिर फ़राज़ - [जब मेरे होंठों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी](https://bazmeshayari.com/jab-mere-honthon-pe/): जब मेरे होंठों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी तेरी आँखों में भी थोड़ी सी नमी रह जाएगी, सरफिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी, ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी, क्या ख़बर थी आएगा एक रोज़ ऐसा वक़्त भी मेरी गोयाई तेरा मुँह देखती रह जाएगी, वक़्त ए रुख़्सत आएगा और ख़त्म होगा ये सफ़र मेरे दिल की बात मेरे दिल में ही रह जाएगी..!! ~ताहिर फ़राज़ - [जो शजर बे लिबास रहते हैं](https://bazmeshayari.com/jo-shajar-be-libas/): जो शजर बे लिबास रहते हैं उन के साए उदास रहते हैं, चंद लम्हात की ख़ुशी के लिए लोग बरसों उदास रहते हैं, इत्तिफ़ाक़न जो हँस लिए थे कभी इंतिक़ामन उदास रहते हैं, मेरी पलकें हैं और अश्क तेरे पेड़ दरिया के पास रहते हैं, उन के बारे में भी सोचिए ज़रा जो मुसलसल उदास रहते हैं..!! ~ताहिर फ़राज़ - [ग़म इसका कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया](https://bazmeshayari.com/gam-iska-kuch-nahi/): ग़म इसका कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया ग़म ये है कि क़ातिलों में तेरा नाम आ गया, जुगनू जले बुझे मेरी पलकों पे सुब्ह तक जब भी तेरा ख़याल सर ए शाम आ गया, महसूस कर रहा हूँ मैं ख़ुशबू की बाज़गश्त शायद तेरे लबों पे मेरा नाम आ गया, कुछ दोस्तों ने पूछा बताओ ग़ज़ल है क्या ? बे साख़्ता ही लबों पे तेरा नाम आ गया, मैंने तो एक लाश की दी थी ख़बर फ़राज़ उल्टा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया..!! ~ताहिर फ़राज़ - [हमारी वजह ए ज़वाल क्या है ? सवाल ये है](https://bazmeshayari.com/hamari-wajah-e-jawal/): हमारी वजह ए ज़वाल क्या है ? सवाल ये है हराम क्या है, हलाल क्या है ? सवाल ये है, तुम्हारे ताज़ों के हीरे मोती तुम्हें हो मुबारक़ मगर रियाया का हाल क्या है ? सवाल ये है, इधर उधर की मिसाल देने से क्या हासिल अपनी करतूत पे मलाल क्या है ? सवाल ये है, बहुत से मिसरा नवीस, गज़लें बना रहे हैं मगर सुख़न में कमाल क्या है ? सवाल ये है, जवाब ये है सफ़ेदपोश जो उच्चक्के हैं यहाँ वही कह रहे हैं, और निकाल माल क्या है ? - [बुग्ज़ ए इस्लाम में पड़े पड़े ही](https://bazmeshayari.com/bugz-e-islam-me/): बुग्ज़ ए इस्लाम में पड़े पड़े ही यहाँ कितनो के क़िरदार गिरे है, सभी मुन्सफ़ गिरे, मनसब गिरे और ना जाने कितने सालार गिरे है, सियासत ए दरबाँ के इशारों पर अदलिया के ऊँचें मीनार गिरे है, जिन्हें न था वास्ता दैर ओ हरम से ऐसे भी मज़हब के ठेकेदार गिरे है.!! फितना ओ ज़ुल्म ए बातिल से अब कौम ए मुजाहिद नहीं डरने वाले, हिफ्ज़ ए मरातिब पर है जाँ निसार मगर हम ईमान नहीं बदलने वाले, नार ए जहन्नुम में खाक़ हो जाएँगे ये आज के तवारीख़ बदलने वाले..!! - [कितनी मोहब्बतों से पहला सबक़ पढ़ाया](https://bazmeshayari.com/kitni-mohabbaton-se-pahla/): कितनी मोहब्बतों से पहला सबक़ पढ़ाया मैं कुछ न जानता था सब कुछ मुझे सिखाया, अनपढ़ था और जाहिल क़ाबिल मुझे बनाया दुनिया ए इल्म ओ दानिश का रास्ता दिखाया, ऐ दोस्तो मिलें तो बस एक पयाम कहना उस्ताद ए मोहतरम को मेरा सलाम कहना, मुझ को ख़बर नहीं थी आया हूँ मैं कहाँ से ? माँ बाप इस ज़मीं पर लाए थे आसमाँ से, पहुँचा दिया फ़लक तक उस्ताद ने यहाँ से वाक़िफ़ न था ज़रा भी इतने बड़े जहाँ से, मुझ को दिलाया कितना अच्छा मक़ाम कहना उस्ताद ए मोहतरम को मेरा सलाम कहना, जीने का फ़न सिखाया - [नेक बच्चे दिल से करते हैं अदब उस्ताद का](https://bazmeshayari.com/nek-bachche-dil-se/): नेक बच्चे दिल से करते हैं अदब उस्ताद का बाप की उल्फ़त से बेहतर है ग़ज़ब उस्ताद का, आम लोगों की जहालत दूर करने के लिए हक़ तआ’ला ने बनाया है सबब उस्ताद का, उस की बरकत से जहाँ में फैलती हैं नेकियाँ क्यों न फिर उस्ताद से राज़ी हो रब उस्ताद का, कुछ न कुछ उम्दा सबक़ देती है उसकी ज़िंदगी ख़ुल्क़ से ख़ाली नहीं है कोई ढब उस्ताद का, जिस घड़ी नादान बच्चों को सिखाता है वो इल्म चूम लेते हैं फ़रिश्ते आ के लब उस्ताद का, बस उसे पढ़ने पढ़ाने से हमेशा काम है कितना अच्छा मश्ग़ला - [दरियाँ का शोर मचाना और समंदर का ख़ामोश रहना](https://bazmeshayari.com/dariya-ka-shor-machana/): दरियाँ का शोर मचाना और समंदर का ख़ामोश रहना वक़्त आने पर हर एक के हुनर ए खास बदल जाते है, जब मैं ख़ामोश रहूँ तो बहस करते है मेरी परवरिस पर और मेरी चुप्पी टूटते ही उनके सवालात बदल जाते है, ये दौलत, ये हुकूमत, ये दबदबा, ये नशा, ये तक़व्वुर मुसाफिर है, वक़्त-बेवक़्त इनके घरबार बदल जाते है, ना कर तू यहाँ ऐ नादाँ किसी से भी उम्मीदें बेहिसाब मतलबी दुनियाँ में वक़्त के साथ जज़्बात बदल जाते हैं, अगर ठुकराता है तुझे कोई तो निराश मत हो ऐ इंसान गर दुआएँ कबूल न हो तो यहाँ भगवान - [दिल के लूट जाने का इज़हार ज़रूरी तो नहीं](https://bazmeshayari.com/dil-ke-loot-jaane/): दिल के लूट जाने का इज़हार ज़रूरी तो नहीं ये तमाशा सर ए बाज़ार ज़रूरी तो नहीं, मुझे था इश्क़ तेरी रूह से और अब भी है जिस्म से हो कोई सरोकार ये ज़रूरी तो नहीं, मैं तुझे टूट के चाहूं ये तो मेरी फ़ितरत है तू भी हो मेरा तलबगार ये ज़रूरी तो नहीं, ऐ सितमगर कभी तो झाँक मेरी आँखों में जुबां से ही हो प्यार का इज़हार ज़रूरी तो नहीं..!! - [हमारे सब्र के दामन को तार तार न कर](https://bazmeshayari.com/hamare-sabr-ke-daman/): हमारे सब्र के दामन को तार तार न कर निगाह ए जोक तलब इतना बे क़रार न कर, बड़े ख़ुलूस से आये हैं तेरी महफ़िल में हमारा खून ए तमन्ना ऐ पर्दादार न कर, ये एतमाद ए मुहब्बत ये ऐतबार ए वफ़ा कज़ा को देख मगर उनका इंतज़ार न कर, कफ़स में ताने बहारों के दे न ऐ सय्याद सितमज़दा पे सितम ऐ सितम सितम शि’आर न कर, चमन को तर्क किए मुद्दतें हुई आदिल हमारे सामने अब क़िस्सा ए बहार न कर..!!   - [मेरी मुहब्बत मेरे जज़्बात सिर्फ़ तुम से हैं](https://bazmeshayari.com/meri-mohabbat-mere-jazbat/): मेरी मुहब्बत मेरे जज़्बात सिर्फ़ तुम से हैं मेरे हमदम मेरी क़ायनात सिर्फ तुम से हैं, गैर महरम से पूछने का हक़ नहीं रखता मेरे सवालात मेरे जवाबात सिर्फ़ तुम से हैं, तुम को मालुम नहीं मेरी तन्हाई का दुःख मेरी हर फिक्र मेरे ख्यालात सिर्फ़ तुम से हैं, तुम सामने हो तो मुक़द्दर पे हुकुमत अपनी मेरे हर रिश्ते की सौगात फक़त तुम से है, गर कभी बिखर जाऊँ तो समेट लेना मुझ को है मुक़म्मल जो ये मेरी ज़ात सिर्फ़ तुम से है..!! - [फ़लक का हर सितारा रात की आँखों का मोती है](https://bazmeshayari.com/falak-ka-har-sitara/): फ़लक का हर सितारा रात की आँखों का मोती है जिसे शबनम सहर की शोख़ किरनों में पिरोती है, वही मस्ती मेरी धड़कन है मेरे दिल की जोती है जो तेरी नीलगूँ आँखों में गहरी नींद सोती है, ज़मीन ए दर्द में चाहत वफ़ा के बीज बोती है तो क्या क्या जावेदाँ लम्हात की तख़्लीक़ होती है, तड़पती है मेरे सीने में ऐसे आरज़ू तेरी कोई जोगन घने जंगल में जैसे छुप के रोती है, ये मेरी सोच हर ज़र्रे में सूरज की तमन्नाई ये दिल की रौशनी को लम्हे लम्हे में समोती है, गए वक़्तों की पहनाई छलक जाती - [सब जल गया जलते हुए ख़्वाबों के असर से](https://bazmeshayari.com/sab-jal-gaya-jalte/): सब जल गया जलते हुए ख़्वाबों के असर से उठता है धुआँ दिल से निगाहों से जिगर से, आज उस के जनाज़े में है एक शहर सफ़ आरा कल मर गया जो आदमी तन्हाई के डर से, कब तक गए रिश्तों से निभाता मैं तअ’ल्लुक़ इस बोझ को ऐ दोस्त उतार आया हूँ सर से, जो आइना ख़ाना मेरी हैरत का सबब है मुमकिन है मेरे बाद मेरी दीद को तरसे, इस अहद ए ख़िज़ाँ में किसी उम्मीद के मानिंद पत्थर से निकल आऊँ मगर अब्र तो बरसे, रूठे हुए सूरज को मनाने की लगन में हम लोग सर ए - [बेख़बर दुनिया को रहने दो ख़बर करते हो क्यूँ](https://bazmeshayari.com/bekhabar-duniya-ko-rahne/): बेख़बर दुनिया को रहने दो ख़बर करते हो क्यूँ दोस्तो मेरे दुखों को मुश्तहर करते हो क्यूँ ? कोई दरवाज़ा न खोलेगा सदा ए दर्द पर बस्तियों में शोरأओ ग़ुल शाम ओ सहर करते हो क्यूँ ? मुझ से ग़ुर्बत मोल ले कर कौन घर ले जाएगा तुम मुझे रुस्वा सर ए बाज़ार ए ज़र करते हो क्यूँ ? आँख के अँधों को क्यूँ दिखलाते हो परवाज़ ए हर्फ़ काग़ज़ों पे अब तमाशा ए हुनर करते हो क्यूँ ? तज़्किरा लिखते हो क्या मेरी शिकस्त ओ रेख़्त का लफ़्ज़ की बस्ती में मअ’नी को खंडर करते हो क्यूँ ? दोस्तो! - [नहीं बदलता यहाँ कुछ भी आरज़ू से फ़क़त](https://bazmeshayari.com/nahi-badalta-yahan-kuchh/): नहीं बदलता यहाँ कुछ भी आरज़ू से फ़क़त नहीं बदलता यहाँ कुछ भी जुस्तजू से फ़क़त, मुझे यक़ीन है हमारा जहाँ बदलेगा ज़मीन बदलेगी और आसमान बदलेगा, ये ख़ार बदलेंगे ये खारज़ार बदलेगा सियासतों का भी कारोबार बदलेगा, खबासतों का ये सारा ज़माना बदलेगा फ़रेब ओ मकर का ये कारख़ाना बदलेगा, ख़बीस लोगो का तर्ज़ ए कलाम तो देखो ज़लील लोगो का तर्ज़ ए खराम तो देखो, गुरूर ओ किब्र का सारा ख़ुमार उतरेगा मुनाफिकत का ये सारा गुबार उतरेगा, सुराही बदलेगी मीना ओ जाम बदलेगा नज़र ये आता है सारे गुलाम बदलेंगे, ये साक़ी बदलेगी ये इंतज़ाम बदलेगा मुझे - [कभी फूलों कभी खारों से बचना](https://bazmeshayari.com/kabhi-foolo-kabhi-khaaro/): कभी फूलों कभी खारों से बचना कभी रक़ीब कभी यारों से बचना, जान बुझ कर धोखा न खा लेना राख़ मे दबे हुए अंगारों से बचना, साहिल पे भी कश्ती डूब जाती है यकीन ना कर किनारो से बचना, मौसम तो बदलते ही रहते है यहाँ कभी ख़िज़ाँ कभी बहारों से बचना, बीच राह मे तन्हा छोड़ जाते है लोग यार तुम ऐसे दिलदारों से बचना, जो गिरगिट की तरह रंग बदले ज़िंदगी मे ऐसे किरदारों से बचना..!! - [हमारे जैसे तुम्हे ख़राबो में मिलेंगे](https://bazmeshayari.com/hamare-jaise-tumhe-kharabo/): हमारे जैसे तुम्हे ख़राबो में मिलेंगे धुल पड़ी कहीं किताबो में मिलेंगे, ज़फागर से किये वफ़ाओ में मिलेंगे ना की हुई अपनी खताओ में मिलेंगे, दोस्तों ! हम जैसे खाना ख़राब यहाँ हर टूटती शय की सदाओं में मिलेंगे, जब शाखों से बिछड़ेगा फूल कोई तो उनकी सिसकती आहों में मिलेंगे, जिन्हें आ जाती है रास फ़कीरी नवाब वो लोग तो ख़ुदा की पनाहों में मिलेंगे..!! - [ये किसका कर रहा है इंतज़ार आदमी](https://bazmeshayari.com/ye-kiska-kar-raha/): ये किसका कर रहा है इंतज़ार आदमी जब ख़ुद ही ला सकता है बहार आदमी, मिलता नहीं मुफ़्त में कुछ भी यहाँ पर फिर भी चाहता है चमत्कार आदमी, दो पल के लिए ही तो जन्नत की चाह नहीं फिर क्यूँ करता है बलात्कार आदमी, सुना है इंसानों की बस्ती है यहां पर फिर क्यूँ रखता है हाथों में हथियार आदमी ? जलता रहे आशियाँ किसी का, हमें क्या जब चिंगारी हो अपने घर की तब होता है शर्मशार आदमी, लूट जाती है उसके भरोसे की दुनिया अक्सर फिर भी खाता है धोखा बार-बार आदमी, सम्भलते नहीं इससे अपने ख़ुद - [दर्द हो या कि रंज़ ओ गम हर हाल में मुस्कुराते चलो](https://bazmeshayari.com/dard-ho-yaa-ki/): दर्द हो या कि रंज़ ओ गम हर हाल में मुस्कुराते चलो गैरों की ख़ुशी की खातिर रस्म ए दुनिया निभाते चलो, अहल ए सियासत ने इंसानियत को मौक़ूफ़ बना रखा है तुम अहल ए वतन को इंसानियत का सबक़ पढ़ाते चलो, मुक़ाबला ही क्या मुर्दा ज़मीरो से अहल ए ईमां वालो का तुम हर हाल में अहल ए ईमां बनो ईमान जगाते चलो..!! - [जला के मिशअल ए जाँ हम जुनूँ सिफ़ात चले](https://bazmeshayari.com/jala-ke-mishal-e/): जला के मिशअल ए जाँ हम जुनूँ सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले, दयार ए शाम नहीं मंज़िल ए सहर भी नहीं अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले, हमारे लब न सही वो दहान ए ज़ख़्म सही वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले, सुतून ए दार पे रखते चलो सरों के चराग़ जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले, हुआ असीर कोई हमनवा तो दूर तलक ब पास ए तर्ज़ ए नवा हम भी साथ साथ चले, बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द ए वफ़ा अगरचे लुटते - [यारो किसी क़ातिल से कभी प्यार न माँगो](https://bazmeshayari.com/yaaro-kisi-qaatil-se/): यारो किसी क़ातिल से कभी प्यार न माँगो अपने ही गले के लिए तलवार न माँगो, गिर जाओगे तुम अपने मसीहा की नज़र से मर कर भी इलाज ए दिल ए बीमार न माँगो, खुल जाएगा इस तरह निगाहों का भरम भी काँटों से कभी फूल की महकार न माँगो, सच बात पे मिलता है सदा ज़हर का प्याला जीना है तो फिर जीने का इज़हार न माँगो, उस चीज़ का क्या ज़िक्र जो मुमकिन ही नहीं है सहरा में कभी साया ए दीवार न माँगो..!! ~क़तील शिफ़ाई - [ये दौर ए ख़िरद है दौर ए जुनूँ](https://bazmeshayari.com/ye-daur-e-khirad/): ये दौर ए ख़िरद है दौर ए जुनूँ इस दौर में जीना मुश्किल है अँगूर की मय के धोके में ज़हराब का पीना मुश्किल है, जब नाख़ुन ए वहशत चलते थे रोके से किसी के रुक न सके अब चाक ए दिल ए इन्सानिय्यत सीते हैं तो सीना मुश्किल है, इक सब्र के घूँट से मिट जाती तब तिश्ना लबों की तिश्ना लबी कमज़र्फी ए दुनिया के सदक़े ये घूँट भी पीना मुश्किल है, वो शोला नहीं जो बुझ जाए आँधी के एक ही झोंके से बुझने का सलीक़ा आसाँ है जलने का क़रीना मुश्किल है, करने को रफ़ू कर - [हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो](https://bazmeshayari.com/hamko-junoon-kya/): हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुम से ज़्यादा चाक किए हैं हम ने अज़ीज़ो चार गरेबाँ तुम से ज़्यादा चाक ए जिगर मोहताज ए रफ़ू है आज तो दामन सर्फ़ ए लहू है एक मौसम था हम को रहा है शौक़ ए बहाराँ तुम से ज़्यादा, अहद ए वफ़ा यारों से निभाएँ नाज़ ए हरीफ़ाँ हँस के उठाएँ जब हमें अरमाँ तुम से सिवा था अब हैं पशेमाँ तुम से ज़्यादा, हम भी हमेशा क़त्ल हुए और तुम ने भी देखा दूर से लेकिन ये न समझना हम को हुआ है जान का नुक़साँ तुम से - [कभी ख़ुद कभी औरो को हटाते रहिए](https://bazmeshayari.com/kabhi-khud-kabhi-auron/): कभी ख़ुद कभी औरो को हटाते रहिए बस यूँ ही रास्तो को सहल बनाते रहिए, कही उठ जाइए किसी का हाथ थाम के कभी औरो को दे कर हाथ उठाते रहिए, एक दिन पानी हर हाल में ऊपर आएगा बस शिद्दत से पत्थर घड़े में गिराते रहिए, कभी न कभी जा कर निशाने पर लगेगा बिना थके कोशिशो के तीर चलाते रहिए, अपने ही नहीं बेगाने भी हो जाएँगे कायल आप बस बेलौस यूँ ही रिश्ते निभाते रहिए..!! - [यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं](https://bazmeshayari.com/yun-to-aapas-me/): यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं ? हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं, हाल ए दिल मुझ से न पूछो मेरी नज़रें देखो राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं, मिलने को यूँ तो मिला करती हैं सब से आँखें मगर दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं, ऐसे हँस हँस के न देखा करो सब की जानिब यहाँ लोग ऐसी ही अदाओं पे तो फ़िदा होते हैं..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी - [कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा](https://bazmeshayari.com/koi-hamdam-na-raha/): कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा, शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे ? जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा, ऐ नज़ारो न हँसो मिल न सकूँगा तुम से तुम मेरे हो न सके मैं भी तुम्हारा न रहा, क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँही चला जाता हूँ ? जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी - [किताब सादा रहेगी कब तक ?](https://bazmeshayari.com/kitab-saada-rahegi-kabtak/): किताब सादा रहेगी कब तक ? कभी तो आगाज़ ए बाब होगा, जिन्होंने बस्तियाँ उजाड़ी है कभी तो उनका हिसाब होगा, वो दिन गए जब कि हर सितम को अदा ए महबूब कह के चुप थे, उठी जो अब हम पे ईंट कोई तो इस का पत्थर जवाब होगा, सहर की खुशियाँ मनाने वालो सहर के तेवर बता रहे है, अभी तो इतनी घुटन बढ़ेगी कि साँस लेना आज़ाब होगा, सकूत ए सहरा में बसने वालो ज़रा रुतों का मिज़ाज समझो ! जो आज का दिन सुकूं से गुज़रा तो कल का मौसम ख़राब होगा, नहीं कि ये सिर्फ़ शायरी - [मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा](https://bazmeshayari.com/mere-jaise-ban-jaaoge/): मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा दीवारों से सर टकराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा, हर बात गवारा कर लोगे मिन्नत भी उतारा कर लोगे तावीज़ें भी बंधवाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा, तन्हाई के झूले खोलेंगे हर बात पुरानी भूलेंगे आईने से तुम घबराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा, जब सूरज भी खो जाएगा और चाँद कहीं सो जाएगा तुम भी घर देर से आओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा, बेचैनी बढ़ जाएगी और याद किसी की आएगी तुम मेरी ग़ज़लें गाअओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा..!! ~सईद राही - [दुनिया ए तसव्वुर हम आबाद नहीं करते](https://bazmeshayari.com/duniya-e-tasavvur-ham/): दुनिया ए तसव्वुर हम आबाद नहीं करते याद आते हो तुम ख़ुद ही हम याद नहीं करते, वो जौर ए मुसलसल से बाज़ आ तो गए लेकिन बेदाद ये क्या कम है बेदाद नहीं करते, साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर अफ़सोस तो करते हैं इमदाद नहीं करते, कुछ दर्द की शिद्दत है कुछ पास ए मोहब्बत है हम आह तो करते हैं फ़रियाद नहीं करते, सहरा से बहारों को ले आए चमन वाले और अपने गुलिस्ताँ को आबाद नहीं करते..!! ~फ़ना निज़ामी कानपुरी - [कौन आता है बुझाने प्यास प्यासा देख कर](https://bazmeshayari.com/kaun-aata-hai-bujhaane/): कौन आता है बुझाने प्यास प्यासा देख कर घर चले जाते है सब के सब तमाशा देख कर, बात तेरी मान ली मैंने कभी टोका ही नहीं लौट आता हूँ तुझे बस बेतहाशा देख कर, ज़िन्दगी की मुश्किलें तो ना डरा पाई मगर डर गया हूँ आज मैं ख़ुद को डरा सा देख कर, मैं बड़ा तो हो गया पर माँ मेरी बदली ही नहीं आज वो रो पड़ी मुझ को रुआँसा देख कर..!! - [वो इश्क़ जो हम से रूठ गया...](https://bazmeshayari.com/wo-ishq-jo-ham/): वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या ? कोई मेहर नहीं कोई क़हर नहीं फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या ? एक हिज्र जो हम को लाहक़ है ता देर उसे दोहराएँ क्या ? वो ज़हर जो दिल में उतार लिया फिर उस के नाज़ उठाएँ क्या ? फिर आँखें लहू से ख़ाली हैं ये शमएँ बुझने वाली हैं, हम ख़ुद भी किसी के सवाली हैं इस बात पे हम शरमाएँ क्या ? एक आग ग़म ए तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गई, जब जिस्म ही सारा जलता हो फिर दामन ए दिल - [एक हम दोनों को ये हालात नहीं कर सकते](https://bazmeshayari.com/ek-hum-dono-ko/): एक हम दोनों को ये हालात नहीं कर सकते ख़ुद को वग्फ़ ए मुज़ाफ़ात नहीं कर सकते, तेरे शहर में न रहने का ही नतीज़ा है कि चाह कर भी तुझसे मुलाक़ात नहीं कर सकते, वक़्त की धूप में जलता है मेरा दिल लेकिन अपने साये से भी खुल के बात नहीं कर सकते, रुसवाई ए ज़माना मेरे पाँव की ज़ंजीर बनी है वरना यूँ अपने प्यार को खैरात नहीं कर सकते, मेरी रातों का सहारा तो एक ख़्वाब ए सितारा है हम चाँद के साथ तो बसर रात नहीं कर सकते..!! - [लहू ने क्या तेरे ख़ंजर को दिलकशी दी है](https://bazmeshayari.com/lahoo-ne-kya-tere/): लहू ने क्या तेरे ख़ंजर को दिलकशी दी है कि हम ने ज़ख़्म भी खाए हैं दाद भी दी है, लिबास छीन लिया है बरहनगी दी है मगर मज़ाक़ तो देखो कि आँख भी दी है, हमारी बात पे किस को यक़ीन आएगा ख़िज़ाँ में हम ने बशारत बहार की दी है, धरा ही क्या था तेरे शहर ए बेज़मीर के पास मेरे शुऊर ने ख़ैरात ए आगही दी है, हयात तुझ को ख़ुदा और सर बुलंद करे तेरी बक़ा के लिए हम ने ज़िंदगी दी है, कहाँ थी पहले ये बाज़ार ए संग की रौनक़ सर ए शिकस्ता ने - [ये जो ज़िंदगी की किताब है](https://bazmeshayari.com/ye-jo-zindagi-ki/): ये जो ज़िंदगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब है, कहीं एक हसीन सा ख़्वाब है कहीं एक जान लेवा अज़ाब है, कहीं छाँव है ये कहीं ये धूप है कहीं ये और ही कोई रूप है, कई चेहरे इस में छुपे हुए एक अजीब सी ये नक़ाब है, कहीं खो दिया कहीं पा लिया कहीं रो लिया कहीं गा लिया, कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी कहीं मेहरबाँ बे हिसाब है, कहीं आँसुओं की है दास्ताँ कहीं मुस्कुराहटों का है बयाँ, कहीं बरकतों की हैं बारिशें कहीं तिश्नगी बे हिसाब है, ये जो ज़िंदगी की किताब है - [कहीं दिरहम कहीं डॉलर कहीं दीनार का झगड़ा](https://bazmeshayari.com/kahin-diraham-kahin-dollor/): कहीं दिरहम कहीं डॉलर कहीं दीनार का झगड़ा कहीं दिरहम कहीं डॉलर कहीं दीनार का झगड़ा कहीं लहँगा कहीं चोली कहीं शलवार का झगड़ा, वतन में आज कल इस ज़ात से उस ज़ात को शिकवा लगा होने कहीं इस पार से उस पार का झगड़ा, वो मस्जिद हो कि मंदिर हो अदब हो या सियासत हो वही है जंग कुर्सी की वही दस्तार का झगड़ा, ज़माने की रविश से कर लिया है सब ने समझौता कोई मअनी नहीं रखता यहाँ किरदार का झगड़ा, किसी की टाँग टूटे या किसी अहमक़ का सर फूटे अगर होने लगे होश्यार से होश्यार का - [नाम से गाँधी के चिढ़ और बैर आज़ादी से है](https://bazmeshayari.com/naam-se-gaandhi-ke-chidh/): नाम से गाँधी के चिढ़ और बैर आज़ादी से है नाम से गाँधी के चिढ़ और बैर आज़ादी से है नफ़रतों की खाद हैं उल्फ़त मगर खादी से है, आलिमों का इल्म से वो रब्त है इस दौर में रब्त धोबी के गधे का जिस तरह लादी से है, ख़्वाब ए ग़फ़लत से वही निस्बत है मेरी क़ौम को आशिक़ों का जो तअल्लुक़ दिल की बर्बादी से है, जैसे सय्यादों को सय्यादी से रहती है ग़रज़ काम उस्तादों को वैसे अपनी उस्तादी से है, बाप दादा के ही नुस्ख़े में है अपनी भी शिफ़ा हम को देरीना तअल्लुक़ ख़ाना दामादी - [कभी ख़ामोश बैठोगे, कभी कुछ गुनगुनाओगे](https://bazmeshayari.com/kabhi-khamosh-baithoge-kabhi/): कभी ख़ामोश बैठोगे, कभी कुछ गुनगुनाओगे कभी ख़ामोश बैठोगे, कभी कुछ गुनगुनाओगे मैं उतना ही याद आऊँगा मुझे जितना भुलाओगे, कोई जब पूछ बैठेगा ख़ामोशी का सबब तुम से बहुत समझाना चाहोगे मगर समझा न पाओगे, कभी दुनियाँ मुक़म्मल बन के आएगी निगाहों में कभी मेरी कमी दुनियाँ की हर शय में पाओगे, कहीं पर भी रहें हम और तुम मुहब्बत फिर मुहब्बत है तुम्हें हम याद आएँगे हमें तुम याद आओगे..!!   और क्या करता बयान ए गम तुम्हारे सामने - [और क्या करता बयान ए गम तुम्हारे सामने](https://bazmeshayari.com/aur-kya-karta-bayan/): और क्या करता बयान ए गम तुम्हारे सामने मेरी आँखें हो गई पुरनम तुम्हारे सामने, हम जुदाई में तुम्हारी मर भी सकते हैं मगर चाहते ये हैं कि निकले दम तुम्हारे सामने, जिसमें हम दोनों के बचपन की भी एक तस्वीर है ढूँढ कर लाया हूँ वो एल्बम तुम्हारे सामने, आते आते लब पे रह जाती हैं दिल की हसरतें खोलते हैं हम जुबां कम कम तुम्हारे सामने, तुम समन्दर की तरह आग़ोश वा करते नहीं हम तो बन जाते हैं मौज ए यम तुम्हारे सामने, किस लिए तुम नींद में शरमा रहे हो इस तरह ख़्वाब में क्या आ - [तलाश ए जन्नत ओ दोज़ख में रायेगाँ इंसाँ](https://bazmeshayari.com/talash-e-zannat-o/): तलाश ए जन्नत ओ दोज़ख में रायेगाँ इंसाँ तलाश ए जन्नत ओ दोज़ख में रायेगाँ इंसाँ ज़मीं पे रोज़ मनाता है कायनात का दुःख, तमाम दिन की मुसीबत तो बाँट ली हम ने कभी कहा नहीं अपनी अपनी रात का दुःख, गए दिनों का कोई ख्वाब दफ़न है शायद अब भी आँख से रिसता है बाकियात का दुःख, न जाने मालिक ए कुन किस तरह निभाता है ? ये दस्तरस की सहुलात ये मुम्किनात का दुःख..!! - [जब भी हँसी की गर्द में चेहरा छुपा लिया](https://bazmeshayari.com/jab-bhi-hansi-ki/): जब भी हँसी की गर्द में चेहरा छुपा लिया   जब भी हँसी की गर्द में चेहरा छुपा लिया बे लौस दोस्ती का बड़ा ही मज़ा लिया, एक लम्हा ए सुकूँ तो मिला था नसीब से लेकिन किसी शरीर सदी ने चुरा लिया, काँटे से भी निचोड़ ली ग़ैरों ने बू ए गुल यारों ने बू ए गुल से भी काँटा बना लिया, असलम बड़े वक़ार से डिग्री वसूल की और इस के बाद शहर में ख़्वांचा लगा लिया..!! ~असलम कोलसरी   कौन है नेक ? कौन बद है यहाँ ? - [कौन है नेक ? कौन बद है यहाँ ?](https://bazmeshayari.com/kaun-hai-nek/): कौन है नेक ? कौन बद है यहाँ ? किसी के हाथों में ये सनद है कहाँ ? खुलते जा रहे हैं कायनात के भेद जो अज़ल है वही अबद हैं यहाँ, जो नज़र आये वो हकीक़त है जो कहा जाए वो मुस्तनद है यहाँ, कितनी मुद्दत से देखता आया हूँ मैं एक तमाशा ए खाल ओ खद है यहाँ, जो किसी तौर जल नहीं पाए उन चिरागों की भी कोई हद है यहाँ..!!   बुरी है कीजिए नफ़रत निहायत - [बुरी है कीजिए नफ़रत निहायत](https://bazmeshayari.com/buri-hai-kijiye-nafarat/): बुरी है कीजिए नफ़रत निहायत बुरी है कीजिए नफ़रत निहायत मिटाए दिल से सदियों की अदावत चलो हम एक हो जाएँ, वो क्या दिन थे जब हम दो जिस्म एक जाँ होते थे किस ने घोल दी हम में सियासत चलो हम एक हो जाए, मुहब्बत की जमीं पे बीज बोया किसने नफ़रत का न हो फिर से अमानत में खयानत चलो हम एक हो जाएँ, वो बाबर था कि औरंगजेब सारे बन के रह गए हिकायत चलो हम एक हो जाएँ, अगर मैं परेशान हूँ तो तुम भी तो परेशान हो करे तो किस से करे शिकायत चलो हम - [दिल में जगह दूँ तुम को अपने पहले से हैं मेहमान बहुत](https://bazmeshayari.com/dil-me-jagah-doon/): दिल में जगह दूँ तुम को अपने पहले से हैं मेहमान बहुत तुम देखो कोई और ठिकाना हो जाओगे परेशान बहुत, उस को भुलाने की कोशिश मैं जितनी करता हूँ यारो उसकी याद के सीने में मेंरे चुभते हैं पैकान बहुत, कौन जिए अब जाँ को जला कर रहने दो मर जाते हैं इश्क़ में मर जाना ही हम को लगता है आसान बहुत, उससे मिला तो देखा मैं ने था ख़ुद से बेगाना वो उससे मिलने का था मुझ को जाने क्यों अरमान बहुत, तेरे दिल को अपनी यादों से रखा आबाद मगर कर बैठे हम अपने दिल को - [चलो तुम को मिलाता हूँ मैं उस मेहमान से पहले](https://bazmeshayari.com/chalo-tum-ko-milata/): चलो तुम को मिलाता हूँ मैं उस मेहमान से पहले जो मेरे जिस्म में रहता था मेरी जान से पहले, मुझे जी भर के अपनी मौत को तो देख लेने दो निकल जाए न मेरी जान, मेरे अरमान से पहले, कोई ख़ामोश हो जाए तो उसकी ख़ामोशी से डर समन्दर चुप ही रहता है, किसी तूफ़ान से पहले, मेरी आँखों में आबी मोतियों का सिलसिला देखो ये माला रोज़ जपता हूँ मैं, एक मुस्कान से पहले, पुराना यार हूँ तेरा तो मेरा ये फ़र्ज़ बनता है तुझे होशियार कर दूँ मैं तेरे नुक़सान से पहले..!! - [बाहर नहीं तो ख़ुद ही के अंदर तलाश कर](https://bazmeshayari.com/bahar-nahi-to-khud/): बाहर नहीं तो ख़ुद ही के अंदर तलाश कर सहरा है जिस जगह पे समुंदर तलाश कर, मुमकिन है ये कि मेरी रग ए जाँ को काट दे ईसार ओ आशिक़ी का तू ख़ंजर तलाश कर, हम सच कहेंगे सच के सिवा कुछ नहीं मियाँ तू अपने जैसे झूठे सितमगर तलाश कर, जो ग़म का मुस्कुरा के उड़ाए मज़ाक़ वो मिल जाएगा वो ख़ुद में क़लंदर तलाश कर, जब तक है जान जान में मरने का डर भी है जो डर निकाल दे वो पयम्बर तलाश कर, अंदाज़ अपना होता है सब के बयान का इरशाद जैसा अच्छा सुख़नवर तलाश - [एक ग़म ही तो यार है अपना](https://bazmeshayari.com/ek-gam-hi-to/): एक ग़म ही तो यार है अपना दिल जो उन पर निसार है अपना, हम तो कब के ही मर गए यारो किस को अब इंतिज़ार है अपना, मेरे ज़ख़्मों को जो कुरेदता है बस वही एक यार है अपना, सारी दुनिया तुम्हारी रख लो तुम सिर्फ़ परवरदिगार है अपना, हम ने रखा है जीने के क़ाबिल ज़िंदगी पर उधार है अपना, तेरे जाने के बाद दिल अब तो एक उजड़ा दयार है अपना, होश मंदों में तुम रहे यारो अहल ए दिल में शुमार है अपना, मर भी जाऊँ तो उन को क्या मतलब एक तरफ़ा ही प्यार है - [हिज्र की शब नाला ए दिल वो सदा देने लगे](https://bazmeshayari.com/hizr-ki-shab-naala/): हिज्र की शब नाला ए दिल वो सदा देने लगे सुनने वाले रात कटने की दुआ देने लगे, आइए हाल ए दिल ए मजरूह सुनिए देखिए क्या कहा ज़ख़्मों ने क्यूँ टाँके सदा देने लगे, किस नज़र से आप ने देखा दिल ए मजरूह को ज़ख़्म जो कुछ भर चले थे फिर हवा देने लगे, सुनने वाले रो दिए सुन कर मरीज़ ए ग़म का हाल देखने वाले तरस खा कर दुआ देने लगे, जुज़ ज़मीन ए कू ए जानाँ कुछ नहीं पेश ए निगाह जिस का दरवाज़ा नज़र आया सदा देने लगे, बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को - [रो रहा था मैं भरी बरसात थी](https://bazmeshayari.com/ro-raha-tha-main/): रो रहा था मैं भरी बरसात थी हाल क्या खुलता अँधेरी रात थी, मेरे नालों से है बरहम बाग़बाँ ये ख़फ़ा होने की कोई बात थी, दिन नहीं देखा सिवा ए शाम ए हिज्र ज़िंदगी भर में यही एक रात थी, नाला ओ आह ओ फ़ुग़ाँ से बढ़ गई वर्ना उल्फ़त एक ज़रा सी बात थी, हश्र तक लाया जहाँ से दर्द ए दिल किस को देता क्या कोई सौग़ात थी, बंद कीं आँखें कि देखूँ ख़्वाब ए सुब्ह खोल कर जब आँख देखा रात थी, ऐ सबा ग़ुंचों ने हँस कर क्या कहा उन का क़िस्सा था कि मेरी - [कहाँ तक जफ़ा हुस्न वालों की सहते](https://bazmeshayari.com/kahan-tak-zafa-husn/): कहाँ तक जफ़ा हुस्न वालों की सहते जवानी जो रहती तो फिर हम न रहते, लहू था तमन्ना का आँसू नहीं थे बहाए न जाते तो हरगिज़ न बहते, वफ़ा भी न होता तो अच्छा था वअदा घड़ी दो घड़ी तो कभी शाद रहते, हुजूम ए तमन्ना से घुटते थे दिल में जो मैं रोकता भी तो नाले न रहते, मैं जागूँगा कब तक वो सोएँ गे ताकै कभी चीख़ उठ्ठूँगा ग़म सहते सहते, बताते हैं आँसू कि अब दिल नहीं है जो पानी न होता तो दरिया न बहते, ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था हमीं सो गए - [फूलों का कुंज ए दिलकश भारत में एक बनाएँ](https://bazmeshayari.com/phoolon-ka-kunj-e/): फूलों का कुंज ए दिलकश भारत में एक बनाएँ हुब्ब ए वतन के पौधे इस में नए लगाएँ, फूलों में जिस चमन के हो बू ए जाँ निसारी हुब्ब ए वतन की क़लमें हम इस चमन से लाएँ, ख़ून ए जिगर से सींचें हर नख़्ल ए आरज़ू को अश्कों से बेल बूटों की आबरू बढ़ाएँ, एक एक गुल में फूंकें रूह ए शमीम ए वहदत एक एक कली को दिल के दामन से दें हवाएँ, फ़िरदौस का नमूना अपना हो कुंज ए दिलकश सारे जहाँ की जिस में हों जल्वागर फ़ज़ाएँ, छाया हो अब्र ए रहमत काशाना ए चमन में - [मेंरी सदा है गुल ए शम् ए शाम ए आज़ादी](https://bazmeshayari.com/meri-sada-hai-gul/): मेंरी सदा है गुल ए शम् ए शाम ए आज़ादी सुना रहा हूँ दिलों को पयाम ए आज़ादी, लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है उछल रहा है ज़माने में नाम ए आज़ादी, मुझे बक़ा की ज़रूरत नहीं कि फ़ानी हूँ मेंरी फ़ना से है पैदा दवाम ए आज़ादी, जो राज करते हैं जम्हूरियत के पर्दे में उन्हें भी है सर ओ सौदा ए ख़ाम ए आज़ादी, बनाएँगे नई दुनिया किसान और मज़दूर यही सजाएँगे दीवान ए आम ए आज़ादी, फ़ज़ा में जलते दिलों से धुआँ सा उठता है अरे ये सुब्ह ए ग़ुलामी ये शाम ए आज़ादी, ये - [नाक़ूस से ग़रज़ है न मतलब अज़ाँ से है](https://bazmeshayari.com/naqoos-se-garaz-hai/): नाक़ूस से ग़रज़ है न मतलब अज़ाँ से है मुझ को अगर है इश्क़ तो हिन्दोस्ताँ से है तहज़ीब ए हिन्द का नहीं चश्मा अगर अज़ल ये मौज ए रंग रंग फिर आई कहाँ से है ज़र्रे में गर तड़प है तो इस अर्ज़ ए पाक से सूरज में रौशनी है तो इस आसमाँ से है है इस के दम से गर्मी ए हंगामा ए जहाँ मग़रिब की सारी रौनक़ इसी एक दुकाँ से है..!! ~ज़फ़र अली ख़ाँ - [यही जगह थी यही दिन था और यही लम्हात](https://bazmeshayari.com/yahi-jagah-thi-yahi/): यही जगह थी यही दिन था और यही लम्हात सरों पे छाई थी सदियों से एक जो काली रात इसी जगह इसी दिन तो मिली थी उसको मात, इसी जगह इसी दिन तो हुआ था ये एलान अँधेरे हार गए ज़िंदाबाद हिन्दोस्तान, यहीं तो हम ने कहा था ये कर दिखाना है जो ज़ख़्म तन पे है भारत के उसको भरना है जो दाग़ माथे पे भारत के है मिटाना है, यहीं तो खाई थी हम सब ने ये क़सम उस दिन यहीं से निकले थे अपने सफ़र पे हम उस दिन, यहीं था गूँज उठा वन्दे मातरम उस दिन - [ये हिन्दोस्ताँ है हमारा वतन](https://bazmeshayari.com/ye-hindustan-hai-hamara/): ये हिन्दोस्ताँ है हमारा वतन मोहब्बत की आँखों का तारा वतन, हमारा वतन दिल से प्यारा वतन वो इस के दरख़्तों के तय्यारियाँ, वो फल फूल पौधे वो फुलवारियाँ हमारा वतन दिल से प्यारा वतन, हवा में दरख़्तों का वो झूमना वो पत्तों का फूलों का मुँह चूमना, हमारा वतन दिल से प्यारा वतन वो सावन में काली घटा की बहार, वो बरसात की हल्की हल्की फुवार हमारा वतन दिल से प्यारा वतन, वो बाग़ों में कोयल वो जंगल के मोर वो गंगा की लहरें वो जमुना का ज़ोर, हमारा वतन दिल से प्यारा वतन इसी से है इस ज़िंदगी - [किसी के नाम रुत्बा और न ख़द्द ओ ख़ाल से मतलब](https://bazmeshayari.com/kisi-ke-naam-rutba/): किसी के नाम रुत्बा और न ख़द्द ओ ख़ाल से मतलब किरामन कातिबीं को ख़ल्क़ के आमाल से मतलब, ये बस साँसों की लय पर नाम उस का जपते रहते हैं फ़क़ीरों को नहीं होता मियाँ सुर ताल से मतलब, मयस्सर आईं उन को ज़िंदगी की सारी सौग़ातें जिन्हें है इस जहाँ में शौकत ओ इक़बाल से मतलब, अगर इस दौर में उठना है तो उठ जाने दे मौला किसी मोमिन को क्यों हो फ़ित्ना ए दज्जाल से मतलब, वगर्ना कौन रंगीनी के पीछे भागे दुनिया की है जब तक ज़िंदगी तब तक है इस जंजाल से मतलब, हम अपनी - [सहर जब मुस्कुराई तब कहीं तारों को नींद आई](https://bazmeshayari.com/sahar-jab-muskuraai-tab/): सहर जब मुस्कुराई तब कहीं तारों को नींद आई बहुत मुश्किल से कल शब दर्द के मारों को नींद आई, सुना है शाम से ही ताक में बैठे हैं सब गुलचीं क़यामत गुल पे आएगी अगर ख़ारों को नींद आई, हमेशा ज़ेहन ओ दिल में कुछ न कुछ चलता ही रहता है हुए जो फ़िक्र से ख़ाली तो फ़नकारों को नींद आई, अज़ल से पूरी शिद्दत से ख़लाओं में मुअल्लक़ हैं कभी तुम ने सुना है ये कि सय्यारों को नींद आई, मुसलसल नाज़ बरदारी से आजिज़ आ चुका था मैं चलो अच्छा हुआ कमबख़्त आज़ारों को नींद आई, ये - [न तो उस्लूब न अंदाज़ गिराँ गुज़रा है](https://bazmeshayari.com/naa-to-usloob-na/): न तो उस्लूब न अंदाज़ गिराँ गुज़रा है उस पे मेरा फ़न ए परवाज़ गिराँ गुज़रा है, ये अलग बात नतीजा जो निकलता लेकिन इतना मायूसकुन आग़ाज़ गिराँ गुज़रा है, एक न एक रोज़ तो खुलनी ही थी सच्चाई मगर फ़ाश अचानक जो हुआ राज़ गिराँ गुज़रा है, जिन में जुरअत नहीं उड़ने की उन्हीं को मेरा होना यूँ माइल ए परवाज़ गिराँ गुज़रा है, आते जाते तेरा पैहम यूँ लगाना चोटें दिल पे मेरे ऐ दग़ाबाज़ गिराँ गुज़रा है..!! ~शमशाद शाद - [बेबसी से हाथ अपने मलने वाले हम नहीं](https://bazmeshayari.com/bebasi-se-haath-apne/): बेबसी से हाथ अपने मलने वाले हम नहीं मेहरबानी पर किसी की पलने वाले हम नहीं, रहगुज़र अपनी जुदा है फ़ल्सफ़ा अपना अलग जा तेरे नक़्श ए क़दम पर चलने वाले हम नहीं, एक बस दिल का किया है जान ए जाँ तुझ से सवाल दिल लिए बिन तेरे दर से टलने वाले हम नहीं, हम कि सूरज की तरह बुज़दिल नहीं ऐ ज़ुल्मतो तीरगी ए शब से डर कर ढलने वाले हम नहीं, मक्र का उंसुर हमारी ख़ू में पाओगे न तुम मीठी बातों से किसी को छलने वाले हम नहीं, तेरी मर्ज़ी से ही फलती फूलती है ज़िंदगी - [चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम ए हक़ सुनाया](https://bazmeshayari.com/chisti-ne-jis-zamin/): चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम ए हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया, तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त ए अरब छुड़ाया, मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था, सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था, तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है, टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से फिर ताब दे के - [वो हर मक़ाम से पहले वो हर मक़ाम के बाद](https://bazmeshayari.com/wo-har-muqam-se/): वो हर मक़ाम से पहले वो हर मक़ाम के बाद सहर थी शाम से पहले सहर है शाम के बाद, हर इंक़िलाब मुबारक हर इंक़िलाब अज़ाब शिकस्त ए जाम से पहले शिकस्त ए जाम के बाद, मुझी पे इतनी तवज्जोह मुझी से इतना गुरेज़ मेंरे सलाम से पहले मेंरे सलाम के बाद, चराग़ ए बज़्म ए सितम हैं हमारा हाल न पूछ जले थे शाम से पहले बुझे हैं शाम के बाद, ये रात कुछ भी नहीं थी ये रात सब कुछ है तुलू ए जाम से पहले तुलू ए जाम के बाद, वही ज़बाँ वही बातें मगर है कितना - [हादसे ज़ीस्त की तौक़ीर बढ़ा देते हैं](https://bazmeshayari.com/haadse-zist-ki-tauqeer/): हादसे ज़ीस्त की तौक़ीर बढ़ा देते हैं ऐ ग़म ए यार तुझे हम तो दुआ देते हैं, तेरे इख़्लास के अफ़्सूँ तेरे वादों के तिलिस्म टूट जाते हैं तो कुछ और मज़ा देते हैं, कू ए महबूब से चुपचाप गुज़रने वाले अरसा ए ज़ीस्त में एक हश्र उठा देते हैं, हाँ यही ख़ाक बसर सोख़्ता सामाँ ऐ दोस्त तेरे क़दमों में सितारों को झुका देते हैं, सीना चाकान ए मोहब्बत को ख़बर है कि नहीं शहर ए ख़ूबाँ के दर ओ बाम सदा देते हैं, हम ने उसके लब ओ रुख़्सार को छू कर देखा हौसले आग को गुलज़ार बना - [होंठों पे हँसी आँख में तारों की लड़ी है](https://bazmeshayari.com/honthon-pe-hanseen-aankh/): होंठों पे हँसी आँख में तारों की लड़ी है वहशत बड़े दिलचस्प दो राहे पे खड़ी है, दिल रस्म ओ रह ए शौक़ से मानूस तो हो ले तकमील ए तमन्ना के लिए उम्र पड़ी है, चाहा भी अगर हम ने तेरी बज़्म से उठना महसूस हुआ पाँव में ज़ंजीर पड़ी है, आवारा ओ रुस्वा ही सही हम मंज़िल ए शब में एक सुब्ह ए बहाराँ से मगर आँख लड़ी है, क्या नक़्श अभी देखिए होते हैं नुमायाँ हालात के चेहरे से ज़रा गर्द झड़ी है, कुछ देर किसी ज़ुल्फ़ के साए में ठहर जाएँ क़ाबिल ग़म ए दौराँ की - [ये शीशे, ये सपने, ये रिश्ते ये धागे](https://bazmeshayari.com/ye-shishe-ye-sapne/): ये शीशे, ये सपने, ये रिश्ते ये धागे किसे क्या ख़बर है कहाँ टूट जायें ? मुहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के न जाने ये किस मोड़ पर डूब जायें, अजब दिल की बस्ती अजब दिल की वादी हर एक मोड़ मौसम नई ख़्वाहिशों का लगाये हैं हम ने भी सपनों के पौधे मगर क्या भरोसा यहाँ बारिशों का, मुरादों की मंज़िल के सपनों में खोये मुहब्बत की राहों पे हम चल पड़े थे ज़रा दूर चल के जब आँखें खुली तो कड़ी धूप में हम अकेले खड़े थे, जिन्हें दिल से चाहा जिन्हें दिल से पूजा नज़र आ - [वो है बहुत हसीन और फिर उर्दू बोला करती है](https://bazmeshayari.com/wo-hai-bahut-haseen/): वो है बहुत हसीन और फिर उर्दू बोला करती है मेरे घर के सामने छत पर अक्सर टहला करती है, मेरे शेरो की दीवानी है वो ग़ज़लें पढ़ा करती है अपने माज़ी की सोचों में ठंडी आहें भरती रहती है, जवानी की उम्र है और शौक़ हैं सारे बुजुर्गो वाले अज़ब सी पागल लड़की है तारीफ़ों से डरती रहती है, मैं उसके दीदार की खातिर घंटो छत पर रहता हूँ एक किताब है मीर की वो उसको पढ़ती रहती है, दिल में उसके भी हलचल है पर कहने से डरती है पागल मेरे मिज़ाज से मुख्तलिफ़ है फिर भी अच्छी - [आसमानों से न उतरेगा सहीफ़ा कोई](https://bazmeshayari.com/aasmaan-se-na-utarega/): आसमानों से न उतरेगा सहीफ़ा कोई ऐ ज़मीं ढूँढ ले अब अपना मसीहा कोई, फिर दर ए दिल पे किसी याद ने दस्तक दी है फिर बहा कर मुझे ले जाएगा दरिया कोई, ये तो महफ़िल न हुई मक़्तल ए एहसास हुआ आइना दे के मुझे ले गया चेहरा कोई, कितने वीरान हैं यादों के दर ओ बाम न पूछ भूल कर भी इधर आया न परिंदा कोई, मैं इस आसेबज़दा शहर में किस से पूछूँ ? क्यूँ मेंरे पीछे लगा रहता है साया कोई ? माँगता है मिरे आमाल का हर रोज़ हिसाब कैफ़ जो मुझ में रहा करता - [दो जहाँ के हुस्न का अरमान आधा रह गया](https://bazmeshayari.com/do-jahan-ke-husn/): दो जहाँ के हुस्न का अरमान आधा रह गया इस सदी के शोर में इंसान आधा रह गया, हर इबादत गाह से ऊँची हैं मिल की चिमनियाँ शहर में हर शख़्स का ईमान आधा रह गया, मैं तो घबराया हुआ था ये बहुत अच्छा हुआ याद उन की आ गई तूफ़ान आधा रह गया, फूल महके रंग छलके झील पर हम तुम मिले बात है ये ख़्वाब की रूमान आधा रह गया, तुम को आना था नहीं आए कहो मैं क्या करूँ ? आसमाँ पर चाँद सा मेहमान आधा रह गया, क्यूँ है इतनी तेज़ रौ बतला मेंरी उम्र ए - [कहिए ऐसी बात जो दिल में लगा दे आग सी](https://bazmeshayari.com/kahiye-aisi-baat-jo/): कहिए ऐसी बात जो दिल में लगा दे आग सी क्या भला होगा किसी का दास्तान ए तूर से, क़ैसर ओ अस्कंदर अपनी क़द्रदानी कर गए पूछ लेते क़ीमत अपनी काश वो जम्हूर से, कैफ़ियत नज़ारे की है फ़ासले पर मुनहसिर कीजिए नज़ारा कुछ नज़दीक से कुछ दूर से, दुख़्तर ए हव्वा से जो देखा सो देखा देखिए रू पज़ीर अख़्लाक़ कैसे हों परी से हूर से ? कर सका इस्लाह ए आलम कब कोई जादानुमा जो भी तब्दीली हुई मिल्लत के नार ओ नूर से, कर गया दुनिया में बस वो इंक़लाब अंगेज़ काम मिल सकी फ़ुर्सत जिसे कुछ - [जिस ने बख़्शी है फ़ुग़ाँ उस को सुना भी न सकूँ](https://bazmeshayari.com/jis-ne-bakhshi-hai/): जिस ने बख़्शी है फ़ुग़ाँ उस को सुना भी न सकूँ कैसा नग़्मा है जिसे साज़ पे गा भी न सकूँ, दिल में एक इस के सिवा दूसरी तस्वीर नहीं उस के आईने को उस को ही दिखा भी न सकूँ, तुम अना छोड़ के आओ तो भुला दूँ हर रंज हर्फ़ क़िस्मत का नहीं हूँ कि मिटा भी न सकूँ, सोच ले अब भी तेरे हाथ है दोनों का सकूँ वर्ना मुमकिन है कभी लौट के आ भी न सकूँ, हाए पाबंदी ए बेचारगी ए अह्द ए वफ़ा ज़ख़्म उस के ही उसे गिन के बता भी न सकूँ, - [किया हम ने जो उन से कुछ ख़िताब आहिस्ता आहिस्ता](https://bazmeshayari.com/kiya-ham-ne-jo/): किया हम ने जो उन से कुछ ख़िताब आहिस्ता आहिस्ता उन्हों ने भी दिया हम को जवाब आहिस्ता आहिस्ता, तसव्वुर में वो चेहरा रफ़्ता रफ़्ता इस तरह आए कि जैसे आता है आँखों में ख़्वाब आहिस्ता आहिस्ता, बुत ए ख़ामोश को जब मैं ने छेड़ा कुछ शरारत से दिखाया उस ने भी कुछ इज़्तिराब आहिस्ता आहिस्ता, तवज्जोह जब न दी हम ने बुज़ुर्गों की नसीहत पर हुआ अपना भी फिर ख़ाना ख़राब आहिस्ता आहिस्ता, वो ज़ोर ओ जब्र से सब दिल की बातें पूछ लेते हैं मगर अपना वो देते हैं हिसाब आहिस्ता आहिस्ता, दिल ए वीरान में इस तरह - [ख़्वाबों की तरह गोया बिखर जाएँगे हम भी](https://bazmeshayari.com/khwabon-ki-tarah-goya/): ख़्वाबों की तरह गोया बिखर जाएँगे हम भी चुप चाप किसी रोज़ गुज़र जाएँगे हम भी, हम जैसे कई लोग चले जाते हैं हर रोज़ क्या होगा किसी रोज़ जो मर जाएँगे हम भी, हम लोग नहीं कुछ भी मगर लौह ए ज़माँ पर एक नक़्श कोई अपना सा धर जाएँगे हम भी, ओढ़े हुए हैं रूह पे हम दाग़ों भरी ख़ाक जब उतरेगी ये ख़ाक निखर जाएँगे हम भी, एक आइना ऐसा कि जो बातिन भी दिखा दे आएगा मुक़ाबिल तो सँवर जाएँगे हम भी, रहना है किसे ख़्वाब सी दुनिया में हमेशा काशिफ़ किसी दिन लौट के घर - [साया ए ज़ुल्फ़ नहीं शोला ए रुख़्सार नहीं](https://bazmeshayari.com/saya-e-zulf-nahin/): साया ए ज़ुल्फ़ नहीं शोला ए रुख़्सार नहीं क्या तेरे शहर में सरमाया ए दीदार नहीं, वक़्त पड़ जाए तो जाँ से भी गुज़र जाएँगे हम दिवाने हैं मोहब्बत के अदाकार नहीं, क्या तेरे शहर के इंसान हैं पत्थर की तरह कोई नग़्मा कोई पायल कोई झंकार नहीं, किस लिए अपनी ख़ताओं पे रहें शर्मिंदा हम ख़ुदा के हैं ज़माने के गुनहगार नहीं, सुर्ख़रू हो के निकलना तो बहुत मुश्किल है दस्त ए क़ातिल में यहाँ साज़ है तलवार नहीं, मोल क्या ज़ख़्म ए दिल ओ जाँ का मिलेगा कामिल शाख़ ए गुल का भी यहाँ कोई ख़रीदार नहीं..!! ~कामिल - [हम अहल ए आरज़ू पे अजब वक़्त आ पड़ा](https://bazmeshayari.com/ham-ahal-e-aarzoo/): हम अहल ए आरज़ू पे अजब वक़्त आ पड़ा हर हर क़दम पे खेल नया खेलना पड़ा, अपना ही शहर हम को बड़ा अजनबी लगा अपने ही घर का हम को पता पूछना पड़ा, इंसान की बुलंदी ओ पस्ती को देख कर इंसाँ कहाँ खड़ा है हमें सोचना पड़ा, माना कि है फ़रार मगर दिल को क्या करें माज़ी की याद ही में हमें डूबना पड़ा, मजबूरियाँ हयात की जब हद से बढ़ गईं हर आरज़ू को पाँव तले रोंदना पड़ा, आगे निकल गए थे ज़रा अपने आप से हम को हबीब ख़ुद की तरफ़ लौटना पड़ा..!! ~हबीब हैदराबादी - [सहराओं में जा पहुँची है शहरों से निकल कर](https://bazmeshayari.com/sahraaon-me-ja-pahunchi/): सहराओं में जा पहुँची है शहरों से निकल कर अल्फ़ाज़ की ख़ुश्बू मेंरे होंठों से निकल कर, सीने को मेंरे कर गया एक आन में रौशन एक नूर का कौंदा तेरी आँखों से निकल कर, मैं क़तरा ए शबनम था मगर आज हूँ सूरज आ बैठा हूँ मैं सदियों में लम्हों से निकल कर, हो जाएँगे बस्ती के दर ओ बाम मुनव्वर सूरज अभी चमकेगा दरीचों से निकल कर, क्या जानिए अब कौन सी जानिब को गया है ? एक ज़र्द सा चेहरा तेरी गलियों से निकल कर, हर सम्त था एक तल्ख़ हक़ाएक़ का समुंदर देखा जो तसव्वुर के - [दास्तानों में वो जादू है न तफ़सीरों में है](https://bazmeshayari.com/daastanon-me-wo-jaadu/): दास्तानों में वो जादू है न तफ़सीरों में है जो तेरी आँखों की बेआवाज़ तक़रीरों में है, राएगाँ हैं कल की ख़ुशियाँ कल के ग़म भी बेअसर अब भला रखा ही क्या माज़ी की तस्वीरों में है ? तेरी आँखों में अगर पढ़ने की हिम्मत है तो पढ़ कर्ब का मज़मूँ मेंरे माथे की तहरीरों में है, उस के एक एक अंग में वो बारहा पाई गई जो तनासुब की कशिश तराशे हुए हीरों में है, वो चुभन शेरों में ढल जाए तो महशर हो बपा जो अभी उस शख़्स की गुफ़्तार के तीरों में है, हर क़दम पर चीख़ - [फ़िक्र का सब्ज़ा मिला जज़्बात की काई मिली](https://bazmeshayari.com/fiqr-e-sabza-mila/): फ़िक्र का सब्ज़ा मिला जज़्बात की काई मिली ज़ेहन के तालाब पर क्या नक़्श आराई मिली, मुतमइन होता कहाँ मेरा दिल ए जल्वत पसंद दरमियान ए शहर भी जंगल सी तन्हाई मिली, देखने में दूर से वो किस क़दर सादा लगा पास से देखा तो उस में कितनी गहराई मिली, हर दरीचा मेरे इस्तिक़बाल को वा हो गया अजनबी गलियों में भी मुझ को शनासाई मिली, जब भी हब्स ए शहर से निकले तो हर एक राह पर मेहरबाँ अहबाब की मानिंद पुरवाई मिली, इस से बढ़ कर और क्या होता सफ़र का इख़्तिताम डूबते सूरज से हर मंज़र को - [ख़ुश्बू मेंरे बदन में रची है ख़लाओं की](https://bazmeshayari.com/khushboo-mere-badan-me/): ख़ुश्बू मेंरे बदन में रची है ख़लाओं की मैं सैर कर रहा हूँ अभी तक फ़ज़ाओं की, मत रोक अपने लब पे नज़र की हक़ीक़तें तेरी हर एक सदा है अमानत हवाओं की, है कौन जो करेगा सदाक़त से मोल तोल क़ीमत तलब करूँ भी तो किस से वफ़ाओं की ? उठी हैं इस तरह से हवादिस की आँधियाँ मिट्टी में ताब मिल गई रंगीं क़बाओं की, शहरों में आ के नूर के साँचे में ढल गई मिट्टी वही कि राख थी गलियों में गाँव की, बेताब आज ढूँढने निकलें किधर अमाँ ? अब शहर शहर बन चुका बस्ती बलाओं - [फूलों की है तख़्लीक़ कि शोलों से बना है](https://bazmeshayari.com/phoolon-ki-hai-takhliq/): फूलों की है तख़्लीक़ कि शोलों से बना है कुंदन सा तेरा जिस्म जो ख़ुश्बू में बसा है, जंगल के ग़ज़ालों पे अजब ख़ौफ़ है तारी तूफ़ान कोई शहर की जानिब से उठा है, ये हुस्न ए चमन है मेंरे एहसास की तख़्लीक़ वर्ना कहीं गुल है न कहीं मौज ए सबा है, हर लफ़्ज़ तेरे चेहरे की तस्वीर बना था किस कर्ब से सौ बार तेरे ख़त को पढ़ा है, डालो मेंरे कानों में भी पिघला हुआ सीसा ऐ बरहमनो मैं ने भी तो वेद सुना है, तुम ढूंढ़ते फिरते हो जिसे सेहन ए चमन में वो शख़्स अभी - [पड़ा हुआ मैं किसी आइने के घर में हूँ](https://bazmeshayari.com/pada-hua-main-kisi/): पड़ा हुआ मैं किसी आइने के घर में हूँ ये तेरा शहर है या ख़्वाब के नगर में हूँ, उड़ाए फिरती है अनदेखे साहिलों की हवा मैं एक उम्र से एक बे कराँ सफ़र में हूँ, तुझे ये वहम कि मैं तुझ से बेतअल्लुक़ हूँ मुझे ये दुख कि तेरे हल्क़ा ए असर में हूँ, मेंरी तलाश में गर्दां हैं तीर किरनों के छुपा हुआ मैं ख़ुनुक साया ए शजर में हूँ, मैं तेरी सम्त भी आऊँगा मारिफ़त को तेरी अभी तो अपने ही इरफ़ाँ की रहगुज़र में हूँ, तेरी उड़ान में शामिल है तरबियत मेरी मुझे न भूल कि - [यूँ बने सँवरे हुए से फूल हैं गुलज़ार में](https://bazmeshayari.com/yun-bane-sanvre-hue/): यूँ बने सँवरे हुए से फूल हैं गुलज़ार में सैर को निकली हों जैसे लड़कियाँ बाज़ार में, ये तेरा हुस्न ए तकल्लुम ये तेरा हुस्न ए बयाँ टूटने लगते हैं आईने तेरी गुफ़्तार में, किस ने फेंका है ये पत्थर ज़ेहन के तालाब में एक तूफ़ाँ सा बपा है अब मेंरे अफ़्कार में, तेरे चेहरे पर नज़र आते हैं अपने ही नुक़ूश है मेंरा दीदार भी शामिल तेरे दीदार में, एक ज़मीं का चाँद फिर होगा दरीचों से तुलूअ आसमाँ का चाँद छुप जाएगा जब अश्जार में, तेरी आमद आमद ए फ़स्ल ए बहाराँ बन गई फूलों से खिलने लगे - [कर गए अश्क मेंरी आँख को जल थल क्या क्या](https://bazmeshayari.com/kar-gaye-ashk-meri/): कर गए अश्क मेंरी आँख को जल थल क्या क्या अब के बरसा है तेरी याद का बादल क्या क्या जिस तरफ़ देखिए एक क़ौस ए क़ुज़ह है रक़्साँ रंग भरता है फ़ज़ा में तेरा आँचल क्या क्या तू तो चुप चाप था लेकिन तुझे मालूम नहीं कह गया मेरी नज़र से तेरा काजल क्या क्या शहर ए सफ़्फ़ाक की बेदर्द गुज़रगाहों में जगमगाते हैं चराग़ ए सर ए मक़्तल क्या क्या किस लिए जाएँ भला दश्त को हम दीवाने शहर ही बनते चले जाते हैं जंगल क्या क्या अब भी हर मोड़ पे एक तिश्नालबी है बेताब यूँ तो - [वक़्त बे वक़्त ये पोशाक मेंरी ताक में है](https://bazmeshayari.com/waqt-be-waqt-ye/): वक़्त बे वक़्त ये पोशाक मेंरी ताक में है जानता हूँ कि मेंरी ख़ाक मेंरी ताक में है, मुझ को दुनिया के अज़ाबों से डराने वालो एक आलम पस ए अफ़्लाक मेंरी ताक में है, साँप हर दश्त में करता है तआक़ुब मेरा बहर ए बे आब का तैराक मेंरी ताक में है, जम्अ करता है शवाहिद मेंरे होने के ख़िलाफ़ दर हक़ीक़त मेंरा इदराक मेंरी ताक में है, है मेंरे गिर्द हिफ़ाज़त के लिए एक हिसार हो अगर कोई ग़ज़बनाक मेंरी ताक में है, उस से कहना मुझे हासिल है तहफ़्फ़ुज़ ग़ैबी जो पस ए पर्दा ए बे चाक - [होंठों को फूल आँख को बादा नहीं कहा](https://bazmeshayari.com/honthon-ko-phool-aankh/): होंठों को फूल आँख को बादा नहीं कहा तुझको तेरी अदा से ज़ियादा नहीं कहा, बरता गया हूँ सिर्फ़ किसी सैर की तरह तूने मुझे सफ़र का इरादा नहीं कहा, कहता तो हूँ तुझे मैं गुल ए ख़ुशनुमा मगर ख़ुश रंग मौसमों का लबादा नहीं कहा, रहते हैं सिर्फ़ तंग नज़र लोग जिस जगह उस शहर ए बे कराँ को कुशादा नहीं कहा, बाँधा हर एक ख़याल बड़ी सादगी के साथ लेकिन कोई ख़याल भी सादा नहीं कहा, मीरी बिसात पर तो सभी बादशाह हैं मैंने कभी किसी को पियादा नहीं कहा, वो आसमाँ मिज़ाज मुसाफ़िर हूँ आज तक मैंने - [हाल ए दिल सुन के मेंरा सर ब गरेबाँ क्यूँ हैं](https://bazmeshayari.com/haal-e-dil-sun/): हाल ए दिल सुन के मेंरा सर ब गरेबाँ क्यूँ हैं जो किया आप ने अब उस पे पशेमाँ क्यूँ हैं ? मद भरे नैन ये और हुस्न ओ जवानी का निखार आइना देख के आज आप भी हैराँ क्यूँ हैं ? मेरी हर सई ए वफ़ा हो गई बेकार मगर दिल में फिर भी मेंरे बढ़ते हुए अरमाँ क्यूँ हैं ? मेंरी नाकामियों का मर्सिया पढ़ने के बजाए कुछ बताएँ तो सही आप ग़ज़ल ख़्वाँ क्यूँ हैं ? पहले आग़ाज़ ए मोहब्बत में सहारा दे कर आप अब मेरी मोहब्बत से परेशाँ क्यूँ हैं ? मेरे अशआ’र तो पढ़ते - [जमी हूँ बर्फ़ की सूरत पिघलना चाहती हूँ मैं](https://bazmeshayari.com/zami-hoon-barf-ki/): जमी हूँ बर्फ़ की सूरत पिघलना चाहती हूँ मैं हिसार ए ज़ात से बाहर निकलना चाहती हूँ मैं, दिया बन कर निहाँख़ानों में जलना चाहती हूँ मैं किसी की रूह के साँचे में ढलना चाहती हूँ मैं, जुदा होती ही आई है हमेशा हीर राँझे से अब इस रस्म ए मोहब्बत को बदलना चाहती हूँ मैं, मैं जिस मिट्टी से आई हूँ उसी मिट्टी में मिलने तक हज़ारों बार गिर कर भी सँभलना चाहती हूँ मैं, ख़िज़ाँ के डर से घबरा कर पलटना चाहता है वो हर एक मौसम में जिस के साथ चलना चाहती हूँ मैं, मिटा डाला है - [घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे](https://bazmeshayari.com/ghar-se-nikalte-to/): घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे हर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे, इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करना घर की दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे, शाम होते ही सिमट जाएँगे सारे रस्ते बहते दरिया से जहाँ होगे ठहर जाओगे, हर नए शहर में कुछ रातें कड़ी होती हैं छत से दीवारें जुदा होंगी तो डर जाओगे, पहले हर चीज़ नज़र आएगी बे-मा’नी सी और फिर अपनी ही नज़रों से उतर जाओगे..!! ~निदा फ़ाज़ली - [जो गुल है याँ सो उस गुल-ए-रुख़्सार साथ है](https://bazmeshayari.com/jo-gul-hai-yaan/): जो गुल है याँ सो उस गुल-ए-रुख़्सार साथ है क्या गुल है वो कि जिस के ये गुलज़ार साथ है, तो मस्त शब अँधेरी और अग़्यार साथ है जो दिल में आवे कह ये गुनहगार साथ है, ख़ामोश अंदलीब-ए-चमन तुझ से किया है बहस अपना सुख़न तो मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार साथ है, पैग़ाम उस निगह का कि जिस में है बू-ए-मेहर क्या जाने किस के आख़िरी दीदार साथ है, उक़्दा न ये खुला कि मिरे दिल सा पहलवान तुझ ज़ुल्फ़ के बंधा हुआ इक तार साथ है, करते तो हो मिरे मरज़-ए-दिल का तुम इलाज यारो जो दिल यही है तो आज़ार - [बाम पर आता है हमारा चाँद](https://bazmeshayari.com/baam-par-aata-hai/): बाम पर आता है हमारा चाँद आसमाँ से करे किनारा चाँद, आप ही की तलाश में साहब गर्दिशें करता है गवारा चाँद, ख़ाल और रुख़ से किस को दूँ निस्बत ऐसे तारे न ऐसा प्यारा चाँद, आग भड़की जो आतिशीं रुख़ की अभी उड़ जाए हो के पारा चाँद, होने तो दो मुक़ाबला उन से ग़ुल करेंगे मलक कि हारा चाँद, चर्ख़ से उन को ताकता है सख़ी जाएगा एक रोज़ मारा चाँद, ~सख़ी लख़नवी - [पहलू में बैठ कर वो पाते क्या ?](https://bazmeshayari.com/pahlu-me-baith-kar/): पहलू में बैठ कर वो पाते क्या दिल तो था ही नहीं चुराते क्या ? हिज्र में ग़म भी एक नेमत है ये न होता तो आज खाते क्या ? मुर्ग़ ए दिल ही का कुछ रहा मज़कूरा और बे पर की वाँ उड़ाते क्या ? राह की छेड़ छाड़ ख़ूब नहीं वो बिगड़ता तो हम बनाते क्या ? सदमा हासिल हुआ अलम लाए और कूचे से उस के लाते क्या ? शैख़ जी कहते हैं ग़िना को हराम उन से पूछो तो हैं ये गाते क्या ? लाग़र ही से कफ़न में था भी मैं मेरी मय्यत को वो - [तुम्हारे हाथ से कल हम भी रो लिए साहिब](https://bazmeshayari.com/tumhare-haath-se-kal/): तुम्हारे हाथ से कल हम भी रो लिए साहिब जिगर के दाग़ जो धोने थे धो लिए साहिब, ग़ुलाम आशिक़ ओ चाकर मुसाहिब ओ हमराज़ ग़रज़ जो था हमें होना सो हो लिए साहिब, क़रार ओ सब्र जो करने थे कर चुके बर्बाद हवास ओ होश जो खोने थे खो लिए साहिब, हमारे वज़्न ए मोहब्बत में कुछ हो फ़र्क़ तो अब फिर इम्तिहाँ की तराज़ू में तौलिए साहिब, कुछ इंतिहा ए बुका हो तो और भी यकचंद सरिश्क ए चश्म से मोती को रोलिए साहिब, कल उस सनम ने कहा देख कर हमें ख़ामोश कि अब तो आप भी - [सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ](https://bazmeshayari.com/sab-ne-milaye-haath/): सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ कितना बड़ा मज़ाक़ हुआ रौशनी के साथ, शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ कीजे मुझे क़ुबूल मेंरी हर कमी के साथ, तेरा ख़याल, तेरी तलब, तेरी आरज़ू मैं उम्र भर चला हूँ किसी रौशनी के साथ, दुनिया मेंरे ख़िलाफ़ खड़ी कैसे हो गई ? मेरी तो दुश्मनी भी नहीं थी किसी के साथ, किस काम की रही ये दिखावे की ज़िंदगी वादे किए किसी से गुज़ारी किसी के साथ, दुनिया को बेवफ़ाई का इल्ज़ाम कौन दे अपनी ही निभ सकी न बहुत दिन किसी के साथ, क़तरे वो कुछ भी पाएँ - [लहू न हो तो क़लम तर्जुमाँ नहीं होता](https://bazmeshayari.com/lahoo-na-ho-to/): लहू न हो तो क़लम तर्जुमाँ नहीं होता हमारे दौर में आँसू ज़बाँ नहीं होता, जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता, ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तन्हाई कि मुझ से आज कोई बद-गुमाँ नहीं होता, बस एक निगाह मिरी राह देखती होती ये सारा शहर मिरा मेज़बाँ नहीं होता, तेरा ख़याल न होता तो कौन समझाता ज़मीं न हो तो कोई आसमाँ नहीं होता, मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा किसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता, वसीम सदियों की आँखों से देखिए मुझ को वो लफ़्ज़ हूँ - [मैं आसमाँ पे बहुत देर रह नहीं सकता](https://bazmeshayari.com/main-aasmaan-pe-bahut/): मैं आसमाँ पे बहुत देर रह नहीं सकता मगर ये बात ज़मीं से तो कह नहीं सकता, किसी के चेहरे को कब तक निगाह में रखूँ सफ़र में एक ही मंज़र तो रह नहीं सकता, ये आज़माने की फ़ुर्सत तुझे कभी मिल जाए मैं आँखों आँखों में क्या बात कह नहीं सकता, सहारा लेना ही पड़ता है मुझ को दरिया का मैं एक क़तरा हूँ तन्हा तो बह नहीं सकता, लगा के देख ले जो भी हिसाब आता हो मुझे घटा के वो गिनती में रह नहीं सकता, ये चंद लम्हों की बे-इख़्तियारियाँ हैं ‘वसीम’ गुनह से रिश्ता बहुत देर - [किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा](https://bazmeshayari.com/kisi-ke-zakhm-par/): किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बांधेगा ? जहां लड़की कि इज़्ज़त लुटना एक खेल बन जाए वहां पर ऐ कबूतर तेरे चिट्ठी कौन बांधेगा ? ये बाज़ार ए सियासत है यहां ख़ुद्दारियां कैसी सभी के हाथ में कासा है मुट्ठी कौन बांधेगा ? तुम्हारी महफ़िलों में हम बड़े बूढ़े ज़रूरी हैं अगर हम ही नहीं होंगे तो पगड़ी कौन बांधेगा ? मुक़द्दर देखिए वो बांझ भी है और बुढ़ी भी हमेशा सोचती रहती है गठरी कौन बांधेगा ? ~ मुनव्वर राना - [ये है तो सब के लिए हो ये ज़िद हमारी है](https://bazmeshayari.com/ye-hai-to-sab/): ये है तो सब के लिए हो ये ज़िद हमारी है इस एक बात पे दुनिया से जंग जारी है, उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है, मैं क़तरा हो के भी तूफ़ाँ से जंग लेता हूँ मुझे बचाना समुंदर की ज़िम्मेदारी है, इसी से जलते हैं सहरा-ए-आरज़ू में चराग़ ये तिश्नगी तो मुझे ज़िंदगी से प्यारी है, कोई बताए ये उस के ग़ुरूर ए बेजा को वो जंग मैं ने लड़ी ही नहीं जो हारी है, हर एक साँस पे पहरा है बे यक़ीनी का ये ज़िंदगी तो नहीं मौत - [मेरी बाहों पे तेरी ज़ुल्फ़ जो लहराई है](https://bazmeshayari.com/meri-baahon-pe-teri/): मेरी बाहों पे तेरी ज़ुल्फ़ जो लहराई है मैं ये समझा कि बियाबाँ में बहार आई है नाम ले ले कर तेरा लोग बुलाते हैं मुझे क्या ख़बर ये मेरी शोहरत है कि रुस्वाई है, मैं तेरे दर से कहीं और नहीं जा सकता तू ने ज़ंजीर मेरे प्यार को पहनाई है, गुनगुनाती हुई आती हैं फ़लक से बूँदें कोई बदली तेरी पाज़ेब से टकराई है, अब तो जाँ भी चली जाए तो क्या फ़िक्र मैं ने तो प्यार निभाने की क़सम खाई है..!! - [मिलें हम कभी तो ऐसे कि हिजाब भूल जाए](https://bazmeshayari.com/mile-ham-kabhi-to/): मिलें हम कभी तो ऐसे कि हिजाब भूल जाए मैं सवाल भूल जाऊं तू जवाब भूल जाए, तू किसी ख्याल में हो और उसी ख्याल ही में कभी मेरे रास्ते में तू गुलाब भूल जाए, कभी तू जो पढ़ने बैठे मुझे हर्फ़ हर्फ़ देखे तेरी आँख भीग जाएँ तू किताब भूल जाए, तेरे ज़हन पर हो हावी मेरी याद इस तरह से कि तू अपनी ज़िन्दगी का ये निसाब भूल जाए, तू जो देखे मेरी जानिब तो बचूँ मैं एक गुनाह से तुझे देख लूं मैं इतना कि शराब भूल जाए, मुझे वो जाते जाते फक़त इतना कह गया है - [संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे](https://bazmeshayari.com/sansar-se-bhaage-firte/): संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे इस लोक को भी अपना न सके उस लोक में भी पछताओगे, ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या रीतों पर धर्म की मोहरें हैं हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे, ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो अपमान रचियता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे, हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूटा सपना है हम जन्म बिता कर जाएँगे तुम जन्म गँवा कर जाओगे..!! ~साहिर लुधियानवी - [तन्हाई से है सोहबत दिन रात जुदाई में](https://bazmeshayari.com/tanhaai-se-hai-sohbat/): तन्हाई से है सोहबत दिन रात जुदाई में क्या ख़ूब गुज़रती है औक़ात जुदाई में, रुख़्सत हो चला था तब दामन न तिरा थामा अफ़्सोस कि मलते हैं अब हाथ जुदाई में, क्या ज़िक्र है आँसू का ज़ालिम मिरी आँखों से ख़ूँ-नाब ही टपके है यक ज़ात जुदाई में, जब वस्ल था उन रोज़ों यक दिल ही पे आफ़त थी अब जान का है सौदा हैहात जुदाई में, ये नाला-ओ-ज़ारी ये ख़स्तगी ओ ख़्वारी जीधर को चलूँ ‘जोशिश’ हैं सात जुदाई में, ~जोशिश अज़ीमाबादी - [कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं](https://bazmeshayari.com/kamar-baandhe-hue-chalne/): कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं बहुत आगे गए बाक़ी जो हैं तय्यार बैठे हैं, न छेड़ ऐ निकहत-ए-बाद-ए-बहारी राह लग अपनी तुझे अटखेलियाँ सूझी हैं हम बे-ज़ार बैठे हैं, ख़याल उन का परे है अर्श-ए-आज़म से कहीं साक़ी ग़रज़ कुछ और धुन में इस घड़ी मय-ख़्वार बैठे हैं, बसान-ए-नक़्श-ए-पा-ए-रह-रवाँ कू-ए-तमन्ना में नहीं उठने की ताक़त क्या करें लाचार बैठे हैं, ये अपनी चाल है उफ़्तादगी से इन दिनों पहरों नज़र आया जहाँ पर साया-ए-दीवार बैठे हैं, कहें हैं सब्र किस को आह नंग ओ नाम है क्या शय ग़रज़ रो पीट कर उन सब को - [अब इश्क़ तमाशा मुझे दिखलाए है कुछ और](https://bazmeshayari.com/ab-ishq-tamasha-mujhe/): अब इश्क़ तमाशा मुझे दिखलाए है कुछ और कहता हूँ कुछ और मुँह से निकल जाए है कुछ और, नासेह की हिमाक़त तो ज़रा देखियो यारो समझा हूँ मैं कुछ और मुझे समझाए है कुछ और, क्या दीदा ए ख़ूँ बार से निस्बत है कि ये अब्र बरसाए है कुछ और वो बरसाए कुछ और, रोने दे, हँसा मुझ को न हमदम कि तुझे अब कुछ और ही भाता है मुझे भाए है कुछ और, पैग़ाम बर आया है ये औसान गँवाए पूछूँ हूँ मैं कुछ और मुझे बतलाए है कुछ और, जुरअत की तरह मेरे हवास अब नहीं बर - [बैठे तो पास हैं पर आँख उठा सकते नहीं](https://bazmeshayari.com/baithe-to-paas-hai/): बैठे तो पास हैं पर आँख उठा सकते नहीं जी लगा है पर अभी हाथ लगा सकते नहीं, दूर से देख वो लब काटते हैं अपने होंठ है अभी पास ए अदब होंठ हिला सकते नहीं, तकते हैं उस क़द ओ रुख़्सार को हसरत से और आह भेंच कर ख़ूब सा छाती से लगा सकते नहीं, दिल तो इन पाँव पे लोटे है मेंरा वक़्त ए ख़िराम शब को दुज़दी से भी पर उन को दबा सकते नहीं, चोर से रात खड़े रहते हैं इस दर से लगे पर जो मतलूब है वो जिंस चुरा सकते नहीं, रीझते उनकी अदाओं - [बरहम कभी क़ासिद से वो महबूब न होता](https://bazmeshayari.com/barhm-kabhi-qasid-se/): बरहम कभी क़ासिद से वो महबूब न होता गर नाम हमारा सर ए मक्तूब न होता, ख़ूबान ए जहाँ की है तेरे हुस्न से ख़ूबी तू ख़ूब न होता तो कोई ख़ूब न होता, इस्लाम से बरगश्ता न होते ब ख़ुदा हम गर इश्क़ ए बुताँ तब्अ के मर्ग़ूब न होता, क्यूँ फेर वो देता मुझे ले कर मेंरे बर से इतना जो दिल ए ज़ार ये मायूब न होता, इस बुत को ख़ुदा लाया है हम पास वगर्ना जीने का हमारे कोई उस्लूब न होता, दिल आज के दिन पास जो होता मेंरे तो आह आने से मैं उस - [मैं ने यूँ इन सर्द लबों को रखा...](https://bazmeshayari.com/main-ne-yun-in/): मैं ने यूँ इन सर्द लबों को रखा उन रुख़्सारों पर जैसे कोई भूल से रख दे फूलों को अंगारों पर, छुप गया ईद का चाँद निकल कर देर हुई पर जाने क्यों नज़रें अब तक टिकी हुई हैं मस्जिद के मीनारों पर, आती जाती साँसों पर वो दिल के तड़पने का आलम जैसे कोई नाच रहा हो दो धारी तलवारों पर, बरसों बाद जो घर में लौटा देख के आँखें भर आईं अब तक उन का नाम लिखा था घर की सब दीवारों पर, मौसम ए गुल फिर आया शायद फिर एक वहशत जाग उठी वो देखो सब्ज़ा उग - [ऐ जुनूँ तेरा अभी तक न मुक़द्दर बदला](https://bazmeshayari.com/ae-junoon-tera-abhi/): ऐ जुनूँ तेरा अभी तक न मुक़द्दर बदला शहर बदला न किसी हाथ का पत्थर बदला, ज़िंदगी बख़्श दी जब क़त्ल मुझे कर न सका मेरे क़ातिल ने बहुत तेज़ ये ख़ंजर बदला, हो गई राह ए जुनूँ फिर किसी साज़िश का शिकार मुझ को लगता है हर एक मील का पत्थर बदला, मैं तो समझा था यहाँ फ़न की परस्तिश होगी चंद सिक्कों का उछलना था कि मंज़र बदला, वो अगर राह में खुलता तो कोई बात भी थी हाए अफ़्सोस कि मंज़िल पे पहुँच कर बदला, बात तो जब थी कि तुम ख़ुद को बदलते यारो आज तक - [राहें वीरान तो उजड़े हुए कुछ घर होंगे](https://bazmeshayari.com/raahen-veeran-to-ujde/): राहें वीरान तो उजड़े हुए कुछ घर होंगे दश्त से बढ़ के मेंरे शहर के मंज़र होंगे, यूँ ही तामीर अगर होते रहे शीशमहल एक दिन शहर की हर राह में पत्थर होंगे, दश्त में हम ने ये माना कि मिलेंगे वहशी शहर वालों से तो हर हाल में बेहतर होंगे, क्या ख़बर थी कि गुलाबों से हसीं होंठों पर ज़हर में डूबे हुए तंज़ के नश्तर होंगे, तेरे इंसाफ़ का मेआर यही कहता है जितने इल्ज़ाम भी होंगे वो मेंरे सर होंगे, हाल ए दिल कहने से पहले हमें मालूम न था तेरी आँखों में भी अश्कों के समुंदर - [युसुफ़ न थे मगर सर ए बाज़ार आ गए](https://bazmeshayari.com/yusuf-na-the-magar/): युसुफ़ न थे मगर सर ए बाज़ार आ गए ख़ुश फहमियाँ ये थी कि ख़रीदार आ गए, आवाज़ दे के छिप गई हर बार ज़िन्दगी हम ऐसे सादा दिल थे कि हर बार आ गए, अब दिल में हौसला न सकत बाज़ूओं में है अब के मुक़ाबले में मेरे यार आ गए, और सूरज की दोस्ती पे जिन्हें नाज़ था फराज़ वो भी तो ज़ेर ए साया ए दीवार आ गए..!! - [एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा](https://bazmeshayari.com/ek-suraj-tha-ki/): एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा आँख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा, किस से पूछूँ तेरे आक़ा का पता ऐ रहवार ये अलम वो है न अब तक किसी शाने से उठा, हल्क़ा ए ख़्वाब को ही गिर्द ए गुलू कस डाला दस्त ए क़ातिल का भी एहसाँ न दिवाने से उठा, फिर कोई अक्स शुआ’ओं से न बनने पाया कैसा महताब मेंरे आइना-ख़ाने से उठा, क्या लिखा था सर ए महज़र जिसे पहचानते ही पास बैठा हुआ हर दोस्त बहाने से उठा..!! ~परवीन शाकिर - [जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे](https://bazmeshayari.com/justazoo-khoye-huo-ki/): जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे चाँद के हमराह हर शब सफ़र करते रहे, रास्तों का इल्म था हम को न सम्तों की ख़बर शहर ए ना मालूम की चाहत मगर करते रहे, हम ने ख़ुद से भी छुपाया और सारे शहर को तेरे जाने की ख़बर दीवार ओ दर करते रहे, वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे, आज आया है हमें भी उन उड़ानों का ख़याल जिन को तेरे ज़ो’म में बे बाल ओ पर करते रहे..!! ~परवीन शाकिर - [वो जो दिल में तेरा मुक़ाम है](https://bazmeshayari.com/wo-jo-dil-me-tera-muqam-hai/): वो जो दिल में तेरा मुक़ाम है किसी और को वो देना नहीं, वो जो रिश्ता तुझ से है बन गया किसी और से वो बना नहीं, वो जो प्यार तुझ से हो गया किसी और से वो हुआ नहीं, वो जो राज़ तुझ से है कह दिया किसी और से वो कहा नहीं, वो जो सीख मिला तेरी ज़ात से किसी और से वो मिला नहीं, तू बसा है आँखों में जिस तरह कोई और ऐसे बसा नहीं, तू हुआ है जितना क़रीब तर कोई और इतना हुआ नहीं..!! - [दिल की दुनिया में दुनिया न आये कभी](https://bazmeshayari.com/dil-ki-dunia-me/): दिल की दुनिया में दुनिया न आये कभी मेरे मौला ये दुनिया न भाये कभी, जिस को क़ुरआँ ने मकड़ी का जाला कहा अपनी जानिब मुझे न बुलाये कभी, मोमिनो के लिए मिस्ल ए ज़िन्दान है नफ़स जन्नत उसे न दिखाए कभी, ऐसे देखो कि घर को ये नादान दिल एक पल के लिए न बसाये कभी, बे अमल हो मगर ऐ खुदा ज़िन्दगी हुब ए दुनिया की ज़द में न आये कभी..!! - [लिबास तन से उतार देना, किसी को बांहों के हार देना](https://bazmeshayari.com/libas-tan-se-utaar/): लिबास तन से उतार देना, किसी को बांहों के हार देना फिर उसके जज़्बों को मार देना, अगर मुहब्बत यही है जाना ? तो मआफ़ करना मुझे नहीं है, गुनाह करने का सोच लेना, हसीन परियाँ दबोच लेना फिर उसकी आँखें ही नोच लेना, अगर मुहब्बत यही है जाना ? तो मआफ़ करना मुझे नहीं है, किसी को लफ़्ज़ों के जाल देना, किसी को जज़्बों की ढाल देना फिर उसकी इज्ज़त उछाल देना,अगर मुहब्बत यही है जाना ? तो मआफ़ करना मुझे नहीं है..!! - [मुक़म्मल दो ही दानों पर ये तस्बीह ए मुहब्बत है](https://bazmeshayari.com/muqammal-do-hi-daano/): मुक़म्मल दो ही दानों पर ये तस्बीह ए मुहब्बत है जो आये तीसरा दाना ये डोरी टूट जाती है, मुक़र्रर वक़्त होता है मुहब्बत की नमाज़ों का अदा जिनकी निकल जाए क़ज़ा भी छूट जाती है, मुहब्बत की नमाज़ों में इमामत एक को सौंपों इसे तकने उसे तकने से नियत टूट जाती है, मुहब्बत दिल का सज़्दा है जो है तो हैद पे क़ायम नज़र के शिर्क वालो से मुहब्बत रूठ जाती है..!! - [तुझे पुकारा है बे इरादा](https://bazmeshayari.com/tujhe-pukaara-hai-be/): तुझे पुकारा है बे इरादा जो दिल दुखा है बहुत ज़ियादा, नदीम हो तेरा हर्फ़ ए शीरीं तो रंग पर आए रंग ए बादा, अता करो इक अदा ए दैरीं तो अश्क से तर करें लिबादा, न जाने किस दिन से मुंतज़िर है दिल ए सर ए रह गुज़र फ़ितादा, कि एक दिन फिर नज़र में आए वो बाम ए रौशन वो दर कुशादा, वो आए पुर्सिश को फिर सजाए क़बा ए रंगीं अदा ए सादा..!! ~फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - [फिर हरीफ़ ए बहार हो बैठे](https://bazmeshayari.com/fir-harif-e-bahar/): फिर हरीफ़ ए बहार हो बैठे जाने किस किस को आज रो बैठे, थी मगर इतनी राएगाँ भी न थी आज कुछ ज़िंदगी से खो बैठे, तेरे दर तक पहुँच के लौट आए इश्क़ की आबरू डुबो बैठे, सारी दुनिया से दूर हो जाए जो ज़रा तेरे पास हो बैठे, न गई तेरी बेरुख़ी न गई हम तिरी आरज़ू भी खो बैठे, फ़ैज़ होता रहे जो होना है शेर लिखते रहा करो बैठे..!! ~फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - [हर सम्त परेशाँ तिरी आमद के क़रीने](https://bazmeshayari.com/har-samt-pareshan-teri/): हर सम्त परेशाँ तिरी आमद के क़रीने धोके दिए क्या क्या हमें बाद ए सहरी ने, हर मंजिल ए ग़ुरबत पे गुमाँ होता है घर का बहलाया है हर गाम बहुत दर ब दरी ने, थे बज़्म में सब दूद ए सर ए बज़्म से शादाँ बेकार जलाया हमें रौशन नज़री ने, मयख़ाने में आजिज़ हुए आज़ुर्दा दिली से मस्जिद का न रखा हमें आशुफ़्ता सरी ने, ये जामा ए सद चाक बदल लेने में क्या था मोहलत ही न दी फ़ैज़ कभी बख़ियागरी ने..!! ~फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - [सोच बदल जाती है,हालात बदल जाते हैं](https://bazmeshayari.com/socha-badal-jaati-hai/): सोच बदल जाती है,हालात बदल जाते हैं वक्त के साथ,लोगो के ख्यालात बदल जाते हैं, इस तरह चेहरे बदलती है जिंदगी दिल बदल जाते हैं,जज्बात बदल जाते हैं, कितनी मुश्किलों से हल होती है एक पहेली तब तक दुनियाँ के सवालात बदल जाते हैं, घबरा के मुँह मत मोड़ लेना जिंदगानी से ताउम्र एक जैसे नहीं रहते हालात बदल जाते हैं, किसी के जाने से नहीं रुकती जिन्दगी रूह वही रहती है बस जिस्मात बदल जाते हैं..!! - [उजड़े हुए हड़प्पा के आसार की तरह](https://bazmeshayari.com/ujde-hue-haddapa-ke/): उजड़े हुए हड़प्पा के आसार की तरह ज़िन्दा हैं लोग वक़्त की रफ़्तार की तरह, क्या रहना ऐसे शहर में मजबूरियों के साथ बिकते हैं लोग शाम के अख़बार की तरह, कातिल बिराजमान हैं मुन्सफ़ के साये में मक़तूल फिर रहे हैं अज़ादार की तरह, वायदे ज़रुरतों की नज़र कर दिए गए रिश्ते हैं सारे रेत की दीवार की तरह, मोहसिन मेरे वज़ूद को संगसार करते वक़्त शामिल था सारा शहर एक त्यौहार की तरह..!! - [निगाह ए यार के बदलने में कुछ देर नहीं लगती](https://bazmeshayari.com/nigaah-e-yaar-ke/): निगाह ए यार के बदलने में कुछ देर नहीं लगती हसीं ख़्वाबों के जलने में कुछ देर नहीं लगती, इश्क़ ओ मुहब्बत का मिजाज़ है हवाओं जैसा हवा के रुख बदलने में कुछ देर नहीं लगती, शब ए हिज्राँ तो गुजरती है सदियों की तरह शब ए वस्ल के ढलने में कुछ देर नहीं लगती, निगाह ए इश्क़ में अगर हो ख़ुलूस की हरारत बर्फ़ ए हुस्न के पिघलने में कुछ देर नहीं लगती..!! - [कोई सुनता ही नहीं किस को सुनाने लग जाएँ](https://bazmeshayari.com/koi-sunta-hi-nahin/): कोई सुनता ही नहीं किस को सुनाने लग जाएँ दर्द अगर उठे तो क्या शोर मचाने लग जाएँ, भेद ऐसा कि गिरह जिस की तलब करती है उम्र रम्ज़ ऐसा कि समझने में ज़माने लग जाएँ, आ गया वो तो दिल ओ जान बिछे हैं हर सू और नहीं आए तो क्या ख़ाक उड़ाने लग जाएँ, तेरी आँखों की क़सम हम को ये मुमकिन ही नहीं तू न हो और ये मंज़र भी सुहाने लग जाएँ, वहशतें इतनी बढ़ा दे कि घरौंदे ढा दें सब्ज़ शाख़ों से परिंदों को उड़ाने लग जाएँ, ऐसा दारू हो रह ए इश्क़ से बाज़ - [जानता हूँ कि तुझे साथ तो रखते है कई](https://bazmeshayari.com/jaanta-hoon-ki-tujhe/): जानता हूँ कि तुझे साथ तो रखते है कई पूछना था कि तेरा ध्यान भी रखता है कोई ? शब बसर करनी है,महफूज़ ठिकाना है कोई ? कोई जंगल है यहाँ पास में ? सेहरा है कोई ? वैसे सोचा था मुहब्बत नहीं करनी मुझे इस लिए की कि कभी पूछ ही लेता है कोई, आपकी आँखें तो सैलाब ज़दा ख़ित्ते हैं आपके दिल की तरफ़ दूसरा रस्ता है कोई ? दुःख मुझे इसका नहीं है कि दुखी है वो शख्स दुःख तो ये है कि सबब मेरे अलावा है कोई, दो मिनट बैठ, मैं बस आईने तक हो आऊँ - [मेरे उसके दरमियाँ ये राब्ता है और बस](https://bazmeshayari.com/mere-uske-darmiyan-ye/): मेरे उसके दरमियाँ ये राब्ता है और बस उम्र भर एक दूसरे को सोचना है और बस, ज़िन्दगी वायदा है मैं वापस पलट कर आऊँगा मैं ने बस एक बार उसको देखना है और बस, यार तूने मंज़िलों का सोच भी कैसे लिया इश्क बस एक रास्ता है रास्ता है और बस, खिड़कियाँ सब बंद है अहबाब सारे सो चुके मैं हूँ या फिर एक कलंदर जागता है और बस, रात दीवारों से सर टकरा रही है आज भी आज भी कमरे में मैं, मैं हूँ एक दीया है और बस, ख़्वाब ज़ादी आ कभी ख़्वाबों से हट कर भी - [चल निकलती हैं ग़म ए यार से बातें क्या क्या](https://bazmeshayari.com/chal-nikalti-hai-gam/): चल निकलती हैं ग़म ए यार से बातें क्या क्या हम ने भी कीं दर ओ दीवार से बातें क्या क्या, बात बन आई है फिर से कि मेरे बारे में उस ने पूछीं मेरे ग़मख़्वार से बातें क्या क्या, लोग लब बस्ता अगर हों तो निकल आती हैं चुप के पैराया ए इज़हार से बातें क्या क्या, किसी सौदाई का क़िस्सा किसी हरजाई की बात लोग ले आते हैं बाज़ार से बातें क्या क्या, हम ने भी दस्त शनासी के बहाने की हैं हाथ में हाथ लिए प्यार से बातें क्या क्या, किस को बिकना था मगर ख़ुश हैं - [ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते](https://bazmeshayari.com/aisa-hai-ki-sab/): ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते जो आज तो होते हैं मगर कल नहीं होते, अंदर की फ़ज़ाओं के करिश्मे भी अजब हैं मेंह टूट के बरसे भी तो बादल नहीं होते, कुछ मुश्किलें ऐसी हैं कि आसाँ नहीं होतीं कुछ ऐसे मुअम्मे हैं कभी हल नहीं होते, शाइस्तगी ए ग़म के सबब आँखों के सहरा नमनाक तो हो जाते हैं जल थल नहीं होते, कैसे ही तलातुम हों मगर क़ुल्ज़ुम ए जाँ में कुछ याद जज़ीरे हैं कि ओझल नहीं होते, उश्शाक़ के मानिंद कई अहल ए हवस भी पागल तो नज़र आते हैं पागल नहीं होते, - [अब तक यही सुना था कि बाज़ार बिक गए](https://bazmeshayari.com/ab-tak-yahi-suna/): अब तक यही सुना था कि बाज़ार बिक गए उनकी गली गए तो ख़रीदार बिक गए, लगने लगी हैं मुझ से भी नाक़स की बोलियाँ यानि जहाँ के सारे ही शहकार बिक गए, जिसने हमें ख़रीदा मुनाफ़ा कमा लिया अपना है ये कमाल कि हर बार बिक गए, अंजाम ये नहीं था कहानी का असल में क्या कीजिए कि बीच में किरदार बिक गए, जंगल की धूप में भी न साया हमें मिला क़ीमत लगी तो देखिये अश्जार बिक गए, इतना तो फ़र्क है चलो अपनों में गैर में अपने थे शर्मसार, मगर यार बिक गए, मत पूछ उनका बिकते - [जैसा नज़र का शौक़ था वैसा न कर सका](https://bazmeshayari.com/jaisa-nazar-ka-shauk/): जैसा नज़र का शौक़ था वैसा न कर सका शहर करिश्मा साज़ तमाशा न कर सका, दुनिया ने घोल दी मेरे लहजे में तल्खियाँ मैं गुफ्तगू का शौक़ भी पूरा न कर सका, एक सब्ज़ रौशनी थी फ़ज़ाओं में खो गई जाने मैं कहाँ खो गया पीछा न कर सका, इस शहर ए दिल फ़रेब ने चाहा बहुत मगर दे कर तवील हिज्र भी तन्हा न कर सका, जादू ए इश्क के इस खेल में मुझे मारा गया फिर यूँ हुआ कि कोई भी जिंदा न कर सका..!! - [ये ज़माने की वफ़ाएं मेरे काम की नहीं](https://bazmeshayari.com/ye-zamane-ki-wafayen/): ये ज़माने की वफ़ाएं मेरे काम की नहीं मुझे उसकी वफ़ा चाहिए किसी आम की नहीं, उसकी तो एक मुस्कराहट भी अनमोल थी ये तमाम मुस्कुराहटें किसी दाम की नहीं, मुझे गम है तो उस के छीन जाने का है परवाह मुझ पर लगे हुए इलज़ाम का नहीं, मेरा हाथ देख कर नजूमी ये बोला…. बहुत सी चाहतें तेरे लिए हैं बाक़ी लेकिन तेरे हाथ में कोई भी लकीर उस के नाम का नहीं..!! - [असर उस को ज़रा नहीं होता](https://bazmeshayari.com/asar-us-ko-zara/): असर उस को ज़रा नहीं होता रंज राहत फ़ज़ा नहीं होता, बेवफ़ा कहने की शिकायत है तो भी वादा वफ़ा नहीं होता, ज़िक्र ए अग़्यार से हुआ मालूम हर्फ़ ए नासेह बुरा नहीं होता, किस को है ज़ौक़ ए तल्ख़कामी लेक जंग बिन कुछ मज़ा नहीं होता, तुम हमारे किसी तरह न हुए वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता, उस ने क्या जाने क्या किया ले कर दिल किसी काम का नहीं होता, इम्तिहाँ कीजिए मेरा जब तक शौक़ ज़ोर आज़मा नहीं होता, एक दुश्मन कि चर्ख़ है न रहे तुझ से ये ऐ दुआ नहीं होता, आह तूल ए - [वो जो हम में तुम में क़रार था...](https://bazmeshayari.com/wo-jo-ham-me/): वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो, वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर वो करम कि था मेरे हाल पर मुझे सब है याद ज़रा ज़रा तुम्हें याद हो कि न याद हो, वो नए गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो, कभी बैठे सब में जो रू ब रू तो इशारतों ही से गुफ़्तुगू वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो कि न - [रह वफ़ा में कोई साहिब ए जुनूँ न मिला](https://bazmeshayari.com/rah-e-wafa-me/): , गुलों के रुख़ पे वही ताज़गी का आलम है न जाने उन को ग़म ए रोज़गार क्यूँ न मिला, कहाँ से लाए वो एक बुल हवस मज़ाक़ ए सलीम जिसे नज़र तो मिली जज़्बा ए दरूँ न मिला, मिली थीं तर्क ए मोहब्बत के बाद भी आँखें मगर वो कैफ़ वो एजाज़ वो फ़ुसूँ न मिला, फ़लक शिगाफ़ था इस दर्जा इज़्तिराब ए अमल कि बंदगी में फ़रिश्तों को भी सुकूँ न मिला, न जाने किस के सहारे रुका हुआ है फ़लक हमें तो फ़र्श ए ज़मीं पर कोई सुतूँ न मिला..!! ~शकील बदायूनी - [हाल में अपने मगन हो फ़िक्र ए आइंदा न हो](https://bazmeshayari.com/haal-me-apne-magan/): हाल में अपने मगन हो फ़िक्र ए आइंदा न हो ये उसी इंसान से मुमकिन है जो ज़िंदा न हो, कम से कम हर्फ़ ए तमन्ना की सज़ा इतनी तो दे जुरअत ए जुर्म ए सुख़न भी मुझ को आइंदा न हो, बेगुनाही जुर्म था अपना सो इस कोशिश में हूँ सुर्ख़रू मैं भी रहूँ क़ातिल भी शर्मिंदा न हो, ज़ुल्मतों की मद्हख़्वानी और इस अंदाज़ से ये किसी पर्वर्दा ए शब का नुमाइंदा न हो, मैं बहर सूरत तेरा कर्ब ए तग़ाफ़ुल सह गया अब मुझे इस का सिला दे सिर्फ़ शर्मिंदा न हो, ज़िंदगी तिश्ना भी है बेरंग - [कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़ ए यार के](https://bazmeshayari.com/kabhi-apne-ishq-pe/): कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़ ए यार के यूँही बीत जाएँगे ये भी दिन जो ख़िज़ाँ के हैं न बहार के, ये तिलिस्म ए हुस्न ए ख़याल है कि फ़रेब तेरे दयार के सर ए बाम जैसे अभी अभी कोई छुप गया है पुकार के, सियो चाक ए दामन ओ आस्तीं कि वो सरगिराँ न हो फिर कहीं यही रुत है इशरत ए दीद की यही दिन हैं आमद ए यार के, अभी और मातम ए रंग ओ बू कि चमन को है तलब ए नुमू तेरे अश्क हों कि मेरा लहू ये अमीं हैं फ़स्ल ए - [ऐ जुनूँ कुछ तो खुले आख़िर मैं किस मंज़िल में हूँ](https://bazmeshayari.com/ae-junoon-kuch-to/): ऐ जुनूँ कुछ तो खुले आख़िर मैं किस मंज़िल में हूँ हूँ जवार ए यार मैं या कूचा ए क़ातिल में हूँ ? पा ब जौलाँ अपने शानों पर लिए अपनी सलीब मैं सफ़ीर ए हक़ हूँ लेकिन नर्ग़ा ए बातिल में हूँ, जश्न ए फ़र्दा के तसव्वुर से लहू गर्दिश में है हाल में हूँ और ज़िंदा अपने मुस्तक़बिल में हूँ, दम ब ख़ुद हूँ अब सर ए मक़्तल ये मंज़र देख कर मैं कि ख़ुद मक़्तूल हूँ लेकिन सफ़ ए क़ातिल में हूँ, एक ज़माना हो गया बिछड़े हुए जिस से सुरूर आज उसी के सामने हूँ और - [और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात](https://bazmeshayari.com/aur-koi-dam-kee/): और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात ढलते ढलते आप अपनी मौत मर जाएगी रात, ज़िंदगी में और भी कुछ ज़हर भर जाएगी रात अब अगर ठहरी रग ओ पै में उतर जाएगी रात, जो भी हैं पर्वर्दा ए शब जो भी हैं ज़ुल्मत परस्त वो तो जाएँगे उसी जानिब जिधर जाएगी रात, अहल ए तूफ़ाँ बेहिसी का गर यही आलम रहा मौज ए ख़ूँ बन कर हर एक सर से गुज़र जाएगी रात, है उफ़ुक़ से एक संग ए आफ़्ताब आने की देर टूट कर मानिंद ए आईना बिखर जाएगी रात, हम तो जाने कब से हैं - [तो क्या ये तय है कि अब उम्र भर नहीं मिलना](https://bazmeshayari.com/to-kya-ye-tay/): तो क्या ये तय है कि अब उम्र भर नहीं मिलना तो फिर ये उम्र भी क्यों तुम से गर नहीं मिलना ? ये कौन चुपके से तन्हाइयों में कहता है तेरे बग़ैर सकूँ उम्र भर नहीं मिलना ? चलो ज़माने की ख़ातिर ये जब्र भी सह लें कि अब मिले तो कभी टूट कर नहीं मिलना, रह ए वफ़ा के मुसाफ़िर को कौन समझाए ? कि इस सफ़र में कोई हमसफ़र नहीं मिलना, जुदा तो जब भी हुए दिल को यूँ लगा जैसे कि अब गए तो कभी लौट कर नहीं मिलना..!! ~सुरूर बाराबंकवी - [बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता](https://bazmeshayari.com/bata-ae-abr-musavat/): बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता हमारे गाँव में बरसात क्यूँ नहीं करता ? महाज़ ए इश्क़ से कब कौन बच के निकला है तू बच गया है तो ख़ैरात क्यूँ नहीं करता ? वो जिस की छाँव में पच्चीस साल गुज़रे हैं वो पेड़ मुझ से कोई बात क्यूँ नहीं करता ? मैं जिस के साथ कई दिन गुज़ार आया हूँ वो मेरे साथ बसर रात क्यूँ नहीं करता ? मुझे तू जान से बढ़ कर अज़ीज़ हो गया है तो मेरे साथ कोई हाथ क्यूँ नहीं करता..!! ~तहज़ीब हाफ़ी - [बिछड़ कर उसका दिल लग भी गया तो क्या लगेगा](https://bazmeshayari.com/bichhad-kar-uska-dil/): बिछड़ कर उसका दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा, मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या न आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा, मैं जिस कोशिश से उसको भूल जाने में लगा हूँ ज्यादा भी अगर लग जाए तो हफ़्ता लगेगा, मेरे हाथों से लग कर फूल मिट्टी हो रहे हैं मेरी आँखों से दरिया देखना सहरा लगेगा, मेरा दुश्मन सुना है कल से भूखा लड़ रहा है ये पहला तीर उसको नाश्ते में जा लगेगा, कई दिन उस के भी सहराओं में गुज़रे हैं हाफ़ी सो इस - [पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा](https://bazmeshayari.com/parai-aag-pe-roti/): पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा मैं भीग जाऊँगा छतरी नहीं बनाऊँगा, अगर ख़ुदा ने बनाने का इख़्तियार दिया अलम बनाऊँगा बर्छी नहीं बनाऊँगा, फ़रेब दे के तेरा जिस्म जीत लूँ लेकिन मैं पेड़ काट के कश्ती नहीं बनाऊँगा, गली से कोई भी गुज़रे तो चौंक उठता हूँ नए मकान में खिड़की नहीं बनाऊँगा, मैं दुश्मनों से अगर जंग जीत भी जाऊँ तो उन की औरतें क़ैदी नहीं बनाऊँगा, तुम्हें पता तो चले बेज़बान चीज़ का दुख मैं अब चराग़ की लौ ही नहीं बनाऊँगा, मैं एक फ़िल्म बनाऊँगा अपने ‘सरवत’ पर और इस में रेल की पटरी नहीं बनाऊँगा..!! - [देखो अभी लहू की एक धार चल रही है](https://bazmeshayari.com/dekho-abhi-lahoo-ki/): देखो अभी लहू की एक धार चल रही है बाज़ू कटे हैं फिर भी तलवार चल रही है, तहज़ीब ने ये कैसा मुख़्बिर लगा रखा है हर लम्हा साथ घर की दीवार चल रही है, कुछ तो मेरी उदासी हंगामा भी किया कर तू आज साथ मेरे बाज़ार चल रही है, तुम साथ हो तो कैसा चिपका पड़ा है दरिया और ये हवा भी कैसी हमवार चल रही है, कर लो अयादत उसकी तुम भी तो फ़रहत एहसास दुनिया बहुत दिनों से बीमार चल रही है..!! ~फ़रहत एहसास - [बदन और रूह में झगड़ा पड़ा है](https://bazmeshayari.com/badan-aur-rooh-me/): बदन और रूह में झगड़ा पड़ा है कि हिस्सा इश्क़ में किस का बड़ा है ? हुजूम ए गिर्या से हूँ दर ब दर मैं कि घर में सर तलक पानी खड़ा है, बुलाती है मुझे दीवार ए दुनिया जहाँ हर जिस्म ईंटों सा जड़ा है, झिंझोड़ा है अभी किस ज़लज़ले ने ज़मीं से ज़िंदगी सा क्या झड़ा है ? फ़क़त आँखें ही आँखें रह गई हैं कि सारा शहर मिट्टी में गड़ा है, तुम्हारा अक्स है या अक्स ए दुनिया तज़ब्ज़ुब सा कुछ आँखों में पड़ा है, मैं दरिया जाँ बचाता फिर रहा हूँ कोई साहिल मेंरे पीछे पड़ा - [हर गली कूचे में रोने की सदा मेरी है](https://bazmeshayari.com/har-gali-kuche-me/): हर गली कूचे में रोने की सदा मेरी है शहर में जो भी हुआ है वो ख़ता मेरी है, ये जो है ख़ाक का इक ढेर बदन है मेरा वो जो उड़ती हुई फिरती है क़बा मेरी है, वो जो इक शोर सा बरपा है अमल है मेरा ये जो तन्हाई बरसती है सज़ा मेरी है, मैं न चाहूँ तो न खिल पाए कहीं एक भी फूल बाग़ तेरा है मगर बाद ए सबा मेरी है, एक टूटी हुई कश्ती सा बना बैठा हूँ न ये मिट्टी न ये पानी न हवा मेरी है..!! ~फ़रहत एहसास - [दिल की बात लबों पर ला कर...](https://bazmeshayari.com/dil-ki-baat-labo/): दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं हम ने सुना था इस बस्ती में दिल वाले भी रहते हैं, बीत गया सावन का महीना मौसम ने नज़रें बदलीं लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आँसू बहते हैं, एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं, जिन की ख़ातिर शहर भी छोड़ा जिन के लिए बदनाम हुए आज वही हम से बेगाने बेगाने से रहते हैं, वो जो अभी इस राहगुज़र से चाक गरेबाँ गुज़रा था उस आवारा दीवाने को जालिब जालिब कहते हैं..!! - [अगर न रोये तो आँखों पे बोझ पड़ता है](https://bazmeshayari.com/agar-na-royen-to/): अगर न रोये तो आँखों पे बोझ पड़ता है करें जो गिर्या तो रातों पे बोझ पड़ता है, परिंदे छोड़ के तन्हा अगर चले जाएँ तो फिर दरख़्त की शाखों पे बोझ पड़ता है, खता ए इश्क को अब सिर्फ़ सोचने भर से हमारी रूह के छालों पे बोझ पड़ता है, ये चाँद करता है आराम जब अमावस में स्याह रात में तारों पे बोझ पड़ता है, तुम उनको इल्म दो लेकिन ये एहतियात रखो हो भारी बस्ता तो बच्चों पे बोझ पड़ता है, सुकूत इतना हमें रास आ गया है कि अब जो कुछ सुने भी तो कानों पे - [उस बाप से नाता तोड़ लिया जिस बाप का था बेहद प्यारा](https://bazmeshayari.com/us-baap-se-naata-tod-liya/): उस बाप से नाता तोड़ लिया जिस बाप का था बेहद प्यारा तू माल हड़प कर बैठा है रोता है ख़ुसुर भी बेचारा, दस्तों में आग ही निकलेगी खाएगा अगर तू अँगारा तू माल और धन के चक्कर में फिरता है अबस मारा मारा, सब ठाट पड़ा रह जाएगा जब लाद चलेगा बंजारा क्या फ़ाएदा रुस्वा होने से रुस्वाई का आग़ाज़ न कर, जिस हाल में तू है अच्छा है अब आरज़ू ए एज़ाज़ न कर ख़्वाबों की अनोखी दुनिया में तू हद से सिवा परवाज़ न कर, दौलत से वफ़ा नामुम्किन है दौलत पे ज़्यादा नाज़ न कर सब - [दिल मोहब्बत में मुब्तला हो जाए](https://bazmeshayari.com/dil-mohabbat-me-mubtila-ho/): दिल मोहब्बत में मुब्तला हो जाए जो अभी तक न हो सका हो जाए, तुझ में ये ऐब है कि ख़ूबी है जो तुझे देख ले तेरा हो जाए, ख़ुद को ऐसी जगह छुपाया है कोई ढूँढे तो लापता हो जाए, मैं तुझे छोड़ कर चला जाऊँ साया दीवार से जुदा हो जाए, बस वो इतना कहे मुझे तुम से और फिर कॉल मुंक़ता हो जाए, दिल भी कैसा दरख़्त है हाफ़ी जो तेरी याद से हरा हो जाए..!! ~तहज़ीब हाफ़ी - [ज़र्द मौसम के एक शजर जैसी](https://bazmeshayari.com/zard-mausam-ke-ek-sazar-jaisi/): ज़र्द मौसम के एक शजर जैसी सारी बस्ती है मेरे घर जैसी, जब बिगड़ता है वक़्त इंसाँ का छिपकली लगती है मगर जैसी, साँस जैसे सफ़र में है राही अपनी काया है रहगुज़र जैसी, छूट जाता है रंग छूने से ख़्वाहिशें तितलियों के पर जैसी, और क्या हम ग़रीब रखते हैं एक दौलत है बस हुनर जैसी, ज़िंदगी आज के ज़माने में बहर ए ज़ुल्मात के सफ़र जैसी, है ज़मीर और जिस्म में अंजुम कश्मकश कश्ती और भँवर जैसी..!! ~अशफ़ाक़ अंजुम - [ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में](https://bazmeshayari.com/khatm-hai-baadal-ki-jab-se/): ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में आग होती जा रही है ज़िंदगानी धूप में, चाँद की आग़ोश में होने से जिस का है वजूद खिल सकेगी क्या भला वो रातरानी धूप में, उस की फ़ुर्क़त की तपिश में मैं झुलस कर रह गई वर्ना इतनी ताब कब थी आसमानी धूप में, कुछ चमकता सा नज़र आने लगा है रेत में बढ़ रही है मेरे क़दमों की रवानी धूप में, एक साया साथ मेरे हमसफ़र बन कर मिरा लिख रहा है फिर कोई ताज़ा कहानी धूप में..!! ~चाँदनी पांडे - [नई पोशाक पहने है पुराने ख़्वाब की हसरत](https://bazmeshayari.com/nayi-poshaak-pahne-hai/): नई पोशाक पहने है पुराने ख़्वाब की हसरत मैं हँस कर टाल देती हूँ दिल ए बेताब की हसरत, मोहब्बत और क्या है एक सराब ए तिश्नगी तो है वही सहरा की चम चम में चमकते आब की हसरत, नया किरदार गढ़ कर मैं कहानी ही बदल देती मगर पूरी न हो पाई नए एक बाब की हसरत, तुम्हारी याद का गहरा तअल्लुक़ आँसुओं से है मेरी पलकों को क्या होगी किसी सैलाब की हसरत ? बस इतना सोच कर इस ओर कश्ती मोड़ दी मैं ने निकल जाए न क्यों कर इस दफ़ा गिर्दाब की हसरत, ज़मीं पे थक - [वो काश मान लेता कभी हमसफ़र मुझे](https://bazmeshayari.com/wo-kaash-maan-leta-kabhi-humsafar/): वो काश मान लेता कभी हमसफ़र मुझे तो रास्तो के पेच का होता न डर मुझे, बेशक ये आइना मुझे जी भर सँवार दे पर देखती नहीं है अब उसकी नज़र मुझे, दीवार जो गिरी है तो इल्ज़ाम किस को दूँ मेरी ख़ुशी ही लाई थी साजन के घर मुझे, मायूसियों ने शक्ल की रंगत बिगाड़ दी पहचानता नहीं है मेरा ही नगर मुझे, आई थी इस तरफ़ तो क्यूँ मुझ से मिली नहीं अब के बहार लग रही है मुख़्तसर मुझे, मैं चाँदनी हूँ नूर है मुझ से जहान में दिखला रहा है कौन अँधेरे का डर मुझे..!! ~चाँदनी - [चेहरा देखें तेरे होंठ और पलकें देखें](https://bazmeshayari.com/chehra-dekhen-tere-honth-2/): चेहरा देखें तेरे होंठ और पलकें देखें दिल पे आँखें रखे तेरी साँसें देखें, सुर्ख़ लबों से सब्ज़ दुआएँ फूटी हैं पीले फूलों तुम को नीली आँखें देखें, साल होने को आया है वो कब लौटेगा आओ खेत की सैर को निकलें कूजें देखें, थोड़ी देर में जंगल हम को आक़ करेगा बरगद देखें या बरगद की शाख़ें देखें, मेरे मालिक आप तो सब कुछ कर सकते हैं साथ चलें हम और दुनिया की आँखें देखें, हम तेरे होंठों की लर्ज़िश कब भूले हैं पानी में पत्थर फेंकें और लहरें देखें..!! ~तहज़ीब हाफ़ी - [एक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ](https://bazmeshayari.com/ek-haveli-hoon-us/): एक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ ख़ुद ही आँगन ख़ुद ही शजर भी हूँ, अपनी मस्ती में बहता दरिया हूँ मैं किनारा भी हूँ भँवर भी हूँ, आसमाँ और ज़मीं की वुसअत देख मैं इधर भी हूँ और उधर भी हूँ, ख़ुद ही मैं ख़ुद को लिख रहा हूँ ख़त और मैं अपना नामा बर भी हूँ, दास्ताँ हूँ मैं एक तवील मगर तू जो सुन ले तो मुख़्तसर भी हूँ, एक फलदार पेड़ हूँ लेकिन वक़्त आने पे बे समर भी हूँ..!! ~तहज़ीब हाफ़ी - [कुछ ज़रूरत से कम किया गया है](https://bazmeshayari.com/kuch-zarurat-se-kam/): कुछ ज़रूरत से कम किया गया है तेरे जाने का ग़म किया गया है, ता क़यामत हरे भरे रहेंगे इन दरख़्तों पे दम किया गया है, इस लिए रौशनी में ठंडक है कुछ चराग़ों को नम किया गया है, क्या ये कम है कि आख़िरी बोसा उस जबीं पर रक़म किया गया है, पानियों को भी ख़्वाब आने लगे अश्क दरिया में ज़म किया गया है, उन की आँखों का तज़्किरा कर के मेरी आँखों को नम किया गया है, धूल में अट गए हैं सारे ग़ज़ाल इतनी शिद्दत से रम किया गया है..!! ~तहज़ीब हाफ़ी - [भुला दिया था जिस को एक शाम याद आ गया](https://bazmeshayari.com/bhoola-diya-tha-jis/): भुला दिया था जिस को एक शाम याद आ गया ग़ज़ाल देख कर वो ख़ुश ख़िराम याद आ गया, ख़ुदा का शुक्र है कि साँस टूटने से पेशतर वो शक्ल याद आ गई वो नाम याद आ गया, वो जिस की ज़ुल्फ़ आँचलों की छाओं को तरस गई शब ए विसाल उस को एहतिराम याद आ गया, मैं पिछले दस बरस से तेरे दिल में घर न कर सका तेरी मुज़ाहिमत से वियतनाम याद आ गया, मैं आज ईस्टवुड की एक फ़िल्म देख कर हटा तो मुझ को एक पुराना इंतिक़ाम याद आ गया..!! ~तहज़ीब हाफ़ी - [सब की कहानी एक तरफ़ है मेरा क़िस्सा एक तरफ़](https://bazmeshayari.com/sab-ki-kahani-ek/): सब की कहानी एक तरफ़ है मेरा क़िस्सा एक तरफ़ एक तरफ़ सैराब हैं सारे और मैं प्यासा एक तरफ़, एक तरफ़ तुम्हें जल्दी है उस के दिल में घर करने की एक तरफ़ वो कर देता है रफ़्ता रफ़्ता एक तरफ़, मेरी मर्ज़ी थी मैं ज़र्रे चुनता या लहरें चुनता उस ने सहरा एक तरफ़ रखा और दरिया एक तरफ़, मैं ने अब तक जितने भी लोगों में ख़ूद को बाँटा है बचपन से रखता आया हूँ तेरा हिस्सा एक तरफ़, जब से उस ने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ़ उस का कमरा एक तरफ़ है बाक़ी - [ज़ौक़ ए गुनाह ओ अज़्म ए पशेमाँ लिए हुए](https://bazmeshayari.com/zauq-e-gunah-o/): ज़ौक़ ए गुनाह ओ अज़्म ए पशेमाँ लिए हुए क्या क्या हुनर हैं हज़रत ए इंसाँ लिए हुए, कुफ़्र ओ ख़िरद को रास न आएगी ज़िंदगी जब तक जुनूँ है मिशअल ए इन्साँ लिए हुए, हूँ उन के सामने मगर उन पर नज़र नहीं सई ए तलब है अज़्म ए गुरेज़ाँ लिए हुए, दिल को सुकून ए पस्ती ए साहिल से क्या ग़रज़ हर अज़्म है बुलंदी ए तूफ़ाँ लिए हुए, गुलशन के दिल में आज भी महफ़ूज़ हैं वो फूल मुरझा गए जो दाग़ ए बहारां लिए हुए, आ ही गए वो अर्ज़ ए नदामत को ऐ शकील लालीँ - [जुदाई रूह को जब इश्तिआल देती है](https://bazmeshayari.com/judaai-rooh-ko-jab/): जुदाई रूह को जब इश्तिआल देती है ख़ुनुक हवा भी बदन को उबाल देती है, अगर हो वक़्त का एहसास ज़िंदगानी में हर एक साँस हमें एक सवाल देती है, उसी के दम से तो यादों के ज़ख़्म ताज़ा हैं यही सबा है जो हर घर का हाल देती है, फ़ज़ा में रंग तेरी ख़ुशबुओं को फैला के दुखे दिलों को सबा भी मलाल देती है, रक़ाबतों के सबब से जो धुंध छा जाए तेरी निगाह वो मंज़र खँगाल देती है, कुदाल पहली चला कर रिवायतों पे नज़र किया वो काम कि दुनिया मिसाल देती है..!! ~जमील नज़र - [फ़िराक़ ओ हिज्र के लम्हे जो टल गए होते](https://bazmeshayari.com/firaq-o-hizr-ke/): फ़िराक़ ओ हिज्र के लम्हे जो टल गए होते हमारे ज़ेहन के ख़ाके बदल गए होते, वो मस्लहत का तक़ाज़ा अगर समझ जाता तमाम शहर के लहजे बदल गए होते, अगर शरीक ए सफ़र वो भी हो गया होता तमाज़तों के ये सूरज भी ढल गए होते, क़दम उठाए हैं कुछ सोच कर मोहब्बत में सँभलना होता हमें तो सँभल गए होते, वफ़ा पसंद अगर वो भी हो गया होता हमारे रास्ते कितने बदल गए होते, जो थोड़ी देर न आता ख़याल ए तन्हाई तुम्हारे शहर की हद से निकल गए होते, नज़र को मोहलत ए नज़्ज़ारगी अगर मिलती निगाह - [दिल है सहरा से कुछ उदास बहुत](https://bazmeshayari.com/dil-hai-sahra-se/): दिल है सहरा से कुछ उदास बहुत घर को वीराँ करूँ तो घास बहुत, रोब पड़ जाए इस पे लहजे का मुद्दआ कम हो इल्तिमास बहुत, मेरी तन्हाइयों की दुनिया में लोग रहते हैं आस पास बहुत, है अजब हाल ग़म के सूरज का रौशनी कम है इनइकास बहुत, मुतमइन दिल हो क्या हक़ीक़त से है मेरी सोच में क़यास बहुत, लोग मरते हैं एक ख़ुशी के लिए हम मसर्रत में हैं उदास बहुत, दूर उफ़्तादा ए चमन के लिए एक ही फूल की है बास बहुत, ख़द्द ओ ख़ाल उस के और ये चेहरे ऐसे देखे हैं इक़्तिबास बहुत, - [अब रहा क्या जो लुटाना रह गया](https://bazmeshayari.com/ab-raha-kya-jo/): अब रहा क्या जो लुटाना रह गया ज़िंदगी का एक ताना रह गया, एक तअल्लुक़ जिन से था दिल को कभी अब वो रिश्ता ग़ाएबाना रह गया, था जो अफ़्साने में अफ़्साने की जान एक वही जुमला बढ़ाना रह गया, ज़िंदगी की लज़्ज़तें रुख़्सत हुईं एक तख़य्युल शायराना रह गया, सोचता हूँ और याद आता नहीं जाने क्या उन को बताना रह गया ? उलझनें माज़ी की सुलझाएँ मगर हाल ओ मुस्तक़बिल में शाना रह गया, कुछ न रहने के यहाँ हालात हों ये भी क्या कम है फ़साना रह गया, जाएज़ा उस ने लिया रुख़ का नज़र सामने के - [एक लम्हा कि मिलें सारे ज़माने जिसमें](https://bazmeshayari.com/ek-lamha-ki-mile/): एक लम्हा कि मिलें सारे ज़माने जिसमें एक नुक्ता सभी हिकमत के ख़ज़ाने जिसमें, दायरा जिसमें समा जाएँ जहानों की हुदूद आइना जिसमें नज़र आए अदम का भी वजूद, फ़र्श पर अर्श की अज़्मत की दलील ए मोहकम ख़ल्क़ पर रहमत ए ख़ालिक़ की सबील ए मोहकम, दस्तरस उसकी निगाहों की कराँ ता ब कराँ वो तजस्सुस के लिए आख़िरी मंज़िल का निशाँ, एक तौसीअ जो क़िस्मत की लकीरों में रहे एक तंबीह जो बेदार ज़मीरों में रहे..!! ~जलील आली - [सूखी ज़मीं को याद के बादल भिगो गए](https://bazmeshayari.com/sookhi-zamin-ko-yaad/): सूखी ज़मीं को याद के बादल भिगो गए पलकों को आज बीते हुए पल भिगो गए, आँसू फ़लक की आँख से टपके तमाम रात और सुब्ह तक ज़मीन का आँचल भिगो गए, माज़ी के अब्र टूट के बरसे कुछ इस तरह मुद्दत से ख़ुश्क आँखों के जंगल भिगो गए, वक़्त ए सफ़र जुदाई के लम्हात ए मुज़्महिल एक बेवफ़ा की आँख का काजल भिगो गए, मैं मंज़रों में खोया हुआ पर्बतों के था आ कर किसी की याद के बादल भिगो गए..!! ~ज़हीर अहमद ज़हीर - [जिसकी ख़ातिर मैने दुनिया की तरफ़ देखा न था](https://bazmeshayari.com/jiski-khatir-maine-duniya/): जिसकी ख़ातिर मैने दुनिया की तरफ़ देखा न था वो मुझे यूँ छोड़ जाएगा कभी सोचा न था, उस के आँसू ही बताते थे न अब लौटेगा वो इस से पहले तो बिछड़ते वक़्त यूँ रोता न था, रह गया तन्हा मैं अपने दोस्तों की भीड़ में और हमदम वो बना जिस से कोई रिश्ता न था, क़हक़हों की धूप में बैठे थे मेरे साथ सब आँसुओं की बारिशों में पर कोई भीगा न था, अश्क पलकों पे बिछड़ कर अपनी क़ीमत खो गया ये सितारा क़ीमती था जब तलक टूटा न था, मरमरीं गुम्बद पे रुकती थी हर एक - [गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था](https://bazmeshayari.com/guzishta-raat-koi-chaand/): गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था वो एक ख़्वाब था या बस नज़र का धोखा था ? सितारे ओस मेरे साथ सुब्ह तक रोए मगर वो शख़्स तो पत्थर का जैसे तुर्शा था, बिछड़ते वक़्त अना दरमियान थी वर्ना मनाना दोनों ने एक दूसरे को चाहा था, क़रीब आ के भी ख़्वाबों की खो गईं किरनें कि मुझ से आगे मेरा बदनसीब साया था, गिला नहीं है जो उसने मुझे न पहचाना लहू लुहान मेरी ज़िंदगी का चेहरा था, निगल सका न शब ए ग़म का अज़दहा मुझको उफ़ुक़ पे वक़्त ए सहर आफ़्ताब उभरा था, हसीन चाँद - [छा गया मेरे मुक़द्दर पे अंधेरा ऐ दोस्त](https://bazmeshayari.com/chha-gaya-mere-muqaddar/): छा गया मेरे मुक़द्दर पे अंधेरा ऐ दोस्त तू ने शानों पे जो गेसू को बिखेरा ऐ दोस्त, यूँ शब ए ग़म में तेरी याद दबे पाँव आई तीरगी से हो नुमू जैसे सवेरा ऐ दोस्त, मैं तो ख़ामोश था चुप रह न सके ज़ख़्म के लब मैं ने समझा है सदा तुझ को मसीहा ऐ दोस्त, एक शबनम ही जहाँ रात गए रोती है दिल हुआ मेरा मिसाल ए गुल ए सहरा ऐ दोस्त, वो निशाँ अहल ए ख़िरद कहते हैं जिस को मंज़िल नक़्श ए पा से है जुनूँ के वो हुवैदा ऐ दोस्त, कश्ती ए ज़ीस्त को - [सदाक़तों को ये ज़िद है ज़बाँ तलाश करूँ](https://bazmeshayari.com/sadaqaton-ko-ye-zidd/): सदाक़तों को ये ज़िद है ज़बाँ तलाश करूँ जो शय कहीं न मिले मैं कहाँ तलाश करूँ ? मेरी हवस के मुक़ाबिल ये शहर छोटे हैं ख़ला में जा के नई बस्तियाँ तलाश करूँ, अज़िय्यतों की भी अपनी ही एक लज़्ज़त है मैं शहर शहर फिरूँ नेकियाँ तलाश करूँ, मकाँ फ़रेब ख़ुशामद मआश समझौते बराए कश्ती ए जाँ बादबाँ तलाश करूँ, तो कब तलक यूँ ही सूरज तले रहेगी धूप तेरे लिए भी कोई साएबाँ तलाश करूँ, गुहर नसीब सदफ़ का तो ज़िक्र क्या अंजुम मैं साहिलों के लिए सीपियाँ तलाश करूँ..!! ~अंजुम ख़लीक़ - [गुलों को रंग सितारों को रौशनी के लिए](https://bazmeshayari.com/gulon-ko-rang-sitaron/): गुलों को रंग सितारों को रौशनी के लिए ख़ुदा ने हुस्न दिया तुम को दिलबरी के लिए, तुम्हारे रू ए मुनव्वर की ज़ौ में डूब गया फ़लक पे चाँद जो निकला था हमसरी के लिए, सनम हज़ारों नए पत्थरों के अंदर ही तड़प रहे हैं अभी फ़न्न ए आज़री के लिए, अरे ओ बर्क़ ए तपाँ फूँक दे नशेमन को तरस रहा हूँ गुलिस्ताँ में रौशनी के लिए, रह ए वफ़ा में मेरा कौन है जो हर सू से ग़ुबार ए राह उठी है पयम्बरी के लिए..!! ~वहीद अर्शी - [कैसे सुनाऊँ ग़म की कहानी साँसों पर है बार बहुत](https://bazmeshayari.com/kaise-sunaaoon-gam-ki/): कैसे सुनाऊँ ग़म की कहानी साँसों पर है बार बहुत माज़ी कहता है कह जाओ हाल को है इंकार बहुत, आप पशेमाँ आख़िर क्यों हैं मुझ को कुछ भी याद नहीं किस की मोहब्बत कैसी कहानी किस से किया था प्यार बहुत, टूटा माज़ी का आईना यादों की बिखरी किर्चें ज़ेहन के ज़ख़्मी तलवे अब हैं चलने से बेज़ार बहुत, पौ फूटे पर कश्ती ए दिल थी वर्ता ए ज़ुल्मत ही में अभी यूँ तो चलाई शब के समुंदर में हम ने पतवार बहुत, भाग चलूँ यादों के ज़िंदाँ से अक्सर सोचा लेकिन जब भी क़स्द किया तो देखा ऊँची - [जिस्म के घरौंदे में आग शोर करती है](https://bazmeshayari.com/jism-ke-gharaunde-me/): जिस्म के घरौंदे में आग शोर करती है दिल में जब मोहब्बत की चाँदनी उतरती है, शाम के धुँदलकों में डूबता है यूँ सूरज जैसे आरज़ू कोई मेरे दिल में मरती है, दिन में एक मिलती है और दूसरी शब में धूप जब बिछड़ती है चाँदनी सँवरती है, बाग़बाँ ने रोका या ले गया उसे बादल बात क्या हुई ख़ुश्बू इतनी देर करती है, ग़म की बंद मुट्ठी में रेत सा मेरा जीवन जब ज़रा कसी मुट्ठी ज़िंदगी बिखरती है, गाँव के परिंद तुम को क्या पता बिदेसों में रात हम अकेलों की किस तरह गुज़रती है ? दूर मुझ - [यहाँ जो ज़ख़्म मिलते हैं वो सिलते हैं यहीं मेरे](https://bazmeshayari.com/yahan-jo-zakhm-milte/): यहाँ जो ज़ख़्म मिलते हैं वो सिलते हैं यहीं मेरे तुम्हारे शहर के सब लोग तो दुश्मन नहीं मेरे, तलाश ए अहद ए रफ़्ता में अजाइब घर भी देखे हैं वहाँ भी सब हवाले हैं कहीं तेरे कहीं मेरे, ज़रा सी मैं ने तरजीहात की तरतीब बदली थी कि आपस में उलझ कर रह गए दुनिया ओ दीं मेरे, फ़लक हद है कि सरहद है ज़मीं मादन है या मदफ़न मुझे बेचैन ही रखते हैं ये वहम ओ यक़ीं मेरे, मैं तेरे ज़ुल्म कैसे हश्र तक सहता चला जाऊँ बस अब तो फ़ैसले होंगे यहीं तेरे यहीं मेरे, अचानक किस - [अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा](https://bazmeshayari.com/agar-talaash-karoon-koi/): अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा ? तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा ? न जाने कब तेरे दिल पर नई सी दस्तक हो मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आएगा, मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा ? तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सताएगा..!! ~बशीर बद्र - [झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं](https://bazmeshayari.com/jhuki-jhuki-see-nazar/): झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं, तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता मेरी तरह तेरा दिल बे क़रार है कि नहीं, वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं, तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को तुझे भी अपने पे ये एतिबार है कि नहीं..!! ~कैफ़ी आज़मी - [कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे](https://bazmeshayari.com/kitne-aish-se-rahte/): कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे ? शाम हुए ख़ुश बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे, वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे, उसकी याद की बाद ए सबा में और तो क्या होता होगा यूँ ही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे, यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो - [चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है](https://bazmeshayari.com/chupke-chupke-raat-din/): चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है, बा हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद हज़ाराँ इश्तियाक़ तुझ से वो पहले पहल दिल का लगाना याद है, बार बार उठना उसी जानिब निगाह ए शौक़ का और तेरा ग़ुर्फ़े से वो आँखें लड़ाना याद है, तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है, खींच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़अतन और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है, जान कर सोता तुझे वो क़स्द ए पा बोसी मेरा और - [इतनी मुद्दत बाद मिले हो](https://bazmeshayari.com/itni-muddat-baad-mile/): इतनी मुद्दत बाद मिले हो किन सोचों में गुम फिरते हो ? इतने ख़ाइफ़ क्यूँ रहते हो ? हर आहट से डर जाते हो तेज़ हवा ने मुझ से पूछा रेत पे क्या लिखते रहते हो ? काश कोई हम से भी पूछे रात गए तक क्यूँ जागे हो ? में दरिया से भी डरता हूँ तुम दरिया से भी गहरे हो, कौन सी बात है तुम में ऐसी इतने अच्छे क्यूँ लगते हो ? पीछे मुड़ कर क्यूँ देखा था पत्थर बन कर क्या तकते हो ? जाओ जीत का जश्न मनाओ में झूठा हूँ तुम सच्चे हो, अपने - [ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया](https://bazmeshayari.com/ae-mohabbat-tere-anjaam/): ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया, यूँ तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती है आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया, कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला मंज़िल ए इश्क़ में हर गाम पे रोना आया, मुझ पे ही ख़त्म हुआ सिलसिला ए नौहागरी इस क़दर गर्दिश ए अय्याम पे रोना आया, जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का शकील मुझ को अपने दिल ए नाकाम पे रोना आया..!! ~शकील बदायूनी - [हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही](https://bazmeshayari.com/hum-ko-kis-ke/): हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही किस ने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही, दिल के लुटने का सबब पूछो न सब के सामने नाम आएगा तुम्हारा ये कहानी फिर सही, नफ़रतों के तीर खा कर दोस्तों के शहर में हम ने किस किस को पुकारा ये कहानी फिर सही, क्या बताएँ प्यार की बाज़ी वफ़ा की राह में कौन जीता कौन हारा ये कहानी फिर सही..!! ~मसरूर अनवर - [ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल ए यार होता](https://bazmeshayari.com/ye-na-thi-humari/): ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल ए यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता, तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना कि ख़ुशी से मर न जाते अगर एतिबार होता, तेरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अहद बोदा कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार होता, कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर ए नीम कश को ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता, ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह कोई चारासाज़ होता कोई ग़म गुसार होता, रग ए संग से टपकता वो लहू कि फिर - [दिल में एक लहर सी उठी है अभी](https://bazmeshayari.com/dil-me-ek-lahar/): दिल में एक लहर सी उठी है अभी कोई ताज़ा हवा चली है अभी, कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी और ये चोट भी नई है अभी, शोर बरपा है ख़ाना ए दिल में कोई दीवार सी गिरी है अभी, भरी दुनिया में जी नहीं लगता जाने किस चीज़ की कमी है अभी, तू शरीक ए सुख़न नहीं है तो क्या हम-सुख़न तेरी ख़ामोशी है अभी, याद के बे निशाँ जज़ीरों से तेरी आवाज़ आ रही है अभी, शहर की बे चराग़ गलियों में ज़िंदगी तुझ को ढूँढती है अभी, सो गए लोग उस हवेली के एक खिड़की मगर - [कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तेरा ख़याल भी](https://bazmeshayari.com/kuchh-to-hawa-bhi/): कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तेरा ख़याल भी दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी, बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की चाँद भी ऐन चैत का उस पे तेरा जमाल भी, सब से नज़र बचा के वो मुझ को कुछ ऐसे देखता एक दफ़अ तो रुक गई गर्दिश ए माह ओ साल भी, दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तरश के देख लें शीशा गिरान ए शहर के हाथ का ये कमाल भी, उस को न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था अब जो पलट के - [जब से तू ने मुझे दीवाना बना रखा है](https://bazmeshayari.com/jab-se-tu-ne/): जब से तू ने मुझे दीवाना बना रखा है संग हर शख़्स ने हाथों में उठा रखा है, उस के दिल पर भी कड़ी इश्क़ में गुज़री होगी नाम जिस ने भी मोहब्बत का सज़ा रखा है, पत्थरो आज मेंरे सर पे बरसते क्यूँ हो मैं ने तुम को भी कभी अपना ख़ुदा रखा है, अब मेरी दीद की दुनिया भी तमाशाई है तू ने क्या मुझ को मोहब्बत में बना रखा है ? पी जा अय्याम की तल्ख़ी को भी हँस कर नासिर ग़म को सहने में भी क़ुदरत ने मज़ा रखा है..!! ~हकीम नासिर - [घुटन भी देख रही है मुझे हैरानी से](https://bazmeshayari.com/ghutan-bhi-dekh-rahi/): घुटन भी देख रही है मुझे हैरानी से कहीं मैं ऊब ही जाऊँ न उस जवानी से, सज़ा ए मौत नहीं उम्रक़ैद काटोगे ये हुक्म आ ही गया दिल की राजधानी से, ज़रा सा इश्क़ किया और अब ये हालत है वो बह रहा है रगों में अजब रवानी से, उदासियों में भी शिकवा भला करें किस से बचा है कौन मोहब्बत में राएगानी से, कभी कभी तो मुझे ख़ुद पे हँसी आती है मुझे ये इश्क़ हुआ भी तो एक दिवानी से, मैं कोशिशों में हूँ एक जिस्म को बनाने की हवा से आग से मिट्टी से और पानी - [इस मिट्टी को ऐसे खेल खिलाया हम ने](https://bazmeshayari.com/is-mitti-ko-aise/): इस मिट्टी को ऐसे खेल खिलाया हम ने ख़ुद को रोज़ बिगाड़ा रोज़ बनाया हम ने, जो सोचा था वो तो हम से बना नहीं फिर जो बन पाया उस से जी बहलाया हम ने, ग़म को फिर से तन्हाई के साथ में मिल कर हँसते हँसते बातों में उलझाया हम ने, नामुम्किन था इस को हासिल करना फिर भी पूरी शिद्दत से ये इश्क़ निभाया हम ने, उस की यादें बोझ न बन जाएँ साँसों पर सो यादों से अपना दिल धड़काया हम ने, कह देते तो शायद अच्छे हो जाते पर ख़ामोशी से अपना मरज़ बढ़ाया हम ने, - [इसी लिए तो नहीं कटती रात आदमी की](https://bazmeshayari.com/isi-liye-to-nahin/): इसी लिए तो नहीं कटती रात आदमी की ख़ुदा की ज़ात से मुश्किल है ज़ात आदमी की, नए ख़याल की बाक़ी कहीं जगह न रहे वसीअ इतनी न हो काएनात आदमी की, ख़ुदा का भी कोई शायद सुराग़ मिल जाए समझ ली जाए अगर नफ़सियात आदमी की, ख़ुदा ने बीच में ऐसा फ़साद बरपा किया अधूरी रह गई दुनिया से बात आदमी की, अलमिया सिर्फ़ यही है यही रहेगा भी ख़ुदा का दीन मगर दीनियात आदमी की, ख़ुदा ख़ुद ऐसी जगह जानबूझ कर गया है पहुँच सके न जहाँ कोई बात आदमी की, हम और कुछ भी रहें हैं पुराने - [है सफ़र में कारवान बहर ओ बर किस के लिए](https://bazmeshayari.com/hai-safar-me-kaarwaan/): है सफ़र में कारवान बहर ओ बर किस के लिए हो रहा है एहतिमाम ए ख़ुश्क ओ तर किस के लिए किस की ख़ातिर ज़ाइक़ों की सख़्तियों में हैं समर और झुक जाती है शाख़ ए बारवर किस के लिए किस की ख़ातिर हैं बदलते मौसमों की बारिशें दिल ग़मीं किस के लिए है चश्म तर किस के लिए रतजगों में गूँजने वाली सदाएँ किस की हैं है हुनर किस के लिए अर्ज़ ए हुनर किस के लिए किस ने ज़ख़्म ए ना रसी से भर दिए हैं रास्ते चारासाज़ी किस लिए है चारागर किस के लिए ला मकाँ में - [निराला अजब नकचढ़ा आदमी हूँ](https://bazmeshayari.com/niraala-azab-nakchadha-aadmi/): निराला अजब नकचढ़ा आदमी हूँ जो तुक की कहो बेतुका आदमी हूँ, बड़े आदमी तो बड़े चैन से हैं मुसीबत मेरी मैं खरा आदमी हूँ, सभी माशाअल्लाह सुब्हानअल्लाह हो ला हौल मुझ पर मैं क्या आदमी हूँ, ये बचना बिदकना छटकना मुझी से मेरी जान मैं तो तेरा आदमी हूँ, अगर सच है सच्चाई होती है उर्यां मैं उर्यां बरहना खुला आदमी हूँ, टटोलो परख लो चलो आज़मा लो ख़ुदा की क़सम बा ख़ुदा आदमी हूँ, भरम का भरम लाज की लाज रख लो था सब को यही वसवसा आदमी हूँ..!! ~शमीम अब्बास - [दे रहे हैं जिस को तोपों की सलामी आदमी](https://bazmeshayari.com/de-rahe-hain-jis/): दे रहे हैं जिस को तोपों की सलामी आदमी क्या कहूँ तुम से कि है कितना हरामी आदमी, भीड़ छट जाएगी तब उस की समझ में आएगा एक अकेला आदमी है अज़दहामी आदमी, क्या दिखाते हो मियाँ, परचा हमें अख़बार का हम ने देखे हैं बहुत नामी गिरामी आदमी, पाँव में जूता नहीं है, पेट में रोटी नहीं ले के क्या चाटेगा ख़ाली नेकनामी आदमी ? उठ के जा बैठा वही अशरफ़िया की गोद में हम ग़रीबों ने जिसे समझा अवामी आदमी, क़ैस साहब किस लिए भटकेंगे नज्द ए शौक़ में मिल ही जाएगा कोई हम सा मक़ामी आदमी, दिल - [ये मत पूछो कि कैसा आदमी हूँ](https://bazmeshayari.com/ye-mat-puchho-ki/): ये मत पूछो कि कैसा आदमी हूँ करोगे याद, ऐसा आदमी हूँ, मेरा नाम ओ नसब क्या पूछते हो ? ज़लील ओ ख़्वार ओ रुस्वा आदमी हूँ, तआरुफ़ और क्या इस के सिवा हो कि मैं भी आप जैसा आदमी हूँ, ज़माने के झमेलों से मुझे क्या मेरी जाँ! मैं तुम्हारा आदमी हूँ, चले आया करो मेरी तरफ़ भी मोहब्बत करने वाला आदमी हूँ, तवज्जोह में कमी बेशी न जानो अज़ीज़ो! मैं अकेला आदमी हूँ, गुज़ारूँ एक जैसा वक़्त कब तक कोई पत्थर हूँ मैं या आदमी हूँ, शुऊर आ जाओ मेरे साथ, लेकिन मैं एक भटका हुआ सा आदमी - [उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा](https://bazmeshayari.com/us-ke-dushman-hai/): उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा, इतना सच बोल कि होंठों का तबस्सुम न बुझे रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा, प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली जिस को पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा, मेंरे बारे में कोई राय तो होगी उस की उस ने मुझ को भी कभी तोड़ के देखा होगा, एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा..!! ~निदा फ़ाज़ली - [राहज़न आदमी रहनुमा आदमी](https://bazmeshayari.com/raahjan-aadmi-rahnuma-aadmi/): राहज़न आदमी रहनुमा आदमी बार हा बन चुका है ख़ुदा आदमी, हाए तख़्लीक़ की कार पर्दाज़ियाँ ख़ाक सी चीज़ को कह दिया आदमी, खुल गए जन्नतों के वहाँ ज़ाइचे दो क़दम झूम कर जब चला आदमी, ज़िंदगी ख़ानक़ाह ए शहूद ओ बक़ा और लौह ए मज़ार ए फ़ना आदमी, सुब्ह दम चाँद की रुख़्सती का समाँ जिस तरह बहर में डूबता आदमी, कुछ फ़रिश्तों की तक़्दीस के वास्ते सह गया आदमी की जफ़ा आदमी, गूँजती ही रहेगी फ़लक दर फ़लक है मशिय्यत की ऐसी सदा आदमी, आस की मूरतें पूजते पूजते एक तस्वीर सी बन गया आदमी..!! ~साग़र सिद्दीक़ी - [कहानी ठीक बनती है नज़ारें ठीक मिलते हैं](https://bazmeshayari.com/kahani-thik-banti-hai/): कहानी ठीक बनती है नज़ारें ठीक मिलते हैं अमूमां वक़्त अच्छा हो तो सारे ठीक मिलते हैं, वजह एक दोस्त ये भी है ताअल्लुक़ बढ़ाने की कि हम दोनों के आपस में सितारे ठीक मिलते हैं, तुम्हारा यूँ मुकर जाना, अचानक बदल जाना तो मतलब मुझको ख़्वाबों में इशारें ठीक मिलते हैं, हमें तो जो मिला अपना वही डसने में माहिर था न जाने कैसे लोगो को सारे के सारे ठीक मिलते हैं ? मुहब्बत के बड़े हम ने अज़ब दस्तूर देखे हैं मुहब्बत तो नहीं मिलती ख़सारे ठीक मिलते हैं..!! - [अपनों को नहीं समझा अपना बेगाना समझ कर छोड़ दिया](https://bazmeshayari.com/apno-ko-nahin-samjha/): अपनों को नहीं समझा अपना बेगाना समझ कर छोड़ दिया अफ़्सोस हक़ीक़त को तुम ने अफ़्साना समझ के छोड़ दिया, तुम ने भी मेरे टूटे दिल की कुछ क़द्र न की क्या ज़ुल्म किया तुम ने भी मेरा दिल टूटा हुआ पैमाना समझ के छोड़ दिया, मंदिर को न समझा घर उसका अफ़्सोस बड़ी नादानी की अल्लाह के घर को ज़ाहिद ने बुतख़ाना समझ के छोड़ दिया, ऐ हज़रत ए मूसा शुक्र करो तुम को न जलाया ख़ैर हुई इस शम्अ ने अपने जलवों का परवाना बना के छोड़ दिया, मरने के बाद भी काम आई दीवानगी अपनी ऐ पुरनम - [आरज़ू ,हसरत, तमन्ना, मुद्दआ कोई नहीं](https://bazmeshayari.com/aarzoo-hasrat-tamanna-muddaa/): आरज़ू ,हसरत, तमन्ना, मुद्दआ कोई नहीं जब से तुम हो मेरे दिल में दूसरा कोई नहीं, बेवफ़ाई का मुझे तुझ से गिला कोई नहीं प्यार तो मैंने किया तेरी ख़ता कोई नहीं, चाहने वाला हूँ तेरा जब कभी मैंने कहा कह दिया उस बेवफ़ा ने तू मेरा कोई नहीं, मैंने जब से दिल लगाया वो न मेरा हो सका इस से बढ़ कर दिल लगाने की सज़ा कोई नहीं, ख़ूब है वो ज़िंदगी जो साथ गुज़रे यार के यार बिन उल्फ़त में जीने का मज़ा कोई नहीं, रूह की तस्कीन का चारा नहीं है मौत भी दर्द ऐसा है मेरा - [मेरे दर्द की तुझे क्या ख़बर है जिसे ख़बर कोई और है](https://bazmeshayari.com/mere-dard-ki-tujhe/): मेरे दर्द की तुझे क्या ख़बर है जिसे ख़बर कोई और है तू इलाज रहने दे चारागर मेरा चारागर कोई और है, वो जो आइने के है रू ब रू वही आइने में है हू ब हू ये न सोच ये न ख़याल कर कि इधर उधर कोई और है, हैं जहाँ में एक से एक हसीं कमी हुस्न वालों की तो नहीं जिसे चाहता हूँ मैं हमनशीं वो हसीं मगर कोई और है, अलग अपनी राह ले नासेहा मुझे तेरे राहनुमा से क्या तेरा राहबर कोई और है मेरा राहबर कोई और है, न फ़रिश्ता है न है आदमी - [रखते हैं दुश्मनी भी जताते हैं प्यार भी](https://bazmeshayari.com/rakhte-hain-dushmani-bhi/): रखते हैं दुश्मनी भी जताते हैं प्यार भी हैं कैसे ग़म गुसार मेरे ग़म गुसार भी, अफ़्सुर्दगी भी रुख़ पे है उनके निखार भी है आज गुल्सिताँ में ख़िज़ाँ भी बहार भी, पीता हूँ मैं शराब ए मोहब्बत तो क्या हुआ पीता है ये शराब तो परवर दिगार भी, मिलने की है ख़ुशी तो बिछड़ने का है मलाल दिल मुतमइन भी आप से है बेक़रार भी, आ कर वो मेरी लाश पे ये कह के रो दिए तुम से हुआ न आज मेरा इंतिज़ार भी, ऐ दोस्त बाद ए मर्ग भी मैं हूँ शिकस्ता हाल दिल की तरह से टूटा - [जान जब तक फ़िदा नहीं होती](https://bazmeshayari.com/jaan-jab-tak-fida/): जान जब तक फ़िदा नहीं होती पूरी रस्म ए वफ़ा नहीं होती, शीशा टूटे तो होती है आवाज़ दिल जो टूटे सदा नहीं होती, बंदा परवर हिजाब लाज़िम है हर नज़र पारसा नहीं होती, बेवफ़ा से न रख वफ़ा की आस बेवफ़ा से वफ़ा नहीं होती, जब से उस बुत पे आ गया है दिल हम से याद ए ख़ुदा नहीं होती, आशिक़ी की नमाज़ ऐ ज़ाहिद आशिक़ों से क़ज़ा नहीं होती, आप नज़दीक जब नहीं होते दूर ग़म की बला नहीं होती, हो न जब तक ख़ुलूस दिल के साथ इल्तिजा इल्तिजा नहीं होती, कुछ भी होता नहीं कभी - [बेवफ़ा से भी प्यार होता है](https://bazmeshayari.com/bewafa-se-bhi-pyar/): बेवफ़ा से भी प्यार होता है यार कुछ भी हो यार होता है, साथ उस के जो है रक़ीब तो क्या फूल के साथ ख़ार होता है, जब वो होते हैं सेहन ए गुलशन में मौसम ए नौ बहार होता है, काश होते हम उस के फूलों में उस गले का जो हार होता है, दोस्त से क्यों भला न खाते फ़रेब दोस्त पे एतिबार होता है, जब वो आते नहीं शब ए वादा मौत का इंतिज़ार होता है, वस्ल में भी ख़याल ए हिज्र से दिल बे सुकूँ बे क़रार होता है, हम बड़े ख़ुश नसीब हैं वर्ना आप - [दस्तूर मोहब्बत का सिखाया नहीं जाता](https://bazmeshayari.com/dastur-mohabbat-ka-sikhaya/): दस्तूर मोहब्बत का सिखाया नहीं जाता ये ऐसा सबक़ है जो पढ़ाया नहीं जाता, कमसिन हैं वो ऐसे उन्हें ज़ालिम कहूँ कैसे मासूम पे इल्ज़ाम लगाया नहीं जाता, आईना दिखाया तो कहा आईना रुख़ ने आईने को आईना दिखाया नहीं जाता, क्या छेड़ है आँचल से गुलिस्ताँ में सबा की उनसे रुख़ ए रौशन को छुपाया नहीं जाता, हैरत है कि मयख़ाने में जाता नहीं ज़ाहिद जन्नत में मुसलमान से जाया नहीं जाता, अब मौत ही ले जाए तो ले जाए यहाँ से कूचे से तेरे हम से तो जाया नहीं जाता, इस दर्जा पशेमाँ मेरा क़ातिल है कि उस - [मौत की सुन के ख़बर प्यार जताने आए](https://bazmeshayari.com/maut-ki-sun-ke/): मौत की सुन के ख़बर प्यार जताने आए रूठे दुनिया से जो हम यार मनाने आए, अच्छे दिन आए तो मैंने ये तमाशा देखा मेरे दुश्मन भी गले मुझको लगाने आए, आज मिल कर मेरे दुश्मन का पता पूछते हैं मुझ से मिलने वो न मिलने के बहाने आए, दर्द ओ ग़म और उदासी के सिवा कौन आता जिन को भेजा था मेरे घर में ख़ुदा ने आए, फूल ही फूल खिले जिन की बदौलत ऐ दोस्त उन के हिस्से में न फूलों के ख़ज़ाने आए, एधी वालों के सिवा कोई नहीं था उस का लोग मुफ़्लिस का जनाज़ा न - [ये कह के आग वो दिल में लगाए जाते हैं](https://bazmeshayari.com/ye-kah-ke-aag/): ये कह के आग वो दिल में लगाए जाते हैं चराग़ ख़ुद नहीं जलते जलाए जाते हैं, अब इस से बढ़ के सितम दोस्तों पे क्या होगा ? वो दुश्मनों को गले से लगाए जाते हैं, ग़रीबी जुर्म है ऐसा कि देख कर मुझ को निगाहें फेर के अपने पराए जाते हैं, कशिश चराग़ की ये बात कर गई रौशन पतिंगे ख़ुद नहीं आते बुलाए जाते हैं, तजल्लियों के हिजाबात हैं ख़याल रहे ये पर्दे दस्त ए नज़र से उठाए जाते हैं, हमें मिली है जगह जब से आप के दिल में जहाँ हैं आप वहाँ हम भी पाए जाते - [हम ने फूलों को जो देखा लब ओ रुख़्सार के बाद](https://bazmeshayari.com/hum-ne-phoolon-ko/): हम ने फूलों को जो देखा लब ओ रुख़्सार के बाद फूल देखे न गए हुस्न ए रुख़ ए यार के बाद, काम नज़रों से लिया अबरू ए ख़मदार के बाद तीर मारे मुझे उस शोख़ ने तलवार के बाद, जिस पे हो जाएँ फ़िदा कोई भी ऐसा न मिला सैकड़ों देखे हसीं आप के दीदार के बाद, दिलरुबाई की अदा यूँ न किसी ने पाई मेरे सरकार से पहले मेरे सरकार के बाद, ज़िंदगी मौत से कुछ कम न थी ऐ जान ए हयात तेरे इक़रार से पहले तेरे इंकार के बाद, दिल ओ जाँ कर के फ़िदा उनको - [एक तो नैनाँ कजरारे और तिस पर डूबे काजल में](https://bazmeshayari.com/ek-to-naina-kajrare/): एक तो नैनाँ कजरारे और तिस पर डूबे काजल में बिजली की बढ़ जाए चमक कुछ और भी गहरे बादल में, आज ज़रा ललचाई नज़र से उसको बस क्या देख लिया पग पग उस के दिल की धड़कन उतरी आए पायल में, प्यासे प्यासे नैनाँ उस के जाने पगली चाहे क्या तट पर जब भी जावे सोचे नदिया भर लूँ छागल में, सुब्ह नहाने जूड़ा खोले नाग बदन से आ लिपटें उस की रंगत उस की ख़ुश्बू कितनी मिलती संदल में, गोरी इस संसार में मुझ को ऐसा तेरा रूप लगे जैसे कोई दीप जला हो घोर अँधेरे जंगल में, - [मुझे मालूम है मैं सारी दुनिया की अमानत हूँ](https://bazmeshayari.com/mujhe-malum-hai-main/): मुझे मालूम है मैं सारी दुनिया की अमानत हूँ मगर वो लम्हा जब मैं सिर्फ़ अपना हो सा जाता हूँ, मैं तुम से दूर रहता हूँ तो मेरे साथ रहती हो तुम्हारे पास आता हूँ तो तन्हा हो सा जाता हूँ, मैं चाहे सच ही बोलूँ हर तरह से अपने बारे में मगर तुम मुस्कुराती हो तो झूठा हो सा जाता हूँ, तेरे गुल रंग होंठों से दहकती ज़िंदगी पी कर मैं प्यासा और प्यासा और प्यासा हो सा जाता हूँ, तुझे बाँहों में भर लेने की ख़्वाहिश यूँ उभरती है कि मैं अपनी नज़र में आप रुस्वा हो सा - [तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा](https://bazmeshayari.com/tamam-umr-azaabon-ka/): तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा, गुज़र ही आए किसी तरह तेरे दीवाने क़दम क़दम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा, चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा, मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा, ये और बात कि हर छेड़ ला उबाली थी तेरी नज़र का दिलों से मोआमला तो रहा..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं](https://bazmeshayari.com/wo-log-hi-har/): वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं, तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं, उनको न पुकारो ग़म ए दौराँ के लक़ब से जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं, हम भी तेरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं, अल्फ़ाज़ में इज़हार ए मोहब्बत के तरीक़े ख़ुद इश्क़ की नज़रों में भी मायूब रहे हैं, इस अहद ए बसीरत में भी नक़्क़ाद हमारे हर एक बड़े नाम से मरऊब रहे हैं, इतना भी न - [सुब्ह के दर्द को रातों की जलन को भूलें](https://bazmeshayari.com/subah-ke-dard-ko/): सुब्ह के दर्द को रातों की जलन को भूलें किस के घर जाएँ कि इस वादा शिकन को भूलें ? आज तक चोट दबाए नहीं दबती दिल की किस तरह उस सनम ए संग बदन को भूलें ? अब सिवा इस के मुदावा ए ग़म ए दिल क्या है इतनी पी जाएँ कि हर रंज ओ मेहन को भूलें ? और तहज़ीब ए ग़म ए इश्क़ निभा दें कुछ दिन आख़िरी वक़्त में क्या अपने चलन को भूलें ?? ~जाँ निसार अख़्तर - [बेकसी हद से जब गुज़र जाए](https://bazmeshayari.com/bekasi-had-se-jab/): बेकसी हद से जब गुज़र जाए कोई ऐ दिल जिए की मर जाए, ज़िंदगी से कहो दुल्हन बन के आज तो दो घड़ी सँवर जाए, उन को जी भर के देख लेने दे दिल की धड़कन ज़रा ठहर जाए, हम हैं अपनी ही जान के दुश्मन क्यूँ ये इल्ज़ाम उन के सर जाए ? मेरे नग़्मों से उन का दिल न दुखे ग़म नहीं मुझ पे जो गुज़र जाए..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [मौज ए गुल मौज ए सबा मौज ए सहर लगती है](https://bazmeshayari.com/mauj-e-gul-mauj/): मौज ए गुल मौज ए सबा मौज ए सहर लगती है सर से पा तक वो समाँ है कि नज़र लगती है, हमने हर गाम पे सज्दों के जलाए हैं चराग़ अब हमें तेरी गली राहगुज़र लगती है, लम्हे लम्हे में बसी है तेरी यादों की महक आज की रात तो ख़ुशबू का सफ़र लगती है, जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं देखना ये है कि अब आग किधर लगती है ? सारी दुनिया में ग़रीबों का लहू बहता है हर ज़मीं मुझ को मेरे ख़ून से तर लगती है, कोई आसूदा नहीं अहल ए सियासत के सिवा - [मुद्दत हुई उस जान ए हया ने हमसे ये इक़रार किया](https://bazmeshayari.com/muddat-hui-us-jaan/): मुद्दत हुई उस जान ए हया ने हमसे ये इक़रार किया जितने भी बदनाम हुए हम उतना उसने प्यार किया, पहले भी ख़ुशचश्मों में हम चौकन्ना से रहते थे तेरी सोई आँखों ने तो और हमें होशियार किया, जाते जाते कोई हम से अच्छे रहना कह तो गया पूछे लेकिन पूछने वाले किस ने ये बीमार किया, क़तरा क़तरा सिर्फ़ हुआ है इश्क़ में अपने दिल का लहू शक्ल दिखाई तब उस ने जब आँखों को ख़ूँ बार किया, हम पर कितनी बार पड़े ये दौरे भी तन्हाई के जो भी हम से मिलने आया मिलने से इंकार किया, इश्क़ - [दीदा ओ दिल में कोई हुस्न बिखरता ही रहा](https://bazmeshayari.com/dida-o-dil-me/): दीदा ओ दिल में कोई हुस्न बिखरता ही रहा लाख पर्दों में छुपा कोई सँवरता ही रहा, रौशनी कम न हुई वक़्त के तूफ़ानों में दिल के दरिया में कोई चाँद उतरता ही रहा, रास्ते भर कोई आहट थी कि आती ही रही कोई साया मेरे बाज़ू से गुज़रता ही रहा, मिट गया पर तेरी बाँहों ने समेटा न मुझे शहर दर शहर मैं गलियों में बिखरता ही रहा, लम्हा लम्हा रहे आँखों में अँधेरे लेकिन कोई सूरज मेरे सीने में उभरता ही रहा..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [लाख आवारा सही शहरों के फ़ुटपाथों पे हम](https://bazmeshayari.com/laakh-aawara-sahi-shahron/): लाख आवारा सही शहरों के फ़ुटपाथों पे हम लाश ये किस की लिए फिरते हैं इन हाथों पे हम, अब उन्हीं बातों को सुनते हैं तो आती है हँसी बे तरह ईमान ले आए थे जिन बातों पे हम, कोई भी मौसम हो दिल की आग कम होती नहीं मुफ़्त का इल्ज़ाम रख देते हैं बरसातों पे हम, ज़ुल्फ़ से छनती हुई उस के बदन की ताबिशें हँस दिया करते थे अक्सर चाँदनी रातों पे हम, अब उन्हें पहचानते भी शर्म आती है हमें फ़ख़्र करते थे कभी जिनकी मुलाक़ातों पे हम..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर](https://bazmeshayari.com/aaye-kya-kya-yaad/): आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर उस का काग़ज़ चिपका देना घर के रौशनदानों पर, आज भी जैसे शाने पर तुम हाथ मेरे रख देती हो चलते चलते रुक जाता हूँ साड़ी की दूकानों पर, बरखा की तो बात ही छोड़ो चंचल है पुरवाई भी जाने किस का सब्ज़ दुपट्टा फेंक गई है धानों पर, शहर के तपते फ़ुटपाथों पर गाँव के मौसम साथ चलें बूढ़े बरगद हाथ सा रख दें मेरे जलते शानों पर, सस्ते दामों ले तो आते लेकिन दिल था भर आया जाने किस का नाम खुदा था पीतल के गुलदानों पर, उस - [तुम पे क्या बीत गई कुछ तो बताओ यारो](https://bazmeshayari.com/tum-pe-kya-beet/): तुम पे क्या बीत गई कुछ तो बताओ यारो मैं कोई ग़ैर नहीं हूँ कि छुपाओ यारो, इन अंधेरों से निकलने की कोई राह करो ख़ून ए दिल से कोई मिशअल ही जलाओ यारो, एक भी ख़्वाब न हो जिन में वो आँखें क्या हैं एक न एक ख़्वाब तो आँखों में बसाओ यारो, बोझ दुनिया का उठाऊँगा अकेला कब तक हो सके तुम से तो कुछ हाथ बटाओ यारो, ज़िंदगी यूँ तो न बाँहों में चली आएगी ग़म ए दौराँ के ज़रा नाज़ उठाओ यारो, उम्र भर क़त्ल हुआ हूँ मैं तुम्हारी ख़ातिर आख़िरी वक़्त तो सूली न चढ़ाओ - [हौसला खो न दिया तेरी नहीं से हम ने](https://bazmeshayari.com/hausla-kho-na-diya/): हौसला खो न दिया तेरी नहीं से हम ने कितनी शिकनों को चुना तेरी जबीं से हम ने, वो भी क्या दिन थे कि दीवाना बने फिरते थे सुन लिया था तेरे बारे में कहीं से हम ने, जिस जगह पहले पहल नाम तेरा आता है दास्ताँ अपनी सुनाई है वहीं से हम ने, यूँ तो एहसान हसीनों के उठाए हैं बहुत प्यार लेकिन जो किया है तो तुम्हीं से हम ने, कुछ समझ कर ही ख़ुदा तुझ को कहा है वर्ना कौन सी बात कही इतने यक़ीं से हम ने..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे](https://bazmeshayari.com/har-ek-rooh-me/): हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे ये ज़िंदगी तो कोई बददुआ लगे है मुझे, पसंद ए ख़ातिर ए अहल ए वफ़ा है मुद्दत से ये दिल का दाग़ जो ख़ुद भी भला लगे है मुझे, जो आँसुओं में कभी रात भीग जाती है बहुत क़रीब वो आवाज़ ए पा लगे है मुझे, मैं सो भी जाऊँ तो क्या मेरी बंद आँखों में तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे, मैं जब भी उस के ख़यालों में खो सा जाता हूँ वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे, मैं सोचता था कि लौटूँगा अजनबी - [दिल को हर लम्हा बचाते रहे जज़्बात से हम](https://bazmeshayari.com/dil-ko-har-lamha/): दिल को हर लम्हा बचाते रहे जज़्बात से हम इतने मजबूर रहे हैं कभी हालात से हम, नशा ए मय से कहीं प्यास बुझी है दिल की तिश्नगी और बढ़ा लाए ख़राजात से हम, आज तो मिल के भी जैसे न मिले हों तुझ से चौंक उठते थे कभी तेरी मुलाक़ात से हम, इश्क़ में आज भी है नीम निगाही का चलन प्यार करते हैं उसी हुस्न ए रिवायात से हम, मर्कज़ ए दीदा ए ख़ुबान ए जहाँ हैं भी तो क्या एक निस्बत भी तो रखते हैं तेरी ज़ात से हम..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [ऐ दर्द ए इश्क़ तुझ से मुकरने लगा हूँ मैं](https://bazmeshayari.com/ae-dard-e-ishq/): ऐ दर्द ए इश्क़ तुझ से मुकरने लगा हूँ मैं मुझ को संभाल हद से गुज़रने लगा हूँ मैं, पहले हक़ीक़तों ही से मतलब था और अब एक आध बात फ़र्ज़ भी करने लगा हूँ मैं, हर आन टूटते ये अक़ीदों के सिलसिले लगता है जैसे आज बिखरने लगा हूँ मैं, ऐ चश्म ए यार मेरा सुधरना मुहाल था तेरा कमाल है कि सुधरने लगा हूँ मैं, ये मेहर ओ माह अर्ज़ ओ समा मुझ में खो गए एक काएनात बन के उभरने लगा हूँ मैं, इतनों का प्यार मुझ से सँभाला न जाएगा लोगो तुम्हारे प्यार से डरने लगा - [अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए](https://bazmeshayari.com/achcha-hai-un-se/): अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए अपनी नज़र में आप को रुस्वा किया न जाए, हम हैं तेरा ख़याल है तेरा जमाल है एक पल भी अपने आप को तन्हा किया न जाए, उठने को उठ तो जाएँ तेरी अंजुमन से हम पर तेरी अंजुमन को भी सूना किया न जाए, उनकी रविश जुदा है हमारी रविश जुदा हमसे तो बात बात पे झगड़ा किया न जाए, हर चंद एतिबार में धोखे भी हैं मगर ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए, लहजा बना के बात करें उन के सामने हमसे तो इस तरह का - [आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो](https://bazmeshayari.com/aahat-see-koi-aaye/): आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो, जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो, संदल से महकती हुई पुरकैफ़ हवा का झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो, ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर नदी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो, जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर चुप चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं](https://bazmeshayari.com/ashaar-mere-yun-to-zamane/): अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं, अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं, सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं, आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं, देखूँ तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं, ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें एक शख़्स की यादों को भुलाने के - [हम से भागा न करो दूर ग़ज़ालों की तरह](https://bazmeshayari.com/hum-se-bhaaga-na/): हम से भागा न करो दूर ग़ज़ालों की तरह हम ने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह, ख़ुद ब ख़ुद नींद सी आँखों में घुली जाती है महकी महकी है शब ए ग़म तेरे बालों की तरह, तेरे बिन रात के हाथों पे ये तारों के अयाग़ ख़ूबसूरत हैं मगर ज़हर के प्यालों की तरह, और क्या इस से ज़्यादा कोई नरमी बरतूँ ? दिल के ज़ख़्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह, गुनगुनाते हुए और आ कभी उन सीनों में तेरी ख़ातिर जो महकते हैं शिवालों की तरह, तेरी ज़ुल्फ़ें तेरी आँखें तेरे अबरू तेरे लब अब - [लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से](https://bazmeshayari.com/log-kahte-hai-ki/): लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से, हाए उस वक़्त को कोसूँ कि दुआ दूँ यारो जिस ने हर दर्द मेंरा छीन लिया है मुझ से, दिल का ये हाल कि धड़के ही चला जाता है ऐसा लगता है कोई जुर्म हुआ है मुझ से, खो गया आज कहाँ रिज़्क़ का देने वाला कोई रोटी जो खड़ा माँग रहा है मुझ से, अब मेंरे क़त्ल की तदबीर तो करनी होगी कौन सा राज़ है तेरा जो छुपा है मुझ से..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी](https://bazmeshayari.com/sau-chaand-bhi-chamkenge/): सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी, उनसे यही कह आएँ कि अब हम न मिलेंगे आख़िर कोई तक़रीब ए मुलाक़ात बनेगी, ऐ नावक ए ग़म दिल में है एक बूँद लहू की कुछ और तो क्या हम से मुदारात बनेगी, ये हम से न होगा कि किसी एक को चाहें ऐ इश्क़ हमारी न तेरे साथ बनेगी, ये क्या है कि बढ़ते चलो बढ़ते चलो आगे जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी..!! ~जाँ निसार अख़्तर - [नये नये वायदों का नया नया बहाव आया है](https://bazmeshayari.com/naye-naye-waado-ka/): नये नये वायदों का नया नया बहाव आया है जनता को लुभाने खातिर कुछ नया उपाय आया है लगता है देश में फिर से चुनाव आया है, जो कुछ नहीं बन सका, वह हमारा नेता बनेगा चंद दिनों के खातिर, वो सभी का बेटा बनेगा, गरीबी खत्म की जाएगी, आरक्षण सबको दिया जाएगा देखो कितना अच्छा अच्छा फिर से सुझाव आया है लगता है देश में फिर से चुनाव आया है..!! - [ख़ुद से इतनी भी अदावत तो नहीं कर सकता](https://bazmeshayari.com/khud-se-itni-bhi/): ख़ुद से इतनी भी अदावत तो नहीं कर सकता अब कोई मुझ से मोहब्बत तो नहीं कर सकता, क्यूँ निभाएगा वो पैमान ए वफ़ा मुझ से कि वो सारी दुनिया से बग़ावत तो नहीं कर सकता, गो वो मुजरिम है मेंरा फिर भी किसी शख़्स से मैं अपने दिलबर की शिकायत तो नहीं कर सकता, दो घड़ी साँस तो लेने दे मुझे ऐ ग़म ए दहर कोई हर आन मशक़्क़त तो नहीं कर सकता, ख़ास होता है किसी का कोई मंज़ूर ए नज़र कोई हर एक पे इनायत तो नहीं कर सकता, कैसे लिखूँ मैं अँधेरे को उजाला काशिफ़ अपने - [मायूसी की कैफ़िय्यत जब दिल पर तारी हो जाती है](https://bazmeshayari.com/mayusi-ki-kaifiyat-jab/): मायूसी की कैफ़िय्यत जब दिल पर तारी हो जाती है रफ़्ता रफ़्ता दीन ओ दुनिया से बे ज़ारी हो जाती है, अव्वल अव्वल ख़ुश आता है परियों के ख़्वाबों में रहना बाद में लेकिन ये हालत ज़ेहनी बीमारी हो जाती है, अक़्ल पे पर्दा पड़ जाता है और हम सब कुछ खो देते हैं जब कोई शख़्सिय्यत हम को हद से प्यारी हो जाती है, रिज़्क़ मुक़द्दर में लिखा है फिर ये कारोबार ए जहाँ क्या एक एक दाना कमाने में किस दर्जा ख़्वारी हो जाती है, बाज़ मक़ाम ऐसे होते हैं जिन से आगे बढ़ जाएँ तो उन तक - [हम पर करेगा रहमतें परवर दिगार भी](https://bazmeshayari.com/hum-par-karega-rahmaten/): हम पर करेगा रहमतें परवर दिगार भी हालात अपने होंगे कभी साज़गार भी, तू ने भुला दी चाहतें क़ौल ओ क़रार भी हम मुंतज़िर रहे तेरे सरहद के पार भी, हालाँकि कर चुका था वो तर्क ए तअल्लुक़ात पर काश मुड़ के देखता बस एक बार भी, डेरा जमा लिया है ख़िज़ाँ ने कुछ इस तरह अब ख़ुश न कर सकेगी ये फ़स्ल ए बहार भी, अपनी निगाह में तो रहे सुर्ख़ रू सदा इंसाँ में होना चाहिए इतना वक़ार भी, ये अपने रहनुमाओं के वादों का है असर बे एतिबार हो गया अब एतिबार भी, ये कैसा दौर आ - [सामने रह कर न होना मसअला मेरा भी है](https://bazmeshayari.com/samne-rah-kar-na/): सामने रह कर न होना मसअला मेरा भी है इस कहानी में इज़ाफ़ी तज़्किरा मेरा भी है, बे सबब आवारगी मसरूफ़ रखती है मुझे रात दिन बेकार फिरना मश्ग़ला मेरा भी है, बात कर फ़रहाद से भी इंतिहा ए इश्क़ पर मशवरा मुझ से भी कर कुछ तजरबा मेरा भी है, क्या ज़रूरी है अँधेरे में तेरा तन्हा सफ़र जिस पे चलना है तुझे वो रास्ता मेरा भी है, है कोई जिस की लगन गर्दिश में रखती है मुझे एक नुक्ते की कशिश से दायरा मेरा भी है, बे सबब ये रक़्स है मेरा भी अपने सामने अक्स वहशत है - [आहन में ढलती जाएगी इक्कीसवीं सदी](https://bazmeshayari.com/aahan-me-dhalti-jayegi/): आहन में ढलती जाएगी इक्कीसवीं सदी फिर भी ग़ज़ल सुनाएगी इक्कीसवीं सदी, बग़दाद दिल्ली मास्को लंदन के दरमियाँ बारूद भी बिछाएगी इक्कीसवीं सदी, जल कर जो राख हो गईं दंगों में इस बरस उन झुग्गियों में आएगी इक्कीसवीं सदी, तहज़ीब के लिबास उतर जाएँगे जनाब डॉलर में यूँ नचाएगी इक्कीसवीं सदी, ले जा के आसमान पे तारों के आस पास अमरीका को गिराएगी इक्कीसवीं सदी, एक यात्रा ज़रूर हो निन्नयानवे के पास रथ पर सवार आएगी इक्कीसवीं सदी, फिर से ख़ुदा बनाएगा कोई नया जहाँ दुनिया को यूँ मिटाएगी इक्कीसवीं सदी, कम्पयूटरों से ग़ज़लें लिखेंगे बशीर बद्र ग़ालिब को भूल - [उदास रात है कोई तो ख़्वाब दे जाओ](https://bazmeshayari.com/udaas-raat-hai-koi/): उदास रात है कोई तो ख़्वाब दे जाओ मेंरे गिलास में थोड़ी शराब दे जाओ, बहुत से और भी घर हैं ख़ुदा की बस्ती में फ़क़ीर कब से खड़ा है जवाब दे जाओ, मैं ज़र्द पत्तों पे शबनम सजा के लाया हूँ किसी ने मुझ से कहा था हिसाब दे जाओ, अदब नहीं है ये अख़बार के तराशे हैं गए ज़मानों की कोई किताब दे जाओ, फिर उस के बाद नज़ारे नज़र को तरसेंगे वो जा रहा है ख़िज़ाँ के गुलाब दे जाओ, मेंरी नज़र में रहे डूबने का मंज़र भी ग़ुरूब होता हुआ आफ़्ताब दे जाओ, हज़ार सफ़्हों का - [मेरी आँखों में तेरे प्यार का आँसू आए](https://bazmeshayari.com/mere-aankh-me-tere/): मेरी आँखों में तेरे प्यार का आँसू आए कोई ख़ुशबू मैं लगाऊँ तेरी ख़ुशबू आए, वक़्त ए रुख़्सत कहीं तारे कहीं जुगनू आए हार पहनाने मुझे फूल से बाज़ू आए, मैंने दिन रात ख़ुदा से ये दुआ माँगी थी कोई आहट न हो दर पर मेंरे जब तू आए, इन दिनों आप का आलम भी अजब आलम है तीर खाया हुआ जैसे कोई आहू आए, उस की बातें कि गुल ओ लाला पे शबनम बरसे सब को अपनाने का उस शोख़ को जादू आए, उसने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया मुद्दतों बाद मेंरी आँखों में आँसू आए..!! - [ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएँगे](https://bazmeshayari.com/gazalon-ka-hunar-apni-ankho/): ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएँगे रोएँगे बहुत लेकिन आँसू नहीं आएँगे, कह देना समुंदर से हम ओस के मोती हैं दरिया की तरह तुझ से मिलने नहीं आएँगे, वो धूप के छप्पर हों या छाँव की दीवारें अब जो भी उठाएँगे मिल जुल के उठाएँगे, जब साथ न दे कोई आवाज़ हमें देना हम फूल सही लेकिन पत्थर भी उठाएँगे..!! ~बशीर बद्र - [यूँ तो हँसते हुए लड़कों को भी ग़म होता है](https://bazmeshayari.com/yun-to-hanste-hue/): यूँ तो हँसते हुए लड़कों को भी ग़म होता है कच्ची उम्रों में मगर तजरबा कम होता है, सिगरटें चाय धुआँ रात गए तक बहसें और कोई फूल सा आँचल कहीं नम होता है, इस तरह रोज़ हम एक ख़त उसे लिख देते हैं कि न काग़ज़ न सियाही न क़लम होता है, एक एक लफ़्ज़ तुम्हारा तुम्हें मालूम नहीं वक़्त के खुरदुरे काग़ज़ पे रक़म होता है, वक़्त हर ज़ुल्म तुम्हारा तुम्हें लौटा देगा वक़्त के पास कहाँ रहम ओ करम होता है, फ़ासला इज़्ज़त ओ रुस्वाई में वाली साहब सुनते आए हैं कि बस चंद क़दम होता है..!! - [हर्फ़ ए रंजिश पे कोई बात भी हो सकती है](https://bazmeshayari.com/harf-e-ranjish-pe/): हर्फ़ ए रंजिश पे कोई बात भी हो सकती है ऍन मुमकिन है, मुलाक़ात भी हो सकती है, ज़िन्दगी फूल है, ख़ुशबू है, मगर याद रहे ज़िन्दगी गर्दिश ए हालात भी हो सकती है, हम ने ये सोच के रखना है क़दम गुलशन में लाला ओ गुल में तेरी ज़ात भी हो सकती है, चाल चलते हुए सतरंज की बाज़ी के असूल भूल जाओगे तो फिर मात भी हो सकती है, एक तो छत के बिना घर है हमारा मोहसिन उस पे ये खौफ़ कि बरसात भी हो सकती है..!! ~मोहसिन नकवी - [दिल में जो था वो हो गया मुझ को सुना के चुप](https://bazmeshayari.com/dil-me-jo-tha/): दिल में जो था वो हो गया मुझ को सुना के चुप सुन कर हुआ हूँ उस को मैं आँसू बहा के चुप, कहता था अपना हाल मैं तुम को सुनाऊँगा न जाने क्यों वो हो गया आँसू बहा के चुप, मैं ने तो बेवफ़ाई का छेड़ा था तज़्किरा मुँह पे लगा के उँगली फिर उस ने कहा कि चुप, उस की किसी भी बात का मतलब भी कुछ नहीं हो जाएगा वो देखना ख़ुद बड़बड़ा के चुप, ख़ामोशियों की सिसकियों में शोर था बहुत तन्हाइयों में हो गया वो गुनगुना के चुप, कुछ दिन से अपने आप से था - [ये मेरा दिल कहाँ है अब तुम्हारी राजधानी है](https://bazmeshayari.com/ye-mera-dil-kahan/): ये मेरा दिल कहाँ है अब तुम्हारी राजधानी है मेंरे दिल पर तुम्हारे दर्द ओ ग़म की हुक्मरानी है, सुनो कुछ तो कहो तुम क्यों भला यूँ रूठ बैठी हो हमेशा मैंने मेरी जाँ तुम्हारी बात मानी है, मुझे कोई नहीं समझा किसी ने भी नहीं जाना सुनो गर वक़्त हो तुम को मेंरे दिल की सुनानी है, मैं सच को सच ही कहता हूँ ख़ुशामद कर नहीं सकता अभी की तो नहीं मेरी ये आदत ख़ानदानी है, तुम्हारे ग़म को रोता है तुम इस पर मुस्कुराते हो समझते झूठ हो सच को तुम्हारी बद गुमानी है, लगाना इस से - [ये इश्क़ के सताए करेंगे लड़ाई ख़ाक](https://bazmeshayari.com/ye-ishq-ke-sataye/): ये इश्क़ के सताए करेंगे लड़ाई ख़ाक घर फूँक के किया है तमाशा उड़ाई ख़ाक, हम से जो हो सका तो मोहब्बत में ये किया दिल को जला के राह ए वफ़ा में बुझाई ख़ाक, रब की रज़ा से संग भी करने लगे कलाम ताक़त हो गर दुआओं में बनती दवाई ख़ाक, हम ने सुना है आएँगे इरशाद इस तरफ़ पलकों से अपनी देखिए हम ने उड़ाई ख़ाक, दो लफ़्ज़ तुम ने बोले तसल्ली के आ के बस ऐ जान तुम ने दोस्ती मुझ से निभाई ख़ाक..!! ~इरशाद अज़ीज़ - [तू क्या जाने रूह भी ज़ख़्मी होती है](https://bazmeshayari.com/tu-kya-jaane-rooh/): तू क्या जाने रूह भी ज़ख़्मी होती है जब लफ़्ज़ों से दहशत गर्दी होती है, आ जाता है बिन दस्तक के वो दिल में फिर कब जाए उस की मर्ज़ी होती है, मैं तो देखता रहता हूँ बस उस का खेल रूह ओ दिल में गुत्थम गुत्थी होती है, उसने नफ़रत घोल दी दिल के दरिया में हर मंज़र में ख़ून की सुर्ख़ी होती है, मुझको मार के ज़िंदा रहना है उस को उस को कब मुझ से हमदर्दी होती है, और तो हम से क्या होता है बस इतना दर्द में डूबों की ग़मख़्वारी होती है, इस छोटे से - [जो भी मिले क़ुबूल है दें हाँ या न जवाब](https://bazmeshayari.com/jo-bhi-mile-qubul/): जो भी मिले क़ुबूल है दें हाँ या न जवाब देखें मेंरे सवाल का देंगे वो क्या जवाब, कैसा सवाल था कि उलझ के वो रह गया ऐसे में क्या किसी ने किसी को दिया जवाब, दिल में उतर गए हो तुम आँखों के रास्ते आँखों के एक सवाल पे आँखों का था जवाब, हम से नज़र मिला के कभी कीजिएगा बात हम देंगे आप को सुनो हर बात का जवाब, ख़ामोशी एक सवाल है ऐसा सवाल कि न चाहते हुए उसे देना पड़ा जवाब, बैठे हैं दिल को थाम के हम तो ब चश्म ए नम मर्ज़ी है उन - [आँखों से मेरे ख़्वाब चुराती रही है रात](https://bazmeshayari.com/aankhon-se-mere-khwab/): आँखों से मेरे ख़्वाब चुराती रही है रात ख़ुद भी जगी है मुझको जगाती रही है रात, आँखें सहर की नींद से बोझल लगीं मुझे एक शोर जो बला का मचाती रही है रात, हम ने तो ख़ुद में शोर मचाया था रात भर ख़ामोशियों के क़िस्से सुनाती रही है रात, जब भी चराग़ मैं ने जलाया है शाम को मिल कर हवा के साथ बुझाती रही है रात, ख़ामोश रात रहती है मैंने सुना था ये जो दिल में आया मुझको सुनाती रही है रात..!! ~इरशाद अज़ीज़ - [दिल भी जलाया उस ने जो मेरा जलाया ख़त](https://bazmeshayari.com/dil-bhi-jalaya-us/): दिल भी जलाया उस ने जो मेरा जलाया ख़त अफ़सोस मैं ने जा के उसी को पढ़ाया ख़त, जितना छुपा के रखा था दुनिया से अपना इश्क़ जा कर हर एक बज़्म में उस ने सुनाया ख़त, अटकी है जान हल्क़ में देंगे वो क्या जवाब परवरदिगार ख़ैर हो अब तक न आया ख़त, उस तक तो दिल की बात को पहुँचाना था ज़रूर उस के लिए लिखा था उसी से पढ़ाया ख़त, मैं ने कहा कि कीजिए इरशाद कुछ हुज़ूर उस ने थमा दिया मुझे चुपके से लाया ख़त..!! ~इरशाद अज़ीज़ - [सच कहने से यार ख़फ़ा हो जाते हैं](https://bazmeshayari.com/sach-kahne-se-yaar/): सच कहने से यार ख़फ़ा हो जाते हैं दिल के सब अरमान हवा हो जाते हैं, हद से ज़ियादा इज़्ज़त देने पर देखो ऐसे वैसे लोग ख़ुदा हो जाते हैं, मेरी तरह जीने से ही इस दुनिया में जीने के हक़ सारे अदा हो जाते हैं, तुम जैसे तो सोचते रहते हैं बुज़दिल हम हक़ पे एक पल में फ़ना हो जाते हैं, दिल पर खा के ज़ख़्म मोहब्बत के यारो हम ग़म के मारों की दवा हो जाते हैं..!! ~इरशाद अज़ीज़ - [तुम को वफ़ा से क्या मतलब है जाओ अपना काम करो](https://bazmeshayari.com/tum-ko-wafa-se/): तुम को वफ़ा से क्या मतलब है जाओ अपना काम करो दिन भर भटके आवारा से अब जा कर आराम करो, कब रोका है मैंने तुम को मेरी बातें करने से नाम अगर होता है तुम्हारा तो मुझ को बदनाम करो, जाने वालों को जाना है कब आते हैं लौट के फिर सर फोड़ो यादों में उनकी रो के सहर से शाम करो, क्या रखा है इसकी उसकी तेरी मेरी करने से ख़ुद से मिलेंगे बात बनेगी ख़ुद को न यूँ दुश्नाम करो, अहल ए ख़िरद से कुछ नहीं बनता हर जानिब कोहराम मचा ऐसा करो सब ज़ेहनों में अपने - [मेरी जैसी उस की हालत कब होगी](https://bazmeshayari.com/meri-jaisi-us-ki/): मेरी जैसी उस की हालत कब होगी उस को जाने मुझ से मोहब्बत कब होगी उस के लिए मैं ख़ुद से लड़ता रहता हूँ उस के दिल को उस से अदावत कब होगी सब से हँस के मिलती है वो जब देखो वो मेरी ही सिर्फ़ अमानत कब होगी उस के नाम से कितना मैं बदनाम हुआ वो रुस्वा अब मेरी बदौलत कब होगी मैं उस की चाहत में कितना टूटा हूँ अब उस को भी मेरी हसरत कब होगी मुझ को नज़र अंदाज़ वो करती रहती है उस की जैसी मेरी आदत कब होगी हाल ए दिल अशआर में - [जाने कितनी उड़ान बाक़ी है](https://bazmeshayari.com/jaane-kitni-udaan-baaqi-hai/): जाने कितनी उड़ान बाक़ी है इस परिंदे में जान बाक़ी है, जितनी बटनी थी बट चुकी ये ज़मीं अब तो बस आसमान बाक़ी है, अब वो दुनिया अजीब लगती है जिस में अम्न ओ अमान बाक़ी है, इम्तिहाँ से गुज़र के क्या देखा एक नया इम्तिहान बाक़ी है, सर क़लम होंगे कल यहाँ उन के जिन के मुँह में ज़बान बाक़ी है..!! ~राजेश रेड्डी - [ये जो ज़िंदगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब है](https://bazmeshayari.com/ye-jo-zindagi-ki-kitab-hai/): ये जो ज़िंदगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब है कहीं एक हसीन सा ख़्वाब है कहीं जानलेवा अज़ाब है, कहीं छाँव है कहीं धूप है कहीं और ही कोई रूप है कई चेहरे इस में छुपे हुए एक अजीब सी ये नक़ाब है, कहीं खो दिया कहीं पा लिया कहीं रो लिया कहीं गा लिया कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी कहीं मेहरबाँ बेहिसाब है, कहीं आँसुओं की है दास्ताँ कहीं मुस्कुराहटों का बयाँ कहीं बरकतों की हैं बारिशें कहीं तिश्नगी बेहिसाब है..!! ~राजेश रेड्डी - [अब क्या बताएँ टूटे हैं कितने कहाँ से हम](https://bazmeshayari.com/ab-kya-batayen-tute-hai-kitne-kahan-se-hum/): अब क्या बताएँ टूटे हैं कितने कहाँ से हम ख़ुद को समेटते हैं यहाँ से वहाँ से हम क्या जाने किस जहाँ में मिलेगा हमें सुकून नाराज़ हैं ज़मीं से ख़फ़ा आसमाँ से हम अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास लेने लगे हैं काम यक़ीं का गुमाँ से हम लेकिन हमारी आँखों ने कुछ और कह दिया कुछ और कहते रह गए अपनी ज़बाँ से हम आईने से उलझता है जब भी हमारा अक्स हट जाते हैं बचा के नज़र दरमियाँ से हम मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं ग़ाएब हुए हैं जब से तिरी - [यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है](https://bazmeshayari.com/yahan-har-shakhs-har-pal-haadsa-hone-se/): यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है, मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम सा बच्चा बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है, न बस में ज़िंदगी उस के न क़ाबू मौत पर उस का मगर इंसान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है, अजब ये ज़िंदगी की क़ैद है दुनिया का हर इंसाँ रिहाई माँगता है और रिहा होने से डरता है..!! ~राजेश रेड्डी - [ज़िंदगी तू ने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं](https://bazmeshayari.com/zindagi-tu-ne-lahoo-le-ke-diya-kuch-bhi-nahin/): ज़िंदगी तू ने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं ? आप इन हाथों की चाहें तो तलाशी ले लें मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं, हम ने देखा है कई ऐसे ख़ुदाओं को यहाँ सामने जिन के वो सचमुच का ख़ुदा कुछ भी नहीं, या ख़ुदा अब के ये किस रंग में आई है बहार ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं, दिल भी एक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं..!! - [तह ब तह है राज़ कोई आब की तहवील में](https://bazmeshayari.com/tah-ba-tah-hai-raaz-koi-aab-ki-tahweel-me/): तह ब तह है राज़ कोई आब की तहवील में ख़ामुशी यूँ ही नहीं रहती है गहरी झील में, मैं ने बचपन में अधूरा ख़्वाब देखा था कोई आज तक मसरूफ़ हूँ उस ख़्वाब की तकमील में, हर घड़ी अहकाम जारी करता रहता है ये दिल हाथ बाँधे मैं खड़ा हूँ हुक्म की तामील में, कब मेरी मर्ज़ी से कोई काम होता है तमाम हर घड़ी रहता हूँ मैं क्यूँ बे सबब ताजील में, माँगती है अब मोहब्बत अपने होने का सुबूत और मैं जाता नहीं इज़हार की तफ़्सील में, मुद्दआ तेरा समझ लेता हूँ तेरी चाल से तू परेशाँ - [नए सिरे से कोई सफ़र आग़ाज़ नहीं करता](https://bazmeshayari.com/naye-sire-se-koi-safar-aagaaz-nahin-karta/): नए सिरे से कोई सफ़र आग़ाज़ नहीं करता जाने क्यूँ अब दिल मेरा परवाज़ नहीं करता, कितनी बुरी आदत है मैं ख़ामोश ही रहता हूँ जब तक मुझ से कोई सुख़न आग़ाज़ नहीं करता, कैसे ज़िंदा रहता हूँ मैं ज़हर को पी कर अब दीवार ओ दर को भी तो हमराज़ नहीं करता, ताज़ा हवा के झोंके अक्सर आते रहते हैं आख़िर क्यूँ मैं अपने दरीचे बाज़ नहीं करता, जाने कैसा राग बजाना सीख लिया दिल ने मेरी संगत अब कोई दम साज़ नहीं करता, अहल ए हुनर की आँखों में क्यूँ चुभता रहता हूँ मैं तो अपनी बे हुनरी - [एक अजब सी दुनिया देखा करता था](https://bazmeshayari.com/ek-azab-see-duniya-dekha-karta-tha/): एक अजब सी दुनिया देखा करता था दिन में भी मैं सपना देखा करता था, एक ख़याल आबाद था मेरे दिल में भी ख़ुद को मैं शहज़ादा देखा करता था, सब्ज़ परी का उड़न खटोला हर लम्हे अपनी जानिब आता देखा करता था, उड़ जाता था रूप बदल कर चिड़ियों के जंगल सहरा दरिया देखा करता था, हीरे जैसा लगता था इक एक पत्थर हर मिट्टी में सोना देखा करता था, कोई नहीं था तिश्ना रेगिस्तानों में हर सहरा में दरिया देखा करता था, हर जानिब हरियाली थी ख़ुशहाली थी हर चेहरे को हँसता देखा करता था, बचपन के दिन - [सुल्ह की हद तक सितमगर आ गया](https://bazmeshayari.com/sulah-ki-had-tak-sitamgar-aa-gaya/): सुल्ह की हद तक सितमगर आ गया आइने की ज़द में पत्थर आ गया, आग तो सुलगी थी दामन के क़रीब आस्तीं का साँप बाहर आ गया, तेग़ में थी जिस के दम से आब ओ ताब तेग़ की ज़द में वही सर आ गया, दरिया दरिया पार होना था मुझे बीच में कोई समुंदर आ गया, धूप में चलने की आदत है मुझे ढल गई जब धूप तो घर आ गया..!! ~हामी गोरखपुरी - [सर पटकती रही दश्त ए ग़म की हवा](https://bazmeshayari.com/sar-patakti-rahi-dasht-e-gam-ki/): सर पटकती रही दश्त ए ग़म की हवा उन की यादों के झोंके भी चलते रहे शाम से ता सहर घर की दहलीज़ पर हम चराग़ों की मानिंद जलते रहे, हुस्न की धूप ने ज़ुल्फ़ की छाँव ने नूर के शहर ने रंग के गाँव ने हर क़दम पर ठहरने को आवाज़ दी हम को चलना था काँटों पे चलते रहे, शहर के मोड़ पर कल मिले थे मुझे मेरे बचपन के दिन मेरे बचपन की शब गाहे आँखें मिलीं गाहे पलकें झुकीं गाहे रुकते रहे गाहे चलते रहे, कौनसा नाम दें ऐसी बरसात को जिस के दामन में पानी - [बस एक तेरे ख़्वाब से इंकार नहीं है](https://bazmeshayari.com/bas-ek-tere-khwab-se-inkaar-nahin-hai/): बस एक तेरे ख़्वाब से इंकार नहीं है दिल वर्ना किसी शय का तलबगार नहीं है, आँखों में हसीं ख़्वाब तो हैं आज भी लेकिन ताबीर से अब कोई सरोकार नहीं है, दरिया से अभी तक है वही रब्त हमारा कश्ती में हमारी कोई पतवार नहीं है, हैरत से नए शहर को मैं देख रहा हूँ दीवार तो है साया ए दीवार नहीं है, इस बज़्म की रौनक़ तो ज़रा ग़ौर से देखो लगता है यहाँ कोई दिल आज़ार नहीं है, आए हो नुमाइश में ज़रा ध्यान भी रखना हर शय जो चमकती है चमकदार नहीं है, क्यूँ इतना हमें - [याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बाद](https://bazmeshayari.com/yaad-karte-ho-mujhe-suraj-nikal-jaane-ke-baad/): याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बाद एक सितारे ने ये पूछा रात ढल जाने के बाद, मैं ज़मीं पर हूँ तो फिर क्यूँ देखता हूँ आसमाँ ? ये ख़याल आया मुझे अक्सर फिसल जाने के बाद, दोस्तों के साथ चलने में भी ख़तरे हैं हज़ार भूल जाता हूँ हमेशा मैं सँभल जाने के बाद, अब ज़रा सा फ़ासला रख कर जलाता हूँ चराग़ तजरबा ये हाथ आया हाथ जल जाने के बाद, वहशत ए दिल को है सहरा से बड़ी निस्बत अजीब कोई घर लौटा नहीं घर से निकल जाने के बाद..!! ~आलम ख़ुर्शीद - [हम को लुत्फ़ आता है अब फ़रेब खाने में](https://bazmeshayari.com/hum-ko-lutf-aata-hai-ab-fareb-khaane-me/): हम को लुत्फ़ आता है अब फ़रेब खाने में आज़माएँ लोगों को ख़ूब आज़माने में, दो घड़ी के साथी को हमसफ़र समझते हैं किस क़दर पुराने हैं हम नए ज़माने में, तेरे पास आने में आधी उम्र गुज़री है आधी उम्र गुज़रेगी तुझ से ऊब जाने में, एहतियात रखने की कोई हद भी होती है भेद हम ने खोले हैं भेद को छुपाने में, ज़िंदगी तमाशा है और इस तमाशे में खेल हम बिगाड़ेंगे खेल को बनाने में..!! ~आलम ख़ुर्शीद - [हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं](https://bazmeshayari.com/haath-pakad-le-ab-bhi-tera-ho-sakta-hoon/): हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं भीड़ बहुत है इस मेले में खो सकता हूँ मैं, पीछे छूटे साथी मुझ को याद आ जाते हैं वर्ना दौड़ में सब से आगे हो सकता हूँ मैं, कब समझेंगे जिन की ख़ातिर फूल बिछाता हूँ राहगुज़र में काँटे भी तो बो सकता हूँ मैं, एक छोटा सा बच्चा मुझ में अब तक ज़िंदा है छोटी छोटी बात पे अब भी रो सकता हूँ मैं, सन्नाटे में दहशत हर पल गूँजा करती है इस जंगल में चैन से कैसे सो सकता हूँ मैं ? सोच समझ कर चट्टानों से - [हमेशा दिल में रहता है कभी गोया नहीं जाता](https://bazmeshayari.com/humesha-dil-me-rahta-hai/): हमेशा दिल में रहता है कभी गोया नहीं जाता जिसे पाया नहीं जाता उसे खोया नहीं जाता, कुछ ऐसे ज़ख़्म हैं जिन को सभी शादाब लगते हैं कुछ ऐसे दाग़ हैं जिन को कभी धोया नहीं जाता, अजब सी गूँज उठती दर ओ दीवार से हरदम ये ख़्वाबों का ख़राबा है यहाँ सोया नहीं जाता, बहुत हँसने की आदत का यही अंजाम होता है कि हम रोना भी चाहें तो कभी रोया नहीं जाता..!! ~आलम ख़ुर्शीद - [ऐसा लगता है समझदार है दुनिया सारी](https://bazmeshayari.com/aisa-lagta-hai-samjhdar-hai-duniya-saari/): ऐसा लगता है समझदार है दुनिया सारी मैं हूँ इस पार तो उस पार है दुनिया सारी, इस नई दौड़ में आगे है न पीछे कोई दाम ए उजलत में गिरफ़्तार है दुनिया सारी, दोस्ती और दिखावे की मोहब्बत करना सब का शेवा है अदाकार है दुनिया सारी, क़ाफ़िले दिल के सर ए आम हैं लूटे जिस ने उसी रहज़न की तलबगार है दुनिया सारी, आप अंदाज़ कुछ अपना तो बदल लेते फ़रोग़ चलिए माना कि ख़तावार है दुनिया सारी..!! ~फ़रोग़ ज़ैदी - [हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है](https://bazmeshayari.com/hungama-hai-kyun-barpa-thodi-see-jo/): हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है, ना तजरबाकारी से वाइज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है ? उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है, ऐ शौक़ वही मय पी ऐ होश ज़रा सो जा मेहमान ए नज़र इस दम इक बर्क़ ए तजल्ली है, वाँ दिल में कि सदमे दो याँ जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है मेरा भी - [आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते](https://bazmeshayari.com/aankhen-mujhe-talwo-se-wo-malne-nahi/): आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते अरमान मेरे दिल के निकलने नहीं देते, ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते सच है कि हमीं दिल को सँभलने नहीं देते, किस नाज़ से कहते हैं वो झुँझला के शब ए वस्ल तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते, परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले क्यूँ हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते, हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़ ए तमन्ना दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते, दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त हम वो हैं कि कुछ - [ऐ मेरी जान तुझे और बदलना होगा](https://bazmeshayari.com/ae-meri-jaan-tujhe-aur-badalna-hoga/): ऐ मेरी जान तुझे और बदलना होगा फिर मेरे साथ कड़ी धूप में चलना होगा, अपने पैरों पे अभी क़र्ज़ ए सफ़र बाक़ी है हद्द ए इमकान से आगे भी निकलना होगा, इस से पहले कि ढले रात नया दिन निकले तेरे ख़्वाबों को मेंरे ख़्वाब में ढलना होगा, इन्क़िलाबात का आग़ाज़ भी होगा लेकिन ले के परचम सर ए बाज़ार निकलना होगा, कामयाबी का यक़ीं दूर न कर दे हम को पास मंज़िल के ज़रा और सँभलना होगा, वादियों में तो किसी ख़्वाब की भटके है फ़रोग़ तुझ को ताबीर के सहरा में भी जलना होगा..!! ~फ़रोग़ ज़ैदी - [इल्म ओ हुनर से क़ौम को रग़बत नहीं रही](https://bazmeshayari.com/ilm-o-hunar-se-qaum-ko-ragbat-nahin/): इल्म ओ हुनर से क़ौम को रग़बत नहीं रही इस पर शिकायतें कि फ़ज़ीलत नहीं रही, बदलेगा क्या निज़ाम कब आएगा इंक़िलाब जब नौजवाँ लहू में हरारत नहीं रही, मज़लूम को दिलाए जो हर ज़ुल्म से नजात ऐसी जहाँ में कोई अदालत नहीं रही, सज्दे में जा के माँगना बे कार नेमतें कुछ भी कहो उसे ये इबादत नहीं रही, फ़तवे लिए हैं शैख़ से पीर ए मुग़ाँ ने ख़ास पीने में अब ज़रा भी क़बाहत नहीं रही, मस्जिद का रुख़ किया है जनाब ए फ़रोग़ ने लगता है अब गुनाह में लज़्ज़त नहीं रही..!! ~फ़रोग़ ज़ैदी - [हुज़ूर हद भी कोई होवे इंतिज़ारी की](https://bazmeshayari.com/huzur-had-bhi-koi-howe-intizari-ki/): हुज़ूर हद भी कोई होवे इंतिज़ारी की कि इंतिहा हुई जावे है बे क़रारी की, न कुछ कहो हो बुलाओ हो और न आओ हो अजीब तर्ज़ है जानाँ वफ़ा शिआरी की, अगर न आना था तुम को तो क्यों किया वादा बहुत ही ख़ूब सज़ा दी है एतिबारी की, शब ए फ़िराक़ तुम्हारा ही रास्ता देखा शब ए फ़िराक़ फ़क़त हम ने आह ओ ज़ारी की, कभी तो होवे सहर भी तुम्हारे क़दमों पर तवील रात बहुत है गुनाह गारी की, जला न देवे कहीं दिल को आतिश ए हसरत ये बुझ न पाई बहुत हम ने अश्क बारी - [ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता](https://bazmeshayari.com/gamza-nahin-hota-ki-ishara-nahin-hota/): ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता आँख उन से जो मिलती है तो क्या क्या नहीं होता जल्वा न हो मानी का तो सूरत का असर क्या बुलबुल गुल ए तस्वीर का शैदा नहीं होता अल्लाह बचाए मरज़ ए इश्क़ से दिल को सुनते हैं कि ये आरिज़ा अच्छा नहीं होता तश्बीह तेरे चेहरे को क्या दूँ गुल ए तर से होता है शगुफ़्ता मगर इतना नहीं होता मैं नज़्अ में हूँ आएँ तो एहसान है उन का लेकिन ये समझ लें कि तमाशा नहीं होता हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम वो क़त्ल भी - [आह जो दिल से निकाली जाएगी](https://bazmeshayari.com/aah-jo-dil-se-nikaali-jayegi/): आह जो दिल से निकाली जाएगी क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी ? इस नज़ाकत पर ये शमशीर ए जफ़ा आप से क्यूँ कर सँभाली जाएगी, क्या ग़म ए दुनिया का डर मुझ रिंद को और एक बोतल चढ़ा ली जाएगी, शैख़ की दावत में मय का काम क्या ? एहतियातन कुछ मँगा ली जाएगी, याद ए अबरू में है अकबर महव यूँ कब तेरी ये कज ख़याली जाएगी..?? ~अकबर इलाहाबादी - [फिरते हैं जिस के वास्ते हम दर ब दर अभी](https://bazmeshayari.com/firte-hai-jis-ke-vaaste-hum-dar-ba-dar/): फिरते हैं जिस के वास्ते हम दर ब दर अभी क्या कीजिए नहीं है उसे कुछ ख़बर अभी, कह दें जो कुछ कि दिल में है अपने अगर अभी शर्मा के धर न देंगे वो काँधे पे सर अभी, थामे हुए हैं हाथों से अपना जिगर सभी सुनते हैं आएगा वो हसीं बाम पर अभी, छेड़ा है उस की ज़ुल्फ़ को बाद ए सबा ने कुछ आएगी रफ़्ता रफ़्ता वो सू ए कमर अभी, यारों को उन के मिल भी गई मंज़िल ए मुराद अकब कि बाँध पाए न रख़्त ए सफ़र अभी..!! ~अकबर अज़ीमाबादी - [हम से आँखें मिलाइए तो कहें](https://bazmeshayari.com/hum-se-aankhen-milaieye-to-kahen/): हम से आँखें मिलाइए तो कहें अपना जल्वा दिखाइए तो कहें, रस्म ही है अगर तो फिर रस्मन रस्म ए उल्फ़त निबाहिइए तो कहें, क्या कहें आप हैं पस ए पर्दा सर ए पर्दा जो आइए तो कहें, दिल है क़ुर्बान पर्दा पोशी पर रुख़ से पर्दा उठाइए तो कहें, दिल में अकबर है जाने क्या क्या कुछ बे हिजाबाना आइए तो कहें..!! ~अकबर अज़ीमाबादी - [दोस्ती का फ़रेब ही खाएँ](https://bazmeshayari.com/dosti-ka-fareb-hi-khaaye-aao-kagaz-ki/): दोस्ती का फ़रेब ही खाएँ आओ काग़ज़ की नाव तैराएँ, हम अगर रहरवी का अज़्म करें मंज़िलें खिंच के ख़ुद चली आएँ, हम को आमादा ए सफ़र न करो रास्ते पुरख़तर न हो जाएँ, हमसफ़र रह गए बहुत पीछे आओ कुछ देर को ठहर जाएँ, मुतरिबा ऐसा गीत छेड़ कि हम ज़िंदगी के क़रीब हो जाएँ, इन बहारों की आबरू रख लो मुस्कुराओ कि फूल खिल जाएँ गेसू ए ज़ीस्त के ये उलझाओ आओ मिल कर शकेब सुलझाएँ..!! ~शकेब जलाली - [आया है हर चढ़ाई के बाद एक उतार भी](https://bazmeshayari.com/aaya-hai-har-chadhaai-ke-baad-ek-uttar-bhi/): आया है हर चढ़ाई के बाद एक उतार भी पस्ती से हम कनार मिले कोहसार भी, आख़िर को थक के बैठ गई एक मक़ाम पर कुछ दूर मेरे साथ चली रहगुज़ार भी, दिल क्यूँ धड़कने लगता है उभरे जो कोई चाप अब तो नहीं किसी का मुझे इंतिज़ार भी, जब भी सुकूत ए शाम में आया तेरा ख़याल कुछ देर को ठहर सा गया आबशार भी, कुछ हो गया है धूप से ख़ाकिस्तरी बदन कुछ जम गया है राह का मुझ पर ग़ुबार भी, इस फ़ासलों के दश्त में रहबर वही बने जिस की निगाह देख ले सदियों के पार - [नक़ाब ए रुख़ उठाया जा रहा है](https://bazmeshayari.com/naqab-e-rookh-uthaya-jaa-raha-hai/): नक़ाब ए रुख़ उठाया जा रहा है घटा में चाँद आया जा रहा है, ज़माने की निगाहों में समो कर मुझे दिल से भुलाया जा रहा है, कहाँ का जाम जब याँ ज़ौक़ ए मस्ती निगाहों से पिलाया जा रहा है, अभी अरमान कुछ बाक़ी हैं दिल में मुझे फिर आज़माया जा रहा है, पिला कर फिर शराब ए हुस्न ओ जल्वा मुझे बे ख़ुद बनाया जा रहा है, सलामत आप का जौर ए मुसलसल मेरे दिल को दुखाया जा रहा है, शकेब अब वो तसव्वुर में न आएँ कलेजा मुँह को आया जा रहा है..!! ~शकेब जलाली - [एक उम्र गुजारी है जिसके साये में](https://bazmeshayari.com/ek-umr-guzari-hai-jiske-saaye-me/): जब से वो मुझे भुलाये जा रही है कोई बला मेरा दिल खाए जा रही है, एक उम्र गुजारी है जिसके साये में कैसे गुज़रेगी अब वो हाय जा रही है, उसे अपने दुःख सुनाने आया था मगर वो है कि अपने दुःख सुनाये जा रही है, मैं अचानक जवान से बूढ़ा हो रहा हूँ मोहब्बत मुझे क्या रोग लगाए जा रही है, रोज़ ही कोशिश करता हूँ मुस्कुराने की ज़िन्दगी मेरी रोज़ मुँह बनाये जा रही है..!! - [ये दिल बे इख़्तियार ओ बे इरादा खेलता रहता है](https://bazmeshayari.com/ye-dil-be-ikhtiyar-o-be-irada-khelta-rahta-hai/): ये दिल बे इख़्तियार ओ बे इरादा खेलता रहता है ख़िरद के हुक्म पर दिल की इताअत कौन करता है ? मोहब्बत काम दीवानों का, मजनूँ की रिवायत है ख़िरद से पूछिए, ऐसी खुराफ़ात कौन करता है ? वफ़ा की जुस्तज़ू में ज़ख्म खा कर भी मुस्कुराता है अंधेरों में चिरागों की हिफाज़त कौन करता है ? मतलबी दुनियाँ फ़ायदे के नाम पर रिश्ते बनाती है खुलुस दिल से रिश्तों की सदाक़त कौन करता है ? अगरचे बेवफ़ा लाखों हों फिर भी ये सवाल उठता है हकीक़त जान कर भी ऐसी हिमाक़त कौन करता है..?? ~नवाब ए हिन्द - [फ़लक पे चाँद के हाले भी सोग करते हैं](https://bazmeshayari.com/falaq-pe-chaand-ke-haale-bhi-sog-karte-hain/): फ़लक पे चाँद के हाले भी सोग करते हैं जो तू नहीं तो उजाले भी सोग करते हैं, तुम्हारे हाथ की चूड़ी भी बैन करती है हमारे होंठ के ताले भी सोग करते हैं, नगर नगर में वो बिखरे हैं ज़ुल्म के मंज़र हमारी रूह के छाले भी सोग करते हैं, उसे कहो कि सितम में वो कुछ कमी कर दे कि ज़ुल्म तोड़ने वाले भी सोग करते हैं, तुम अपने दुख पे अकेले नहीं हो अफ़्सुर्दा तुम्हारे चाहने वाले भी सोग करते हैं..!! ~वसी शाह - [दिल होश से बेगाना बेगाने को क्या कहिए](https://bazmeshayari.com/dil-hosh-se-begana-begane-ko-kya/): दिल होश से बेगाना बेगाने को क्या कहिए चुप रहना ही बेहतर है दीवाने को क्या कहिए कुछ भी तो नहीं देखा और कूच की तैयारी यूँ आने से क्या हासिल यूँ जाने को क्या कहिए मजबूर हैं सब अपनी उफ़्ताद तबीअत से हो शम्अ से क्या शिकवा परवाने को क्या कहिए तुझ से ही मरासिम हैं तुझ से ही गिला होगा बेगाने से क्या लेना बेगाने को क्या कहिए माना कि वसी शाह से तुम को हैं बहुत शिकवे दीवाना है दीवाना दीवाने को क्या कहिए..!! ~वसी शाह - [मेरी आँखों के समुंदर में जलन कैसी है](https://bazmeshayari.com/meri-aankhon-ke-samndar-me-jalan-kaisi-hai/): मेरी आँखों के समुंदर में जलन कैसी है आज फिर दिल को तड़पने की लगन कैसी है ? अब किसी छत पे चराग़ों की क़तारें भी नहीं अब तेरे शहर की गलियों में घुटन कैसी है ? बर्फ़ के रूप में ढल जाएँगे सारे रिश्ते मुझ से पूछो कि मोहब्बत की अगन कैसी है ? मैं तेरे वस्ल की ख़्वाहिश को न मरने दूँगा मौसम ए हिज्र के लहजे में थकन कैसी है ? रेगज़ारों में जो बनती रही काँटों की रिदा इस की मजबूर सी आँखों में करन कैसी है ? मुझे मासूम सी लड़की पे तरस आता है - [कैसा मफ़्तूह सा मंज़र है कई सदियों से](https://bazmeshayari.com/kaisa-maftooh-saa-manzar-hai/): कैसा मफ़्तूह सा मंज़र है कई सदियों से मेरे क़दमों पे मेरा सर है कई सदियों से, ख़ौफ़ रहता है न सैलाब कहीं ले जाए मेरी पलकों पे तेरा घर है कई सदियों से, अश्क आँखों में सुलगते हुए सो जाते हैं ये मेरी आँख जो बंजर है कई सदियों से, कौन कहता है मुलाक़ात मेरी आज की है तू मेरी रूह के अंदर है कई सदियों से, मैं ने जिस के लिए हर शख़्स को नाराज़ किया रूठ जाए न यही डर है कई सदियों से, उस को आदत है जड़ें काटते रहने की वसी जो मेरी ज़ात का - [किस क़दर ज़ुल्म ढाया करते थे](https://bazmeshayari.com/kis-qadar-zulm-dhaya-karte-the/): किस क़दर ज़ुल्म ढाया करते थे ये जो तुम भूल जाया करते थे, किस का अब हाथ रख के सीने पर दिल की धड़कन सुनाया करते थे, हम जहाँ चाय पीने जाते थे क्या वहाँ अब भी आया करते थे ? कौन है अब कि जिस के चेहरे पर अपनी पलकों का साया करते थे ? क्यों मेरे दिल में रख नहीं देते किस लिए ग़म उठाया करते थे ? फ़ोन पर गीत जो सुनाते थे अब वो किस को सुनाया करते थे ? आख़िरी में इस को लिखा है तुम मुझे याद आया करते थे, किस क़दर ज़ुल्म ढाया - [ज़िहानतों को कहाँ कर्ब से फ़रार मिला](https://bazmeshayari.com/zihanto-ko-kahan-karb-se-farar-mila/): ज़िहानतों को कहाँ कर्ब से फ़रार मिला जिसे निगाह मिली उस को इंतिज़ार मिला, वो कोई राह का पत्थर हो या हसीं मंज़र जहाँ भी रास्ता ठहरा वहीं मज़ार मिला, कोई पुकार रहा था खुली फ़ज़ाओं से नज़र उठाई तो चारों तरफ़ हिसार मिला, हर एक साँस न जाने थी जुस्तुजू किस की हर एक दयार मुसाफ़िर को बे दयार मिला, ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोई जो आदमी भी मिला बन के इश्तिहार मिला..!! ~निदा फ़ाज़ली - [मेरी तेरी दूरियाँ हैं अब इबादत के ख़िलाफ़](https://bazmeshayari.com/meri-teri-dooriyan-hai-ab-ibadat-ke-khilaf/): मेरी तेरी दूरियाँ हैं अब इबादत के ख़िलाफ़ हर तरफ़ है फ़ौज आराई मोहब्बत के ख़िलाफ़, हर्फ़ ए सरमद ख़ून ए दारा के अलावा शहर में कौन है जो सर उठाए बादशाहत के ख़िलाफ़, पहले जैसा ही दुखी है आज भी बूढ़ा कबीर कोई आयत का मुख़ालिफ़ कोई मूरत के ख़िलाफ़, मैं भी चुप हूँ तू भी चुप है बात ये सच है मगर हो रहा है जो भी वो तो है तबीअत के ख़िलाफ़, मुद्दतों के बाद देखा था उसे अच्छा लगा देर तक हँसता रहा वो अपनी आदत के ख़िलाफ़..!! ~निदा फ़ाज़ली - [ठहरे जो कहीं आँख तमाशा नज़र आए](https://bazmeshayari.com/thahare-jo-kahin-aankh-tamasha-nazar-aaye/): ठहरे जो कहीं आँख तमाशा नज़र आए सूरज में धुआँ चाँद में सहरा नज़र आए, रफ़्तार से ताबिंदा उमीदों के झरोके ठहरूँ तो हर एक सम्त अँधेरा नज़र आए, साँचों में ढले क़हक़हे सोची हुई बातें हर शख़्स के काँधों पे जनाज़ा नज़र आए, हर राहगुज़र रास्ता भूला हुआ बालक हर हाथ में मिट्टी का खिलौना नज़र आए, खोई हैं अभी मैं के धुँदलकों में निगाहें हट जाए ये दीवार तो दुनिया नज़र आए, जिस से भी मिलें झुक के मिलें हँस के हों रुख़्सत अख़्लाक़ भी इस शहर में पेशा नज़र आए..!! ~निदा फ़ाज़ली - [तलाश कर न ज़मीं आसमान से बाहर](https://bazmeshayari.com/talash-kar-na-zamin-aasmaan-se-bahar-nahi-hai/): तलाश कर न ज़मीं आसमान से बाहर नहीं है राह कोई इस मकान से बाहर, बस एक दो ही क़दम और थे सफ़र वाले थकान देख न पाई थकान से बाहर, निसाब दर्जा ब दर्जा यूँ ही बदलता है हुआ न कोई भी इस इम्तिहान से बाहर, उसी की जुस्तुजू अक्सर उदास करती है वो एक जहान जो है हर जहान से बाहर, नमाज़ियों से कहो देखें चाँद सूरज को निकल रहे हैं मुअज़्ज़िन अज़ान से बाहर..!! ~निदा फ़ाज़ली - [दुआ सलाम में लिपटी ज़रूरतें माँगे](https://bazmeshayari.com/duaa-salam-me-lipti-zaruraten-maange/): दुआ सलाम में लिपटी ज़रूरतें माँगे क़दम क़दम पे ये बस्ती तिजारतें माँगे, कहाँ हर एक को आती है रास बर्बादी नए सफ़र की मसाफ़त ज़िहानतें माँगे, चमकते कपड़े महकता ख़ुलूस पुख़्ता मकाँ हर एक बज़्म में इज़्ज़त हिफ़ाज़तें माँगे, कोई धमाका कोई चीख़ कोई हंगामा लहू बदन का लहू की शबाहतें माँगे, कोई न हो मेरे तेरे अलावा बस्ती में कभी कभी यही जज़्बा रिक़ाबतें माँगे..!! ~निदा फ़ाज़ली - [हुए सब के जहाँ में एक जब अपना जहाँ और हम](https://bazmeshayari.com/hue-sab-ke-jahan-me-ek-jab-apana-jahan/): हुए सब के जहाँ में एक जब अपना जहाँ और हम मुसलसल लड़ते रहते हैं ज़मीन ओ आसमाँ और हम, कभी आकाश के तारे ज़मीं पर बोलते भी थे कभी ऐसा भी था जब साथ थीं तन्हाइयाँ और हम, सभी एक दूसरे के दुख में सुख में रोते हँसते थे कभी थे एक घर के चाँद सूरज नदियाँ और हम, मोअर्रिख़ की क़लम के चंद लफ़्ज़ों सी है ये दुनिया बदलती है हर एक युग में हमारी दास्ताँ और हम, दरख़्तों को हरा रखने के ज़िम्मेदार थे दोनों जो सच पूछो बराबर के हैं मुजरिम बाग़बाँ और हम..!! ~निदा फ़ाज़ली - [जो कल हैरान थे उन को परेशाँ कर के छोड़ूँगा](https://bazmeshayari.com/jo-kal-hairaan-the-un-ko-pareshan-kar-ke/): जो कल हैरान थे उन को परेशाँ कर के छोड़ूँगा मैं अब आईना ए हस्ती को हैराँ कर के छोड़ूँगा, दिखा दूँगा तमाशा दी अगर फ़ुर्सत ज़माने ने तमाशाए ए फ़रावाँ को फ़रावाँ कर के छोड़ूँगा, किया था इश्क़ ने ताराज जिस सेहन ए गुलिस्ताँ को मैं अब उस पर मोहब्बत को निगहबाँ कर के छोड़ूँगा, अयाँ है जो हर इक ज़र्रे में हर ख़ुर्शीद में अजमल मैं उस पर्दानशीं को अब नुमायाँ कर के छोड़ूँगा..!! ~अजमल सिराज - [शाम अपनी बेमज़ा जाती है रोज़](https://bazmeshayari.com/shaam-apni-bemaza-jaati-hai-roz/): शाम अपनी बेमज़ा जाती है रोज़ और सितम ये है कि आ जाती है रोज़, कोई दिन आसाँ नहीं जाता मेरा कोई मुश्किल आज़मा जाती है रोज़, मुझ से पूछे कोई क्या है ज़िंदगी मेरे सर से ये बला जाती है रोज़, जाने किस की सुर्ख़रूई के लिए ख़ूँ में ये धरती नहा जाती है रोज़, गीत गाते हैं परिंदे सुब्ह ओ शाम या समाअत चहचहा जाती है रोज़, देखने वालों को अजमल ज़िंदगी रंग कितने ही दिखा जाती है रोज़..!! ~अजमल सिराज - [मैं वो दरख़्त हूँ खाता है जो भी फल मेरे](https://bazmeshayari.com/main-wo-darakht-hoon-jo-bhi-fal-mere/): मैं वो दरख़्त हूँ खाता है जो भी फल मेरे ज़रूर मुझ से ये कहता है साथ चल मेरे, ये काइनात तसर्रुफ़ में थी रहे जब तक नज़र बुलंद मेरी फ़ैसले अटल मेरे, मुझे न देख मेरी बात सुन कि मुझ से हैं कहीं कहीं मुतसादिम भी कुछ अमल मेरे, बचा ही क्या हूँ मैं आवाज़ रह गया हूँ फ़क़त चुरा के रंग तो सब ले गई ग़ज़ल मेरे, ये तब की बात है जब तुम से राब्ता भी न था अभी हुए न थे अशआर मुब्तज़ल मेरे, ये ख़ौफ़ मुझ को उड़ाता है वक़्त के मानिंद कि बैठने से - [पेश जो आया सर ए साहिल ए शब बतलाया](https://bazmeshayari.com/pesh-aaya-sar-e-sahil-e-shab-batlaya/): पेश जो आया सर ए साहिल ए शब बतलाया मौज ए ग़म को भी मगर मौज ए तरब बतलाया, है बताने की कोई चीज़ भला नाम ओ नसब हम ने पूछा न कभी नाम ओ नसब बतलाया, रंग महफ़िल का अजब हो गया जिस दम उस ने ख़ामुशी को भी मेरी हुस्न ए तलब बतलाया, दिल को दुनिया से सरोकार कभी था ही नहीं आँख ने भी मगर इस रुख़ को अजब बतलाया, ये उदासी का सबब पूछने वाले अजमल क्या करेंगे जो उदासी का सबब बतलाया..!! ~अजमल सिराज - [हर नई शाम सुहानी तो नहीं होती है](https://bazmeshayari.com/har-nayi-shaam-suhani-to-nahi-hoti/): हर नई शाम सुहानी तो नहीं होती है और हर उम्र जवानी तो नहीं होती है, तुम ने एहसान किया था सो जताया तुम ने जो मोहब्बत हो जतानी तो नहीं होती है, दोस्तो सच कहो कब दिल को क़रार आएगा हर घड़ी आस बँधानी तो नहीं होती है, दिल में जो आग लगी है वो लगी रहने दे यार हर आग बुझानी तो नहीं होती है, जब भी मिलते हैं चटक उठते हैं कलियों की तरह दोस्ती हो तो पुरानी तो नहीं होती है, बारहा उस की गली से ये गुज़र कर सोचा हर गली छोड़ के जानी तो - [किसी की क़ैद से आज़ाद हो के रह गए हैं](https://bazmeshayari.com/kisi-ki-qaid-se-aazad-ho-ke-rah-gaye-hai/): किसी की क़ैद से आज़ाद हो के रह गए हैं तबाह हो गए बर्बाद हो के रह गए हैं, अब और क्या हो तमन्ना ए वस्ल का अंजाम दिल ओ दिमाग़ तेरी याद हो के रह गए हैं, कहें तो क़िस्सा ए अहवाल मुख़्तसर ये है हम अपने इश्क़ की रूदाद हो के रह गए हैं, किसी की याद दिलों का क़रार ठहरी है किसी के ज़िक्र से दिल शाद हो के रह गए हैं, तेरे हुज़ूर जो रश्क ए बहार थे अजमल ख़राब ओ ख़्वार तेरे बाद हो के रह गए हैं..!! ~अजमल सिराज - [सुनी है चाप बहुत वक़्त के गुज़रने की](https://bazmeshayari.com/suni-hai-chaap-bahut-waqt-ke-gujrne-kee/): सुनी है चाप बहुत वक़्त के गुज़रने की मगर ये ज़ख़्म कि हसरत है जिस के भरने की, हमारे सर पे तो ये आसमान टूट पड़ा घड़ी जब आई सितारों से माँग भरने की, गिरह में दाम तो रखते हैं ज़हर खाने को ये और बात कि फ़ुर्सत नहीं है मरने की, बहुत मलाल है तुझ को न देख पाने का बहुत ख़ुशी है तेरी राह से गुज़रने की, बताओ तुम से कहाँ राब्ता किया जाए ? कभी जो तुम से ज़रूरत हो बात करने की..!! ~अजमल सिराज - [घूम फिर कर इसी कूचे की तरफ़ आएँगे](https://bazmeshayari.com/ghoom-fir-kar-isi-kooche-kee-taraf/): घूम फिर कर इसी कूचे की तरफ़ आएँगे दिल से निकले भी अगर हम तो कहाँ जाएँगे ? हम को मालूम था ये वक़्त भी आ जाएगा हाँ मगर ये नहीं सोचा था कि पछताएँगे, ये भी तय है कि जो बोएँगे वो काटेंगे यहाँ और ये भी कि जो खोएँगे वही पाएँगे, कभी फ़ुर्सत से मिलो तो तुम्हें तफ़्सील के साथ इम्तियाज़ ए हवस ओ इश्क़ भी समझाएँगे, कह चुके हम हमें इतना ही फ़क़त कहना था आप फ़रमाइए कुछ आप भी फ़रमाएँगे ? एक दिन ख़ुद को नज़र आएँगे हम भी अजमल एक दिन अपनी ही आवाज़ से - [किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है](https://bazmeshayari.com/kisi-ke-hizr-me-jina-muhal-ho-gaya/): किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है किसे बताएँ हमारा जो हाल हो गया है ? कहीं गिरा है न रौंदा गया है दिल फिर भी शिकस्ता हो गया है पाएमाल हो गया है, सहर जो आई है शब के तमाम होने पर तो इस में कौन सा ऐसा कमाल हो गया है ? कोई भी चीज़ सलामत नहीं मगर ये दिल शिकस्तगी में जो अपनी मिसाल हो गया है, उधर चराग़ जले हैं किसी दरीचे में इधर वज़ीफ़ा ए दिल भी बहाल हो गया है, हया का रंग जो आया है उस के चेहरे पर ये रंग - [फ़ाएदा क्या है हमें और ख़सारा क्या है](https://bazmeshayari.com/fayada-kya-hai-hame-aur-khasaara-kya-hai/): फ़ाएदा क्या है हमें और ख़सारा क्या है जो भी है आप का सब कुछ है हमारा क्या है ? हम ने कुछ ऐसी बना रखी है हालत अपनी पूछता कोई नहीं हाल तुम्हारा क्या है ? कुछ नहीं देखते कुछ भी हो तेरे दीवाने देखते हैं तेरी जानिब से इशारा क्या है ? दूर से जो नज़र आता है सितारे जैसा अश्क ए महताब है या कोई शरारा क्या है ? जिस्म पर वार किया और उसे ढेर किया हम को मारा है क़ज़ा ने वले मारा क्या है ? ख़त्म हो जाएगा जब खेल तो खुल जाएगा कोई - [निकल पड़े हैं सनम रात के शिवाले से](https://bazmeshayari.com/nikal-pade-hain-sanam-raat-ke/): निकल पड़े हैं सनम रात के शिवाले से कुछ आज शहर ए ग़रीबाँ में हैं उजाले से, चलो पलट भी चलें अपने मयकदे की तरफ़ ये आ गए किस अंधेरे में हम उजाले से ? ख़ुदा करे कि बिखर जाएँ मेरे शानों पर सँवर रहे हैं ये बादल जो काले काले से, बुतों की ख़ल्वत ए रंगीं में बज़्म ए अंजुम में कहाँ कहाँ न गए हम तेरे हवाले से, जुनूँ की वादी ए आज़ाद में तलब कर लो निकाल लो हमें शाम ओ सहर के हाले से, हयात ए अस्र मुझे फेर दे मेरा माज़ी हसीन था वो अंधेरा - [बचाओ दामन ए दिल ऐसे हमनशीनों से](https://bazmeshayari.com/bachaao-daaman-e-dil-aise-hamnashino-se/): बचाओ दामन ए दिल ऐसे हमनशीनों से मिला के हाथ जो डसते हैं आस्तीनों से, निगार ए वक़्त को इतना तो पैरहन दे दो छुपा ले दीदा ए पुरनम को आस्तीनों से, हमारी फ़िक्र अमानत है सुब्ह ए फ़र्दा की समाँ है दूर का देखो न ख़ुर्दबीनों से, अब अपने ज़ख़्म ए जबीं को छुपा भी ले ऐ दिल टपक रहा है पसीना कई जबीनों से, तुझे हवा ए मुख़ालिफ़ जगा दिया किस ने ? बहुत क़रीब था साहिल कई सफ़ीनों से, न जाने मुजरिम ए ज़ौक़ ए नज़र पे क्या गुज़री भरी थी राह ए तमाशा तमाशबीनों से, सुकूत - [पी ले जो लहू दिल का वो इश्क़ की मस्ती है](https://bazmeshayari.com/pee-le-jo-lahoo-dil-ka-wo-ishq/): पी ले जो लहू दिल का वो इश्क़ की मस्ती है क्या मस्त है ये नागन अपने ही को डसती है, मयख़ाने के साए में रहने दे मुझे साक़ी मयख़ाने के बाहर तो एक आग बरसती है, ऐ ज़ुल्फ़ ए ग़म ए जानाँ तू छाँव घनी कर दे रह रह के जगाता है शायद ग़म ए हस्ती है, ढलते हैं यहाँ शीशे चलते हैं यहाँ पत्थर दीवानो ठहर जाओ सहरा नहीं बस्ती है, जिन फूलों के झुरमुट में रहते थे शमीम एक दिन उन फूलों की ख़ुशबू को अब रूह तरसती है..!! ~शमीम करहानी - [वो मुस्कुरा के जिधर से निकल गए होंगे](https://bazmeshayari.com/wo-muskura-ke-jidhar-se-nikal-gaye/): वो मुस्कुरा के जिधर से निकल गए होंगे निगाह ए शौक़ में आँसू मचल गए होंगे, गुज़र के होश की मंज़िल से तेरे दीवाने जुनूँ की हद से भी आगे निकल गए होंगे, बुतान ए दहर के वादे ग़लत सही लेकिन हज़ार हा दिल ए नादाँ बहल गए होंगे, जो हमसफ़र सर ए मंज़िल नज़र नहीं आते जुनून ए शौक़ में आगे निकल गए होंगे, शब ए फ़िराक़ से घबरा गए थे दीवाने तलाश ए सुब्ह से घर से निकल गए होंगे, एक इंक़लाब से आलम गुज़र रहा है शमीम मुझे यक़ीन है वो भी बदल गए होंगे..!! ~शमीम करहानी - [ज़हर को मय दिल ए सद पारा को मीना न कहो](https://bazmeshayari.com/zahar-ko-may-dil-e-sad-paara-ko/): ज़हर को मय दिल ए सद पारा को मीना न कहो दौर ऐसा है कि पीने को भी पीना न कहो, न बताओ कि तबस्सुम भी है एक ज़ख़्म का नाम चाक है किस लिए इंसान का सीना न कहो, कम निगाहों का है फ़रमान कि ऐ दीदावरो किस लिए तुम को मिला दीदा ए बीना न कहो, रख दो इल्ज़ाम किसी मौजा ए मासूम के सर ना ख़ुदाओं ने डुबोया है सफ़ीना न कहो, हर नफ़स मौत की बख़्शी हुई मोहलत जैसे कोई जीना है ये जीना इसे जीना न कहो, ये तो फ़नकार की मेहनत का सिला है - [क्या क्या लोग ख़ुशी से अपनी बिकने पर तैयार हुए](https://bazmeshayari.com/kya-kya-log-khushi-se-apni-bikne-par/): क्या क्या लोग ख़ुशी से अपनी बिकने पर तैयार हुए एक हमीं दीवाने निकले हम ही यहाँ पर ख़्वार हुए, प्यार के बंधन ख़ून के रिश्ते टूट गए ख़्वाबों की तरह जागती आँखें देख रही थीं क्या क्या कारोबार हुए ? आप वो स्याने रस्ते के हर पत्थर को बुत मान लिया हम वो पागल अपनी राह में आप ही ख़ुद दीवार हुए, अपनी अपनी जगह पर दोनों बेबस भी मसरूर भी हैं तुम तहरीर ए संग हुए हम भूला हुआ इक़रार हुए, आने वाली सुब्ह गिनेगी रात के अंधे तूफ़ाँ में कितने साहिल ही पर डूबे कितने भँवर के - [जाने क्या देखा था मैं ने ख़्वाब में](https://bazmeshayari.com/jaane-kya-dekha-tha-main-ne-khwab-me/): जाने क्या देखा था मैं ने ख़्वाब में फँस गया फिर जिस्म के गिर्दाब में, तेरा क्या तू तो बरस के खुल गया मेरा सब कुछ बह गया सैलाब में, मेरी आँखों का भी हिस्सा है बहुत तेरे इस चेहरे की आब ओ ताब में, तुझ में और मुझ में तअल्लुक़ है वही है जो रिश्ता साज़ और मिज़राब में, मेरा वादा है कि सारी ज़िंदगी तुझ से मैं मिलता रहूँगा ख़्वाब में..!! ~बशर नवाज़ - [हर नई रुत में नया होता है मंज़र मेरा](https://bazmeshayari.com/har-nayi-rut-me-naya-hota-hai/): हर नई रुत में नया होता है मंज़र मेरा एक पैकर में कहाँ क़ैद है पैकर मेरा, मैं कहाँ जाऊँ कि पहचान सके कोई मुझे अजनबी मान के चलता है मुझे घर मेरा, जैसे दुश्मन ही नहीं कोई मेरा अपने सिवा लौट आता है मेरी सम्त ही पत्थर मेरा, जो भी आता है वही दिल में समा जाता है कितने दरियाओं का प्यासा है समुंदर मेरा, तू वो महताब तकें राह उजाले तेरी मैं वो सूरज कि अंधेरा है मुक़द्दर मेरा..!! ~बशर नवाज़ - [आहट पे कान दर पे नज़र इस तरह न थी](https://bazmeshayari.com/aahat-pe-kaan-dar-pe-nazar-is-tarah/): आहट पे कान दर पे नज़र इस तरह न थी एक एक पल की हम को ख़बर इस तरह न थी, था दिल में दर्द पहले भी लेकिन न इस क़दर वीराँ तो थी हयात मगर इस तरह न थी, हर एक मोड़ मक़्तल ए अरमान ओ आरज़ू पहले तो तेरी राहगुज़र इस तरह न थी, जब तक सबा ने छेड़ा न था निकहत ए गुलाब कूचा ब कूचा महव ए सफ़र इस तरह न थी, बरसों में पहले होती थी नम आस्तीं कभी अर्ज़ां मता ए दीदा ए तर इस तरह न थी..!! ~बशर नवाज़ - [ये कामयाबियाँ इज़्ज़त ये नाम तुम से है](https://bazmeshayari.com/ye-kaamyabiyan-izzat-ye-naam-tum-se-hai/): ये कामयाबियाँ इज़्ज़त ये नाम तुम से है ऐ मेरी माँ मेरा सारा मक़ाम तुम से है, तुम्हारे दम से हैं मेरे लहू में खिलते गुलाब मेरे वजूद का सारा निज़ाम तुम से है, गली गली में जो आवारा फिर रहा होता जहान भर में वही नेक नाम तुम से है, कहाँ बिसात ए जहाँ और मैं कमसिन ओ नादाँ ये मेरी जीत का सब एहतिमाम तुम से है, जहाँ जहाँ है मेरी दुश्मनी सबब मैं हूँ जहाँ जहाँ है मेरा एहतिराम तुम से है, ऐ मेरी माँ मुझे हरपल रहे तुम्हारा ख़याल तुम ही से सुब्ह मेरी मेरी शाम - [अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन आज़ाद है](https://bazmeshayari.com/ab-koi-gulshan-na-ujde-ab-watan/): अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन आज़ाद है रूह गंगा की हिमाला का बदन आज़ाद है, खेतियाँ सोना उगाएँ वादियाँ मोती लुटाएँ आज गौतम की ज़मीं तुलसी का बन आज़ाद है, मंदिरों में संख बाजे मस्जिदों में हो अज़ाँ शैख़ का धर्म और दीन ए बरहमन आज़ाद है, लूट कैसी भी हो अब इस देश में रहने न पाए आज सब के वास्ते धरती का धन आज़ाद है..!! ~साहिर लुधियानवी - [ख़त के छोटे से तराशे में नहीं आएँगे](https://bazmeshayari.com/khat-ke-chhote-se-tarashe-me-nahi/): ख़त के छोटे से तराशे में नहीं आएँगे ग़म ज़ियादा हैं लिफ़ाफ़े में नहीं आएँगे, हम न मजनूँ हैं न फ़रहाद के कुछ लगते हैं हम किसी दश्त तमाशे में नहीं आएँगे, मुख़्तसर वक़्त में ये बात नहीं हो सकती दर्द इतने हैं ख़ुलासे में नहीं आएँगे, उस की कुछ ख़ैर ख़बर हो तो बताओ यारो हम किसी और दिलासे में नहीं आएँगे, जिस तरह आप ने बीमार से रुख़्सत ली है साफ़ लगता है जनाज़े में नहीं आएँगे..!! ~ख़ालिद नदीम शानी - [तुम्हारा हिज्र मनाया तो मैं अकेला था](https://bazmeshayari.com/tumhara-hizr-manaya-to-main/): तुम्हारा हिज्र मनाया तो मैं अकेला था जुनूँ ने हश्र उठाया तो मैं अकेला था, ये मेरी अपनी दुआएँ जिन्हों ने रद्द हो कर गले से मुझ को लगाया तो मैं अकेला था, दयार ए ख़्वाब था तुम थे तमाम दुनिया थी किसी ने आ के जगाया तो मैं अकेला था, कोई हुसैनी न निकला मेरे रफ़ीक़ों में दिया बुझा के जलाया तो मैं अकेला था, तुम्हारा हाथ नहीं था वो मौज ए गिर्या थी मेरी समझ में जब आया तो मैं अकेला था, तुम्हारे लम्स की ख़ुशबू फ़रेब निकली है बदन ने हश्र उठाया तो मैं अकेला था, कहाँ - [कह गया हूँ जो मैं रवानी में](https://bazmeshayari.com/kah-gaya-hoon-jo-main/): कह गया हूँ जो मैं रवानी में वो तो शामिल न था कहानी में, कोई लग़्ज़िश गुनाह तौबा कर नेक बच्चा था मैं जवानी में, रंग काला भी उस पे जचता है पर जो लगती है आसमानी में, पाँव दरिया में डाल कर बोली ऐसे लगती है आग पानी में, मैं अगर ख़ुद को मार डालूँ तो क्या बचेगा तेरी कहानी में..?? ~ख़ालिद नदीम शानी - [अदाएँ तुम बना लेना इशारे मैं बनाऊँगा](https://bazmeshayari.com/adaayen-tum-bana-lena-ishaare-main/): अदाएँ तुम बना लेना इशारे मैं बनाऊँगा तुम्हारे फूल जज़्बों को शरारे मैं बनाऊँगा, तुम्हारा साथ शामिल है तो फिर तुम देखते जाओ ज़मीन ओ आसमाँ के अब किनारे मैं बनाऊँगा, अगर तुम फ़ैसला कर लो मोहब्बत ओढ़ लेने का तो फिर उस शाल के ऊपर सितारे मैं बनाऊँगा, तुम्हारा काम इतना है फ़क़त काजल लगा लेना तुम्हारी आँख की ख़ातिर नज़ारे मैं बनाऊँगा, तुम्हें बस मुस्कुराना है तुम्हें बस गुनगुनाना है मोहब्बत के लिए नग़्मे तो सारे मैं बनाऊँगा, अगर उस की ये ख़्वाहिश हो कि जू ए शीर लाज़िम है फ़क़त इक बार ख़ालिद वो पुकारे मैं बनाऊँगा..!! - [दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं](https://bazmeshayari.com/dil-me-ab-yun-tere-bhule-hue/): दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं जैसे बिछड़े हुए काबे में सनम आते हैं, एक एक कर के हुए जाते हैं तारे रौशन मेरी मंज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं, रक़्स ए मय तेज़ करो साज़ की लय तेज़ करो सू ए मयख़ाना सफ़ीरान ए हरम आते हैं, कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग़ वो तो जब आते हैं माइल ब करम आते हैं, और कुछ देर न गुज़रे शब ए फ़ुर्क़त से कहो दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं..!! ~फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - [तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं](https://bazmeshayari.com/tumhari-yaad-ke-jab-zakhm-bharne/): तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं, हदीस ए यार के उनवाँ निखरने लगते हैं तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं, हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं, सबा से करते हैं ग़ुर्बत नसीब ज़िक्र ए वतन तो चश्म ए सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं, वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़ियागरी फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं, दर ए क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है तो फ़ैज़ दिल में सितारे उतरने लगते - [कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं](https://bazmeshayari.com/kab-yaad-me-tera-sath-nahin/): कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं सद शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं, मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँ दिल वालो कूचा ए जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं ? जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है ये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं, मैदान ए वफ़ा दरबार नहीं याँ नाम ओ नसब की पूछ कहाँ आशिक़ तो किसी का नाम नहीं कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं, गर बाज़ी इश्क़ की - [किसी और ग़म में इतनी ख़लिश ए निहाँ नहीं है](https://bazmeshayari.com/kisi-aur-gam-me-itni-khalish-e-nihan/): किसी और ग़म में इतनी ख़लिश ए निहाँ नहीं है ग़म ए दिल मेरे रफ़ीक़ो ग़म ए राएगाँ नहीं है, कोई हम नफ़स नहीं है कोई राज़ दाँ नहीं है फ़क़त एक दिल था अब तक सो वो मेहरबाँ नहीं है, मेरी रूह की हक़ीक़त मेरे आँसुओं से पूछो मेरा मज्लिसी तबस्सुम मेरा तर्जुमाँ नहीं है, किसी ज़ुल्फ़ को सदा दो किसी आँख को पुकारो बड़ी धूप पड़ रही है कोई साएबाँ नहीं है, इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर आ सको तो आओ मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशाँ नहीं है..!! ~मुस्तफ़ा ज़ैदी - [आँधी चली तो नक़्श ए कफ़ ए पा नहीं मिला](https://bazmeshayari.com/aandhi-chali-to-naksh-e-qaf-e-paa/): आँधी चली तो नक़्श ए कफ़ ए पा नहीं मिला दिल जिस से मिल गया वो दोबारा नहीं मिला, हम अंजुमन में सब की तरफ़ देखते रहे अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला, आवाज़ को तो कौन समझता कि दूर दूर ख़ामोशियों का दर्द शनासा नहीं मिला, क़दमों को शौक़ ए आबला पाई तो मिल गया लेकिन ब-ज़र्फ़ ए वुसअत ए सहरा नहीं मिला, कनआँ में भी नसीब हुई ख़ुद दरीदगी चाक ए क़बा को दस्त ए ज़ुलेख़ा नहीं मिला, मेहर ओ वफ़ा के दश्त नवर्दो जवाब दो तुम को भी वो ग़ज़ाल मिला या नहीं मिला ? कच्चे - [कभी झिड़की से कभी प्यार से समझाते रहे](https://bazmeshayari.com/kabhi-jhidki-se-kabhi-pyar-se/): कभी झिड़की से कभी प्यार से समझाते रहे हम गई रात पे दिल को लिए बहलाते रहे, अपने अख़्लाक़ की शोहरत ने अजब दिन दिखलाए वो भी आते रहे अहबाब भी साथ आते रहे, हम ने तो लुट के मोहब्बत की रिवायत रख ली उन से तो पोछिए वो किस लिए पछताते रहे ? उस के तो नाम से वाबस्ता है कलियों का गुदाज़ आँसुओ तुम से तो पत्थर भी पिघल जाते रहे, यूँ तो ना अहलों के पीने पे जिगर कटता था हम भी पैमाने को पैमाने से टकराते रहे, उन की ये वज़् ए क़दीमाना भी अल्लाह अल्लाह! - [सीने में ख़िज़ाँ आँखों में बरसात रही है](https://bazmeshayari.com/sine-me-khizaan-aankhon-me/): सीने में ख़िज़ाँ आँखों में बरसात रही है इस इश्क़ में हर फ़स्ल की सौग़ात रही है, किस तरह ख़ुद अपने को यक़ीं आए कि उस से हम ख़ाक नशीनों की मुलाक़ात रही है, सूफ़ी का ख़ुदा और था शायर का ख़ुदा और तुम साथ रहे हो तो करामात रही है, इतना तो समझ रोज़ के बढ़ते हुए फ़ित्ने हम कुछ नहीं बोले तो तेरी बात रही है, हम में तो ये हैरानी ओ शोरीदगी ए इश्क़ बचपन ही से मिनजुमला ए आदात रही है, इस से भी तो कुछ रब्त झलकता है कि वो आँख बस हम पे इनायात - [इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की](https://bazmeshayari.com/is-qadar-musalsal-thi-shiddaten/): इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की आज पहली बार उस से मैं ने बेवफ़ाई की, वर्ना अब तलक यूँ था ख़्वाहिशों की बारिश में या तो टूट कर रोया या ग़ज़ल सराई की, तज दिया था कल जिन को हम ने तेरी चाहत में आज उन से मजबूरन ताज़ा आश्नाई की, हो चला था जब मुझ को इख़्तिलाफ़ अपने से तू ने किस घड़ी ज़ालिम मेरी हमनवाई की, तर्क कर चुके क़ासिद कू ए नामुरादाँ को कौन अब ख़बर लावे शहर ए आश्नाई की ? तंज़ ओ ताना ओ तोहमत सब हुनर हैं नासेह के आप से कोई पूछे - [ये शहर सेहर ज़दा है सदा किसी की नहीं](https://bazmeshayari.com/ye-shahar-sehar-zada-hai/): ये शहर सेहर ज़दा है सदा किसी की नहीं यहाँ ख़ुद अपने लिए भी दुआ किसी की नहीं, ख़िज़ाँ में चाक गरेबाँ था मैं बहार में तू मगर ये फ़स्ल ए सितम आश्ना किसी की नहीं, सब अपने अपने फ़साने सुनाते जाते हैं निगाह ए यार मगर हमनवा किसी की नहीं, मैं आज ज़द पे अगर हूँ तो ख़ुश गुमान न हो चराग़ सब के बुझेंगे हवा किसी की नहीं, फ़राज़ अपनी जिगर कावियों पे नाज़ न कर कि ये मता ए हुनर भी सदा किसी की नहीं..!! ~अहमद फ़राज़ - [यूँ ही राह ए वफ़ा की सलीब पर दो क़दम उठाने के शुक्रिया](https://bazmeshayari.com/yun-hi-raah-e-waafa-kee-salib-par/): यूँ ही राह ए वफ़ा की सलीब पर दो क़दम उठाने के शुक्रिया बड़ा पुर खतर है ये रास्ता, तेरे लौट जाने का शुक्रिया, जो उदास हैं तेरे हिज्र में जिन्हें बोझ लगती है ज़िन्दगी सर ए बज़्म यूँ उन्हें देख कर, तेरे मुस्कुराने का शुक्रिया, तेरी याद किस किस भेस में मेरे शेर ओ नग्मा में ढल गई ये कमाल था तेरी याद का, मुझे याद आने का शुक्रिया, मुझे ख़स्ता हाल देख कर तेरे फूल से लब खिल उठे मुझे अपने हासिल का गम नहीं, तेरे मुस्कुराने का शुक्रिया, जो ज़माने भर का असूल था वो असूल तूने - [अजब अपना हाल होता जो विसाल ए यार होता](https://bazmeshayari.com/azab-apna-haal-hota-jo/): अजब अपना हाल होता जो विसाल ए यार होता कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता, कोई फ़ित्ना ता क़यामत न फिर आश्कार होता तेरे दिल पे काश ज़ालिम मुझे इख़्तियार होता, जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूठे वादे करता तुम्हीं मुंसिफ़ी से कह दो तुम्हें एतिबार होता ? ग़म ए इश्क़ में मज़ा था जो उसे समझ के खाते ये वो ज़हर है कि आख़िर मय ए ख़ुशगवार होता, ये मज़ा था दिललगी का कि बराबर आग लगती न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता, न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में कोई - [आप का एतिबार कौन करे](https://bazmeshayari.com/aapka-aetibar-kaun-kare/): आप का एतिबार कौन करे रोज़ का इंतिज़ार कौन करे ज़िक्र ए मेहर ओ वफ़ा तो हम करते पर तुम्हें शर्मसार कौन करे हो जो उस चश्म ए मस्त से बेख़ुद फिर उसे होशियार कौन करे तुम तो हो जान एक ज़माने की जान तुम पर निसार कौन करे आफ़त ए रोज़गार जब तुम हो शिकवा ए रोज़गार कौन करे अपनी तस्बीह रहने दे ज़ाहिद दाना दाना शुमार कौन करे हिज्र में ज़हर खा के मर जाऊँ मौत का इंतिज़ार कौन करे आँख है तुर्क ज़ुल्फ़ है सय्याद देखें दिल का शिकार कौन करे वादा करते नहीं ये कहते हैं - [फिरे राह से वो यहाँ आते आते](https://bazmeshayari.com/fire-raah-se-wo-yahan-aate-aate/): फिरे राह से वो यहाँ आते आते अजल मर रही तू कहाँ आते आते, न जाना कि दुनिया से जाता है कोई बहुत देर की मेहरबाँ आते आते, सुना है कि आता है सर नामाबर का कहाँ रह गया अरमुग़ाँ आते आते, यक़ीं है कि हो जाए आख़िर को सच्ची मेरे मुँह में तेरी ज़बाँ आते आते, सुनाने के क़ाबिल जो थी बात उन को वही रह गई दरमियाँ आते आते, मुझे याद करने से ये मुद्दआ था निकल जाए दम हिचकियाँ आते आते, अभी सिन ही क्या है जो बेबाकियाँ हों उन्हें आएँगी शोख़ियाँ आते आते, कलेजा मेरे मुँह - [ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा](https://bazmeshayari.com/le-chala-jaan-meri-ruth-ke-jana/): ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा, अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा सब ने जाना जो पता एक ने जाना तेरा, तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है किस के उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा, आरज़ू ही न रही सुब्ह ए वतन की मुझ को शाम ए ग़ुर्बत है अजब वक़्त सुहाना तेरा, ये समझ कर तुझे ऐ मौत लगा रखा है काम आता है बुरे वक़्त में आना तेरा, ऐ दिल ए शेफ़्ता में आग लगाने वाले रंग लाया है ये लाखे का - [गली गली यूँ मोहब्बत के ख़्वाब बेचूँगा](https://bazmeshayari.com/gali-gali-yun-mohabbat-ke-khwab/): गली गली यूँ मोहब्बत के ख़्वाब बेचूँगा मैं रख के रेढ़ी पे ताज़ा गुलाब बेचूँगा, रही जो ज़िन्दगी मेरी तो शहर ए ज़ुल्मत में चिराग़ बेचूँगा और बे हिसाब बेचूँगा, मेरा उजालों का व्योपार बस चमक जाए फ़लक पे बैठ के मैं आफ़ताब बेचूँगा, कशिद कर के क़लन्दर की मस्त आँखों से शराबियों को मैं हक़ की शराब बेचूँगा, खरीद कर मैं जहन्नुम से जिस्म लैला का जनाब कैश को दिलकश अज़ाब बेचूँगा, सुनाई देगा जिसे मेरी रूह का नग्मा मैं ऐसे शख्स को दिल का रबाब बेचूँगा, लगा के आग मैं रख दूँगा फिक्र ए नफ़रत को कबाड़ियों को - [नशा नशे के लिए है अज़ाब में शामिल](https://bazmeshayari.com/nasha-nashe-ke-liye-hai/): नशा नशे के लिए है अज़ाब में शामिल किसी की याद को कीजे शराब में शामिल, हर एक तलाश यहाँ फ़ासलों से रौशन है हक़ीक़तें कहाँ होती हैं ख़्वाब में शामिल ? वो तुम नहीं हो तो फिर कौन था वो तुम जैसा किसी का ज़िक्र तो था हर किताब में शामिल, हमें भी शौक़ है अपनी तरफ़ से जीने का हमारा नाम भी कीजे इताब में शामिल, अकेले कमरे में गुलदान बोलते कब हैं तुम्हारे होंठ हैं शायद गुलाब में शामिल, ज़मीन रोज़ कहाँ मोजिज़ा दिखाती है मेरी निगाह भी होगी नक़ाब में शामिल, उसी का नाम है नग़्मा - [तन्हा हुए ख़राब हुए आइना हुए](https://bazmeshayari.com/tanha-hue-kharab-hue/): तन्हा हुए ख़राब हुए आइना हुए चाहा था आदमी बनें लेकिन ख़ुदा हुए, जब तक जिए बिखरते रहे टूटते रहे हम साँस साँस क़र्ज़ की सूरत अदा हुए, हम भी किसी कमान से निकले थे तीर से ये और बात है कि निशाने ख़ता हुए, पुरशोर रास्तों से गुज़रना मुहाल था हट कर चले तो आप ही अपनी सज़ा हुए..!! ~निदा फ़ाज़ली - [कोई नहीं है आने वाला फिर भी कोई आने को है](https://bazmeshayari.com/koi-nahin-hai-aane-wala/): कोई नहीं है आने वाला फिर भी कोई आने को है आते जाते रात और दिन में कुछ तो जी बहलाने को है, चलो यहाँ से अपनी अपनी शाख़ों पे लौट आए परिंदे भूली बिसरी यादों को फिर तन्हाई दोहराने को है, दो दरवाज़े एक हवेली आमद रुख़्सत एक पहेली कोई जा कर आने को है कोई आ कर जाने को है, दिन भर का हंगामा सारा शाम ढले फिर बिस्तर प्यारा मेरा रस्ता हो या तेरा हर रस्ता घर जाने को है, आबादी का शोर शराबा छोड़ के ढूँडो कोई ख़राबा तन्हाई फिर शम्अ जला कर कोई हर्फ़ सुनाने - [किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करो](https://bazmeshayari.com/kisi-bhi-shahar-me-jaao/): किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करो कोई फ़ज़ा कोई मंज़र किसी के नाम करो, दुआ सलाम ज़रूरी है शहर वालों से मगर अकेले में अपना भी एहतिराम करो, हमेशा अम्न नहीं होता फ़ाख़्ताओं में कभी कभार उक़ाबों से भी कलाम करो, हर एक बस्ती बदलती है रंग रूप कई जहाँ भी सुब्ह गुज़ारो उधर ही शाम करो, ख़ुदा के हुक्म से शैतान भी है आदम भी वो अपना काम करेगा तुम अपना काम करो..!! ~निदा फ़ाज़ली - [कोई किसी की तरफ़ है कोई किसी की तरफ़](https://bazmeshayari.com/koi-kisi-ki-taraf-hai-koi/): कोई किसी की तरफ़ है कोई किसी की तरफ़ कहाँ है शहर में अब कोई ज़िंदगी की तरफ़, सभी की नज़रों में ग़ाएब था जो वो हाज़िर था किसी ने रुक के नहीं देखा आदमी की तरफ़, तमाम शहर की शमएँ उसी से रौशन थीं कभी उजाला बहुत था किसी गली की तरफ़, कहीं की भूख हो हर खेत उस का अपना है कहीं की प्यास हो जाएगी वो नदी की तरफ़, न निकले ख़ैर से अल्लामा क़ौल से बाहर यगाना टूट गए जब चले ख़ुदी की तरफ़..!! ~निदा फ़ाज़ली - [चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं](https://bazmeshayari.com/chahte-mausami-parinde-hai/): चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं घोंसले बन के टूट जाते हैं दाग़ शाख़ों पे चहचहाते हैं, आने वाले बयाज़ में अपनी जाने वालों के नाम लिखते हैं सब ही औरों के ख़ाली कमरों को अपनी अपनी तरह सजाते हैं, मौत एक वाहिमा है नज़रों का साथ छुटता कहाँ है अपनों का जो ज़मीं पर नज़र नहीं आते चाँद तारों में जगमगाते हैं, ये मुसव्विर अजीब होते हैं आप अपने हबीब होते हैं दूसरों की शबाहतें ले कर अपनी तस्वीर ही बनाते हैं, यूँ ही चलता है कारोबार ए जहाँ है ज़रूरी हर एक चीज़ यहाँ - [दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे](https://bazmeshayari.com/dukh-me-neer-baha-dete-the/): दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे सीधे सादे लोग थे लेकिन कितने अच्छे लगते थे, नफ़रत चढ़ती आँधी जैसी प्यार उबलते चश्मों सा बैरी हों या संगी साथी सारे अपने लगते थे, बहते पानी दुख सुख बाँटें पेड़ बड़े बूढ़ों जैसे बच्चों की आहट सुनते ही खेत लहकने लगते थे, नदिया पर्बत चाँद निगाहें माला एक कई दाने छोटे छोटे से आँगन भी कोसों फैले लगते थे..!! ~निदा फ़ाज़ली - [कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया](https://bazmeshayari.com/kuch-dino-to-shahar-sara/): कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया फिर हुआ यूँ वो किसी की मैं किसी का हो गया, इश्क़ कर के देखिए अपना तो ये है तजरबा घर मोहल्ला शहर सब पहले से अच्छा हो गया, क़ब्र में हक़गोई बाहर मंक़बत क़व्वालियाँ आदमी का आदमी होना तमाशा हो गया, वो ही मूरत वो ही सूरत वो ही क़ुदरत की तरह उस को जिस ने जैसा सोचा वो भी वैसा हो गया..!! ~निदा फ़ाज़ली - [उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ](https://bazmeshayari.com/uth-ke-kapde-badal-ghar-se/): उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ रात के बाद दिन आज के बाद कल जो हुआ सो हुआ, जब तलक साँस है भूख है प्यास है ये ही इतिहास है रख के काँधे पे हल खेत की ओर चल जो हुआ सो हुआ, ख़ून से तर ब तर कर के हर रहगुज़र थक चुके जानवर लकड़ियों की तरह फिर से चूल्हे में जल जो हुआ सो हुआ, जो मरा क्यूँ मरा जो लुटा क्यूँ लुटा जो जला क्यूँ जला मुद्दतों से हैं ग़म इन सवालों के हल जो हुआ सो हुआ, मंदिरों में भजन - [ज़ीस्त उनवान तेरे होने का](https://bazmeshayari.com/zist-unwan-tere-hone-ka/): ज़ीस्त उनवान तेरे होने का दिल को ईमान तेरे होने का, मुझ को हर सम्त ले के जाता है एक इम्कान तेरे होने का, आ गया वक़्त मेरे बाद आख़िर अब परेशान तेरे होने का, आँख मंज़र बनाती रहती है यानी सामान तेरे होने का, मेरा होना भी एक पहलू है हाँ मेरी जान तेरे होने का..!! ~अज़हर नवाज़ - [हम ने जिस के लिए फूलों के जहाँ छोड़े हैं](https://bazmeshayari.com/hum-ne-jis-ke-liye/): हम ने जिस के लिए फूलों के जहाँ छोड़े हैं उस ने इस दिल में फ़क़त ज़ख़्म ए निहाँ छोड़े हैं, हम ने ख़ुद अपने उसूलों की हिफ़ाज़त के लिए दौलतें छोड़ दीं शोहरत की जहाँ छोड़े हैं, ज़िंदगी हम ने तेरा साथ निभाने के लिए तपते सहरा में भी क़दमों के निशाँ छोड़े हैं, हम किसी और के हो जाएँ किसी को चाहें ऐसे अस्बाब मगर उस ने कहाँ छोड़े हैं ? जिस की परछाई लिए फिरती हैं आँखें मेरी उस ने पलकों पे मेरी आब ए रवाँ छोड़े हैं..!! ~मीना ख़ान - [बदन पे सूट उर्दू का गले में टाई उर्दू की](https://bazmeshayari.com/badan-pe-suit-urdu-ka/): बदन पे सूट उर्दू का गले में टाई उर्दू की उन्हें मालूम है गहराई और गीराई उर्दू की, बजाते हैं हर एक महफ़िल में ये शहनाई उर्दू की कि सारी उम्र खाई है फ़क़त बालाई उर्दू की, प्रोफ़ेसर ये उर्दू के जो उर्दू से कमाते हैं इसी पैसे से बच्चों को ये अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं..!! ~अहमद अल्वी - [एक दिन बीवी ने फ़रमाया तुम्हारी हर किताब](https://bazmeshayari.com/ek-din-bibi-ne-farmaya/): एक दिन बीवी ने फ़रमाया तुम्हारी हर किताब फ़ालतू सामान है कूड़ा है रद्दी है जनाब, आज कल महँगाई से मैं किस क़दर बदहाल हूँ तुम इजाज़त दो अगर रद्दी में इनको बेच दूँ, दफ़्न इन में इल्म ओ फ़न के हैं हज़ारों माहताब मैं ने बीवी से कहा नायाब है हर एक किताब, देख ये दीवान ए ग़ालिब आप है अपनी मिसाल इस का एक एक शेर है उर्दू अदब में ला ज़वाल, देख हाली की मुसद्दस का नहीं कोई जवाब ये भी है उर्दू अदब में एक बा मक़सद किताब, और ये बाँग ए दरा इक़बाल की पहचान - [नुक़सान हो रहा है बहुत कारोबार में](https://bazmeshayari.com/nuksan-ho-raha-hai-bahut/): नुक़सान हो रहा है बहुत कारोबार में अब्बा पड़े हैं जब से पड़ोसन के प्यार में, सौ कोशिशों से आए थे चंदिया पे चार बाल दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में, ना अहल ही मिली मुझे हर एक अहलिया मैं ने किए निकाह सब यारो उधार में, बनती न सुर्मा पस्लियाँ और फूटता न सर होती अगर ज़बान मेरे इख़्तियार में, अंग्रेज़ी गुफ़्तुगू का बड़ा फ़ाएदा हुआ छे सात चाँद लग गए मेरे वक़ार में, जब से मकाँ बदल गईं दोनों पड़ोसनें लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में..!! ~अहमद अल्वी - [मुझ से फिर मेरी कार तू माँगे](https://bazmeshayari.com/mujh-se-fir-meri-car/): मुझ से फिर मेरी कार तू माँगे एक या दो हज़ार तू माँगे, इस से पहले उधार तू माँगे मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा, गीत फिल्मों के गुनगुनाने में रोड पर लड़कियाँ पटाने में, इस से पहले पिटूँ मैं थाने में मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा, बन न जाए ख़बर बड़ी कोई इस से पहले कि फुलझड़ी कोई, फूँक दे दिल की झोंपड़ी कोई मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा, मेरी ख़ातिर ख़रीद ले डंडे इस से पहले किराए के गुंडे, तोड़ दें दाँत मेरे मुस्टंडे मैं तेरा शहर छोड़ जाऊँगा..!! ~अहमद अल्वी - [सुना है रोज़ वो हम को सँवर के देखते हैं](https://bazmeshayari.com/suna-hai-roz-wo-ham-ko/): सुना है रोज़ वो हम को सँवर के देखते हैं ये बात सच है तो उन पे भी मर के देखते हैं, सुना है लोगों से महबूब है मेरा गंजा चलो कि चाँद पे उस की उतर के देखते हैं, करेंगे आँख मटक्का वो क्या पड़ोसन से ? जो लोग अपनी ही बीवी को डर के देखते हैं, सुना है शौक़ है उस को भी पहलवानी का चलो कि उस से भी दो हाथ कर के देखते हैं, सुना है चश्मा लगाता नहीं गधा कोई ये बात है तो हरी घास चर के देखते हैं, गए ज़माने की बातें हैं - [ग़ुस्से में बीवी ये बोली शौहर से](https://bazmeshayari.com/gusse-me-bibi-ye-boli/): ग़ुस्से में बीवी ये बोली शौहर से तुम ने तो बस ज़ुल्म मुझी पर ढाए हैं, मैं ही तुम को फूटी आँख नहीं भाती तुम ने सब से प्यार के पेच लड़ाए हैं, शौहर बोला बात अगर ये सच्ची है फिर ये बच्चे किस के घर से आए हैं ? बंटी बबली सोनू मोनू क्या तुम ने इंटरनेट से डाउन लोड कराए हैं ? इतना भी मालूम नहीं है क्या तुम को फूल ये किस की कोशिश ने महकाए हैं ? इंटरनेट का सरवर कब से डाउन है सारे बच्चे पेन ड्राईव से आए हैं..!! ~अहमद अल्वी - [ये खटमल ये मक्खी ये मच्छर की दुनिया](https://bazmeshayari.com/ye-khatmal-ye-makkhi/): ये खटमल ये मक्खी ये मच्छर की दुनिया ये लंगूर भालू ये बंदर की दुनिया, ये कुत्तों गधों और ख़च्चर की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ? ये औरत ये मर्दों ये छक्कों की दुनिया निहत्तों की हथियार बंदों की दुनिया, ये डाकू पुलिस और ग़ुंडों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ? ये चोरों ये लुच्चों लफ़ंगों की दुनिया ये कमज़ोरों की और दबंगों की दुनिया, तप ए दिक़ के बीमार चंगों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ? ये बुश जूनीयर और ओबामों - [मेरा पड़ोसी कोई माल दार थोड़ी है](https://bazmeshayari.com/mera-padosi-koi-maal-dar-thodi/): मेरा पड़ोसी कोई माल दार थोड़ी है ये कार बैंक की है उसकी कार थोड़ी है, हर एक मुल्क में जाएँगे खाएँगे जूते कि बुज़दिलों में हमारा शुमार थोड़ी है, ख़ुदा का शुक्र है चक्कर कई से हैं अपने बस एक बीवी पे दार ओ मदार थोड़ी है, गले में डाल के बाहें सड़क पे घूमेंगे है नक़्द इश्क़ हमारा उधार थोड़ी है, हमारा प्यार जो क़ाज़ी निकाह तक पहोंचे हमारे बीच कोई इतना प्यार थोड़ी है, जो फ़ोन बंद रखूँ कॉल न उठाऊँ मैं किसी के बाप का मुझ पे उधार थोड़ी है..!! ~अहमद अल्वी - [न होता दहर से जो बेनियाज़ क्या करता](https://bazmeshayari.com/na-hota-dahar-se-jo-beniyaz-kya-karta/): न होता दहर से जो बेनियाज़ क्या करता खुला था मुझ पे कुछ ऐसा ही राज़ क्या करता मरीज़ कश्मकश ए जब्र ओ इख़्तियार में था इलाज ए जज़्ब ओ कशिश चारासाज़ क्या करता तेरे करम ने तो दुनिया ही सौंप दी थी मुझे बचा के कुछ न रखा हिर्स ओ आज़ क्या करता बिगड़ गया मेरा हुलिया तो बरहमी कैसी थे रहगुज़र में नशेब ओ फ़राज़ क्या करता मुझे ख़बर थी कि मैं भी तेरे सबब से हूँ फिर अपनी ज़ात पे मैं फ़ख़्र ओ नाज़ क्या करता तमाम उम्र रहे पहरेदार काँधों पर तेरे ख़िलाफ़ ऐ अंजुम नवाज़ - [तेशा ब दस्त आ मेरे आज़र तराश दे](https://bazmeshayari.com/tesha-ba-dast-aa-mere-aazar-tarash-de/): तेशा ब दस्त आ मेरे आज़र तराश दे बेडोल है बहुत मेरा पैकर तराश दे, गर क़ुमरियों के नग़्मे गिराँबार हैं तुझे इस रुत में सारे सर्व सनोबर तराश दे, यूँ उड़ गई है बू ए वफ़ा उस की ज़ात से जिस तरह कोई शाख़ ए गुल ए तर तराश दे, उड़ना अगर है बाद ए मुख़ालिफ़ का ध्यान रख ऐसा न हो कि तेज़ हवा पर तराश दे, क्या मोम के बदन की हक़ीक़त तेरे लिए तू चाहे तो निगाहों से पत्थर तराश दे..!! ~अशफ़ाक़ अंजुम - [शहर मेरा हुजरा ए आफ़ात है](https://bazmeshayari.com/shahar-mera-huzra-e-aafaat-hai/): शहर मेरा हुजरा ए आफ़ात है सर पे सूरज और घर में रात है, सुर्ख़ थे चेहरे बदन शादाब थे ये अभी दो चार दिन की बात है, फूटने ही वाला है चश्मा यहाँ सारी दुनिया अर्सा ए अर्फ़ात है, वो तो है बेचैन मिलने के लिए दरमियाँ ख़ुद मेरी अपनी ज़ात है, मैं हूँ अंजुम आफ़ियात ए नीम शब मुझ से बरगश्ता अँधेरी रात है..!! ~अशफ़ाक़ अंजुम - [उठाओ संग कि हम में सनक बहुत है अभी](https://bazmeshayari.com/uthaao-sang-ki-hum-me-sanak-bahut-hai-abhi/): उठाओ संग कि हम में सनक बहुत है अभी हमारे गर्म लहू में नमक बहुत है अभी, उतर रही है अगर चाँदनी उतरने दे महकती ज़ुल्फ़ में तेरी चमक बहुत है अभी, ये कल किसी नए मौसम की फ़स्ल काटेंगे सरों में अहल ए जुनूँ के ठनक बहुत है अभी, उसे ख़बर नहीं सूरज भी डूब जाता है हसीं लिबास पे नाज़ाँ धनक बहुत है अभी, हमारे पहले ही मौसम ने हम को तोड़ दिया मगर तुम्हारे बदन में लचक बहुत है अभी, हवा ए वक़्त ने झोंकी है धूल आँखों में हमारी आँख में लेकिन चमक बहुत है अभी, - [अब ज़र्द लिबादे भी नहीं ख़ुश्क शजर पर](https://bazmeshayari.com/ab-zard-libaade-bhi-nahi-khushq-shazar-par/): अब ज़र्द लिबादे भी नहीं ख़ुश्क शजर पर जिस सम्त नज़र उठती है बे रंग है मंज़र, उतरे हैं मेरी आँखों में जलवो के सहीफ़े ख़्वाबों का फ़रिश्ता हूँ मैं ग़ज़लों का पयम्बर, बीते हुए लम्हों से मुलाक़ात अगर हो ले आना हवाओ ज़रा एक बार मेरे घर, इतराओ न मस्ती में जवाँ साल परिंदो पुरवाई के झोंकों से भी कट जाते हैं शहपर, आ जाते हैं जब भी तेरी ख़ुशबू के बुलावे पेचीदा सवालात किया करता है बिस्तर..!! ~अशफ़ाक़ अंजुम - [मैं सोचता तो हूँ लेकिन ये बात किस से कहूँ](https://bazmeshayari.com/main-sochta-to-hoon-lekin-ye-baat-kis-se-kahoon/): मैं सोचता तो हूँ लेकिन ये बात किस से कहूँ वो आइने में जो उतरे तो मैं सँवर जाऊँ, ख़ुद अपने आप से वहशत सी हो रही है मुझे बिछड़ के तुझ से मैं एक मुस्तक़िल अज़ाब में हूँ, हर एक लम्हा भँवर है हर एक पल तूफ़ाँ कहाँ तक और मैं साहिल की जुस्तुजू में बढ़ूँ, मेरे वजूद ने क्या क्या लिबास बदले हैं कहीं चराग़ कहीं रास्ते का पत्थर हूँ, हवा के दोश पे हूँ मिस्ल ए बर्ग ए आवारा अब और क्या कहूँ अंजुम में अपना हाल ए ज़बूँ..!! ~अशफ़ाक़ अंजुम - [ख़्वाहिशों का इम्तिहाँ होने तो दो](https://bazmeshayari.com/khwahisho-ka-imtihan-hone-to-do/): ख़्वाहिशों का इम्तिहाँ होने तो दो फ़ासले कुछ दरमियाँ होने तो दो, मय कशी भी बा वज़ू होगी यहाँ शैख़ को पीर ए मुग़ाँ होने तो दो, मंज़िल ए मक़्सूद से आई सदा दिल को मीर ए कारवाँ होने तो दो, ख़ामुशी आवाज़ बन जाएगी यूँ बे ज़बानी को ज़बाँ होने तो दो, क्या नहीं मुमकिन है कुछ सय्याद से उस को अपना बाग़बाँ होने तो दो..!! ~फ़रोग़ ज़ैदी - [क्यों वो मेरा मरकज़ ए अफ़्कार था ?](https://bazmeshayari.com/kyo-wo-mera-markaz-e-afqaar-tha/): क्यों वो मेरा मरकज़ ए अफ़्कार था ? जिस के होने से मुझे इंकार था, यूँ तो मुश्किल थी बहुत तेरी तलाश ख़ुद को अपना और भी दुश्वार था, उस के हिस्से में दर ओ दीवार थे मेरा हिस्सा साया ए दीवार था, रफ़्ता रफ़्ता सब के जैसा हो गया पहले मैं भी साहब ए किरदार था, दूरियों ने क़ुर्बतें बख़्शीं हमें मिलना जुलना बाइस ए तकरार था, कैसे बढ़ता क़ाफ़िला आगे फ़रोग़ हर कोई जब क़ाफ़िला सालार था..!! ~फ़रोग़ ज़ैदी - [या रब मेरी हयात से ग़म का असर न जाए](https://bazmeshayari.com/yaa-rab-meri-hayat-se-gam-ka-asar-na-jaaye/): या रब मेरी हयात से ग़म का असर न जाए जब तक किसी की ज़ुल्फ़ ए परेशाँ सँवर न जाए, वो आँख क्या जो आरिज़ ओ रुख़ पर ठहर न जाए वो जल्वा क्या जो दीदा ओ दिल में उतर न जाए, मेरे जुनूँ को ज़ुल्फ़ के साए से दूर रख रस्ते में छाँव पा के मुसाफ़िर ठहर न जाए, मैं आज गुलसिताँ में बुला लूँ बहार को लेकिन ये चाहता हूँ ख़िज़ाँ रूठ कर न जाए, पैदा हुए हैं अब तो मसीहा नए नए बीमार अपनी मौत से पहले ही मर न जाए, कर ली है तौबा इस लिए - [मुझे प्यार से तेरा देखना मुझे छुप छुपा के वो देखना](https://bazmeshayari.com/mujhe-pyar-se-tera-dekhna-mujhe-chhup-chhupa-ke-wo-dekhna/): मुझे प्यार से तेरा देखना मुझे छुप छुपा के वो देखना मेरा सोया जज़्बा उभारना तुम्हें याद हो कि न याद हो, रह ओ रस्म क़ल्ब ओ निगाह के वो तुम्हारे दावे निबाह के वो हमारा शेख़ी बघारना तुम्हें याद हो कि न याद हो, वो हमारी छेड़ वो शोख़ियाँ वो हमारा काटना चुटकियाँ वो तुम्हारा कुहनी का मारना तुम्हें याद हो कि न याद हो, कभी सर्द आहों के सिलसिले कभी ठंडी साँसों के मश्ग़ले वो हमारी नक़लें उतारना तुम्हें याद हो कि न याद हो, वो तुम्हारा शाएर ए ख़ुशनवा जिसे लोग कहने लगे फ़ना वो निसार कह - [ये ऐश ओ तरब के मतवाले बेकार की बातें करते हैं](https://bazmeshayari.com/ye-aish-o-tarab-ke-matwaale-bekaar-ki-baaten-karte-hain/): ये ऐश ओ तरब के मतवाले बेकार की बातें करते हैं पायल के ग़मों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं, नाहक़ है हवस के बंदों को नज़्ज़ारा ए फ़ितरत का दावा आँखों में नहीं है बेताबी दीदार की बातें करते हैं, कहते हैं उन्हीं को दुश्मन ए दिल है नाम उन्हीं का नासेह भी वो लोग जो रह कर साहिल पर मंजधार की बातें करते हैं, पहुँचे हैं जो अपनी मंज़िल पर उन को तो नहीं कुछ नाज़ ए सफ़र चलने का जिन्हें मक़्दूर नहीं रफ़्तार की बातें करते हैं..!! ~शकील बदायूनी - [निगाह ए नाज़ का एक वार कर के छोड़ दिया](https://bazmeshayari.com/nigaah-e-naaz-ka-ek-waar-kar-ke-chhod-diya/): निगाह ए नाज़ का एक वार कर के छोड़ दिया दिल ए हरीफ़ को बेदार कर के छोड़ दिया, हुई तो है यूँही तरदीद ए अहद ए लुत्फ़ ओ करम दबी ज़बान से इक़रार कर के छोड़ दिया, छुपे कुछ ऐसे कि ताज़ीस्त फिर न आए नज़र रहीन ए हसरत ए दीदार कर के छोड़ दिया, मुझे तो क़ैद ए मोहब्बत अज़ीज़ थी लेकिन किसी ने मुझ को गिरफ़्तार कर के छोड़ दिया, नज़र को जुरअत ए तकमील ए बंदगी न हुई तवाफ़ ए कूच ए दिलदार कर के छोड़ दिया, ख़ुशा वो कशमकश ए रब्त ए बाहमी जिस ने - [आँखों से दूर सुब्ह के तारे चले गए](https://bazmeshayari.com/aankhon-se-door-subah-ke-taare-chale-gaye/): आँखों से दूर सुब्ह के तारे चले गए नींद आ गई तो ग़म के नज़ारे चले गए, दिल था किसी की याद में मसरूफ़ और हम शीशे में ज़िंदगी को उतारे चले गए, अल्लाह रे बेख़ुदी कि हम उन के ही रू ब रू बेइख़्तियार उन्ही को पुकारे चले गए, मुश्किल था कुछ तो ऐश की बाज़ी का जीतना कुछ जीतने के ख़ौफ़ से हारे चले गए, नाकामी ए हयात का करते भी क्या गिला दो दिन गुज़ारने थे गुज़ारे चले गए, तर्ग़ीब ए तर्क ए शौक़ के पर्दे में ग़मगुसार हर नक़्श ए आरज़ू को उभारे चले गए, पहुँचाई - [तक़दीर की गर्दिश क्या कम थी इस पर ये क़यामत कर बैठे](https://bazmeshayari.com/taqdeer-ki-gardish-kya-kam-thi-is-par-ye-qayamat-kar-baithe/): तक़दीर की गर्दिश क्या कम थी इस पर ये क़यामत कर बैठे बेताबी ए दिल जब हद से बढ़ी घबरा के मोहब्बत कर बैठे, आँखों में छलकते हैं आँसू दिल चुपके चुपके रोता है वो बात हमारे बस की न थी जिस बात की हिम्मत कर बैठे, ग़म हम ने ख़ुशी से मोल लिया उस पर भी हुई ये नादानी जब दिल की उमीदें टूट गईं क़िस्मत से शिकायत कर बैठे..!! ~शकील बदायूनी - [दुनिया की रिवायात से बेगाना नहीं हूँ](https://bazmeshayari.com/duniya-ki-riwayat-se-begaan-nahi-hoon/): दुनिया की रिवायात से बेगाना नहीं हूँ छेड़ो न मुझे मैं कोई दीवाना नहीं हूँ, इस कसरत ए ग़म पर भी मुझे हसरत ए ग़म है जो भर के छलक जाए वो पैमाना नहीं हूँ, रूदाद ए ग़म ए इश्क़ है ताज़ा मेरे दम से उनवान ए हर अफ़्साना हूँ अफ़्साना नहीं हूँ, इल्ज़ाम ए जुनूँ दें न मुझे अहल ए मोहब्बत मैं ख़ुद ये समझता हूँ कि दीवाना नहीं हूँ, मैं क़ाएल ए ख़ुद्दारी ए उल्फ़त सही लेकिन आदाब ए मोहब्बत से तो बेगाना नहीं हूँ, है बर्क़ ए सर ए तूर से दिल शोला ब दामाँ शम ए - [मुझे दुनिया वालो शराबी न समझो](https://bazmeshayari.com/mujhe-duniya-walo-sharabi-na-samjho/): मुझे दुनिया वालो शराबी न समझो मैं पीता नहीं हूँ पिलाई गई है जहाँ बेख़ुदी में क़दम लड़खड़ाए वही राह मुझ को दिखाई गई है, नशे में हूँ लेकिन मुझे ये ख़बर हैं कि इस ज़िंदगी में सभी पी रहे है किसी को मिले हैं छलकते पियाले किसी को नज़र से पिलाई गई है, किसी को नशा है जहाँ में ख़ुशी का किसी को नशा है ग़म ए ज़िंदगी का कोई पी रहा है लहू आदमी का हर एक दिल में मस्ती रचाई गई है, ज़माने के यारो चलन हैं निराले यहाँ तन हैं उजले मगर दिल हैं काले ये - [अब बंद जो इस अब्र ए गुहर बार को लग जाए](https://bazmeshayari.com/ab-band-jo-is-abr-e-guhar-bar-ko-lag-jaye/): अब बंद जो इस अब्र ए गुहर बार को लग जाए कुछ धूप हमारे दर ओ दीवार को लग जाए, पलकों पे सजाए रहो उम्मीद के जुगनू क्या जानिए किस की दुआ बीमार को लग जाए ? सूली पे भी इस बात की कोशिश है हमारी ईसार हमारा तेरे मेआर को लग जाए, हक़गोई से मेरी ही परेशान है दुनिया क्या हो ये वबा और जो दो चार को लग जाए, थोड़ी सी रहे जेब ए ख़रीदार कुशादा थोड़ा सा गहन रौनक़ ए बाज़ार को लग जाए..!! ~शकील जमाली - [तल्ख़ हालात में जीने का सबब होते हैं](https://bazmeshayari.com/talkh-halaat-me-jine-ka-sabab-hote-hain/): तल्ख़ हालात में जीने का सबब होते हैं ख़त जो छुप छुप के लिखे जाएँ अजब होते हैं, कोई एहसास की गहराई से महसूस करे एक न एक ज़ख़्म लिए रूह में सब होते हैं, इन अँधेरों से न ख़ाइफ़ हो कि कुछ वक़्त के बाद ये अंधेरे ही उजाले का सबब होते हैं, आओ कोशिश तो करें गुत्थियाँ सुलझाने की मसअले कैसे भी हों ग़ौर तलब होते हैं, बस यही सोच के देता हूँ तसल्ली दिल को इख़्तिलाफ़ात भी रिश्तों के सबब होते हैं..!! ~शकील जमाली - [तुम शुजाअत के कहाँ क़िस्से सुनाने लग गए](https://bazmeshayari.com/tum-shujaat-ke-kahan-qisse-sunane-lag-gaye/): तुम शुजाअत के कहाँ क़िस्से सुनाने लग गए जीतने आए थे जो दुनिया ठिकाने लग गए, उड़ रही है शहर के सारे गली कूचों में ख़ाक जितने आशिक़ थे वो सब खाने कमाने लग गए, रेंगती कारें उबलती भीड़ बेबस रास्ते कल मुझे घर तक पहुँचने में ज़माने लग गए, उस ने हम पर एक मोहब्बत की नज़र क्या डाल दी हाथ जैसे हम ग़रीबों के ख़ज़ाने लग गए, उम्र भर करते रहे हम एक कूचे का तवाफ़ एक साए के तआक़ुब में ज़माने लग गए, ज़िंदगी देने लगी परहेज़गारी का सबक़ अब तो हम जैसे भी सब्ज़ी दाल खाने - [वो लोग आएँ जिन्हें हौसला ज़्यादा है](https://bazmeshayari.com/wo-log-aaye-jinhen-hausla-zyada-hai/): वो लोग आएँ जिन्हें हौसला ज़्यादा है ग़ज़ल में ख़ून का मसरफ़ ज़रा ज़्यादा है, सब अपने आप को दोहरा रहे हैं रह रह कर वो इस लिए कि पढ़ा कम लिखा ज़्यादा है, ये सच है कोई फ़रिश्ता नहीं मेरे अंदर मगर ख़ता की बनिसबत सज़ा ज़्यादा है, मेरा ख़ुमार उतर जाए तो ये फ़ैसला हो तेरी शराब में क्या कम है क्या ज़्यादा है ? ग़ज़ल उसी पे दर ए इल्तिफ़ात खोलती है जिसे लिहाज़ रिवायात का ज़्यादा है..!! ~शकील जमाली - [न कोई ख़्वाब कमाया न आँख ख़ाली हुई](https://bazmeshayari.com/na-koi-khwab-kamaya-na-aankh-khaali-hui/): न कोई ख़्वाब कमाया न आँख ख़ाली हुई तुम्हारे साथ हमारी भी रात काली हुई, ख़ुदा का शुक्र अदा कर वो बेवफ़ा निकला ख़ुशी मना कि तेरी जान की बहाली हुई, ज़रा से ख़्वाब बुने थे कि साँस फूल गई क़दम दुकाँ पे रखा था कि जेब ख़ाली हुई, वफ़ा के बारे में लोगों की राय ठीक नहीं बिरादरी से ये ख़ातून है निकाली हुई, तुम्ही तो सर पे बिठाए हुए थे दुनिया को तुम्ही पे भौंक रही है तुम्हारी पाली हुई, मैं कैसे देखूँ रवा दारियों को मिटते हुए ये दाग़ बेल है मेरे बड़ों की डाली हुई, जो - [किसी का साथ मियाँ जी सदा नहीं रहा है](https://bazmeshayari.com/kisi-ka-saath-miyan-ji-sada-nahi-raha-hai/): किसी का साथ मियाँ जी सदा नहीं रहा है मगर दिलों को अभी सब्र आ नहीं रहा है, यही तो है जो ख़यालों से जा नहीं रहा है ये आदमी जो मेरा फ़ोन उठा नहीं रहा है, हमारे बीच कोई बा वफ़ा नहीं रहा है ये बात कोई किसी को बता नहीं रहा है, मेरे अज़ीज़ मेरी ग़ीबतों में लग गए हैं कि अब किसी को कोई मश्ग़ला नहीं रहा है, कहीं उसे मेरा नेमुल बदल न मिल गया हो कई दिनों से मेरी सम्त आ नहीं रहा है, ये चंद फ़ैसला कुन साअतें हैं सब के लिए इसी लिए - [कोई भी दार से ज़िंदा नहीं उतरता है](https://bazmeshayari.com/koi-bhi-daar-se-zinda-nahi-utarta-hai/): कोई भी दार से ज़िंदा नहीं उतरता है मगर जुनून हमारा नहीं उतरता है, तबाह कर दिया अहबाब को सियासत ने मगर मकान से झंडा नहीं उतरता है, मैं अपने दिल के उजड़ने की बात किस से कहूँ कोई मिज़ाज पे पूरा नहीं उतरता है, कभी क़मीज़ के आधे बटन लगाते थे और अब बदन से लबादा नहीं उतरता है, मुसालहत के बहुत रास्ते हैं दुनिया में मगर सलीब से ईसा नहीं उतरता है, जुआरियों का मुक़द्दर ख़राब है शायद जो चाहिए वही पत्ता नहीं उतरता है..!! ~शकील जमाली - [इसी दुनिया के इसी दौर के हैं](https://bazmeshayari.com/isi-duniya-ke-isi-daur-ke-hai/): इसी दुनिया के इसी दौर के हैं हम तो दिल्ली में भी बिजनौर के हैं, आप इनआम किसी और को दें हम नमक ख़्वार किसी और के हैं, सरसरी तौर से मत लो हम को हम ज़रा फ़िक्र ज़रा ग़ौर के हैं, कुछ तरीक़े भी पुराने हैं मेरे कुछ मसाइल भी नए दौर के हैं, कोई उम्मीद न रखना हम से अब तो हम यूँ भी किसी और के हैं..!! ~शकील जमाली - [चाहत की लौ को मद्धम कर देता है](https://bazmeshayari.com/chahat-ki-lau-ko-madhham-kar-deta-hai/): चाहत की लौ को मद्धम कर देता है डर जाता है मिलना कम कर देता है, जल्दी अच्छे हो जाने का जज़्बा भी ज़ख़्मों को वक़्फ़ ए मरहम कर देता है, मौत तो फिर भी अपने वक़्त पे आती है मौत का आधा काम तो ग़म कर देता है, सौ ग़ज़लें होती हैं और मर जाती हैं एक मिस्रा तारीख़ रक़म कर देता है, दिल में ऐसे दुख ने डेरा डाला है ऐसा दुख जो आँखें नम कर देता है, सब्र का दामन हाथों से मत जाने दो सब्र दिलों की वहशत कम कर देता है..!! ~शकील जमाली - [कहानी में छोटा सा किरदार है](https://bazmeshayari.com/kahani-me-chhota-saa-kirdar-hai/): कहानी में छोटा सा किरदार है हमारा मगर एक मेआर है, ख़ुदा तुझ को सुनने की तौफ़ीक़ दे मेरी ख़ामुशी मेरा इज़हार है, ये कैसे इलाक़े में हम आ बसे घरों से निकलते ही बाज़ार है, सियासत के चेहरे पे रौनक़ नहीं ये औरत हमेशा की बीमार है, हक़ीक़त का एक शाइबा तक नहीं तुम्हारी कहानी मज़ेदार है, तअल्लुक़ की तजहीज़ ओ तकफ़ीन कर वो दामन छुड़ाने को तय्यार है, पड़ोसी पड़ोसी से है बे ख़बर मगर सब के हाथों में अख़बार है, ये छुट्टी का दिन हम से मत छीनना यही हम ग़रीबों का त्यौहार है, उसे मश्वरों की - [सब के होते हुए लगता है कि घर ख़ाली है](https://bazmeshayari.com/sab-ke-hote-hue-lagta-hai-ki-ghar-khaali-hai/): सब के होते हुए लगता है कि घर ख़ाली है ये तकल्लुफ़ है कि जज़्बात की पामाली है, आसमानों से उतरने का इरादा हो तो सुन शाख़ पर एक परिंदे की जगह ख़ाली है, जिस की आँखों में शरारत थी वो महबूबा थी ये जो मजबूर सी औरत है ये घर वाली है, रात बे लुत्फ़ है परहेज़ के सालन की तरह दिन भिखारी के कटोरे की तरह ख़ाली है, मुद्दतों ख़ुद को भरोसे में लिया है मैं ने तब कहीं तेरी मोहब्बत ने सिपर डाली है..!! ~शकील जमाली - [अगर हमारे ही दिल में ठिकाना चाहिए था](https://bazmeshayari.com/agar-humare-hi-dil-me-thikaana-chahiye-tha/): अगर हमारे ही दिल में ठिकाना चाहिए था तो फिर तुझे ज़रा पहले बताना चाहिए था, चलो हमी सही सारी बुराइयों का सबब मगर तुझे भी ज़रा सा निभाना चाहिए था, अगर नसीब में तारीकियाँ ही लिखी थीं तो फिर चराग़ हवा में जलाना चाहिए था, मोहब्बतों को छुपाते हो बुज़दिलों की तरह ये इश्तिहार गली में लगाना चाहिए था, जहाँ उसूल ख़ता में शुमार होते हों वहाँ वक़ार नहीं सर बचाना चाहिए था, लगा के बैठ गए दिल को रोग चाहत का ये उम्र वो थी कि खाना कमाना चाहिए था..!! ~शकील जमाली - [अल्फ़ाज़ नर्म हो गए लहजे बदल गए](https://bazmeshayari.com/alfaaz-narm-ho-gaye-lahze-badal-gaye/): अल्फ़ाज़ नर्म हो गए लहजे बदल गए लगता है ज़ालिमों के इरादे बदल गए, ये फ़ाएदा ज़रूर हुआ एहतिजाज से जो ढो रहे थे हम को वो काँधे बदल गए, अब ख़ुशबुओं के नाम पते ढूँढते फिरो महफ़िल में लड़कियों के दुपट्टे बदल गए, ये सरकशी कहाँ है हमारे ख़मीर में लगता है अस्पताल में बच्चे बदल गए, कुछ लोग हैं जो झेल रहे हैं मुसीबतें कुछ लोग हैं जो वक़्त से पहले बदल गए, मुझ को मेरी पसंद का सामे तो मिल गया लेकिन ग़ज़ल के सारे हवाले बदल गए..!! ~शकील जमाली - [वफ़ादारों पे आफ़त आ रही है](https://bazmeshayari.com/wafadaaron-pe-aafat-aa-rahi-hai/): वफ़ादारों पे आफ़त आ रही है मियाँ ले लो जो क़ीमत आ रही है, मैं उस से इतने वादे कर चुका हूँ मुझे इस बार ग़ैरत आ रही है, न जाने मुझ में क्या देखा है उस ने मुझे उस पर मोहब्बत आ रही है, बदलता जा रहा है झूठ सच में कहानी में सदाक़त आ रही है, मेरा झगड़ा ज़माने से नहीं है मेरे आड़े मोहब्बत आ रही है, अभी रौशन हुआ जाता है रस्ता वो देखो एक औरत आ रही है, मुझे उस की उदासी ने बताया बिछड़ जाने की साअत आ रही है, बड़ों के दरमियाँ बैठा - [जुनूँ से गुज़रने को जी चाहता है](https://bazmeshayari.com/junoon-se-guzarne-ko-jee-chahta-hai/): जुनूँ से गुज़रने को जी चाहता है हँसी ज़ब्त करने को जी चाहता है, जहाँ इश्क़ में डूब कर रह गए हैं वहीं फिर उभरने को जी चाहता है, वो हम से ख़फ़ा हैं हम उन से ख़फ़ा हैं मगर बात करने को जी चाहता है, है मुद्दत से बे-रंग नक़्श ए मोहब्बत कोई रंग भरने को जी चाहता है, ब ईं ख़ुदसरी वो ग़ुरूर ए मोहब्बत उन्हें सज्दा करने को जी चाहता है, क़ज़ा मुज़्दा ए ज़िंदगी ले के आए कुछ इस तरह मरने को जी चाहता है, निज़ाम ए दो आलम की हो ख़ैर या रब फिर एक - [आँख से आँख मिलाता है कोई](https://bazmeshayari.com/aankh-se-aankh-milaata-hai-koi/): आँख से आँख मिलाता है कोई दिल को खींचे लिए जाता है कोई, वाए हैरत कि भरी महफ़िल में मुझ को तन्हा नज़र आता है कोई, सुब्ह को ख़ुनुक फ़ज़ाओं की क़सम रोज़ आ आ के जगाता है कोई, मंज़र ए हुस्न ए दो आलम के निसार मुझ को आईना दिखाता है कोई, चाहिए ख़ुद पे यक़ीन ए कामिल हौसला किस का बढ़ाता है कोई, सब करिश्मात ए तसव्वुर हैं शकील वर्ना आता है न जाता है कोई..!! ~शकील बदायूनी - [न मिलता ग़म तो बर्बादी के अफ़्साने कहाँ जाते](https://bazmeshayari.com/na-milta-gam-to-barbadi-ke-afsaane-kahan-jaate/): न मिलता ग़म तो बर्बादी के अफ़्साने कहाँ जाते अगर दुनिया चमन होती तो वीराने कहाँ जाते ? चलो अच्छा हुआ अपनों में कोई ग़ैर तो निकला अगर होते सभी अपने तो बेगाने कहाँ जाते ? दुआएँ दो मोहब्बत हम ने मिट कर तुम को सिखलाई न जलती शम्अ महफ़िल में तो परवाने कहाँ जाते ? तुम्हीं ने ग़म की दौलत दी बड़ा एहसान फ़रमाया ज़माने भर के आगे हाथ फैलाने कहाँ जाते..?? ~शकील बदायूनी - [ये दुनिया है यहाँ दिल को लगाना किस को आता है](https://bazmeshayari.com/ye-duniya-hai-yahan-dil-ko-lagaana-kis-ko-aata-hai/): ये दुनिया है यहाँ दिल को लगाना किस को आता है हज़ारों प्यार करते हैं निभाना किस को आता है ? ये दुनिया है यहाँ दिल में समाना किस को आता है मिटाने वाले लाखों हैं बनाना किस को आता है ? निगाहें फेर लीं तुम ने तो हम किस की तरफ़ देखें तुम्ही कह दो मोहब्बत का फ़साना किस को आता है ? वफ़ा का यूँ तो दम भरते हैं इस दुनिया में सब लेकिन वफ़ा के नाम पर मिट कर दिखाना किस को आता है..?? ~शकील बदायूनी - [बदले बदले मेरे ग़म ख़्वार नज़र आते हैं](https://bazmeshayari.com/badle-badle-mere-gam-khwaar-nazar-aate-hain/): बदले बदले मेरे ग़म ख़्वार नज़र आते हैं मरहले इश्क़ के दुश्वार नज़र आते हैं, कश्ती ए ग़ैरत ए एहसास सलामत यारब आज तूफ़ान के आसार नज़र आते हैं, इंक़लाब आया न जाने ये चमन में कैसा ग़ुंचा ओ गुल मुझे तलवार नज़र आते हैं, जिन की आँखों से छलकता था कभी रंग ए ख़ुलूस इन दिनों माइल ए तकरार नज़र आते हैं, जो सुना करते थे हंस हंस के कभी नामा ए शौक़ अब मेरी शक्ल से बेज़ार नज़र आते हैं, उन के आगे जो झुकी रहती हैं नज़रें अपनी इस लिए हम ही ख़तावार नज़र आते हैं, दुश्मन - [कैसे कह दूँ की मुलाक़ात नहीं होती है](https://bazmeshayari.com/kaise-kah-doon-ki-mulaqaat-nahi-hoti/): कैसे कह दूँ की मुलाक़ात नहीं होती है रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है, आप लिल्लाह न देखा करें आईना कभी दिल का आ जाना बड़ी बात नहीं होती है, छुप के रोता हूँ तेरी याद में दुनिया भर से कब मेरी आँख से बरसात नहीं होती है, हाल ए दिल पूछने वाले तेरी दुनिया में कभी दिन तो होता है मगर रात नहीं होती है, जब भी मिलते हैं तो कहते हैं कि कैसे हो शकील इस से आगे तो कोई बात नहीं होती है..!! ~शकील बदायूनी - [ऐ इश्क़ ये सब दुनिया वाले बेकार की बातें करते हैं](https://bazmeshayari.com/ae-ishq-ye-sab-duniya-wale-bekaar-ki-baaten-karte-hain/): ऐ इश्क़ ये सब दुनिया वाले बेकार की बातें करते हैं पायल के ग़मों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं, हर दिल में छुपा है तीर कोई हर पाँव में है ज़ंजीर कोई पूछे कोई इन से ग़म के मज़े जो प्यार की बातें करते हैं, उल्फ़त के नए दीवानों को किस तरह से कोई समझाए नज़रों पे लगी है पाबंदी दीदार की बातें करते हैं, भँवरे हैं अगर मदहोश तो क्या परवाने भी हैं ख़ामोश तो क्या सब प्यार के नग़्मे गाते हैं सब यार की बातें करते हैं..!! ~शकील बदायूनी - [आख़िरी वक़्त है आख़िरी साँस है](https://bazmeshayari.com/aakhiri-waqt-hai-aakhiri-saans-hai/): आख़िरी वक़्त है आख़िरी साँस है ज़िंदगी की है शाम आख़िरी आख़िरी संगदिल आ भी जा अब ख़ुदा के लिए लब पे है तेरा नाम आख़िरी आख़िरी, कुछ तो आसान होगा अदम का सफ़र उन से कहना तुम्हें ढूँढती है नज़र नामाबर तू ख़ुदारा न अब देर कर दे दे उन को पयाम आख़िरी आख़िरी, तौबा करता हूँ कल से पियूँगा नहीं मयकशी के सहारे जियूँगा नहीं मेरी तौबा से पहले मगर साक़िया सिर्फ़ दे एक जाम आख़िरी आख़िरी, मुझ को यारों ने नहला के कफ़ना दिया दो घड़ी भी न बीती कि दफ़ना दिया कौन करता है ग़म टूटते - [आज फिर गर्दिश ए तक़दीर पे रोना आया](https://bazmeshayari.com/aaj-fir-gardish-e-takdeer-pe-rona-aaya/): आज फिर गर्दिश ए तक़दीर पे रोना आया दिल की बिगड़ी हुई तस्वीर पे रोना आया, इश्क़ की क़ैद में अब तक तो उमीदों पे जिए मिट गई आस तो ज़ंजीर पे रोना आया, क्या हसीं ख़्वाब मोहब्बत ने दिखाया था हमें खुल गई आँख तो ताबीर पे रोना आया, पहले क़ासिद की नज़र देख के दिल सहम गया फिर तेरी सुर्ख़ी ए तहरीर पे रोना आया, दिल गँवा कर भी मोहब्बत के मज़े मिल न सके अपनी खोई हुई तक़दीर पे रोना आया, कितने मसरूर थे जीने की दुआओं पे शकील जब मिले रंज तो तासीर पे रोना आया..!! - [ग़म ए आशिक़ी से कह दो रह ए आम तक न पहुँचे](https://bazmeshayari.com/gam-e-ashiqui-se-kah-do-rah-e-aam-tak-na-pahunche/): ग़म ए आशिक़ी से कह दो रह ए आम तक न पहुँचे मुझे ख़ौफ़ है ये तोहमत तेरे नाम तक न पहुँचे, मैं नज़र से पी रहा था तो ये दिल ने बददुआ दी तेरा हाथ ज़िंदगी भर कभी जाम तक न पहुँचे, वो नवा ए मुज़्महिल क्या न हो जिस में दिल की धड़कन वो सदा ए अहल ए दिल क्या जो अवाम तक न पहुँचे, मेरे ताइर ए नफ़स को नहीं बाग़बाँ से रंजिश मिले घर में आब ओ दाना तो ये दाम तक न पहुँचे, नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है ये - [ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया](https://bazmeshayari.com/ae-mohabbat-tere-anjaam-pe-rona-aaya/): ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया जाने क्यूँ आज तेरे नाम पे रोना आया ? यूँ तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती है आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया, कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला मंज़िल ए इश्क़ में हर गाम पे रोना आया, मुझ पे ही ख़त्म हुआ सिलसिला ए नौहागरी इस क़दर गर्दिश ए अय्याम पे रोना आया, जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का शकील मुझ को अपने दिल ए नाकाम पे रोना आया..!! ~शकील बदायूनी - [मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे](https://bazmeshayari.com/mere-humnafas-mere-humnawa-mujhe-dost-ban-ke-daga-na-de/): मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे मैं हूँ दर्द ए इश्क़ से जाँ ब लब मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे, मेरे दाग़ ए दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी मुझे डर है ऐ मेरे चारागर ये चराग़ तू ही बुझा न दे, मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर तेरा क्या भरोसा है चारागर ये तेरी नवाज़िश ए मुख़्तसर मेरा दर्द और बढ़ा न दे, मेरा अज़्म इतना बुलंद है कि पराए शोलों का डर नहीं मुझे ख़ौफ़ आतिश ए गुल से है ये कहीं चमन को जला न दे, वो उठे - [गुलों में रंग भरे बाद ए नौ बहार चले](https://bazmeshayari.com/gulon-me-rang-bhare-baad-e-nau-bahar-chale/): गुलों में रंग भरे बाद ए नौ बहार चले चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले, क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो कहीं तो बहर ए ख़ुदा आज ज़िक्र ए यार चले, कभी तो सुब्ह तेरे कुंज ए लब से हो आग़ाज़ कभी तो शब सर ए काकुल से मुश्कबार चले, बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल ग़रीब सही तुम्हारे नाम पे आएँगे ग़मगुसार चले, जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब ए हिज्राँ हमारे अश्क तेरी आक़िबत सँवार चले, हुज़ूर ए यार हुई दफ़्तर ए जुनूँ की तलब गिरह में ले के गरेबाँ - [दिल ए नादाँ तुझे हुआ क्या है](https://bazmeshayari.com/dil-e-naadaan-tujhe-hua-kya-hai/): दिल ए नादाँ तुझे हुआ क्या है आख़िर इस दर्द की दवा क्या है ? हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार या इलाही ये माजरा क्या है ? मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ काश पूछो कि मुद्दआ क्या है ? जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है ? ये परी चेहरा लोग कैसे हैं ग़म्ज़ा ओ इश्वा ओ अदा क्या है ? शिकन ए ज़ुल्फ़ ए अंबरीं क्यूँ है निगह ए चश्म ए सुरमा सा क्या है ? सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं अब्र क्या चीज़ है हवा क्या - [सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं](https://bazmeshayari.com/suna-hai-log-use-aankh-bhar-ke-dekhte-hain/): सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं, सुना है रब्त है उस को ख़राबहालों से सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं, सुना है दर्द की गाहक है चश्म ए नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं, सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़ सो हम भी मोजिज़े अपने हुनर के देखते हैं, सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं, सुना है - [कोई समझेगा क्या राज़ ए गुलशन](https://bazmeshayari.com/koi-samjhega-kya-raaj-e-gulshan/): कोई समझेगा क्या राज़ ए गुलशन जब तक उलझे न काँटों से दामन, यक ब यक सामने आ न जाना रुक न जाए कहीं दिल की धड़कन, गुल तो गुल ख़ार तक चुन लिए हैं फिर भी ख़ाली है गुलचीं का दामन, कितनी आराइश ए आशियाना टूट जाए न शाख़ ए नशेमन, अज़्मत ए आशियाना बढ़ा दी बर्क़ को दोस्त समझूँ कि दुश्मन, उन गुलों से तो काँटे ही अच्छे जिन से होती हो तौहीन ए गुलशन..!! ~फ़ना निज़ामी कानपुरी - [साक़िया तू ने मेरे ज़र्फ़ को समझा क्या है](https://bazmeshayari.com/saaqiya-tu-ne-mere-zarf-ko-samjha-kya-hai/): साक़िया तू ने मेरे ज़र्फ़ को समझा क्या है ज़हर पी लूँगा तेरे हाथ से सहबा क्या है ? मैं चला आया तेरा हुस्न ए तग़ाफ़ुल ले कर अब तेरी अंजुमन ए नाज़ में रखा क्या है ? न बगूले हैं न काँटे हैं न दीवाने हैं अब तो सहरा का फ़क़त नाम है सहरा क्या है ? हो के मायूस ए वफ़ा तर्क ए वफ़ा तो कर लूँ लेकिन इस तर्क ए वफ़ा का भी भरोसा क्या है ? कोई पाबंद ए मोहब्बत ही बता सकता है एक दीवाने का ज़ंजीर से रिश्ता क्या है ? साक़िया कल के - [दुनिया ए तसव्वुर हम आबाद नहीं करते](https://bazmeshayari.com/duniya-e-tasavvur-hum-aabaad-nahin-karte/): दुनिया ए तसव्वुर हम आबाद नहीं करते याद आते हो तुम ख़ुद ही हम याद नहीं करते, वो जौर ए मुसलसल से बाज़ आ तो गए लेकिन बेदाद ये क्या कम है बेदाद नहीं करते, साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर अफ़सोस तो करते हैं इमदाद नहीं करते, कुछ दर्द की शिद्दत है कुछ पास ए मोहब्बत है हम आह तो करते हैं फ़रियाद नहीं करते, सहरा से बहारों को ले आए चमन वाले और अपने गुलिस्ताँ को आबाद नहीं करते..!! ~फ़ना निज़ामी कानपुरी - [ऐसा बनना सँवरना मुबारक तुम्हें](https://bazmeshayari.com/aisa-banna-sanvarna-mubarak-tumhen/): ऐसा बनना सँवरना मुबारक तुम्हें कम से कम इतना कहना हमारा करो चाँद शरमाएगा चाँदनी रात में यूँ न ज़ुल्फ़ों को अपनी सँवारा करो, ये तबस्सुम ये आरिज़ ये रौशन जबीं ये अदा ये निगाहें ये ज़ुल्फ़ें हसीं आइने की नज़र लग न जाए कहीं जान ए जाँ अपना सदक़ा उतारा करो, दिल तो क्या चीज़ है जान से जाएँगे मौत आने से पहले ही मर जाएँगे ये अदा देखने वाले लुट जाएँगे यूँ न हँस हँस के दिलबर इशारा करो, फ़िक्र ए उक़्बा की मस्ती उतर जाएगी तौबा टूटी तो क़िस्मत सँवर जाएगी तुम को दुनिया में जन्नत नज़र - [ये बहार का ज़माना ये हसीं गुलों के साए](https://bazmeshayari.com/ye-bahaar-ka-zamana-ye-hasin-gulon-ke-saaye/): ये बहार का ज़माना ये हसीं गुलों के साए मुझे डर है बाग़ बाँ को कहीं नींद आ न जाए, तेरे वादों पर कहाँ तक मेरा दिल फ़रेब खाए कोई ऐसा कर बहाना मेरी आस टूट जाए, मेरे गुलशन ए मोहब्बत में ख़िजाँ कहाँ से आए कभी उस ने गुल खिलाए कभी मैं ने गुल खिलाए, खिले गुलशन ए वफा में गुल ए नामुराद ऐसे ना बहार ही ने पूछा ना खिजां के काम आए, तेरी साज़िश ए तवज्जोह ये नहीं तो और क्या है मैं जहाँ चला सँभल कर वहीं पाँव डगमगाए, मेरे ज़ब्त ए ग़म की अज़्मत का - [राह पर उन को लगा लाए तो हैं बातों में](https://bazmeshayari.com/raah-par-un-ko-laga-laaye-to-hain-baaton-me/): राह पर उन को लगा लाए तो हैं बातों में और खुल जाएँगे दो चार मुलाक़ातों में, ये भी तुम जानते हो चंद मुलाक़ातों में आज़माया है तुम्हें हम ने कई बातों में, ग़ैर के सर की बलाएँ जो नहीं लें ज़ालिम क्या मेरे क़त्ल को भी जान नहीं हाथों में, अब्र ए रहमत ही बरसता नज़र आया ज़ाहिद ख़ाक उड़ती कभी देखी न ख़राबातों में, यारब उस चाँद के टुकड़े को कहाँ से लाऊँ रौशनी जिस की हो इन तारों भरी रातों में, तुम्हीं इंसाफ़ से ऐ हज़रत नासेह कह दो लुत्फ़ उन बातों में आता है कि इन - [ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाएँ हम](https://bazmeshayari.com/gam-se-kahin-nazaat-mile-chain-paayen-hum/): ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाएँ हम दिल ख़ून में नहाए तो गंगा नहाएँ हम, जन्नत में जाएँ हम कि जहन्नम में जाएँ हम मिल जाए तो कहीं न कहीं तुझ को पाएँ हम, जौफ़ ए फ़लक में ख़ाक भी लज़्ज़त नहीं रही जी चाहता है तेरी जफ़ाएँ उठाएँ हम, डर है न भूल जाए वो सफ़्फ़ाक रोज़ ए हश्र दुनिया में लिखते जाते हैं अपनी ख़ताएँ हम, मुमकिन है ये कि वादे पर अपने वो आ भी जाए मुश्किल ये है कि आप में उस वक़्त आएँ हम, नाराज़ हो ख़ुदा तो करें बंदगी से ख़ुश माशूक़ रूठ - [तुम आईना ही न हर बार देखते जाओ](https://bazmeshayari.com/tum-aaeena-hi-na-har-baar-dekhte-jaao/): तुम आईना ही न हर बार देखते जाओ मेरी तरफ़ भी तो सरकार देखते जाओ, न जाओ हाल ए दिल ए ज़ार देखते जाओ कि जी न चाहे तो नाचार देखते जाओ, बहार ए उम्र में बाग़ ए जहाँ की सैर करो खिला हुआ है ये गुलज़ार देखते जाओ, यही तो चश्म ए हक़ीक़त निगर का सुर्मा है निज़ा ए काफ़िर ओ दींदार देखते जाओ, उठाओ आँख न शरमाओ ये तो महफ़िल है ग़ज़ब से जानिब ए अग़्यार देखते जाओ, नहीं है जिंस ए वफ़ा की तुम्हें जो क़द्र न हो बनेंगे कितने ख़रीदार देखते जाओ, तुम्हें ग़रज़ जो करो - [तुम्हारे ख़त में नया एक सलाम किस का था](https://bazmeshayari.com/tumhare-khat-me-naya-ek-salam-kis-ka-tha/): तुम्हारे ख़त में नया एक सलाम किस का था न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था ? वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं ये काम किस ने किया है ये काम किस का था ? वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था ? रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था ? न पूछ गछ थी किसी की वहाँ न आव भगत तुम्हारी बज़्म में कल एहतिमाम किस का था ? तमाम बज़्म जिसे सुन के - [एक वो दौर कि मिन्नतें करता था वफ़ा निभाने की](https://bazmeshayari.com/ek-wo-daur-ki-minnaten-karta-tha-wafa-nibhaane-ki/): एक वो दौर कि मिन्नतें करता था वफ़ा निभाने की एक ये वक़्त कि उसे आरज़ू है दामन छुड़ाने की, नसीब में ही न लिखा था अपने विसाल ए यार वरना तमन्ना उसकी भी बड़ी थी मुझ को अपनाने की, मैं पड़ोस में लगी आग को बुझाता रहा ख़बर ही न रही अपने जलते हुए आशियाने की, हो चुकी सूख सड़ कर जब फ़सलें तबाह हुई तौफ़ीक बादलों को बारिश बरसाने की, उन हसीं आँखों के समंदर में डूब कर उमर कौन तमन्ना करे उभर कर फिर साहिल पाने की..?? ~उमर दराज़ मार्थ - [खिड़कियों से झाँक कर गलियों में डर देखा किए](https://bazmeshayari.com/khidkiyon-se-jhaank-kar-galiyon-me-dar-dekha/): खिड़कियों से झाँक कर गलियों में डर देखा किए घर में बैठे रात दिन दीवार ओ दर देखा किए, ऐसा मंज़र था कि आँखें देख कर पथरा गईं फिर न देखा कुछ मगर नेज़ों पे सर देखा किए, रात भर सोचा किए और सुब्ह दम अख़बार में अपने हाथों अपने मरने की ख़बर देखा किए, एक तारा ना गहाँ चमका गिरा और बुझ गया फिर न आई नींद तारे रात भर देखा किए, वो तो ख़्वाबों में भी ख़ुश्बू की तरह आता रहा फूल की मानिंद उस को हम मगर देखा किए, कौन था वो कब मिला था क्या पता - [इरादा है किसी जंगल में जा रहूँगा मैं](https://bazmeshayari.com/iraada-hai-kisi-jungle-me-jaa-rahunga/): इरादा है किसी जंगल में जा रहूँगा मैं तुम्हारा नाम हर एक पेड़ पर लिखूँगा मैं, हर एक पेड़ पे चढ़ के तुम्हें पुकारूँगा हर एक पेड़ के नीचे तुम्हें मिलूँगा मैं, हर एक पेड़ कोई दास्ताँ सुनाएगा समझ न पाऊँगा लेकिन सुना करूँगा मैं, तमाम रात बहारों के ख़्वाब देखूँगा गिरे पड़े हुए पत्तों पे सो रहूँगा मैं, अँधेरा होने से पहले परिंदे आएँगे उजाला होने से पहले ही जाग उठूँगा मैं, तुम्हें यक़ीन न आए तो क्या हुआ अल्वी मुझे यक़ीन है ऐसे भी जी सकूँगा मैं..!! ~मोहम्मद अल्वी - [शगुन ले कर न क्यूँ घर से चला मैं](https://bazmeshayari.com/shagun-le-kar-na-kyun-ghar-se-chala-main/): शगुन ले कर न क्यूँ घर से चला मैं तुम्हारे शहर में तन्हा फिरा मैं, अकेला था किसे आवाज़ देता उतरती रात से तन्हा लड़ा मैं, गुज़रते वक़्त के पैरों में आया सरकती धूप का साया बना मैं, ख़लाओं में मुझे फेंका गया था ज़मीं पे रेज़ा रेज़ा हो गया मैं, मेरे होने ने मुझ को मार डाला नहीं था तो बहुत महफ़ूज़ था मैं, यहाँ तो आईने ही आईने हैं मुझे ढूंढों कहाँ पर खो गया मैं..!! ~मोहम्मद अल्वी - [वो मेरे साथ आने पे तैयार हो गया](https://bazmeshayari.com/wo-mere-saath-aane-pe-taiyar-ho-gaya/): वो मेरे साथ आने पे तैयार हो गया सोते से हड़बड़ा के मैं बेदार हो गया, उस के हसीन चेहरे पे ख़त ख़ूब था मगर दाढ़ी मुँडा के और तरह दार हो गया, बत्ती बुझा के हीरो हीरोइन लिपट गए क़िस्सा बहुत ही फिर तो मज़ेदार हो गया, क़ातिल फ़रार हो गया पुलिस के आने तक एक राह रौ बेचारा गिरफ़्तार हो गया, उन को गुनाह करते हुए मैं ने जा लिया फिर उन के साथ मैं भी गुनहगार हो गया, मर्दांगी का उस की बहुत शोर था मगर आई शब ए विसाल तो बीमार हो गया..!! ~मोहम्मद अल्वी - [गिरह में रिश्वत का माल रखिए](https://bazmeshayari.com/girah-me-rishwat-ka-maal-rakhiye/): गिरह में रिश्वत का माल रखिए ज़रूरतों को बहाल रखिए, बिछाए रखिए अँधेरा हर सू सितारा कोई उछाल रखिए, अरे ये दिल और इतना ख़ाली कोई मुसीबत ही पाल रखिए, जहाँ कि बस एक तिलिस्म सा है न टूट जाए ख़याल रखिए, तुड़ा मुड़ा है मगर ख़ुदा है इसे तो साहब सँभाल रखिए, तमाम रंजिश को दिल से अल्वी वो आ रहा है निकाल रखिए..!! ~मोहम्मद अल्वी - [थोड़ी सर्दी ज़रा सा नज़ला है](https://bazmeshayari.com/thodi-sardi-zara-saa-nazla-hai/): थोड़ी सर्दी ज़रा सा नज़ला है शायरी का मिज़ाज पतला है, सुनने वालों का कुछ क़ुसूर नहीं नया शायर बेचारा हकला है, देखिए तो सभी बराबर है सोचिए तो अजीब घपला है, प्यार करते भी हैं नहीं भी हैं दिल इसी बात पर तो मचला है, अब यहाँ कोई भी नहीं आता दोस्तों ने ठिकाना बदला है, आओ अल्वी मज़े करा लाएँ यार इस शहर में भी चकला है..!! ~मोहम्मद अल्वी - [दुख का एहसास न मारा जाए](https://bazmeshayari.com/dukh-ka-ehsas-na-maara-jaaye/): दुख का एहसास न मारा जाए आज जी खोल के हारा जाए, इन मकानों में कोई भूत भी है रात के वक़्त पुकारा जाए, सोचने बैठें तो इस दुनिया में एक लम्हा न गुज़ारा जाए, ढूँढता हूँ मैं ज़मीं अच्छी सी ये बदन जिस में उतारा जाए, साथ चलता हुआ साया अपना एक पत्थर उसे मारा जाए, हम यगाना तो नहीं हैं अल्वी नाव जाए कि किनारा जाए..!! ~मोहम्मद अल्वी - [सुखाने बाल ही कोठे पे आ गए होते](https://bazmeshayari.com/sukhaane-baal-hi-kothe-pe-aa-gaye-hote/): सुखाने बाल ही कोठे पे आ गए होते इसी बहाने ज़रा मुँह दिखा गए होते, तुम्हें भी वक़्त की रफ़्तार का पता चलता निकल के घर से गली तक तो आ गए होते, गला भिगो के कहीं और सदा लगा लेता ज़रा फ़क़ीर को पानी पिला गए होते, अरे ये ठीक हुआ होंट सी लिए हम ने वगर्ना लोग तुझे कब का पा गए होते, भला हो चाँद का आते ही नूर पहुँचाया सितारे होते तो आँखें चुरा गए होते, जवान जिस्मों को ठंडा न कर सके लेकिन हवा के झोंके दिया तो बुझा गए होते..!! ~मोहम्मद अल्वी - [सच है कि वो बुरा था हर एक से लड़ा किया](https://bazmeshayari.com/sach-hai-ki-wo-bura-tha/): सच है कि वो बुरा था हर एक से लड़ा किया लेकिन उसे ज़लील किया ये बुरा किया, गुलदान में गुलाब की कलियाँ महक उठीं कुर्सी ने उस को देख के आग़ोश वा किया, घर से चला तो चाँद मेरे साथ हो लिया फिर सुब्ह तक वो मेरे बराबर चला किया, कोठों पे मुँह अँधेरे सितारे उतर पड़े बन के पतंग मैं भी हवा में उड़ा किया, उस से बिछड़ते वक़्त मैं रोया था ख़ूब सा ये बात याद आई तो पहरों हँसा किया, छोड़ो पुराने क़िस्सों में कुछ भी धरा नहीं आओ तुम्हें बताएँ कि अल्वी ने क्या किया..!! - [ऐसा हुआ नहीं है पर ऐसा न हो कहीं](https://bazmeshayari.com/aisa-hua-nahin-hai-par-aisa-na-ho/): ऐसा हुआ नहीं है पर ऐसा न हो कहीं उस ने मुझे न देख के देखा न हो कहीं, क़दमों की चाप देर से आती है कान में कोई मेरे ख़याल में फिरता न हो कहीं, सनकी हुई हवाओं में ख़ुश्बू की आँच है पत्तों में कोई फूल दहकता न हो कहीं, ये कौन झाँकता है किवाड़ों की ओट से बत्ती बुझा के देख सवेरा न हो कहीं, अल्वी ख़ुदा के वास्ते घर में पड़े रहो बाहर न जाओ फिर कोई झगड़ा न हो कहीं..!! ~मोहम्मद अल्वी - [रात पड़े घर जाना है](https://bazmeshayari.com/raat-pade-ghar-jaana-hai/): रात पड़े घर जाना है सुब्ह तलक मर जाना है, जाग के पछताना है बहुत सोते में डर जाना है, जाने से पहले हम ने शोर बहुत कर जाना है, सारे ख़ून ख़राबे को आँखों में भर जाना है, अंधों ने बुलवाया है भेस बदल कर जाना है, छे नज़्में जुर्माना था एक ग़ज़ल हर्जाना है, लड़की अच्छी है अल्वी नाम उस का मरजाना है..!! ~मोहम्मद अल्वी - [क्या कहते क्या जी में था](https://bazmeshayari.com/kya-kahte-kya-jee-me-tha/): क्या कहते क्या जी में था शोर बहुत बस्ती में था, पहली बूँद गिरी टप से फिर सब कुछ पानी में था, छतें गिरीं घर बैठ गए ज़ोर ऐसा आँधी में था, मौजें साहिल फाँद गईं दरिया गली गली में था, मेरी लाश नहीं है ये क्या इतना भारी मैं था, आख़िर तूफ़ाँ गुज़र गया देखा तो बाक़ी मैं था, छोड़ गया मुझ को अल्वी शायद वो जल्दी में था..!! ~मोहम्मद अल्वी - [तीसरी आँख खुलेगी तो दिखाई देगा](https://bazmeshayari.com/teesri-aankh-khulegi-to-dikhaai-dega/): तीसरी आँख खुलेगी तो दिखाई देगा और कै दिन मेरा हमज़ाद जुदाई देगा ? वो न आएगा मगर दिल ये कहे जाता है उस के आने का अभी शोर सुनाई देगा, दिल का आईना हुआ जाता है धुँदला धुँदला कब तेरा अक्स इसे अपनी सफ़ाई देगा ? ख़ुश था मैं चेहरे पे आँखों को सजा कर लेकिन क्या ख़बर थी मुझे कुछ भी न सुझाई देगा, अपने ही ख़ून में आलूदा किए बैठा हूँ कौन इस हाथ में अब दस्त ए हिनाई देगा ? मौत भी दूर बहुत दूर कहीं फिरती है कौन अब आ के असीरों को रिहाई देगा - [अचानक तेरी याद का सिलसिला](https://bazmeshayari.com/achanak-teri-yaad-ka-silsila/): अचानक तेरी याद का सिलसिला अँधेरे की दीवार बन के गिरा, अभी कोई साया निकल आएगा ज़रा जिस्म को रौशनी तो दिखा, पड़ा था दरख़्तों तले टूट कर चमकती हुई धूप का आइना, कोई अपने घर से निकलता नहीं अजब हाल है आज कल शहर का, मैं उस के बदन की मुक़द्दस किताब निहायत अक़ीदत से पढ़ता रहा, ये क्या आप फिर शेर कहने लगे अरे यार अल्वी ये फिर क्या हुआ..?? ~मोहम्मद अल्वी - [रात के मुँह पर उजाला चाहिए](https://bazmeshayari.com/raat-ke-munh-par-ujaala-chahiye/): रात के मुँह पर उजाला चाहिए चोर के घर में भी ताला चाहिए, ग़म बहुत दिन मुफ़्त की खाता रहा अब उसे दिल से निकाला चाहिए, पाँव में जूती न हो तो कुछ नहीं हाँ मगर एक आध छाला चाहिए, हाथ फैलाने से कुछ मिलता नहीं भीख लेने को प्याला चाहिए, याद उन की यूँ न जाएगी उसे कुछ बहाना कर के टाला चाहिए, शायरी माँगे है पूरा आदमी अब उसे भी मोंछ वाला चाहिए..!! ~मोहम्मद अल्वी - [सोचते रहते हैं अक्सर रात में](https://bazmeshayari.com/sochate-rahte-hain-aksar-raat-me/): सोचते रहते हैं अक्सर रात में डूब क्यूँ जाते हैं मंज़र रात में ? किस ने लहराई हैं ज़ुल्फ़ें दूर तक कौन फिरता है खुले सर रात में ? चाँदनी पी कर बहक जाती है रात चाँद बन जाता है साग़र रात में, चूम लेते हैं किनारों की हदें झूम उठते हैं समुंदर रात में, खिड़कियों से झाँकती है रौशनी बत्तियाँ जलती हैं घर घर रात में, रात का हम पर बड़ा एहसान है रो लिया करते हैं खुल कर रात में, दिल का पहलू में गुमाँ होता नहीं आँख बन जाती है पत्थर रात में, अल्वी साहब वक़्त है - [धूप में सब रंग गहरे हो गए](https://bazmeshayari.com/dhoop-me-sab-rang-gahre-ho-gaye/): धूप में सब रंग गहरे हो गए तितलियों के पर सुनहरे हो गए, सामने दीवार पर कुछ दाग़ थे ग़ौर से देखा तो चेहरे हो गए, अब न सुन पाएँगे हम दिल की पुकार सुनते सुनते कान बहरे हो गए, अब किसी की याद भी आती नहीं दिल पे अब फ़िक्रों के पहरे हो गए, आओ अल्वी अब तो अपने घर चलें दिन बहुत दिल्ली में ठहरे हो गए..!! ~मोहम्मद अल्वी - [कोई मौसम हो भले लगते थे](https://bazmeshayari.com/koi-mausam-ho-bhale-lagte-the/): कोई मौसम हो भले लगते थे दिन कहाँ इतने कड़े लगते थे ? ख़ुश तो पहले भी नहीं थे लेकिन यूँ न अंदर से बुझे लगते थे, रोज़ के देखे हुए मंज़र थे फिर भी हर रोज़ नए लगते थे, उन दिनों घर से अजब रिश्ता था सारे दरवाज़े गले लगते थे, रह समझती थीं अँधेरी गलियाँ लोग पहचाने हुए लगते थे, झीलें पानी से भरी रहती थीं सब के सब पेड़ हरे लगते थे, शहर थे ऊँची फ़सीलों वाले डर ज़माने के परे लगते थे, बाँध रखा था ज़मीं ने अल्वी हम मगर फिर भी अड़े लगते थे..!! ~मोहम्मद - [दिन में परियाँ क्यूँ आती हैं ?](https://bazmeshayari.com/din-me-pariyan-kyun-aati-hai/): दिन में परियाँ क्यूँ आती हैं ऐसी घड़ियाँ क्यूँ आती हैं ? अपना घर आने से पहले इतनी गलियाँ क्यूँ आती हैं ? बाहर किस का डर लगता है घर में चिड़ियाँ क्यूँ आती हैं ? दिन क्यूँ नंगे हो जाते हैं रातें उर्यां क्यूँ आती हैं ? शेर में उल्टी सीधी बातें बोल मेरी जाँ क्यूँ आती हैं ? अल्वी क़ब्रों तक जाने में भूल भूलैयाँ क्यूँ आती हैं..?? ~मोहम्मद अल्वी - [सफ़र में सोचते रहते हैं छाँव आए कहीं](https://bazmeshayari.com/safar-me-sochte-rahte-hai-chhanv-aaye-kahin/): सफ़र में सोचते रहते हैं छाँव आए कहीं ये धूप सारा समुंदर ही पी न जाए कहीं, मैं ख़ुद को मरते हुए देख कर बहुत ख़ुश हूँ ये डर भी है कि मेरी आँख खुल न जाए कहीं, हवा का शोर है बादल हैं और कुछ भी नहीं जहाज़ टूट ही जाए ज़मीं दिखाए कहीं, चला तो हूँ मगर इस बार भी ये धड़का है ये रास्ता भी मुझे फिर यहीं न लाए कहीं, ख़मोश रहना तुम्हारा बुरा न था अल्वी भुला दिया तुम्हें सब ने न याद आए कहीं..!! ~मोहम्मद अल्वी - [कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए](https://bazmeshayari.com/kuch-to-is-dil-ko-saza-dee-jaaye/): कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए उस की तस्वीर हटा दी जाए, ढूँढने में भी मज़ा आता है कोई शय रख के भुला दी जाए, नाम लिख लिख के तेरा काग़ज़ पर रौशनाई भी गिरा दी जाए, नाव काग़ज़ की बना कर उस को बहते पानी में बहा दी जाए, रात को चुपके से एक एक घर की क्यूँ न ज़ंजीर लगा दी जाए ? नींद में चौंक पड़ेगा कोई आओ उस दर पे सदा दी जाए, आख़िरी साँस महक जाएगी उस के दामन की हवा दी जाए, सब के सब याद चले आते हैं आज किस किस - [सर्दी में दिन सर्द मिला](https://bazmeshayari.com/sardi-me-din-sard-mila/): सर्दी में दिन सर्द मिला हर मौसम बेदर्द मिला, ऊँचे लम्बे पेड़ों का पत्ता पत्ता ज़र्द मिला, सोचते हैं क्यूँ ज़िंदा हैं अच्छा ये सर दर्द मिला, हम रोए तो बात भी थी क्यूँ रोता हर फ़र्द मिला ? मिला हमें बस एक ख़ुदा और वो भी बेदर्द मिला, अल्वी ख़्वाहिश भी थी बाँझ जज़्बा भी ना मर्द मिला..!! ~मोहम्मद अल्वी - [मुँह ज़बानी क़ुरआन पढ़ते थे](https://bazmeshayari.com/munh-zabani-quraan-padhte-the/): मुँह ज़बानी क़ुरआन पढ़ते थे पहले बच्चे भी कितने बूढ़े थे, एक परिंदा सुना रहा था ग़ज़ल चार छे पेड़ मिल के सुनते थे, जिन को सोचा था और देखा भी ऐसे दो चार ही तो चेहरे थे, अब तो चुप चाप शाम आती है पहले चिड़ियों के शोर होते थे, रात उतरा था शाख़ पर एक गुल चार सू ख़ुशबुओं के पहरे थे, आज की सुब्ह कितनी हल्की है याद पड़ता है रात रोए थे, ये कहाँ दोस्तों में आ बैठे हम तो मरने को घर से निकले थे, ये भी दिन हैं कि आग गिरती है वो भी - [दिन एक के बाद एक गुज़रते हुए भी देख](https://bazmeshayari.com/din-ek-ke-baad-ek-guzarte-hue-bhi-dekh/): दिन एक के बाद एक गुज़रते हुए भी देख एक दिन तू अपने आप को मरते हुए भी देख, हर वक़्त खिलते फूल की जानिब तका न कर मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुए भी देख, हाँ देख बर्फ़ गिरती हुई बाल बाल पर तपते हुए ख़याल ठिठुरते हुए भी देख, अपनों में रह के किस लिए सहमा हुआ है तू आ मुझ को दुश्मनों से न डरते हुए भी देख, पैवंद बादलों के लगे देख जा ब जा बगलों को आसमान कतरते हुए भी देख, हैरान मत हो तैरती मछली को देख कर पानी में रौशनी को उतरते हुए - [और बाज़ार से क्या ले जाऊँ ?](https://bazmeshayari.com/aur-baazar-se-kya-le-jaaoon/): और बाज़ार से क्या ले जाऊँ पहली बारिश का मज़ा ले जाऊँ कुछ तो सौग़ात दूँ घर वालों को रात आँखों में सजा ले जाऊँ घर में सामाँ तो हो दिलचस्पी का हादिसा कोई उठा ले जाऊँ एक दिया देर से जलता होगा साथ थोड़ी सी हवा ले जाऊँ क्यूँ भटकता हूँ ग़लत राहों में ख़्वाब में उस का पता ले जाऊँ रोज़ कहता है हवा का झोंका आ तुझे दूर उड़ा ले जाऊँ आज फिर मुझ से कहा दरिया ने क्या इरादा है बहा ले जाऊँ ? घर से जाता हूँ तो काम आएँगे एक दो अश्क बचा ले - [धूप ने गुज़ारिश की](https://bazmeshayari.com/dhoop-ne-guzarish-ki-ek-boond-barish-ki/): धूप ने गुज़ारिश की एक बूँद बारिश की, लो गले पड़े काँटे क्यूँ गुलों की ख़्वाहिश की ? जगमगा उठे तारे बात थी नुमाइश की, एक पतिंगा उजरत थी छिपकिली की जुम्बिश की, हम तवक़्क़ो रखते हैं और वो भी बख़्शिश की, लुत्फ़ आ गया अल्वी वाह ख़ूब कोशिश की..!! ~मोहम्मद अल्वी - [लबों पर यूँही सी हँसी भेज दे](https://bazmeshayari.com/labon-par-yunhi-see-hansi-bhej-de/): लबों पर यूँही सी हँसी भेज दे मुझे मेरी पहली ख़ुशी भेज दे, अँधेरा है कैसे तेरा ख़त पढ़ूँ लिफ़ाफ़े में कुछ रौशनी भेज दे, मैं प्यासा हूँ ख़ाली कुआँ है तो क्या सुराही लिए एक परी भेज दे, बहुत नेक बंदे हैं अब भी तेरे किसी पर तो या रब वही भेज दे, कहीं खो न जाए क़यामत का दिन ये अच्छा समय है अभी भेज दे..!! ~मोहम्मद अल्वी - [अच्छे दिन कब आएँगे ?](https://bazmeshayari.com/achche-din-kab-aayenge/): अच्छे दिन कब आएँगे क्या यूँ ही मर जाएँगे ? अपने आप को ख़्वाबों से कब तक हम बहलाएँगे ? बम्बई में ठहरेंगे कहाँ दिल्ली में क्या खाएँगे ? खिलते हैं तो खिलने दो फूल अभी मुरझाएँगे, कितनी अच्छी लड़की है बरसों भूल न पाएँगे, मौत न आई तो अल्वी छुट्टी में घर जाएँगे..!! ~मोहम्मद अल्वी - [नींद रातों की उड़ा देते हैं](https://bazmeshayari.com/neend-raaton-ki-uda-dete-hain/): नींद रातों की उड़ा देते हैं हम सितारों को दुआ देते हैं, रोज़ अच्छे नहीं लगते आँसू ख़ास मौक़ों पे मज़ा देते हैं, अब के हम जान लड़ा बैठेंगे देखें अब कौन सज़ा देते हैं ? हाए वो लोग जो देखे भी नहीं याद आएँ तो रुला देते हैं..!! ~मोहम्मद अल्वी - [है कोई बैर सा उस को मेरी तदबीर के साथ](https://bazmeshayari.com/hai-koi-bair-saa-us-ko-meri-tadbir-ke-saath/): है कोई बैर सा उस को मेरी तदबीर के साथ अब कहाँ तक कोई झगड़ा करे तक़दीर के साथ ? मेरे होने में न होने का था सामाँ मौजूद टूटना मेरा लिखा था मेरी तामीर के साथ, छोड़ जाते हैं हक़ीक़त के जहाँ में हमें फिर ख़्वाब आते ही कहाँ हमें कभी ताबीर के साथ, आदमी ही के बनाए हुए ज़िंदाँ हैं ये सब कोई पैदा नहीं होता किसी ज़ंजीर के साथ, जानते सब हैं कि दो गज़ ही ज़मीं अपनी है कौन ख़ुश रहता है लेकिन किसी जागीर के साथ, साथ ग़ालिब के गई फ़िक्र की गहराई भी और - [एक ख़ला अंदर उतर जाने दिया](https://bazmeshayari.com/ek-khalaa-andar-utar-jaane-diya/): एक ख़ला अंदर उतर जाने दिया ख़ुद को ख़ालीपन से भर जाने दिया, जान मुड़ कर देखती थी बार बार जिस्म ने उस को मगर जाने दिया, कर ही क्या सकते थे हम सो उम्र भर रफ़्ता रफ़्ता ख़ुद को मर जाने दिया, सर छुपाया अपना अपने आप में और तूफ़ाँ को गुज़र जाने दिया, हम न रख पाए ज़बाँ अपनी ख़मोश सर तो जाना ही था सर जाने दिया..!! ~राजेश रेड्डी - [ग़म को दिल का क़रार कर लिया जाए](https://bazmeshayari.com/gam-ko-dil-ka-qarar-kar-liya-jaaye/): ग़म को दिल का क़रार कर लिया जाए इस ख़िज़ाँ को बहार कर लिया जाए, फिर जुनूँ को सवार कर लिया जाए ख़ुद को फिर तार तार कर लिया जाए, ज़िंदगी की कमान से निकले तीर को आर पार कर लिया जाए, ख़ुदकुशी को उधार रखते हुए मौत का इंतिज़ार कर लिया जाए, तजरबों को भुला के चाहते हैं तुझ पे फिर एतिबार कर लिया जाए, एक ही शख़्स तो जहान में है ख़ुद को भी गर शुमार कर लिया जाए, सोच कर इस जहाँ के बारे में ख़ुद को क्यूँ शर्मसार कर लिया जाए ? अब तो लगता दुश्मनों - [अक्स मौजूद न साया मौजूद](https://bazmeshayari.com/aqs-mauzood-na-saya-mauzood-mujh-me/): अक्स मौजूद न साया मौजूद मुझ में अब कुछ नहीं मेरा मौजूद, निकल आता हूँ मैं अक्सर बाहर कोई ख़ुद में रहे कितना मौजूद, कभी दरिया से है क़तरा ग़ाएब कभी क़तरे में है दरिया मौजूद, मैं ज़रा भी नहीं उस में लेकिन मुझ में वो सारा का सारा मौजूद, जब तलक प्यास है तुझ में बाक़ी बस तभी तक है ये दरिया मौजूद, काश मौजूद न हो अपना कोई जिस घड़ी होने लगूँ ला मौजूद..!! ~राजेश रेड्डी - [कोशिश तो है कि ज़ब्त को रुस्वा करूँ नहीं](https://bazmeshayari.com/koshish-to-hai-ki-zabt-ko-ruswa-karoon-nahin/): कोशिश तो है कि ज़ब्त को रुस्वा करूँ नहीं हँस कर मिलूँ सभी से किसी पर खुलूँ नहीं, क़ीमत चुका रहा हूँ मैं शोहरत की इस तरह वो हो के रह गया हूँ जो दरअस्ल हूँ नहीं, ऐ मौत कम ही रहता हूँ मैं अपने आप में ऐसा न हो न कि आए तू और मैं मिलूँ नहीं..!! ~राजेश रेड्डी - [कुछ इस क़दर मैं ख़िरद के असर में आ गया हूँ](https://bazmeshayari.com/kuch-is-qadar-main-khirad-ke-asar-me-aa-gaya-hoon/): कुछ इस क़दर मैं ख़िरद के असर में आ गया हूँ सिमट के सारा का सारा ही सर में आ गया हूँ, ज़मीं उछाल चुकी आसमाँ ने थामा नहीं मैं काएनात में बिल्कुल अधर में आ गया हूँ, ये ज़िंदगी भी मेरे हौसलों पे हैराँ है समझ रही थी कि मैं उस के डर में आ गया हूँ, ज़रा सा फ़ासला मैं ने भी तय किया तो है अगर से दो क़दम आगे मगर मैं आ गया हूँ, मेरी शनाख़्त की ख़ातिर छपी मेरी तस्वीर न जीते जी सही मर के ख़बर में आ गया हूँ, उदास हो गया हूँ - [बे घरी का अपनी ये इज़हार कम कर दीजिए](https://bazmeshayari.com/be-ghari-ka-apni-ye-izhaar-kam-kar-dijiye/): बे घरी का अपनी ये इज़हार कम कर दीजिए शेर में ज़िक्र ए दर ओ दीवार कम कर दीजिए, अपनी तन्हाई में इतना भी ख़लल अच्छा नहीं आप अपने आप से गुफ़्तार कम कर दीजिए, दुश्मनों की ख़ुद ब ख़ुद हो जाएगी तादाद कम यारों की फ़िहरिस्त में कुछ यार कम कर दीजिए, जब तवज्जोह ही नहीं मौजूदगी किस काम की इस कहानी में मेरा किरदार कम कर दीजिए, सोचिए अब इतने चारागर कहाँ से आएँगे मुस्कुरा कर अपने कुछ बीमार कम कर दीजिए, आप की बातों में आ कर जान से तो जा चुके अब तो इन में ज़हर - [दुनिया से जिस से आगे का सोचा नहीं गया](https://bazmeshayari.com/duniya-se-jis-se-aage-ka-socha-nahi-gaya/): दुनिया से जिस से आगे का सोचा नहीं गया हम से वहाँ पहुँच के भी ठहरा नहीं गया, आँखों पे ऐसा वक़्त भी गुज़रा है बारहा वो देखना पड़ा है जो देखा नहीं गया, पढ़वाना चाहते थे नुजूमी से हम वही हम से क़दम ज़मीन पे रखा नहीं गया, नक़्शे में आज ढूँढने बैठा हूँ वो ज़मीं जिस को हज़ार टुकड़ों में बाँटा नहीं गया, अब क्या कहें नुजूमी के बारे में छोड़िए अपना तो ये बरस भी कुछ अच्छा नहीं गया..!! ~राजेश रेड्डी - [ख़त में उभर रही है तस्वीर धीरे धीरे](https://bazmeshayari.com/khat-me-ubhar-rahi-hai-tasveer-dheere-dheere/): ख़त में उभर रही है तस्वीर धीरे धीरे गुम होती जा रही है तहरीर धीरे धीरे, एहसास तुझ को होगा ज़िंदाँ का रफ़्ता रफ़्ता तुझ पर खुलेगी तेरी ज़ंजीर धीरे धीरे, मुझ से ही काम मेरे टलते चले गए हैं होती चली गई है ताख़ीर धीरे धीरे, तक़दीर रंग अपना दिखला रही है पल पल बे रंग हो चली है तदबीर धीरे धीरे, आँखों में एक आँसू भी अब नहीं बचा है हम ने लुटा दी सारी जागीर धीरे धीरे, देखा है जब से उस को लगता है जैसे दिल में पैवस्त हो रहा है एक तीर धीरे धीरे, आसाँ - [न जिस्म साथ हमारे न जाँ हमारी तरफ़](https://bazmeshayari.com/naa-zism-saath-humare-na-jaan-humari-taraf-hai/): न जिस्म साथ हमारे न जाँ हमारी तरफ़ है कुछ भी हम में हमारा कहाँ हमारी तरफ़, खड़े हैं प्यासे अना के इसी भरोसे पर कि चल के आएगा एक दिन कुआँ हमारी तरफ़, बिछड़ते वक़्त वो तक़्सीम कर गया मौसम बहार उस की तरफ़ है ख़िज़ाँ हमारी तरफ़, इसी उमीद पे किरदार हम निभाते रहे कि रुख़ करेगी कभी दास्ताँ हमारी तरफ़, कहाँ कहाँ न छुपे बस्तियाँ जला के मगर जहाँ जहाँ गए आया धुआँ हमारी तरफ़, लगा के जान की बाज़ी जिसे बचाया था खिंची हुई है उसी की कमाँ हमारी तरफ़, उछाल देते हैं पत्थर ख़ला में - [कितनी आसानी से दुनिया की गिरह खोलता है](https://bazmeshayari.com/kitni-aasaani-se-duniya-ki-girah-kholta-hai/): कितनी आसानी से दुनिया की गिरह खोलता है मुझ में एक बच्चा बुज़ुर्गों की तरह बोलता है, क्या अजब है कि उड़ाता है कबूतर पहले फिर फ़ज़ाओं में वो बारूद की बू घोलता है, रूप कितने ही भरें कितने ही चेहरे बदलें आईना आप को अपनी ही तरह तौलता है, सोच लो कल कहीं आँसू न बहाने पड़ जाएँ ख़ून का क्या है रगों में वो यूँही खौलता है, हाथ उठाता है दुआओं को फ़लक भी उस दम जब परिंदा कोई परवाज़ को पर तौलता है, कौन वाक़िफ़ नहीं संसार के सच से लेकिन सब का संसार की हर चीज़ - [इजाज़त कम थी जीने की मगर मोहलत ज़्यादा थी](https://bazmeshayari.com/izazat-kam-thi-jine-ki-magar-mohlat-zyada/): इजाज़त कम थी जीने की मगर मोहलत ज़्यादा थी हमारे पास मरने के लिए फ़ुर्सत ज़्यादा थी, तअज्जुब में तो पड़ता ही रहा है आइना अक्सर मगर इस बार उस की आँखों में हैरत ज़्यादा थी, बुलंदी के लिए बस अपनी ही नज़रों से गिरना था हमारी कम नसीबी हम में कुछ ग़ैरत ज़्यादा थी, जवाँ होने से पहले ही बुढ़ापा आ गया हम पर हमारी मुफ़्लिसी पर उम्र की उजलत ज़्यादा थी, ज़माने से अलग रह कर भी मैं शामिल रहा इस में मेंरे इंकार में इक़रार की नियत ज़्यादा थी..!! मयस्सर मुफ़्त में थे आसमाँ के चाँद तारे - [ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊँ](https://bazmeshayari.com/ye-kab-chaha-ki-mashahoor-ho-jaaoon/): ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊँ बस अपने आप को मंज़ूर हो जाऊँ, नसीहत कर रही है अक़्ल कब से कि मैं दीवानगी से दूर हो जाऊँ, न बोलूँ सच तो कैसा आईना मैं जो बोलूँ सच तो चकना चूर हो जाऊँ, है मेरे हाथ में जब हाथ तेरा अजब क्या है जो मैं मग़रूर हो जाऊँ, बहाना कोई तो ऐ ज़िंदगी दे कि जीने के लिए मजबूर हो जाऊँ, सराबों से मुझे सैराब कर दे नशे में तिश्नगी के चूर हो जाऊँ, मेरे अंदर से गर दुनिया निकल जाए मैं अपने आप में भरपूर हो जाऊँ..!! ~राजेश - [घर से निकले थे हौसला कर के](https://bazmeshayari.com/ghar-se-nikale-the-hausla-kar-ke/): घर से निकले थे हौसला कर के लौट आए ख़ुदा ख़ुदा कर के, दर्द ए दिल पाओगे वफ़ा कर के हम ने देखा है तजरबा कर के, लोग सुनते रहे दिमाग़ की बात हम चले दिल को रहनुमा कर के, किस ने पाया सुकून दुनिया में ज़िंदगानी का सामना कर के, ज़िंदगी तो कभी नहीं आई मौत आई ज़रा ज़रा कर के..!! ~राजेश रेड्डी - [कुछ परिंदों को तो बस दो चार दाने चाहिएँ](https://bazmeshayari.com/kuch-parindo-ko-to-bas-do-chaar-daane-chahiye/): कुछ परिंदों को तो बस दो चार दाने चाहिएँ कुछ को लेकिन आसमानों के ख़ज़ाने चाहिएँ, दोस्तों का क्या है वो तो यूँ भी मिल जाते हैं मुफ़्त रोज़ एक सच बोल कर दुश्मन कमाने चाहिएँ, तुम हक़ीक़त को लिए बैठे हो तो बैठे रहो ये ज़माना है इसे हर दिन फ़साने चाहिएँ, रोज़ इन आँखों के सपने टूट जाते हैं तो क्या ? रोज़ इन आँखों में फिर सपने सजाने चाहिएँ, बार हा ख़ुश हो रहे हैं क्यूँ इन्ही बातों पे लोग बार हा जिन पे उन्हें आँसू बहाने चाहिएँ..!! ~राजेश रेड्डी - [किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँ नहीं होता](https://bazmeshayari.com/kisi-din-zindagaani-me-karishma-kyun-nahi-hota/): किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँ नहीं होता मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ ज़िंदा क्यूँ नहीं होता ? मेरी एक ज़िंदगी के कितने हिस्सेदार हैं लेकिन किसी की ज़िंदगी में मेरा हिस्सा क्यूँ नहीं होता ? जहाँ में यूँ तो होने को बहुत कुछ होता रहता है मैं जैसा सोचता हूँ कुछ भी वैसा क्यूँ नहीं होता ? हमेशा तंज़ करते हैं तबीअत पूछने वाले तुम अच्छा क्यूँ नहीं करते मैं अच्छा क्यूँ नहीं होता ? ज़माने भर के लोगों को किया है मुब्तला तू ने जो तेरा हो गया तू भी उसी का क्यूँ नहीं होता..?? ~राजेश - [चूर था ज़ख़्मों से दिल ज़ख़्मी जिगर भी हो गया](https://bazmeshayari.com/choor-tha-zakhmon-se-dil-zakhmi-zigar-bhi-ho-gaya/): चूर था ज़ख़्मों से दिल ज़ख़्मी जिगर भी हो गया उस को रोते थे कि सूना ये नगर भी हो गया, लोग उसी सूरत परेशाँ हैं जिधर भी देखिए और वो कहते हैं कोह ए ग़म तो सर भी हो गया, बाम ओ दर पर है मुसल्लत आज भी शाम ए अलम यूँ तो इन गलियों से ख़ुर्शीद ए सहर भी हो गया, उस सितमगर की हक़ीक़त हम पे ज़ाहिर हो गई ख़त्म ख़ुश फ़हमी की मंज़िल का सफ़र भी हो गया..!! ~हबीब जालिब क्या दौर था फ़ुर्सतों में बस यही काम होना - [क्या दौर था फ़ुर्सतों में बस यही काम होना](https://bazmeshayari.com/kya-daur-tha-fursaton-me-bas-yahi-kaam-hona/): क्या दौर था फ़ुर्सतों में बस यही काम होना आँखों में सूरत तेरी होंठों पर तेरा नाम होना, हसीं ख़्यालों की दुनिया में बसा कर तुझे चलते फिरते उठते बैठते तुझ से हम कलाम होना, तुम्हारी सहर अंगेज़ क़ुर्बत की हसीं क़ैद में वो शाम से सुबह वो सुबह से शाम होना, बारहा मुझ से दिल का हाल कहते हुए मुँह से निकले तेरे जुमलों का वो न तमाम होना, ये भी सच है कि मुहब्बत में खो जाता है आराम सुकूं भी देता है पर मुहब्बत में बे आराम होना..!! ~उमरदराज़ मार्थ इश्क में जब नफ़ा नुक़सान का हिसाब - [इश्क में जब नफ़ा नुक़सान का हिसाब लगाया जायेगा](https://bazmeshayari.com/ishq-me-jab-nafa-nuqsaan-ka-hisab-lagaya-jayega/): इश्क में जब नफ़ा नुक़सान का हिसाब लगाया जायेगा उस दिन सच्चे दिल टूटेंगे, ख़्वाबों को दफ़नाया जायेगा, मुहब्बत जब सच्चे जज़्बों से खाली हो जायेगा तब ये दर्द का दरिया बन कर बहाया जायेगा, जहाँ ख़्वाबों की बोलियाँ लगेगी किसी बाज़ार में वहां दिलों के टुकड़ों का भी जश्न मनाया जायेगा, इश्क की क़ीमत लगाना कब सीखा है ज़माने ने मगर जब लगाई गई, दिल का खून बहाया जायेगा, मुहब्बत को जो तिज़ारत की तरह तौला करते हैं इश्क़ में उन्हें हर मोड़ पे तन्हा ही छोड़ा जायेगा, जो लोग दिल के सौदागर बने हैं इस दुनियाँ में उन - [जीवन मुझ से मैं जीवन से शरमाता हूँ](https://bazmeshayari.com/jivan-mujh-se-main-jivan-se-sharmata-hoon/): जीवन मुझ से मैं जीवन से शरमाता हूँ मुझ से आगे जाने वालो में आता हूँ, जिन की यादों से रौशन हैं मेरी आँखें दिल कहता है उन को भी मैं याद आता हूँ, सुर से साँसों का नाता है तोड़ूँ कैसे ? तुम जलते हो क्यूँ जीता हूँ क्यूँ गाता हूँ ? तुम अपने दामन में सितारे बैठ के टाँको और मैं नए बरन लफ़्ज़ों को पहनाता हूँ, जिन ख़्वाबों को देख के मैं ने जीना सीखा उन के आगे हर दौलत को ठुकराता हूँ, ज़हर उगलते हैं जब मिल कर दुनिया वाले मीठे बोलों की वादी में खो - [फ़ैज़ और फ़ैज़ का ग़म भूलने वाला है कहीं](https://bazmeshayari.com/faiz-aur-fazi-ka-gam-bhulne-wala-hai-kahin/): फ़ैज़ और फ़ैज़ का ग़म भूलने वाला है कहीं मौत ये तेरा सितम भूलने वाला है कहीं, हम से जिस वक़्त ने वो शाह ए सुख़न छीन लिया हम को वो वक़्त ए अलम भूलने वाला है कहीं, तेरे अश्क और भी चमकाएँगी यादें उस की हम को वो दीदा ए नम भूलने वाला है कहीं, कभी ज़िंदाँ में कभी दूर वतन से ऐ दोस्त जो किया उस ने रक़म भूलने वाला है कहीं, आख़िरी बार उसे देख न पाए जालिब ये मुक़द्दर का सितम भूलने वाला है कहीं..!! ~हबीब जालिब आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह - [आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह](https://bazmeshayari.com/aag-hai-faili-hui-kaali-ghataao-ki-jagah/): आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह बद दुआएँ हैं लबों पर अब दुआओं की जगह, इंतिख़ाब ए अहल ए गुलशन पर बहुत रोता है दिल देख कर ज़ाग़ ओ ज़ग़्न को ख़ुशनवाओं की जगह, कुछ भी होता पर न होते पारा पारा जिस्म ओ जाँ राहज़न होते अगर उन रहनुमाओं की जगह, लुट गई इस दौर में अहल ए क़लम की आबरू बिक रहे हैं अब सहाफ़ी बेसवाओं की जगह, कुछ तो आता हम को भी जाँ से गुज़रने का मज़ा ग़ैर होते काश जालिब आश्नाओं की जगह..!! ~हबीब जालिब अफ़्सोस तुम्हें कार के शीशे का हुआ है - [अफ़्सोस तुम्हें कार के शीशे का हुआ है](https://bazmeshayari.com/afsos-tumhen-kaar-ke-shishe-ka-hua-hai/): अफ़्सोस तुम्हें कार के शीशे का हुआ है परवाह नहीं एक माँ का जो दिल टूट गया है, होता है असर तुम पे कहाँ नाला ए ग़म का बरहम जो हुई बज़्म ए तरब इस का गिला है, फ़िरऔन भी नमरूद भी गुज़रे हैं जहाँ में रहता है यहाँ कौन यहाँ कौन रहा है ? तुम ज़ुल्म कहाँ तक तह ए अफ़्लाक करोगे ये बात न भूलो कि हमारा भी ख़ुदा है, आज़ादी ए इंसान के वहीं फूल खिलेंगे जिस जा पे ज़हीर आज तेरा ख़ून गिरा है, ता चंद रहेगी ये शब ए ग़म की सियाही रस्ता कोई सूरज - [बातें तो कुछ ऐसी हैं कि ख़ुद से भी न की जाएँ](https://bazmeshayari.com/baaten-to-kuch-aisi-hai-ki-khud-se-bhi-na-kee-jaayen/): बातें तो कुछ ऐसी हैं कि ख़ुद से भी न की जाएँ सोचा है ख़मोशी से हर एक ज़हर को पी जाएँ, अपना तो नहीं कोई वहाँ पूछने वाला उस बज़्म में जाना है जिन्हें अब तो वही जाएँ, अब तुझ से हमें कोई तअल्लुक़ नहीं रखना अच्छा हो कि दिल से तेरी यादें भी चली जाएँ, एक उम्र उठाए हैं सितम ग़ैर के हम ने अपनों की तो एक पल भी जफ़ाएँ न सही जाएँ, जालिब ग़म ए दौराँ हो कि याद ए रुख़ ए जानाँ तन्हा मुझे रहने दें मेरे दिल से सभी जाएँ..!! ~हबीब जालिब उस रऊनत - [उस रऊनत से वो जीते हैं कि मरना ही नहीं](https://bazmeshayari.com/us-ranaut-se-wo-jite-hain-ki-marna-hi-nahin/): उस रऊनत से वो जीते हैं कि मरना ही नहीं तख़्त पर बैठे हैं यूँ जैसे उतरना ही नहीं, यूँ मह ओ अंजुम की वादी में उड़े फिरते हैं वो ख़ाक के ज़र्रों पे जैसे पाँव धरना ही नहीं, उन का दावा है कि सूरज भी उन्ही का है ग़ुलाम शब जो हम पर आई है उस को गुज़रना ही नहीं, क्या इलाज उस का अगर हो मुद्दआ उन का यही एहतिमाम रंग ओ बू गुलशन में करना ही नहीं, ज़ुल्म से हैं बरसर ए पैकार आज़ादी पसंद उन पहाड़ों में जहाँ पर कोई झरना ही नहीं, दिल भी उन - [वो देखने मुझे आना तो चाहता होगा](https://bazmeshayari.com/wo-dekhne-mujhe-aana-to-chahta-hoga/): वो देखने मुझे आना तो चाहता होगा मगर ज़माने की बातों से डर गया होगा, उसे था शौक़ बहुत मुझ को अच्छा रखने का ये शौक़ औरों को शायद बुरा लगा होगा, कभी न हद्द ए अदब से बढ़े थे दीदा ओ दिल वो मुझ से किस लिए किस बात पर ख़फ़ा होगा ? मुझे गुमान है ये भी यक़ीन की हद तक किसी से भी न वो मेरी तरह मिला होगा, कभी कभी तो सितारों की छाँव में वो भी मेरे ख़याल में कुछ देर जागता होगा, वो उस का सादा ओ मासूम वालिहानापन किसी भी जुग में कोई - [फिर कभी लौट कर न आएँगे](https://bazmeshayari.com/fir-kabhi-laut-kar-na-aayenge/): फिर कभी लौट कर न आएँगे हम तेरा शहर छोड़ जाएँगे, दूर उफ़्तादा बस्तियों में कहीं तेरी यादों से लौ लगाएँगे, शम ए माह ओ नुजूम गुल कर के आँसुओं के दिए जलाएँगे, आख़िरी बार एक ग़ज़ल सुन लो आख़िरी बार हम सुनाएँगे, सूरत ए मौजा ए हवा जालिब सारी दुनिया की ख़ाक उड़ाएँगे..!! ~हबीब जालिब अब तेरी ज़रूरत भी बहुत कम है मेरी जाँ - [अब तेरी ज़रूरत भी बहुत कम है मेरी जाँ](https://bazmeshayari.com/ab-teri-zarurat-bhi-bahut-kam-hai/): अब तेरी ज़रूरत भी बहुत कम है मेरी जाँ अब शौक़ का कुछ और ही आलम है मेरी जाँ, अब तज़्किरा ए ख़ंदा ए गुल बार है जी पर जाँ वक़्फ़ ए ग़म ए गिर्या ए शबनम है मेरी जाँ, रुख़ पर तेरे बिखरी हुई ये ज़ुल्फ़ ए सियह ताब तस्वीर ए परेशानी ए आलम है मेरी जाँ, ये क्या कि तुझे भी है ज़माने से शिकायत ये क्या कि तेरी आँख भी पुरनम है मेरी जाँ, हम सादादिलों पर ये शब ए ग़म का तसल्लुत मायूस न हो और कोई दम है मेरी जाँ, ये तेरी तवज्जोह का है - [दिल ए पुर शौक़ को पहलू में दबाए रखा](https://bazmeshayari.com/dil-e-pur-shauk-ko-pahlu-me-dabaye-rakha/): दिल ए पुर शौक़ को पहलू में दबाए रखा तुझ से भी हम ने तेरा प्यार छुपाए रखा, छोड़ इस बात को ऐ दोस्त कि तुझ से पहले हम ने किस किस को ख़यालों में बसाए रखा, ग़ैर मुमकिन थी ज़माने के ग़मों से फ़ुर्सत फिर भी हम ने तेरा ग़म दिल में बसाए रखा, फूल को फूल न कहते सो उसे क्या कहते क्या हुआ ग़ैर ने कॉलर पे सजाए रखा, जाने किस हाल में हैं कौन से शहरों में हैं वो ? ज़िंदगी अपनी जिन्हें हम ने बनाए रखा, हाए क्या लोग थे वो लोग परी चेहरा लोग - [उस ने जब मेरी तरफ प्यार से देखा होगा](https://bazmeshayari.com/us-ne-jab-meri-taraf-pyar-se-dekh-hoga/): उस ने जब मेरी तरफ प्यार से देखा होगा मेरे बारे में बड़े गौर से सोचा होगा, सुबह को जिस ने सजाई है हँसी होंठों पर रात भर उस को किसी गम ने सताया होगा, कर के वायदा आने का वो नहीं आया होगा अब नाम बदनाम ज़माने में वफ़ा का होगा, हँस के हम बात जो कर लेते हैं उन से समर हाल अपना वो समझ लेते हैं अच्छा होगा, हर दर्द को ऐ जान मैं अपने सीने में छुपा लूं काँटे तेरी राहों के मैं पलकों पे सजा लूं, बिछड़ी है मेरी नींद बिछड़ी हो तुम जब से - [समन्दर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं](https://bazmeshayari.com/samndar-me-utarta-hoon-to-aankhen-bhig-jaati-hain/): समन्दर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तेरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं, तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छीन गई जब से कोई भी लफ्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं, तेरी यादों की ख़ुशबू खिड़कियों में रक्स करती हैं तेरे गम में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं, न जाने हो गया हों इस क़दर हस्सास मैं कब से किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं, हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मेरे दिल पर मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखे भीग जाती हैं..!! - [मैं खुश नसीबी हूँ तेरी मुझे भी रास है तू](https://bazmeshayari.com/main-khush-naisbi-hoon-teri-mujhe-bhi-raas-hai-tu/): मैं खुश नसीबी हूँ तेरी मुझे भी रास है तू तेरा लिबास हूँ मैं और मेरा लिबास है तू, अज़ीब शय है मुहब्बत कि हम कहाँ जाएँ तेरे पास हूँ मैं भी मेरे भी पास है तू, मैं ने ख़ुद को फ़रामोश किया तेरे लिए आम है सारा जहाँ मेरे लिए ख़ास है तू, बंद होंठों पर मेरे रेत जमी जाती है मेरे पास है फिर भी मेरी प्यास है तू, दरमियाँ तेरे मेरे जब से लोग आने लगे उस के बाद से मैं तन्हा और बे आस है तू, ज़माना हम को जुदा कर सके नहीं मुमकिन मुहब्बत में - [बटे रहोगे तो अपना यूँही बहेगा लहू](https://bazmeshayari.com/bate-rahoge-to-apna-yunhi-bahega-lahoo/): बटे रहोगे तो अपना यूँही बहेगा लहू हुए न एक तो मंज़िल न बन सकेगा लहू, हो किस घमंड में ऐ लख़्त लख़्त दीदा-वरो तुम्हें भी क़ातिल ए मेहनतकशाँ कहेगा लहू, इसी तरह से अगर तुम अना परस्त रहे ख़ुद अपना राहनुमा आप ही बनेगा लहू, सुनो तुम्हारे गरेबान भी नहीं महफ़ूज़ डरो तुम्हारा भी एक दिन हिसाब लेगा लहू, अगर न अहद किया हम ने एक होने का ग़नीम सब का यूँही बेचता रहेगा लहू, कभी कभी मेरे बच्चे भी मुझ से पूछते हैं कहाँ तक और तू ख़ुश्क अपना ही करेगा लहू ? सदा कहा यही मैं ने - [कभी तो मेहरबाँ हो कर बुला लें](https://bazmeshayari.com/kabhi-to-meharbaan-ho-kar-bula-le/): कभी तो मेहरबाँ हो कर बुला लें ये महवश हम फ़क़ीरों की दुआ लें, न जाने फिर ये रुत आए न आए जवाँ फूलों की कुछ ख़ुश्बू चुरा लें, बहुत रोए ज़माने के लिए हम ज़रा अपने लिए आँसू बहा लें, हम उन को भूलने वाले नहीं हैं समझते हैं ग़म ए दौराँ की चालें, हमारी भी सँभल जाएगी हालत वो पहले अपनी ज़ुल्फ़ें तो सँभालें, निकलने को है वो महताब घर से सितारों से कहो नज़रें झुका लें, हम अपने रास्ते पर चल रहे हैं जनाब ए शैख़ अपना रास्ता लें, ज़माना तो यूँही रूठा रहेगा चलो जालिब उन्हें - [ख़ूब आज़ादी ए सहाफ़त है](https://bazmeshayari.com/khoob-aazadi-e-sahafat-hai/): ख़ूब आज़ादी ए सहाफ़त है नज़्म लिखने पे भी क़यामत है, दावा जम्हूरियत का है हर आन ये हुकूमत भी क्या हुकूमत है ? धाँदली धोंस की है पैदावार सब को मालूम ये हक़ीक़त है ख़ौफ़ के ज़ेहन-ओ-दिल पे साए हैं किस की इज़्ज़त यहाँ सलामत है कभी जम्हूरियत यहाँ आए यही ‘जालिब’ हमारी हसरत है..!! ~हबीब जालिब - [झूटी ख़बरें घड़ने वाले झूटे शेर सुनाने वाले](https://bazmeshayari.com/jhuthi-khabaren-ghadne-wale-jhuthe-sher-sunane-wale/): झूटी ख़बरें घड़ने वाले झूटे शेर सुनाने वाले लोगो सब्र कि अपने किए की जल्द सज़ा हैं पाने वाले, दर्द आँखों से बहता है और चेहरा सब कुछ कहता है ये मत लिखो वो मत लिखो आए बड़े समझाने वाले, ख़ुद काटेंगे अपनी मुश्किल ख़ुद पाएँगे अपनी मंज़िल राहज़नों से भी बदतर हैं राहनुमा कहलाने वाले, उन से प्यार किया है हम ने उन की राह में हम बैठे हैं नामुम्किन है जिन का मिलना और नहीं जो आने वाले, उन पर भी हँसती थी दुनिया आवाज़ें कसती थी दुनिया जालिब अपनी ही सूरत थे इश्क़ में जाँ से जाने - [ये और बात तेरी गली में न आएँ हम](https://bazmeshayari.com/ye-aur-baat-teri-gali-me-na-aaye-hum/): ये और बात तेरी गली में न आएँ हम लेकिन ये क्या कि शहर तेरा छोड़ जाएँ हम, मुद्दत हुई है कू ए बुताँ की तरफ़ गए आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएँ हम ? शायद ब क़ैद ए ज़ीस्त ये साअत न आ सके तुम दास्तान ए शौक़ सुनो और सुनाएँ हम, बे नूर हो चुकी है बहुत शहर की फ़ज़ा तारीक रास्तों में कहीं खो न जाएँ हम, उस के बग़ैर आज बहुत जी उदास है जालिब चलो कहीं से उसे ढूँढ लाएँ हम..!! ~हबीब जालिब - [वही हालात हैं फ़क़ीरों के](https://bazmeshayari.com/wahi-halaat-hain-fakiron-ke-din-fire-hain/): वही हालात हैं फ़क़ीरों के दिन फिरे हैं फ़क़त वज़ीरों के, अपना हल्क़ा है हल्क़ा ए ज़ंजीर और हल्क़े हैं सब अमीरों के, हर बिलावल है देस का मक़रूज़ पाँव नंगे हैं बेनज़ीरों के, वही अहल ए वफ़ा की सूरत ए हाल वारे न्यारे हैं बे ज़मीरों के, साज़िशें हैं वही ख़िलाफ़ ए अवाम मशवरे हैं वही मुशीरों के, बेड़ियाँ सामराज की हैं वही वही दिन रात हैं असीरों के..!! ~हबीब जालिब - [फिर दिल से आ रही है सदा उस गली में चल](https://bazmeshayari.com/fir-dil-se-aa-rahi-hai-sada-us-gali-me-chal/): फिर दिल से आ रही है सदा उस गली में चल शायद मिले ग़ज़ल का पता उस गली में चल, कब से नहीं हुआ है कोई शेर काम का ये शेर की नहीं है फ़ज़ा उस गली में चल, वो बाम ओ दर वो लोग वो रुस्वाइयों के ज़ख़्म हैं सब के सब अज़ीज़ जुदा उस गली में चल, उस फूल के बग़ैर बहुत जी उदास है मुझ को भी साथ ले के सबा उस गली में चल, दुनिया तो चाहती है यूँही फ़ासले रहें दुनिया के मशवरों पे न जा उस गली में चल, बे नूर ओ बे असर - [कुछ लोग ख़यालों से चले जाएँ तो सोएँ](https://bazmeshayari.com/kuch-log-khyalon-se-chale-jaayen-to-soyen/): कुछ लोग ख़यालों से चले जाएँ तो सोएँ बीते हुए दिन रात न याद आएँ तो सोएँ, चेहरे जो कभी हम को दिखाई नहीं देंगे आ आ के तसव्वुर में न तड़पाएँ तो सोएँ, बरसात की रुत के वो तरब रेज़ मनाज़िर सीने में न एक आग सी भड़काएँ तो सोएँ, सुब्हों के मुक़द्दर को जगाते हुए मुखड़े आँचल जो निगाहों में न लहराएँ तो सोएँ, महसूस ये होता है अभी जाग रहे हैं लाहौर के सब यार भी सो जाएँ तो सोएँ..!! ~हबीब जालिब - [इस शहर ए ख़राबी में ग़म ए इश्क़ के मारे](https://bazmeshayari.com/is-shahar-e-kharabi-me-gam-e-ishq-ke-maare-zinda-hain/): इस शहर ए ख़राबी में ग़म ए इश्क़ के मारे ज़िंदा हैं यही बात बड़ी बात है प्यारे, ये हँसता हुआ चाँद ये पुरनूर सितारे ताबिंदा ओ पाइंदा हैं ज़र्रों के सहारे, हसरत है कोई ग़ुंचा हमें प्यार से देखे अरमाँ है कोई फूल हमें दिल से पुकारे, हर सुब्ह मेरी सुब्ह पे रोती रही शबनम हर रात मेरी रात पे हँसते रहे तारे, कुछ और भी हैं काम हमें ऐ ग़म ए जानाँ कब तक कोई उलझी हुई ज़ुल्फ़ों को सँवारे..!! ~हबीब जालिब - [दिल पर जो ज़ख़्म हैं वो दिखाएँ किसी को क्या](https://bazmeshayari.com/dil-par-jo-zakhm-hain-wo-dikhaye-kisi-ko-kya/): दिल पर जो ज़ख़्म हैं वो दिखाएँ किसी को क्या अपना शरीक ए दर्द बनाएँ किसी को क्या ? हर शख़्स अपने अपने ग़मों में है मुब्तला ज़िंदाँ में अपने साथ रुलाएँ किसी को क्या ? बिछड़े हुए वो यार वो छोड़े हुए दयार रह रह के हम को याद जो आएँ किसी को क्या ? रोने को अपने हाल पे तन्हाई है बहुत उस अंजुमन में ख़ुद पे हँसाएं किसी को क्या ? वो बात छेड़ जिस में झलकता हो सब का ग़म यादें किसी की तुझ को सताएं किसी को क्या ? सोए हुए हैं लोग तो होंगे - [अपनों ने वो रंज दिए हैं बेगाने याद आते हैं](https://bazmeshayari.com/apno-ne-wo-ranj-diye-hai-begaane-yaad-aate-hain/): अपनों ने वो रंज दिए हैं बेगाने याद आते हैं देख के उस बस्ती की हालत वीराने याद आते हैं, उस नगरी में क़दम क़दम पे सर को झुकाना पड़ता है उस नगरी में क़दम क़दम पर बुतख़ाने याद आते हैं, आँखें पुरनम हो जाती हैं ग़ुर्बत के सहराओं में जब उस रिमझिम की वादी के अफ़्साने याद आते हैं, ऐसे ऐसे दर्द मिले हैं नए दयारों में हम को बिछड़े हुए कुछ लोग पुराने याराने याद आते हैं, जिन के कारन आज हमारे हाल पे दुनिया हँसती है कितने ज़ालिम चेहरे जाने पहचाने याद आते हैं, यूँ न लुटी - [वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम ए ज़र है ख़तरे में](https://bazmeshayari.com/watan-ko-kuch-nahin-khatara-nizam-e-zar-hai-khatare-me/): वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम ए ज़र है ख़तरे में हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर है ख़तरे में, जो बैठा है सफ़ ए मातम बिछाए मर्ग ए ज़ुल्मत पर वो नौहागर है ख़तरे में वो दानिश वर है ख़तरे में, अगर तशवीश लाहक़ है तो सुलतानों को लाहक़ है न तेरा घर है ख़तरे में न मेरा घर है ख़तरे में, जहाँ इक़बाल भी नज़्र ए ख़त ए तनसीख़ हो जालिब वहाँ तुझ को शिकायत है तेरा जौहर है ख़तरे में..!! ~हबीब जालिब - [हुजूम देख के रस्ता नहीं बदलते हम](https://bazmeshayari.com/hujum-dekh-ke-rasta-nahin-badalte-hum/): हुजूम देख के रस्ता नहीं बदलते हम किसी के डर से तक़ाज़ा नहीं बदलते हम, हज़ार ज़ेर ए क़दम रास्ता हो ख़ारों का जो चल पड़ें तो इरादा नहीं बदलते हम, इसी लिए तो नहीं मोतबर ज़माने में कि रंग ए सूरत ए दुनिया नहीं बदलते हम, हवा को देख के जालिब मिसाल ए हम अस्राँ बजा ये ज़ोम हमारा नहीं बदलते हम..!! ~हबीब जालिब - [भुला भी दे उसे जो बात हो गई प्यारे](https://bazmeshayari.com/bhula-bhi-de-use-jo-baat-ho-gai-pyare/): भुला भी दे उसे जो बात हो गई प्यारे नए चराग़ जला रात हो गई प्यारे, तेरी निगाह ए पशेमाँ को कैसे देखूँगा ? कभी जो तुझ से मुलाक़ात हो गई प्यारे, न तेरी याद न दुनिया का ग़म न अपना ख़याल अजीब सूरत ए हालात हो गई प्यारे, उदास उदास हैं शमएँ बुझे बुझे साग़र ये कैसी शाम ए ख़राबात हो गई प्यारे, वफ़ा का नाम न लेगा कोई ज़माने में हम अहल ए दिल को अगर मात हो गई प्यारे, तुम्हें तो नाज़ बहुत दोस्तों पे था जालिब अलग थलग से हो क्या बात हो गई प्यारे..?? ~हबीब - [और सब भूल गए हर्फ़ ए सदाक़त लिखना](https://bazmeshayari.com/aur-sab-bhool-gaye-harf-e-sadakat-likhna/): और सब भूल गए हर्फ़ ए सदाक़त लिखना रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना, लाख कहते रहें ज़ुल्मत को न ज़ुल्मत लिखना हम ने सीखा नहीं प्यारे ब इजाज़त लिखना, न सिले की न सताइश की तमन्ना हम को हक़ में लोगों के हमारी तो है आदत लिखना, हम ने जो भूल के भी शह का क़सीदा न लिखा शायद आया इसी ख़ूबी की बदौलत लिखना, इस से बढ़ कर मेरी तहसीन भला क्या होगी पढ़ के नाख़ुश हैं मेरा साहब ए सरवत लिखना, दहर के ग़म से हुआ रब्त तो हम भूल गए सर्व क़ामत को जवानी को - [दुश्मनों ने जो दुश्मनी की है](https://bazmeshayari.com/dushmanon-ne-jo-dushmani-ki-hai/): दुश्मनों ने जो दुश्मनी की है दोस्तों ने भी क्या कमी की है, ख़ामुशी पर हैं लोग ज़ेर ए इताब और हम ने तो बात भी की है, मुतमइन है ज़मीर तो अपना बात सारी ज़मीर ही की है, अपनी तो दास्ताँ है बस इतनी ग़म उठाए हैं शाएरी की है, अब नज़र में नहीं है एक ही फूल फ़िक्र हम को कली कली की है, पा सकेंगे न उम्र भर जिस को जुस्तुजू आज भी उसी की है, जब मह ओ महर बुझ गए जालिब हम ने अश्कों से रौशनी की है..!! ~हबीब जालिब - [शेर से शाइरी से डरते हैं](https://bazmeshayari.com/sher-se-shayari-se-darte-hain/): शेर से शाइरी से डरते हैं कम नज़र रौशनी से डरते हैं, लोग डरते हैं दुश्मनी से तेरी हम तेरी दोस्ती से डरते हैं, दहर में आह ए बे कसाँ के सिवा और हम कब किसी से डरते हैं, हम को ग़ैरों से डर नहीं लगता अपने अहबाब ही से डरते हैं, दावर ए हश्र बख़्श दे शायद हाँ मगर मौलवी से डरते हैं, रूठता है तो रूठ जाए जहाँ उन की हम बेरुख़ी से डरते हैं, हर क़दम पर है मोहतसिब जालिब अब तो हम चाँदनी से डरते हैं..!! ~हबीब जालिब - [दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं](https://bazmeshayari.com/dil-ki-baat-labon-par-laa-kar-ab-tak-hum-dukh-sahte-hain/): दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं हम ने सुना था इस बस्ती में दिल वाले भी रहते हैं, बीत गया सावन का महीना मौसम ने नज़रें बदलीं लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आँसू बहते हैं, एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं, जिन की ख़ातिर शहर भी छोड़ा जिन के लिए बदनाम हुए आज वही हम से बेगाने बेगाने से रहते हैं, वो जो अभी इस राहगुज़र से चाक गरेबाँ गुज़रा था उस आवारा दीवाने को जालिब जालिब कहते हैं..!! - [बेवफ़ा तुम को भुलाने में तकल्लुफ़ कैसा](https://bazmeshayari.com/bewafa-tum-ko-bhulaane-me-takalluf-kaisa/): बेवफ़ा तुम को भुलाने में तकल्लुफ़ कैसा आइना सच का दिखाने में तकल्लुफ़ कैसा तीरगी घर की मिटाने में तकल्लुफ़ कैसा दीप छोटा सा जलाने में तकल्लुफ़ कैसा प्यार का गीत सुनाने में तकल्लुफ़ कैसा हाँ पसंद अपनी बताने में तकल्लुफ़ कैसा वो उदासी के समुंदर में अकेला है बहुत हौसला देने दिलाने में तकल्लुफ़ कैसा अपने गुलशन को मैं शादाब रखा करती हूँ घर का कचरा भी उठाने में तकल्लुफ़ कैसा मुझ को अक्सर वो यही बात कहा करता है हम से ही मिलने मिलाने में तकल्लुफ़ कैसा जो ‘शगुफ़्ता’ को ज़माना ये सताता है बहुत आँख से अश्क - [वक़्त का मारा हुआ इंसाँ रऊनत का शिकार](https://bazmeshayari.com/waqt-ka-maara-hua-insaan-raunat-ka-shikar/): वक़्त का मारा हुआ इंसाँ रऊनत का शिकार जिस की मेहनत का नतीजा अज़मत-ए-सरमाया-दार अस्ल में हिन्दोस्ताँ का बादशह लेकिन ग़ुलाम ज़िंदगी की दूसरी मंज़िल में है गर्म-ए-ख़िराम फिर रहा है चिलचिलाती धूप में दीवाना-वार बाल-बच्चों का तसव्वुर कर रहा है बे-क़रार ख़ून पानी एक कर के दाम जब मिलते नहीं हाथ फैला कर भी क्या देगा कोई नान-ए-जवीं इब्तिदा है तीसरे फ़ाक़े की घर में कुछ नहीं सोच कर कुछ घर की जानिब चल पड़ा मर्द-ए-हज़ीं देखता क्या है कि बच्चा भूक से है बे-क़रार जैसे कोई मार खा के भागने वाला शिकार गोद में बिठला के माँ समझा - [रात कुछ तारीक भी है और कुछ रौशन भी है](https://bazmeshayari.com/raat-kuch-taarik-bhi-hai-aur-kuch-raushan-bhi/): रात कुछ तारीक भी है और कुछ रौशन भी है वक़्त के माथे पे शोख़ी भी है भोला पन भी है बाम ओ दर पर आज मिट्टी के दिए हैं इस तरह आसमानों पर सितारे जगमगाएँ जिस तरह रास्तों पर हैं दनादन की सदाएँ ख़ौफ़नाक ज़िंदगी से मौत गोया कर रही है ताक-झाँक हो रही हैं हर गली-कूचे में आतिश-बाज़ियाँ आर रहा है अब्र की सूरत तमव्वुल का धुआँ कर रहे हैं लक्ष्मी-पूजन भी घरों में साहूकार देव दौलत को समझ बैठे हैं रब्ब-ए-इक़्तिदार हिन्द वालों को मरज़ है नारवा तक़लीद का आज घर में सेठ-जी भी खेल लेते हैं - [दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ](https://bazmeshayari.com/deewali-ke-deep-jalaayen/): दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ गोशे गोशे में तज़ईन-ओ-ज़ेबाई साफ़ करें हर दिल की मैली अँगनाई फ़ितरत ने भी मस्ती में ली अंगड़ाई ख़ुशियों का संगीत सुनाएँ आ जाओ दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ आशाओं की मंज़िल पर सब कॉमन हो नफ़रत जाए प्यार की ज्योति रौशन हो प्रेम नगर में चाहे दाव पे जीवन हो भेद-भाव पे तीर चलाएँ आ जाओ दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ रौशनियों के जाल भी कितने सुंदर हैं दीपक मालाएँ घर घर का - [जब से आई है दीपावली](https://bazmeshayari.com/jab-se-aai-hai-deepavali/): जब से आई है दीपावली हर तरफ़ छाई है रौशनी हर जगह चाहतों के दिए शाम होते ही जलने लगे फुल-झड़ियों का बाज़ार है ये पटाख़ों का तेहवार है दीपों का है सुहाना समाँ जिन से धरती बनी कहकशाँ जितने रॉकेट पटाख़े चले आसमाँ पर लगे हैं भले हो गईं दूर तारीकियाँ अब हैं रौशन ज़मीं आसमाँ जब से आई हैं दीपावली हर तरफ़ छाई है रौशनी एक मौक़ा है पहचान का दिल मिलाती है इंसान का चाहतों की ये तस्वीर है इक नए युग की ता’बीर है ~आदिल हयात - [जल रहे हैं दिए मुंडेरों पर](https://bazmeshayari.com/jal-rahe-hain-diye-mundero-par/): जल रहे हैं दिए मुंडेरों पर हो रहा है करम अँधेरों पर तुम जो बन कर किरन किरन आओ दाग़-ए-दिल भी हँसें सवेरों पर मुस्कुराती हुई चली आओ दिल सुलगता है दाग़ जलते हैं छनछनाती हुई चली आओ आरज़ूओं के बाग़ जलते हैं हुन की देवी हो तुम मिरे घर में रोज़ दीवाली ग़म-ज़दा घर में हुन लुटाती हुई चली आओ आँसुओं के चराग़ जलते हैं जिस को कहते हैं लोग दीवाली ऊँचे आदर्श की निशानी है बाप-दादों के पाक जीवन की एक अज़्मत-भरी कहानी है ~चरख़ चिन्योटी - [हो रहे हैं रात के दियों के हर सू एहतिमाम](https://bazmeshayari.com/ho-rahe-hain-raat-ke-diyon-ke-har-soo-ehtimam/): हो रहे हैं रात के दियों के हर सू एहतिमाम सुब्ह से जल्वा नुमा है आज दीवाली की शाम, हो चुकी घर घर सपेदी धुल रही हैं नालियाँ फिरती हैं कूचों में मिट्टी के खिलौने वालियाँ, भोली भाली बच्चियाँ चंडोल पापा कर मगन अपनी गुड़ियों के घरोंदों में सजी है अंजुमन, रस्म की इन हिक़मतों को कौन कह देगा फ़ुज़ूल रख दिए हैं ठीकरों में ख़ाना दारी के उसूल, जीत में हर शख़्स वो नौ ख़ेज़ हो या पुख़्ताकार हार से इंकार लब हा ए मसर्रत पर निसार, सर्द मौसम का लड़कपन गर्म चूल्हों पर शबाब बर्फ़ में साक़ी लगा - [छुप गया ख़ुर्शीद ए ताबाँ आई दीवाली की शाम](https://bazmeshayari.com/chhup-gaya-khurshid-e-taabaan-aai-deewali-ki-sham/): छुप गया ख़ुर्शीद ए ताबाँ आई दीवाली की शाम हर तरफ़ जश्न ए चराग़ाँ का है कैसा एहतिमाम डेवढ़ियों पर शादयाने ऐश के बजने लगे और रंगीं क़ुमक़ुमों से बाम-ओ-दर सजने लगे इत्र ओ अंबर से हवा है किस क़दर महकी हुई ख़ुशनुमा महताबियों से है फ़ज़ा दहकी हुई फुलझड़ी से फूल यूँ झड़ते हैं जैसे कहकशाँ हर तरफ़ फैला फ़ज़ा में है पटाख़ों का धुआँ क्या मज़े की आतिश-अफ़्शानी है अग्नी-बान की देख कर अश अश करे जिस को नज़र इंसान की हैं सितारों की ये लड़ियाँ या चराग़ों की क़तार कूचा ओ बाज़ार के दीवार ओ दर हैं - [घर की क़िस्मत जगी घर में आए सजन](https://bazmeshayari.com/ghar-ki-qismat-jagi-ghar-me-aaye-sajan/): घर की क़िस्मत जगी घर में आए सजन ऐसे महके बदन जैसे चंदन का बन आज धरती पे है स्वर्ग का बाँकपन अप्सराएँ न क्यूँ गाएँ मंगलाचरण ज़िंदगी से है हैरान यमराज भी आज हर दीप अँधेरे पे है ख़ंदा-ज़न उन के क़दमों से फूल और फुल-वारियाँ आगमन उन का मधुमास का आगमन उस को सब कुछ मिला जिस को वो मिल गए वो हैं बे-आस की आस निर्धन के धन है दीवाली का त्यौहार जितना शरीफ़ शहर की बिजलियाँ उतनी ही बद-चलन उन से अच्छे तो माटी के कोरे दिए जिन से दहलीज़ रौशन है आँगन चमन कौड़ियाँ दाँव - [सुनो मादर-ए-हिन्द के नौ-निहालो](https://bazmeshayari.com/suno-madar-e-hind-ke-nau-nihaalo/): सुनो मादर-ए-हिन्द के नौ-निहालो सदाक़त पे गर्दन कटा लेने वालो उठो ख़्वाब-ए-ग़फ़लत मिटा लो मिटा लो कमर-बस्ता हो जाओ हिम्मत बढ़ा लो तुम्हें गाम-ए-हिम्मत बढ़ाना पड़ेगा वतन का मुक़द्दर जगाना पड़ेगा तरक़्क़ी का भारत की नग़्मा सुना दो मोहब्बत की गंगा दिलों में बहा दो जो ख़ुफ़्ता हैं मुद्दत से उन को जगा दो सदाक़त का दीदों की डंका बजा दो करो जल्द सैराब उजड़े चमन को लगें चार चाँद आज अपने वतन को पड़े हैं कहीं दीन की जाँ के लाले कहीं दिल हिलाते हैं बेकस के नाले हुए हैं कहीं नीम-जाँ भोले भाले मुसीबत के चक्कर में हैं - [गो ख़ाक हो चुका है हिन्दोस्ताँ हमारा](https://bazmeshayari.com/go-khaaq-ho-chuka-hai-hindostaan-humara/): गो ख़ाक हो चुका है हिन्दोस्ताँ हमारा फिर भी है कुल जहाँ में पल्ला गराँ हमारा मुँह तक रहा है अब तक सारा जहाँ हमारा है नाम किशवरों में विर्द-ए-ज़बाँ हमारा ज़रख़ेज़ है सरासर ये गुलिस्ताँ हमारा है ताइर-ए-तिलाई हिन्दोस्ताँ हमारा भारत में देखते थे हम सनअतें जहाँ की मशहूर थी जहाँ में कारीगरी यहाँ की वो बात हिन्दियों ने ग़ैरों के दरमियाँ की जिस पर झुकी है गर्दन अम्बोह-ए-सरकशाँ की मिलता था इल्म-ओ-फ़न में हम-सर कहाँ हमारा है ताइर-ए-तलाई हिन्दोस्ताँ हमारा तस्लीम कर रहे हैं एस्पेन और जापाँ सब मानते हैं लोहा जर्मन फ़्रांस-ओ-यूनाँ अमरीका में है चर्चा इस - [स्वराज का झंडा भारत में गड़वा दिया गाँधी बाबा ने](https://bazmeshayari.com/swaraj-ka-jhanda-bharat-me-gadwa-diya-gaandhi-baba-ne/): स्वराज का झंडा भारत में गड़वा दिया गाँधी बाबा ने दिल क़ौम-ओ-वतन के दुश्मन का दहला दिया गाँधी बाबा ने उल्फ़त की राह में मर जाना पर नाम जहाँ में कर जाना ये पाठ वतन के बच्चों को सिखला दिया गाँधी बाबा ने इक धर्म की ताक़त दिखला कर ज़ालिम के छक्के छुड़वा कर भारत का लोहा दुनिया से मनवा दिया गाँधी बाबा ने ऐ क़ौम वतन के परवानो लो अपने फ़र्ज़ को पहचानो अब जेल से ये पैग़ाम हमें भिजवा दिया गाँधी बाबा ने चर्ख़े की तोप चला दो तुम ग़ैरों के छक्के छुड़ा दो तुम ये हिन्द का - [इक प्रेम पुजारी आया है चरनों में ध्यान लगाने को](https://bazmeshayari.com/ek-prem-pujaari-aaya-hai-charano-me-dhyaan-lagaane-ko/): इक प्रेम पुजारी आया है चरनों में ध्यान लगाने को भगवान तुम्हारी मूरत पर श्रधा के फूल चढ़ाने को वो प्रेम का तूफ़ाँ दिल में उठा कि ज़ब्त का यारा ही न रहा आँखों में अश्क उमँड आए प्रेमी का हाल बताने को तुम नंद को नैन के तारे हो तुम दीन दुखी के सहारे हो तुम नंगे पैरों ढाने हो भगतों का मान बढ़ाने को आँखों से ख़ून टपकता है सीने पर ख़ंजर चलता है मन-मोहन जल्द ख़बर लेना दीनों की जान बचाने को फ़ुर्क़त में तुम्हारी क़ल्ब के टुकड़े आँखों से बह जाते हैं ऐ कृष्ण मुरारी आओ - [राम के हिज्र में इक रोज़ भरत ने ये कहा](https://bazmeshayari.com/ram-ke-hizr-me-ek-roz-bharat-ne-ye-kaha/): राम के हिज्र में इक रोज़ भरत ने ये कहा क़ल्ब-ए-मुज़्तर को शब-ओ-रोज़ नहीं चैन ज़रा दिल में अरमाँ है कि आ जाएँ वतन में रघुबिर याद में उन की कलेजे में चुभे हैं नश्तर कोई भाई से कहे ज़ख़्म-ए-जिगर भर दें मिरा ख़ाना-ए-दिल को ज़ियारत से मुनव्वर कर दें राम आएँ तो दिए घी के जलाऊँ घर घर दीप-माला का समाँ आज दिखाऊँ घर घर तेग़-ए-फ़ुर्क़त से जिगर पाश हुआ जाता है दिल ग़म-ए-रंज से पामाल हुआ जाता है दाग़ हैं मेरे जले दिल पे हज़ारों लाखों ग़म के नश्तर जो चले दिल पे हज़ारों लाखों कह रहे थे - [घुट गया अँधेरे का आज दम अकेले में](https://bazmeshayari.com/ghut-gaya-andhere-ka-aaj-dam-akele-me/): घुट गया अँधेरे का आज दम अकेले में हर नज़र टहलती है रौशनी के मेले में आज ढूँढने पर भी मिल सकी न तारीकी मौत खो गई शायद ज़िंदगी के रेले में इस तरह से हँसती हैं आज दीप-मालाएँ शोख़ियाँ करें जैसे साथ मिल के बालाएँ हर गली नई दुल्हन हर सड़क हसीना है हर देहात अँगूठी है हर नगर नगीना है पड़ गई है ख़तरे में आज यम की यमराजी मौत के भी माथे पर मौत का पसीना है रात के करूँ मैं है आज रात का कंगन इक सुहागनी बन कर छाई जाती है जोगन क़ुमक़ुमे जले घर - [एक दो ही नहीं छब्बीस दिए](https://bazmeshayari.com/ek-do-hi-nahi-chhabbis-diye/): एक दो ही नहीं छब्बीस दिए एक इक कर के जलाए मैं ने एक दिया नाम का आज़ादी के उस ने जलते हुए होंटों से कहा चाहे जिस मुल्क से गेहूँ माँगो हाथ फैलाने की आज़ादी है इक दिया नाम का ख़ुश-हाली के उस के जलते ही ये मालूम हुआ कितनी बद-हाली है पेट ख़ाली है मिरा जेब मिरी ख़ाली है इक दिया नाम का यक-जेहती के रौशनी उस की जहाँ तक पहुँची क़ौम को लड़ते झगड़ते देखा माँ के आँचल में हैं जितने पैवंद सब को इक साथ उधड़ते देखा दूर से बीवी ने झल्ला के कहा तेल महँगा - [मेरी साँसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है](https://bazmeshayari.com/meri-saanson-ko-geet-aur-aatma-ko-saaz-deti-hai/): मेरी साँसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है ये दीवाली है सब को जीने का अंदाज़ देती है, हृदय के द्वार पर रह रह के देता है कोई दस्तक बराबर ज़िंदगी आवाज़ पर आवाज़ देती है, सिमटता है अंधेरा पाँव फैलाती है दीवाली हँसाए जाती है रजनी हँसे जाती है दीवाली, क़तारें देखता हूँ चलते फिरते माह पारों की घटाएँ आँचलों की और बरखा है सितारों की, वो काले काले गेसू सुर्ख़ होंट और फूल से आरिज़ नगर में हर तरफ़ परियाँ टहलती हैं बहारों की, निगाहों का मुक़द्दर आ के चमकाती है दीवाली पहन कर दीपमाला नाज़ - [हर एक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का](https://bazmeshayari.com/har-ek-makaan-me-jala-fir-diya-deewali-ka/): हर एक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का हर एक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का, सभी के दिल में समाँ भा गया दिवाली का किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दिवाली का, अजब बहार का है दिन बना दिवाली का जहाँ में यारो अजब तरह का है ये त्यौहार, किसी ने नक़्द लिया और कोई करे है उधार खिलौने खेलों बताशों का गर्म है बाज़ार, हर एक दुकाँ में चराग़ों की हो रही है बहार सभों को फ़िक्र है अब जा ब जा दिवाली का, मिठाइयों की दुकानें लगा के हलवाई पुकारते हैं कि लाला दिवाली है - [दोस्तो क्या क्या दिवाली में नशात ओ ऐश है](https://bazmeshayari.com/doston-kya-kya-deewali-me-nashaat-o-aish-hai/): दोस्तो क्या क्या दिवाली में नशात ओ ऐश है सब मुहय्या है जो इस हंगाम के शायाँ है शय, इस तरह हैं कूचा ओ बाज़ार पर नक़्श ओ निगार हो अयाँ हुस्न ए निगारिसताँ की जिन से ख़ूब रे, गर्मजोशी अपने बा जाम ए चराग़ाँ लुत्फ़ से क्या ही रौशन कर रही है हर तरफ़ रोग़न की मय, माइल ए सैर ए चराग़ाँ ख़ल्क़ हर जा दम ब दम हासिल ए नज़्ज़ारा हुस्न ए शम्अ रू याँ पै ब पै, आशिक़ाँ कहते हैं माशूक़ों से बाइज्ज़ ओ नियाज़ है अगर मंज़ूर कुछ लेना तो हाज़िर हैं रूपए, गर मुकर्रर अर्ज़ - [कोई सिपाही नहीं बच सका निशानों से](https://bazmeshayari.com/koi-sipahi-nahi-bach-saka-nishano-se/): कोई सिपाही नहीं बच सका निशानों से गली में तीर बरसते रहे मकानों से, ये बर्बादी अचानक से थोड़ी आई है कलाम करना पड़ा मुझको बदज़ुबानो से, हमारे राह में दीवार बन गए वो लोग जिन्हें सुनाई भी नहीं दे रहा था कानो से, तमाशे यूँ ही नहीं कामयाब हो जाते मकीं खींच के लाये गए मकानों, बहुत से शेर सुनाएँ है गुनगुना के मगर ये जंग जीती नहीं जा रही अब तरानों से..!! - [तुम से पहले वो जो एक शख़्स यहाँ तख़्तनशीं था](https://bazmeshayari.com/tum-se-pahle-wo-jo-ek-shakhs-yahan-takhtnashin-tha/): तुम से पहले वो जो एक शख़्स यहाँ तख़्तनशीं था उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था, कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था, आज सोए हैं तह ए ख़ाक न जाने यहाँ कितने कोई शोला कोई शबनम कोई महताब जबीं था, अब वो फिरते हैं इसी शहर में तन्हा लिए दिल को एक ज़माने में मिज़ाज उन का सर ए अर्श ए बरीं था, छोड़ना घर का हमें याद है जालिब नहीं भूले था वतन ज़ेहन में अपने कोई ज़िंदाँ तो नहीं था..!! - [वो बात बात में ऐसे निशान छोड़ गया](https://bazmeshayari.com/wo-baat-baat-me-aise-nishan-chhod-gaya/): वो बात बात में ऐसे निशान छोड़ गया सुलगते दिल को चिता के समान छोड़ गया, न जाने कौन सी धुन में था क़ातिलों का हुजूम तड़पते जिस्मों में थोड़ी सी जान छोड़ गया, जिसे मैं अपने मसाइल का हल समझता था वो जब गया तो बहुत इम्तिहान छोड़ गया, हमारा राज़ तेरी बज़्म तक गया कैसे है कौन जो पस ए दीवार कान छोड़ गया, वो आज तक है मुहाजिर के नाम से बदनाम जो शख़्स तैश में हिन्दोस्तान छोड़ गया, शिकायतें भी करें हम नवाब तो कैसे वो लफ़्ज़ छीन के मुँह में ज़बान छोड़ गया..!! ~ख़्वाजा सईदुद्दीन - [मायूस ए शाम ए ग़म तुझे इस की ख़बर भी है](https://bazmeshayari.com/maayus-e-sham-e-gam-tujhe-is-kee-khabar-bhi-hai/): मायूस ए शाम ए ग़म तुझे इस की ख़बर भी है तारीकियों की आड़ में नूर ए सहर भी है, मुमकिन नहीं है दीदा ओ दानिस्ता तर्क ए इश्क़ मजबूर सिर्फ़ दिल ही नहीं है नज़र भी है, ये मुनहसिर है आप पे जैसे भी देखिए ना मो’तबर भी है वो नज़र मो’तबर भी है, तू ही बता दे मुझ को कि सज्दे कहाँ करूँ माबैन ए दैर ओ का’बा तेरा संग ए दर भी है, तेरे जुनून ए शौक़ ने क्या गुल खिलाए हैं बेगाना ए बहार थे कुछ गुल ख़बर भी है, सब रह रव ए हयात हैं - [कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है](https://bazmeshayari.com/koi-hndu-koi-muslim-koi-isaai-hai/): कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है, इतनी ख़ूँ ख़ार न थीं पहले इबादतगाहें ये अक़ीदे हैं या कि इंसान की तन्हाई है ? तीन चौथाई से ज़ाइद हैं जो आबादी में उन के ही वास्ते हर भूख है महँगाई है, देखे कब तलक बाक़ी रहे सजधज उस की आज जिस चेहरा से तस्वीर उतरवाई है, अब नज़र आता नहीं कुछ भी दुकानों के सिवा अब न बादल हैं, न चिड़ियाँ हैं, न पुर्वाई है..!! ~निदा फ़ाज़ली - [जब तेरा हुक्म मिला, तर्क ए मुहब्बत कर दी](https://bazmeshayari.com/jab-tera-huqm-mila-tark-e-muhabbat-kar-dee/): जब तेरा हुक्म मिला, तर्क ए मुहब्बत कर दी दिल मगर इस पे वो धड़का कि क़यामत कर दी, तुझ से किस तरह मैं इज़हार ए तमन्ना करता लफ्ज़ जो सूझे भी तो म’आनी ने बगावत कर दी, मैं ने तो समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले तू ने तो जा कर जुदाई ही मेरी क़िस्मत कर दी, तुझ को पूजा है कि असनाम परस्ती की है मैं ने वहदत के मफ़ाहीम की कसरत कर दी, मुझ को दुश्मन के इरादों पे भी प्यार आता है तेरी उल्फ़त ने मुहब्बत मेरी आदत कर दी, पूछ बैठा हूँ मैं - [हमने सुना था फ़रिश्ते जान लेते है](https://bazmeshayari.com/humne-suna-tha-farishte-jaan-lete-hain/): हमने सुना था फ़रिश्ते जान लेते है खैर छोड़ो ! अब तो इन्सान लेते है, इश्क़ ने ऐसी शिनाख्त बख्शी है अब तो दूर से ही लोग पहचान लेते है, ग़ुरबत यूँ रक्साँ है हमारी बस्ती में बेच कर ज़िस्म यहाँ लोग समान लेते है, दीन तो बड़ी अनमोल चीज है ख़ुदा की यहाँ लोग अब उसका भी दान लेते है, इन आँखों ने लाखो में चुना है उसको यूँ कि लोग रेत से हीरा जैसे छान लेते है, शहर ए मुनाफ़िक़ से तंग आ गया हूँ मैं आओ किसी गाँव में कच्चा मकान लेते है, बख्शीश जब है तेरे - [इन्सान भूल चुका है इन्सान की क़ीमत](https://bazmeshayari.com/insan-bhool-chuka-hai-insan-kee-qeemat/): इन्सान भूल चुका है इन्सान की क़ीमत बाज़ार में बढ़ गई आज हैवान की क़ीमत, इक्तिदार में आते है इख़्तियार की लालच में कुछ लोग लगा बैठे अपने ईमान की क़ीमत, तुमने तो मज़मून बना लिया खून से लिपटी लाश को एक माँ से पूछना एक जवान की क़ीमत, मेरी ही तरह आओ मैं हक़ की तरफ से हूँ शेख ने भी माँग ली आख़िर अपनी ज़बान की क़ीमत, उठा जब जनाज़ा तो बहुत से अपने पास पाए हमने शायद मुझसे ज्यादा थी मेरे मकान की क़ीमत, इन्सान भूल चुका है इन्सान की क़ीमत बाज़ार में बढ़ गई आज हैवान - [भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे](https://bazmeshayari.com/bhala-gamon-se-kahan-haar-jaane-wale-the/): भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे हम आँसुओं की तरह मुस्कुराने वाले थे, हम ही ने कर दिया ऐलान ए गुमरही वर्ना हमारे पीछे बहुत लोग आने वाले थे, उन्हें तो ख़ाक में मिलना ही था कि मेरे थे ये अश्क कौन से ऊँचे घराने वाले थे, उन्हें क़रीब न होने दिया कभी मैं ने जो दोस्ती में हदें भूल जाने वाले थे, मैं जिन को जान के पहचान भी नहीं सकता कुछ ऐसे लोग मेरा घर जलाने वाले थे, हमारा अलमिया ये था कि हमसफ़र भी हमें वही मिले जो बहुत याद आने वाले थे, ‘वसीम’ कैसी - [मैं दिल पे जब्र करूँगा तुझे भुला दूँगा](https://bazmeshayari.com/main-dil-pe-zabr-karunga-tujhe-bhula-dunga/): मैं दिल पे जब्र करूँगा तुझे भुला दूँगा मरूँगा ख़ुद भी तुझे भी कड़ी सज़ा दूँगा, ये तीरगी मेरे घर का ही क्यूँ मुक़द्दर हो मैं तेरे शहर के सारे दिए बुझा दूँगा, हवा का हाथ बटाऊँगा हर तबाही में हरे शजर से परिंदे मैं ख़ुद उड़ा दूँगा, वफ़ा करूँगा किसी सोगवार चेहरे से पुरानी क़ब्र पे कतबा नया सजा दूँगा, इसी ख़याल में गुज़री है शाम ए दर्द अक्सर कि दर्द हद से बढ़ेगा तो मुस्कुरा दूँगा, तू आसमान की सूरत है गर पड़ेगा कभी ज़मीं हूँ मैं भी मगर तुझ को आसरा दूँगा, बढ़ा रही हैं मेरे दुख - [तुम दूर हो तो प्यार का मौसम न आएगा](https://bazmeshayari.com/tum-door-ho-to-pyar-ka-mausam-na-ayega/): तुम दूर हो तो प्यार का मौसम न आएगा अब के बरस बहार का मौसम न आएगा, चूमूँगा किस की ज़ुल्फ़ घटाओं को देख कर एक जुर्म ए ख़ुश गवार का मौसम न आएगा, छलके शराब बर्क़ गिरे या जलें चराग़ ज़िक्र ए निगाह ए यार का मौसम न आएगा, वादा ख़िलाफ़ियों को तरस जाएगा यक़ीं रातों को इंतिज़ार का मौसम न आएगा, तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी हो जाएगी तवील एहसास के निखार का मौसम न आएगा..!! ~असद भोपाली - [भड़काएँ मेरी प्यास को अक्सर तेरी आँखें](https://bazmeshayari.com/bhadkaaye-meri-pyas-ko-aksar-teri-aankhen/): भड़काएँ मेरी प्यास को अक्सर तेरी आँखें सहरा मेरा चेहरा है समुंदर तेरी आँखें, फिर कौन भला दाद ए तबस्सुम उन्हें देगा रोएँगी बहुत मुझ से बिछड़ कर तेरी आँखें, ख़ाली जो हुई शाम ए ग़रीबाँ की हथेली क्या क्या न लुटाती रहीं गौहर तेरी आँखें, बोझल नज़र आती हैं ब ज़ाहिर मुझे लेकिन खुलती हैं बहुत दिल में उतर कर तेरी आँखें, अब तक मेरी यादों से मिटाए नहीं मिटता भीगी हुई एक शाम का मंज़र तेरी आँखें, मुमकिन हो तो एक ताज़ा ग़ज़ल और भी कह लूँ फिर ओढ़ न लें ख़्वाब की चादर तेरी आँखें, मैं संग - [इतनी मुद्दत बाद मिले हो](https://bazmeshayari.com/itni-muddat-baad-mile-ho/): इतनी मुद्दत बाद मिले हो किन सोचों में गुम फिरते हो ? इतने ख़ाइफ़ क्यूँ रहते हो ? हर आहट से डर जाते हो, तेज़ हवा ने मुझ से पूछा रेत पे क्या लिखते रहते हो ? काश कोई हम से भी पूछे रात गए तक क्यूँ जागे हो ? मैं दरिया से भी डरता हूँ तुम दरिया से भी गहरे हो, कौन सी बात है तुम में ऐसी इतने अच्छे क्यूँ लगते हो ? पीछे मुड़ कर क्यूँ देखा था पत्थर बन कर क्या तकते हो ? जाओ जीत का जश्न मनाओ में झूटा हूँ तुम सच्चे हो, अपने - [उजड़ उजड़ के सँवरती है तेरे हिज्र की शाम](https://bazmeshayari.com/ujad-ujad-ke-sanvarti-hai-tere-hizr-kee-shaam/): उजड़ उजड़ के सँवरती है तेरे हिज्र की शाम न पूछ कैसे गुज़रती है तेरे हिज्र की शाम ? ये बर्ग बर्ग उदासी बिखर रही है मेरी कि शाख़ शाख़ उतरती है तेरे हिज्र की शाम, उजाड़ घर में कोई चाँद कब उतरता है सवाल मुझ से ये करती है तेरे हिज्र की शाम, मेरे सफ़र में एक ऐसा भी मोड़ आता है जब अपने आप से डरती है तेरे हिज्र की शाम, बहुत अज़ीज़ हैं दिल को ये ज़ख़्म ज़ख़्म रुतें इन्ही रुतों में निखरती है तेरे हिज्र की शाम, ये मेरा दिल ये सरासर निगार खाना ए ग़म - [निगाह ए इल्तिफ़ात अब बदगुमाँ मालूम होती है](https://bazmeshayari.com/nigaah-e-iltifaat-ab-badgumaan-malum-hoti-hai/): निगाह ए इल्तिफ़ात अब बदगुमाँ मालूम होती है मेरी हर बात दुनिया को गिराँ मालूम होती है, तड़प उठते हैं सज्दे रौशनी महसूस करता हूँ जबीं मेरी क़रीब ए आस्ताँ मालूम होती है, क़यामत है जवानी के दिनों का याद आ जाना चमन की सैर भी बार ए गराँ मालूम होती है, ग़म ओ अंदोह में ऐ काश सारी ज़िंदगी गुज़रे यही मुझ को हयात ए जाविदाँ मालूम होती है, तरी दिल में नहीं अब ख़ुश्क हैं अश्क ए मसर्रत भी हर एक उम्मीद गर्द ए कारवाँ मालूम होती है, निहाँ हैं उन के जल्वे आइना हैराँ है क़िस्मत का - [हम तो हर ग़म को जहाँ के ग़म ए जानाँ समझे](https://bazmeshayari.com/hum-to-har-gam-ko-jahan-ke-gam-e-jaana-samjhe/): हम तो हर ग़म को जहाँ के ग़म ए जानाँ समझे जब बढ़ा नश्शा तो हम बादा ए इरफ़ाँ समझे, जो बहारों को सहर कारी ए दौराँ समझे ज़िंदगानी को वही ख़्वाब ए परेशाँ समझे, फ़िक्र ए ईजाद ए सितम में वो झुकाए थे जबीं हम उन्हें अपनी जफ़ाओं पे पशेमाँ समझे, खा गया एक जहाँ मेरे तबस्सुम का फ़रेब जो मेरी तरह परेशाँ थे परेशाँ समझे, हम ने शिकवा न किया शौक़ किसी से ग़म का अपनी तक़दीर को अपने से गुरेज़ाँ समझे..!! ~विशनू कुमार शौक - [अंदाज़ हू ब हू तेरी आवाज़ ए पा का था](https://bazmeshayari.com/andaaz-hoo-ba-hoo-teri-aawaz-e-paa-ka-tha/): अंदाज़ हू ब हू तेरी आवाज़ ए पा का था देखा निकल के घर से तो झोंका हवा का था, इस हुस्न ए इत्तिफ़ाक़ पे लुट कर भी शाद हूँ तेरी रज़ा जो थी वो तक़ाज़ा वफ़ा का था, दिल राख हो चुका तो चमक और बढ़ गई ये तेरी याद थी कि अमल कीमिया का था, इस रिश्ता ए लतीफ़ के असरार क्या खुलें तू सामने था और तसव्वुर ख़ुदा का था, छुप छुप के रोऊँ और सर ए अंजुमन हँसूँ मुझ को ये मशवरा मेरे दर्द आश्ना का था, उठा अजब तज़ाद से इंसान का ख़मीर आदी फ़ना - [तुझे खो कर भी तुझे पाऊँ जहाँ तक देखूँ](https://bazmeshayari.com/tujhe-kho-kar-bhi-tujhe-paaoon-jahan-tak-dekhoon/): तुझे खो कर भी तुझे पाऊँ जहाँ तक देखूँ हुस्न ए यज़्दाँ से तुझे हुस्न ए बुताँ तक देखूँ तू ने यूँ देखा है जैसे कभी देखा ही न था मैं तो दिल में तेरे क़दमों के निशाँ तक देखूँ सिर्फ़ इस शौक़ में पूछी हैं हज़ारों बातें मैं तेरा हुस्न तेरे हुस्न ए बयाँ तक देखूँ मेरे वीराना ए जाँ में तेरी यादों के तुफ़ैल फूल खिलते नज़र आते हैं जहाँ तक देखूँ वक़्त ने ज़ेहन में धुँदला दिए तेरे ख़द ओ ख़ाल यूँ तो मैं टूटते तारों का धुआँ तक देखूँ दिल गया था तो ये आँखें भी - [फ़रेब ए हुस्न तेरा एतिबार कर लेंगे](https://bazmeshayari.com/fareb-e-husn-tera-aetibar-kar-lenge/): फ़रेब ए हुस्न तेरा एतिबार कर लेंगे इसी तरह से ख़िज़ाँ को बहार कर लेंगे, हमारा साथ अगर दे गई हयात ऐ दोस्त तो हश्र तक भी तेरा इंतिज़ार कर लेंगे, हम अजनबी की तरह तेरी बज़्म में बैठें ये जब्र होगा मगर इख़्तियार कर लेंगे, करम की भीक न माँगेंगे हम ज़माने से हयात सर्फ़ ए ग़म ए रोज़गार कर लेंगे, गुलों से बढ़ के हसीं होंगे राह में काँटे हमारे पाँव के छाले जो प्यार कर लेंगे, वो हमसफ़र हैं अगर ये गुमाँ भी हो जाए रह ए हयात को हम ख़ुशगवार कर लेंगे, अभी तो अपने ही - [फ़ना कुछ नहीं है बक़ा कुछ नहीं है](https://bazmeshayari.com/fana-kuch-nahi-hai-baqa-kuch-nahi-hai/): फ़ना कुछ नहीं है बक़ा कुछ नहीं है फ़क़त वहम है मा सिवा कुछ नहीं है, मेरा उज़्र इस के सिवा कुछ नहीं है ख़ताकार हूँ और ख़ता कुछ नहीं है, न अपने हुए वो तो मेरा मुक़द्दर ज़माने से मुझ को गिला कुछ नहीं है, न पूछो मोहब्बत का हासिल न पूछो पशेमानियों के सिवा कुछ नहीं है, ख़ुशी भी मुसीबत भी राहत भी ग़म भी जहान ए मोहब्बत में क्या कुछ नहीं है, था दुश्वार इज़हार ए दर्द ए मोहब्बत ये क्या कम है जो कह दिया कुछ नहीं है, वो सुनते थे अहवाल अंजान बन कर यही - [इस तरह गुम हूँ ख़यालों में कुछ एहसास नहीं](https://bazmeshayari.com/is-tarah-goom-hoon-khyaalon-me-kuch-ehsas-nahin/): इस तरह गुम हूँ ख़यालों में कुछ एहसास नहीं कौन है पास मेरे कौन मेरे पास नहीं, दर्द जब हद में रहे दर्द का भी लुत्फ़ मिले ये भी क्या ग़म है कि जिस ग़म का कुछ एहसास नहीं, इस तरह शौक़ ए मोहब्बत में न गुम हो कोई मुझ को उल्फ़त भी किसी से है ये एहसास नहीं, ये हैं उल्फ़त के करिश्मे कि इलाही तौबा यूँ मेरे पास हैं वो जैसे मेरे पास नहीं, काँटों को रौंदता मैं बढ़ता चला जाता हूँ शौक़ ए दीदार में मंज़िल का भी एहसास नहीं, सुब्ह का तारा भी मादूम हुआ जाता - [कमाँ पे चढ़ के ब शक्ल ए ख़दंग होना पड़ा](https://bazmeshayari.com/kamaan-pe-chadh-ke-ba-shakl-e-khadang-hona-pada/): कमाँ पे चढ़ के ब शक्ल ए ख़दंग होना पड़ा हरीफ़ ए अम्न से मसरूफ़ ए जंग होना पड़ा, यहाँ थी दुश्मनी इंसाँ से प्यार पत्थर से मुझे भी आख़िरश एक रोज़ संग होना पड़ा, हसद की आग में जल जल के लोग मरने लगे मुझे समेट के वुसअ’त को तंग होना पड़ा, रहा जो बर सर ए पैकार में मुक़द्दर से तो उस हरीफ़ को हैरान ओ दंग होना पड़ा, ज़माना रोज़ मेरा ज़ब्त आज़माता था मेरे मिज़ाज को यूँ शोला रंग होना पड़ा, बहुत ग़ुरूर था पैराक होने का जिन को उन्हें ज़मीर शिकार ए नहंग होना पड़ा..!! - [जुदा उस जिस्म से हो कर कहीं तहलील हो जाता](https://bazmeshayari.com/juda-us-zism-se-ho-kar-kahin-tahlil-ho-jaata/): जुदा उस जिस्म से हो कर कहीं तहलील हो जाता फ़ना होते ही लाफ़ानी में मैं तब्दील हो जाता, मेरे पीछे अगर इबलीस को आने न देता तू सरापा में तेरे हर हुक्म की तामील हो जाता, जो होता इख़्तियार अपने मुक़द्दर को बदलने का तमन्नाओं की मैं एक सूरत ए तकमील हो जाता, मुझे पहचान कर कोई ज़माने को बता देता तो मिस्ल ए निकहत ए गुलज़ार मैं तर्सील हो जाता, करिश्मा ये भी हो जाता तेरे अदना तआ’वुन से मुझे तू सोचता तो मैं तेरी तख़्ईल हो जाता, ज़मीं प्यासी ज़मीर इंसान भी प्यासे नहीं रहते अगर दरिया - [अमीरों के बुरे अतवार को जो ठीक समझे है](https://bazmeshayari.com/amiron-ke-bure-atwaar-ko-jo-thik-samjhe-hain/): अमीरों के बुरे अतवार को जो ठीक समझे है मेरी हक़ बात को वो क़ाबिल ए तश्कीक समझे है, बहुत मुश्किल है जो उस की ग़रीबी दूर हो जाए अजब ख़ुद्दार है इमदाद को भी भीख समझे है, मेरे बारे में उस के कान भरता है कोई शायद बयाँ तौसीफ़ करता हूँ तो वो तज़हीक समझे है, तेरे ख़त तेरी तस्वीरें शिकस्ता दिल के कुछ टुकड़े तेरा दीवाना इन सब को तेरी तमलीक समझे है, मैं उस के हर गुमाँ का पास अक्सर रखा करता हूँ मेरा दिल अपने दिल के वो बहुत नज़दीक समझे है, चले है इस तरह - [ये कहना आसान नहीं है](https://bazmeshayari.com/ye-kahna-aasaan-nahi-hai/): ये कहना आसान नहीं है दिल में कोई अरमान है, हिम्मत की तो पाई मंज़िल दुनिया का एहसान नहीं है, लाख तसल्ली दी है तुम ने लेकिन इत्मीनान नहीं है, हाए मोहब्बत की मजबूरी रोना भी आसान नहीं है, छोड़ तो दूँ मैं उन का दामन लेकिन अब इम्कान नहीं है, पोंछ के तुम दामन से तो देखो आँसू हैं तूफ़ान नहीं है, तर्क ए मोहब्बत तौबा तौबा ये मेरा ईमान नहीं है, ख़ास तजल्ली ढूँड रहा हूँ किरनों की पहचान नहीं है, शौक़ समझते हो जितना तुम इतना वो नादान नहीं है..!! ~विशनू कुमार शौक - [मोहब्बत ख़ुद ही अपनी पर्दादार ए राज़ होती है](https://bazmeshayari.com/mohabbat-khud-hi-apni-pardadar-e-raaz-hoti-hai/): मोहब्बत ख़ुद ही अपनी पर्दादार ए राज़ होती है जो दिल पर चोट लगती है वो बे आवाज़ होती है, ब ज़ाहिर नग़्मा ए हस्ती भला मालूम होता है मगर हर साँस आवाज़ ए शिकस्त ए साज़ होती है, दिलों के मेल में रुस्वाइयाँ भी हो के रहती है कि टकराते हैं जब साग़र तो एक आवाज़ होती है, न हँसने का कोई मक़्सद न रोने का कोई मतलब वो दीवाने हैं जिन की ज़िंदगी एक राज़ होती है, छुपाए से लब ओ लहजा मोहब्बत का नहीं छुपता ज़माने से बहुत बदली हुई आवाज़ होती है, मैं रोता हूँ तो - [तस्कीन न हो जिस में वो राज़ बदल डालो](https://bazmeshayari.com/taskeen-na-ho-jis-me-wo-raaz-badal-daalo/): तस्कीन न हो जिस में वो राज़ बदल डालो जो राज़ न रख पाए हमराज़ बदल डालो, तुम ने भी सुनी होगी बड़ी आम कहावत है अंजाम का हो ख़तरा आगाज़ बदल डालो, पुर सोज़ दिलों को जो मुस्कान न दे पाए सुर ही न मिले जिस में वो साज़ बदल डालो, दुश्मन के इरादों को है ज़ाहिर अगर करना तुम खेल वही खेलो अंदाज़ बदल डालो, ऐ दोस्त करो हिम्मत कुछ दूर सवेरा है गर चाहते हो मंज़िल परवाज़ बदल डालो..!! ~अल्लामा इक़बाल - [रहोगे हम से कब तक बेख़बर से](https://bazmeshayari.com/rahoge-hum-se-kab-tak-bekhabar-se/): रहोगे हम से कब तक बेख़बर से जुदा होती नहीं दीवार दर से, मुसाफ़िर हाल क्या अपना सुनाए अभी लौटा नहीं अपने सफ़र से, हमेशा तो नहीं रहता है क़ाएम तअ’ल्लुक़ राह रौ का रहगुज़र से, मकानों से मकीं रुख़्सत हुए हैं उदासी झाँकती है बाम ओ दर से, अभी तक हूँ सफ़र में इर्तिक़ा के मुझे लगते थे रस्ते मुख़्तसर से, इसी मिट्टी से है पहचान मेरी मोहब्बत है मुझे भी अपने घर से, न जाने उन पे क्या गुज़री थी शाहिद जुदा पत्ते हुए थे जब शजर से..!! ~हफ़ीज़ शाहिद - [हालात पर निगाह रुतों पर नज़र न थी](https://bazmeshayari.com/halaat-par-nigaah-ruto-par-nazar-na-thi/): हालात पर निगाह रुतों पर नज़र न थी जब तक रहे चमन में चमन की ख़बर न थी, ख़ुद अपने घर को आग दिखाई थी आप ने इस में तो कोई साज़िश ए बर्क़ ओ शरर न थी, रूदाद ए तीरा बख़्ती ए अहबाब क्या कहें उन के लिए सहर भी तुलू ए सहर न थी, फ़स्ल ए बहार में तर ओ ताज़ा नहीं हवा शायद शजर को ख़्वाहिश ए बर्ग ओ समर न थी, टूटी हुई उमीद शिकस्ता थे हौसले दिल की तबाहियों पे मगर आँख तर न थी, दश्त ए तलब में इतने अंधेरे थे कारगर रख़्शंदा एक - [इतना सैराब होने वाला था](https://bazmeshayari.com/itna-sairab-hone-wala-tha/): इतना सैराब होने वाला था मैं तह ए आब होने वाला था, तेज़ उस हुस्न की हरारत थी जिस्म सीमाब होने वाला था, एक आमद ग़ज़ल की थी उस पल एक नया बाब होने वाला था, फिर से बीमार कर दिया उस ने मैं शिफ़ायाब होने वाला था, उस का मिलना भी गाहे गाहे था मैं भी कमयाब होने वाला था, छत थी कमज़ोर बारिशों के लिए फ़र्श तालाब होने वाला था, एक सफ़ीना वो बन गई आतिर जब मैं गिर्दाब होने वाला था..!! ~यासीनआतिर - [अनगिनत फूल इंतिख़ाब गुलाब](https://bazmeshayari.com/anginat-phool-intikhab-gulab/): अनगिनत फूल इंतिख़ाब गुलाब आदतें कर गया ख़राब गुलाब, वो है नाराज़ उस की चौखट पर ले के जाऊँगा बेहिसाब गुलाब, नज़्र जो कर सकूँगा उस के हुज़ूर शहर में कब वो दस्तियाब गुलाब, उस की रंगत है क्या बदन कैसा इन सवालों का है जवाब गुलाब, ऐसे लगता है अहल ए दिल के लिए बन गया इश्क़ का निसाब गुलाब, हर नए फूल में तजस्सुस है किस तरह से है कामयाब गुलाब, पत्ती पत्ती बिखर गया क्यूँ कर कर न ले मेरा एहतिसाब गुलाब..!! ~यासीनआतिर - [मेरे क़ातिल को पुकारो कि मैं जिंदा हूँ अभी](https://bazmeshayari.com/mere-qatil-ko-pukaro-ki-main-zinda-hoon-abhi/): मेरे क़ातिल को पुकारो कि मैं जिंदा हूँ अभी फिर से मक़तल को सँवारों कि मैं जिंदा हूँ अभी, ये शब ए हिज्र तो साथी है मेरी बरसों से जाओ सो जाओ सितारों कि मैं जिंदा हूँ अभी, ये परेशाँ से गेसूं देखे नहीं जाते मुझ से अपनी जुल्फों को सँवारों कि मैं जिंदा हूँ अभी, लाख मौजों में घिरा हूँ अभी डूबा तो नहीं मुझ को साहिल से पुकारो कि मैं जिंदा हूँ अभी, कब्र से आज भी मोहसिन की आती है सदा तुम कहाँ हो मेरे यारो कि मैं जिंदा हूँ अभी..!! ~मोहसिन - [कोई हो दर्द ए मुसलसल तो नींद आती है](https://bazmeshayari.com/koi-ho-dard-e-musalsam-to-neend-aati-hai/): कोई हो दर्द ए मुसलसल तो नींद आती है बदन में हो कोई हलचल तो नींद आती है, हमें सुकून मयस्सर नहीं है एक पल भी तुम्हारी याद हो पल पल तो नींद आती है, तलब नहीं है किसी और ख़ुशबदन की हमें तुम्हारा पास हो आँचल तो नींद आती है, कभी न तुम से रही गुफ़्तुगू अधूरी सी ग़ज़ल हो जब भी मुकम्मल तो नींद आती है, अजीब ख़ौफ़ सा लाहक़ है बस्तियों से हमें क़रीब हो कोई जंगल तो नींद आती है, पसंद है हमें शोरिश फ़साद गिर्द ओ नवाह अगर हो शहर मोअत्तल तो नींद आती है, - [कुछ न इस काम में किफ़ायत की](https://bazmeshayari.com/kuch-na-is-kaam-me-kifayat-kee/): कुछ न इस काम में किफ़ायत की मैं ने दिल खोल कर मोहब्बत की, सस्ते दामों कहाँ मैं बिकता हूँ बस तेरे वास्ते रिआयत की, काम इस शहर में ये मुश्किल था पर तेरे इश्क़ की हिफ़ाज़त की, मुझ को अब कुछ गिला नहीं ख़ुद से मैं ने जी भर के तेरी चाहत की, मैं तो मजबूर हो गया उस पल जब तेरे हिज्र ने बग़ावत की..!! ~यासीनआतिर - [शजर में शजर सा बचा कुछ नहीं](https://bazmeshayari.com/shazar-me-shazar-sa-bacha-kuch-bhi-nahin/): शजर में शजर सा बचा कुछ नहीं हवाओं से फिर भी गिला कुछ नहीं, कहा क्या गुज़रते हुए अब्र ने झुलसती ज़मीं ने सुना कुछ नहीं, किनारों पे लिखा था क्या क्या मगर किसी मौज ने भी पढ़ा कुछ नहीं, चलो अब किसी की दुआ मिल गई मेरे पास वैसे भी था कुछ नहीं, उसे अब भी फ़ारूक़ कहते हो घर अब इस में तो घर सा बचा कुछ नहीं..!! ~फ़ारूक़ इंजीनियर - [फ़ैसले वो न जाने कैसे थे](https://bazmeshayari.com/faisle-wo-na-jaane-kaise-the/): फ़ैसले वो न जाने कैसे थे रात की रात घर से निकले थे, याद आते हैं अब भी रह रह कर शहर में कुछ तो ऐसे चेहरे थे, क्या ज़माना था वो कि हम दोनों एक दूजे का दुख समझते थे, किस कड़ी धूप के सफ़र में हैं नाम पेड़ों पे जिन के लिखे थे, जाने किस गुलबदन की याद आई फ़स्ल ए गुल में उदास बैठे थे, वक़्त सा चारागर भी हार गया हिजरतों के तो ज़ख़्म ऐसे थे, पहली बारिश ही ले गई फ़ारूक़ रंग सारे के सारे कच्चे थे..!! ~फ़ारूक़ इंजीनियर - [इस बार तो ग़ुरूर ए हुनर भी निकल गया](https://bazmeshayari.com/is-baar-to-gurur-e-hunar-bhi-nikal-gaya/): इस बार तो ग़ुरूर ए हुनर भी निकल गया बच कर वो मुझ से बार ए दिगर भी निकल गया, इतना तेरा विसाल तो चाहा न था कभी दिल से तेरी जुदाई का डर भी निकल गया, हम राह के तअय्युन ए जाँ काह में रहे इस कश्मकश में वक़्त ए सफ़र भी निकल गया, मक़्सूद सिर्फ़ ढूँढना कब था तुझे सो मैं जिस सम्त तू नहीं था उधर भी निकल गया, कहता न था मियाना रवी है बुरी जमाल सहरा के साथ हाथ से घर भी निकल गया..!! ~जमाल एहसानी - [रास्ते अपनी नज़र बदला किए](https://bazmeshayari.com/raaste-apni-nazar-badla-kiye/): रास्ते अपनी नज़र बदला किए हम तुम्हारा रास्ता देखा किए, अहल ए दिल सहरा में गुम होते रहे ज़िंदगी बैठी रही पर्दा किए, एहतिमाम ए दार ओ ज़िंदाँ की क़सम आदमी हर अहद ने पैदा किए, हम हैं और अब याद का आसेब है उस ने वादे तो कई ईफ़ा किए, हाए रे वहशत कि तेरे शहर का हम सबा से रास्ता पूछा किए..!! ~राही मासूम रज़ा - [बला वो टल गई सदक़े में जिस के शहर चढ़े](https://bazmeshayari.com/balaa-wo-tal-gai-sadke-me-jis-ke-shahar-chadhe/): बला वो टल गई सदक़े में जिस के शहर चढ़े हमें डुबो के न अब कोई ख़ूनी नहर चढ़े, बढ़ा जो मैं थके क़दमों ने बददुआ ये दी क़दम क़दम तुझे पगडंडियों का ज़हर चढ़े, वही मिलन का समाँ उस से माँझियो होगा नदी में चाँद की जब नाव लहर लहर चढ़े, ख़ुदा करे तेरा तन मन रहे यूँही उजला न तेरे गाँव पे गर्द ए हवा ए शहर चढ़े, ढकूँ बदन तो गए मौसमों की बू महके बदन को खोलूँ तो भीगी रुतों का ज़हर चढ़े, बना वो चाँद मुसव्विर तो उस पे क़ैद लगी न अब मकानों की - [हर चमकती क़ुर्बत में एक फ़ासला देखूँ](https://bazmeshayari.com/har-chamakati-qurbat-me-ek-faasla-dekhoon/): हर चमकती क़ुर्बत में एक फ़ासला देखूँ कौन आने वाला है किस का रास्ता देखूँ ? शाम का धुँदलका है या उदास ममता है भूली बिसरी यादों से फूटती दुआ देखूँ, मस्जिदों में सज्दों की मिशअलें हुईं रौशन बेचराग़ गलियों में खेलता ख़ुदा देखूँ, लहर लहर पानी में डूबता हुआ सूरज कौन मुझ में दर आया उठ के आइना देखूँ, लहलहाते मौसम में तेरा ज़िक्र ए शादाबी शाख़ शाख़ पर तेरे नाम को हरा देखूँ..!! ~निदा फ़ाज़ली - [फिर गोया हुई शाम परिंदों की ज़बानी](https://bazmeshayari.com/fir-goya-hui-shaam-parindon-ki-zabani/): फिर गोया हुई शाम परिंदों की ज़बानी आओ सुनें मिट्टी से ही मिट्टी की कहानी, वाक़िफ़ नहीं अब कोई समुंदर की ज़बाँ से सदियों की मसाफ़त को सुनाता तो है पानी, उतरे कोई महताब कि कश्ती हो तह ए आब दरिया में बदलती नहीं दरिया की रवानी, कहता है कोई कुछ तो समझता है कोई कुछ लफ़्ज़ों से जुदा हो गए लफ़्ज़ों के मआ’नी, इस बार तो दोनों थे नई राहों के राही कुछ दूर ही हमराह चलें यादें पुरानी, ~निदा फ़ाज़ली - [वक़्त बंजारा सिफ़त लम्हा ब लम्हा अपना](https://bazmeshayari.com/waqt-banjaara-sifat-lamha-ba-lamha-apna/): वक़्त बंजारा सिफ़त लम्हा ब लम्हा अपना किस को मालूम यहाँ कौन है कितना अपना ? जो भी चाहे वो बना ले उसे अपने जैसा किसी आईने का होता नहीं चेहरा अपना, ख़ुद से मिलने का चलन आम नहीं है वर्ना अपने अंदर ही छुपा होता है रस्ता अपना, यूँ भी होता है वो ख़ूबी जो है हम से मंसूब उस के होने में नहीं होता इरादा अपना, ख़त के आख़िर में सभी यूँ ही रक़म करते हैं उस ने रस्मन ही लिखा होगा तुम्हारा अपना..!! ~निदा फ़ाज़ली - [एक रात लगती है एक सहर बनाने में](https://bazmeshayari.com/ek-raat-lagti-hai-ek-sahar-banane-me/): एक रात लगती है एक सहर बनाने में हम ने क्यों नहीं सोचा हमसफ़र बनाने में ? मंज़िलें बदलते हो पर तुम्हें नहीं मालूम उम्रें बीत जाती हैं रहगुज़र बनाने में, उम्र भर रहा हम पर उस का ही असर हावी बेअसर रहे जिस पर हम असर बनाने में, मौज में बनाता हूँ जिस्म जिस परिंदे का रूह काँप उठती है उस के पर बनाने में, तेरी याद की गाड़ी कुछ मदद करें शायद इस तवील रस्ते को मुख़्तसर बनाने में..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [अगरचे सब यहाँ सस्ता पड़ेगा](https://bazmeshayari.com/agarche-sab-yahan-sasta-padega/): अगरचे सब यहाँ सस्ता पड़ेगा तुम्हें बस इश्क़ ही महँगा पड़ेगा, मुसव्विर से उलझने की सज़ा है हमें तस्वीर में रहना पड़ेगा, मेरी आँखों में तुम बच कर उतरना यहाँ अश्कों का एक दरिया पड़ेगा, सभी किरदार गर रखने हैं ज़िंदा कहानी में हमें मरना पड़ेगा, तुम्हें भी अच्छे हम लगने लगे हैं सुनो तुम को भी पछताना पड़ेगा, घड़ी सच बोलने की आ गई है हमें दानिस्ता हकलाना पड़ेगा, चरस से बचने को तुम कह रहे हो यक़ीनन इश्क़ से बचना पड़ेगा..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [छोड़ कर ऐसे गया है छोड़ने वाला मुझे](https://bazmeshayari.com/chhod-kar-aise-gaya-hai-chhodne-wala-mujhe/): छोड़ कर ऐसे गया है छोड़ने वाला मुझे दोस्तो उस ने कहीं का भी नहीं छोड़ा मुझे, बोल बाला इस क़दर ख़ामोशियों का है यहाँ काटने को दौड़ता है मेरा ही कमरा मुझे, हाँ वही तस्वीर जो खींची थी मैं ने साथ में हाँ वही तस्वीर कर जाती है अब तन्हा मुझे, बात तो ये बाद की है कुछ बनूँगा या नहीं कूज़ागर तू चाक पे तो रक़्स करवाता मुझे, बस इसी उम्मीद पे होता गया बर्बाद मैं गर कभी बिखरा तो आ कर तू सँभालेगा मुझे, आठवीं शब भी महज़ कुछ घंटों की मेहमान है गर मनाना होता तो - [अगर जो प्यार ख़ता है तो कोई बात नहीं](https://bazmeshayari.com/agar-jo-pyar-khata-hai-to-koi-baat-nahi/): अगर जो प्यार ख़ता है तो कोई बात नहीं क़ज़ा ही उस की सज़ा है तो कोई बात नहीं, तू सिर्फ़ मेरी है इस का ग़ुरूर है मुझ को अगर ये वहम मेरा है तो कोई बात नहीं, मुआ’फ़ करने की आदत नहीं है वैसे तो अगर ये तीर तेरा है तो कोई बात नहीं, बिना बदन के तअ’ल्लुक़ बचा नहीं सकते यही जो रस्ता बचा है तो कोई बात नहीं, हाँ मेरे बाद किसी और का न हो जाना तू आज मुझ से जुदा है तो कोई बात नहीं..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [झूठ का बोलना आसान नहीं होता है](https://bazmeshayari.com/jhooth-ka-bolna-aasaan-nahi-hota-hai/): झूठ का बोलना आसान नहीं होता है दिल तेरे बाद परेशान नहीं होता है, सब तेरे बाद यही पूछते रहते हैं मुझे अब किसी बात पे हैरान नहीं होता है, कैसे तुम भूल गए हो मुझे आसानी से इश्क़ में कुछ भी तो आसान नहीं होता है, हिज्र का ज़ाइक़ा लीजे ज़रा धीरे धीरे सब की थाली में ये पकवान नहीं होता है, कोई किरदार मज़ा देता नहीं है उस का जिस कहानी का तू उन्वान नहीं होता है, होने को क्या नहीं होता है जहाँ में लेकिन तुम से मिलने का ही इम्कान नहीं होता है..!! ~अक्स समस्तीपुरी - [आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे](https://bazmeshayari.com/aankh-par-patti-rahe-aur-aql-par-taala-rahe/): आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे अपने शाहे वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे, देखने को दे उन्हें अल्लाह कंप्यूटर की आँख सोचने को कोई बाबा बाल्टीवाला रहे, तालिब ए शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे, एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए चार छै चमचे रहें माइक रहे माला रहे..!! ~अदम गोंडवी सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं - [सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं](https://bazmeshayari.com/sau-me-sattar-aadmi-filhal-jab-naashaad-hain/): सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं दिल रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है ? कोठियों से मुल्क़ के मेआर को मत आँकिए असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है, जिस शहर में मुंतज़िम अंधे हों जल्वागाह के उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है, ये नई पीढ़ी पे निर्भर है वही जजमेंट दे फ़ल्सफ़ा गाँधी का मौज़ूँ है कि नक्सलवाद है, यह ग़ज़ल मरहूम मंटो की नज़र है दोस्तो जिसके अफ़साने में ठंडे गोश्त की रूदाद है..!! ~अदम गोंडवी वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं - [वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं](https://bazmeshayari.com/ved-me-jinka-hawala-haashiye-par-bhi-nahi/): वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें ? लोक रंजन हो जहाँ शंबूक वध की आड़ में उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें ? कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का यथार्थ त्रासदी कुंठा घुटन संत्रास लेकर क्या करें ? गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे पारलौकिक प्रेम का मधुमास लेकर क्या करें..?? ~अदम गोंडवी भूख के एहसास को शेर ओ सुख़न तक ले चलो - [भूख के एहसास को शेर ओ सुख़न तक ले चलो](https://bazmeshayari.com/bhookh-ke-ehsas-ko-sher-o-sukhan-tak-le-chalo/): भूख के एहसास को शेर ओ सुख़न तक ले चलो या अदब को मुफ़्लिसों की अंजुमन तक ले चलो, जो ग़ज़ल माशूक़ के जलवों से वाक़िफ़ हो गई उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो, मुझको सब्र ओ ज़ब्त की तालीम देना बाद में पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो, ख़ुद को ज़ख़्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो..!! ~अदम गोंडवी जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे - [जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे](https://bazmeshayari.com/jo-dalhauji-na-kar-paya-wo-ye-huqqam-kar-denge/): जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे, सुरा व सुंदरी के शौक़ में डूबे हुए रहबर दिल्ली को रंगीलेशाह का हम्माम कर देंगे, ये वंदेमातरम् का गीत गाते हैं सुबह उठकर मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगना दाम कर देंगे, सदन को घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे अगली योजना में घूसख़ोरी आम कर देंगे..!! ~अदम गोंडवी जो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल में - [जो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल में](https://bazmeshayari.com/jo-ulajh-kar-rah-gayi-hai-faailon-ke-jaal-me/): जो उलझकर रह गई है फ़ाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में ? बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई रमसुधी की झोंपड़ी सरपंच की चौपाल में, खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में, जिसकी क़ीमत कुछ न हो इस भीड़ के माहौल में ऐसा सिक्का ढालिए मत जिस्म की टकसाल में..!! ~अदम गोंडवी ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी - [ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी](https://bazmeshayari.com/ye-amiron-se-humari-faislakun-jung-thi/): ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी फिर कहाँ से बीच में मस्जिद व मंदिर आ गए ? जिनके चेहरे पर लिखी है जेल की ऊँची फ़सील रामनामी ओढ़कर संसद के अंदर आ गए, देखना सुनना व सच कहना जिन्हें भाता नहीं कुर्सियों पर फिर वही बापू के बंदर आ गए, कल तलक जो हाशिए पर भी न आते थे नज़र आजकल बाज़ार में उनके कैलेंडर आ गए..!! ~अदम गोंडवी घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है - [घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है](https://bazmeshayari.com/ghar-pe-thande-chulhe-par-agar-khaali-patili-hai/): घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है बताओं कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है ? भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन सी ये सुब्हे फ़रवरी बीमार पत्नी से भी पीली है, बग़ावत के कँवल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है, सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे मुहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है..!! ~अदम गोंडवी अंत्यज कोरी पासी हैं हम - [अंत्यज कोरी पासी हैं हम](https://bazmeshayari.com/antayj-kori-paasi-hai-hum/): अंत्यज कोरी पासी हैं हम क्यूँ कर भारतवासी हैं हम ? अपने को क्यूँ वेद में खोजें क्या दर्पण विश्वासी हैं हम ? छाया भी छूना गर्हित है ऐसे सत्यानाशी हैं हम, धर्म के ठेकेदार बताएँ किस ग्रह के अधिवासी हैं हम..?? ~अदम गोंडवी वल्लाह किस जुनूँ के सताए हुए हैं लोग - [वल्लाह किस जुनूँ के सताए हुए हैं लोग](https://bazmeshayari.com/vallah-kis-junoon-ke-sataye-hue-hai-log/): वल्लाह किस जुनूँ के सताए हुए हैं लोग हमसाए के लहू में नहाए हुए हैं लोग, ये तिश्नगी गवाह है घायल है इनकी रूह चेहरे ही तबस्सुम से सजाए हुए हैं लोग, ग़ैरत मरी तो वाक़ई इंसान मर गया जीने की सिर्फ़ रस्म निभाए हुए हैं लोग, कहने को कह रहे हैं मुबारक हो नया साल खंज़र भी आस्तीं में छुपाए हुए हैं लोग..!! ~अदम गोंडवी न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से - [न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से](https://bazmeshayari.com/na-mahlon-ki-bulandi-se-na-lafzon-ke-nagine-se/): न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से तमद्दुन में निखार आता है ‘घीसू’ के पसीने से, अब चर्चा में रोटी है मुहब्बत हाशिए पर है उतर आई ग़ज़ल इस दौर में कोठी के ज़ीने से, अदब का आईना उन तंग गलियों से गुज़रता है जहाँ बचपन सिसकता है लिपटकर माँ के सीने से, कि बहरे बेकराँ में ताक़यामत का सफ़र ठहरा जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से, अदीबों की नई पीढ़ी से ये मेरी गुज़ारिश है सँजोकर रखें धूमिल की विरासत को क़रीने से..!! ~अदम गोंडवी ये समझते हैं खिले हैं तो फिर बिखरना - [ये समझते हैं खिले हैं तो फिर बिखरना है](https://bazmeshayari.com/ye-samjhte-hain-khile-hai-to-fir-bikhrana-hai/): ये समझते हैं खिले हैं तो फिर बिखरना है पर अपने ख़ून से गुलशन में रंग भरना है, उससे मिलने को कई मोड़ से गुज़रना है अभी तो आग के दरिया में भी उतरना है, जिसके आने से बदल जाए ज़माने का निज़ाम ऐसे इंसान को इस ख़ाक से उभरना है, बह रहा दरिया इधर एक घूँट को तरसे उदय प्रताप जी वादे से ये मुकरना है..!! ~अदम गोंडवी ज़िंदगी दुश्वार है उफ़! ये गिरानी देखिए - [ज़िंदगी दुश्वार है उफ़! ये गिरानी देखिए](https://bazmeshayari.com/zindagi-dushwaar-hai-uff-ye-giraani-dekhiye/): ज़िंदगी दुश्वार है उफ़! ये गिरानी देखिए और फिर नेताओं की शोला बयानी देखिए, भीख का लेकर कटोरा चाँद पर जाने की ज़िद ये अदा, ये बाँकपन ये लंतरानी देखिए, मुल्क जाए भाड़ में इससे उन्हें मतलब नहीं कुर्सी से चिपटे हुए हैं जाँफ़िशानी देखिए..!! ~अदम गोंडवी अचेतन मन में प्रज्ञा कल्पना की लौ जलाती है - [अचेतन मन में प्रज्ञा कल्पना की लौ जलाती है](https://bazmeshayari.com/achetan-man-me-pragya-kalpana-kee-lau-jalaati-hai/): अचेतन मन में प्रज्ञा कल्पना की लौ जलाती है सहज अनुभूति के स्तर में कविता जन्म पाती है उठाता पाँव है विज्ञान संशय के अँधेरे में अचानक उस अँधेरे में ही बिजली कौंध जाती है अदम इस सभ्यता के पास देने को नहीं कुछ अब जो ये संतप्त मानव के लिए पेशाब लाती है..!! ~अदम गोंडवी दोस्तो! अब और क्या तौहीन होगी रीश की - [दोस्तो! अब और क्या तौहीन होगी रीश की](https://bazmeshayari.com/doston-ab-aur-kya-tauheen-hogi-reesh-kee/): दोस्तो! अब और क्या तौहीन होगी रीश की ब्रेसरी के हुक पे ठहरी चेतना रजनीश की, योग की पेचीदगी का हल मिले या न मिले आप सब सूरत से वाक़िफ़ हो गए इब्लीस की, मोहतरम यूँ पाँव लटकाए हुए हैं क़ब्र में चाहिए लड़की कोई सोलह, कोई उन्नीस की, फ़ल्सफ़े की रौशनी में रूह नंगी हो गई क्यूँ नहीं उठती है अब कोई नज़र तफ़्तीश की, जिस्म की घाटी में अब इल्हाम ढूँढ़ा जा रहा ये घिनौनी लत है कोरे गाँव के जगदीश की..!! ~अदम गोंडवी जिसके सम्मोहन में पागल, धरती है, आकाश भी है - [जिसके सम्मोहन में पागल, धरती है, आकाश भी है](https://bazmeshayari.com/jiske-sammohan-me-pagal-dharti-hai-aakash-bhi-hai/): जिसके सम्मोहन में पागल, धरती है, आकाश भी है एक पहेली सी से दुनिया, गल्प भी है, इतिहास भी है, चिंतन के सोपान पे चढ़कर चाँद सितारे छू आए लेकिन मन की गहराई में माटी की बू बास भी है, मानव मन के द्वंद्व को आख़िर किस साँचे में ढालोगे महारास की पृष्ठभूमि में ‘ओशो’ का संन्यास भी है, अमृत की बूँदे बरसी थीं तब हमने मुँह फेर लिया आज ख़ुशी से ज़हर पी रहे और इसका एहसास भी है, इंद्रधनुष के पुल से गुज़रकर उस बस्ती तक आए हैं जहाँ भूख की धूप सलोनी चंचल है बिंदास भी है, - [इंद्रधनुषी रंग में महकी हुई तहरीर है](https://bazmeshayari.com/indradhanushi-rang-me-mahki-hui-tahrir-hai/): इंद्रधनुषी रंग में महकी हुई तहरीर है अमृता की शायरी एक बोलती तस्वीर है, टूटते रिश्तों की तल्ख़ी है मेरे अश्आर में वाक़ई पंजाब के माटी की ये तासीर है, दिल को तड़पाती है असफल प्यार की तीखी चुभन शबनमी होंठों पे गोया दास्तान ए हीर है, बारहा दुनिया में जिस औरत को रुस्वाई मिली तेरी नज़्मों में वो बर्ग ए गुल नहीं शमशीर है, गंगाजल से वोदका तक ये सफ़रनामा अदम अहल ए पंजाबी अदब में एक नई तामीर है..!! ~अदम गोंडवी वामपंथी सोच का आयाम है नागार्जुन - [वामपंथी सोच का आयाम है नागार्जुन](https://bazmeshayari.com/vaampanthi-soch-ka-aayaam-hai-nagarjun/): वामपंथी सोच का आयाम है नागार्जुन ज़िंदगी में आस्था का नाम है नागार्जुन, ग्रामगंधी सर्जना, उसमें जुलाहे का ग़ुरूर जितना अनगढ़ उतना ही अभिराम है नागार्जुन, हम तो कहते हैं बंगाल की खाँटी सुबह केरला की ख़ूबसूरत शाम है नागार्जुन, ख़ास इतना है कि सर आँखों पे है उसका वजूद मुफ़लिसों की झोपड़ी तक आम है नागार्जुन, इस अहद के साथ कि इस बार हारेगा यज़ीद कर्बला में युद्ध का पैग़ाम है नागार्जुन..!! ~अदम गोंडवी नीलोफ़र, शबनम नहीं, अँगार की बातें करो - [नीलोफ़र, शबनम नहीं, अँगार की बातें करो](https://bazmeshayari.com/nilofar-shabnam-nahi-angaar-kee-baaten-karo/): नीलोफ़र, शबनम नहीं, अँगार की बातें करो वक़्त के बदले हुए मेयार की बातें करो, भाप बन सकती नहीं पानी अगर हो नीम गर्म क्रांति लाने के लिए हथियार की बातें करो, आसमानी बाप से जब प्यार कर सकते नहीं इस ज़मीं के ही किसी किरदार की बातें करो, तर्क कर तन्क़ीद के जज़्बे को मर जाती है क़ौम ज़ुर्म है ठहराव अब रफ़्तार की बातें करो..!! ~अदम गोंडवी भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है - [भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है](https://bazmeshayari.com/bhookhmari-kee-zad-me-hai-yaa-daar-ke-saaye-me-hai/): भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है अहले हिंदुस्तान अब तलवार के साये में है छा गई है ज़ेहन की पर्तों पे मायूसी की धूप आदमी गिरती हुई दीवार के साये में है बेबसी का इक समंदर दूर तक फैला हुआ और कश्ती काग़ज़ी पतवार के साये में है हम फ़क़ीरों की न पूछो मुतमइन वो भी नहीं जो तुम्हारी गेसुए-ख़मदार के साये में है ~अदम गोंडवी उनका दावा मुफ़लिसी का मोर्चा सर हो गया - [उनका दावा मुफ़लिसी का मोर्चा सर हो गया](https://bazmeshayari.com/unka-daawa-muflisi-ka-morcha-sar-ho-gaya/): उनका दावा मुफ़लिसी का मोर्चा सर हो गया पर हक़ीक़त ये है मौसम और बदतर हो गया, बंद कल को क्या किया मुखिया के खेतों में बेगार अगले दिन ही एक होरी और बेघर हो गया, जब हुई नीलाम कोठे पर किसी की आबरू फिर अहल्या का सरापा जिस्म पत्थर हो गया, रंग रोगन से पुता पहलू में लेकिन दिल नहीं आज का इंसान भी काग़ज़ का पैकर हो गया, माफ़ करिए सच कहूँ तो आज हिंदुस्तान में कोख ही ज़रख़ेज़ है, एहसास बंजर हो गया..!! ~अदम गोंडवी कौन जात हो भाई ? - [कौन जात हो भाई ?](https://bazmeshayari.com/kaun-jaat-ho-bhai-dalit-hai-saab/): कौन जात हो भाई? “दलित हैं साब!” नहीं मतलब किसमें आते हो? आपकी गाली में आते हैं गंदी नाली में आते हैं और अलग की हुई थाली में आते हैं साब! मुझे लगा हिंदू में आते हो! आता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में। क्या खाते हो भाई? “जो एक दलित खाता है साब!” नहीं मतलब क्या-क्या खाते हो? आपसे मार खाता हूँ क़र्ज़ का भार खाता हूँ और तंगी में नून तो कभी अचार खाता हूँ साब! नहीं मुझे लगा कि मुर्ग़ा खाते हो! खाता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में। क्या पीते हो भाई? “जो एक - [मेरे ख़्वाबों से ओझल उस का चेहरा हो गया है](https://bazmeshayari.com/mere-khwabo-se-ojhal-us-ka-chehra-ho-gaya-hai/): मेरे ख़्वाबों से ओझल उस का चेहरा हो गया है मैं ऐसा चाहता कब था पर ऐसा हो गया है, तअ’ल्लुक़ अब यहाँ कम है मुलाक़ातें ज़ियादा हुजूम ए शहर में हर शख़्स तन्हा हो गया है, तेरी तकमील की ख़्वाहिश तो पूरी हो न पाई मगर एक शख़्स मुझ में भी अधूरा हो गया है, जो बाग़ ए आरज़ू था अब वही है दश्त ए वहशत ये दिल क्या होने वाला था मगर क्या हो गया है ? मैं समझा था सियेगी आगही चाक ए जुनूँ को मगर ये ज़ख़्म तो पहले से गहरा हो गया है, मैं तुझ - [बताता है मुझे आईना कैसी बे रुख़ी से](https://bazmeshayari.com/batata-hai-mujhe-aaeena-kaisi-be-rukhi-se/): बताता है मुझे आईना कैसी बे रुख़ी से कि मैं महरूम होता जा रहा हूँ रौशनी से, किसे इल्ज़ाम दूँ मैं राएगाँ होने का अपने कि सारे फ़ैसले मैं ने किए ख़ुद ही ख़ुशी से, हर एक लम्हे मुझे रहती है ताज़ा एक शिकायत कभी तुझ से कभी ख़ुद से कभी इस ज़िंदगी से, मुझे कल तक बहुत ख़्वाहिश थी ख़ुद से गुफ़्तुगू की मैं छुपता फिर रहा हूँ आज अपने आप ही से, वो बे कैफ़ी का आलम है कि दिल ये चाहता है कहीं रू पोश हो जाऊँ अचानक ख़ामुशी से, सुकून ए ख़ाना ए दिल के लिए - [शिकस्त ए ख़्वाब का हमें मलाल क्यूँ नहीं रहा](https://bazmeshayari.com/shikast-e-khwab-ka-humen-malal-kyun-nahi-raha/): शिकस्त ए ख़्वाब का हमें मलाल क्यूँ नहीं रहा बिछड़ गए तो फिर तिरा ख़याल क्यूँ नहीं रहा ? अगर ये इश्क़ है तो फिर वो शिद्दतें कहाँ गईं अगर ये वस्ल है तो फिर मुहाल क्यूँ नहीं रहा ? वो ज़ुल्फ़ ज़ुल्फ़ रात क्यूँ बिखर बिखर के रह गई वो ख़्वाब ख़्वाब सिलसिला बहाल क्यूँ नहीं रहा ? वो साया जो बुझा तो क्या बदन भी साथ बुझ गया नज़र को तीरगी का अब मलाल क्यूँ नहीं रहा ? वो दौर जिस में आगही के दर खुले थे क्या हुआ ज़वाल था तो उम्र भर ज़वाल क्यूँ नहीं रहा - [यहाँ तकरार ए साअत के सिवा क्या रह गया है](https://bazmeshayari.com/yahan-taqrar-e-saaat-ke-siwa-kya-rah-gaya-hai/): यहाँ तकरार ए साअत के सिवा क्या रह गया है मुसलसल एक हालत के सिवा क्या रह गया है ? तुम्हें फ़ुर्सत हो दुनिया से तो हम से आ के मिलना हमारे पास फ़ुर्सत के सिवा क्या रह गया है ? बहुत मुमकिन है कुछ दिन में उसे हम तर्क कर दें तुम्हारा क़ुर्ब आदत के सिवा क्या रह गया है ? बहुत नादिम किया था हम ने एक शीरीं सुख़न को सो अब ख़ुद पर नदामत के सिवा क्या रह गया है ? हमारा इश्क़ भी अब मांद है जैसे कि तुम हो तो ये सौदा रिआयत के सिवा - [ख़्वाब में कोई मुझ को आस दिलाने बैठा था](https://bazmeshayari.com/khwab-me-koi-mujh-ko-aas-dilaane-baitha-tha/): ख़्वाब में कोई मुझ को आस दिलाने बैठा था जागा तो मैं ख़ुद अपने ही सिरहाने बैठा था, यूँही रुका था दम लेने को, तुम ने क्या समझा ? हार नहीं मानी थी बस सुस्ताने बैठा था, ख़ुद भी लहूलुहान हुआ दिल, मुझे भी ज़ख़्म दिए मैं भी कैसे वहशी को समझाने बैठा था, लाख जतन करने पर भी कम हुआ न दिल का बोझ कैसा भारी पत्थर मैं सरकाने बैठा था, तारे किरनों की रथ पर लाए थे उस की याद चाँद भी ख़्वाबों का चंदन महकाने बैठा था, नए बरस की ख़ुशियों में मशग़ूल थे सब, और मैं - [हमें नहीं आते ये कर्तब नए ज़माने वाले](https://bazmeshayari.com/hume-nahi-aate-ye-kartab-naye-zamane-wale/): हमें नहीं आते ये कर्तब नए ज़माने वाले हम तो सीधे लोग हैं यारो वही पुराने वाले, उन के होते कोई कमी है रातों की रौनक़ में यादें ख़्वाब दिखाने वाली ख़्वाब सुहाने वाले, कहाँ गईं रंगीन पतंगें लट्टू काँच के बँटे अब तो खेल भी बच्चों के हैं दिल दहलाने वाले, वो आँचल से ख़ुशबू की लपटें बिखराते पैकर वो चिलमन की ओट से चेहरे छब दिखलाने वाले, बाम पे जाने वाले जानें उस महफ़िल की बातें हम तो ठहरे उस कूचे में ख़ाक उड़ाने वाले, जब गुज़रोगे उन रस्तों से तपती धूप में तन्हा तुम्हें बहुत याद आएँगे - [सभी ये पूछते रहते हैं क्या गुम हो गया है](https://bazmeshayari.com/sabhi-ye-puchte-rahte-hain-kya-gum-ho-gaya-hai/): सभी ये पूछते रहते हैं क्या गुम हो गया है बता दूँ? मुझ से ख़ुद अपना पता गुम हो गया है, तुम्हारे दिन में एक रूदाद थी जो खो गई है हमारी रात में एक ख़्वाब था, गुम हो गया है, वो जिस के पेच ओ ख़म में दास्ताँ लिपटी हुई थी कहानी में कहीं वो माजरा गुम हो गया है, ज़रा अहल ए जुनूँ आओ हमें रस्ता सुझाओ यहाँ हम अक़्ल वालों का ख़ुदा गुम हो गया है, नज़र बाक़ी है लेकिन ताब ए नज़्ज़ारा नहीं अब सुख़न बाक़ी है लेकिन मुद्दआ’ गुम हो गया है, मुझे दुख है - [अब आ भी जाओ, बहुत दिन हुए मिले हुए भी](https://bazmeshayari.com/ab-aa-bhi-jaao-bahut-din-hue-mile-hue-bhi/): अब आ भी जाओ, बहुत दिन हुए मिले हुए भी भुला ही देंगे अगर दिल में कुछ गिले हुए भी, हमारी राह अलग है, हमारे ख़्वाब जुदा हम उन के साथ न होंगे, जो क़ाफ़िले हुए भी, हुजूम-ए-शहर-ए-ख़िरद में भी हम से अहल-ए-जुनूँ अलग दिखेंगे, गरेबाँ जो हों सिले हुए भी, हमें न याद दिलाओ हमारे ख़्वाब-ए-सुख़न कि एक उम्र हुए होंट तक हिले हुए भी, नज़र की, और मनाज़िर की बात अपनी जगह हमारे दिल के कहाँ अब, जो सिलसिले हुए भी, यहाँ है चाक-ए-क़फ़स से उधर इक और क़फ़स सो हम को क्या, जो चमन में हों गुल - [उदास बस आदतन हूँ कुछ भी हुआ नहीं है](https://bazmeshayari.com/udaas-bas-adatan-hoon-kuch-bhi-hua-nahi-hai/): उदास बस आदतन हूँ कुछ भी हुआ नहीं है यक़ीन मानो किसी से कोई गिला नहीं है, अधेड़ कर सी रहा हूँ बरसों से अपनी परतें नतीजतन ढूँडने को अब कुछ बचा नहीं है, ज़रा ये दिल की उमीद देखो यक़ीन देखो मैं ऐसे मासूम से ये कह दूँ ख़ुदा नहीं है, मैं अपनी मिट्टी से अपने लोगों से कट गया हूँ यक़ीनन इस से बड़ा कोई सानेहा नहीं है, तो क्या कभी मिल सकेंगे या बात हो सकेगी नहीं नहीं जाओ तुम कोई मसअला नहीं है, वो राज़ सीने में रख के भेजा गया था मुझ को वही जो - [ग़मों में कुछ कमी या कुछ इज़ाफ़ा कर रहे हैं](https://bazmeshayari.com/gamon-me-kuch-kami-yaa-kuch-iazafa-kar-rahe-hain/): ग़मों में कुछ कमी या कुछ इज़ाफ़ा कर रहे हैं समझ में कुछ नहीं आता कि हम क्या कर रहे हैं जो आता है नज़र में उस को ले आते हैं दिल में नई तरकीब से हम ख़ुद को तन्हा कर रहे हैं, नज़र करते हैं यूँ जैसे बिछड़ने की घड़ी हो सुख़न करते हैं ऐसे जैसे गिर्या कर रहे हैं, तुम्हारे ही तअल्लुक़ से तो हम हैं इस बदन में तुम्हारे ही लिए तो ये तमाशा कर रहे हैं, ज़वाल ए आमादगी अब गूँजती है धड़कनों में सो दिल से ख़्वाहिशों का बोझ हल्का कर रहे हैं, सुख़न तुम - [एक ख़्वाब नींद का था सबब, जो नहीं रहा](https://bazmeshayari.com/ek-khwab-neend-ka-tha-sabab-jo-nahi-raha/): एक ख़्वाब नींद का था सबब, जो नहीं रहा उस का क़लक़ है ऐसा कि मैं सो नहीं रहा, वो हो रहा है जो मैं नहीं चाहता कि हो और जो मैं चाहता हूँ वही हो नहीं रहा, नम दीदा हूँ, कि तेरी ख़ुशी पर हूँ ख़ुश बहुत चल छोड़, तुझ से कह जो दिया, रो नहीं रहा, ये ज़ख़्म जिस को वक़्त का मरहम भी कुछ नहीं ये दाग़, सैल ए गिर्या जिसे धो नहीं रहा, अब भी है रंज, रंज भी ख़ासा शदीद है वो दिल को चीरता हुआ ग़म गो नहीं रहा, आबाद मुझ में तेरे सिवा - [अजब है रंग ए चमन जा ब जा उदासी है](https://bazmeshayari.com/azab-hai-rang-e-chaman-jaa-ba-jaa-udasi-hai/): अजब है रंग ए चमन जा ब जा उदासी है महक उदासी है बाद ए सबा उदासी है, नहीं नहीं ये भला किस ने कह दिया तुम से में ठीक ठाक हूँ हाँ बस ज़रा उदासी है, मैं मुब्तला कभी होता नहीं उदासी में मैं वो हूँ जिस में कि ख़ुद मुब्तला उदासी है, तबीब ने कोई तफ़्सील तो बताई नहीं बहुत जो पूछा तो इतना कहा उदासी है, गुदाज़ क़ल्ब ख़ुशी से भला किसी को मिला अज़ीम वस्फ़ ही इंसान का उदासी है, शदीद दर्द की रू है रवाँ रग ए जाँ में बला का रंज है बेइंतिहा उदासी - [कोई मिला तो किसी और की कमी हुई है](https://bazmeshayari.com/koi-mila-to-kisi-aur-ki-kami-hui-hai/): कोई मिला तो किसी और की कमी हुई है सो दिल ने बे तलबी इख़्तियार की हुई है, जहाँ से दिल की तरफ़ ज़िंदगी उतरती थी निगाह अब भी उसी बाम पर जमी हुई है, है इंतिज़ार उसे भी तुम्हारी ख़ुशबू का हवा गली में बहुत देर से रुकी हुई है, तुम आ गए हो तो अब आईना भी देखेंगे अभी अभी तो निगाहों में रौशनी हुई है, हमारा इल्म तो मरहून ए लौह ए दिल है मियाँ किताब ए अक़्ल तो बस ताक़ पर धरी हुई है, बनाओ साए हरारत बदन में जज़्ब करो कि धूप सह्न में कब - [क्या बताऊँ कि जो हंगामा बपा है मुझ में](https://bazmeshayari.com/kya-bataaoon-ki-jo-hungama-bapa-hai-mujh-me/): क्या बताऊँ कि जो हंगामा बपा है मुझ में इन दिनों कोई बहुत सख़्त ख़फ़ा है मुझ में, उस की ख़ुशबू कहीं अतराफ़ में फैली हुई है सुब्ह से रक़्सकुनाँ बाद ए सबा है मुझ में, तेरी सूरत में तुझे ढूँड रहा हूँ मैं भी ग़ालिबन तू भी मुझे ढूँड रहा है मुझ में, एक ही सम्त हर एक ख़्वाब चला जाता है याद है या कोई नक़्श ए कफ़ ए पा है मुझ में, मेरी बेराह रवी इस लिए सरशार सी है मेरे हक़ में कोई मसरूफ़ ए दुआ है मुझ में, अपनी साँसों की कसाफ़त से गुमाँ होता - [अपनी ख़बर, न उस का पता है, ये इश्क़ है](https://bazmeshayari.com/apni-khabar-na-us-ka-pata-hai-ye-ishq-hai/): अपनी ख़बर, न उस का पता है, ये इश्क़ है जो था, नहीं है, और न था, है, ये इश्क़ है, पहले जो था, वो सिर्फ़ तुम्हारी तलाश थी लेकिन जो तुम से मिल के हुआ है, ये इश्क़ है, तश्कीक है, न जंग है माबैन ए अक़्ल ओ दिल बस ये यक़ीन है कि ख़ुदा है, ये इश्क़ है, बेहद ख़ुशी है, और है बेइंतिहा सुकून अब दर्द है, न ग़म, न गिला है, ये इश्क़ है, क्या रम्ज़ जाननी है तुझे अस्ल ए इश्क़ की ? जो तुझ में उस बदन के सिवा है, ये इश्क़ है, शोहरत - [चलो तुम को मिलाता हूँ मैं उस मेहमान से पहले](https://bazmeshayari.com/chalo-tum-ko-milata-hoon-main-us-mehman-se-pahle/): चलो तुम को मिलाता हूँ मैं उस मेहमान से पहले जो मेरे जिस्म में रहता था मेरी जान से पहले, मुझे जी भर के अपनी मौत को तो देख लेने दो निकल जाए न मेरी जान, मेरे अरमान से पहले, कोई ख़ामोश हो जाए तो उसकी ख़ामोशी से डर समन्दर चुप ही रहता है, किसी तूफ़ान से पहले, मेरी आँखों में आबी मोतियों का सिलसिला देखो ये माला रोज़ जपता हूँ मैं, एक मुस्कान से पहले, पुराना यार हूँ तेरा तो मेरा ये फ़र्ज़ बनता है तुझे होशियार कर दूँ मैं तेरे नुक़सान से पहले..!! - [मोहब्बत की रंगीनियाँ छोड़ आए](https://bazmeshayari.com/mohabbat-ki-ranginiyaan-chhod-aaye/): मोहब्बत की रंगीनियाँ छोड़ आए तेरे शहर में एक जहाँ छोड़ आए, पहाड़ों की वो मस्त शादाब वादी जहाँ हम दिल ए नग़्मा ख़्वाँ छोड़ आए, वो सब्ज़ा वो दरिया वो पेड़ों के साए वो गीतों भरी बस्तियाँ छोड़ आए, हसीं पनघटों का वो चाँदी सा पानी वो बरखा की रुत वो समाँ छोड़ आए, बहुत दूर हम आ गए उस गली से बहुत दूर वो आस्ताँ छोड़ आए, बहुत मेहरबाँ थीं वो गुल-पोश राहें मगर हम उन्हें मेहरबाँ छोड़ आए, बगूलों की सूरत यहाँ फिर रहे हैं नशेमन सर ए गुलसिताँ छोड़ आए, ये एजाज़ है हुस्न ए आवारगी - [सर ए मिंबर वो ख़्वाबों के महल तामीर करते हैं](https://bazmeshayari.com/sar-e-mimbar-wo-khwabon-ke-mahal-taamir-karte-hain/): सर ए मिंबर वो ख़्वाबों के महल तामीर करते हैं इलाज ए ग़म नहीं करते फ़क़त तक़रीर करते हैं, बहर आलम ख़ुदा का शुक्र कीजे उन का कहना है ख़ता करते हैं हम जो शिकवा ए तक़दीर करते हैं, हमारी शायरी में दिल धड़कता है ज़माने का वो नालाँ हैं हमारी लोग क्यों तौक़ीर करते हैं ? उन्हें ख़ुशनूदी ए शाहाँ का दाइम पास रहता है हम अपने शे’र से लोगों के दिल तस्ख़ीर करते हैं, हमारे ज़ह्न पर छाए नहीं हैं हिर्स के साए जो हम महसूस करते हैं वही तहरीर करते हैं, बने फिरते हैं कुछ ऐसे भी - [ग़ालिब ओ यगाना से लोग भी थे जब तन्हा](https://bazmeshayari.com/gaalib-ko-yagaana-se-log-bhi-the-jab-tanha/): ग़ालिब ओ यगाना से लोग भी थे जब तन्हा हम से तय न होगी क्या मंज़िल ए अदब तन्हा, फ़िक्र ए अंजुमन किस को कैसी अंजुमन प्यारे अपना अपना ग़म सब का सोचिए तो सब तन्हा, सुन रखो ज़माने की कल ज़बान पर होगी हम जो बात करते हैं आज ज़ेर ए लब तन्हा, अपनी रहनुमाई में की है ज़िंदगी हम ने साथ कौन था पहले हो गए जो अब तन्हा, मेहर ओ माह की सूरत मुस्कुरा के गुज़रे हैं ख़ाक दान ए तीरा से हम भी रोज़ ओ शब तन्हा, कितने लोग आ बैठे पास मेहरबाँ हो कर हम - [दयार ए दाग़ ओ बेख़ुद शहर ए देहली छोड़ कर तुझ को](https://bazmeshayari.com/dayaar-e-daag-o-bekhud-shahar-e-dehli-chod-kar-tujh-ko/): दयार ए दाग़ ओ बेख़ुद शहर ए देहली छोड़ कर तुझ को न था मा’लूम यूँ रोएगा दिल शाम ओ सहर तुझ को, कहाँ मिलते हैं दुनिया को कहाँ मिलते हैं दुनिया में हुए थे जो अता अहल ए सुख़न अहल ए नज़र तुझ को, तुझे मरकज़ कहा जाता था दुनिया की निगाहों का मोहब्बत की नज़र से देखते थे सब नगर तुझ को, ब क़ौल ए मीर औराक़ ए मुसव्वर थे तेरे कूचे मगर हाए ज़माने की लगी कैसी नज़र तुझ को ? न भूलेगा हमारी दास्ताँ तू भी क़यामत तक दिलाएँगे हमारी याद तेरे रहगुज़र तुझ को, जो - [कैसे कहें कि याद ए यार रात जा चुकी बहुत](https://bazmeshayari.com/kaise-kahe-ki-yaad-e-yaar-raat-ja-chuki-bahut/): कैसे कहें कि याद ए यार रात जा चुकी बहुत रात भी अपने साथ साथ आँसू बहा चुकी बहुत, चाँद भी है थका थका तारे भी हैं बुझे बुझे तेरे मिलन की आस फिर दीप जला चुकी बहुत, आने लगी है ये सदा दूर नहीं है शहर ए गुल दुनिया हमारी राह में काँटे बिछा चुकी बहुत, खुलने को है क़फ़स का दर पाने को है सुकूँ नज़र ऐ दिल ए ज़ार शाम ए ग़म हम को रुला चुकी बहुत, अपनी क़ियादतों में अब ढूंढेंगे लोग मंज़िलें राहज़नों की रहबरी राह दिखा चुकी बहुत..!! ~हबीब जालिब हर गाम पर थे - [हर गाम पर थे शम्स ओ क़मर उस दयार में](https://bazmeshayari.com/har-gaam-par-the-shams-o-qamar-us-dayaar-me/): हर गाम पर थे शम्स ओ क़मर उस दयार में कितने हसीं थे शाम ओ सहर उस दयार में, वो बाग़ वो बहार वो दरिया वो सब्ज़ा ज़ार नश्शों से खेलती थी नज़र उस दयार में, आसान था सफ़र कि हर एक रहगुज़ार पर मिलते थे सायादार शजर उस दयार में, हर चंद थी वहाँ भी ख़िज़ाँ की उदास धूप दिल पर नहीं था ग़म का असर उस दयार में, महसूस हो रहा था सितारे हैं गर्द ए राह हम थे हज़ार ख़ाक बसर उस दयार में, जालिब यहाँ तो बात गरेबाँ तक आ गई रखते थे सिर्फ़ चाक जिगर - [घर के ज़िंदाँ से उसे फ़ुर्सत मिले तो आए भी](https://bazmeshayari.com/ghar-ke-zinda-se-use-fursat-mile-to-aaye-bhi/): घर के ज़िंदाँ से उसे फ़ुर्सत मिले तो आए भी जाँ फ़ज़ा बातों से आ के मेरा दिल बहलाए भी, लग के ज़िंदाँ की सलाख़ों से मुझे वो देख ले कोई ये पैग़ाम मेरा उस तलक पहुँचाए भी, एक चेहरे को तरसती हैं निगाहें सुब्ह ओ शाम ज़ौ फ़िशाँ ख़ुर्शीद भी है चाँदनी के साए भी, सिसकियाँ लेती हवाएँ फिर रही हैं देर से आँसुओं की रुत मेरे अब गुलसिताँ से जाए भी, रोज़ हँसता है सलीबों से उधर माह ए मुनीर उस के पीछे कौन है वो छब मुझे दिखलाए भी..!! ~हबीब जालिब एक शख़्स बा ज़मीर मेरा यार - [एक शख़्स बा ज़मीर मेरा यार मुसहफ़ी](https://bazmeshayari.com/ek-shakhs-ba-zamir-mera-yaar-musahafi/): एक शख़्स बा ज़मीर मेरा यार मुसहफ़ी मेरी तरह वफ़ा का परस्तार मुसहफ़ी, रहता था कज कुलाह अमीरों के दरमियाँ यकसर लिए हुए मेरा किरदार मुसहफ़ी, देते हैं दाद ग़ैर को कब अहल ए लखनऊ कब दाद का था उन से तलबगार मुसहफ़ी ? ना क़द्री ए जहाँ से कई बार आ के तंग एक उम्र शेर से रहा बेज़ार मुसहफ़ी, दरबार में था बार कहाँ उस ग़रीब को बरसों मिसाल ए मीर फिरा ख़्वार मुसहफ़ी, मैं ने भी उस गली में गुज़ारी है रो के उम्र मिलता है उस गली में किसे प्यार मुसहफ़ी..?? ~हबीब जालिब ग़ज़लें तो कही - [ग़ज़लें तो कही हैं कुछ हम ने उन से न कहा अहवाल तो क्या](https://bazmeshayari.com/gazalen-to-kahi-hain-kuch-hum-ne-un-se-na-kaha-ahwal-to-kya/): ग़ज़लें तो कही हैं कुछ हम ने उन से न कहा अहवाल तो क्या कल मिस्ल ए सितारा उभरेंगे हैं आज अगर पामाल तो क्या ? जीने की दुआ देने वाले ये राज़ तुझे मालूम नहीं तख़्लीक़ का एक लम्हा है बहुत बेकार जिए सौ साल तो क्या ? सिक्कों के एवज़ जो बिक जाए वो मेरी नज़र में हुस्न नहीं ऐ शम ए शबिस्तान ए दौलत तू है जो परी तिमसाल तो क्या ? हर फूल के लब पर नाम मेरा चर्चा है चमन में आम मेरा शोहरत की ये दौलत क्या कम है गर पास नहीं है माल - [मावरा ए जहाँ से आए हैं](https://bazmeshayari.com/maawara-e-jahan-se-aaye-hain/): मावरा ए जहाँ से आए हैं आज हम ख़ुमसिताँ से आए हैं, इस क़दर बे-रुख़ी से बात न कर देख तो हम कहाँ से आए हैं हम से पूछो चमन पे क्या गुज़री हम गुज़र कर ख़िज़ाँ से आए हैं, रास्ते खो गए ज़ियाओं में ये सितारे कहाँ से आए हैं ? इस क़दर तो बुरा नहीं जालिब मिल के हम उस जवाँ से आए हैं..!! ~हबीब जालिब कितना सुकूत है रसन ओ दार की तरफ़ - [कितना सुकूत है रसन ओ दार की तरफ़](https://bazmeshayari.com/kitna-sukut-hai-rasan-o-daar-kee-taraf/): कितना सुकूत है रसन ओ दार की तरफ़ आता है कौन जुरअत ए इज़हार की तरफ़, दश्त ए वफ़ा में आबला पा कोई अब नहीं सब जा रहे हैं साया ए दीवार की तरफ़, क़स्र ए शही से कहते हैं निकलेगा मेहर ए नौ अहल ए ख़िरद हैं इस लिए सरकार की तरफ़, वित्नाम ओ कोरिया से अदू को निकाल लें आएँगे लौट कर लब ओ रुख़्सार की तरफ़, बाक़ी जहाँ में रह गया ग़ालिब का नाम ही हर चंद एक हुजूम था अग़्यार की तरफ़..!! ~हबीब जालिब लोक गीतों का नगर याद आया - [लोक गीतों का नगर याद आया](https://bazmeshayari.com/lok-geeton-ka-nagar-yaad-aaya/): लोक गीतों का नगर याद आया आज परदेस में घर याद आया, जब चले आए चमन ज़ार से हम इल्तिफ़ात ए गुल ए तर याद आया, तेरी बेगाना निगाही सर ए शाम ये सितम ता ब सहर याद आया, हम ज़माने का सितम भूल गए जब तेरा लुत्फ़ ए नज़र याद आया, तो भी मसरूर था इस शब सर ए बज़्म अपने शेरों का असर याद आया, फिर हुआ दर्द ए तमन्ना बेदार फिर दिल ए ख़ाक बसर याद आया, हम जिसे भूल चुके थे जालिब फिर वही राहगुज़र याद आया..!! ~हबीब जालिब उस गली के लोगों को मुँह लगा - [उस गली के लोगों को मुँह लगा के पछताए](https://bazmeshayari.com/us-gali-ke-logon-ko-munh-laga-ke-pachhtaaye/): उस गली के लोगों को मुँह लगा के पछताए एक दर्द की ख़ातिर कितने दर्द अपनाए, थक के सो गया सूरज शाम के धुँदलकों में आज भी कई ग़ुंचे फूल बन के मुरझाए, हम हँसे तो आँखों में तैरने लगी शबनम तुम हँसे तो गुलशन ने तुम पे फूल बरसाए, उस गली में क्या खोया उस गली में क्या पाया तिश्ना काम पहुँचे थे तिश्ना काम लौट आए, फिर रही हैं आँखों में तेरे शहर की गलियाँ डूबता हुआ सूरज फैलते हुए साए, जालिब एक आवारा उलझनों का गहवारा कौन उस को समझाए कौन उस को सुलझाए..?? ~हबीब जालिब ये - [ये उजड़े बाग़ वीराने पुराने](https://bazmeshayari.com/ye-ujde-baag-veerane-puraane/): ये उजड़े बाग़ वीराने पुराने सुनाते हैं कुछ अफ़्साने पुराने, एक आह ए सर्द बन कर रह गए हैं वो बीते दिन वो याराने पुराने, जुनूँ का एक ही आलम हो क्यूँ कर नई है शम्अ परवाने पुराने, नई मंज़िल की दुश्वारी मुसल्लम मगर हम भी हैं दीवाने पुराने, मिलेगा प्यार ग़ैरों ही में जालिब कि अपने तो हैं बेगाने पुराने..!! ~हबीब जालिब गुलशन की फ़ज़ा धुआँ धुआँ है - [गुलशन की फ़ज़ा धुआँ धुआँ है](https://bazmeshayari.com/gulshan-ki-faza-dhuaan-dhuaan-hai/): गुलशन की फ़ज़ा धुआँ धुआँ है कहते हैं बहार का समाँ है, बिखरी हुई पत्तियाँ हैं गुल की टूटी हुई शाख़ ए आशियाँ है, जिस दिल से उभर रहे थे नग़्मे पहलू में वो आज नौहा ख़्वाँ है, हम ही नहीं पाएमाल तन्हा ऐ दोस्त तबाह एक जहाँ है, जालिब वो कहाँ है इश्क़ तेरा प्यारे वो ग़ज़ल तेरी कहाँ है..?? ~हबीब जालिब जहाँ हैं महबूस अब भी हम वो हरम सराएँ नहीं रहेंगी - [जहाँ हैं महबूस अब भी हम वो हरम सराएँ नहीं रहेंगी](https://bazmeshayari.com/jahan-hai-mahbus-ab-bhi-hum-wo-haram-saraayen-nahi-rahegi/): जहाँ हैं महबूस अब भी हम वो हरम सराएँ नहीं रहेंगी लरज़ते होंटों पे अब हमारे फ़क़त दुआएँ नहीं रहेंगी, ग़सब शुदा हक़ पे चुप न रहना हमारा मंशूर हो गया है उठेगा अब शोर हर सितम पर दबी सदाएँ नहीं रहेंगी, हमारे अज़्म ए जवाँ के आगे हमारे सैल ए रवाँ के आगे पुराने ज़ालिम नहीं टिकेंगे नई बलाएँ नहीं रहेंगी, ये क़त्ल गाहें ये अद्ल गाहें इन्हें भला किस तरह सराहें ग़ुलाम आदिल नहीं रहेंगे ग़लत सज़ाएँ नहीं रहेंगी, बने हैं जो ख़ादिमान ए मिल्लत वो करना सीखें हमारी इज़्ज़त वगर्ना उन के तनों पे भी ये सजी - [महताब सिफ़त लोग यहाँ ख़ाक बसर हैं](https://bazmeshayari.com/mahtab-sifat-log-yahan-khaaq-basar-hain/): महताब सिफ़त लोग यहाँ ख़ाक बसर हैं हम महव ए तमाशा ए सर ए राह गुज़र हैं, हसरत सी बरसती है दर ओ बाम पे हर सू रोती हुई गलियाँ हैं सिसकते हुए घर हैं, आए थे यहाँ जिन के तसव्वुर के सहारे वो चाँद वो सूरज वो शब ओ रोज़ किधर हैं ? सोए हो घनी ज़ुल्फ़ के साए में अभी तक ऐ राह रवाँ क्या यही अंदाज़ ए सफ़र हैं, वो लोग क़दम जिन के लिए काहकशाँ ने वो लोग भी ऐ हम नफ़सो हम से बशर हैं, बिक जाएँ जो हर शख़्स के हाथों सर ए बाज़ार - [क्या क्या लोग गुज़र जाते हैं रंग बिरंगी कारों में](https://bazmeshayari.com/kya-kya-log-guzar-jaate-hain-rang-birangi-kaaro-me/): क्या क्या लोग गुज़र जाते हैं रंग बिरंगी कारों में दिल को थाम के रह जाते हैं दिल वाले बाज़ारों में, ये बेदर्द ज़माना हम से तेरा दर्द न छीन सका हम ने दिल की बात कही है तीरों में तलवारों में, होंटों पर आहें क्यूँ होतीं आँखें निस दिन क्यूँ रोतीं कोई अगर अपना भी होता ऊँचे ओहदेदारों में, सद्र ए महफ़िल दाद जिसे दे दाद उसी को मिलती है हाए कहाँ हम आन फँसे हैं ज़ालिम दुनियादारों में, रहने को घर भी मिल जाता चाक ए जिगर भी सिल जाता जालिब तुम भी शेर सुनाते जा के अगर - [तेरे माथे पे जब तक बल रहा है](https://bazmeshayari.com/tere-maathe-pe-jab-tak-bal-raha-hai/): तेरे माथे पे जब तक बल रहा है उजाला आँख से ओझल रहा है, समाते क्या नज़र में चाँद तारे तसव्वुर में तेरा आँचल रहा है, तेरी शान ए तग़ाफ़ुल को ख़बर क्या कोई तेरे लिए बे कल रहा है, शिकायत है ग़म ए दौराँ को मुझ से कि दिल में क्यूँ तेरा ग़म पल रहा है, तअज्जुब है सितम की आँधियों में चराग़ ए दिल अभी तक जल रहा है, लहू रोएँगी मग़रिब की फ़ज़ाएँ बड़ी तेज़ी से सूरज ढल रहा है, ज़माना थक गया जालिब ही तन्हा वफ़ा के रास्ते पर चल रहा है..!! ~हबीब जालिब हम ने - [हम ने दिल से तुझे सदा माना](https://bazmeshayari.com/hum-ne-dil-se-tujhe-sada-maana/): हम ने दिल से तुझे सदा माना तू बड़ा था तुझे बड़ा माना, मीर ओ ग़ालिब के बाद अनीस के बाद तुझ को माना बड़ा बजा माना, तू कि दीवाना ए सदाक़त था तू ने बंदे को कब ख़ुदा माना, तुझ को परवाह न थी ज़माने की तू ने दिल ही का हर कहा माना, तुझ को ख़ुद पे था एतिमाद इतना ख़ुद ही को तो न रहनुमा माना, की न शब की कभी पज़ीराई सुब्ह को लाएक़ ए सना माना, हँस दिया सत्ह ए ज़ेहन ए आलम पर जब किसी बात का बुरा माना, यूँ तो शायर थे और - [तू रंग है ग़ुबार हैं तेरी गली के लोग](https://bazmeshayari.com/tu-rang-hai-gubar-hai-teri-gali-ke-log/): तू रंग है ग़ुबार हैं तेरी गली के लोग तो फूल है शरार हैं तेरी गली के लोग, तो रौनक़ ए हयात है तो हुस्न ए काएनात उजड़ा हुआ दयार हैं तेरी गली के लोग, तू पैकर ए वफ़ा है मुजस्सम ख़ुलूस है बदनाम ए रोज़गार हैं तेरी गली के लोग, रौशन तेरे जमाल से हैं मेहर ओ माह भी लेकिन नज़र पे बार हैं तेरी गली के लोग, देखो जो ग़ौर से तो ज़मीं से भी पस्त हैं यूँ आसमाँ शिकार हैं तेरी गली के लोग, फिर जा रहा हूँ तेरे तबस्सुम को लूट कर हर चंद होशियार हैं - [शहर वीराँ उदास हैं गलियाँ](https://bazmeshayari.com/shahar-veeraan-udas-hai-galiyan/): शहर वीराँ उदास हैं गलियाँ रहगुज़ारों से उठ रहा है धुआँ, आतिश ए ग़म में जल रहे हैं दयार गर्द आलूद है रुख़ ए दौराँ, बस्तियों पर ग़मों की यूरिश है क़र्या क़र्या है वक़्फ़ ए आह ओ फ़ुग़ाँ, सुब्ह बे नूर शाम बे माया लुट गई दौलत ए निगाह कहाँ ? फिर रहे हैं तुयूर आवारा बर्क़ हर शाख़ पर है शो’ला फ़िशाँ, मेरी तन्हाइयों पे सूरत ए शम्अ’ रो रहा है अलम नसीब समाँ, मेरे शानों से तेरी ज़ुल्फ़ों तक फ़ासला उम्र का है मेरी जाँ..!! ~हबीब जालिब नज़र नज़र में लिए तेरा प्यार फिरते हैं - [नज़र नज़र में लिए तेरा प्यार फिरते हैं](https://bazmeshayari.com/nazar-nazar-me-liye-tera-pyar-firte-hain/): नज़र नज़र में लिए तेरा प्यार फिरते हैं मिसाल ए मौज ए नसीम ए बहार फिरते हैं, तेरे दयार से ज़र्रों ने रौशनी पाई तेरे दयार में हम सोगवार फिरते हैं, ये हादिसा भी अजब है कि तेरे दीवाने लगाए दिल से ग़म ए रोज़गार फिरते हैं, लिए हुए हैं दो आलम का दर्द सीने में तेरी गली में जो दीवाना वार फिरते हैं, बहार आ के चली भी गई मगर जालिब अभी निगाह में वो लाला ज़ार फिरते हैं..!! ~हबीब जालिब बहुत रौशन है शाम ए ग़म हमारी - [बहुत रौशन है शाम ए ग़म हमारी](https://bazmeshayari.com/bahut-raushan-hai-shaam-e-gam-humari/): बहुत रौशन है शाम ए ग़म हमारी किसी की याद है हमदम हमारी, ग़लत है ला तअल्लुक़ हैं चमन से तुम्हारे फूल और शबनम हमारी, ये पलकों पर नए आँसू नहीं हैं अज़ल से आँख है पुरनम हमारी, हर एक लब पर तबस्सुम देखने की तमन्ना कब हुई है कम हमारी ? कही है हम ने ख़ुद से भी बहुत कम न पूछो दास्तान ए ग़म हमारी..!! ~हबीब जालिब कम पुराना बहुत नया था फ़िराक़ - [कम पुराना बहुत नया था फ़िराक़](https://bazmeshayari.com/kam-purana-bahut-naya-tha-firaq/): कम पुराना बहुत नया था फ़िराक़ एक अजब रम्ज़ आशना था फ़िराक़, दूर वो कब हुआ निगाहों से धड़कनों में बसा हुआ है फ़िराक़, शाम ए ग़म के सुलगते सहरा में एक उमंडती हुई घटा था फ़िराक़, अम्न था प्यार था मोहब्बत था रंग था नूर था नवा था फ़िराक़, फ़ासले नफ़रतों के मिट जाएँ प्यार ही प्यार सोचता था फ़िराक़, हम से रंज ओ अलम के मारों को किस मोहब्बत से देखता था फ़िराक़, इश्क़ इंसानियत से था उस को हर तअस्सुब से मावरा था फ़िराक़..!! ~हबीब जालिब हम आवारा गाँव गाँव बस्ती बस्ती फिरने वाले - [हम आवारा गाँव गाँव बस्ती बस्ती फिरने वाले](https://bazmeshayari.com/hum-awara-gaanv-gaanv-basti-basti-firne-wale/): हम आवारा गाँव गाँव बस्ती बस्ती फिरने वाले हम से प्रीत बढ़ा कर कोई मुफ़्त में क्यूँ ग़म को अपना ले ? ये भीगी भीगी बरसातें ये महताब ये रौशन रातें दिल ही न हो तो झूटी बातें क्या अँधियारे क्या उजियाले ? ग़ुंचे रोएँ कलियाँ रोएँ रो रो अपनी आँखें खोएँ चैन से लम्बी तान के सोएँ इस फुलवारी के रखवाले, दर्द भरे गीतों की माला जपते जपते जीवन गुज़रा किस ने सुनी हैं कौन सुनेगा दिल की बातें दिल के नाले..?? ~हबीब जालिब यूँ वो ज़ुल्मत से रहा दस्त ओ गरेबाँ यारो - [यूँ वो ज़ुल्मत से रहा दस्त ओ गरेबाँ यारो](https://bazmeshayari.com/yun-wo-zulmat-se-raha-dast-o-garebaan-yaaro/): यूँ वो ज़ुल्मत से रहा दस्त ओ गरेबाँ यारो उस से लर्ज़ां थे बहुत शब के निगहबाँ यारो, उस ने हर गाम दिया हौसला ए ताज़ा हमें वो न एक पल भी रहा हम से गुरेज़ाँ यारो, उस ने मानी न कभी तीरगी ए शब से शिकस्त दिल अँधेरों में रहा उस का फ़रोज़ाँ यारो, उस को हर हाल में जीने की अदा आती थी वो न हालात से होता था परेशाँ यारो, उस ने बातिल से न ता ज़ीस्त किया समझौता दहर में उस सा कहाँ साहब ए ईमाँ यारो, उस को थी कश्मकश ए दैर ओ हरम से - [दिल वालो क्यूँ दिल सी दौलत यूँ बे कार लुटाते हो](https://bazmeshayari.com/dil-walon-kyun-dil-see-daulat-yun-be-kar-lutate-ho/): दिल वालो क्यूँ दिल सी दौलत यूँ बे कार लुटाते हो क्यूँ इस अँधियारी बस्ती में प्यार की जोत जगाते हो ? तुम ऐसा नादान जहाँ में कोई नहीं है कोई नहीं फिर इन गलियों में जाते हो पग पग ठोकर खाते हो, सुंदर कलियो कोमल फूलो ये तो बताओ ये तो कहो आख़िर तुम में क्या जादू है क्यूँ मन में बस जाते हो ? ये मौसम रिमझिम का मौसम ये बरखा ये मस्त फ़ज़ा ऐसे में आओ तो जानें ऐसे में कब आते हो ? हम से रूठ के जाने वालो इतना भेद बता जाओ क्यूँ नित रातो - [दरख़्त सूख गए रुक गए नदी नाले](https://bazmeshayari.com/darakht-sookh-gaye-rook-gaye-nadi-naale/): दरख़्त सूख गए रुक गए नदी नाले ये किस नगर को रवाना हुए हैं घर वाले ? कहानियाँ जो सुनाते थे अहद ए रफ़्ता की निशाँ वो गर्दिश ए अय्याम ने मिटा डाले, मैं शहर शहर फिरा हूँ इसी तमन्ना में किसी को अपना कहूँ कोई मुझ को अपना ले, सदा न दे किसी महताब को अंधेरों में लगा न दे ये ज़माना ज़बान पर ताले, कोई किरन है यहाँ तो कोई किरन है वहाँ दिल ओ निगाह ने किस दर्जा रोग हैं पाले, हमीं पे उन की नज़र है हमीं पे उन का करम ये और बात यहाँ और - [जब कोई कली सेहन ए गुलिस्ताँ में खिली है](https://bazmeshayari.com/jab-koi-kali-sehan-e-gulistaan-me-khili-hai/): जब कोई कली सेहन ए गुलिस्ताँ में खिली है शबनम मेरी आँखों में वहीं तैर गई है, जिस की सर ए अफ़्लाक बड़ी धूम मची है आशुफ़्ता सरी है मेरी आशुफ़्ता सरी है, अपनी तो उजालों को तरसती हैं निगाहें सूरज कहाँ निकला है कहाँ सुब्ह हुई है, बिछड़ी हुई राहों से जो गुज़रे हैं कभी हम हर गाम पे खोई हुई एक याद मिली है, एक उम्र सुनाएँ तो हिकायत न हो पूरी दो रोज़ में हम पर जो यहाँ बीत गई है, हँसने पे न मजबूर करो लोग हँसेंगे हालात की तफ़्सीर तो चेहरे पे लिखी है, मिल - [उस ने जब हँस के नमस्कार किया](https://bazmeshayari.com/us-ne-jab-hans-ke-namskar-kiya/): उस ने जब हँस के नमस्कार किया मुझ को इंसान से अवतार किया, दश्त ए ग़ुर्बत में दिल ए वीराँ ने याद जमुना को कई बार किया, प्यार की बात न पूछो यारो हम ने किस किस से नहीं प्यार किया, कितनी ख़्वाबीदा तमन्नाओं को उस की आवाज़ ने बेदार किया, हम पुजारी हैं बुतों के जालिब हम ने का’बे में भी इक़रार किया..!! ~हबीब जालिब तेरी आँखों का अजब तुर्फ़ा समाँ देखा है - [तेरी आँखों का अजब तुर्फ़ा समाँ देखा है](https://bazmeshayari.com/teri-aankhon-ka-azab-turfaa-samaan-dekha-hai/): तेरी आँखों का अजब तुर्फ़ा समाँ देखा है एक आलम तेरी जानिब निगराँ देखा है, कितने अनवार सिमट आए हैं इन आँखों में एक तबस्सुम तेरे होंटों पे रवाँ देखा है, हम को आवारा ओ बेकार समझने वालो तुम ने कब इस बुत ए काफ़िर को जवाँ देखा है, सेहन ए गुलशन में कि अंजुम की तरबगाहों में तुम को देखा है कहीं जाने कहाँ देखा है, वही आवारा ओ दीवाना ओ आशुफ़्ता मिज़ाज हम ने जालिब को सर ए कू ए बुताँ देखा है..!! ~हबीब जालिब ये जो शब के ऐवानों में इक हलचल एक हश्र बपा है - [ये जो शब के ऐवानों में इक हलचल एक हश्र बपा है](https://bazmeshayari.com/ye-jo-shab-ke-aewano-me-ek-hulchal-hashr-bapa-hai/): ये जो शब के ऐवानों में इक हलचल एक हश्र बपा है ये जो अंधेरा सिमट रहा है ये जो उजाला फैल रहा है, ये जो हर दुख सहने वाला दुख का मुदावा जान गया है मज़लूमों मजबूरों का ग़म ये जो मेरे शेरों में ढला है, ये जो महक गुलशन गुलशन है ये जो चमक आलम आलम है मार्कसिज़्म है मार्कसिज़्म है मार्कसिज़्म है मार्कसिज़्म है..!! ~हबीब जालिब हम ने सुना था सहन ए चमन में कैफ़ के बादल छाए हैं - [हम ने सुना था सहन ए चमन में कैफ़ के बादल छाए हैं](https://bazmeshayari.com/hum-ne-suna-tha-sahan-e-chaman-me-kaif-ke-badal-chhaye-hain/): हम ने सुना था सहन ए चमन में कैफ़ के बादल छाए हैं हम भी गए थे जी बहलाने अश्क बहा कर आए हैं, फूल खिले तो दिल मुरझाए शम्अ जले तो जान जले एक तुम्हारा ग़म अपना कर कितने ग़म अपनाए हैं, एक सुलगती याद चमकता दर्द फ़रोज़ाँ तन्हाई पूछ न उस के शहर से हम क्या क्या सौग़ातें लाए हैं, सोए हुए जो दर्द थे दिल में आँसू बन कर बह निकले रात सितारों की छाँव में याद वो क्या क्या आए हैं, आए भी सूरज डूब गया बे नूर उफ़ुक़ के सागर में आज भी फूल चमन - [ये सोच कर न माइल ए फ़रियाद हम हुए](https://bazmeshayari.com/ye-soch-kar-na-maaiel-e-fariyaad-hum-hue/): ये सोच कर न माइल ए फ़रियाद हम हुए आबाद कब हुए थे कि बर्बाद हम हुए, होता है शाद काम यहाँ कौन बा ज़मीर नाशाद हम हुए तो बहुत शाद हम हुए, परवेज़ के जलाल से टकराए हम भी हैं ये और बात है कि न फ़रहाद हम हुए, कुछ ऐसे भा गए हमें दुनिया के दर्द ओ ग़म कू ए बुताँ में भूली हुई याद हम हुए, जालिब तमाम उम्र हमें ये गुमाँ रहा उस ज़ुल्फ़ के ख़याल से आज़ाद हम हुए..!! ~हबीब जालिब शेर होता है अब महीनों में - [शेर होता है अब महीनों में](https://bazmeshayari.com/sher-hota-hai-ab-mahino-me/): शेर होता है अब महीनों में ज़िंदगी ढल गई मशीनों में, प्यार की रौशनी नहीं मिलती उन मकानों में उन मकीनों में, देख कर दोस्ती का हाथ बढ़ाओ साँप होते हैं आस्तीनों में, क़हर की आँख से न देख इन को दिल धड़कते हैं आबगीनों में, आसमानों की ख़ैर हो यारब एक नया अज़्म है ज़मीनों में, वो मोहब्बत नहीं रही जालिब हम सफ़ीरों में हम नशीनों में..!! ~हबीब जालिब मीर ओ ग़ालिब बने यगाना बने - [मीर ओ ग़ालिब बने यगाना बने](https://bazmeshayari.com/meer-o-gaalib-bane-yagaana-bane/): मीर ओ ग़ालिब बने यगाना बने आदमी ऐ ख़ुदा ख़ुदा न बने, मौत की दस्तरस में कब से हैं ज़िंदगी का कोई बहाना बने, अपना शायद यही था जुर्म ऐ दोस्त बा वफ़ा बन के बे वफ़ा न बने, हम पे एक एतिराज़ ये भी है बे नवा हो के बे नवा न बने, ये भी अपना क़ुसूर क्या कम है किसी क़ातिल के हमनवा न बने, क्या गिला संगदिल ज़माने का आश्ना ही जब आश्ना न बने, छोड़ कर उस गली को ऐ जालिब एक हक़ीक़त से हम फ़साना बने..!! ~हबीब जालिब जागने वालो ता ब सहर ख़ामोश रहो - [जागने वालो ता ब सहर ख़ामोश रहो](https://bazmeshayari.com/jaagne-walo-taa-ba-sahar-khamosh-raho/): जागने वालो ता ब सहर ख़ामोश रहो कल क्या होगा किस को ख़बर ख़ामोश रहो, किस ने सहर के पाँव में ज़ंजीरें डालीं हो जाएगी रात बसर ख़ामोश रहो, शायद चुप रहने में इज़्ज़त रह जाए चुप ही भली ऐ अहल ए नज़र ख़ामोश रहो, क़दम क़दम पर पहरे हैं इन राहों में दार ओ रसन का है ये नगर ख़ामोश रहो, यूँ भी कहाँ बेताबी ए दिल कम होती है यूँ भी कहाँ आराम मगर ख़ामोश रहो, शेर की बातें ख़त्म हुईं इस आलम में कैसा जोश और किस का जिगर ख़ामोश रहो..!! ~हबीब जालिब बड़े बने थे जालिब - [बड़े बने थे जालिब साहब पिटे सड़क के बीच](https://bazmeshayari.com/bade-bane-the-jaalib-sahab-pite-sadak-ke-beech/): बड़े बने थे जालिब साहब पिटे सड़क के बीच गोली खाई लाठी खाई गिरे सड़क के बीच, कभी गिरेबाँ चाक हुआ और कभी हुआ दिल ख़ून हमें तो यूँही मिले सुख़न के सिले सड़क के बीच, जिस्म पे जो ज़ख़्मों के निशाँ हैं अपने तमग़े हैं मिली है ऐसी दाद वफ़ा की किसे सड़क के बीच..!! ~हबीब जालिब सर ही अब फोड़िए नदामत में - [सर ही अब फोड़िए नदामत में](https://bazmeshayari.com/sar-hi-ab-fodiye-nadamat-me/): सर ही अब फोड़िए नदामत में नींद आने लगी है फ़ुर्क़त में, हैं दलीलें तेरे ख़िलाफ़ मगर सोचता हूँ तेरी हिमायत में, रूह ने इश्क़ का फ़रेब दिया जिस्म को जिस्म की अदावत में, अब फ़क़त आदतों की वर्ज़िश है रूह शामिल नहीं शिकायत में, इश्क़ को दरमियाँ न लाओ कि मैं चीख़ता हूँ बदन की उसरत में, ये कुछ आसान तो नहीं है कि हम रूठते अब भी हैं मुरव्वत में, वो जो ता’मीर होने वाली थी लग गई आग उस इमारत में, ज़िंदगी किस तरह बसर होगी दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में, हासिल ए कुन है ये - [ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं](https://bazmeshayari.com/thik-hai-khud-ko-hum-badalte-hain/): ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं, हो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाद देखने वाले हाथ मलते हैं, है वो जान अब हर एक महफ़िल की हम भी अब घर से कम निकलते हैं, क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं, है उसे दूर का सफ़र दर पेश हम सँभाले नहीं सँभलते हैं, तुम बनो रंग तुम बनो ख़ुश्बू हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं, मैं उसी तरह तो बहलता हूँ और सब जिस तरह बहलते हैं, है अजब फ़ैसले का सहरा भी चल न - [दिल ने वफ़ा के नाम पर कार ए वफ़ा नहीं किया](https://bazmeshayari.com/dil-ne-wafa-ke-naam-par-kaar-e-wafa-nahi-kiya/): दिल ने वफ़ा के नाम पर कार ए वफ़ा नहीं किया ख़ुद को हलाक कर लिया ख़ुद को फ़िदा नहीं किया, ख़ीरा सरान ए शौक़ का कोई नहीं है जुम्बा दार शहर में इस गिरोह ने किस को ख़फ़ा नहीं किया, जो भी हो तुम पे मो’तरिज़ उस को यही जवाब दो आप बहुत शरीफ़ हैं आप ने क्या नहीं किया, निस्बत ए ‘इल्म है बहुत हाकिम ए वक़्त को अज़ीज़ उस ने तो कार ए जहल भी बे उलमा नहीं किया, जिस को भी शैख़ ओ शाह ने हुक्म ए ख़ुदा दिया क़रार हम ने नहीं क्या वो काम - [वो जो था वो कभी मिला ही नहीं](https://bazmeshayari.com/wo-jo-tha-wo-kabhi-mila-hi-nahi/): वो जो था वो कभी मिला ही नहीं सो गरेबाँ कभी सिला ही नहीं, उस से हर दम मोआ’मला है मगर दरमियाँ कोई सिलसिला ही नहीं, बे मिले ही बिछड़ गए हम तो सौ गिले हैं कोई गिला ही नहीं, चश्म ए मयगूँ से है मुग़ाँ ने कहा मस्त कर दे मगर पिला ही नहीं, तू जो है जान तू जो है जानाँ तू हमें आज तक मिला ही नहीं, मस्त हूँ मैं महक से उस गुल की जो किसी बाग़ में खिला ही नहीं, हाए जौन उस का वो पियाला ए नाफ़ जाम ऐसा कोई मिला ही नहीं, तू - [किस से इज़हार ए मुद्दआ कीजे](https://bazmeshayari.com/kis-se-izhaar-e-muddaa-kije/): किस से इज़हार ए मुद्दआ कीजे आप मिलते नहीं हैं क्या कीजे ? हो न पाया ये फ़ैसला अब तक आप कीजे तो क्या किया कीजे ? आप थे जिस के चारागर वो जवाँ सख़्त बीमार है दुआ कीजे, एक ही फ़न तो हम ने सीखा है जिस से मिलिए उसे ख़फ़ा कीजे, है तक़ाज़ा मेरी तबीअ’त का हर किसी को चराग़ पा कीजे, है तो बारे ये आलम ए असबाब बे सबब चीख़ने लगा कीजे, आज हम क्या गिला करें उस से गिला ए तंगी ए क़बा कीजे, नुत्क़ हैवान पर गराँ है अभी गुफ़्तुगू कम से कम किया - [बड़ा एहसान हम फ़रमा रहे हैं](https://bazmeshayari.com/bada-ehsan-hum-farma-rahe-hain/): बड़ा एहसान हम फ़रमा रहे हैं कि उन के ख़त उन्हें लौटा रहे हैं, नहीं तर्क ए मोहब्बत पर वो राज़ी क़यामत है कि हम समझा रहे हैं, यक़ीं का रास्ता तय करने वाले बहुत तेज़ी से वापस आ रहे हैं, ये मत भूलो कि ये लम्हात हम को बिछड़ने के लिए मिलवा रहे हैं, तअ’ज्जुब है कि इश्क़ ओ आशिक़ी से अभी कुछ लोग धोका खा रहे हैं, तुम्हें चाहेंगे जब छिन जाओगी तुम अभी हम तुम को अर्ज़ां पा रहे हैं, किसी सूरत उन्हें नफ़रत हो हम से हम अपने ऐब ख़ुद गिनवा रहे हैं, वो पागल मस्त - [ज़ब्त कर के हँसी को भूल गया](https://bazmeshayari.com/zabt-kar-ke-hansi-ko-bhool-gaya/): ज़ब्त कर के हँसी को भूल गया मैं तो उस ज़ख़्म ही को भूल गया, ज़ात दर ज़ात हमसफ़र रह कर अजनबी अजनबी को भूल गया, सुब्ह तक वज्ह ए जाँ कनी थी जो बात मैं उसे शाम ही को भूल गया, अहद ए वाबस्तगी गुज़ार के मैं वज्ह ए वाबस्तगी को भूल गया, सब दलीलें तो मुझ को याद रहीं बहस क्या थी उसी को भूल गया, क्यूँ न हो नाज़ इस ज़ेहानत पर एक मैं हर किसी को भूल गया, सब से पुरअम्न वाक़िआ ये है आदमी आदमी को भूल गया, क़हक़हा मारते ही दीवाना हर ग़म ए - [चलो बाद ए बहारी जा रही है](https://bazmeshayari.com/chalo-baad-e-bahari-jaa-rahi-hai/): चलो बाद ए बहारी जा रही है पिया जी की सवारी जा रही है, शुमाल ए जावेदान ए सब्ज़ ए जाँ से तमन्ना की अमारी जा रही है, फ़ुग़ाँ ऐ दुश्मन ए दार ए दिल ओ जाँ मेरी हालत सुधारी जा रही है, है पहलू में टके की एक हसीना तेरी फ़ुर्क़त गुज़ारी जा रही है, जो इन रोज़ों मेरा ग़म है वो ये है कि ग़म से बुर्दबारी जा रही है, है सीने में अजब एक हश्र बरपा कि दिल से बेक़रारी जा रही है, मैं पैहम हार कर ये सोचता हूँ वो क्या शय है जो हारी जा - [कोई हालत नहीं ये हालत है](https://bazmeshayari.com/koi-haalat-nahi-ye-halat-hai/): कोई हालत नहीं ये हालत है ये तो आशोब नाक सूरत है, अंजुमन में ये मेरी ख़ामोशी बुर्दबारी नहीं है वहशत है, तुझ से ये गाह गाह का शिकवा जब तलक है बसा ग़नीमत है, ख़्वाहिशें दिल का साथ छोड़ गईं ये अज़िय्यत बड़ी अज़िय्यत है, लोग मसरूफ़ जानते हैं मुझे याँ मेरा ग़म ही मेरी फ़ुर्सत है, तंज़ पैराया ए तबस्सुम में इस तकल्लुफ़ की क्या ज़रूरत है ? हम ने देखा तो हम ने ये देखा जो नहीं है वो ख़ूबसूरत है, वार करने को जाँ निसार आएँ ये तो ईसार है इनायत है, गर्मजोशी और इस क़दर - [उस के पहलू से लग के चलते हैं](https://bazmeshayari.com/us-ke-pahlu-se-lag-ke-chalte-hain/): उस के पहलू से लग के चलते हैं हम कहीं टालने से टलते हैं बंद है मय-कदों के दरवाज़े हम तो बस यूँही चल निकलते हैं मैं उसी तरह तो बहलता हूँ और सब जिस तरह बहलते हैं वो है जान अब हर एक महफ़िल की हम भी अब घर से कम निकलते हैं क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं है उसे दूर का सफ़र दर-पेश हम सँभाले नहीं सँभलते हैं शाम फ़ुर्क़त की लहलहा उट्ठी वो हवा है कि ज़ख़्म भरते हैं है अजब फ़ैसले का सहरा भी चल न - [सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई](https://bazmeshayari.com/sina-dahak-raha-ho-to-kya-chup-rahe-koi/): सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए’तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं - [हाल ये है कि ख़्वाहिश ए पुर्सिश ए हाल भी नहीं](https://bazmeshayari.com/haal-ye-hai-ki-khwahish-e-pursish-e-haal-bhi-nahin/): हाल ये है कि ख़्वाहिश ए पुर्सिश ए हाल भी नहीं उस का ख़याल भी नहीं अपना ख़याल भी नहीं, ऐ शजर ए हयात ए शौक़ ऐसी ख़िज़ाँ रसीदगी पोशिश ए बर्ग ओ गुल तो क्या जिस्म पे छाल भी नहीं, मुझ में वो शख़्स हो चुका जिस का कोई हिसाब था सूद है क्या ज़ियाँ है क्या इस का सवाल भी नहीं, मस्त हैं अपने हाल में दिल ज़दगान ओ दिलबराँ सुल्ह ओ सलाम तो कुजा बहस ओ जिदाल भी नहीं, तू मेरा हौसला तो देख दाद तो दे कि अब मुझे शौक़ ए कमाल भी नहीं ख़ौफ़ ए - [बहुत दिल को कुशादा कर लिया क्या](https://bazmeshayari.com/bahut-dil-ko-kushaada-kar-liya-kya/): बहुत दिल को कुशादा कर लिया क्या ज़माने भर से वा’दा कर लिया क्या ? तो क्या सचमुच जुदाई मुझ से कर ली तो ख़ुद अपने को आधा कर लिया क्या ? हुनरमंदी से अपनी दिल का सफ़्हा मेरी जाँ तुम ने सादा कर लिया क्या ? जो यकसर जान है उस के बदन से कहो कुछ इस्तिफ़ादा कर लिया क्या ? बहुत कतरा रहे हो मुग़्बचों से गुनाह ए तर्क ए बादा कर लिया क्या ? यहाँ के लोग कब के जा चुके हैं सफ़र जादा ब जादा कर लिया क्या ? उठाया एक क़दम तू ने न उस - [आदमी वक़्त पर गया होगा](https://bazmeshayari.com/aadmi-waqt-par-gaya-hoga/): आदमी वक़्त पर गया होगा वक़्त पहले गुज़र गया होगा, वो हमारी तरफ़ न देख के भी कोई एहसान धर गया होगा, ख़ुद से मायूस हो के बैठा हूँ आज हर शख़्स मर गया होगा, शाम तेरे दयार में आख़िर कोई तो अपने घर गया होगा, मरहम ए हिज्र था अजब इक्सीर अब तो हर ज़ख़्म भर गया होगा..!! ~जौन एलिया एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है - [एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है](https://bazmeshayari.com/ek-hi-muzda-subah-laati-hai/): एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है धूप आँगन में फैल जाती है, रंग ए मौसम है और बाद ए सबा शहर कूचों में ख़ाक उड़ाती है, फ़र्श पर काग़ज़ उड़ते फिरते हैं मेज़ पर गर्द जमती जाती है, सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर अब किसे रात भर जगाती है, मैं भी इज़्न ए नवा गरी चाहूँ बे दिली भी तो लब हिलाती है, सो गए पेड़ जाग उठी ख़ुश्बू ज़िंदगी ख़्वाब क्यूँ दिखाती है, उस सरापा वफ़ा की फ़ुर्क़त में ख़्वाहिश ए ग़ैर क्यूँ सताती है, आप अपने से हमसुख़न रहना हमनशीं साँस फूल जाती है, क्या सितम - [अभी एक शोर सा उठा है कहीं](https://bazmeshayari.com/abhi-ek-shor-saa-utha-hai-khain/): अभी एक शोर सा उठा है कहीं कोई ख़ामोश हो गया है कहीं, है कुछ ऐसा कि जैसे ये सब कुछ इस से पहले भी हो चुका है कहीं, तुझ को क्या हो गया कि चीज़ों को कहीं रखता है ढूँढता है कहीं, जो यहाँ से कहीं न जाता था वो यहाँ से चला गया है कहीं, आज शमशान की सी बू है यहाँ क्या कोई जिस्म जल रहा है कहीं, हम किसी के नहीं जहाँ के सिवा ऐसी वो ख़ास बात क्या है कहीं, तू मुझे ढूँड मैं तुझे ढूँडूँ कोई हम में से रह गया है कहीं, कितनी - [शर्मिंदगी है हम को बहुत हम मिले तुम्हें](https://bazmeshayari.com/sharmindagi-hai-hum-ko-bahut-hum-mile-tumhen/): शर्मिंदगी है हम को बहुत हम मिले तुम्हें तुम सर ब सर ख़ुशी थे मगर ग़म मिले तुम्हें, मैं अपने आप में न मिला इस का ग़म नहीं ग़म तो ये है कि तुम भी बहुत कम मिले तुम्हें, है जो हमारा एक हिसाब उस हिसाब से आती है हम को शर्म कि पैहम मिले तुम्हें, तुम को जहान ए शौक़ ओ तमन्ना में क्या मिला हम भी मिले तो दरहम ओ बरहम मिले तुम्हें, अब अपने तौर ही में नहीं तुम सो काश कि ख़ुद में ख़ुद अपना तौर कोई दम मिले तुम्हें, इस शहर ए हीला जू में - [अपने सब यार काम कर रहे हैं](https://bazmeshayari.com/apne-sab-yaar-kaam-kar-rahe-hain/): अपने सब यार काम कर रहे हैं और हम हैं कि नाम कर रहे हैं, तेग़बाज़ी का शौक़ अपनी जगह आप तो क़त्ल ए आम कर रहे हैं, दाद ओ तहसीन का ये शोर है क्यूँ ? हम तो ख़ुद से कलाम कर रहे हैं, हम हैं मसरूफ़ ए इंतिज़ाम मगर जाने क्या इंतिज़ाम कर रहे हैं, है वो बेचारगी का हाल कि हम हर किसी को सलाम कर रहे हैं, एक क़त्ताला चाहिए हम को हम ये एलान ए आम कर रहे हैं, क्या भला साग़र ए सिफ़ाल कि हम नाफ़ प्याले को जाम कर रहे हैं, हम तो - [ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो](https://bazmeshayari.com/ye-gam-kya-dil-ki-adat-hai-nahi-to/): ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो, किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो, है वो एक ख़्वाब ए बेताबीर उस को भुला देने की नीयत है नहीं तो, किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो, तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो, हम आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो, हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी - [गाहे गाहे बस अब यही हो क्या](https://bazmeshayari.com/gaahe-gaahe-bas-ab-yahi-ho-kya/): गाहे गाहे बस अब यही हो क्या तुम से मिल कर बहुत ख़ुशी हो क्या ? मिल रही हो बड़े तपाक के साथ मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या ? याद हैं अब भी अपने ख़्वाब तुम्हें मुझ से मिल कर उदास भी हो क्या ? बस मुझे यूँही एक ख़याल आया सोचती हो तो सोचती हो क्या ? अब मेरी कोई ज़िंदगी ही नहीं अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या ? क्या कहा इश्क़ जावेदानी है! आख़िरी बार मिल रही हो क्या ? हाँ फ़ज़ा याँ की सोई सोई सी है तो बहुत तेज़ रौशनी हो क्या - [ज़र्रे ही सही कोह से टकरा तो गए हम](https://bazmeshayari.com/zarre-hi-sahi-koh-se-takra-to-gaye-hum/): ज़र्रे ही सही कोह से टकरा तो गए हम दिल ले के सर ए अर्सा ए ग़म आ तो गए हम, अब नाम रहे या न रहे इश्क़ में अपना रूदाद ए वफ़ा दार पे दोहरा तो गए हम, कहते थे जो अब कोई नहीं जाँ से गुज़रता लो जाँ से गुज़र कर उन्हें झुटला तो गए हम, जाँ अपनी गँवा कर कभी घर अपना जला कर दिल उन का हर एक तौर से बहला तो गए हम, कुछ और ही आलम था पस ए चेहरा ए याराँ रहता जो यूँही राज़ उसे पा तो गए हम, अब सोच रहे - [न डगमगाए कभी हम वफ़ा के रस्ते में](https://bazmeshayari.com/na-dagmagaaye-kabhi-hum-wafa-ke-raste-me/): न डगमगाए कभी हम वफ़ा के रस्ते में चराग़ हम ने जलाए हवा के रस्ते में, किसे लगाए गले और कहाँ कहाँ ठहरे हज़ार ग़ुंचा ओ गुल हैं सबा के रस्ते में, ख़ुदा का नाम कोई ले तो चौंक उठते हैं मिले हैं हम को वो रहबर ख़ुदा के रस्ते में, कहीं सलासिल ए तस्बीह और कहीं ज़ुन्नार बिछे हैं दाम बहुत मुद्दआ के रस्ते में, अभी वो मंज़िल ए फ़िक्र ओ नज़र नहीं आई है आदमी अभी जुर्म ओ सज़ा के रस्ते में, हैं आज भी वही दार ओ रसन वही ज़िंदाँ हर एक निगाह ए रुमूज़ आश्ना के - [कौन बताए कौन सुझाए कौन से देस सिधार गए](https://bazmeshayari.com/kaun-bataye-kaun-sujhaye-kaun-se-des-sidhar-gaye/): कौन बताए कौन सुझाए कौन से देस सिधार गए उन का रस्ता तकते तकते नैन हमारे हार गए, काँटों के दुख सहने में तस्कीन भी थी आराम भी था हँसने वाले भोले भाले फूल चमन के मार गए, एक लगन की बात है जीवन एक लगन ही जीवन है पूछ न क्या खोया क्या पाया क्या जीते क्या हार गए ? आने वाली बरखा देखें क्या दिखलाए आँखों को ये बरखा बरसाते दिन तो बिन प्रीतम बेकार गए, जब भी लौटे प्यार से लौटे फूल न पा कर गुलशन में भँवरे अमृत रस की धुन में पल पल सौ सौ - [दिल में एक लहर सी उठी है अभी](https://bazmeshayari.com/dil-me-ek-lahar-see-uthi-hai-abhi/): दिल में एक लहर सी उठी है अभी कोई ताज़ा हवा चली है अभी, कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी और ये चोट भी नई है अभी, शोर बरपा है ख़ाना ए दिल में कोई दीवार सी गिरी है अभी, भरी दुनिया में जी नहीं लगता जाने किस चीज़ की कमी है अभी, तू शरीक ए सुख़न नहीं है तो क्या हम सुख़न तेरी ख़ामुशी है अभी, याद के बे निशाँ जज़ीरों से तेरी आवाज़ आ रही है अभी, शहर की बे चराग़ गलियों में ज़िंदगी तुझ को ढूँढती है अभी, सो गए लोग उस हवेली के एक खिड़की - [शाम से आँख में नमी सी है](https://bazmeshayari.com/shaam-se-aankh-me-nami-see-hai/): शाम से आँख में नमी सी है आज फिर आप की कमी सी है, दफ़्न कर दो हमें कि साँस आए नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है, कौन पथरा गया है आँखों में बर्फ़ पलकों पे क्यूँ जमी सी है ? वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर आदत इस की भी आदमी सी है, आइए रास्ते अलग कर लें ये ज़रूरत भी बाहमी सी है..!! ~गुलज़ार वो शख़्स कि मैं जिस से मोहब्बत नहीं करता - [वो शख़्स कि मैं जिस से मोहब्बत नहीं करता](https://bazmeshayari.com/wo-shakhs-ki-main-jis-se-mohabbat-nahi-karta/): वो शख़्स कि मैं जिस से मोहब्बत नहीं करता हँसता है मुझे देख के नफ़रत नहीं करता, पकड़ा ही गया हूँ तो मुझे दार पे खींचो सच्चा हूँ मगर अपनी वकालत नहीं करता, क्यूँ बख़्श दिया मुझ से गुनहगार को मौला मुंसिफ़ तो किसी से भी रिआ’यत नहीं करता, घर वालों को ग़फ़लत पे सभी कोस रहे हैं चोरों को मगर कोई मलामत नहीं करता, किस क़ौम के दिल में नहीं जज़्बात ए बराहीम किस मुल्क पे नमरूद हुकूमत नहीं करता ? देते हैं उजाले मेरे सज्दों की गवाही मैं छुप के अँधेरे में इबादत नहीं करता, भूला नहीं मैं - [रंग पैराहन का ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम](https://bazmeshayari.com/rang-pairahan-ka-khushboo-zulf-lahrane-ka-naam/): रंग पैराहन का ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम मौसम ए गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम, दोस्तो उस चश्म ओ लब की कुछ कहो जिस के बग़ैर गुलसिताँ की बात रंगीं है न मयख़ाने का नाम, फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमएँ जलीं फिर तसव्वुर ने लिया उस बज़्म में जाने का नाम, दिलबरी ठहरा ज़बान ए ख़ल्क़ खुलवाने का नाम अब नहीं लेते परी रू ज़ुल्फ़ बिखराने का नाम, अब किसी लैला को भी इक़रार ए महबूबी नहीं इन दिनों बदनाम है हर एक दीवाने का नाम, मोहतसिब की ख़ैर ऊँचा है उसी के - [मेरे ही लहू पर गुज़र औक़ात करो हो](https://bazmeshayari.com/mere-hi-lahoo-par-guzar-auqat-karo-ho/): मेरे ही लहू पर गुज़र औक़ात करो हो मुझ से ही अमीरों की तरह बात करो हो, दिन एक सितम एक सितम रात करो हो वो दोस्त हो दुश्मन को भी तुम मात करो हो, हम ख़ाकनशीं तुम सुख़न आरा ए सर ए बाम पास आ के मिलो दूर से क्या बात करो हो ? हम को जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है हम और भुला दें तुम्हें क्या बात करो हो ? यूँ तो कभी मुँह फेर के देखो भी नहीं हो जब वक़्त पड़े है तो मुदारात करो हो, दामन पे कोई छींट न ख़ंजर - [मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा](https://bazmeshayari.com/mere-junoon-ka-naeeja-zarur-nikalega/): मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा, गिरा दिया है तो साहिल पे इंतिज़ार न कर अगर वो डूब गया है तो दूर निकलेगा, उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़ हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा, यक़ीं न आए तो एक बात पूछ कर देखो जो हँस रहा है वो ज़ख़्मों से चूर निकलेगा, उस आस्तीन से अश्कों को पोछने वाले उस आस्तीन से ख़ंजर ज़रूर निकलेगा..!! ~अमीर क़ज़लबाश न सियो होंठ न ख़्वाबों में सदा दो हम को - [न सियो होंठ न ख़्वाबों में सदा दो हम को](https://bazmeshayari.com/na-siyo-honth-na-khwabon-me-sada-do-hum-ko/): न सियो होंठ न ख़्वाबों में सदा दो हम को मस्लहत का ये तक़ाज़ा है भुला दो हम को, जुर्म ए सुक़रात से हट कर न सज़ा दो हम को ज़हर रखा है तो ये आब ए बक़ा दो हम को, बस्तियाँ आग में बह जाएँ कि पत्थर बरसें हम अगर सोए हुए हैं तो जगा दो हम को, हम हक़ीक़त हैं तो तस्लीम न करने का सबब हाँ अगर हर्फ़ ए ग़लत हैं तो मिटा दो हम को, ख़िज़्र मशहूर हो इल्यास बने फिरते हो कब से हम गुम हैं हमारा तो पता दो हम को, ज़ीस्त है इस - [यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे](https://bazmeshayari.com/yun-na-mil-muj-se-khafa-ho-jaise/): यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे साथ चल मौज ए सबा हो जैसे, लोग यूँ देख के हँस देते हैं तू मुझे भूल गया हो जैसे, इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा यूँ न मिल हम से ख़ुदा हो जैसे, मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ मुझ पे एहसान किया हो जैसे, ऐसे अंजान बने बैठे हो तुम को कुछ भी न पता हो जैसे, हिचकियाँ रात को आती ही रहीं तू ने फिर याद किया हो जैसे, ज़िंदगी बीत रही है दानिश एक बे जुर्म सज़ा हो जैसे..!! ~एहसान दानिश पुर्सिश ए ग़म - [पुर्सिश ए ग़म का शुक्रिया क्या तुझे आगही नहीं](https://bazmeshayari.com/pursish-e-gam-ka-shukriya-kya-tujhe-aagahi-nahin/): पुर्सिश ए ग़म का शुक्रिया क्या तुझे आगही नहीं तेरे बग़ैर ज़िंदगी दर्द है ज़िंदगी नहीं, देख के ख़ुश्क ओ ज़र्द फूल दिल है कुछ इस तरह मलूल जैसे मेरी ख़िज़ाँ के बाद दौर ए बहार ही नहीं, दौर था एक गुज़र चुका नशा था एक उतर चुका अब वो मक़ाम है जहाँ शिकवा ए बे रुख़ी नहीं, इशरत ए ख़ुल्द के लिए ज़ाहिद ए कज नज़र झुके मशरब ए इश्क़ में तो ये जुर्म है बंदगी नहीं, तेरे सिवा करूँ पसंद क्या तेरी काएनात में दोनों जहाँ की नेमतें क़ीमत ए बंदगी नहीं, लाख ज़माना ज़ुल्म ढाए वक़्त न - [ये तो नहीं कि तुम से मोहब्बत नहीं मुझे](https://bazmeshayari.com/ye-to-nahi-ki-tum-se-mohabbat-nahi-mujhe/): ये तो नहीं कि तुम से मोहब्बत नहीं मुझे इतना ज़रूर है कि शिकायत नहीं मुझे, मैं हूँ कि इश्तियाक़ में सर ता क़दम नज़र वो हैं कि एक नज़र की इजाज़त नहीं मुझे, आज़ादी ए गुनाह की हसरत के साथ साथ आज़ादी ए ख़याल की जुरअत नहीं मुझे, दूभर है गरचे जौर‌‌‌‌ ए अज़ीज़ाँ से ज़िंदगी लेकिन ख़ुदा गवाह शिकायत नहीं मुझे, जिस का गुरेज़ शर्त हो तक़रीब ए दीद में इस होश इस नज़र की ज़रूरत नहीं मुझे, जो कुछ गुज़र रही है ग़नीमत है हमनशीं अब ज़िंदगी पे ग़ौर की फ़ुर्सत नहीं मुझे, मैं क्यूँ किसी के - [मेरी अना का असासा ज़रूर ख़ाक हुआ](https://bazmeshayari.com/meri-anaa-ka-asasa-zarur-khaaq-hua/): मेरी अना का असासा ज़रूर ख़ाक हुआ मगर ख़ुशी है कि तेरे हुज़ूर ख़ाक हुआ, मुझे बदन के बिखरने का ग़म नहीं लेकिन मलाल ये है दिल ए ना सुबूर ख़ाक हुआ, मैं अपनी ख़ाक से रौशन हुआ जो सूरत ए मुश्क तमाम मौसम ए गुल का ग़ुरूर ख़ाक हुआ, बिछड़ के तुझ से ये कम तो नहीं ज़ियाँ मेरा हर एक मंज़र ए नज़दीक ओ दूर ख़ाक हुआ, ये कैसा क़हत मेरे ज़ेहन ओ दिल पे आया है सलीम मेरी ग़ज़ल का शुऊ’र ख़ाक हुआ..!! ~सलीम अंसारी बरहना शाख़ों पे कब फ़ाख़ताएँ आती हैं - [बरहना शाख़ों पे कब फ़ाख़ताएँ आती हैं](https://bazmeshayari.com/barhana-shaakho-pe-kab-faakhtaayen-aati-hain/): बरहना शाख़ों पे कब फ़ाख़ताएँ आती हैं मैं वो शजर हूँ कि जिस में बलाएँ आती हैं, ये कौन मेरे लहू में दिए जलाता है बदन से छन के ये कैसी शुआएँ आती हैं, मुझे सनद की ज़रूरत नहीं है नाक़िद से मेरी ग़ज़ल पे हसीनों की राएँ आती हैं, ख़ुदा से जिन का तअ’ल्लुक़ नहीं बचा कोई सफ़र में याद उन्हें भी दुआएँ आती हैं, उन्हें ख़बर ही नहीं कब का बुझ चुका हूँ मैं मेरी तलाश में अब तक हवाएँ आती हैं, मैं चीख़ता हूँ किसी दश्त ए बे अमाँ में सलीम फिर उस के बा’द मुसलसल सदाएँ - [फ़ज़ा में छाए हुए हैं उदास सन्नाटे](https://bazmeshayari.com/faza-me-chhaaye-hue-hai-udaas-sannate/): फ़ज़ा में छाए हुए हैं उदास सन्नाटे हों जैसे ज़ुल्मत ए शब का लिबास सन्नाटे, तेरे ख़याल की आहट ने सर्द कर डाला सुलग रहे थे अभी आस पास सन्नाटे, ख़ुदी के नन्हे फ़रिश्तों को लोरियाँ दे कर जगा न दें कहीं जिस्मों की प्यास सन्नाटे, उठाओ संग ए सदा और ज़ोर से फेंको बिखर ही जाएँगे ये बे क़यास सन्नाटे, ये अहल ए ज़र्फ़ की हिम्मत को आज़माते हैं हर एक दिल को नहीं आते रास सन्नाटे, सलीम शाम की तारीकियाँ बढ़ाते हैं यही दरख़्त पे लटके उदास सन्नाटे..!! ~सलीम अंसारी जो तेरे देखने से निकले हैं - [जो तेरे देखने से निकले हैं](https://bazmeshayari.com/jo-tere-dekhne-se-nikale-hai/): जो तेरे देखने से निकले हैं वो भी दिन क्या मज़े से निकले हैं, वो कहाँ नज़्र जाँ करें अपनी जो परिंदे दीये से निकले हैं, जो किसी सम्त भी नहीं जाते हम उसी रास्ते से निकले हैं, ज़ीस्त को पढ़ के ये हुआ रौशन मत्न सब हाशिए से निकले हैं, सारे अरमान आँधियों के सलीम मेरे पर टूटने से निकले हैं..!! ~सलीम अंसारी जो दे रूह को सुकून वो है मेरे लिए तेरा प्यार - [जो दे रूह को सुकून वो है मेरे लिए तेरा प्यार](https://bazmeshayari.com/jo-de-rooh-ko-sukun-wo-hai-mere-liye-tera-pyar/): जो दे रूह को सुकून वो है मेरे लिए तेरा प्यार मेरे ज़ेहन ओ दिल का नूर है मेरे लिए तेरा प्यार, ज़िन्दगी के हर एक मोड़ पर संभाल लेता है मेरे हर ख़्वाबों की ताबीर है मेरे लिए तेरा प्यार, फ़साने लाख हों और दावेदार दुनिया में हज़ार मगर मेरे दिल का एक ही हक़दार है तेरा प्यार, सफ़र में जब भी दर्द मिले और दिल हो जाए बेकरार मरहम बनकर दिल पे उतरता है मेरे लिए तेरा प्यार, आहट से महक उठे मेरी सांसों का हर एक गुज़र जैसे ख़ुशबू ए गुलशन सा बिखर जाए तेरा प्यार, जहाँ - [बे हिसी चेहरे की लहजे की उदासी ले गया](https://bazmeshayari.com/be-hisi-chehre-kee-lahze-kee-udasi-le-gaya/): बे हिसी चेहरे की लहजे की उदासी ले गया वो मेरे अंदर की सारी बद हवासी ले गया, फ़स्ल शो’लों की उगाना चाहता था शहर में माँग कर जो आग कल मुझ से ज़रा सी ले गया, सुब्ह के अख़बार की सुर्ख़ी ने चौंकाया मगर रात का एक ख़्वाब सारी बद हवासी ले गया, आज तो सूरज भी मेरे बाद ही जागा सलीम कौन फिर गुलदान के सब फूल बासी ले गया..?? ~सलीम अंसारी बदन दरीदा हूँ यारो शिकस्ता पा हूँ मैं - [बदन दरीदा हूँ यारो शिकस्ता पा हूँ मैं](https://bazmeshayari.com/badan-darida-hoon-yaaro-shikasta-paa-hoon-main/): बदन दरीदा हूँ यारो शिकस्ता पा हूँ मैं कि जैसे अपने बुज़ुर्गों की बददुआ हूँ मैं, वो शख़्स तो किसी अंधी सुरंग जैसा है और उस से ज़िंदा निकलने का रास्ता हूँ मैं, वो हमसफ़र ही नहीं मानता मुझे अपना ये जानता हूँ मगर साथ चल रहा हूँ मैं, ये भूल जाओ कि तुम मुझ को भूल जाओगे कभी तो तुम से मिलूँगा कि हादिसा हूँ मैं, मेरी शनाख़्त मेरा चेहरा गर भी कर न सका सलीम इतनी बुलंदी से गिर पड़ा हूँ मैं..!! ~सलीम अंसारी लहूलुहान परों पर उड़ान रख देना - [लहूलुहान परों पर उड़ान रख देना](https://bazmeshayari.com/lahuluhan-paro-par-udaan-rakh-dena/): लहूलुहान परों पर उड़ान रख देना शिकस्तगी में नया इम्तिहान रख देना, मेरे बदन पे लबों के निशान रख देना नई ज़मीं पे नया आसमान रख देना, अगर कभी मेरा सच जानने की ख़्वाहिश हो किसी भी शख़्स के मुँह में ज़बान रख देना, हमारे घर की ये दीवार कितनी तन्हा है जो हो सके तो कोई साएबान रख देना, लड़ाई में जो किसी का सुहाग चीख़ उठे सलीम हाथ से तीर ओ कमान रख देना..!! ~सलीम अंसारी होंठों से लफ़्ज़ ज़ेहन से अफ़्कार छीन ले - [होंठों से लफ़्ज़ ज़ेहन से अफ़्कार छीन ले](https://bazmeshayari.com/hontho-se-lafz-zehan-se-afqaar-chheen-le/): होंठों से लफ़्ज़ ज़ेहन से अफ़्कार छीन ले मुझ से मेरा वसीला ए इज़हार छीन ले, नस्लें तबाह होंगी क़बीलों की जंग में जा बढ़ के अपने बाप से तलवार छीन ले, ना क़दरियों की अंधी गुफा सामने है फिर दीमक ही मेरे हाथ से शहकार छीन ले, अंजाम ख़ुद कुशी न सही फिर भी ऐ नदीम मुझ से मेरी कहानी का किरदार छीन ले, दरिया के उस तरफ़ तो अकेला नहीं सलीम तुझ को जो छीनना हो इसी पार छीन ले..!! ~सलीम अंसारी शजर तो कब का कट के गिर चुका है - [शजर तो कब का कट के गिर चुका है](https://bazmeshayari.com/shajar-to-kab-ka-kat-ke-gir-chuka-hai/): शजर तो कब का कट के गिर चुका है परिंदा शाख़ से लिपटा हुआ है, समुंदर साहिलों से पूछता है तुम्हारा शहर कितना जागता है ? हवा के हाथ ख़ाली हो चुके हैं यहाँ हर पेड़ नंगा हो चुका है, अब उस से दोस्ती मुमकिन है मेरी वो अपने जिस्म के बाहर खड़ा है, बहा कर ले गईं मौजें घरौंदा वो बच्चा किस लिए फिर हँस रहा है..?? ~सलीम अंसारी बच्चे की ज़िद को अब तो मेरा एतिबार दे - [बच्चे की ज़िद को अब तो मेरा एतिबार दे](https://bazmeshayari.com/bachche-kee-zidd-ko-ab-to-mera-aetibar-de/): बच्चे की ज़िद को अब तो मेरा एतिबार दे ऐ आसमाँ ये चाँद मेरे घर उतार दे, चोरी करूँ तो हाथ मेरे काट दे मगर पहले ख़ुदा ए वक़्त मुझे रोज़गार दे, ठुकरा न दूँ मैं ग़ैर के हाथों मिली शिकस्त मुझ को भी मेरी नस्ल ही मुजरिम क़रार दे, यारब जुनून ए इश्क़ से महरूम रख मुझे या मेरी वहशतों को नए रेग ज़ार दे..!! ~सलीम अंसारी ता हद्द ए नज़र कोई भी दम साज़ नहीं है - [ता हद्द ए नज़र कोई भी दम साज़ नहीं है](https://bazmeshayari.com/taa-hadd-e-nazar-koi-bhi-dam-saaz-nahi-hai/): ता हद्द ए नज़र कोई भी दम साज़ नहीं है या फिर मेरी चीख़ों में ही आवाज़ नहीं है, हंगामे हैं इस दर्जा बपा ख़ल्वत ए जाँ में अब दिल के धड़कने की भी आवाज़ नहीं है, शायद मैं उसी एक कहानी का हूँ किरदार अंजाम है जिस का मगर आग़ाज़ नहीं है, अल्लाह ये क्या मंज़िल ए अर्ज़ानी ए जाँ है क़ातिल हैं हर एक मोड़ पे दम साज़ नहीं है, जो ख़त है लिफ़ाफ़े में उसे ग़ौर से पढ़िए चेहरा मेरे हालात का ग़म्माज़ नहीं है..!! ~सलीम अंसारी चराग़ों से हवाएँ लड़ रही हैं - [चराग़ों से हवाएँ लड़ रही हैं](https://bazmeshayari.com/charagon-se-hawayen-lad-rahi-hain/): चराग़ों से हवाएँ लड़ रही हैं कि ख़ुद बच्चों से माएँ लड़ रही हैं, नशेमन तो उजाड़े थे हवा ने शजर से फ़ाख़ताएँ लड़ रही हैं, नई तहज़ीब की बे रह रवी पर पुरानी दाश्ताएँ लड़ रही हैं, बरहना हो गए किरदार सारे कि आपस में कथाएँ लड़ रही हैं, झगड़ कर हो चुके हैं दोस्त बच्चे अभी तक मामताएँ लड़ रही हैं..!! ~सलीम अंसारी उसे हम याद आते हैं फक़त फ़ुर्सत के लम्हों में - [उसे हम याद आते हैं फक़त फ़ुर्सत के लम्हों में](https://bazmeshayari.com/use-hum-yaad-aate-hai-faqat-fursat-ke-lamhon-me/): उसे हम याद आते हैं फक़त फ़ुर्सत के लम्हों में मगर ये बात भी सच है उसे फ़ुर्सत नहीं मिलती, हम तस्लीम करते हैं हमें फ़ुर्सत नहीं मिलती मगर जब याद करते हैं ज़माना भूल जाते हैं, ज़माना भूल जाते हैं तेरी एक दीद की खातिर ख्यालों से निकलते हैं तो है तो सदियाँ बीत जाती हैं, सदियाँ बीत जाती हैं ख़्यालों से निकलने में मगर जब याद आती है तो आँखें भीग जाती हैं..!! - [वो मुहब्बत भी मौसम की तरह निभाता है](https://bazmeshayari.com/wo-muhabbat-bhi-mausam-ki-tarah-nibhata-hai/): वो मुहब्बत भी मौसम की तरह निभाता है कभी बरसता है कभी बूँद बूँद को तरसाता है, पल में कहता है ज़माने में फक़त तेरे हैं पल में इज़हार ए मुहब्बत से मुक़र जाता है, भरी महफ़िल में दुश्मनों की तरह मिलता है और दुआओं में मेरा ही नाम लिए जाता है, दयार ए गैर में मुझ को ही तलाश करता है गर मिलूँ तो पास से चुप चाप गुज़र जाता है, लाख मौसम की तरह रंग बदलता रहे मगर आज भी टूट के शिद्दत से हमें ही चाहता है..!! - [दिल ग़म ए रोज़गार से निकला](https://bazmeshayari.com/dil-gam-e-rozgaar-se-nikala/): दिल ग़म ए रोज़गार से निकला किस घने ख़ारज़ार से निकला, हम-सफ़र हो गए मह ओ अंजुम मैं जो अपने हिसार से निकला, शोर था लाठियों का सड़कों पर साँप घर की दरार से निकला, जिस को काँटा समझ रहे थे लोग उस का रिश्ता बहार से निकला, कर गया मुंतशिर निज़ाम ए जहाँ जो भी ज़र्रा क़तार से निकला, हो गया बहर ए बे कराँ वो सलीम जो भी दरिया कनार से निकला..!! ~सलीम अंसारी मुझ को सज़ा ए मौत का धोका दिया गया   - [मुझ को सज़ा ए मौत का धोका दिया गया](https://bazmeshayari.com/mujh-ko-saza-e-maut-ka-dhoka-diya-gaya/): मुझ को सज़ा ए मौत का धोका दिया गया मेरा वजूद मुझ में ही दफ़ना दिया गया, बोलो तुम्हारी रीढ़ की हड्डी कहाँ गई क्यूँ तुम को ज़िंदगी का तमाशा दिया गया ? आँखों को मेरी सच से बचाने की फ़िक्र में टी वी के स्क्रीन पे चिपका दिया गया, साज़िश न जाने किस की बड़ी कामयाब है हर शख़्स अपने आप में भटका दिया गया, लहजे में सच का ज़ुहूर उगलने का जुर्म था मेरी ग़ज़ल को धूप में झुलसा दिया गया..!! ~सलीम अंसारी मेज़ चेहरा किताब तन्हाई - [मेज़ चेहरा किताब तन्हाई](https://bazmeshayari.com/maze-chehra-kitab-tanhaai/): मेज़ चेहरा किताब तन्हाई बन न जाए अज़ाब तन्हाई, कर रहे थे सवाल सन्नाटे दे रही थी जवाब तन्हाई, आँख से टूट कर गिरे आँसू हो गई बे नक़ाब तन्हाई, वस्ल के एक एक लम्हे का माँगती है हिसाब तन्हाई, आहटों को भी क़त्ल कर देगी दूर तक कामयाब तन्हाई, चंद बे चेहरा साअ’तों का सलीम सह रही है अज़ाब तन्हाई..!! ~सलीम अंसारी सदाक़त का जो पैग़म्बर रहा है - [सदाक़त का जो पैग़म्बर रहा है](https://bazmeshayari.com/sadaqat-ka-jo-paigambar-raha-hai/): सदाक़त का जो पैग़म्बर रहा है वो अब सच बोलने से डर रहा है, कहानी हो रही है ख़त्म शायद कोई किरदार मुझ में मर रहा है, ज़रा सी देर को आँधी रुकी है परिंदा फिर उड़ानें भर रहा है, मेरे अहबाब खो जाएँगे एक दिन मुझे ये वहम सा अक्सर रहा है, लगी है रौशनी की शर्त शब से सितारा जुगनुओं से डर रहा है..!! ~सलीम अंसारी होश वालों को ख़बर क्या बे ख़ुदी क्या चीज़ है - [होश वालों को ख़बर क्या बे ख़ुदी क्या चीज़ है](https://bazmeshayari.com/hosh-walon-ko-khabar-kya-be-khudi-kya-cheej-hai/): होश वालों को ख़बर क्या बे ख़ुदी क्या चीज़ है इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है, उन से नज़रें क्या मिलीं रौशन फ़ज़ाएँ हो गईं आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है, बिखरी ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी झुकती आँखों ने बताया मयकशी क्या चीज़ है, हम लबों से कह न पाए उन से हाल ए दिल कभी और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है..!! ~निदा फ़ाज़ली - [दो जवां दिलों का ग़म दूरियाँ समझती हैं](https://bazmeshayari.com/do-javan-dilon-ka-gam-dooriyan-samjhti-hain/): दो जवां दिलों का ग़म दूरियाँ समझती हैं कौन याद करता है हिचकियाँ समझती हैं, तुम तो खुद ही कातिल हो तुम ये बात क्या जानो क्यूँ हुआ मैं दीवाना ? बेड़ियाँ समझती हैं, यूँ तो सैर ए गुलशन को कितने लोग आते हैं फूल कौन तोड़ेगा ? डालियाँ समझती हैं, मौसम ए बहारां में तुम जो दूर होते हो दिल पे क्या गुजरती हैं सिसकियाँ समझती हैं, बाम से उतरती है जब हसीन दोशीज़ा जिस्म की नज़ाकत को सीढियाँ समझती हैं, जिसने कर लिया दिल में पहली बार घर दानिश उसको मेरी आँखों की पुतलियाँ समझती हैं।..!! ~एहसान दानिश - [कोई जो रहता है रहने दो मस्लहत का शिकार](https://bazmeshayari.com/koi-jo-rahta-hai-rahne-do-maslhat-ka-shikar/): कोई जो रहता है रहने दो मस्लहत का शिकार चलो कि जश्न ए बहाराँ मनाएँगे सब यार, चलो निखारेंगे अपने लहू से आरिज़ ए गुल यही है रस्म ए वफ़ा और मनचलों का शिआ’र, जो ज़िंदगी में है वो ज़ह्र हम भी पी डालें चलो हटाएँगे पलकों से रास्तों के ख़ार, यहाँ तो सब ही सितम दीदा ग़म गज़ीदा हैं करेगा कौन भला ज़ख़्म हा ए दिल का शुमार, चलो कि आज रखी जाएगी निहाद ए चमन चलो कि आज बहुत दोस्त आएँगे सर ए दार..!! ~अख़्तरुल ईमान किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी - [किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी](https://bazmeshayari.com/kisi-ka-yun-to-hua-kaun-umr-bhar-fir-bhi/): किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी ये हुस्न ओ इश्क़ तो धोका है सब मगर फिर भी, हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है नई नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी, कहूँ ये कैसे इधर देख या न देख उधर कि दर्द दर्द है फिर भी नज़र नज़र फिर भी, ख़ुशा इशारा ए पैहम ज़हे सुकूत ए नज़र दराज़ हो के फ़साना है मुख़्तसर फिर भी, झपक रही हैं ज़मान ओ मकाँ की भी आँखें मगर है क़ाफ़िला आमादा ए सफ़र फिर भी, शब ए फ़िराक़ से आगे है आज मेरी नज़र कि कट - [इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं](https://bazmeshayari.com/in-aankhon-ki-masti-ke-mastane-hazaron-hain/): इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं इन आँखों से वाबस्ता अफ़्साने हज़ारों हैं, एक तुम ही नहीं तन्हा उल्फ़त में मेरी रुस्वा इस शहर में तुम जैसे दीवाने हज़ारों हैं, एक सिर्फ़ हमीं मय को आँखों से पिलाते हैं कहने को तो दुनिया में मयख़ाने हज़ारों हैं, इस शम ए फ़रोज़ाँ को आँधी से डराते हो इस शम ए फ़रोज़ाँ के परवाने हज़ारों हैं..!! ~शहरयार ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में - [ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में](https://bazmeshayari.com/khushboo-jaise-log-mile-afsane-me/): ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में एक पुराना ख़त खोला अनजाने में, शाम के साए बालिश्तों से नापे हैं चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में, रात गुज़रते शायद थोड़ा वक़्त लगे धूप उन्डेलो थोड़ी सी पैमाने में, जाने किस का ज़िक्र है इस अफ़्साने में दर्द मज़े लेता है जो दोहराने में, दिल पर दस्तक देने कौन आ निकला है किस की आहट सुनता हूँ वीराने में, हम इस मोड़ से उठ कर अगले मोड़ चले उन को शायद उम्र लगेगी आने में..!! ~गुलज़ार ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के साए में ज़िंदगी गुज़ारी है - [ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के साए में ज़िंदगी गुज़ारी है](https://bazmeshayari.com/zulf-o-rukh-ke-saaye-me-zindagi-guzari-hai/): ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के साए में ज़िंदगी गुज़ारी है धूप भी हमारी है छाँव भी हमारी है, ग़म गुसार चेहरों पर ए’तिबार मत करना शहर में सियासत के दोस्त भी शिकारी है, मोड़ लेने वाली है, ज़िंदगी कोई शायद अब के फिर हवाओं में एक बे क़रारी है, हाल ख़ूँ में डूबा है कल न जाने क्या होगा अब ये ख़ौफ़ ए मुस्तक़बिल ज़ेहन ज़ेहन तारी है, मेरे ही बुज़ुर्गों ने सर बुलंदियाँ बख़्शीं मेरे ही क़िबले पर मश्क़ ए संग बारी है, एक अजीब ठंडक है इस के नर्म लहजे में लफ़्ज़ लफ़्ज़ शबनम है बात बात प्यारी है, - [आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई](https://bazmeshayari.com/aankh-bhar-aayi-kisi-se-jo-mulaqaat-hui/): आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई ख़ुश्क मौसम था मगर टूट के बरसात हुई, दिन भी डूबा कि नहीं ये मुझे मालूम नहीं जिस जगह बुझ गए आँखों के दीये रात हुई, कोई हसरत कोई अरमाँ कोई ख़्वाहिश ही न थी ऐसे आलम में मेरी ख़ुद से मुलाक़ात हुई, हो गया अपने पड़ोसी का पड़ोसी दुश्मन आदमिय्यत भी यहाँ नज़्र ए फ़सादात हुई, इसी होनी को तो क़िस्मत का लिखा कहते हैं जीतने का जहाँ मौक़ा था वहीं मात हुई, इस तरह गुज़रा है बचपन कि खिलौने न मिले और जवानी में बुढ़ापे से मुलाक़ात हुई..!! ~मंज़र भोपाली - [ताक़तें तुम्हारी हैं और ख़ुदा हमारा है](https://bazmeshayari.com/taaqate-tumhari-aur-khuda-humara-hai/): ताक़तें तुम्हारी हैं और ख़ुदा हमारा है अक्स पर न इतराओ आईना हमारा है, आप की ग़ुलामी का बोझ हम न ढोएँगे आबरू से मरने का फ़ैसला हमारा है, उम्र भर तो कोई भी जंग लड़ नहीं सकता तुम भी टूट जाओगे तजुर्बा हमारा है, अपनी रहनुमाई पर अब ग़ुरूर मत करना आप से बहुत आगे नक़्श ए पा हमारा है..!! ~मंज़र भोपाली गर्दिश ए साग़र सुबू के दरमियाँ - [गर्दिश ए साग़र सुबू के दरमियाँ](https://bazmeshayari.com/gardish-e-sagar-subu-ke-darmiyan/): गर्दिश ए साग़र सुबू के दरमियाँ ज़िंदगी है हाओ हू के दरमियाँ, ज़ख़्म और पोशाक भी रखे गए आइना और आब जू के दरमियाँ, तीसरा रस्ता किधर को जाए है आरज़ू और जुस्तुजू के दरमियाँ, कितनी बे मा’नी सी है ये ज़िंदगी ख़ामोशी और गुफ़्तुगू के दरमियाँ, ज़िंदगी तरजीह किस को देती है सब्ज़ रू और ख़ुश गुलू के दरमियाँ, याद की एक अजनबी परछाईं है रंग ओ बू ओ काख़ ओ कू के दरमियाँ, वक़्त से बच कर निकल जाऊँ कहीं एक दर है चार सू के दरमियाँ, मेरा चेहरा दूसरों से मुख़्तलिफ़ फ़र्क़ है क्या ये लहू के - [ये क्या रुत है अब की रुत में देखें ज़र्द गुलाब](https://bazmeshayari.com/ye-kya-rut-hai-ab-kee-rut-me-dekhe-zard-gulab/): ये क्या रुत है अब की रुत में देखें ज़र्द गुलाब चेहरे सूखे फूल ख़िज़ाँ के आँखें ज़र्द गुलाब, फूल से बच्चे भी ख़्वाबों के ईंधन बनते जाएँ देखें कैसी रुत फूलों की ओढें ज़र्द गुलाब, एक अलामत हो गई अपने ख़्वाबों की तफ़्सीर सोचें अपने ख़्वाबों को तो लिक्खें ज़र्द गुलाब, दीवारों पर अपनी नस्ल का नौहा लिखते जाएँ जिस के दिन भी ज़हरीले हैं रातें ज़र्द गुलाब, झूट के ज़हरीले पंजों में जकड़े मुर्दा लोग बातें उड़ती ख़ुशबू जैसी सोचें ज़र्द गुलाब, अब आँगन में सन्नाटे की डायन नाचे गाए अब बच्चों के बदले घर में खेलें ज़र्द - [हिज्र के मौसम ए तन्हाई के दुख देखे](https://bazmeshayari.com/hizr-ke-mausam-e-tanhai-ke-dukh-dekhe/): हिज्र के मौसम ए तन्हाई के दुख देखे एक चेहरे के पीछे कितने दुख देखे, एक सन्नाटा पहरों ख़ून रुलाता है एक आवाज़ की ख़ातिर कैसे दुख देखे, मैं भी अपनी ज़ात में तन्हा फिरता हूँ तुम ने भी बे ख़्वाब रुतों के दुख देखे, जिन बच्चों ने हँसना भी न सीखा था उन बच्चों ने सब से पहले दुख देखे, तुम को देखा है तो ये महसूस हुआ कैसे मुरझाते हैं चेहरे दुख देखे, हम दोनों ने एक दूजे को जान लिया हम दोनों ने एक दूजे के दुख देखे, जिस को जीना है दुनिया में दस्तूरन लाज़िम है - [रात दरपेश थी मुसाफ़िर को](https://bazmeshayari.com/raat-darpesh-thi-musafir-ko/): रात दरपेश थी मुसाफ़िर को नींद क्यों आ गई मुसाफ़िर को ? क्या नगर है ये दिल दिखाई दे हर तरफ़ आग सी मुसाफ़िर को, कल मोहब्बत सरा ए हैरत में एक मिला अजनबी मुसाफ़िर को, याद के बे कराँ समुंदर में एक लहर ले चली मुसाफ़िर को, याद आ जाएँ ख़्वाब जैसे लोग जाने कब किस घड़ी मुसाफ़िर को, साथ ले कर चली गई अपने एक परी साँवली मुसाफ़िर को, एक सदा थी कि हर घड़ी हर पल जो बुलाती रही मुसाफ़िर को, एक कहानी बहुत पुरानी सी याद आती रही मुसाफ़िर को, चुप लगी जब भी भूलने वाले - [ख़याल ओ ख़्वाब में होना सदा ए बाद में रहना](https://bazmeshayari.com/khyal-o-khwab-me-hona-sada-e-baad-me-rahna/): ख़याल ओ ख़्वाब में होना सदा ए बाद में रहना किसी की आस में जीना किसी की याद में रहना, पुर असरारी अजब सी है तेरी वीरान आँखों में तुझे भी रास आया ख़ाना ए बर्बाद में रहना, मोहब्बत एक बहर ए बे कराँ है और मोहब्बत में कहीं पर क़ैद होना है दिल ए आज़ाद में रहना, किसी की याद है उलझी हुई साँसों की डोरी से किसी के हिज्र में है अर्सा ए फ़रियाद में रहना, तो फिर हिज्र ओ विसाल ओ रंज ओ ग़म सारे इज़ाफ़ी हैं जो हासिल है वफ़ा को इश्क़ की बुनियाद में रहना, - [उजाड़ आँखों में रत जगों का अज़ाब उतरा है नीम शब को](https://bazmeshayari.com/ujaad-aankhon-me-rat-jago-ka-azaab-utra-hai/): उजाड़ आँखों में रत जगों का अज़ाब उतरा है नीम शब को जो दर्द जागा है शाम ढलते तो शेर लिखा है नीम शब को, मैं ख़ाली कमरे के सर्द गोशे में रोज़ तन्हा ये सोचता हूँ ये कौन हँसता है दिन ढले तक ये कौन रोता है नीम शब को, हमारे बच्चों की सब्ज़ आँखों में रौशनी के कँवल नहीं हैं उदास साया सा रोज़ आकर ये मुझ से कहता है नीम शब को, दुआएँ ले कर हम अपने होंटों पे जाने किस सुख के मुंतज़िर हैं हमें ख़बर है कि इस नगर में अज़ाब उतरा है नीम शब - [कोई साया अच्छे साईं धूप बहुत है](https://bazmeshayari.com/koi-sayaa-achche-saaee-dhoop-bahut-hai/): कोई साया अच्छे साईं धूप बहुत है मर जाऊँगा अच्छे साईं धूप बहुत है, साँवली रुत में ख़्वाब जले तो आँख खुली है मैं ने देखा अच्छे साईं धूप बहुत है, अब के मौसम यही रहे तो मर जाएगा एक एक लम्हा अच्छे साईं धूप बहुत है, कोई ठिकाना बख़्श उसे जो घूम रहा है मारा मारा अच्छे साईं धूप बहुत है, एक तो दिल के रस्ते भी दुश्वार बहुत हैं फिर मैं प्यासा अच्छे साईं धूप बहुत है, कोई साया आग में जलने वालों पर भी कोई पुर्वा अच्छे साईं धूप बहुत है, रात को एक पागल ने शहर - [जहाँ वहम ओ गुमाँ हो जाएगा क्या](https://bazmeshayari.com/jahan-vaham-o-gumaan-ho-jayega-kya/): जहाँ वहम ओ गुमाँ हो जाएगा क्या यहाँ सब कुछ धुआँ हो जाएगा क्या ? सितारे धूल और मिट्टी बनेंगे समुंदर आसमाँ हो जाएगा क्या ? तुम्हारा इश्क़ तो ला हासिली है ये ग़म भी राएगाँ हो जाएगा क्या ? यूँ सर पर हाथ रख कर चल रहे हो तो इस से साएबाँ हो जाएगा क्या ? ये मेरा इख़्तिताम ए ज़िंदगी भी कहीं पे दरमियाँ हो जाएगा क्या ? किसी का दुख समझता ही नहीं जो ज़माना मेहरबाँ हो जाएगा क्या ? बहुत कुछ है यहाँ कहने के लाएक़ मगर सब कुछ बयाँ हो जाएगा क्या ? हाँ आदम - [वो दूर ख़्वाबों के साहिलों में अज़ाब किस के हैं ख़्वाब किस के](https://bazmeshayari.com/wo-door-khwabon-ke-sahilon-me-azaab-kis-ke-hain/): वो दूर ख़्वाबों के साहिलों में अज़ाब किस के हैं ख़्वाब किस के ये कौन जाने कि अब रुतों में अज़ाब किस के हैं ख़्वाब किस के ? ये कौन जाने कि किस का चेहरा ग़ुबार लम्हों में ख़ाक होगा ये कौन जाने कि अब दिनों में अज़ाब किस के हैं ख़्वाब किस के ? ये ज़र्द चेहरे की सारी ज़र्दी ये बाँझ आँखों का रतजगा पन ये पूछते हैं कि आइनों में अज़ाब किस के हैं ख़्वाब किस के ? जबीं पे उभरी हुई शिकन में ये किस की यादों का अक्स ए ग़म है ये वक़्त के बहते - [दिल को तेरे ध्यान में रखा](https://bazmeshayari.com/dil-ko-tere-dhayn-me-rakha/): दिल को तेरे ध्यान में रखा शोर सूने मकान में रखा, हर तरफ़ आइने बिछाए और एक चेहरा जहान में रखा, एक आँसू छुपाया मुट्ठी में एक समुंदर मकान में रखा, एक मोहब्बत जगाई सीने में आग को ख़ाक दान में रखा, जान रखी तुम्हारी चौखट पर दिल को तेरी अमान में रखा, धूप फैली हुई थी आँखों में ख़्वाब को साएबान में रखा, पाँव की बे सबात वहशत को गर्दिश ए आसमान में रखा, ख़ाक होने तलक मेरे दिल ने मुझ को वहम ओ गुमान में रखा..!! ~नून मीम दनिश जिन्हें हम कह नहीं पाए वो बातें याद आती - [जिन्हें हम कह नहीं पाए वो बातें याद आती हैं](https://bazmeshayari.com/jinhen-hum-kah-nahi-paaye-wo-baaten-yaad-aati-hain/): जिन्हें हम कह नहीं पाए वो बातें याद आती हैं गुज़शता ना मुलाक़ातों की यादें याद आती हैं, कभी वीरान रस्तों पर कभी तन्हाई की चुप में वो चेहरा बात करता है वो आँखें याद आती हैं, कभी आए नहीं वो दिन जो अक्सर साथ चलते हैं गुज़ारी जो नहीं हम ने वो रातें याद आती हैं, जहाँ रखा नहीं पाँव वो रस्ता साथ चलता है जिन्हें सोचा नहीं दिल ने वो राहें याद आती हैं..!! ~नून मीम दनिश गलियों की बस ख़ाक उड़ा के जाना है - [गलियों की बस ख़ाक उड़ा के जाना है](https://bazmeshayari.com/galiyon-ki-bas-khaaq-uda-ke-jana-hai/): गलियों की बस ख़ाक उड़ा के जाना है हम को भी आवाज़ लगा के जाना है, रस्ते में दीवार है टूटे ख़्वाबों की हम को वो दीवार गिरा के जाना है, हम भी एक दिन आएगा जब जाएँगे हम को भी ये रस्म निभा के जाना है, जो भी है वो सब मिट्टी हो जाएगा हम को बस एक ख़्वाब बचा के जाना है, मेरे अंदर सदियों की ख़ामोशी है तुम को वो आवाज़ सुना के जाना है, तुम को भी एक ख़्वाब मुकम्मल करना था हम को भी तस्वीर बना के जाना है..!! ~नून मीम दनिश वो किसी भी - [वो किसी भी अक्स ए जमाल में नहीं आएगा](https://bazmeshayari.com/wo-kisi-bhi-aks-e-jamal-me-nahi-ayega/): वो किसी भी अक्स ए जमाल में नहीं आएगा वो जवाब है तो सवाल में नहीं आएगा, नहीं आएगा वो किसी भी हर्फ़ ओ बयान में वो किसी नज़ीर ओ मिसाल में नहीं आएगा, उसे ढालना है ख़याल में किसी और ढब वो शबाहत ओ ख़द ओ ख़ाल में नहीं आएगा, वो जो शहसवार है तेग़ ज़न रह ए ज़िंदगी मेरे साथ वक़्त ए ज़वाल में नहीं आएगा, यहाँ कौन था जो सलामती से गुज़र गया यहाँ कौन है जो वबाल में नहीं आएगा ? उसे लाऊँगा मैं सुकूत ए हर्फ़ ओ सदा में भी वो सुख़न कभी जो सवाल - [देखे हुए किसी को बहुत दिन गुज़र गए](https://bazmeshayari.com/dekhe-hue-kisi-ko-bahut-din-guzar-gaye/): देखे हुए किसी को बहुत दिन गुज़र गए इस दिल की बेबसी को बहुत दिन गुज़र गए, हर शब छतों पे चाँद उतरता तो है मगर इस घर में चाँदनी को बहुत दिन गुज़र गए, कोई जवाज़ ढूँड ग़म ए ना शनास का बे वज्ह बेकली को बहुत दिन गुज़र गए, अब तक अकेलेपन का मुसलसल अज़ाब है दुनिया से दोस्ती को बहुत दिन गुज़र गए, तेरी रिफाक़तें तो मुक़द्दर में ही न थीं अब अपनी ही कमी को बहुत दिन गुज़र गए, मुद्दत हुई है टूट के रोया नहीं हूँ मैं इस चैन की घड़ी को बहुत दिन गुज़र - [तेरा ख़याल बहुत देर तक नहीं रहता](https://bazmeshayari.com/tera-khyal-bahut-der-tak-nahi-rahta/): तेरा ख़याल बहुत देर तक नहीं रहता कोई मलाल बहुत देर तक नहीं रहता, उदास करती है अक्सर तुम्हारी याद मुझे मगर ये हाल बहुत देर तक नहीं रहता, मैं रेज़ा रेज़ा तो होता हूँ हर शिकस्त के बा’द मगर निढाल बहुत देर तक नहीं रहता, जवाब मिल ही तो जाता है एक चुप ही न हो कोई सवाल बहुत देर तक नहीं रहता, मैं जानता हूँ कि सूरज हूँ डूब जाऊँ भी तो मुझे ज़वाल बहुत देर तक नहीं रहता..!! ~नून मीम दनिश - [यादें पागल कर देती हैं](https://bazmeshayari.com/yaaden-pagal-kar-deti-hain/): यादें पागल कर देती हैं बातें पागल कर देती हैं, चेहरा होश उड़ा देता है आँखें पागल कर देती हैं, तन्हा चलने वालों को ये राहें पागल कर देती हैं, दिन तो ख़ैर गुज़र जाता है रातें पागल कर देती हैं..!! ~नून मीम दनिश जब तेरे नैन मुस्कुराते हैं - [जब तेरे नैन मुस्कुराते हैं](https://bazmeshayari.com/jab-tere-nain-muskurate-hain/): जब तेरे नैन मुस्कुराते हैं ज़ीस्त के रंज भूल जाते हैं, क्यूँ शिकन डालते हो माथे पर भूल कर आ गए हैं जाते हैं, कश्तियाँ यूँ भी डूब जाती हैं नाख़ुदा किस लिए डराते हैं ? एक हसीं आँख के इशारे पर क़ाफ़िले राह भूल जाते हैं..!! ~अब्दुल हमीद अदम हँस के बोला करो बुलाया करो - [हँस के बोला करो बुलाया करो](https://bazmeshayari.com/hans-ke-bola-karo-bulaya-karo/): हँस के बोला करो बुलाया करो आप का घर है आया जाया करो, मुस्कुराहट है हुस्न का ज़ेवर रूप बढ़ता है मुस्कुराया करो, हद से बढ़ कर हसीन लगते हो झूठीं क़समें ज़रूर खाया करो, हुक्म करना भी एक सख़ावत है हम को ख़िदमत कोई बताया करो, बात करना भी बादशाहत है बात करना न भूल जाया करो, ताकि दुनिया की दिलकशी न घटे नित नए पैरहन में आया करो, हम हसद से अदम नहीं कहते उस गली में बहुत न जाया करो..!! ~अब्दुल हमीद अदम साक़ी शराब ला कि तबीअ’त उदास है - [साक़ी शराब ला कि तबीअ'त उदास है](https://bazmeshayari.com/saaqi-sharab-laa-ki-tabiyat-udas-hai/): साक़ी शराब ला कि तबीअ’त उदास है मुतरिब रुबाब उठा कि तबीअ’त उदास है, रुक रुक के साज़ छेड़ कि दिल मुतमइन नहीं थम थम के मय पिला कि तबीअ’त उदास है, चुभती है क़ल्ब ओ जाँ में सितारों की रौशनी ऐ चाँद डूब जा कि तबीअ’त उदास है, मुझ से नज़र न फेर कि बरहम है ज़िंदगी मुझ से नज़र मिला कि तबीअ’त उदास है, शायद तेरे लबों की चटक से हो जी बहाल ऐ दोस्त मुस्कुरा कि तबीअ’त उदास है, है हुस्न का फ़ुसूँ भी इलाज ए फ़सुर्दगी रुख़ से नक़ाब उठा कि तबीअ’त उदास है, मैं ने - [ख़ाली है अभी जाम मैं कुछ सोच रहा हूँ](https://bazmeshayari.com/khaali-hai-abhi-jaam-main-kuch-soch-raha-hoon/): ख़ाली है अभी जाम मैं कुछ सोच रहा हूँ ऐ गर्दिश ए अय्याम मैं कुछ सोच रहा हूँ, साक़ी तुझे एक थोड़ी सी तकलीफ़ तो होगी साग़र को ज़रा थाम मैं कुछ सोच रहा हूँ, पहले बड़ी रग़बत थी तेरे नाम से मुझ को अब सुन के तेरा नाम मैं कुछ सोच रहा हूँ, इदराक अभी पूरा तआ’वुन नहीं करता दय बादा ए गुलफ़ाम मैं कुछ सोच रहा हूँ, हल कुछ तो निकल आएगा हालात की ज़िद का ऐ कसरत ए आलाम मैं कुछ सोच रहा हूँ, फिर आज अदम शाम से ग़मगीं है तबीअत फिर आज सर ए शाम - [आप की आँख अगर आज गुलाबी होगी](https://bazmeshayari.com/aap-ki-aankh-agar-aaj-gulabi-hogi/): आप की आँख अगर आज गुलाबी होगी मेरी सरकार बड़ी सख़्त ख़राबी होगी, मोहतसिब ने ही पढ़ा होगा मक़ाला पहले मेरी तक़रीर ब हर हाल जवाबी होगी, आँख उठाने से भी पहले ही वो होंगे ग़ाएब क्या ख़बर थी कि उन्हें इतनी शिताबी होगी, हर मोहब्बत को समझता है वो नॉवेल का वरक़ उस परी ज़ाद की ता’लीम किताबी होगी, शैख़ जी हम तो जहन्नम के परिंदे ठहरे आप के पास तो फ़िरदौस की चाबी होगी, कर दिया मूसा को जिस चीज़ ने बेहोश अदम बे नक़ाबी नहीं वो नीम हिजाबी होगी..!! ~अब्दुल हमीद अदम एक पल में ज़िंदगी भर - [एक पल में ज़िंदगी भर की उदासी दे गया](https://bazmeshayari.com/ek-pal-me-zindagi-bhar-ki-udasi-de-gaya/): एक पल में ज़िंदगी भर की उदासी दे गया वो जुदा होते हुए कुछ फूल बासी दे गया, नोच कर शाख़ों के तन से ख़ुश्क पत्तों का लिबास ज़र्द मौसम बाँझ रुत को बे लिबासी दे गया, सुब्ह के तारे मेरी पहली दुआ तेरे लिए तू दिल ए बे सब्र को तस्कीं ज़रा सी दे गया, लोग मलबों में दबे साए भी दफ़नाने लगे ज़लज़ला अहल ए ज़मीं को बद हवासी दे गया, तुंद झोंके की रगों में घोल कर अपना धुआँ एक दिया अंधी हवा को ख़ुद शनासी दे गया, ले गया मोहसिन वो मुझ से अब्र बनता आसमाँ - [अब वो तूफ़ाँ है न वो शोर हवाओं जैसा](https://bazmeshayari.com/ab-wo-toofaan-hai-na-wo-shor-hawaaon-jaisa/): अब वो तूफ़ाँ है न वो शोर हवाओं जैसा दिल का आलम है तेरे बाद ख़लाओं जैसा, काश दुनिया मेरे एहसास को वापस कर दे ख़ामुशी का वही अंदाज़ सदाओं जैसा, पास रह कर भी हमेशा वो बहुत दूर मिला उस का अंदाज़ ए तग़ाफ़ुल था ख़ुदाओं जैसा, कितनी शिद्दत से बहारों को था एहसास ए मआ’ल फूल खिल कर भी रहा ज़र्द ख़िज़ाओं जैसा, क्या क़यामत है कि दुनिया उसे सरदार कहे जिस का अंदाज़ ए सुख़न भी हो गदाओं जैसा, फिर तेरी याद के मौसम ने जगाए महशर फिर मेरे दिल में उठा शोर हवाओं जैसा, बारहा ख़्वाब - [आप की आँख से गहरा है मेरी रूह का ज़ख़्म](https://bazmeshayari.com/aap-ki-aankh-se-gahra-hai-meri-rooh-ka-zakhm/): आप की आँख से गहरा है मेरी रूह का ज़ख़्म आप क्या सोच सकेंगे मेरी तन्हाई को ? मैं तो दम तोड़ रहा था मगर अफ़्सुर्दा हयात ख़ुद चली आई मेरी हौसला अफ़ज़ाई को, लज़्ज़त ए ग़म के सिवा तेरी निगाहों के बग़ैर कौन समझा है मेरे ज़ख़्म की गहराई को, मैं बढ़ाऊँगा तेरी शोहरत ए ख़ुश्बू का निखार तू दुआ दे मेरे अफ़्साना ए रुसवाई को, वो तो यूँ कहिए कि एक क़ौस ए क़ुज़ह फैल गई वर्ना मैं भूल गया था तेरी अंगड़ाई को..!! ~मोहसिन नक़वी तेरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है - [तेरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है](https://bazmeshayari.com/tere-badan-se-jo-chhoo-kar-idhar-bhi-aaata-hai/): तेरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है मिसाल ए रंग वो झोंका नज़र भी आता है, तमाम शब जहाँ जलता है एक उदास दिया हवा की राह में एक ऐसा घर भी आता है, वो मुझ को टूट के चाहेगा छोड़ जाएगा मुझे ख़बर थी उसे ये हुनर भी आता है, उजाड़ बन में उतरता है एक जुगनू भी हवा के साथ कोई हम सफ़र भी आता है, वफ़ा की कौन सी मंज़िल पे उस ने छोड़ा था कि वो तो याद हमें भूल कर भी आता है, जहाँ लहू के समुंदर की हद ठहरती है वहीं - [अगरचे मैं एक चटान सा आदमी रहा हूँ](https://bazmeshayari.com/agarche-main-ek-chattan-saa-aadmi-raha-hoon/): अगरचे मैं एक चटान सा आदमी रहा हूँ मगर तेरे बाद हौसला है कि जी रहा हूँ, वो रेज़ा रेज़ा मेरे बदन में उतर रहा है मैं क़तरा क़तरा उसी की आँखों को पी रहा हूँ, तेरी हथेली पे किस ने लिखा है क़त्ल मेरा मुझे तो लगता है मैं तेरा दोस्त भी रहा हूँ, खुली हैं आँखें मगर बदन है तमाम पत्थर कोई बताए मैं मर चुका हूँ कि जी रहा हूँ, कहाँ मिलेगी मिसाल मेरी सितमगरी की कि मैं गुलाबों के ज़ख़्म काँटों से सी रहा हूँ, न पूछ मुझ से कि शहर वालों का हाल क्या था - [जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ](https://bazmeshayari.com/jab-se-us-ne-shahar-ko-chhoda-har-rasta-sunsan-hua/): जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ अपना क्या है सारे शहर का एक जैसा नुक़सान हुआ, ये दिल ये आसेब की नगरी मस्कन सोचूँ वहमों का सोच रहा हूँ इस नगरी में तू कब से मेहमान हुआ ? सहरा की मुँह ज़ोर हवाएँ औरों से मंसूब हुईं मुफ़्त में हम आवारा ठहरे मुफ़्त में घर वीरान हुआ, मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तन्हा मौसम में पत्थर भी रो पड़ते हैं इंसान तो फिर इंसान हुआ, इतनी देर में उजड़े दिल पर कितने महशर बीत गए जितनी देर में तुझ को पा कर खोने - [कभी पहली बार स्कूल जाने में डर लगता था](https://bazmeshayari.com/kabhi-pahli-baar-school-jaane-me-dar-lagta-tha/): कभी पहली बार स्कूल जाने में डर लगता था आज अकेले ही ज़माना घूम लेते हैं, पहले फर्स्ट आने के लिए पढ़ा करते थे आज कमाने के लिए पढ़ते हैं, कभी छोटी सी चोट लगने पे रो देते थे आज दिल टूट जाने पे भी संभल जाते हैं, पहले हम दोस्तों के साथ रहते थे आज दोस्त हमारी यादों में रहते हैं, पहले लड़ना मरना रोज़ का काम होता था आज एक बार लड़ते हैं तो रिश्ते खो जाते हैं, सच हैं ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सीखा दिया जाने कब हम को वक़्त ने इतना बड़ा बना दिया..!! दिल में - [दिल में बंदों के बहुत ख़ौफ़ ए ख़ुदा था पहले](https://bazmeshayari.com/dil-me-bando-ke-bahut-khauf-e-khuda-tha-pahle/): दिल में बंदों के बहुत ख़ौफ़ ए ख़ुदा था पहले ये ज़माना कभी इतना न बुरा था पहले, राम के राज की तस्वीर थी अपनी धरती मसलक ए फ़िक्र ओ अमल उन्स ओ वफ़ा था पहले, एक इंसान से बे वज्ह हो इंसान को बैर ये वतीरा कभी देखा न सुना था पहले, हिंदू ओ मुस्लिम ओ ईसाई ओ सिख मेल से थे आपसी प्रेम का उल्फ़त का मज़ा था पहले, क़ौमी यकजेहती का आदर्श था ये भारतवर्ष हम ने पैग़ाम ए विला सब को दिया था पहले, बादशाह और गदा सब के बराबर थे हुक़ूक़ न्याय में कोई भी - [इश्क़ गर हाथ छुड़ाए तो छुड़ाने देना](https://bazmeshayari.com/ishq-gar-hath-chhudaye-chhudane-dena/): इश्क़ गर हाथ छुड़ाए तो छुड़ाने देना कार ए वहशत पे मगर आँच न आने देना, यूँ भी आग़ाज़ में हर काम भला लगता है अव्वल अव्वल है इसे हिज्र मनाने देना, अपने बच्चे को न नफ़रत का पढ़ा देना सबक़ हाथ दुश्मन से मिलाए तो मिलाने देना, ये भी कमज़र्फ़ मोहब्बत का वतीरा है मियाँ जब नए ज़ख़्म की ख़्वाहिश हो पुराने देना, जिस ने दामन मेरा दुख दर्द से भर डाला है मेरे मौला उसे ख़ुशियों के ख़ज़ाने देना, इज़्ज़त ए नफ़्स से बढ़ कर तो कोई चीज़ नहीं जो तुम्हें छोड़ के जाए उसे जाने देना, ~कोमल - [सुख़न के शौक़ में तौहीन हर्फ़ की नहीं की](https://bazmeshayari.com/sukhan-ke-shauq-me-tauhin-harf-ki-nahi-ki/): सुख़न के शौक़ में तौहीन हर्फ़ की नहीं की कि हम ने दाद की ख़्वाहिश में शाएरी नहीं की, जो ख़ुदपसंद थे उन से सुख़न किया कम कम जो कज कुलाह थे उन से तो बात भी नहीं की, कभी भी हम ने न की कोई बात मस्लहतन मुनाफ़िक़त की हिमायत, नहीं, कभी नहीं की, दिखाई देता कहाँ फिर अलग से अपना वजूद सो हम ने ज़ात की तफ़्हीम आख़िरी नहीं की, उसे बताया नहीं है कि मैं बदन में नहीं जो बात सब से ज़रूरी है वो अभी नहीं की, ब नाम ए ख़ुश नफ़सी हम तो आह भरते - [हर एक शक्ल में सूरत नई मलाल की है](https://bazmeshayari.com/har-ek-shakl-me-surat-nayi-malal-ki-hai/): हर एक शक्ल में सूरत नई मलाल की है हमारे चारों तरफ़ रौशनी मलाल की है, हम अपने हिज्र में तेरा विसाल देखते हैं यही ख़ुशी की है साअत, यही मलाल की है, हमारे ख़ाना ए दिल में नहीं है क्या क्या कुछ ये और बात कि हर शय इसी मलाल की है, अभी से शौक़ की आज़ुर्दगी का रंज न कर कि दिल को ताब ख़ुशी की न थी मलाल की है, किसी का रंज हो, अपना समझने लगते हैं वबाल ए जाँ ये कुशादा दिली मलाल की है, नहीं है ख़्वाहिश ए आसूदगी ए वस्ल हमें जवाज़ ए - [चुप है आग़ाज़ में, फिर शोर ए अजल पड़ता है](https://bazmeshayari.com/chup-hai-aagaaz-me-fir-shor-e-azal-padta-hai/): चुप है आग़ाज़ में, फिर शोर ए अजल पड़ता है और कहीं बीच में इम्कान का पल पड़ता है, एक वहशत है कि होती है अचानक तारी एक ग़म है कि यकायक ही उबल पड़ता है, याद का फूल महकते ही नवाह ए शब में कोई ख़ुशबू से मुलाक़ात को चल पड़ता है, हुजरा ए ज़ात में सन्नाटा ही ऐसा है कि दिल ध्यान में गूँजती आहट पे उछल पड़ता है, रोक लेता है अबद वक़्त के उस पार की राह दूसरी सम्त से जाऊँ तो अज़ल पड़ता है, साअतों की यही तकरार है जारी हर दम मेरी दुनिया में - [मेरे सिवा भी कोई गिरफ़्तार मुझ में है](https://bazmeshayari.com/mere-siwa-bhi-koi-giraftar-mujh-me-hai/): मेरे सिवा भी कोई गिरफ़्तार मुझ में है या फिर मेरा वजूद ही बेज़ार मुझ में है, मेरी ग़ज़ल किसी के तकल्लुम की बाज़गश्त एक यार ए ख़ुश कलाम ओ तरहदार मुझ में है, हद है कि तू न मेरी अज़िय्यत समझ सका शायद कोई बला का अदाकार मुझ में है, जिस का वजूद वक़्त से पहले की बात है वो भी अदम से बरसर ए पैकार मुझ में है, तू है कि तेरी ज़ात का इक़रार हर नफ़स मैं हूँ कि मेरी ज़ात का इंकार मुझ में है, तुझ से न कुछ कहा तो किसी से न कुछ कहा - [वो चराग़ ए जाँ कि चराग़ था कहीं रहगुज़ार में बुझ गया](https://bazmeshayari.com/wo-charag-e-jaan-ki-charag-tha-kahin-rahgujar-me-bujh-gaya/): वो चराग़ ए जाँ कि चराग़ था कहीं रहगुज़ार में बुझ गया मैं जो एक शो’लानज़ाद था हवस ए क़रार में बुझ गया, मुझे क्या ख़बर थी तेरी जबीं की वो रौशनी मेरे दम से थी मैं अजीब सादा मिज़ाज था तेरे ए’तिबार में बुझ गया, मुझे रंज है कि मैं मौसमों की तवक़्क़ुआत से कम रहा मेरी लौ को जिस में अमाँ मिली मैं उसी बहार में बुझ गया, वो जो लम्स मेरी तलब रहा वो झुलस गया मेरी खोज में सो मैं उस की ताब न ला सका कफ़ ए दाग़दार में बुझ गया, जिन्हें रौशनी का लिहाज़ - [मज्लिस ए ग़म, न कोई बज़्म ए तरब, क्या करते](https://bazmeshayari.com/majlis-e-gam-na-koi-bazm-e-tarab-kya-karte/): मज्लिस ए ग़म, न कोई बज़्म ए तरब, क्या करते घर ही जा सकते थे आवारा ए शब, क्या करते ? ये तो अच्छा क्या तन्हाई की आदत रखी तब उसे छोड़ दिया होता तो अब क्या करते ? रौशनी, रंग, महक, ताइर ए ख़ुश लहन, सबा तू न आता जो चमन में तो ये सब क्या करते ? दिल का ग़म दिल में लिए लौट गए हम चुप चाप कोई सुनता ही न था शोर ओ शग़ब क्या करते ? बात करने में हमें कौन सी दुश्वारी थी उस की आँखों से तख़ातुब था सो लब क्या करते ? - [सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है](https://bazmeshayari.com/sarfaroshi-ki-tamanna-ab-humare-dil-me-hai/): सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए क़ातिल में है, ऐ शहीद ए मुल्क ओ मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार ले तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है, वाए क़िस्मत पाँव की ऐ ज़ोफ़ कुछ चलती नहीं कारवाँ अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है, रहरव ए राह ए मोहब्बत रह न जाना राह में लज़्ज़त ए सहरा नवर्दी दूरी ए मंज़िल में है, शौक़ से राह ए मोहब्बत की मुसीबत झेल ले एक ख़ुशी का राज़ पिन्हाँ जादा ए मंज़िल में है, आज फिर मक़्तल में क़ातिल कह रहा - [वतन की सरज़मीं से इश्क़ ओ उल्फ़त हम भी रखते हैं](https://bazmeshayari.com/watan-ki-sarzamin-se-ishq-o-ulfat-hum-bhi-rakhte-hain/): वतन की सरज़मीं से इश्क़ ओ उल्फ़त हम भी रखते हैं खटकती जो रहे दिल में वो हसरत हम भी रखते हैं, ज़रूरत हो तो मर मिटने की हिम्मत हम भी रखते हैं ये जुरअत ये शुजाअत ये बसालत हम भी रखते हैं, ज़माने को हिला देने के दावे बाँधने वालो ज़माने को हिला देने की ताक़त हम भी रखते हैं, बला से हो अगर सारा जहाँ उन की हिमायत पर ख़ुदा ए हर दो आलम की हिमायत हम भी रखते हैं, बहार ए गुलशन ए उम्मीद भी सैराब हो जाए करम की आरज़ू ऐ अब्र ए रहमत हम भी - [कठ पुतली है या जीवन है जीते जाओ सोचो मत](https://bazmeshayari.com/kath-putli-hai-yaa-jivan-hai-jite-jaao-socho-mat/): कठ पुतली है या जीवन है जीते जाओ सोचो मत सोच से ही सारी उलझन है जीते जाओ सोचो मत, लिखा हुआ किरदार कहानी में ही चलता फिरता है कभी है दूरी कभी मिलन है जीते जाओ सोचो मत, नाच सको तो नाचो जब थक जाओ तो आराम करो टेढ़ा क्यूँ घर का आँगन है जीते जाओ सोचो मत, हर मज़हब का एक ही कहना जैसा मालिक रक्खे रहना जब तक साँसों का बंधन है जीते जाओ सोचो मत, घूम रहे हैं बाज़ारों में सरमायों के आतिश दान किस भट्टी में कौन ईंधन है जीते जाओ सोचो मत..!! ~निदा फ़ाज़ली - [रात के बाद नए दिन की सहर आएगी](https://bazmeshayari.com/raat-ke-baad-naye-din-ki-sahar-ayegi/): रात के बाद नए दिन की सहर आएगी दिन नहीं बदलेगा तारीख़ बदल जाएगी, हँसते हँसते कभी थक जाओ तो छुप के रो लो ये हँसी भीग के कुछ और चमक जाएगी, जगमगाती हुई सड़कों पे अकेले न फिरो शाम आएगी किसी मोड़ पे डस जाएगी, और कुछ देर यूँही जंग सियासत मज़हब और थक जाओ अभी नींद कहाँ आएगी, मेरी ग़ुर्बत को शराफ़त का अभी नाम न दे वक़्त बदला तो तिरी राय बदल जाएगी, वक़्त नदियों को उछाले कि उड़ाए पर्बत उम्र का काम गुज़रना है गुज़र जाएगी..!! ~निदा फ़ाज़ली मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की - [मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं](https://bazmeshayari.com/mutthi-bhar-logo-ke-hathon-me-laakho-ki-taqdeeren-hain/): मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं जुदा जुदा हैं धर्म इलाक़े एक सी लेकिन ज़ंजीरें हैं, आज और कल की बात नहीं है सदियों की तारीख़ यही है हर आँगन में ख़्वाब हैं लेकिन चंद घरों में ताबीरें हैं, जब भी कोई तख़्त सजा है मेरा तेरा ख़ून बहा है दरबारों की शान ओ शौकत मैदानों की शमशीरें हैं, हर जंगल की एक कहानी वो ही भेंट वही क़ुर्बानी गूँगी बहरी सारी भेड़ें चरवाहों की जागीरें हैं..!! ~निदा फ़ाज़ली मोहब्बत में वफ़ादारी से बचिए - [मोहब्बत में वफ़ादारी से बचिए](https://bazmeshayari.com/mohabbat-me-wafadari-se-bachiye/): मोहब्बत में वफ़ादारी से बचिए जहाँ तक हो अदाकारी से बचिए, हर एक सूरत भली लगती है कुछ दिन लहू की शो’बदा कारी से बचिए, शराफ़त आदमियत दर्द मंदी बड़े शहरों में बीमारी से बचिए, ज़रूरी क्या हर एक महफ़िल में बैठें तकल्लुफ़ की रवा दारी से बचिए, बिना पैरों के सर चलते नहीं हैं बुज़ुर्गों की समझदारी से बचिए..!! ~निदा फ़ाज़ली गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया - [गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया](https://bazmeshayari.com/girija-me-mandiron-me-azanon-me-bat-gaya/): गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया, इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया, पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया, जब तक था आसमान में सूरज सभी का था फिर यूँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया, हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ आलम तमाम चंद मचानों में बट गया, ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया..!! ~निदा फ़ाज़ली - [ज़मीन दी है तो थोड़ा सा आसमान भी दे](https://bazmeshayari.com/zameen-dee-hai-to-thoda-saa-aasmaan-bhi-de/): ज़मीन दी है तो थोड़ा सा आसमान भी दे मेरे ख़ुदा मेरे होने का कुछ गुमान भी दे, बना के बुत मुझे बीनाई का अज़ाब न दे ये ही अज़ाब है क़िस्मत तो फिर ज़बान भी दे, ये काएनात का फैलाव तो बहुत कम है जहाँ समा सके तन्हाई वो मकान भी दे, मैं अपने आप से कब तक किया करूँ बातें मेरी ज़बाँ को कभी कोई तर्जुमान भी दे, फ़लक को चांद सितारे नवाज़ने वाले मुझे चराग़ जलाने को साएबान भी दे..!! ~निदा फ़ाज़ली देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ - [देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ](https://bazmeshayari.com/dekha-hua-saa-kuch-hai-to-socha-hua-saa-kuch/): देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ, होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं जंगल सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ, साहिल की गीली रेत पे बच्चों के खेल सा हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ, फ़ुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ, धुँदली सी एक याद किसी क़ब्र का दिया और मेरे आस पास चमकता हुआ सा कुछ..!! ~निदा फ़ाज़ली इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी - [इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी](https://bazmeshayari.com/insan-me-haiwan-yahan-bhi-hai-wahan-bhi/): इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहाँ भी, ख़ूँ ख़्वार दरिंदों के फ़क़त नाम अलग हैं हर शहर बयाबान यहाँ भी है वहाँ भी, हिन्दू भी सुकूँ से है मुसलमाँ भी सुकूँ से इंसान परेशान यहाँ भी है वहाँ भी, रहमान की रहमत हो कि भगवान की मूरत हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहाँ भी, उठता है दिल ओ जाँ से धुआँ दोनों तरफ़ ही ये मीर का दीवान यहाँ भी है वहाँ भी..!! ~निदा फ़ाज़ली न जाने कौन सा मंज़र नज़र में रहता है - [न जाने कौन सा मंज़र नज़र में रहता है](https://bazmeshayari.com/naa-jaane-kaun-saa-manzar-nazar-me-rahta-hai/): न जाने कौन सा मंज़र नज़र में रहता है तमाम उम्र मुसाफ़िर सफ़र में रहता है, लड़ाई देखे हुए दुश्मनों से मुमकिन है मगर वो ख़ौफ़ जो दीवार ओ दर में रहता है, ख़ुदा तो मालिक ओ मुख़्तार है कहीं भी रहे कभी बशर में कभी जानवर में रहता है, अजीब दौर है ये तयशुदा नहीं कुछ भी न चाँद शब में न सूरज सहर में रहता है, जो मिलना चाहो तो मुझ से मिलो कहीं बाहर वो कोई और है जो मेरे घर में रहता है, बदलना चाहो तो दुनिया बदल भी सकती है अजब फ़ुतूर सा हर वक़्त - [कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है](https://bazmeshayari.com/koi-hindu-koi-muslim-koi-eesaai-hai/): कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है, इतनी ख़ूँ ख़ार न थीं पहले इबादत गाहें ये अक़ीदे हैं कि इंसान की तन्हाई है, तीन चौथाई से ज़ाइद हैं जो आबादी में उन के ही वास्ते हर भूक है महँगाई है, देखे कब तलक बाक़ी रहे सज धज उस की आज जिस चेहरा से तस्वीर उतरवाई है, अब नज़र आता नहीं कुछ भी दुकानों के सिवा अब न बादल हैं न चिड़ियाँ हैं न पुर्वाई है..!! ~निदा फ़ाज़ली काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में - [हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो](https://bazmeshayari.com/har-ek-ghar-me-diya-bhi-jale-anaj-bhi-ho/): हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो, रहेगी वा’दों में कब तक असीर ख़ुशहाली हर एक बार ही कल क्यूँ कभी तो आज भी हो, न करते शोर शराबा तो और क्या करते तुम्हारे शहर में कुछ और काम काज भी हो, हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो, बदल रहे हैं कई आदमी दरिंदों में मरज़ पुराना है इस का नया इलाज भी हो, अकेले ग़म से नई शाइरी नहीं होती ज़बान ए मीर में ग़ालिब का इम्तिज़ाज भी - [कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया](https://bazmeshayari.com/koshish-ke-bavjood-ye-ilzam-rah-gaya/): कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया हर काम में हमेशा कोई काम रह गया, छोटी थी उम्र और फ़साना तवील था आग़ाज़ ही लिखा गया अंजाम रह गया, उठ उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए दहशत गरों के हाथ में इस्लाम रह गया, उस का क़ुसूर ये था बहुत सोचता था वो वो कामयाब हो के भी नाकाम रह गया, अब क्या बताएँ कौन था क्या था वो एक शख़्स गिनती के चार हर्फ़ों का जो नाम रह गया..!! ~निदा फ़ाज़ली पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो - [घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे](https://bazmeshayari.com/ghar-se-nikale-to-ho-socha-bhi-kidhar-jaaoge/): घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे हर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे, इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करना घर की दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे, शाम होते ही सिमट जाएँगे सारे रस्ते बहते दरिया से जहाँ होगे ठहर जाओगे, हर नए शहर में कुछ रातें कड़ी होती हैं छत से दीवारें जुदा होंगी तो डर जाओगे, पहले हर चीज़ नज़र आएगी बे मा’नी सी और फिर अपनी ही नज़रों से उतर जाओगे..!! ~निदा फ़ाज़ली मुल्क की ऐसी तरक़्क़ी, आपकी बला से हो जो हो - [ये कैसी कश्मकश है ज़िंदगी में](https://bazmeshayari.com/ye-kaisi-kashmakash-hai-zindagi-me/): ये कैसी कश्मकश है ज़िंदगी में किसी को ढूँडते हैं हम किसी में, जो खो जाता है मिल कर ज़िंदगी में ग़ज़ल है नाम उस का शाएरी में, निकल आते हैं आँसू हँसते हँसते ये किस ग़म की कसक है हर ख़ुशी में, कहीं चेहरा कहीं आँखें कहीं लब हमेशा एक मिलता है कई में, चमकती है अंधेरों में ख़मोशी सितारे टूटते हैं रात ही में, सुलगती रेत में पानी कहाँ था कोई बादल छुपा था तिश्नगी में, बहुत मुश्किल है बंजारा मिज़ाजी सलीक़ा चाहिए आवारगी में..!! ~निदा फ़ाज़ली आदमी ही आदमी के बीच में आने लगा - [हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा](https://bazmeshayari.com/har-ghadi-khud-se-uljhna-hai-muqaddar-mera/): हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा, किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा, एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे मेरी आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा, मुद्दतें बीत गईं ख़्वाब सुहाना देखे जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा, आइना देख के निकला था मैं घर से बाहर आज तक हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा..!! ~निदा फ़ाज़ली अक़्ल बड़ी है या फिर भालू दानिश वाले ग़ौर करें - [अश्क ए नादाँ से कहो बाद में पछताएँगे](https://bazmeshayari.com/ashk-e-naadaan-se-kaho-baad-me-pachhtayenge/): अश्क ए नादाँ से कहो बाद में पछताएँगे आप गिर कर मेरी आँखों से किधर जाएँगे ? अपने लफ़्ज़ों को तकल्लुम से गिरा कर जानाँ अपने लहजे की थकावट में बिखर जाएँगे, तुम से ले जाएँगे हम छीन के वायदे अपने अब तो कसमों की सदाक़त से भी डर जाएँगे, एक तेरा घर था मेरी हद ए मुसाफत लेकिन अब ये सोचा है कि हम हद से गुज़र जाएँगे, अपने अफ्क़ार जला डालेंगे कागज़ कागज़ सोच मर जाएगी तो हम आप ही मर जाएँगे, इस से पहले कि जुदाई की ख़बर तुम से मिले हम ने सोचा है कि हम - [चलो चलके मनाया जाए उसको](https://bazmeshayari.com/chalo-chalke-manaya-jaaye-usko/): चलो चलके मनाया जाए उसको गले से फिर लगाया जाए उसको, सियासत आदमी को बाँटती है ये सच अब तो बताया जाए उसको, वो चेहरा हो कि कोई ख़्वाब मीठा निगाहों में बसाया जाए उसको, बहुत ख़ामोश हो बच्चा जो कोई न तन्हा छोड़ जाया जाए उसको, परिंदे पर शिकारी की नज़र है अभी कुछ पल उड़ाया जाए उसको, कहाँ महफ़ूज़ आख़िर रह सकेगा वो इंसा है बताया जाए उसको, बहुत नज़दीक रहता है मेरे वो ज़रा सा आज़माया जाए उसको..!! ~लक्ष्मण गुप्त अक़्ल बड़ी है या फिर भालू दानिश वाले ग़ौर करें - [अक़्ल बड़ी है या फिर भालू दानिश वाले ग़ौर करें](https://bazmeshayari.com/aql-badi-hai-yaa-fir-bhaaloo-danish-wale-gaur-kare/): अक़्ल बड़ी है या फिर भालू दानिश वाले ग़ौर करें शाख़ पे बैठा है क्यों उल्लू दानिश वाले ग़ौर करें, जिसका जुर्म उसी का थाना वही पार्टी सत्ता में दाँव उसी में है क्यों चालू दानिश वाले ग़ौर करें, पढ़े लिखे खाते पीते मोटे ताज़े लड़की लड़के बदबू को कहते हैं ख़ुशबू दानिश वाले ग़ौर करें, ग़ुंडो की अज़मत के आगे इंक़लाब छुटभैया है किस उसूल का है ये पहलू दानिश वाले ग़ौर करें, जिसके पास मिले चिकनाई वही पार्टी अच्छी है लेनिन से ऊँचा है लालू दानिश वाले ग़ौर करें..!! ~संजय चतुर्वेदी आदमी ही आदमी के बीच में आने - [आदमी ही आदमी के बीच में आने लगा](https://bazmeshayari.com/aadmi-hi-aadmi-ke-beech-me-aane-laga/): आदमी ही आदमी के बीच में आने लगा फिर वही गुज़रा ज़माना ख़ुद को दुहराने लगा, एक अदना सा इशारा उसने क्या है कर दिया बस्तियों पर बस्तियों का ख़ौफ़ मंडराने लगा, फिर लिखेगा दास्ताँ, जो है हक़ीक़त ही नहीं फिर सियासी भाव में उसका क़लम जाने लगा, है बग़ावत ये तो लो, हमने बग़ावत कर ही दी देखिए, शीशे में छिपकर कोई चिल्लाने लगा..!! ~लक्ष्मण गुप्त मुल्क की ऐसी तरक़्क़ी, आपकी बला से हो जो हो - [मुल्क की ऐसी तरक़्क़ी, आपकी बला से हो जो हो](https://bazmeshayari.com/mulq-ki-aisi-taraqqi-aapki-bala-se-ho-jo-ho/): मुल्क की ऐसी तरक़्क़ी, आपकी बला से हो जो हो क़ौम की कैसी भी पस्ती, आपकी बला से हो जो हो, आप तो ख़ुद से भी कभी, ग़ुस्सा नहीं करते जनाब होशियारी फिर शाह की, आपकी बला से हो जो हो, आप बैठेंगे कभी, मसनद की बग़ल में अन क़रीब दूसरे की क्या है हस्ती, आपकी बला से हो जो हो, सब ख़ला में फिर उड़ेंगे, क़ौम के हैं जो सरबराह शहर हो कि कोई बस्ती, आपकी बला से हो जो हो, शाह के रहम ओ करम से, आपको सब हासिल हुआ और हासिल सरपरस्ती, आपकी बला से हो जो - [पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो](https://bazmeshayari.com/pahle-janab-koi-shigufa-uchhal-do/): पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो फिर कर का बोझ क़ौम की गर्दन डल डाल दो, रिश्वत को हक़ समझ के जहाँ ले रहे हों लोग है और कोई मुल्क तो उसकी मिसाल दो ? औरत तुम्हारे पाँव की जूती की तरह है जब बोरियत महसूस हो घर से निकाल दो, चीनी नहीं है घर में, लो मेहमान आ गए महँगाई की भट्ठी में शराफ़त उबाल दो..!! ~अदम गोंडवी जितने हरामख़ोर थे क़ुर्बो जवार में - [जितने हरामख़ोर थे क़ुर्बो जवार में](https://bazmeshayari.com/jitne-haramkhor-the-kurbo-jawar-me/): जितने हरामख़ोर थे क़ुर्बो जवार में परधान बनके आ गए अगली क़तार में, दीवार फाँदने में यूँ जिनका रिकॉर्ड था वे चौधरी बने हैं उमर के उतार में, फ़ौरन खजूर छाप के परवान चढ़ गई जो भी ज़मीन ख़ाली पड़ी थी कछार में, बंजर ज़मीन पट्टे में जो दे रहे हैं आप ये रोटी का टुकड़ा है मियादी बुख़ार में, जब दस मिनट की पूजा में घंटों गुज़ार दें समझो कोई ग़रीब फँसा है शिकार में..!! ~अदम गोंडवी काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में - [काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में](https://bazmeshayari.com/kaajoo-bhune-plate-me-whisky-gilas-me/): काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में उतरा है रामराज विधायक निवास में, पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत इतना असर है खादी के उजले लिबास में, आज़ादी का ये जश्न मनाएँ वो किस तरह ? जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में, पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें संसद बादल गई है यहाँ के नख़ाश में, जनता के पास एक ही चारा है बग़ावत ये बात कह रहा हूँ मैं होश ओ हवास में..!! ~अदम गोंडवी तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है - [तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है](https://bazmeshayari.com/tumhari-faaielon-me-gaanv-ka-mausam-gulabi-hai/): तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये आँकड़ें झूठे हैं ये दावा किताबी है, उधर जम्हूरियत ढोल पीटे जा रहे हैं वो इधर पर्दे के पीछे बर्बरीयत है नवाबी है, लगी है होड़ सी देखो अमीरी और ग़रीबी में ये पूँजीवाद के ढाँचे की बुनियादी ख़राबी है, तुम्हारी मेज़ चाँदी की तुम्हारे जाम सोने के यहाँ ज़ुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है..!! ~अदम गोंडवी आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे - [गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो](https://bazmeshayari.com/gaye-dino-ka-suraag-le-kar-kidhar-se-aaya-kidhar-gaya-wo/): गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो, बस एक मोती सी छब दिखा कर बस एक मीठी सी धुन सुना कर सितारा ए शाम बन के आया ब रंग ए ख़्वाब ए सहर गया वो, ख़ुशी की रुत हो कि ग़म का मौसम नज़र उसे ढूँडती है हर दम वो बू ए गुल था कि नग़्मा ए जाँ मेरे तो दिल में उतर गया वो, न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की उदास बरखा यूँही ज़रा सी कसक है दिल में जो - [दयार ए दिल की रात में चराग़ सा जला गया](https://bazmeshayari.com/dayar-e-dil-kee-raat-me-charaag-saa-jal-gaya/): दयार ए दिल की रात में चराग़ सा जला गया मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया, वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब ए दुश्मनाँ हुई वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया, जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द ए ज़िंदगी ने भर दिए तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया, पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें ज़मीं निगल गई उन्हें कि आसमान खा गया, ये सुब्ह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ अब आइने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया ? ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ - [दिल में एक लहर सी उठी है अभी](https://bazmeshayari.com/dil-me-ek-lahar-see-uthi-hai-abhi-2/): दिल में एक लहर सी उठी है अभी कोई ताज़ा हवा चली है अभी, कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी और ये चोट भी नई है अभी, शोर बरपा है ख़ाना ए दिल में कोई दीवार सी गिरी है अभी, भरी दुनिया में जी नहीं लगता जाने किस चीज़ की कमी है अभी, तू शरीक ए सुख़न नहीं है तो क्या हम सुख़न तेरी ख़ामुशी है अभी, याद के बे निशाँ जज़ीरों से तेरी आवाज़ आ रही है अभी, शहर की बे चराग़ गलियों में ज़िंदगी तुझ को ढूँडती है अभी, सो गए लोग उस हवेली के एक खिड़की - [दिल धड़कने का सबब याद आया](https://bazmeshayari.com/dil-dhadkane-ka-sabab-yaad-aaya/): दिल धड़कने का सबब याद आया वो तेरी याद थी अब याद आया, आज मुश्किल था सँभलना ऐ दोस्त तू मुसीबत में अजब याद आया, दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से फिर तेरा वादा ए शब याद आया, तेरा भूला हुआ पैमान ए वफ़ा मर रहेंगे अगर अब याद आया, फिर कई लोग नज़र से गुज़रे फिर कोई शहर ए तरब याद आया, हाल ए दिल हम भी सुनाते लेकिन जब वो रुख़्सत हुआ तब याद आया, बैठ कर साया ए गुल में नासिर हम बहुत रोए वो जब याद आया..!! ~नासिर काज़मी निय्यत ए शौक़ भर न जाए कहीं - [निय्यत ए शौक़ भर न जाए कहीं](https://bazmeshayari.com/niyyat-e-shauq-bhar-na-jaaye-kahin/): निय्यत ए शौक़ भर न जाए कहीं तू भी दिल से उतर न जाए कहीं, आज देखा है तुझ को देर के ब’अद आज का दिन गुज़र न जाए कहीं, न मिला कर उदास लोगों से हुस्न तेरा बिखर न जाए कहीं, आरज़ू है कि तू यहाँ आए और फिर उम्र भर न जाए कहीं, जी जलाता हूँ और सोचता हूँ राएगाँ ये हुनर न जाए कहीं, आओ कुछ देर रो ही लें नासिर फिर ये दरिया उतर न जाए कहीं..!! ~नासिर काज़मी नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ ? - [नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ ?](https://bazmeshayari.com/naye-kapde-badal-kar-jaaoon-kahan/): नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए ? वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया मैं बाहर जाऊँ किस के लिए ? जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई, इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिए ? वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था, अब ऐसे वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए ? अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान ए ग़ज़ल ही नहीं, ऐवान ए ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुलदान - [कुछ इस अदा से ग़म ए ज़िंदगी के साथ चले](https://bazmeshayari.com/kuch-is-ada-se-gam-e-zindagi-ke-saath-chale/): कुछ इस अदा से ग़म ए ज़िंदगी के साथ चले कि जैसे कोई किसी अजनबी के साथ चले, क़दम क़दम ग़म ए कौन ओ मकाँ भुलाए हुए जो मेरे साथ चले वो ख़ुशी के साथ चले, ख़िरद को राह रवी का शु’ऊर आ जाए ज़रा सी दूर वो दीवानगी के साथ चले, जो हमसफ़र नहीं कोई तो अपना साया है ये आसरा तो है जैसे किसी के साथ चले, सुरूर ओ कैफ़ की राहें बहुत ही नाज़ुक हैं उन्हीं का ज़िक्र ज़रा मयकशी के साथ चले, रह ए हयात में वो तज्रबे हुए हैं कि बस हर एक सोच समझ - [आराइश ए बहार का सामाँ कहाँ से आए](https://bazmeshayari.com/aaraaeesh-e-bahaar-ka-saamaan-kahan-se-aaye/): आराइश ए बहार का सामाँ कहाँ से आए या’नी जुनूँ में रोज़ गरेबाँ कहाँ से आए ? इंसाँ मिले तो दौलत ए कौनैन भी निसार लेकिन सवाल ये है कि इंसाँ कहाँ से आए ? जोश ए जुनूँ ब ख़ैर अब इस ग़म से छुट गए दामन कहाँ से आए गरेबाँ कहाँ से आए ? बच बच के लाख बाद ए बहाराँ चले मगर उन की सी वो अदा ए गुरेज़ाँ कहाँ से आए ? इतना भी कोई पूछने वाला नहीं रईस हैराँ कहाँ से आए परेशाँ कहाँ से आए..?? ~रईस रामपुरी क्या क्या न सामने से ज़माने गुज़र गए - [क्या क्या न सामने से ज़माने गुज़र गए](https://bazmeshayari.com/kya-kya-na-saamne-se-zamane-guzar-gaye/): क्या क्या न सामने से ज़माने गुज़र गए एक ग़म था जिस ने साथ न छोड़ा जिधर गए, बेताब दिल के सामने और मस्लहत की बात चाहा न जाएँ बज़्म में उन की मगर गए, सुनते हैं दिन शबाब के जान ए हयात हैं लेकिन वो सुब्ह ओ शाम जो रो कर गुज़र गए, क्या क्या मज़े उठाए हैं ज़ब्त ए मलाल में दिल ख़ून हो गया है जो आँसू ठहर गए, डरता हूँ मैं कि ज़ब्त का दामन न छूट जाए बंदा नवाज़ आप तो हद से गुज़र गए, कुछ कम नहीं ये अज़्मत ए आवारगान ए इश्क़ दुनिया - [कौन कहता है कि पी कर दूर हो जाते हैं ग़म ?](https://bazmeshayari.com/kaun-kahta-hai-ki-pee-kar-door-ho-jate-hai-gam/): कौन कहता है कि पी कर दूर हो जाते हैं ग़म ? और याद आती हैं बातें और तड़पाते हैं ग़म, मुस्कुरा कर अपनी ख़ुद्दारी की रख लेता हूँ लाज मुस्कुराहट के हसीं पर्दे में छुप जाते हैं ग़म, एहतियात ओ ज़ब्त बन जाता है जिस दिल का मिज़ाज ऐसे दिल का चुपके चुपके काम कर जाते हैं ग़म, यूँ भी अख़्लाक़न उन्हें दिल में जगह देता हूँ मैं मुझ को अपना ही समझते हैं तो मिल जाते हैं ग़म, तिश्ना कामान ए मोहब्बत के फ़साने ही सुनाओ इस तरह ऐ हमदमो आँखों से बह जाते हैं ग़म, हूँ तो - [वो हँस देते हैं जब महफ़िल में मेरा नाम आता है](https://bazmeshayari.com/wo-hans-dete-hai-jab-mahfil-me-mera-naam-aata-hai/): वो हँस देते हैं जब महफ़िल में मेरा नाम आता है ख़ुदा की देन है दीवानापन यूँ काम आता है, ग़म ए दौर ए मय ओ साग़र से बाला है मेरी रिंदी जो उठ जाती हैं वो नज़रें तो मुझ तक जाम आता है, किसी की हर अदा ए सर्द मेहरी को ख़ुदा रखे न हँसना काम आता है न रोना काम आता है, ये कौन आहू मिज़ाज ओ गेसू ए मुश्कीं ब दोश आया कि देखे से ज़बानों पर ख़ुदा का नाम आता है, बहार ए नौ भी आए लेकिन अब के देखना ये है गरेबाँ काम आता है - [सुना है जब से कि तुम को भी ग़म गवारा है](https://bazmeshayari.com/suna-hai-jab-se-ki-tum-ko-bhi-gam-gavara-hai/): सुना है जब से कि तुम को भी ग़म गवारा है ख़याल अब हमें अपना नहीं तुम्हारा है, कभी जो सुनता हूँ आवाज़ ए बाज़गश्त अपनी तो सोचता हूँ कि तुम ने मुझे पुकारा है, कहाँ गई मेरी ज़िंदा दिली मैं क्यों सोचूँ ? ये फ़र्ज़ मेरा नहीं दोस्तो तुम्हारा है, ज़माने भर को अगर गुल तो हम को ख़ार अज़ीज़ ज़माने भर से अलग मुद्द’आ हमारा है, ये रात अब यूँही काँटों पे लोटना है रईस कि तू ने फूलों के साए में दिन गुज़ारा है..!! ~रईस रामपुरी हम अहल ए दिल का समझिए क़रार बाक़ी है - [हम अहल ए दिल का समझिए क़रार बाक़ी है](https://bazmeshayari.com/hum-ahal-e-dil-ka-samajhiye-qarar-baaqee-hai/): हम अहल ए दिल का समझिए क़रार बाक़ी है कहीं कोई जो मोहब्बत शि’आर बाक़ी है, खुली ही रह गईं बीमार ए हिज्र की आँखें हयात बीत गई इंतिज़ार बाक़ी है, तबाहियों के सिले में सुकून ए दिल के लिए तसव्वुर ए निगह ए शर्मसार बाक़ी है, लहू के फूल खिले हैं रविश रविश देखो मेरे चमन में अभी तक बहार बाक़ी है, अगर इधर से कोई कारवाँ नहीं गुज़रा तो फिर ये राह में कैसा ग़ुबार बाक़ी है ? सलीब ओ दार उसी की तो सुर्ख़ियाँ हैं रईस वो दास्ताँ जो सर ए कू ए यार बाक़ी है..!! ~रईस - [क्या अभी कहियेगा मुझ को अपना सौदाई कि बस](https://bazmeshayari.com/kya-abhi-kahiyega-mujh-ko-apna-saudaai-ki-bas/): क्या अभी कहियेगा मुझ को अपना सौदाई कि बस और कुछ मद्द ए नज़र है अपनी रुस्वाई कि बस, चौदहवीं का चाँद फूलों की महक ठंडी हवा रात उस काफ़िर अदा की ऐसी याद आई कि बस, हम को तो मंज़ूर है ही अपनी तस्कीन ए नज़र है मगर उन को भी वो शौक़ ए ख़ुद आराई कि बस, जब मुझे देखा उन्हें शर्म आ गई घबरा गए वो हुई है ख़ैर से दोनों कि रुस्वाई कि बस, अब भी कोह ए तूर पर गोया ज़बान ए हाल से है कोई और उस के जल्वे का तमन्नाई कि बस, चाक - [कल तक ये फूल रूह ए रवाँ थे बहार के](https://bazmeshayari.com/kal-tak-ye-phool-rooh-e-ravan-the-bahar-ke/): कल तक ये फूल रूह ए रवाँ थे बहार के तुम ने अभी अभी जिन्हें फेंका उतार के, देखा तो ज़र्रे ज़र्रे में जल्वे हैं यार के पछता रहा हूँ दैर ओ हरम में गुज़ार के, इस का तो ग़म नहीं कि नशेमन उजड़ गया इस का क़लक़ रहेगा कि दिन थे बहार के, ग़म से कभी गुरेज़ कभी साज़ बाज़ है हालात क्या बताऊँ दिल ए बेक़रार के, आए हैं मुद्दतों में जो दम भर के वास्ते हालात पूछते हैं शब ए इंतिज़ार के, क़ुर्बान जाऊँ हुस्न ए तसव्वुर के ऐ रईस पेश ए नज़र ख़िज़ाँ में हैं ख़ाके - [सब को मा'लूम है ये बात कहाँ](https://bazmeshayari.com/sab-ko-malum-hai-ye-baat-kahan/): सब को मा’लूम है ये बात कहाँ दिन कहाँ काटता हूँ रात कहाँ ? इस को तक़दीर ही कहा जाए मैं कहाँ उन का इल्तिफ़ात कहाँ ? जिन के आगे ज़बाँ भी हिल न सके कहने बैठा हूँ दिल की बात कहाँ ? सोच सकता हूँ कह नहीं सकता लुट गई दिल की काएनात कहाँ ? ऐ सबा उन की काकुलों को न छेड़ मुँह छुपाती फिरेगी रात कहाँ ? वो तो आँसू निकल पड़े वर्ना मैं कहाँ शरह ए वाक़ि’आत कहाँ ? उन को एहसास हो चला है रईस वो नज़र वो हँसी वो बात कहाँ..?? ~रईस रामपुरी मैं - [मैं हज़ार बार चाहूँ कि वो मुस्कुरा के देखे](https://bazmeshayari.com/main-hazar-baar-chahoon-ki-wo-muskura-ke-dekhe/): मैं हज़ार बार चाहूँ कि वो मुस्कुरा के देखे उसे क्या गरज़ पड़ी है जो नज़र उठा के देखे ? मेरे दिल का हौसला था कि ज़रा सी खाक़ उड़ा ली मेरे बाद उस गली में कोई और जा के देखे, कहीं आसमान टूटा तो क़दम कहाँ रुकेंगे ? जिसे ख़्वाब देखना हो वो ज़मीं पे आ के देखे, उसे क्या ख़बर कि क्या है ये शिकस्त ए अहद ओ पैमां जो फ़रेब दे रहा है वो फ़रेब खा के देखे, है अज़ीब कशमकश में मेरी शमअ ए आरज़ू भी मैं जला जला के देखूँ वो बुझा बुझा के देखे, - [नियाज़ ए इश्क़ से नाज़ ए बुताँ तक बात जा पहुँची](https://bazmeshayari.com/niyaz-e-ishq-e-naaz-e-butaan-tak-baat-ja-pahunchi/): नियाज़ ए इश्क़ से नाज़ ए बुताँ तक बात जा पहुँची ज़मीं का तज़्किरा था आसमाँ तक बात जा पहुँची, मोहब्बत में कहीं एक राज़ दाँ तक बात जा पहुँची बस अब क्या था ज़माने की ज़बाँ तक बात जा पहुँची, ज़माना ताड़ लेगा मैं न कहता था ये अब समझे मुझे दीवाना कहने से कहाँ तक बात जा पहुँची ? निज़ाम ए मयकदा पर तब्सिरे और होश वालों में यहीं से अज़्मत ए पीर ए मुग़ाँ तक बात जा पहुँची, सुना ये था कि चश्मक बिजलियों को है बहारों से हुआ ये है कि मेरे आशियाँ तक बात जा - [तरह तरह के सवालात करते रहते हैं](https://bazmeshayari.com/tarah-tarah-ke-sawalaat-karte-rahte-hain/): तरह तरह के सवालात करते रहते हैं अब अपने आप से हम बात करते रहते हैं, अता हुई है हमें जब से दौलत ए एहसास ग़मों से सब के मुलाक़ात करते रहते हैं, ख़ुशी में ख़ुश हूँ मैं जिन की उन्हें ये क्या मालूम कि ख़ुदकुशी मेरे जज़्बात करते रहते हैं, नसीहतें न करें अब तो क्या करें कि रईस यूँही तलाफ़ी ए माफ़ात करते रहते हैं..!! ~रईस रामपुरी जब से दिल में तेरे बख़्शे हुए ग़म ठहरे हैं - [जब से दिल में तेरे बख़्शे हुए ग़म ठहरे हैं](https://bazmeshayari.com/jab-se-dil-me-tere-bakhshe-hue-gam-thahre-hain/): जब से दिल में तेरे बख़्शे हुए ग़म ठहरे हैं महरम और भी अपने लिए हम ठहरे हैं, ग़म कि हर दौर में ठहराए गए हासिल ए ज़ीस्त और इस दौर में हम साहब ए ग़म ठहरे हैं, हम तेरी राह में उठे हैं बड़े अज़्म के साथ गर्दिश ए दहर भी ठहरी है जो हम ठहरे हैं, शौक़ ए आवारगी ओ ज़ौक़ तलब के क़ुर्बां उठ गए हैं तो कहाँ अपने क़दम ठहरे हैं, मैं तसव्वुर से कभी जिन के लरज़ उठता था वही हालात मोहब्बत का भरम ठहरे हैं, मग़्फ़िरत ही सही मयख़ाना ओ मय के मा’नी कि - [नज़र में सब की मेरी बे ख़ुदी का आलम है](https://bazmeshayari.com/nazar-me-sab-kee-meri-be-khudi-ka-aalam-hai/): नज़र में सब की मेरी बे ख़ुदी का आलम है किसे ख़बर कि बड़ी बेबसी का आलम है, अजीब शय है ये नैरंगी ए ज़माना भी किसी का कोई नहीं है किसी का आलम है, मैं अब हक़ीक़त ए दुनिया समझ गया शायद ख़ुद अपने आप से बेगानगी का आलम है, हर एक देख रहा है मेरे तबस्सुम को किसे ख़बर जो मेरी ज़िंदगी का आलम है, मुझे अज़ीज़ है अब यूँ रईस नाकामी सुना है ग़म से गुज़र कर ख़ुशी का आलम है..!! ~रईस रामपुरी कम मयस्सर हो जो होती है उसी की क़ीमत - [कम मयस्सर हो जो होती है उसी की क़ीमत](https://bazmeshayari.com/kam-mayassar-ho-jo-hoti-hai-usi-kee-qeemat/): कम मयस्सर हो जो होती है उसी की क़ीमत कसरत ए ग़म ने बढ़ाई है ख़ुशी की क़ीमत, पैरवी ए दिल ए नादाँ का सलीक़ा है जिन्हें उन से पूछे कोई बे राह रवी की क़ीमत, तुम ने हँसते मुझे देखा है तुम्हें क्या मालूम करनी पड़ती है अदा कितनी हँसी की क़ीमत, एहतिराम अपना ही ख़ुद जिस की निगाहों में न हो क्या भला उस की निगाहों में किसी की क़ीमत ? मुझ से धोका तो हुआ दिल को मगर मौज ए सराब मिल गई मुझ को मेरी तिश्नालबी की क़ीमत, मेरे सीने में छुपे ज़ख़्म बताएँगे रईस मैं - [अपनी आँखें हैं और तुम्हारे ख़्वाब](https://bazmeshayari.com/apni-aankhen-hain-aur-tumhare-khwab/): अपनी आँखें हैं और तुम्हारे ख़्वाब कितने पुर कैफ़ हैं हमारे ख़्वाब, उन के हक़ में बड़ा सहारा हैं देखते हैं जो बे सहारे ख़्वाब, हासिल ए ज़िंदगी जिन्हें कहिए कुछ हमारे हैं कुछ तुम्हारे ख़्वाब, यूँही बनते बिगड़ते रहते हैं गर्दिश ए वक़्त के सहारे ख़्वाब, हाँ न टूटे तिलिस्म ए ख़ुशफ़हमी यूँही देखो रईस प्यारे ख़्वाब..!! ~रईस रामपुरी जैसे कोई रब्त नहीं हो जैसे हों अनजाने लोग - [जैसे कोई रब्त नहीं हो जैसे हों अनजाने लोग](https://bazmeshayari.com/jaise-koi-rabt-nahi-ho-jaise-ho-anjane-log/): जैसे कोई रब्त नहीं हो जैसे हों अनजाने लोग क्या से क्या हो जाते हैं अक्सर जाने पहचाने लोग, मुँह से बात निकलते ही सौ गढ़ लेंगे अफ़्साने लोग बैठे बैठे बुन लेते हैं कैसे ताने बाने लोग, दैर ओ हरम ही से दुनिया को होश की राहें मिलती हैं दैर ओ हरम के नाम पे ही बन जाते हैं दीवाने लोग, कोई उन्हें भी तो समझाए कोई कुछ उन से भी कहे जब देखो तब आ जाते हैं मुझ को ही समझाने लोग, हज़रत ए ज़ाहिद समझा दें तो तौबा कर लूँ मैं भी रईस बादल क्यों छा जाते - [दिल में मेरे अरमान बहुत हैं](https://bazmeshayari.com/dil-me-mere-arman-bahut-hain/): दिल में मेरे अरमान बहुत हैं इस घर में मेहमान बहुत हैं, आप ज़माने को क्या जानें आप अभी नादान बहुत हैं, ऐसे ही हँस कर दिल रख लो वैसे तो अरमान बहुत हैं, है तो उन का नाम लबों पर इतने भी औसान बहुत हैं, ग़ौर करोगे तो काँटों के गुलशन पर एहसान बहुत हैं..!! ~रईस रामपुरी ख़ुद अपनी ज़िल्लत ओ ख़्वारी न करना - [ख़ुद अपनी ज़िल्लत ओ ख़्वारी न करना](https://bazmeshayari.com/khud-apni-zillat-o-khwaree-na-karna/): ख़ुद अपनी ज़िल्लत ओ ख़्वारी न करना किसी कमज़र्फ़ से यारी न करना, अगर तुम शाद रहना चाहते हो किसी की भी दिल आज़ारी न करना, अगर तौफ़ीक़ हो सच बोलने की तो अपनी भी तरफ़दारी न करना, तुम्हें हम जानते पहचानते हैं कभी हम से अदाकारी न करना किसी के साथ कर लेना इबादत हर एक के साथ मयख़्वारी न करना, न गिर जाना रईस अपनी नज़र से कभी तौहीन ए ख़ुद्दारी न करना..!! ~रईस रामपुरी क्या कहें ये जब्र कैसा ज़िंदगी के साथ है - [क्या कहें ये जब्र कैसा ज़िंदगी के साथ है](https://bazmeshayari.com/kya-kahe-ye-jabr-kaisa-zindagi-ke-sath/): क्या कहें ये जब्र कैसा ज़िंदगी के साथ है हम किसी के साथ हैं और दिल किसी के साथ है, ज़िंदा रखने की रिवायत आस्तीं के साँप की एक न एक हमदर्द भी हर आदमी के साथ है, अपनी अपनी मस्लहत है अपना अपना है मफ़ाद वर्ना इस दुनिया में कब कोई किसी के साथ है ? हो चुकी हैं मुश्किलात ए राह सब पर आश्कार अब जो मेरे साथ है अपनी ख़ुशी के साथ, वज़्अ दारी की क़सम है शहर में बस एक रईस देखिए जब भी उसे ज़िंदादिली के साथ है..!! ~रईस रामपुरी खुला है झूठ का बाज़ार - [खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें](https://bazmeshayari.com/khula-hai-jhooth-ka-bazaar-aao-sach-bole/): खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें, सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर यही है मौक़ा ए इज़हार आओ सच बोलें, हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना ब नाम ए अज़्मत ए किरदार आओ सच बोलें, सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है पुकार कर सर ए दरबार आओ सच बोलें, तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर कहेंगे क्या रसन ओ दार आओ सच बोलें, बजा कि ख़ू ए वफ़ा एक भी हसीं में नहीं कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें, जो वस्फ़ - [हाथ आँखों पे रख लेने से ख़तरा नहीं जाता](https://bazmeshayari.com/hath-ankhon-pe-rakh-lene-se-khatra-nahi-jata/): हाथ आँखों पे रख लेने से ख़तरा नहीं जाता दीवार से भौंचाल को रोका नहीं जाता, दावों की तराज़ू में तो अज़्मत नहीं तुलती फ़ीते से तो किरदार को नापा नहीं जाता, फ़रमान से पेड़ों पे कभी फल नहीं लगते तलवार से मौसम कोई बदला नहीं जाता, चोर अपने घरों में तो नहीं नक़्ब लगाते अपनी ही कमाई को तो लूटा नहीं जाता, औरों के ख़यालात की लेते हैं तलाशी और अपने गरेबान में झाँका नहीं जाता, फ़ौलाद से फ़ौलाद तो कट सकता है लेकिन क़ानून से क़ानून को बदला नहीं जाता, ज़ुल्मत को घटा कहने से बारिश नहीं होती - [किस तरफ़ क़ाफ़िला जाना है कहाँ देखते हैं](https://bazmeshayari.com/kis-taraf-qaafila-jana-hai-kahan-dekhte-hai/): किस तरफ़ क़ाफ़िला जाना है कहाँ देखते हैं हम तो बस आप के पैरों के निशाँ देखते हैं, ऐसा माहौल बना रक्खा है दरवाज़े पर आते जाते हुए सब मेरा मकाँ देखते हैं, जंग बीनाई को किस मोड़ पे ले आई है आसमाँ देखना चाहें तो धुआँ देखते हैं, लोग कहते हैं तू मौजूद नहीं दुनिया में हम को फिर भी नज़र आता है जहाँ देखते हैं, पैरहन देख रहे हैं ये सभी लोग मेरा तुम तो कहते थे कि अंदाज़ ए बयाँ देखते हैं..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान दिल इतना खो गया आराइशों में - [दिल इतना खो गया आराइशों में](https://bazmeshayari.com/dil-itna-kho-gaya-aaraaeesho-me/): दिल इतना खो गया आराइशों में तेरी ख़्वाहिश नहीं है ख़्वाहिशों में, तेरी यादें हैं और आँसू हमारे चिताएँ जल रही हैं बारिशों में, हमारी रूह घुट के मर गई है हमारे जिस्म की गुंजाइशों में, हम अपने क़त्ल का ज़िम्मा किसे दें है सारा शहर ही फ़रमाइशों में..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान वो संगदिल तो फ़क़त देखने से टूट गए - [वो संगदिल तो फ़क़त देखने से टूट गए](https://bazmeshayari.com/wo-sangdil-to-faqat-dekhne-se-toot-gaye/): वो संगदिल तो फ़क़त देखने से टूट गए ये देखने में हमारे पसीने छूट गए, उन्हें हमारे सिवा क़ाफ़िले से कुछ न मिला मगर लुटेरे हमारा भरम तो लूट गए, तुम्हारी दीद का दरवाज़ा खटखटाया ज़रूर मैं क्या करूँ कि निगाहों के हाथ टूट गए, तुम्हारे दश्त से कुछ ख़ास हाथ आया नहीं ज़रा से आबले लाए थे वो भी फूट गए, न खाईं ठोकरें उस की गली के पत्थरों से गुज़रने वालो तुम्हारे नसीब फूट गए..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान करता है कोई अब भी पज़ीराई हमारी - [करता है कोई अब भी पज़ीराई हमारी](https://bazmeshayari.com/karta-hai-koi-ab-bhi-pazeeraaee-humari/): करता है कोई अब भी पज़ीराई हमारी रुस्वाई भी लगती नहीं रुस्वाई हमारी, हम देख के दुनिया भी तुझे देख न पाए बेकार पड़ी रह गई बीनाई हमारी, लगता है बिछड़ कर भी नज़र आते रहेंगे है उस के महल्ले में शनासाई हमारी, हम तेरे ख़यालों में भटकते रहे बेजा आवाज़ लगाती रही तन्हाई हमारी, अब सब से मुसव्विर का पता पूछ रहा है इतनी उसे तस्वीर पसंद आई हमारी, रुस्वाई पे हम नाज़ करें क्यों न बताएँ जब आप से मंसूब है रुस्वाई हमारी..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान यूँ भरम अपनी अमीरी का बना रखा है - [यूँ भरम अपनी अमीरी का बना रखा है](https://bazmeshayari.com/yun-bharam-apni-amiree-ka-bana-rakha-hai/): यूँ भरम अपनी अमीरी का बना रखा है घर तो ख़ाली है मगर ताला लगा रखा है, आल ए मक़्तूल तो मक़्तल में खड़ी है ख़ामोश आप ने किस लिए हंगामा मचा रखा है ? तुम ने सहरा में बहुत ख़ाक उड़ाई होगी मैं ने तो शहर में माहौल बना रखा है, जैसे तैसे तेरी तस्वीर चुरा ली मैं ने बस कोई पूछ न ले जेब में क्या रखा है ? तुम कहो अपने तअल्लुक़ की वज़ाहत कर दूँ एक पत्थर है जिसे सर पे उठा रखा है..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान हाकिम ए शहर के अंदाज़ हैं हिंदा जैसे - [हाकिम ए शहर के अंदाज़ हैं हिंदा जैसे](https://bazmeshayari.com/haaqim-e-shahar-ke-andaz-hai-hinda-jaise/): हाकिम ए शहर के अंदाज़ हैं हिंदा जैसे हम तो हाथों में थमा देंगे कलेजा जैसे, सख़्त मुश्किल था मुझे छोड़ के आना तुझ को सुकड़ी गलियों से निकलता है जनाज़ा जैसे, यूँ दिलाया है उसे अपनी मोहब्बत का यक़ीन मुंकिर ए दीं को पढ़ाया गया कलमा जैसे, उस का झुँझलाना तो बनता था कि मैं ने उस को ऐसे देखा कभी देखा ही नहीं था जैसे, ज़िंदगी साथ तेरे इतनी हसीं लगती है धूप में बैठा हुआ दूध मुँह बच्चा जैसे, ज़िंदगी घूम रही है तेरी यादें ले कर मौत के घर में टहलती हुई बेवा जैसे..!! ~इब्राहीम अली - [जनाब ए आली बिछड़ने की कोई बात नहीं](https://bazmeshayari.com/janab-e-aali-bichhadne-kee-koi-baat-nahi/): जनाब ए आली बिछड़ने की कोई बात नहीं हमारे सीने में एक दिल है पाँच सात नहीं, बहुत झिझक के किया है मुसाफ़हा तुम ने तुम्हारे हाथ में शायद तुम्हारा हाथ नहीं, ज़माने भर से तअल्लुक़ की पर्दादारी है किसे बताएँ कि अब तू हमारे साथ नहीं, हमारी ज़ात से बाहर हमें तलाश करो हमारी ज़ात के अंदर हमारी ज़ात नहीं, मैं चाहता हूँ तअल्लुक़ बहाल करना मगर तुम्हारा दिल ही नहीं है तो कोई बात नहीं, हम अपने पैरों को ये बात कैसे समझाएँ अब उस गली में हमारे मुआमलात नहीं..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान रखा नहीं था तू ने - [रखा नहीं था तू ने मेरा दिल सँभाल कर](https://bazmeshayari.com/rakha-nahi-tha-tu-ne-mera-dil-sambhal-kar/): रखा नहीं था तू ने मेरा दिल सँभाल कर अब कुछ न कर सकेगा लिहाज़ा मलाल कर, रक़्साँ थी शब को धूप तुम्हारे ख़याल की फ़ुर्सत का चाँद बैठ गया दिल सँभाल कर, बाहर निकल के देख अँधेरों से एक बार रखा है रौशनी ने कलेजा निकाल कर, कहते हैं दिल जिसे कहीं मौजूद ही नहीं देखा है मैं ने बारहा सीना खँगाल कर, बाब ए क़फ़स खुला था रिहा तब न हो सके अब क्या करें ज़मीन से रस्ता निकाल कर ? आई थी इतनी याद तेरे जिस्म की महक हम चूमने लगे तेरे कपड़े निकाल कर..!! ~इब्राहीम अली - [तू तो तन्हा सर ए बाज़ार निकल जाता है](https://bazmeshayari.com/tu-to-tanha-sar-e-bazar-nikal-jaata-hai/): तू तो तन्हा सर ए बाज़ार निकल जाता है देखते देखते माहौल बदल जाता है, तुम ने हर बार मेरे इश्क़ का इंकार किया इतनी कोशिश में फटा नोट भी चल जाता है, जब भी लगती है भनक आप से मंसूब हूँ मैं सामने वाले का लहजा ही बदल जाता है, देर तक रह नहीं पाती तेरे चेहरे पे नज़र इस चढ़ाई पे मेरा पाँव फिसल जाता है, धूप से हाथ छुड़ाया तो हमें इल्म हुआ साया औक़ात से बाहर भी निकल जाता है..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान आँख से कैसे कहूँ अब भी अंधेरा देखे - [आँख से कैसे कहूँ अब भी अंधेरा देखे](https://bazmeshayari.com/aankh-se-kaise-kahoon-ab-bhi-andhera-dekhe/): आँख से कैसे कहूँ अब भी अंधेरा देखे मुद्दतें बीत गईं धूप का जल्वा देखे, दो गिलासों में समुंदर तो नहीं आ सकता ये नज़र तुझ को अगर देखे तो कितना देखे ? घूम कर देख लिया सारा ज़माना मैं ने अब तो बनता है मुझे सारा ज़माना देखे, ऐसे पढ़ता हूँ क़सीदे तेरी रानाई के है जो महरूम ए नज़र वो भी सरापा देखे, जा रहा था वो मुझे छोड़ के ऐसे उस दिन मैं ने भी चाहा नहीं मुड़ के दुबारा देखे, उस के जाने पे ख़ुशी भी थी मुझे फ़िक्र भी थी जैसे माँ मदरसे जाता हुआ - [ज़िंदगी ऐसे चल रही है दोस्त](https://bazmeshayari.com/zindagi-aise-chal-rahi-hai-dost/): ज़िंदगी ऐसे चल रही है दोस्त जैसे मय्यत निकल रही है दोस्त, आज जाना है ग़म की महफ़िल में शक्ल कपड़े बदल रही है दोस्त, बेवफ़ा तुम हो बेवफ़ा हम हैं बर्फ़ पर नाव चल रही है दोस्त, होश नीचे गिराएगा उस को नींद रस्सी पे चल रही है दोस्त, ये उदासी हमारी आँखों में कितने नाज़ों से पल रही है दोस्त आग कैसे बुझेगी पानी से आग पानी में जल रही है दोस्त..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान वो आ के बैठे थे जिस वक़्त आशियाने में - [वो आ के बैठे थे जिस वक़्त आशियाने में](https://bazmeshayari.com/wo-aa-ke-baithe-the-jis-waqt-aashiyaane-me/): वो आ के बैठे थे जिस वक़्त आशियाने में अमीर झाँक रहे थे ग़रीब ख़ाने में, हज़ार क़ाफ़िले गुज़रे हैं सामने से मगर मैं रह गया हूँ तुम्हें देखने दिखाने में, तमाम उम्र बिछड़ने से ख़ौफ़ खाया मगर ज़रा सी देर लगी अस्थियाँ बहाने में, हमारे दिल को सुकून आ गया है जब से मियाँ मची हुई है अजब हड़बड़ी ज़माने में, ख़ुदा के वास्ते चेहरा सँभाल कर रखना लगा हुआ है कोई आइना बनाने में..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान चश्म देखूँ न मैं उस की न ही अबरू देखूँ - [चश्म देखूँ न मैं उस की न ही अबरू देखूँ](https://bazmeshayari.com/chashm-dekhoon-na-main-us-kee-na-hee-abroo-dekhoon/): चश्म देखूँ न मैं उस की न ही अबरू देखूँ फिर वो क्या शय है जिसे दुनिया में हर सू देखूँ ? इस भरे शहर में बस एक ही सौदागर है अब मैं सामान खरीदूँ कि तराज़ू देखूँ ? जंग ने छोड़ दिए ज़ख़्म मेरे हाथों पर फ़त्ह का जश्न मनाऊँ कि ये बाज़ू देखूँ ? मुझ को हालात ने इस सम्त धकेला है मगर मेरी ये उम्र कहाँ है कि मैं घूँघरू देखूँ ? इन उजालों से बंधी हैं मेरी आँखें ज़ीशाँ इन उजालों से निकल जाऊँ तो घूँघरू देखूँ..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान शर्मिंदगी में उम्र बसर कर रहे - [शर्मिंदगी में उम्र बसर कर रहे हैं हम](https://bazmeshayari.com/sharmindagi-me-umr-basar-kar-rahe-hai-hum/): शर्मिंदगी में उम्र बसर कर रहे हैं हम ये काम था तुम्हारा मगर कर रहे हैं हम, पीना करो न बंद मुलाक़ात की शराब मुद्दत के बाद तुम पे असर कर रहे हैं हम, ऐसे भटक रहे हैं तुम्हारी तलाश में दुनिया को लग रहा है सफ़र कर रहे हैं हम, दिल सारी बात भूल गया सोचना भी मत हँस हँस के तुझ से बात अगर कर रहे हैं हम, तू शहर में नहीं है मगर इस के बावजूद तेरी गली से रोज़ गुज़र कर रहे हैं हम..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान हम एक रोज़ उस को भुलाने निकल गए - [हम एक रोज़ उस को भुलाने निकल गए](https://bazmeshayari.com/hum-ek-roz-us-ko-bhulaane-nikal-gaye/): हम एक रोज़ उस को भुलाने निकल गए जब आए लौट कर तो ज़माने निकल गए, एक शख़्स जा रहा था हमारे ज़मीन से हम आसमान सर पे उठाने निकल गए, तू तो ख़मोश हो गया फिर हम गली गली तेरी तरफ़ का शोर मचाने निकल गए, जब जब हमारे हाथ में आए हमारे पाँव उन की गली में ख़ाक उड़ाने निकल गए, उस कमसुख़न ने आज बहुत खुल के बात की मुफ़्लिस की झोपड़ी से ख़ज़ाने निकल गए, बिल्कुल नई ज़बान थी उस के कलाम में लेकिन हमारे कान पुराने निकल गए, जब जब भी याद आईं तुम्हारी हथेलियाँ - [रह रह के याद आती है उस शर्मसार की](https://bazmeshayari.com/rah-rah-ke-yaad-aati-hai-us-sharmsaar-kee/): रह रह के याद आती है उस शर्मसार की बे इख़्तियारी देख मेरे इख़्तियार की, डर है कि गिर न जाए मोहब्बत का आशियाँ मिट्टी खिसक रही है मिरे एतिबार की, मुरझा रहा है दिल में तेरी याद का दरख़्त क्या धूप पड़ रही है तेरे इंतिज़ार की, एक तुझ को देखना ही मेरा काम काज था क्यों धज्जियाँ उड़ा दीं मेरे रोज़गार की, वो शख़्स आ के मेरे महल्ले में बस गया मुझ पर निगाह पड़ गई परवरदिगार की..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान दिल किसी का न हुआ एक ख़रीदार के बाद - [दिल किसी का न हुआ एक ख़रीदार के बाद](https://bazmeshayari.com/dil-kisi-ka-na-hua-ek-kharidar-ke-baad/): दिल किसी का न हुआ एक ख़रीदार के बाद यहाँ लोग बाज़ार लगा लेते हैं बाज़ार के बाद, क़त्ल कर के भी हमें दिल नहीं भरता उन का लात भी मारते हैं जिस्म पे तलवार के बाद, ख़ुद को बदबख़्त कहूँ या मैं कहूँ ख़ुशक़िस्मत मेरी बीनाई गई है तेरे दीदार के बाद, शहर ख़ाली न हो ये सोच के हम ख़ाना बदोश जम हो जाते हैं हर रात को बाज़ार के बाद, सिर्फ़ पछतावा हुआ है हमें तुझ से मिल कर कभी गुफ़्तार से पहले कभी गुफ़्तार के बाद..!! ~इब्राहीम अली ज़ीशान तू मुझे याद करे ऐसा तरीक़ा निकले - [तू मुझे याद करे ऐसा तरीक़ा निकले](https://bazmeshayari.com/tu-mujhe-yaad-kare-aisa-tariqa-nikale/): तू मुझे याद करे ऐसा तरीक़ा निकले मेरी यकतरफ़ा मोहब्बत का नतीजा निकले, तेरी आँखों में दिखाई दे मोहब्बत मेरी बे नमाज़ी तेरे बस्ते से मुसल्ला निकले, वर्ना हम कब के चट्टानों में फँसे मर जाते पाँव काटे तो तेरे दश्त से ज़िंदा निकले, जंग में कौन निकलता है घरों से बाहर तू ने आवाज़ लगाई थी लिहाज़ा निकले, तेरी राहों में भटकते हुए मौत आ जाए और ऐसे में मेरी जेब से नक़्शा निकले, इतनी ख़ामोशी से निकले हैं तेरे शोर से हम जैसे बाज़ार के मजमा से जनाज़ा निकले, आज आऊँगा तेरे पास मोहब्बत ले कर मुद्दतें हो - [मेरी सारी ज़िंदगी को बे समर उस ने किया](https://bazmeshayari.com/meri-saari-zindagi-ko-be-samar-us-ne-kiya/): मेरी सारी ज़िंदगी को बे समर उस ने किया उम्र मेरी थी मगर उस को बसर उस ने किया, मैं बहुत कमज़ोर था इस मुल्क में हिजरत के बा’द पर मुझे इस मुल्क में कमज़ोर तर उस ने किया, राहबर मेरा बना गुमराह करने के लिए मुझ को सीधे रास्ते से दर ब दर उस ने किया, शहर में वो मो’तबर मेरी गवाही से हुआ फिर मुझे इस शहर में ना मो’तबर उस ने किया, शहर को बरबाद कर के रख दिया उस ने मुनीर शहर पर ये ज़ुल्म मेरे नाम पर उस ने किया..!! ~मुनीर नियाज़ी पा ब गिल - [पा ब गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन](https://bazmeshayari.com/paa-ba-gil-sab-hai-rihaayee-kee-kare-tadbeer-kaun/): पा ब गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन दस्त बस्ता शहर में खोले मेरी ज़ंजीर कौन ? मेरा सर हाज़िर है लेकिन मेरा मुंसिफ़ देख ले कर रहा है मेरी फ़र्द ए जुर्म को तहरीर कौन ? आज दरवाज़ों पे दस्तक जानी पहचानी सी है आज मेरे नाम लाता है मेरी ताज़ीर कौन ? कोई मक़्तल को गया था मुद्दतों पहले मगर है दर ए ख़ेमा पे अब तक सूरत ए तस्वीर कौन ? मेरी चादर तो छिनी थी शाम की तन्हाई में बे रिदाई को मेरी फिर दे गया तश्हीर कौन ? सच जहाँ पा बस्ता मुल्ज़िम - [बज़्म ए तकल्लुफ़ात सजाने में रह गया](https://bazmeshayari.com/bazm-e-takallufaat-sajaane-me-rah-gaya/): बज़्म ए तकल्लुफ़ात सजाने में रह गया मैं ज़िंदगी के नाज़ उठाने में रह गया, तासीर के लिए जहाँ तहरीफ़ की गई एक झोल बस वहीं पे फ़साने में रह गया, सब मुझ पे मोहर ए जुर्म लगाते चले गए मैं सब को अपने ज़ख़्म दिखाने में रह गया, ख़ुद हादसा भी मौत पे उस की था दम ब ख़ुद वो दूसरों की जान बचाने में रह गया, अब अहल ए कारवाँ पे लगाता है तोहमतें वो हम सफ़र जो हीले बहाने में रह गया, मैदान ए कार ज़ार में आए वो क़ौम क्या जिस का जवान आईना ख़ाने में - [ये मोहब्बत का फ़साना भी बदल जाएगा](https://bazmeshayari.com/ye-mohabbat-ka-fasana-bhi-badal-jayega/): ये मोहब्बत का फ़साना भी बदल जाएगा वक़्त के साथ ज़माना भी बदल जाएगा, आज कल में कोई तूफ़ान है उठने वाला हम ग़रीबों का ठिकाना भी बदल जाएगा, मुझ से लिल्लाह न सरकार छुड़ाएँ दामन आप बदले तो ज़माना भी बदल जाएगा, फिर बहार आई है गुलशन का नज़ारा कर लो वर्ना ये वक़्त सुहाना भी बदल जाएगा, मुफ़्लिसी मसनद ए ज़रदार पे क़ाबिज़ होगी महल बदलेगा ज़माना भी बदल जाएगा, किस को मालूम था अंजाम ये होगा अज़हर घर बदलते ही घराना भी बदल जाएगा..!! ~अज़हर लखनवी अब कहाँ दोस्त मिलें साथ निभाने वाले - [अब कहाँ दोस्त मिलें साथ निभाने वाले](https://bazmeshayari.com/ab-kahan-dost-mile-saath-nibhane-wale/): अब कहाँ दोस्त मिलें साथ निभाने वाले सब ने सीखे हैं अब आदाब ज़माने वाले, दिल जलाओ या दिए आँखों के दरवाज़े पर वक़्त से पहले तो आते नहीं आने वाले, अश्क बन के मैं निगाहों में तेरी आऊँगा ऐ मुझे अपनी निगाहों से गिराने वाले, वक़्त बदला तो उठाते हैं अब उँगली मुझ पर कल तलक हक़ में मेरे हाथ उठाने वाले, वक़्त हर ज़ख़्म का मरहम तो नहीं बन सकता दर्द कुछ होते हैं ता उम्र रुलाने वाले, एक नज़र देख तू मजबूरियाँ भी तो मेरी ऐ मेंरी लग़्ज़िशों पर आँख टिकाने वाले, कौन कहता है बुरे काम - [एक लफ़्ज़ ए मोहब्बत का अदना ये फ़साना है](https://bazmeshayari.com/ek-lafz-e-mohabbat-ka-adna-ye-fasana-hai/): एक लफ़्ज़ ए मोहब्बत का अदना ये फ़साना है सिमटे तो दिल ए आशिक़ फैले तो ज़माना है, ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना है जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है, दिल संग ए मलामत का हर चंद निशाना है दिल फिर भी मेरा दिल है दिल ही तो ज़माना है, हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है, वो और वफ़ा दुश्मन मानेंगे न माना है सब दिल की शरारत है आँखों का बहाना है, शायर हूँ मैं शायर हूँ मेरा ही ज़माना है - [हर दम तरफ़ है वैसे मिज़ाज करख़्त का](https://bazmeshayari.com/har-dam-taraf-hai-waise-mizaz-karakht-ka-tukda/): हर दम तरफ़ है वैसे मिज़ाज करख़्त का टुकड़ा मेरा जिगर है कहो संग सख़्त का, सब्ज़ान इन रू की जहाँ जल्वा गाह थी अब देखिए तो वाँ नहीं साया दरख़्त का, जों बर्ग हा ए लाला परेशान हो गया मज़कूर क्या है अब जिगर लख़्त लख़्त का ? दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज ओ तख़्त का, ख़ाक ए सियह से में जो बराबर हुआ हूँ मीर साया पड़ा है मुझ पे कसो तीरा बख़्त का..!! ~मीर तक़ी मीर मय ए फ़राग़त का आख़िरी दौर चल रहा था - [मय ए फ़राग़त का आख़िरी दौर चल रहा था](https://bazmeshayari.com/may-e-faragat-ka-aakhiri-duar-chal-raha-tha/): मय ए फ़राग़त का आख़िरी दौर चल रहा था सुबू किनारे विसाल का चाँद ढल रहा था, वो साज़ की लय कि नाचता था लहू रगों में वो हिद्दत ए मय कि लम्हा लम्हा पिघल रहा था, फ़ज़ा में लहरा रहे थे अफ़्सुर्दगी के साए अजब घड़ी थी कि वक़्त भी हाथ मल रहा था, सकूँ से महरूम थीं तरब गाह की नशिस्तें कि एक नया इज़्तिराब जिस्मों में चल रहा था, निगाहें दावत की मेज़ से दूर खो गई थीं तमाम ज़ेहनों में एक साया सा चल रहा था, हवा ए ग़ुर्बत की लहर अन्फ़ास में रवाँ थी नए - [सदा रहेगी यही रवानी रवाँ है पानी](https://bazmeshayari.com/sada-rahegi-yahi-rawani-ravan-hai-paani/): सदा रहेगी यही रवानी रवाँ है पानी बहाओ इस का है जावेदानी रवाँ है पानी, बहाव में बह रहे हैं मौसम निगाह मंज़र बहाए जाता है सब को पानी रवाँ है पानी, कभी थे इन रास्तों में क़र्ये मकान चेहरे ये दास्ताँ है मगर पुरानी रवाँ है पानी, न अब वो साहिल न अब वो हस्ती न वो फ़सीलें न उस ज़मीं की कोई निशानी रवाँ है पानी वहाँ वो अक़्लीम जिस पे सिक्का रवाँ था अपना यहाँ हवाओं की हुक्मरानी रवाँ है पानी, वो रात दिन भी इसी रवानी में बह चुके हैं बिखर चुकीं वो रुतें सुहानी रवाँ - [जब ख़िलाफ़ ए मस्लहत जीने की नौबत आई थी](https://bazmeshayari.com/jab-khilaf-e-maslhat-jine-kee-naubat-aayee-thi/): जब ख़िलाफ़ ए मस्लहत जीने की नौबत आई थी डूब मरते डूब मरने में अगर दानाई थी, मैं तो हर मुमकिन उसे लाता रहा तेरे क़रीब क्या करूँ ऐ दिल तेरी तक़दीर में तन्हाई थी, ख़ौफ़ का इफ़रीत साँसें ले रहा था दश्त में रात के चेहरे पे सन्नाटे की दहशत छाई थी, एक ये नौबत कि वहशत ढूँढता फिरता हूँ मैं एक वो मौसम कि गुलशन की हुआ सहराई थी, आसमाँ से गिर रही थी शोख़ रंगों की फुवार मेरी आँखों में तेरे दीदार की रा’नाई थी, शब गज़ीदों से हिसाब ए ग़म चुकाने के लिए तुम न आए - [बहार की धूप में नज़ारे हैं उस किनारे](https://bazmeshayari.com/bahar-kee-dhoop-me-nazare-hai-us-kinare/): बहार की धूप में नज़ारे हैं उस किनारे सफ़ेद पानी के सब्ज़ धारे हैं उस किनारे, वहाँ की सुब्हों का रंग है फ़ाख़्ताओं जैसा हमेश्गी के निशान सारे हैं उस किनारे, फ़ज़ा फ़रिश्तों के नूर से जगमगा रही है धुले हुए आसमान सारे हैं उस किनारे, वहाँ की रातों में ख़्वाब हैं कीमिया गरों के रवाँ मेरी रूह के सितारे हैं उस किनारे, फ़ज़ाओं में कश्फ़ के दिए झिलमिला रहे हैं हवाओं में ग़ैब के इशारे हैं उस किनारे, वहाँ है फ़ैज़ान आसमाँ की ज़ियाफ़तों का फ़लक ने नेमत के ख़्वाँ उतारे हैं उस किनारे, वहाँ हैं अंगूर के चमन - [दिल की बर्बादी में शामिल थी रज़ा आँखों की](https://bazmeshayari.com/dil-kee-barbadi-me-shamil-thi-raza-aankhon-kee/): दिल की बर्बादी में शामिल थी रज़ा आँखों की इस की पादाश में काम आई ज़िया आँखों की, आँख माहौल से जब तर्क ए तअ’ल्लुक़ कर ले ग़ौर कीजे तो वो होती है अना आँखों की, ज़ेर ए लब मौज ए तबस्सुम न अरूसाना लिबास हुस्न ए मा’सूम की पहचान हया आँखों की, हाल ए दिल लफ़्ज़ों का मुहताज है ये किस ने कहा कोई समझे तो ये आँसू हैं सदा आँखों की, हम को ले डूबेगा ये ज़ाहिर ओ बातिन का तज़ाद रूह का कर्ब जुदा राह जुदा आँखों की, गौहर ए अश्क को अर्ज़ां नहीं करते ये लोग - [उन लबों की याद आई गुल के मुस्कुराने से](https://bazmeshayari.com/un-labo-kee-yaad-aai-gul-ke-muskurane-se/): उन लबों की याद आई गुल के मुस्कुराने से ज़ख़्म ए दिल उभर आए फिर बहार आने से, जाने थी गुरेज़ उन को या कि शर्म महफ़िल में रात मुझ से कतराए वो नज़र मिलाने से, राज़ जो छुपाए थे आज सब पे ज़ाहिर हैं कुछ मेरी कहानी से कुछ तेरे फ़साने से, हाल जो हमारा है सब तो उन पे रौशन है फिर बताऊँ क्या होगा हाल ए दिल सुनाने से, उन को हम से क्या मतलब हम को क्या ग़रज़ तर्क ए इश्क़ कर बैठे हम तो एक ज़माने से..!! ~अज्ञात नेकियों के ज़ुमरे में भी ये काम - [नेकियों के ज़ुमरे में भी ये काम कर जाओ](https://bazmeshayari.com/nekiyo-ke-jumre-me-bhi-ye-kaam-kar-jaao/): नेकियों के ज़ुमरे में भी ये काम कर जाओ मुस्कुरा के थोड़ा सा मेरे ज़ख़्म भर जाओ, कितने ग़म बदामाँ हो सुब्ह से परेशाँ हो शाम आने वाली है अब उठो सँवर जाओ, ज़िंदगी जो करनी है मुस्कुरा के दिन काटो वर्ना सब से मुँह मोड़ो ज़हर खा के मर जाओ, गो मगो में ज़हमत है सोचना क़यामत है जिस तरफ़ कहे जज़्बा बे धड़क उधर जाओ, सच भी अब फ़साना है हाए क्या ज़माना है सब को फूल दो लेकिन आप बे समर जाओ, वो भी सहमा सहमा है प्यार के नताएज से बेहतरीन मौक़ा है तुम भी एक - [किसी रांझे से इतना दूर कहाँ कोई हीर रहती है](https://bazmeshayari.com/kisi-raanjhe-se-itna-door-kahan-koi-heer-rahti-hai/): किसी रांझे से इतना दूर कहाँ कोई हीर रहती है मैं अब लाहौर रहता हूँ, वो अब कश्मीर रहती है, सियासी ज़ुल्म के चलते जो हम बिछड़े सैंतालिस में उस मंज़र की मेरे दिल में अब भी तस्वीर रहती है, सरहद से लौट आये सब लिखे जो राब्ते को ख़त दराज़ों में मोहब्बत की मिटी तहरीर रहती है, मिलेंगे हम कभी इस आस को दफ़ना दिया कब का किसी गोशे में क़ैद हो कर मेरी तक़दीर रहती है, ईद की रस्म अदा सारी बिन उसके हो ही जाती है हमेशा की तरह अक्सर बस फीकी खीर रहती है, कभी तो - [ज़माने में कहीं दिल को लगाना भी ज़रूरी था](https://bazmeshayari.com/zamane-me-kahin-dil-ko-lagana-bhi-zaruri-tha/): ज़माने में कहीं दिल को लगाना भी ज़रूरी था ग़लत कुछ भी नहीं लेकिन छुपाना भी ज़रूरी था, ग़म ए दौराँ में हम को मुस्कुराना भी ज़रूरी था कि काँटों से हमें दामन बचाना भी ज़रूरी था, ज़माना क्या कहेगा ये नहीं सोचा कभी हम ने जो था दिल में हमारे वो बताना भी ज़रूरी था, हमें पत्थर भी खाने थे हमें गाली भी खानी थी मगर दुनिया को आईना दिखाना भी ज़रूरी था, हमें हँसते हुए बस देखता तो रूठ जाता वो हमें हँसते हुए आँसू बहाना भी ज़रूरी था, न हम सोए न वो सोए न आई नींद - [दिल के तातार में यादों के अब आहू भी नहीं](https://bazmeshayari.com/dil-ke-tatar-me-yaadon-ke-ab-aahoo-bhi-nahi/): दिल के तातार में यादों के अब आहू भी नहीं आईना माँगे जो हम से वो परी रू भी नहीं, दश्त ए तन्हाई में आवाज़ के घुँगरू भी नहीं और ऐसा भी कि सन्नाटे का जादू भी नहीं, ज़िंदगी जिन की रिफ़ाक़त पे बहुत नाज़ाँ थी उन से बिछड़ी तो कोई आँख में आँसू भी नहीं, चाहते हैं रह ए मयख़ाना न क़दमों को मिले लेकिन इस शोख़ी ए रफ़्तार पे क़ाबू भी नहीं, तल्ख़ियाँ नीम के पत्तों की मिली हैं हर सू ये मेरा शहर किसी फूल की ख़ुशबू भी नहीं, जाने क्या सोच के हम रुक गए वीरानों - [हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे](https://bazmeshayari.com/hum-bichhad-ke-tum-se-baadal-kee-tarah-rote-rahe/): हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे थक गए तो ख़्वाब की दहलीज़ पर सोते रहे, ज़िंदगी ने हाथ से ख़ंजर न रखा एक पल हम क़तील ए ग़म्ज़ा ओ नाज़ ए बुताँ होते रहे, लोक लहजे का सुहाना पन सुख़न की नग़्मगी शहर की आबादियों के शोर में खोते रहे, क्यूँ मता ए दिल के लुट जाने का कोई ग़म करे शहर ए दिल्ली में तो ऐसे वाक़िए होते रहे, सुर्ख़ियाँ अख़बार की गलियों में ग़ुल करती रहीं लोग अपने बंद कमरों में पड़े सोते रहे, महफ़िलों में हम रफ़ीक़ ओ राज़ दाँ समझे गए घर - [जश्न ए ग़म हा ए दिल मनाता हूँ](https://bazmeshayari.com/jashn-e-gam-haa-e-dil-manata-hoon/): जश्न ए ग़म हा ए दिल मनाता हूँ चोट खाता हूँ मुस्कुराता हूँ, हादसों से गुज़रता जाता हूँ जज़्बा ए दिल को आज़माता हूँ, अश्क ए ग़म की लतीफ़ शबनम से तेरी यादों के गुल खिलाता हूँ, ग़म ए दौराँ की तेज़ आँधी में दीप उम्मीद के जलाता हूँ, सामना जब भी उन का हो शाहीन बात कहने की भूल जाता हूँ..!! ~उस्मान शाहीन मुद्दत हुई अपनी आँखों को - [मुद्दत हुई अपनी आँखों को](https://bazmeshayari.com/muddat-hui-apni-aankhon-ko/): मुद्दत हुई अपनी आँखों को क्यों अश्क फ़िशानी याद आई ? क्या दिल ने उन्हें फिर याद किया फिर भूली कहानी याद आई ? बरखा की बरसती रातों में जब भूली कहानी याद आई, फिर अपना फ़साना याद आया फिर तेरी जवानी याद आई, कुछ सर्द सी आहें दाग़ ए जिगर आँखों की नमी और दिल की ख़लिश, रह रह के वो मिले और बिछड़े साजन की हर एक निशानी याद आई, गुलशन की फ़ज़ा से जब गुज़रा ग़ुंचों का चटकना भी देखा, होंटों की हँसी आँखों की नमी और शाम सुहानी याद आई, दुनिया से बचा कर इस दिल - [पोशीदा सब की आँख से दिल की किताब रख](https://bazmeshayari.com/poshida-sab-kee-aankh-se-dil-kee-kitab-rakh/): पोशीदा सब की आँख से दिल की किताब रख मुमकिन हो गर तो ज़ख़्म के बदले गुलाब रख, एहसान करके भूल जा एहसान मत जता किस किस को क्या दिया है कभी मत हिसाब रख, सेहन ए चमन के ग़ुंचों में तक़्सीम कर ख़ुशी शबनम की तरह क़ल्ब की आँखें पुर आब रख, दीमक ज़दा कुतुब से न अलमारियाँ सजा पढ़ने को तजरबात की ज़िंदा किताब रख, नाकामियों की धूप में कटती है ज़िंदगी दिल के सुकून के लिए आँखों में ख़्वाब रख, हर ज़र्रा को चमकने का अंदाज़ बख़्श दे हर सुब्ह ए नौ के वास्ते एक आफ़्ताब रख, - [जब भी ख़ल्वत में मेरी शम्अ जली शाम के बाद](https://bazmeshayari.com/jab-bhi-khalwat-me-meri-shama-jali-shaam-ke-baad/): जब भी ख़ल्वत में मेरी शम्अ जली शाम के बाद दिल के दरवाज़े पे दस्तक सी हुई शाम के बाद, चाँद तारों की जो महफ़िल थी सजी शाम के बाद मुझ को महसूस हुई तेरी कमी शाम के बाद, दिन तो ख़ामोश गुज़र जाता है अपना लेकिन आ ही जाती है मगर याद तेरी शाम के बाद, जान ए मन कुछ तो इलाज ए ग़म ए दौराँ करना वर्ना बढ़ जाएगी अफ़्सुर्दा दिली शाम के साथ, शैख़ की बात पे जो कर ली थी तौबा हम ने आप के आते ही वो टूट गई शाम के बाद, वो भी अब - [तड़प रहा है दिल ए बे क़रार आ जाओ](https://bazmeshayari.com/tadap-raha-hai-dil-e-be-qarar-aa-jaao/): तड़प रहा है दिल ए बे क़रार आ जाओ बस एक बार ऐ जान ए बहार आ जाओ, तुम्हारे आने से लौट आएगी चमन में बहार ख़िज़ाँ उड़ाने लगी है ग़ुबार आ जाओ, लगा दी आग गुलिस्ताँ में दुश्मनों ने मगर बुझाएँ आग जो हैं जाँ निसार आ जाओ, हैं घर के सारे दरीचे ही वा तुम्हारे लिए तसव्वुरात की दुनिया में यार आ जाओ, न छूट जाए कहीं अब ये ज़ब्त का दामन न जाओ रूठ के जान ए बहार आ जाओ, सहर का तारा भी शाहीन कह रहा है यही गुज़र न जाए शब ए इंतिज़ार आ जाओ..!! - [ज़िंदगी भी अजब तमाशा है](https://bazmeshayari.com/zindagi-bhi-azab-tamasha-hai/): ज़िंदगी भी अजब तमाशा है कभी आशा कभी निराशा है, जिस में करती हैं गुफ़्तुगू आँखें वो मोहब्बत की एक भाषा है, ज़ुल्मत ए ग़म है छट ही जाएगी तुझ को ऐ दोस्त क्यों निराशा है ? क्यों अकड़ता है ऐ दिल ए नादाँ तू तो पानी में एक बताशा है, इस ज़माने में आदमी शाहीन जैसे एक चलता फिरता लाशा है..!! ~उस्मान शाहीन ज़िक्र होता है उस परी वश का - [ज़िक्र होता है उस परी वश का](https://bazmeshayari.com/zikr-hota-hai-us-pari-vash-ka/): ज़िक्र होता है उस परी वश का जब भी महफ़िल में बात होती है, उस की यादों की अंजुमन ही में दिन गुज़रता है और रात होती है, सदक़े उतरी है ज़ीस्त इस दिल के रूह की है मफ़ारिक़त तन से, इल्तिहाब ए वजूद ख़त्म हुआ ग़म से दिल को नजात होती है, लाख पहरे भी हों तो महफ़िल में बात करने से कैसे रोकेंगे ? कौन जाने ज़बान ए अहल ए वफ़ा आँखों आँखों में बात होती है, लम्हे गुज़रे जो उन की बाहों में रक़्स कुन अब भी हैं निगाहों में, उन की ज़ुल्फ़ों की छाँव के नीचे - [अपने घर के दर ओ दीवार को ऊँचा न करो](https://bazmeshayari.com/apne-ghar-ke-dar-o-deewar-ko-ooncha-na-karo/): अपने घर के दर ओ दीवार को ऊँचा न करो इतना गहरा मेरी आवाज़ से पर्दा न करो, जो न एक बार भी चलते हुए मुड़ के देखें ऐसी मग़रूर तमन्नाओं का पीछा न करो, हो अगर साथ किसी शोख़ की ख़ुशबू ए बदन राह चलते हुए मह पारों को देखा न करो, कल न हो ये कि मकीनों को तरस जाए ये दिल दिल के आसेब का हर एक से चर्चा न करो, इश्क़ आसार ज़ुलेखाओं की इस बस्ती में साहिबो पाकी ए दामाँ पे भरोसा न करो..!! ~ज़ुबैर रिज़वी ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस - [ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ](https://bazmeshayari.com/gurub-e-shaam-hi-se-khud-ko-yun-mahsus-karta-hoon/): ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ कि जैसे एक दीया हूँ और हवा की ज़द पे रखा हूँ, चमकती धूप तुम अपने ही दामन में न भर लेना मैं सारी रात पेड़ों की तरह बारिश में भीगा हूँ, ये किस आवाज़ का बोसा मेरे होंटों पे काँपा है मैं पिछली सब सदाओं की हलावत भूल बैठा हूँ, बिछड़ के तुम से मैं ने भी कोई साथी नहीं ढूँढा हुजूम ए रहगुज़र में दूर तक देखो अकेला हूँ, कोई टूटा हुआ रिश्ता न दामन से उलझ जाए तुम्हारे साथ पहली बार बाज़ारों में निकला हूँ, मैं - [बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो](https://bazmeshayari.com/bichhadte-daamno-me-phool-kee-kuch-pattiyan-rakh-do/): बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो तअल्लुक़ की गिराँबारी में थोड़ी नर्मियाँ रख दो, भटक जाती हैं तुम से दूर चेहरों के तआक़ुब में जो तुम चाहो मेरी आँखों पे अपनी उँगलियाँ रख दो, बरसते बादलों से घर का आँगन डूब तो जाए अभी कुछ देर काग़ज़ की बनी ये कश्तियाँ रख दो, धुआँ सिगरेट का बोतल का नशा सब दुश्मन ए जाँ हैं कोई कहता है अपने हाथ से ये तल्ख़ियाँ रख दो, बहुत अच्छा है यारो महफ़िलों में टूट कर मिलना कोई बढ़ती हुई दूरी भी अपने दरमियाँ रख दो, नुक़ूश ए ख़ाल ओ ख़द - [कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली](https://bazmeshayari.com/kabhi-khirad-se-kabhi-dil-se-dosti-kar-lee/): कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली न पूछ कैसे बसर हम ने ज़िंदगी कर ली, अँधेरी रात का मंज़र भी ख़ूब था लेकिन तुम आ गए तो चराग़ों में रौशनी कर ली, तुम्हारा जिस्म है जाड़ों का सर्द सन्नाटा हरारतों से कहाँ तुम ने दोस्ती कर ली, हुज़ूर ए दोस्त अजब हादिसा हुआ यारो हर एक हर्फ़ ए शिकायत ने ख़ुदकुशी कर ली, लिए फिरे हैं बहुत तुम को दिल की गलियों में इस एक बात पे दुनिया ने दुश्मनी कर ली, हर एक मोड़ पे ख़ंजर ब कफ़ थी तन्हाई ग़रीब ए शहर ने घबरा के - [मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना](https://bazmeshayari.com/mujhe-tum-shohraton-ke-darmiyan-gumnam-likh-dena/): मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना जहाँ दरिया मिले बे आब मेरा नाम लिख देना, ये सारा हिज्र का मौसम ये सारी ख़ाना वीरानी इसे ऐ ज़िंदगी मेरे जुनूँ के नाम लिख देना, तुम अपने चाँद तारे कहकशाँ चाहे जिसे देना मेरी आँखों पे अपनी दीद की एक शाम लिख देना, मेरे अंदर पनाहें ढूँढती फिरती है ख़ामोशी लब ए गोया मेरे अंदर भी एक कोहराम लिख देना, वो मौसम जा चुका जिस में परिंदे चहचहाते थे अब इन पेड़ों की शाख़ों पर सुकूत ए शाम लिख देना, शबिस्तानों में लौ देते हुए कुंदन से जिस्मों पर हवा - [तू ने अपना जल्वा दिखाने को जो नक़ाब मुँह से उठा दिया](https://bazmeshayari.com/tu-ne-apna-jalwa-dikhaane-ko-jo-naqab-munh-se-utha-diya/): तू ने अपना जल्वा दिखाने को जो नक़ाब मुँह से उठा दिया वहीं महव ए हैरत ए बे ख़ुदी मुझे आइना सा बना दिया, वो जो नक़्श ए पा की तरह रही थी नुमूद अपने वजूद की सो कशिश ने दामन ए नाज़ की उसे भी ज़मीं से मिटा दिया, रग ओ पै में आग भड़क उठी फुंके है पड़ा ये सभी बदन मुझे साक़िया मय ए आतिशीं का ये जाम कैसा पिला दिया, जभी जा के मकतब ए इश्क़ में सबक़ ए मक़ाम ए फ़ना लिया जो लिखा पढ़ा था नियाज़ ने सो वो साफ़ दिल से भुला दिया..!! - [मोहब्बत ही न जो समझे वो ज़ालिम प्यार क्या जाने](https://bazmeshayari.com/mohabbat-hi-na-jo-samjhe-wo-zalim-pyar-kya-jaane/): मोहब्बत ही न जो समझे वो ज़ालिम प्यार क्या जाने निकलती दिल के तारों से जो है झंकार क्या जाने ? उसे तो क़त्ल करना और तड़पाना ही आता है गला किस का कटा क्यूँकर कटा तलवार क्या जाने ? दवा से फ़ाएदा होगा कि होगा ज़हर ए क़ातिल से मरज़ की क्या दवा है ये कोई बीमार क्या जाने ? करो फ़रियाद सर टकराओ अपनी जान दे डालो तड़पते दिल की हालत हुस्न की दीवार क्या जाने ?? ~अज्ञात ला पिला दे साक़िया पैमाना पैमाने के बा’द - [ला पिला दे साक़िया पैमाना पैमाने के बा'द](https://bazmeshayari.com/laa-pila-de-saaqiya-paimana-paimane-ke-baad/): ला पिला दे साक़िया पैमाना पैमाने के बा’द बात मतलब की करूँगा होश आ जाने के बा’द, जो जलाता है किसी को ख़ुद भी जलता है ज़रूर शम्अ’ भी जलती रही परवाना जल जाने के बा’द, दिल मेरा लेने की ख़ातिर मिन्नतें क्या क्या न कीं कैसे नज़रें फेर लीं मतलब निकल जाने के बा’द, उठ चलो बस ए ज़फ़र इस महफ़िल ए अग़्यार से वर्ना पीनी ही पड़ेगी दौर चल जाने के बा’द..!! ~अज्ञात हक़ीक़त का अगर अफ़्साना बन जाए तो क्या कीजे - [हक़ीक़त का अगर अफ़्साना बन जाए तो क्या कीजे](https://bazmeshayari.com/haqiqat-ka-agar-afsana-ban-jaaye-to-kya-kijiye/): हक़ीक़त का अगर अफ़्साना बन जाए तो क्या कीजे गले मिल कर भी वो बेगाना बन जाए तो क्या कीजे ? हमें सौ बार तर्क ए मयकशी मंज़ूर है लेकिन नज़र उस की अगर मयख़ाना बन जाए तो क्या कीजे ? नज़र आता है सज्दे में जो अक्सर शैख़ साहब को वो जल्वा जल्वा ए जानाना बन जाए तो क्या कीजे ? तेरे मिलने से जो मुझ को हमेशा मना करता है अगर वो भी तेरा दीवाना बन जाए तो क्या कीजे ? ख़ुदा का घर समझ रखा है अब तक हम ने जिस दिल को गर इस में भी - [मेरी आँखों को बख़्शे हैं आँसू](https://bazmeshayari.com/meri-aankhon-ko-bakhshe-hain-aansoon/): मेरी आँखों को बख़्शे हैं आँसू दिल को दाग़ ए अलम दे गए हैं, इस इनायत पे क़ुर्बान जाऊँ प्यार माँगा था ग़म दे गए हैं, देने आए थे हम को तसल्ली वो तसल्ली तो क्या हम को देते, तोड़ कर का’बा ए दिल हमारा हसरतों के सनम दे गए हैं, दिल तड़पता है फ़रियाद कर के आँख डरती है आँसू बहा के, ऐसी उल्फ़त से वो जाते जाते मुझ को अपनी क़सम दे गए हैं, मरहबा मयकशों का मुक़द्दर अब तो पीना इबादत है अनवर, आज रिंदों को पीने की दावत वाइ’ज़ ए मोहतरम दे गए हैं..!! ~अज्ञात गुलाब - [गुलाब आँखें शराब आँखें](https://bazmeshayari.com/gulab-aankhen-sharab-aankhen/): गुलाब आँखें शराब आँखें यही तो हैं ला जवाब आँखें, इन्हीं में उल्फ़त इन्हीं में नफ़रत सवाल आँखें जवाब आँखें, कभी नज़र में बला की शोख़ी कभी सरापा हिजाब आँखें, कभी छुपाती हैं हाल दिल के कभी हैं दिल की किताब आँखें, किसी ने देखीं तो झील जैसी किसी ने पाईं शराब आँखें, वो आए तो लोग मुझ से बोले हुज़ूर आँखें जनाब आँखें..!! ~अज्ञात सहर क़रीब है तारों का हाल क्या होगा - [सहर क़रीब है तारों का हाल क्या होगा](https://bazmeshayari.com/sahar-qareeb-hai-taaron-ka-haal-kya-hoga/): सहर क़रीब है तारों का हाल क्या होगा अब इंतिज़ार के मारों का हाल क्या होगा ? तेरी निगाह ने ज़ालिम कभी है ये सोचा तेरी निगाह के मारों का हाल क्या होगा ? मुक़ाबला है तेरे हुस्न का बहारों से न जाने आज बहारों का हाल क्या होगा ? नक़ाब उन का उलटना तो चाहता हूँ मगर बिगड़ गए तो नज़ारों का हाल क्या होगा ? मज़ाक़ ए दीद ही सहबा अगर बदल जाए तो ज़िंदगी की बहारों का हाल क्या होगा..?? ~अज्ञात फ़स्ल ए गुल है सजा है मयख़ाना - [फ़स्ल ए गुल है सजा है मयख़ाना](https://bazmeshayari.com/fasl-e-gul-hai-saza-hai-maykhana/): फ़स्ल ए गुल है सजा है मयख़ाना चल मेरे दिल खुला है मयख़ाना, शाम के वक़्त बैठने के लिए सब से अच्छी जगह है मयख़ाना, ख़त है शायद किसी शराबी का ख़त के ऊपर लिखा है मयख़ाना, किस तरह छोड़ दूँ इसे वाइज़ मुश्किलों से मिला है मयख़ाना, ज़िंदगी जब गुज़ारनी है कहीं यार फिर क्या बुरा है मयख़ाना, जब से वो आँख है ख़फ़ा हम से यूँ लगे है ख़फ़ा है मयख़ाना..!! ~अज्ञात फिरूँ ढूँढ़ता मयकदा तौबा तौबा - [फिरूँ ढूँढ़ता मयकदा तौबा तौबा](https://bazmeshayari.com/firoon-dhoondhta-maykada-tauba-tauba/): फिरूँ ढूँढ़ता मयकदा तौबा तौबा मुझे आज कल इतनी फ़ुर्सत नहीं है, सलामत रहे तेरी आँखों की मस्ती मुझे मय कशी की ज़रूरत नहीं है, ये तर्क ए तअ’ल्लुक़ का क्या तज़्किरा है तुम्हारे सिवा कोई अपना नहीं है, अगर तुम कहो तो मैं ख़ुद को भुला दूँ तुम्हें भूल जाने की ताक़त नहीं है, हमेशा मेरे सामने से गुज़रना निगाहें चुरा कर मुझे देख लेना, मेरी जान तुम मुझ को इतना बता दो ये क्या चीज़ है गर मोहब्बत नहीं है, हज़ारों तमन्नाएँ होती हैं दिल में अभी तो बस एक तमन्ना यही है, मुझे एक दफ़ा अपना कह - [कहना ग़लत ग़लत तो छुपाना सही सही](https://bazmeshayari.com/kahna-galat-galat-to-chupana-sahi-sahi/): कहना ग़लत ग़लत तो छुपाना सही सही क़ासिद कहा जो उस ने बताना सही सही, ये सुब्ह सुब्ह चेहरे की रंगत उड़ी हुई कल रात तुम कहाँ थे बताना सही सही, दिल ले के मेरा हाथ में कहते हैं मुझ से वो क्या लोगे इस का दाम बताना सही सही, आँखें मिलाओ ग़ैर से दो हम को जाम ए मय साक़ी तुम्हें क़सम है पिलाना सही सही, ऐ मय फ़रोश भीड़ है तेरी दुकान पर गाहक हैं हम भी माल दिखाना सही सही, हम तो जान ओ दिल से फ़क़त आप के है बस क्या आप भी हैं हमारे बताना - [अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का](https://bazmeshayari.com/ada-se-dekh-lo-jaata-rahe-gila-dil-ka/): अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का बस एक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का, सितम वो तुम ने किए भूले हम गिला दिल का हुआ तुम्हारे बिगड़ने से फ़ैसला दिल का, बहार आते ही कुंज ए क़फ़स नसीब हुआ हज़ार हैफ़ कि निकला न जो सिला दिल का, जो ये निशाना उड़ा दो तो समझें तीर फ़गन बहुत है नावक ए मिज़्गाँ से फ़ासला दिल का, इलाही ख़ैर हो कुछ आज रंग बे ढब है टपक रहा है कई दिन से आबला दिल का, चला है छोड़ के तन्हा किधर तसव्वुर ए यार शब ए फ़िराक़ - [बात साक़ी की न टाली जाएगी](https://bazmeshayari.com/baat-saaqi-ki-na-taali-jayegi/): बात साक़ी की न टाली जाएगी कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी, वो सँवरते हैं मुझे इस की है फ़िक्र आरज़ू किस की निकाली जाएगी, दिल लिया पहली नज़र में आप ने अब अदा कोई न ख़ाली जाएगी, आते आते आएगा उन को ख़याल जाते जाते बे ख़याली जाएगी, क्या कहूँ दिल तोड़ते हैं किस लिए आरज़ू शायद निकाली जाएगी, गर्मी ए नज़्ज़ारा बाज़ी का है शौक़ बाग़ से नर्गिस निकाली जाएगी, देखते हैं ग़ौर से मेरी शबीह शायद उस में जान डाली जाएगी, ऐ तमन्ना तुझ को रो लूँ शाम ए वस्ल आज तू दिल से निकाली जाएगी, फ़स्ल - [ज़माना है कि गुज़रा जा रहा है](https://bazmeshayari.com/zamana-hai-ki-guzra-ja-raha-hai/): ज़माना है कि गुज़रा जा रहा है ये दरिया है कि बहता जा रहा है, वो उट्ठे दर्द उठा हश्र उठा मगर दिल है कि बैठा जा रहा है, लगी थी उन के क़दमों से क़यामत मैं समझा साथ साया जा रहा है, ज़माने पर हँसे कोई कि रोए जो होना है वो होता जा रहा है, मेरे दाग़ ए जिगर को फूल कह कर मुझे काँटों में खींचा जा रहा है, बहार आई कि दिन होली के आए गुलों में रंग खेला जा रहा है, रवाँ है उम्र और इंसान ग़ाफ़िल मुसाफ़िर है कि सोता जा रहा है, सर - [दिल गया दिल लगी नहीं जाती](https://bazmeshayari.com/dil-gaya-dil-lagi-nahi-jaati/): दिल गया दिल लगी नहीं जाती रोते रोते हँसी नहीं जाती, आँखें साक़ी की जब से देखी हैं हम से दो घूँट पी नहीं जाती, कभी हम भी तड़प में बिजली थे अब तो करवट भी ली नहीं जाती, उन को सीने से भी लगा देखा हाए दिल की लगी नहीं जाती, बात करते वो क़त्ल करता है बात भी जिस से की नहीं जाती, आप में आए भी तो क्या आए लज़्ज़त ए बे ख़ुदी नहीं जाती, हैं वही मुझ से काविशें दिल की दोस्त की दुश्मनी नहीं जाती, हो गए फूल ज़ख़्म ए दिल खिल कर नहीं जाती - [निगाह बर्क़ नहीं चेहरा आफ़्ताब नहीं](https://bazmeshayari.com/nigaah-barq-nahi-chehra-aftab-nahi/): निगाह बर्क़ नहीं चेहरा आफ़्ताब नहीं वो आदमी है मगर देखने की ताब नहीं, गुनह गुनह न रहा इतनी बादा नोशी की अब एक शग़्ल है कुछ लज़्ज़त ए शराब नहीं, हमें तो दूर से आँखें दिखाई जाती हैं नक़ाब लिपटी है उस पर कोई इताब नहीं, पिए बग़ैर चढ़ी रहती है हसीनों को वहाँ शबाब है क्या कम अगर शराब नहीं, बहार देता है छन छन के नूर चेहरे का सर ए नक़ाब है जो कुछ तह ए नक़ाब नहीं, वो अपने अक्स को आवाज़ दे के कहते हैं तेरा जवाब तो मैं हूँ मेरा जवाब नहीं, उसे भी - [देखा जो हुस्न ए यार तबीअत मचल गई](https://bazmeshayari.com/dekha-jo-husn-e-yaar-tabiyat-machal-gayi/): देखा जो हुस्न ए यार तबीअत मचल गई आँखों का था क़ुसूर छुरी दिल पे चल गई, हम तुम मिले न थे तो जुदाई का था मलाल अब ये मलाल है कि तमन्ना निकल गई, साक़ी तेरी शराब जो शीशे में थी पड़ी साग़र में आ के और भी साँचे में ढल गई, दुश्मन से फिर गई निगह ए यार शुक्र है एक फाँस थी कि दिल से हमारे निकल गई, पीने से कर चुका था मैं तौबा मगर जलील बादल का रंग देख के नीयत बदल गई..!! ~जलील मानिकपूरी बहुत रहा है कभी लुत्फ़ ए यार हम पर भी - [बहुत रहा है कभी लुत्फ़ ए यार हम पर भी](https://bazmeshayari.com/bahut-raha-hai-kabhi-lutf-e-yaar-hum-par-bhi/): बहुत रहा है कभी लुत्फ़ ए यार हम पर भी गुज़र चुकी है ये फ़स्ल ए बहार हम पर भी, उरूस ए दहर को आया था प्यार हम पर भी ये बेसवा थी किसी शब निसार हम पर भी, बिठा चुका है ज़माना हमें भी मसनद पर हुआ किए हैं जवाहिर निसार हम पर भी, अदू को भी जो बनाया है तुम ने महरम ए राज़ तो फ़ख़्र क्या जो हुआ ए’तिबार हम पर भी, ख़ता किसी की हो लेकिन खुली जो उन की ज़बाँ तो हो ही जाते हैं दो एक वार हम पर भी, हम ऐसे रिंद मगर - [एक बोसा दीजिए मेरा ईमान लीजिए](https://bazmeshayari.com/ek-bosa-dijiye-mera-eeman-lijiye/): एक बोसा दीजिए मेरा ईमान लीजिए गो बुत हैं आप बहर ए ख़ुदा मान लीजिए, दिल ले के कहते हैं तेरी ख़ातिर से ले लिया उल्टा मुझी पे रखते हैं एहसान लीजिए, ग़ैरों को अपने हाथ से हँस कर खिला दिया मुझ से कबीदा हो के कहा पान लीजिए, मरना क़ुबूल है मगर उल्फ़त नहीं क़ुबूल दिल तो न दूँगा आप को मैं जान लीजिए, हाज़िर हुआ करूँगा मैं अक्सर हुज़ूर में आज अच्छी तरह से मुझे पहचान लीजिए..!! ~अकबर इलाहाबादी हूँ मैं परवाना मगर शम्अ तो हो रात तो हो - [हूँ मैं परवाना मगर शम्अ तो हो रात तो हो](https://bazmeshayari.com/hoon-main-parwana-magar-shama-to-ho-raat-to-ho/): हूँ मैं परवाना मगर शम्अ तो हो रात तो हो जान देने को हूँ मौजूद कोई बात तो हो, दिल भी हाज़िर सर ए तस्लीम भी ख़म को मौजूद कोई मरकज़ हो कोई क़िबला ए हाजात तो हो, दिल तो बेचैन है इज़हार ए इरादत के लिए किसी जानिब से कुछ इज़हार ए करामात तो हो, दिल कुशा बादा ए साफ़ी का किसे ज़ौक़ नहीं बातिन अफ़रोज़ कोई पीर ए ख़राबात तो हो, गुफ़्तनी है दिल ए पुर दर्द का क़िस्सा लेकिन किस से कहिए कोई मुस्तफ़्सिर ए हालात तो हो, दास्तान ए ग़म ए दिल कौन कहे कौन सुने - [हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना](https://bazmeshayari.com/haya-se-sar-jhuka-lena-ada-se-muskura-dena/): हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना, ये तर्ज़ एहसान करने का तुम्हीं को ज़ेब देता है मरज़ में मुब्तला कर के मरीज़ों को दवा देना, बलाएँ लेते हैं उन की हम उन पर जान देते हैं ये सौदा दीद के क़ाबिल है क्या लेना है क्या देना, ख़ुदा की याद में महवियत ए दिल बादशाही है मगर आसाँ नहीं है सारी दुनिया को भुला देना..!! ~अकबर इलाहाबादी लहरा के झूम झूम के ला मुस्कुरा के ला - [लहरा के झूम झूम के ला मुस्कुरा के ला](https://bazmeshayari.com/lahra-ke-jhoom-jhoom-ke-laa-muskura-ke-laa/): लहरा के झूम झूम के ला मुस्कुरा के ला फूलों के रस में चाँद की किरनें मिला के ला, कहते हैं उम्र ए रफ़्ता कभी लौटती नहीं जा मय कदे से मेरी जवानी उठा के ला, साग़र शिकन है शैख़ ए बला नोश की नज़र शीशे को ज़ेर ए दामन ए रंगीं छुपा के ला, क्यूँ जा रही है रूठ के रंगीनी ए बहार जा एक मर्तबा उसे फिर वर्ग़ला के ला, देखी नहीं है तू ने कभी ज़िंदगी की लहर अच्छा तो जा अदम की सुराही उठा के ला..!! ~अब्दुल हमीद अदम उदासी आसमाँ है दिल मेरा कितना अकेला - [उदासी आसमाँ है दिल मेरा कितना अकेला है](https://bazmeshayari.com/udaasi-aasmaan-hai-dil-mera-kitna-akela-hai/): उदासी आसमाँ है दिल मेरा कितना अकेला है परिंदा शाम के पुल पर बहुत ख़ामोश बैठा है, मैं जब सो जाऊँ इन आँखों पे अपने होंठ रख देना यक़ीं आ जाएगा पलकों तले भी दिल धड़कता है, तुम्हारे शहर के सारे दिए तो सो गए कब के हवा से पूछना दहलीज़ पे ये कौन जलता है ? अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना हर एक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है, कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा मुझे मालूम है क़िस्मत का लिखा भी बदलता है..!! ~बशीर बद्र हम हैं और उन की - [हम हैं और उन की ख़ुशी है आज कल](https://bazmeshayari.com/hum-hai-aur-un-kee-khushi-hai-aaj-kal/): हम हैं और उन की ख़ुशी है आज कल ज़िंदगी ही ज़िंदगी है आज कल, ग़म का हर आलम नया है इन दिनों दिल की हर दुनिया नई है आज कल, उन का ज़िक्र उन की तमन्ना उन की याद वक़्त कितना क़ीमती है आज कल, चाँद भी है सोगवार ए हिज्र दोस्त फीकी फीकी चाँदनी है आज कल, जल रही है दिल में शम ए आरज़ू ग़म कदे में रौशनी है आज कल, तू है और दरिया दिली है साक़िया मैं हूँ और तिश्ना लबी है आज कल, बे क़रारी करवटों पर करवटें दिल का आलम दीदनी है आज - [किसे अपना बनाएँ कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता](https://bazmeshayari.com/kise-apna-banayen-koi-is-qaabil-nahin-milta/): किसे अपना बनाएँ कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता यहाँ पत्थर बहुत मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलता, मोहब्बत का सिला ईसार का हासिल नहीं मिलता वो नज़रें बार हा मिलती हैं लेकिन दिल नहीं मिलता, तुम्हारा रूठना तम्हीद थी अफ़्साना ए ग़म की ज़माना हो गया हम से मिज़ाज ए दिल नहीं मिलता, जहाँ तक देखता हूँ मैं जहाँ तक मैं ने समझा है कोई तेरे सिवा तारीफ़ के क़ाबिल नहीं मिलता, हरम की मंज़िलें हों या सनम ख़ाने की राहें हों ख़ुदा मिलता नहीं जब तक मक़ाम ए दिल नहीं मिलता, मुसाफ़िर अपनी मंज़िल पर पहुँच कर चैन पाते - [दुई का तज़्किरा तौहीद में पाया नहीं जाता](https://bazmeshayari.com/duee-ka-tazkira-tauhid-me-paya-nahi-jaata/): दुई का तज़्किरा तौहीद में पाया नहीं जाता जहाँ मेरी रसाई है मेरा साया नहीं जाता, मेरे टूटे हुए पा ए तलब का मुझ पे एहसाँ है तुम्हारे दर से उठ कर अब कहीं जाया नहीं जाता, मोहब्बत हो तो जाती है मोहब्बत की नहीं जाती ये शो’ला ख़ुद भड़क उठता है भड़काया नहीं जाता, फ़क़ीरी में भी मुझ को माँगने से शर्म आती है सवाली हो के मुझ से हाथ फैलाया नहीं जाता, चमन तुम से इबारत है बहारें तुम से ज़िंदा हैं तुम्हारे सामने फूलों से मुरझाया नहीं जाता, मोहब्बत के लिए कुछ ख़ास दिल मख़्सूस होते हैं - [एक बिखरते आशियाँ की बात है](https://bazmeshayari.com/ek-bikharte-aashiyaan-kee-baat-hai/): एक बिखरते आशियाँ की बात है एक शिकस्ता साएबाँ की बात है, मेरे माथे के निशाँ की बात है उन के संग ए आस्ताँ की बात है, दर्द ओ ग़म के क़ाफ़िले का ज़िक्र है अश्क की मौज ए रवाँ की बात है, रूह का रिश्ता है ये तेरा मेरा ये भला कब जिस्म ओ जाँ की बात है, लोग जो कहते हैं तुम को बेवफ़ा तुम बताओ ये कहाँ की बात है, ज़ख़्म भर कर फिर हरे कैसे हुए बस कफ़ ए चारा गराँ की बात है, सच वही है जो अभी मैं ने कहा बाक़ी ज़ेब ए दास्ताँ - [अब इजाज़त दे कि मैं हूँ जाँ ब लब ऐ ज़िंदगी](https://bazmeshayari.com/ab-izazat-de-ki-main-hoon-jaan-ba-lab-ae-zindagi/): अब इजाज़त दे कि मैं हूँ जाँ ब लब ऐ ज़िंदगी मौत आती है बस अब हद्द ए अदब ऐ ज़िंदगी, किस लिए अब तक जिया हूँ और क्यों ज़िंदा रहूँ अपने होने का बता मुझ को सबब ऐ ज़िंदगी, क्यों बनी है जान की दुश्मन मेरी मुझ को बता तेरे पीछे मैं भला भागा हूँ कब ऐ ज़िंदगी ? हुस्न दौलत दोस्त दुनिया दिल नज़र हर एक शय छोड़ जाऊँगा तेरी ख़ातिर ये सब ऐ ज़िंदगी, सोचता हूँ क्या करेगी मेरे बिन तन्हा भला छोड़ जाऊँगा तुझे एक रोज़ जब ऐ ज़िंदगी..!! ~सबीहुद्दीन शोऐबी मैं ने देखा है कैसा - [मैं ने देखा है कैसा ये सपना नया रात के इस पहर](https://bazmeshayari.com/main-ne-dekha-hai-kaisa-ye-sapna-naya-raat-ke-is-pahar/): मैं ने देखा है कैसा ये सपना नया रात के इस पहर मुझ से बिछड़ा हुआ कोई अपना मिला रात के इस पहर, नींद क्यों उड़ गई चैन क्यों खो गया रात के इस पहर ये अचानक मेरे साथ क्या हो गया रात के इस पहर ? यूँ लगा मुझ को जैसे फ़ज़ा ख़ुश्बूओं से महकने लगी फिर किसी की गली से चली है हवा रात के इस पहर, दिल में जागी है कैसी तमन्ना नई ख़ुद मैं हैरान हूँ एक नई आरज़ू ने मुझे छू लिया रात के इस पहर, एक मंज़िल बसी थी निगाहों में जाने वो क्या - [मैं जो कहता हूँ तू कजरवी छोड़ दे](https://bazmeshayari.com/main-jo-kahta-hoon-tu-kajravee-chhod-de/): मैं जो कहता हूँ तू कजरवी छोड़ दे वो ये कहती है तू दोस्ती छोड़ दे, मैं ये कहता हूँ मुझ को दिवाना बना वो ये कहती है दीवानगी छोड़ दे, जब मैं तारीफ़ करता हूँ उस की कभी तब वो कहती है बस शाइ’री छोड़ दे, जब कभी दिल की बातें बताता हूँ मैं तब वो कहती है अब दिल लगी छोड़ दे, जब मैं कहता हूँ है जान हाज़िर मेरी वो ये कहती है अब जाँ मेरी छोड़ दे, जब मैं कहता हूँ जीना है मुश्किल बहुत तब वो कहती है जा ज़िंदगी छोड़ दे..!! ~सबीहुद्दीन शोऐबी जिसे - [जिसे ख़ुद से जुदा रखा नहीं है](https://bazmeshayari.com/jise-khud-se-juda-rakha-nahi-hai/): जिसे ख़ुद से जुदा रखा नहीं है वो मेरा है मगर मेरा नहीं है, जिसे खोने का मुझ को डर है इतना उसे मैं ने अभी पाया नहीं है, नुक़ूश अब ज़ेहन से मिटने लगे हैं बहुत दिन से उसे देखा नहीं है, सुना है फूल अब खिलते नहीं हैं तो क्या खुल कर वो अब हँसता नहीं है, नगर छोड़ा है जब से उस ग़ज़ल ने कोई शाइ’र ग़ज़ल कहता नहीं है, तेरी यादों से रौशन है मेरा दिल ये वो सूरज है जो ढलता नहीं है, मेरी आँखों का ये दरिया अजब है कि बहता है तो फिर - [जिस को इतना चाहा मैं ने जिस को ग़ज़ल में लिखा चाँद](https://bazmeshayari.com/jisko-itna-chaha-main-ne-jis-ko-gazal-me-likha-chaand/): जिस को इतना चाहा मैं ने जिस को ग़ज़ल में लिखा चाँद छोड़ गया है मुझ को कैसे आज वो मेरा अपना चाँद, अपने चाँद की सोचों में गुम बैठा था तन्हाई में जाने मेरे दिल के सूने आँगन में कब निकला चाँद, छुप जाए कभी सामने आए खेले आँख मिचोली क्यों मेरी जान मुझे लगता है बिल्कुल तेरे जैसा चाँद, दुख हो सुख हो रंज ख़ुशी हो मुश्किल हो या आसानी हर मौसम में साथ निभाए मेरा यार पुराना चाँद, नफ़सा नफ़सी का आलम है सब को अपनी फ़िक्र पड़ी अपनी धरती अपना अम्बर अपना सूरज अपना चाँद, चेहरों - [सोचता हूँ मैं कि कुछ इस तरह रोना चाहिए](https://bazmeshayari.com/sochta-hoon-main-ki-kuch-is-qadar-rona-chahiye/): सोचता हूँ मैं कि कुछ इस तरह रोना चाहिए अपने अश्कों से तेरा दामन भिगोना चाहिए, ज़िंदगी की राह पर कैसे अकेले हम चलें इस सफ़र में हमसफ़र कोई तो होना चाहिए, दिल बहुत छोटा है मेरा और जहाँ में ग़म बहुत मैं परेशाँ हूँ किसे कैसे समोना चाहिए, बच्चा रोता है मगर रोता है वो तक़दीर पर माँ समझती है कि मुन्ने को खिलौना चाहिए, अजनबी बिस्तर ये बोला रात के पिछले पहर ऐ सबीह ए बे वतन अब तुझ को सोना चाहिए..!! ~सबीहुद्दीन शोऐबी यूँ शहर के बाज़ार में क्या क्या नहीं मिलता - [यूँ शहर के बाज़ार में क्या क्या नहीं मिलता](https://bazmeshayari.com/yun-shahar-ke-bazaar-me-kya-kya-nahin-milta/): यूँ शहर के बाज़ार में क्या क्या नहीं मिलता पर हुस्न में सानी कोई तेरा नहीं नहीं मिलता, जो कुछ दिल ए नाकाम ने चाहा नहीं मिलता मंज़िल नहीं मिलती कभी रस्ता नहीं मिलता, लहजा नहीं मिलता कभी चेहरा नहीं मिलता दुनिया में हमें एक भी तुम सा नहीं मिलता, छोड़ा है जो एक घर को तो दूजा नहीं मिलता अब दिल सा तेरे कोई ठिकाना नहीं मिलता, आती है ख़ुशी गर तो वो मिलती है अधूरी ग़म जब कभी मिलता है अकेला नहीं मिलता..!! ~सबीहुद्दीन शोऐबी रह गया दुनिया में वो बन कर तमाशा उम्र भर - [रह गया दुनिया में वो बन कर तमाशा उम्र भर](https://bazmeshayari.com/rah-gaya-duniya-me-wo-ban-kar-tamasha-umr-bhar/): रह गया दुनिया में वो बन कर तमाशा उम्र भर जिस ने अपनी ज़िंदगी को खेल समझा उम्र भर, तुम अमीर ए शहर के घर को जला कर देखना घर में हो जाएगा मुफ़्लिस के उजाला उम्र भर, ऐसा लगता है कि अब वो क़ब्र तक जाएगी साथ दिल के ख़ानों में निहाँ थी जो तमन्ना उम्र भर, क़र्ज़ मेरी क़ौम वो कैसे चुकाएगी भला सूद ख़ुद को बेच कर जिस का उतार उम्र भर, जानता हूँ मुझ को डस लेगा वो मार ए आस्तीं जिस को अपना ख़ूँ पिला कर मैं ने पाला उम्र भर, ज़िंदगी ने’मत थी जिस - [गिरने वाली है बहुत जल्द ये सरकार हुज़ूर](https://bazmeshayari.com/girne-wali-hai-bahut-jald-ye-sarkar-huzoor/): गिरने वाली है बहुत जल्द ये सरकार हुज़ूर हाँ नज़र आते हैं ऐसे ही कुछ आसार हुज़ूर, कारवाँ यूँही भटकता रहे हर बार हुज़ूर नेक निय्यत न हों गर क़ाफ़िला ए सालार हुज़ूर, वो जो अज़ ख़ुद ही बने बैठे हैं सरदार हुज़ूर वक़्त एक दिन उन्हें लाएगा सर ए दार हुज़ूर, ख़ुद को देते हैं वो धोका यूँही बेकार हुज़ूर जो ख़ताओं का नहीं करते हैं इक़रार हुज़ूर, सामने आ के रहे सच सर ए बाज़ार हुज़ूर कोई कितना ही करे झूट का प्रचार हुज़ूर..!! ~सबीहुद्दीन शोऐबी मुसलसल मुझ पे ये तेरी इनायत मार डालेगी - [मुसलसल मुझ पे ये तेरी इनायत मार डालेगी](https://bazmeshayari.com/musalsal-mujh-pe-ye-teri-inayat-maar-dalegi/): मुसलसल मुझ पे ये तेरी इनायत मार डालेगी कभी फ़ुर्क़त कभी इस दर्जा क़ुर्बत मार डालेगी, ग़रीब ए शहर का क्या इस को ग़ुर्बत मार डालेगी अमीर ए शहर को दौलत की चाहत मार डालेगी, सड़क पर पाया जाएगा किसी दिन मेरा भी लाशा मुझे सच बोलते रहने की आदत मार डालेगी, ये तेरी दस्त गीरी एक दिन ले डूबेगी मुझ को मेरी हर बात पर तेरी हिमायत मार डालेगी, अगर चाहत की शिद्दत दिन ब दिन बढ़ती रही यूँ ही सबीह ए नीम जाँ तुझ को मोहब्बत मार डालेगी..!! ~सबीहुद्दीन शोऐबी आ ही जाएगी सहर मतला ए इम्काँ तो - [आ ही जाएगी सहर मतला ए इम्काँ तो खुला](https://bazmeshayari.com/aa-hi-jayegi-sahar-matla-e-imkaan-to-khula/): आ ही जाएगी सहर मतला ए इम्काँ तो खुला न सही बाब ए क़फ़स रौज़न ए ज़िंदाँ तो खुला, ले के आई तो सबा उस गुल ए चीनी का पयाम वो सही ज़ख़्म की सूरत लब ए ख़ंदाँ तो खुला, सैल ए रंग आ ही रहेगा मगर ऐ किश्त ए चमन ज़र्ब ए मौसम तो पड़ी बंद ए बहाराँ तो खुला, दिल तलक पहुँचे न पहुँचे मगर ऐ चश्म ए हयात बाद मुद्दत के तेरा पंजा ए मिज़्गाँ तो खुला, दर्द का दर्द से रिश्ता है चलो ऐ मजरूह आज यारों से ये एक उक़्दा ए आसाँ तो खुला..!! ~मजरूह - [इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए](https://bazmeshayari.com/is-baag-me-wo-sang-ke-qaabil-kaha-na-jaaye/): इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए जब तक किसी समर को मिरा दिल कहा न जाए, शाख़ों पे नोक ए तेग़ से क्या क्या खिले हैं फूल अंदाज़ ए लाला कारी ए क़ातिल कहा न जाए, किस के लहू के रंग हैं ये ख़ार शोख़ रंग क्या गुल कतर गई रह ए मंज़िल कहा न जाए, बाराँ के मुंतज़िर हैं समुंदर पे तिश्नालब अहवाल ए मेज़बानी ए साहिल कहा न जाए, मेरे ही संग ओ ख़िश्त से तामीर ए बाम ओ दर मेरे ही घर को शहर में शामिल कहा न जाए, ज़िंदाँ खुला है जब - [ख़ंजर की तरह बू ए समन तेज़ बहुत है](https://bazmeshayari.com/khanzar-kee-tarah-boo-e-saman-tej-bahut-hai/): ख़ंजर की तरह बू ए समन तेज़ बहुत है मौसम की हवा अब के जुनूँ ख़ेज़ बहुत है, रास आए तो है छाँव बहुत बर्ग ओ शजर की हाथ आए तो हर शाख़ समर रेज़ बहुत है, लोगो मेरी गुलकारी ए वहशत का सिला क्या दीवाने को एक हर्फ़ ए दिल आवेज़ बहुत है, मुनइम की तरह पीर ए हरम पीते हैं वो जाम रिंदों को भी जिस जाम से परहेज़ बहुत है, मस्लूब हुआ कोई सर ए राह ए तमन्ना आवाज़ ए जरस पिछले पहर तेज़ बहुत है, मजरूह सुने कौन तेरी तल्ख़ नवाई गुफ़्तार ए अज़ीज़ाँ शकर आमेज़ - [चमन है मक़्तल ए नग़्मा अब और क्या कहिए](https://bazmeshayari.com/chaman-hai-maqtal-e-nagma-ab-aur-kya-kahiye/): चमन है मक़्तल ए नग़्मा अब और क्या कहिए बस एक सुकूत का आलम जिसे नवा कहिए, असीर ए बंद ए ज़माना हूँ साहबान ए चमन मेरी तरफ़ से गुलों को बहुत दुआ कहिए, यही है जी में कि वो रफ़्ता ए तग़ाफुल ओ नाज़ कहीं मिले तो वही क़िस्सा ए वफ़ा कहिए, उसे भी क्यूँ न फिर अपने दिल ए ज़बूँ की तरह ख़राब ए काकुल ओ आवारा ए अदा कहिए, ये कू ए यार ये ज़िंदाँ ये फ़र्श ए मयख़ाना इन्हें हम अहल ए तमन्ना के नक़्श ए पा कहिए, वो एक बात है कहिए तुलू ए सुब्ह - [ख़त्म शोर ए तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी](https://bazmeshayari.com/khatm-shor-e-tufaan-tha-door-thi-siyaah-bhi/): ख़त्म शोर ए तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी दम के दम में अफ़्साना थी मेरी तबाही भी, इल्तिफ़ात समझूँ या बे रुख़ी कहूँ इस को रह गई ख़लिश बन कर उस की कम निगाही भी, उस नज़र के उठने में उस नज़र के झुकने में नग़मा ए सहर भी है आह ए सुब्ह गाही भी, याद कर वो दिन जिस दिन तेरी सख़्त गीरी पुर अश्क भर के उट्ठी थी मेरी बे गुनाही भी, पस्ती ए ज़मीं से है रिफ़अत ए फ़लक क़ाएम मेरी ख़स्ता हाली से तेरी कज कुलाही भी, शम्अ भी उजाला भी मैं ही अपनी महफ़िल - [डरा के मौज ओ तलातुम से हम नशीनों को](https://bazmeshayari.com/dara-ke-mauj-o-talatum-se-hum-nasheenon-ko/): डरा के मौज ओ तलातुम से हम नशीनों को यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को, शराब हो ही गई है ब क़द्र ए पैमाना ब अज़्म ए तर्क निचोड़ा जब आस्तीनों को, जमाल ए सुब्ह दिया रू ए नौ बहार दिया मेरी निगाह भी देता ख़ुदा हसीनों को, हमारी राह में आए हज़ार मयख़ाने भुला सके न मगर होश के क़रीनों को, कभी नज़र भी उठाई न सू ए बादा ए नाब कभी चढ़ा गए पिघला के आबगीनों को, यही जहाँ है जहन्नम यही जहाँ फ़िरदौस बताओ आलम ए बाला के सैर बीनों को, हुए हैं क़ाफ़िले ज़ुल्मत - [अहल ए तूफ़ाँ आओ दिल वालों का अफ़्साना कहें](https://bazmeshayari.com/ahal-e-tufaan-aaoo-dil-walon-ka-afsana-kahen/): अहल ए तूफ़ाँ आओ दिल वालों का अफ़्साना कहें मौज को गेसू भँवर को चश्म ए जानाना कहें, दार पर चढ़ कर लगाएँ नारा ए ज़ुल्फ़ ए सनम सब हमें बाहोश समझें चाहे दीवाना कहें, यार ए नुक्ता दाँ किधर है फिर चलें उस के हुज़ूर ज़िंदगी को दिल कहें और दिल को नज़राना कहें, थामें उस बुत की कलाई और कहें इस को जुनूँ चूम लें मुँह और इसे अंदाज़ ए रिंदाना कहें, सुर्ख़ी ए मय कम थी मैं ने छू लिए साक़ी के होंट सर झुका है जो भी अब अरबाब ए मयख़ाना कहें, तिश्नगी ही तिश्नगी है - [कहीं बे ख़याल हो कर युंही छू लिया किसी ने](https://bazmeshayari.com/kahin-be-khyaal-ho-kar-yunhi-choo-liya-kisi-ne/): कहीं बे ख़याल हो कर युंही छू लिया किसी ने कई ख़्वाब देख डाले यहाँ मेरी बे ख़ुदी ने, मेरे दिल मैं कौन है तू कि हुआ जहाँ अँधेरा वहीं सौ दिये जलाए तेरे रुख़ की चाँदनी ने, कभी इस परी का है कुछ कभी उस हसीं की महफ़िल मुझे दर ब दर फिराया मेरे दिल की सादगी ने, है भला सा नाम उस का मैं अभी से क्या बताऊँ किया बे क़रार हँस कर मुझे एक आदमी ने, अरे मुझ पे नाज़ वालो ये नियाज़ मंदियाँ क्यों है यही करम तुम्हारा तो मुझे न दोगे जीने..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी आ - [आ निकल के मैदाँ में दो रुख़ी के ख़ाने से](https://bazmeshayari.com/aa-nikal-ke-maidaan-me-do-rukhi-ke-khaane-se/): आ निकल के मैदाँ में दो रुख़ी के ख़ाने से काम चल नहीं सकता अब किसी बहाने से, अहद ए इंक़लाब आया दौर ए आफ़्ताब आया मुंतज़िर थीं ये आँखें जिस की एक ज़माने से, अब ज़मीन गाएगी हल के साज़ पर नग़्मे वादियों में नाचेंगे हर तरफ़ तराने से, अहल ए दिल उगाएँगे ख़ाक से मह ओ अंजुम अब गुहर सुबुक होगा जौ के एक दाने से, मनचले बुनेंगे अब रंग ओ बू के पैराहन अब सँवर के निकलेगा हुस्न कारख़ाने से, आम होगा अब हमदम सब पे फ़ैज़ फ़ितरत का भर सकेंगे अब दामन हम भी इस ख़ज़ाने - [अल्फाज़ के झूठे बंधन में](https://bazmeshayari.com/alfaz-ke-jhuthe-bandhan-me/): अल्फाज़ के झूठे बंधन में आगाज़ के गहरे परों में हर शख्स मुहब्बत करता है, हालाकिं मुहब्बत कुछ भी नहीं सब झूठे रिश्ते नाते हैं सब दिल रखने की बातें हैं, कब कौन किसी का होता है ? सब असली रूप छुपाते हैं, एहसास से खाली लोग यहाँ लफ़्ज़ों के तीर चलाते हैं, एक बार नज़र में आ के वो फिर सारी उम्र रुलाते हैं, खुलुस ओ मुहब्बत महर ओ वफ़ा सब रस्मी रस्मी बातें हैं, हर शख्स ख़ुद की मस्ती में बस अपनी खातिर जीता है..!! ~अज्ञात सू ए मक़्तल कि पए सैर ए चमन जाते हैं - [सू ए मक़्तल कि पए सैर ए चमन जाते हैं](https://bazmeshayari.com/soo-e-maqtal-ki-paye-sair-e-chaman-jaate-hain/): सू ए मक़्तल कि पए सैर ए चमन जाते हैं अहल ए दिल जाम ब कफ़ सर ब कफ़न जाते हैं, आ गई फ़स्ल ए जुनूँ कुछ तो करो दीवानो अब्र सहरा की तरफ़ साया फ़गन जाते हैं, उस को देखा नहीं तुम ने कि यही कूचा ओ राह शाख़ ए गुल शोख़ी ए रफ़्तार से बन जाते हैं, वो अगर बात न पूछे तो करें क्या हम भी आप ही रूठते हैं आप ही मन जाते हैं, बुलबुलो अपनी नवा फ़ैज़ है उन आँखों का जिन से हम सीखने अंदाज़ ए सुख़न जाते हैं, जो ठहरती तो ज़रा चलते - [गो रात मेरी सुब्ह की महरम तो नहीं है](https://bazmeshayari.com/go-raat-meri-subah-kee-marham-to-nahin-hai/): गो रात मेरी सुब्ह की महरम तो नहीं है सूरज से तेरा रंग ए हिना कम तो नहीं है, कुछ ज़ख़्म ही खाएँ चलो कुछ गुल ही खिलाएँ हर चंद बहाराँ का ये मौसम तो नहीं है, चाहे वो किसी का हो लहू दामन ए गुल पर सय्याद ये कल रात की शबनम तो नहीं है, इतनी भी हमें बंदिश ए ग़म कब थी गवारा पर्दे में तेरी काकुल ए पुरख़म तो नहीं है, अब कारगह ए दहर में लगता है बहुत दिल ऐ दोस्त कहीं ये भी तेरा ग़म तो नहीं है, सहरा में बगूला भी है मजरूह सबा - [निगाह ए साक़ी ए ना मेहरबाँ ये क्या जाने](https://bazmeshayari.com/nigaah-e-saaqi-e-na-meharbaan-ye-kya-jaane/): निगाह ए साक़ी ए ना मेहरबाँ ये क्या जाने कि टूट जाते हैं ख़ुद दिल के साथ पैमाने, मिली जब उन से नज़र बस रहा था एक जहाँ हटी निगाह तो चारों तरफ़ थे वीराने, हयात लग़्ज़िश ए पैहम का नाम है साक़ी लबों से जाम लगा भी सकूँ ख़ुदा जाने, तबस्सुमों ने निखारा है कुछ तो साक़ी के कुछ अहल ए ग़म के सँवारे हुए हैं मयख़ाने, ये आग और नहीं दिल की आग है नादाँ चराग़ हो कि न हो जल बुझेंगे परवाने, फ़रेब ए साक़ी ए महफ़िल न पूछिए मजरूह शराब एक है बदले हुए हैं पैमाने..!! - [तक़दीर का शिकवा बे मअ'नी](https://bazmeshayari.com/taqdeer-ka-shikwa-be-maanee/): तक़दीर का शिकवा बे मअ’नी जीना ही तुझे मंज़ूर नहीं, आप अपना मुक़द्दर बन न सके इतना तो कोई मजबूर नहीं, ये महफ़िल ए अहल ए दिल है यहाँ हम सब मयकश हम सब साक़ी, तफ़रीक़ करें इंसानों में इस बज़्म का ये दस्तूर नहीं, जन्नत ब निगह तसनीम ब लब अंदाज़ उस के ऐ शैख़ न पूछ, मैं जिस से मोहब्बत करता हूँ इंसाँ है ख़याली हूर नहीं, वो कौन सी सुब्हें हैं जिन में बेदार नहीं अफ़्सूँ तेरा, वो कौन सी काली रातें हैं जो मेरे नशे में चूर नहीं, सुनते हैं कि काँटे से गुल तक हैं - [उठाए जा उन के सितम और जिए जा](https://bazmeshayari.com/uthaye-jaa-un-ke-sitam-aur-jiye-jaa/): उठाए जा उन के सितम और जिए जा यूँ ही मुस्कुराए जा आँसू पिए जा, यही है मोहब्बत का दस्तूर ऐ दिल वो ग़म दे तुझे तू दुआएँ दिए जा, कभी वो नज़र जो समाई थी दिल में उसी एक नज़र का सहारा लिए जा, सताए ज़माना सितम ढाए दुनिया मगर तू किसी की तमन्ना किए जा..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी अब अहल ए दर्द ये जीने का एहतिमाम करें - [अब अहल ए दर्द ये जीने का एहतिमाम करें](https://bazmeshayari.com/ab-ahal-e-dard-ye-jeene-ka-ehtimam-karen/): अब अहल ए दर्द ये जीने का एहतिमाम करें उसे भुला के ग़म ए ज़िंदगी का नाम करें, फ़रेब खा के उन आँखों का कब तलक ऐ दिल शराब ए ख़ाम पिएँ रक़्स ए ना तमाम करें, ग़म ए हयात ने आवारा कर दिया वर्ना थी आरज़ू कि तेरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें, न माँगूँ बादा ए गुल गूँ से भीक मस्ती की अगर तेरे लब ए लालीं मेरा ये काम करें, न देखें दैर ओ हरम सू ए रह रवान ए हयात ये क़ाफ़िले तो न जाने कहाँ क़याम करें ? हैं इस कशाकश ए पैहम में - [दुश्मन की दोस्ती है अब अहल ए वतन के साथ](https://bazmeshayari.com/dushman-kee-dosti-hai-ab-ahal-e-watan-ke-saath/): दुश्मन की दोस्ती है अब अहल ए वतन के साथ है अब ख़िज़ाँ चमन में नए पैरहन के साथ, सर पर हवा ए ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ, किस ने कहा कि टूट गया ख़ंजर ए फ़रंग सीने पे ज़ख़्म ए नौ भी है दाग़ ए कुहन के साथ, झोंके जो लग रहे हैं नसीम ए बहार के जुम्बिश में है क़फ़स भी असीर ए चमन के साथ, मजरूह क़ाफ़िले की मेरे दास्ताँ ये है रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी हमें शुऊर ए जुनूँ है - [हमें शुऊर ए जुनूँ है कि जिस चमन में रहे](https://bazmeshayari.com/humen-shuoor-e-junoon-hai-ki-jis-chaman-me-rahen/): हमें शुऊर ए जुनूँ है कि जिस चमन में रहे निगाह बन के हसीनों की अंजुमन में रहे, तू ऐ बहार ए गुरेज़ाँ किसी चमन में रहे मेरे जुनूँ की महक तेरे पैरहन में रहे, मुझे नहीं किसी उसलूब ए शाइरी की तलाश तेरी निगाह का जादू मेरे सुख़न में रहे, न हम क़फ़स में रुके मिस्ल ए बू ए गुल सय्याद न हम मिसाल ए सबा हल्क़ा ए रसन में रहे, खुले जो हम तो किसी शोख़ की नज़र में खुले हुए गिरह तो किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे, सरिश्क रंग न बख़्शे तो क्यूँ हो बार ए - [मुझ से कहा जिब्रील ए जुनूँ ने ये भी वहइ ए इलाही है](https://bazmeshayari.com/mujh-se-kaha-jibreel-e-junoon-ne-ye-bhi-vahee-ilaahi-hai/): मुझ से कहा जिब्रील ए जुनूँ ने ये भी वहइ ए इलाही है मज़हब तो बस मज़हब ए दिल है बाक़ी सब गुमराही है, वो जो हुए फ़िरदौस बदर तक़्सीर थी वो आदम की मगर मेरा अज़ाब ए दर बदरी मेरी ना कर्दा गुनाही है, संग तो कोई बढ़ के उठाओ शाख़ ए समर कुछ दूर नहीं जिस को बुलंदी समझे हो उन हाथों की कोताही है, फिर कोई मंज़र फिर वही गर्दिश क्या कीजे ऐ कू ए निगार मेरे लिए ज़ंजीर ए गुलू मेरी आवारा निगाही है, बहर ए ख़ुदा ख़ामोश रहो बस देखते जाओ अहल ए नज़र क्या - [रहते थे कभी जिन के दिल में हम](https://bazmeshayari.com/rahte-the-kabhi-jin-ke-dil-me-hum/): रहते थे कभी जिन के दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह, बैठे हैं उन्ही के कूचे में हम आज गुनहगारों की तरह, दावा था जिन्हें हमदर्दी का ख़ुद आ के न पूछा हाल कभी, महफ़िल में बुलाया है हम पे हँसने को सितमगारों की तरह, बरसों के सुलगते तुम मन पर अश्कों के तो छींटे दे न सके, तपते हुए दिल के ज़ख़्मों पर बरसे भी तो अंगारों की तरह, सौ रूप भरे जीने के लिए बैठे हैं हज़ारों ज़हर पिए, ठोकर न लगाना हम ख़ुद हैं गिरती हुई दीवारों की तरह..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी मसर्रतों को ये - [मसर्रतों को ये अहल ए हवस न खो देते](https://bazmeshayari.com/masarraton-ko-ye-ahal-e-havas-na-kho-dete/): मसर्रतों को ये अहल ए हवस न खो देते जो हर ख़ुशी में तेरे ग़म को भी समो देते, कहाँ वो शब कि तेरे गेसुओं के साए में ख़याल ए सुब्ह से हम आस्तीं भिगो देते, बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए हम एक बार तेरी आरज़ू भी खो देते, बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना किनारे वाले सफ़ीना मेरा डुबो देते, जो देखते मेरी नज़रों पे बंदिशों के सितम तो ये नज़ारे मेरी बेबसी पे रो देते, कभी तो यूँ भी उमँडते सरिश्क ए ग़म मजरूह कि मेरे ज़ख़्म ए तमन्ना के दाग़ धो देते..!! - [शाम ए ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं](https://bazmeshayari.com/shaam-e-gam-kee-qasam-aaj-gamgeen-hain/): शाम ए ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं हम आ भी जा आ भी जा आज मेरे सनम, दिल परेशान है रात वीरान है देख जा किस तरह आज तन्हा हैं हम, चैन कैसा जो पहलू में तू ही नहीं मार डाले न दर्द ए जुदाई कहीं, रुत हसीं है तो क्या चाँदनी है तो क्या चाँदनी ज़ुल्म है और जुदाई सितम, अब तो आ जा कि अब रात भी सो गई ज़िंदगी ग़म के सहराओं में खो गई, ढूँढती है नज़र तू कहाँ है मगर देखते देखते आया आँखों में दम..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी ये रुके रुके से आँसू ये - [ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें](https://bazmeshayari.com/ye-ruke-ruke-se-aansoon-ye-dabi-dabi-see-aahen/): ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें यूँही कब तलक ख़ुदाया ग़म ए ज़िंदगी निबाहें, कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है तलाश ए दश्त ए रहबर कहीं जगमगा उठी हैं मेरे नक़्श ए पा से राहें, तेरे ख़ानुमाँ ख़राबों का चमन कोई न सहरा ये जहाँ भी बैठ जाएँ वहीं इन की बारगाहें, कभी जादा ए तलब से जो फिरा हूँ दिल शिकस्ता तेरी आरज़ू ने हँस कर वहीं डाल दी हैं बाँहें, मेरे अहद में नहीं है ये निशान ए सरबुलंदी ये रंगे हुए अमामे ये झुकी झुकी कुलाहें..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी किसी ने भी तो न - [किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे](https://bazmeshayari.com/kisi-ne-bhi-to-na-dekha-nigaah-bhar-ke-mujhe/): किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे गया फिर आज का दिन भी उदास कर के मुझे, सबा भी लाई न कोई पयाम अपनों का सुना रही है फ़साने इधर उधर के मुझे, मुआ’फ़ कीजे जो मैं अजनबी हूँ महफ़िल में कि रास्ते नहीं मालूम इस नगर के मुझे, वो दर्द है कि जिसे सह सकूँ न कह पाऊँ मिलेगा चैन तो अब जान से गुज़र के मुझे..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए - [मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए](https://bazmeshayari.com/mujhe-sahal-ho-gayi-manzilen-wo-hawa-ke-rukh-bhi-badal-gaye/): मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चराग़ राह में जल गए, वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए, वही बात जो वो न कह सके मेरे शेर ओ नग़्मा में आ गई वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दह ए शराब में ढल गए, वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं दिल ए ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए, तुझे चश्म - [आह ए जाँ सोज़ की महरूमी ए तासीर न देख](https://bazmeshayari.com/aah-e-jaan-soz-kee-mahrumi-e-taasir-na-dekh/): आह ए जाँ सोज़ की महरूमी ए तासीर न देख हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न देख, हादसे और भी गुज़रे तेरी उल्फ़त के सिवा हाँ मुझे देख मुझे अब मेरी तस्वीर न देख, ये ज़रा दूर पे मंज़िल ये उजाला ये सुकूँ ख़्वाब को देख अभी ख़्वाब की ताबीर न देख, देख ज़िंदाँ से परे रंग ए चमन जोश ए बहार रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख, कुछ भी हूँ फिर भी दुखे दिल की सदा हूँ नादाँ मेरी बातों को समझ तल्ख़ी ए तक़रीर न देख, वही मजरूह वही शाइर ए आवारा - [ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो](https://bazmeshayari.com/ae-dil-mujhe-aisi-jagah-le-chal-jahan-koi-na-ho/): ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो अपना पराया मेहरबाँ ना मेहरबाँ कोई न हो, जा कर कहीं खो जाऊँ मैं नींद आए और सो जाऊँ मैं दुनिया मुझे ढूँडे मगर मेरा निशाँ कोई न हो, उल्फ़त का बदला मिल गया वो ग़म लुटा वो दिल गया चलना है सब से दूर दूर अब कारवाँ कोई न हो..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा - [तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा](https://bazmeshayari.com/tujhe-kya-sunaaoon-main-dilruba/): तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा तेरे सामने मेरा हाल है, तेरी एक निगाह की बात है मेरी ज़िंदगी का सवाल है, मेरी हर ख़ुशी तेरे दम से है मेरी ज़िंदगी तेरे ग़म से है, तेरे दर्द से रहे बे ख़बर मेरे दिल की कब ये मजाल है ? तेरे हुस्न पर है मेरी नज़र मुझे सुब्ह शाम की क्या ख़बर ? मेरी शाम है तेरी जुस्तुजू मेरी सुब्ह तेरा ख़याल है, मेरे दिल जिगर में समा भी जा रहे क्यों नज़र का भी फ़ासला, कि तेरे बग़ैर तो जान ए जाँ मुझे ज़िंदगी भी मुहाल है..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी जला के - [जला के मिशअल ए जाँ हम जुनूँ सिफ़ात चले](https://bazmeshayari.com/jala-ke-mishaal-e-jaan-hum-junoon-sifaat-chale/): जला के मिशअल ए जाँ हम जुनूँ सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले, दयार ए शाम नहीं मंज़िल ए सहर भी नहीं अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले, हमारे लब न सही वो दहान ए ज़ख़्म सही वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले, सुतून ए दार पे रखते चलो सरों के चराग़ जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले, हुआ असीर कोई हमनवा तो दूर तलक ब पास ए तर्ज़ ए नवा हम भी साथ साथ चले, बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द ए वफ़ा अगरचे लुटते - [हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो](https://bazmeshayari.com/hum-ko-junoon-kya-sikhlaate-ho/): हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुम से ज़्यादा, चाक किए हैं हम ने अज़ीज़ो चार गरेबाँ तुम से ज़्यादा, चाक ए जिगर मोहताज ए रफ़ू है आज तो दामन सर्फ़ ए लहू है, एक मौसम था हम को रहा है शौक़ ए बहाराँ तुम से ज़्यादा, अहद ए वफ़ा यारों से निभाएँ नाज़ ए हरीफ़ाँ हँस के उठाएँ, जब हमें अरमाँ तुम से सिवा था अब हैं पशेमाँ तुम से ज़्यादा, हम भी हमेशा क़त्ल हुए और तुम ने भी देखा दूर से लेकिन, ये न समझना हम को हुआ है जान का नुक़साँ तुम से - [जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम ए जाँ बनता गया](https://bazmeshayari.com/jab-hua-irfaan-to-gam-aaraam-e-jaan-banta-gaya/): जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम ए जाँ बनता गया सोज़ ए जानाँ दिल में सोज़ ए दीगराँ बनता गया, रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म ए चमन धीरे धीरे नग़्मा ए दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया, मैं अकेला ही चला था जानिब ए मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया, मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र ए हर ख़ास ओ आम यूँ तो जो आया वही पीर ए मुग़ाँ बनता गया, जिस तरफ़ भी चल पड़े हम आबला पायान ए शौक़ ख़ार से गुल और गुल से गुलसिताँ बनता गया, शरह ए ग़म तो - [यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं](https://bazmeshayari.com/yun-to-aapas-me-bigadte-hain-khafa-hote-hain/): यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं, हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं, हाल ए दिल मुझ से न पूछो मेरी नज़रें देखो राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं, मिलने को यूँ तो मिला करती हैं सब से आँखें दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं, ऐसे हँस हँस के न देखा करो सब की जानिब लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह - [हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह](https://bazmeshayari.com/hum-hain-mataa-e-kucha-o-baazar-kee-tarah/): हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह, इस कू ए तिश्नगी में बहुत है कि एक जाम हाथ आ गया है दौलत ए बेदार की तरह, वो तो कहीं है और मगर दिल के आस पास फिरती है कोई शय निगह ए यार की तरह, सीधी है राह ए शौक़ पे यूँही कहीं कहीं ख़म हो गई है गेसू ए दिलदार की तरह, बे तेशा ए नज़र न चलो राह ए रफ़्तगाँ हर नक़्श ए पा बुलंद है दीवार की तरह, अब जा के कुछ खुला हुनर ए नाख़ुन ए जुनूँ - [कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा](https://bazmeshayari.com/koi-humdam-na-raha-koi-sahara-na-raha/): कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा, शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा, ऐ नज़ारो न हँसो मिल न सकूँगा तुम से तुम मेरे हो न सके मैं भी तुम्हारा न रहा, क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँही चला जाता हूँ जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे - [हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे](https://bazmeshayari.com/humare-baad-ab-mahfil-me-afsaane-bayaan-honge/): हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे बहारें हम को ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे, इसी अंदाज़ से झूमेगा मौसम गाएगी दुनिया मोहब्बत फिर हसीं होगी नज़ारे फिर जवाँ होंगे, न हम होंगे न तुम होगे न दिल होगा मगर फिर भी हज़ारों मंज़िलें होंगी हज़ारों कारवाँ होंगे..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी मिट्टी की सुराही है - [मिट्टी की सुराही है](https://bazmeshayari.com/mitti-kee-suraahi-hai/): मिट्टी की सुराही है पानी की गवाही है, उश्शाक़ नहीं हम लोग पर रंग तो काही है, हर ग़ुंचा ए लब दरबाँ हर शाख़ सिपाही है, सब्ज़े पे खिंचा नक़्शा और सुर्ख़ सियाही है, एक साँवली पतझड़ के पुश्ते पे तबाही है, उधड़ी हुई क़ब्रों पर कत्बों की मनाही है, ऐ काँच की सी पिंडली ये शहर ए सबा ही है..!! ~आमिर सुहैल रस्ते में अजब आसार मिले - [रस्ते में अजब आसार मिले](https://bazmeshayari.com/raste-me-azab-aasaar-mile/): रस्ते में अजब आसार मिले जूँ कोई पुराना यार मिले, जिस तरह कड़कती धूपों में दो जिस्मों को दीवार मिले, जिस तरह मुसाफ़िर गाड़ी में एक रिश्ते की महकार मिले, जिस तरह पुराने कपड़ों से एक चूड़ी खुशबू दार मिले, जिस तरह अँधेरे खेतों में एक रुत मशअ’ल बरदार मिले, जिस तरह कोई हँसमुख बालक जिस तरह ग़सीली नार मिले, जिस तरह इकहरे भादों से एक पानी की बौछार मिले, जूँ एक सीपी में ला’ल पड़े जूँ मोती दजला पार मिले, जूँ घाव भरे नासूर सा एक जूँ सपनों को चहकार मिले, जिस तरह यतीमी को आमिर एक भरा पुरा - [एक वज़ीफ़ा है किसी दर्द का दोहराया हुआ](https://bazmeshayari.com/ek-vazeefa-hai-kisi-dard-ka-dohraya-hua/): एक वज़ीफ़ा है किसी दर्द का दोहराया हुआ जिस की ज़द में है पहाड़ों का धुआँ आया हुआ, ये तेरे इश्क़ की मीक़ात ये होनी की अदा धूप के शीशे में एक ख़्वाब सा फैलाया हुआ, बाँध लेते हैं गिरह में उसी मंज़र की धनक हम ने मेहमान को कुछ देर है ठहराया हुआ, ताइरो अब्र ओ हवा भी हैं इसी उलझन में कैसे दो होंटों ने एक बाग़ है दहकाया हुआ, छेद हैं उम्र की पोशाक पे तन्हाई के ख़ुशनुमा क़रियों में हूँ आप से उकताया हुआ, रात आती है तो रख देती है फाहा दिल पर वर्ना इस - [अदा है ख़्वाब है तस्कीन है तमाशा है](https://bazmeshayari.com/adaa-hai-khwab-hai-taskeen-hai-tamaasha-hai/): अदा है ख़्वाब है तस्कीन है तमाशा है हमारी आँख में एक शख़्स बे तहाशा है, ज़रा सी चाय गिरी और दाग़ दाग़ वरक़ ये ज़िंदगी है कि अख़बार का तराशा है, तुम्हारा बोलता चेहरा पलक से छू छू कर ये रात आईना की है ये दिन तराशा है, तेरे वजूद से बारा दरी दमक उठी कि फूल पल्लू सरकने से इर्तिआशा है, मैं बे ज़बाँ नहीं जो बोलता हूँ लिख लिख कर मेरी ज़बान तले ज़हर का बताशा है, तुम्हारी याद के चर्कों से लख़्त लख़्त है जी कि ख़ंजरों से किसी ने बदन को क़ाशा है, जहान भर - [अब तुम को ही सावन का संदेसा नहीं बनना](https://bazmeshayari.com/ab-tum-ko-hi-savan-ka-sandesa-nahi-banana/): अब तुम को ही सावन का संदेसा नहीं बनना मुझ को भी किसी और का रस्ता नहीं बनना, कहती है कि आँखों से समुंदर को निकालो हँसती है कि तुम से तो किनारा नहीं बनना, मोहतात है इतनी कि कभी ख़त नहीं लिखती कहती है मुझे औरों के जैसा नहीं बनना, तस्वीर बनाऊँ तो बिगड़ जाती है मुझ से ऐसा नहीं बनना मुझे वैसा नहीं बनना, इस तरह के लब कौन तराशेगा दोबारा इस तरह का चेहरा तो किसी का नहीं बनना, चेहरे पे किसी और की पलकें नहीं झुकती आँखों में किसी और का नक़्शा नहीं बनना, मैं सोच - [आराइश ए ख़याल भी हो दिलकुशा भी हो](https://bazmeshayari.com/aaraaesh-e-khyal-bhi-ho-dilkusha-bhi-ho/): आराइश ए ख़याल भी हो दिलकुशा भी हो वो दर्द अब कहाँ जिसे जी चाहता भी हो, ये क्या कि रोज़ एक सा ग़म एक सी उमीद इस रंज ए बेख़ुमार की अब इंतिहा भी हो, ये क्या कि एक तौर से गुज़रे तमाम उम्र जी चाहता है अब कोई तेरे सिवा भी हो, टूटे कभी तो ख़्वाब ए शब ओ रोज़ का तिलिस्म इतने हुजूम में कोई चेहरा नया भी हो, दीवानगी ए शौक़ को ये धुन है इन दिनों घर भी हो और बे दर ओ दीवार सा भी हो, जुज़ दिल कोई मकान नहीं दहर में जहाँ - [किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे](https://bazmeshayari.com/kisi-kali-ne-bhi-dekha-na-aankh-bhar-ke-mujhe/): किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे गुज़र गई जरस ए गुल उदास कर के मुझे, मैं सो रहा था किसी याद के शबिस्ताँ में जगा के छोड़ गए क़ाफ़िले सहर के मुझे, मैं रो रहा था मुक़द्दर की सख़्त राहों में उड़ा के ले गए जादू तिरी नज़र के मुझे, मैं तेरे दर्द की तुग़्यानियों में डूब गया पुकारते रहे तारे उभर उभर के मुझे, तिरे फ़िराक़ की रातें कभी न भूलेंगी मज़े मिले उन्हीं रातों में उम्र भर के मुझे, ज़रा सी देर ठहरने दे ऐ ग़म ए दुनिया बुला रहा है कोई बाम से - [तेरी ज़ुल्फ़ों के बिखरने का सबब है कोई](https://bazmeshayari.com/teri-zulfon-ke-bikharne-ka-sabab-hai-koi/): तेरी ज़ुल्फ़ों के बिखरने का सबब है कोई आँख कहती है तेरे दिल में तलब है कोई, आँच आती है तेरे जिस्म की उर्यानी से पैरहन है कि सुलगती हुई शब है कोई, होश उड़ाने लगीं फिर चाँद की ठंडी किरनें तेरी बस्ती में हूँ या ख़्वाब ए तरब है कोई, गीत बुनती है तेरे शहर की भरपूर हवा अजनबी मैं ही नहीं तू भी अजब है कोई, लिए जाती हैं किसी ध्यान की लहरें नासिर दूर तक सिलसिला ए ताक ए तरब है कोई..!! ~नासिर काज़मी वो इस अदा से जो आए तो क्यूँ भला न लगे - [वो इस अदा से जो आए तो क्यूँ भला न लगे](https://bazmeshayari.com/wo-is-adaa-se-jo-aaye-to-kyun-bhala-na-lage/): वो इस अदा से जो आए तो क्यूँ भला न लगे हज़ार बार मिलो फिर भी आश्ना न लगे, कभी वो ख़ास इनायत कि सौ गुमाँ गुज़रे कभी वो तर्ज़ ए तग़ाफ़ुल कि महरमाना लगे, वो सीधी सादी अदाएँ कि बिजलियाँ बरसें वो दिल बराना मुरव्वत कि आशिक़ाना लगे, दिखाऊँ दाग़ ए मोहब्बत जो नागवार न हो सुनाऊँ क़िस्सा ए फ़ुर्क़त अगर बुरा न लगे, बहुत ही सादा है तू और ज़माना है अय्यार ख़ुदा करे कि तुझे शहर की हवा न लगे, बुझा न दें ये मुसलसल उदासियाँ दिल को वो बात कर कि तबीअत को ताज़ियाना लगे, जो - [जब रात गए तेरी याद आई सौ तरह से जी को बहलाया](https://bazmeshayari.com/jab-raat-gaye-teri-yaad-aayi-sau-tarah-se-jee-ko-bahalaya/): जब रात गए तेरी याद आई सौ तरह से जी को बहलाया कभी अपने ही दिल से बातें कीं कभी तेरी याद को समझाया, यूँही वक़्त गँवाया मोती सा यूँही उम्र गँवाई सोना सी सच कहते हो तुम हम सुख़नो इस इश्क़ में हम ने क्या पाया ? जब पहले पहल तुझे देखा था दिल कितने ज़ोर से धड़का था वो लहर न फिर दिल में जागी वो वक़्त न लौट के फिर आया, फिर आज तेरे दरवाज़े पर बड़ी देर के बा’द गया था मगर एक बात अचानक याद आई मैं बाहर ही से लौट आया..!! ~नासिर काज़मी तेरे - [तेरे ख़याल से लो दे उठी है तन्हाई](https://bazmeshayari.com/tere-khyal-se-lau-de-uthi-hai-tanhaai/): तेरे ख़याल से लो दे उठी है तन्हाई शब ए फ़िराक़ है या तेरी जल्वा आराई, तू किस ख़याल में है मंज़िलों के शैदाई उन्हें भी देख जिन्हें रास्ते में नींद आई, पुकार ऐ जरस ए कारवान ए सुब्ह ए तरब भटक रहे हैं अँधेरों में तेरे सौदाई, ठहर गए हैं सर ए राह ख़ाक उड़ाने को मुसाफ़िरों को न छेड़ ऐ हवा ए सहराई, रह ए हयात में कुछ मरहले तो देख लिए ये और बात तेरी आरज़ू न रास आई, ये सानिहा भी मोहब्बत में बार हा गुज़रा कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई, - [कौन उस राह से गुज़रता है](https://bazmeshayari.com/kaun-us-raah-se-guzarta-hai/): कौन उस राह से गुज़रता है दिल यूँही इंतिज़ार करता है, देख कर भी न देखने वाले दिल तुझे देख देख डरता है, शहर ए गुल में कटी है सारी रात देखिए दिन कहाँ गुज़रता है, ध्यान की सीढ़ियों पे पिछले पहर कोई चुपके से पाँव धरता है, दिल तो मेरा उदास है नासिर शहर क्यूँ साएँ साएँ करता है..?? ~नासिर काज़मी देख मोहब्बत का दस्तूर - [देख मोहब्बत का दस्तूर](https://bazmeshayari.com/dekh-mohabbat-ka-dastoor/): देख मोहब्बत का दस्तूर तू मुझ से मैं तुझ से दूर, तन्हा तन्हा फिरते हैं दिल वीराँ आँखें बेनूर, दोस्त बिछड़ते जाते हैं शौक़ लिए जाता है दूर, हम अपना ग़म भूल गए आज किसे देखा मजबूर ? दिल की धड़कन कहती है आज कोई आएगा ज़रूर, कोशिश लाज़िम है प्यारे आगे जो उस को मंज़ूर, सूरज डूब चला नासिर और अभी मंज़िल है दूर..!! ~नासिर काज़मी तुम आ गए हो तो क्यूँ इंतिज़ार ए शाम करें - [तुम आ गए हो तो क्यूँ इंतिज़ार ए शाम करें](https://bazmeshayari.com/tum-aa-gaye-ho-to-kyun-intizar-e-sham-karen/): तुम आ गए हो तो क्यूँ इंतिज़ार ए शाम करें कहो तो क्यूँ न अभी से कुछ एहतिमाम करें, ख़ुलूस ओ मेहर ओ वफ़ा लोग कर चुके हैं बहुत मेरे ख़याल में अब और कोई काम करें, ये ख़ास ओ आम की बेकार गुफ़्तुगू कब तक क़ुबूल कीजिए जो फ़ैसला अवाम करें, हर आदमी नहीं शाइस्ता ए रुमूज़ ए सुख़न वो कम सुख़न हो मुख़ातब तो हम कलाम करें, जुदा हुए हैं बहुत लोग एक तुम भी सही अब इतनी बात पे क्या ज़िंदगी हराम करें, ख़ुदा अगर कभी कुछ इख़्तियार दे हम को तू पहले ख़ाक नशीनों का इंतिज़ाम - [शहर सुनसान है किधर जाएँ](https://bazmeshayari.com/shahar-sunsan-hai-kidhar-jaayen/): शहर सुनसान है किधर जाएँ ख़ाक हो कर कहीं बिखर जाएँ रात कितनी गुज़र गई लेकिन इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ, यूँ तेरे ध्यान से लरज़ता हूँ जैसे पत्ते हवा से डर जाएँ, उन उजालों की धुन में फिरता हूँ छब दिखाते ही जो गुज़र जाएँ, रैन अँधेरी है और किनारा दूर चाँद निकले तो पार उतर जाएँ..!! ~नासिर काज़मी गिरफ़्ता दिल हैं बहुत आज तेरे दीवाने - [गिरफ़्ता दिल हैं बहुत आज तेरे दीवाने](https://bazmeshayari.com/girafta-dil-hai-bahut-aaj-tere-deewane/): गिरफ़्ता दिल हैं बहुत आज तेरे दीवाने ख़ुदा करे कोई तेरे सिवा न पहचाने, मिटी मिटी सी उमीदें थके थके से ख़याल बुझे बुझे से निगाहों में ग़म के अफ़्साने, हज़ार शुक्र कि हम ने ज़बाँ से कुछ न कहा ये और बात कि पूछा न अहल ए दुनिया ने, ब क़द्र ए तिश्नालबी पुर्सिश ए वफ़ा न हुई छलक के रह गए तेरी नज़र के पैमाने, ख़याल आ गया मानूस रहगुज़ारों का पलट के आ गए मंज़िल से तेरे दीवाने, कहाँ है तू कि तेरे इंतिज़ार में ऐ दोस्त तमाम रात सुलगते हैं दिल के वीराने, उमीद ए पुर्सिश - [तार ए शबनम की तरह सूरत ए ख़स टूटती है](https://bazmeshayari.com/taar-e-shabnam-kee-tarah-soorat-e-khas-tutati-hai/): तार ए शबनम की तरह सूरत ए ख़स टूटती है आस बँधने नहीं पाती है कि बस टूटती है, आरज़ूओं का हुजूम और ये ढलती हुई उम्र साँस उखड़ती है न ज़ंजीर ए हवस टूटती है, गर्द इतनी कि सुझाई नहीं देता कुछ भी शोर इतना है कि आवाज़ ए जरस टूटती है, मुंहदिम होता चला जाता है दिल साल ब साल ऐसा लगता है गिरह अब के बरस टूटती है, बू ए गुल आए न आए मगर उश्शाक़ के बीच इतनी वहशत है कि दीवार ए क़फ़स टूटती है, ज़िक्र अस्मा ए इलाही का है फ़ैज़ान कि अब दम - [ख़्वाब में मंज़र रह जाता है](https://bazmeshayari.com/khwab-me-manzar-rah-jaata-hai/): ख़्वाब में मंज़र रह जाता है तकिए पर सर रह जाता है, आ पड़ती है झील आँखों में हाथ में पत्थर रह जाता है, रोज़ किसी हैरत का धब्बा आईने पर रह जाता है, दिल में बसने वाला एक दिन जेब के अंदर रह जाता है, नदिया पर मिलने का वा’दा मेज़ के ऊपर रह जाता है, साल गुज़र जाता है सारा और कैलन्डर रह जाता है, आँगन की ख़्वाहिश में कोई बाम के ऊपर रह जाता है, लग जाती है नाव उस पार और समुंदर रह जाता है, रुख़्सत होते होते कोई दरवाज़े पर रह जाता है..!! ~सरफ़राज़ ज़ाहिद - [उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर](https://bazmeshayari.com/umr-bhar-chalte-rahe-hum-waqt-kee-talwar-par/): उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर परवरिश पाई है अपने ख़ून ही की धार पर, चाहने वाले की एक ग़लती से बरहम हो गया फ़ख़्र था कितना उसे ख़ुद प्यार के मेआ’र पर, रात गहरी मेरी तन्हाई का सागर और फिर तेरी यादों के सुलगते दीप हर मंजधार पर, शाम आई और सब शाख़ों की गलियाँ सो गईं मौत का साया सा मंडलाने लगा अश्जार पर, ख़ल्वत ए शब में ये अक्सर सोचता क्यूँ हूँ कि चाँद नूर का बोसा है गोया रात के रुख़्सार पर, साल ए नौ आता है तो महफ़ूज़ कर लेता हूँ मैं - [कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे](https://bazmeshayari.com/kashtee-havas-hawaaon-ke-rukh-par-utaar-de/): कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे खोए होऊँ से मिल ये दलद्दर उतार दे, बे सम्त की उड़ान है शोख़ी शबाब की उस छत पे आज तू ये कबूतर उतार दे, मैं इतना बद मआ’श नहीं या’नी खुल के बैठ चुभने लगी है धूप स्वेटर उतार दे, दिन रात यूँ न ख़ौफ़ का गट्ठर उठाए फिर ये बोझ अपने सर से झटक कर उतार दे, उस की ही आब ओ ताब से रौशन हो रेग ए दिल ये तेग़ मेरे सीने के अंदर उतार दे, चेहरे से झाड़ पिछले बरस की कुदूरतें दीवार से पुराना कैलेंडर उतार दे, - [हर चौक पे भाषण हैं, हर मंच पे क़सम का शोर](https://bazmeshayari.com/har-chauk-pe-bhashan-hai-har-manch-pe-qasam-ka-shor/): हर चौक पे भाषण हैं, हर मंच पे क़सम का शोर पर रोटी की कतार में आज भी वही हैरानी होगी, तख़्त भी बदल जाएँगे चेहरे भी नए आ जाएँगे सत्ता की फ़ितरत मगर सदियों से सियानी होगी, क़ाग़ज़ पे सुनहरे ख़्वाब मगर ज़मीं पे धूल ही धूल विकास की तस्वीर फिर से सिर्फ़ ज़ुबानी होगी, आवाज़ जो उठेगी वो पहले ही कुचल दी जाएगी ख़ामोशी यहाँ जनता की सबसे बड़ी कहानी होगी, इंक़लाब के नारे हैं, पर डर की निगहबानी है क़ानून की आँखों पर पट्टी सियासी मेहरबानी होगी, अहल ए चमन पूछते हैं तो कहते हैं सब्र रखना - [रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में](https://bazmeshayari.com/raqs-karne-ka-mila-huqm-jo-dariyaaon-me/): रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में हम ने ख़ुश हो के भँवर बाँध लिए पाँव में, उन को भी है किसी भीगे हुए मंज़र की तलाश बूँद तक भी न बो सके जो कभी सहराओं में, ए मेरे हम सफ़रो तुम भी थके हारे हो धूप की तुम तो मिलावट न करो छाँव में, जो भी आता है बताता है नया कोई इलाज बट न जाए तेरा बीमार मसीहाओं में, हौसला किस में है यूसुफ़ की ख़रीदारी का अब तो महँगाई के चर्चे हैं ज़ुलेख़ाओं में, जिस बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है उस को - [जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी](https://bazmeshayari.com/jis-taraf-chahoon-pahunch-jaaoon-masafat-kaisi/): जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी मैं तो आवाज़ हूँ आवाज़ की हिजरत कैसी ? सुनने वालों की समाअत गई गोयाई भी क़िस्सा गो तू ने सुनाई थी हिकायत कैसी ? हम जुनूँ वाले हैं हम से कभी पूछो प्यारे दश्त कहते हैं किसे दश्त की वहशत कैसी ? आप के ख़ौफ़ से कुछ हाथ बढ़े हैं लेकिन दस्त ए मजबूर की सहमी हुई बैअत कैसी ? फिर नए साल की सरहद पे खड़े हैं हम लोग राख हो जाएगा ये साल भी हैरत कैसी ? और कुछ ज़ख़्म मेरे दिल के हवाले मेरी जाँ ये मोहब्बत है मोहब्बत - [यकुम जनवरी है नया साल है](https://bazmeshayari.com/yakum-janvari-hai-naya-saal-hai/): यकुम जनवरी है नया साल है दिसम्बर में पूछूँगा क्या हाल है ? बचाए ख़ुदा शर की ज़द से उसे बिचारा बहुत नेक आमाल है, बताने लगा रात बूढ़ा फ़क़ीर ये दुनिया हमेशा से कंगाल है, है दरिया में कच्चा घड़ा सोहनी किनारे पे गुम सुम महीवाल है, मैं रहता हूँ हर शाम शिकवा ब लब मेरे पास दीवान ए इक़बाल है..!! ~अमीर क़ज़लबाश मैं उससे जुदा वो मुझसे जुदा - [मैं उससे जुदा वो मुझसे जुदा](https://bazmeshayari.com/main-usse-juda-wo-mujh-se-juda/): मैं उससे जुदा वो मुझसे जुदा ये दोनों बातें एक सी हैं, आकाश में चाँद भी तारे भी दोनों की रातें एक सी हैं, ये बात अलग आकाश था वो मैं धरती था वो नभ मेरा, अब किस से मैं ये बतलाऊँ आकाश रहा ना अब मेरा, तारा टूटे तो दुआ करूँ वो ठीक रहे ख़ुशहाल रहे, कैसा भी पिछला साल गया ये साल तो अच्छा साल रहे..!! ~अन्नू रिज़वी   - [वल्लाह किस जुनूँ के सताए हुए हैं लोग](https://bazmeshayari.com/vallah-kis-junoon-ke-sataye-hue-hai-log-2/): वल्लाह किस जुनूँ के सताए हुए हैं लोग हमसाए के लहू में नहाए हुए हैं लोग, ये तिश्नगी गवाह है घायल है इनकी रूह चेहरे ही तबस्सुम से सजाए हुए हैं लोग, ग़ैरत मरी तो वाक़ई इंसान मर गया जीने की सिर्फ़ रस्म निभाए हुए हैं लोग, कहने को कह रहे हैं मुबारक हो नया साल खंज़र भी आस्तीं में छुपाए हुए हैं लोग..!! ~अदम गोंडवी सहर ने मसर्रत का नग़्मा सुनाया - [सहर ने मसर्रत का नग़्मा सुनाया](https://bazmeshayari.com/sahar-ne-masarrat-ka-nagma-sunaya/): सहर ने मसर्रत का नग़्मा सुनाया फ़ज़ा ने गुलिस्ताँ का दामन सजाया, हवाओं ने अख़्लाक़ का गीत गाया निगाहों से माज़ी का पर्दा उठाया, नया साल आया नया साल आया मसर्रत मसर्रत के गुन गा रही है, मुसावात के फूल बरसा रही है सदा ए सलामत रवी आ रही है, ज़मीं मुस्कुराई फ़लक मुस्कुराया नया साल आया नया साल आया, ये हिन्दोस्ताँ एक आवाज़ होगा अब इंसान इंसान का दमसाज़ होगा, नए दौर का फिर से आग़ाज़ होगा नया सन नई रुत का पैग़ाम लाया, नया साल आया नया साल आया तअ’स्सुब की परछाइयाँ अब न होंगी, वो पिछली सफ़ - [गुफ़्तुगू जो होती है साल ए नौ से अम्बर की](https://bazmeshayari.com/guftagoo-jo-hoti-hai-saal-e-nau-se-ambar-kee/): गुफ़्तुगू जो होती है साल ए नौ से अम्बर की गर्म होने लगती हैं सर्दियाँ दिसम्बर की, जाने वाले लम्हे तो लौट कर नहीं आते कारोबार ए दुनिया के पर ये रुक नहीं पाते, क्यों न मसअले सारे इस तरह से हल कर लें साल ए नौ के हर पल को प्यार की ग़ज़ल कर लें, सज्दा ए मोहब्बत से आओ मो’तबर कर दें साल ए नौ के आँगन को ख़ुशबुओं का घर कर दें, तन बदन उम्मीदों के फिर से महके महके हैं रुख़ नई तमाज़त से ख़्वाहिशों के दहके हैं, एक नया वरक़ खोलें हम किताब ए हस्ती - [मुबारक मुबारक नया साल सब को](https://bazmeshayari.com/mubarak-mubarak-naya-saal-sab-ko/): मुबारक मुबारक नया साल सब को न चाहा था हम ने तू हम से जुदा हो, मगर किस ने रोका है बहती हवा को जो हम चाहते हैं वो कैसे भला हो, ऐ जाते बरस तुझ को सौंपा ख़ुदा को मुबारक मुबारक नया साल सब को, मुबारक घड़ी में ये हम अहद कर लें ब सद शान हम ज़िंदगी में सँवर लें, गुलों की तरह गुलिस्ताँ में निखर लें बनें हम भी सूरज गगन में उभर लें, मुबारक मुबारक नया साल सब को अँधेरों ने लूटी उजालों की दौलत, उड़ा ले गया वक़्त एक ख़्वाब ए राहत न लौटेगी बीती - [एक बरस और कट गया शारिक़](https://bazmeshayari.com/ek-baras-aur-kat-gaya-shariq/): एक बरस और कट गया शारिक़ रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए, सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए, और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता, अब भी मरने को जी नहीं करता एक बरस और कट गया..!! ~शारिक़ कैफ़ी ऐ नए साल बता तुझ में नयापन क्या है - [ऐ नए साल बता तुझ में नयापन क्या है](https://bazmeshayari.com/ae-naye-saal-bata-tujh-me-nayapan-kya-hai/): ऐ नए साल बता तुझ में नयापन क्या है हर तरफ़ ख़ल्क़ ने क्यों शोर मचा रखा है ? रौशनी दिन की वही तारों भरी रात वही आज हम को नज़र आती है हर एक बात वही, आसमान बदला है अफ़्सोस ना बदली है ज़मीं एक हिंदिसे का बदलना कोई जिद्दत तो नहीं, अगले बरसों की तरह होंगे क़रीने तेरे किसे मालूम नहीं बारह महीने तेरे, जनवरी फ़रवरी मार्च में पड़ेगी सर्दी और अप्रैल मई जून में हो गी गर्मी, तेरा मन दहर में कुछ खोएगा कुछ पाएगा अपनी मीआ’द बसर कर के चला जाएगा, तू नया है तो दिखा - [नहीं काम रखना कोई दिल लगी से यकुम जनवरी से](https://bazmeshayari.com/nahi-kaam-rakhna-koi-dil-lagi-se-yakum-janwari-se/): नहीं काम रखना कोई दिल लगी से यकुम जनवरी से गुज़रना नहीं अब तुम्हारी गली से यकुम जनवरी से, गुज़िश्ता बरस सब के नख़रे उठाए मगर कुछ न पाया नहीं मुझ को करनी मोहब्बत किसी से यकुम जनवरी से, दिसम्बर के आख़िर में अपने गुनाहों से तौबा करूँगा फ़रिश्ता ही बन जाउँगा आदमी से यकुम जनवरी से, ख़ुशी क्या मनाऊँ कि दिल ग़मज़दा है नए साल पर भी कि एक कम हुआ है बरस ज़िंदगी से यकुम जनवरी से..!! ~फख़्र अब्बास पिछले बरस तुम साथ थे मेरे और दिसम्बर था - [पिछले बरस तुम साथ थे मेरे और दिसम्बर था](https://bazmeshayari.com/pichhle-baras-tum-saath-the-mere-aur-december-tha/): पिछले बरस तुम साथ थे मेरे और दिसम्बर था महके हुए दिन रात थे मेरे और दिसम्बर था, चाँदनी रात थी सर्द हवा से खिड़की बजती थी उन हाथों में हाथ थे मेरे और दिसम्बर था, बारिश की बूंदों से दिल पे दस्तक होती थी सब मौसम बरसात थे मेरे और दिसम्बर था, भीगी ज़ुल्फ़ें भीगा आँचल नींद थी आँखों में कुछ ऐसे हालात थे मेरे और दिसम्बर था, धीरे धीरे भड़क रही थी आतिश दान की आग बहके हुए जज़्बात थे मेरे और दिसम्बर था, प्यार भरी नज़रों से फ़रह जब उस ने देखा था बस वो ही लम्हात - [नतीजा फिर वही होगा सुना है साल बदलेगा](https://bazmeshayari.com/nateeja-fir-wahi-hoga-suna-hai-saal-badlega/): नतीजा फिर वही होगा सुना है साल बदलेगा परिंदे फिर वही होंगे शिकारी जाल बदलेगा, बदलना है तो दिन बदलो बदलते क्यूँ हो हिंदिसे को ? महीने फिर वही होंगे सुना है साल बदलेगा, वही हाकिम वही ग़ुरबत वही क़ातिल वही ज़ालिम बताओ कितने सालों में हमारा हाल बदलेगा..?? ~अज्ञात नासिर क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है - [नासिर क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है](https://bazmeshayari.com/naasir-kya-kahta-firta-hai-kuch-na-suno-to-behtar-hai/): नासिर क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है दीवाना है दीवाने के मुँह न लगो तो बेहतर है, कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जाएगा रूखी सूखी जो मिल जाए शुक्र करो तो बेहतर है, कल ये ताब ओ तवाँ न रहेगी ठंडा हो जाएगा लहू नाम ए ख़ुदा हो जवान अभी कुछ कर गुज़रो तो बेहतर है, क्या जाने क्या रुत बदले हालात का कोई ठीक नहीं अब के सफ़र में तुम भी हमारे साथ चलो तो बेहतर है, कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिए - [सफ़र ए मंज़िल ए शब याद नहीं](https://bazmeshayari.com/safar-e-manzil-e-shab-yaad-nahi/): सफ़र ए मंज़िल ए शब याद नहीं लोग रुख़्सत हुए कब याद नहीं, अव्वलीं क़ुर्ब की सरशारी में कितने अरमाँ थे जो अब याद नहीं, दिल में हर वक़्त चुभन रहती थी थी मुझे किस की तलब याद नहीं, वो सितारा थी कि शबनम थी कि फूल एक सूरत थी अजब याद नहीं, कैसी वीराँ है गुज़र गाह ए ख़याल जब से वो आरिज़ ओ लब याद नहीं, भूलते जाते हैं माज़ी के दयार याद आएँ भी तो सब याद नहीं, ऐसा उलझा हूँ ग़म ए दुनिया में एक भी ख़्वाब ए तरब याद नहीं, रिश्ता ए जाँ था कभी - [गली गली मेरी याद बिछी है प्यारे रस्ता देख के चल](https://bazmeshayari.com/gali-gali-meri-yaad-bichhee-hai-pyare-rasta-dekh-ke-chal/): गली गली मेरी याद बिछी है प्यारे रस्ता देख के चल मुझ से इतनी वहशत है तो मेरी हदों से दूर निकल, एक समय तेरा फूल सा नाज़ुक हाथ था मेरे शानों पर एक ये वक़्त कि मैं तन्हा और दुख के काँटों का जंगल, याद है अब तक तुझ से बिछड़ने की वो अँधेरी शाम मुझे तू ख़ामोश खड़ा था लेकिन बातें करता था काजल, मैं तो एक नई दुनिया की धुन में भटकता फिरता हूँ मेरी तुझ से कैसे निभेगी एक हैं तेरे फ़िक्र ओ अमल, मेरा मुँह क्या देख रहा है देख इस काली रात को देख - [मुसलसल बेकली दिल को रही है](https://bazmeshayari.com/musalsal-bekali-dil-ko-rahi-hai/): मुसलसल बेकली दिल को रही है मगर जीने की सूरत तो रही है, मैं क्यूँ फिरता हूँ तन्हा मारा मारा ये बस्ती चैन से क्यूँ सो रही है ? चले दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर ये नगरी आज ख़ाली हो रही है, न समझो तुम इसे शोर ए बहाराँ ख़िज़ाँ पत्तों में छुप कर रो रही है, हमारे घर की दीवारों पे नासिर उदासी बाल खोले सो रही है..!! ~नासिर काज़मी फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए - [फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए](https://bazmeshayari.com/fir-sawan-rut-kee-pawan-chali-tum-yaad-aaye/): फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए फिर पत्तों की पाज़ेब बजी तुम याद आए, फिर कूजें बोलीं घास के हरे समुंदर में रुत आई पीले फूलों की तुम याद आए, फिर कागा बोला घर के सूने आँगन में फिर अमृत रस की बूँद पड़ी तुम याद आए, पहले तो मैं चीख़ के रोया और फिर हँसने लगा बादल गरजा बिजली चमकी तुम याद आए, दिन भर तो मैं दुनिया के धंदों में खोया रहा जब दीवारों से धूप ढली तुम याद आए..!! ~नासिर काज़मी क्या ज़माना था कि हम रोज़ मिला करते थे - [क्या ज़माना था कि हम रोज़ मिला करते थे](https://bazmeshayari.com/kya-zamana-tha-ki-hum-roz-mila-karte-the/): क्या ज़माना था कि हम रोज़ मिला करते थे रात भर चाँद के हमराह फिरा करते थे, जहाँ तन्हाइयाँ सर फोड़ के सो जाती हैं इन मकानों में अजब लोग रहा करते थे, कर दिया आज ज़माने ने उन्हें भी मजबूर कभी ये लोग मेरे दुख की दवा करते थे, देख कर जो हमें चुप चाप गुज़र जाता है कभी उस शख़्स को हम प्यार किया करते थे, इत्तिफ़ाक़ात ए ज़माना भी अजब हैं नासिर आज वो देख रहे हैं जो सुना करते थे..!! ~नासिर काज़मी कुछ यादगार ए शहर ए सितमगर ही ले चलें - [कुछ यादगार ए शहर ए सितमगर ही ले चलें](https://bazmeshayari.com/kuch-yaadgaar-e-shahar-e-sitamgar-hi-le-chale/): कुछ यादगार ए शहर ए सितमगर ही ले चलें आए हैं इस गली में तो पत्थर ही ले चलें, यूँ किस तरह कटेगा कड़ी धूप का सफ़र सर पर ख़याल ए यार की चादर ही ले चलें, रंज ए सफ़र की कोई निशानी तो पास हो थोड़ी सी ख़ाक ए कूचा ए दिलबर ही ले चलें, ये कह के छेड़ती है हमें दिल गिरफ़्तगी घबरा गए हैं आप तो बाहर ही ले चलें, इस शहर ए बे चराग़ में जाएगी तू कहाँ आ ऐ शब ए फ़िराक़ तुझे घर ही ले चलें..!! ~नासिर काज़मी वो दिलनवाज़ है लेकिन नज़र शनास - [वो दिलनवाज़ है लेकिन नज़र शनास नहीं](https://bazmeshayari.com/wo-dilnawaz-hai-lekin-nazar-shanas-nahin/): वो दिलनवाज़ है लेकिन नज़र शनास नहीं मेरा इलाज मेरे चारागर के पास नहीं, तड़प रहे हैं ज़बाँ पर कई सवाल मगर मेरे लिए कोई शायान ए इल्तिमास नहीं, तेरे जिलौ में भी दिल काँप काँप उठता है मेरे मिज़ाज को आसूदगी भी रास नहीं, कभी कभी जो तेरे क़ुर्ब में गुज़ारे थे अब उन दिनों का तसव्वुर भी मेरे पास नहीं, गुज़र रहे हैं अजब मरहलों से दीदा ओ दिल सहर की आस तो है ज़िंदगी की आस नहीं, मुझे ये डर है तेरी आरज़ू न मिट जाए बहुत दिनों से तबीअ’त मेरी उदास नहीं..!! ~नासिर काज़मी दिल के - [दिल के तातार में यादों के अब आहू भी नहीं](https://bazmeshayari.com/dil-ke-tatar-me-yaadon-ke-ab-aahoo/): दिल के तातार में यादों के अब आहू भी नहीं आईना माँगे जो हम से वो परी रू भी नहीं, दश्त ए तन्हाई में आवाज़ के घुँगरू भी नहीं और ऐसा भी कि सन्नाटे का जादू भी नहीं, ज़िंदगी जिन की रिफ़ाक़त पे बहुत नाज़ाँ थी उन से बिछड़ी तो कोई आँख में आँसू भी नहीं, चाहते हैं रह ए मयख़ाना न क़दमों को मिले लेकिन इस शोख़ी ए रफ़्तार पे क़ाबू भी नहीं, तल्ख़ियाँ नीम के पत्तों की मिली हैं हर सू ये मेरा शहर किसी फूल की ख़ुशबू भी नहीं, जाने क्या सोच के हम रुक गए वीरानों - [हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे](https://bazmeshayari.com/hum-bichhad-ke-tum-se-baadal-kee-tarah/): हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे थक गए तो ख़्वाब की दहलीज़ पर सोते रहे, ज़िंदगी ने हाथ से ख़ंजर न रखा एक पल हम क़तील ए ग़म्ज़ा ओ नाज़ ए बुताँ होते रहे, लोक लहजे का सुहाना पन सुख़न की नग़्मगी शहर की आबादियों के शोर में खोते रहे, क्यूँ मता ए दिल के लुट जाने का कोई ग़म करे शहर ए दिल्ली में तो ऐसे वाक़िए होते रहे, सुर्ख़ियाँ अख़बार की गलियों में ग़ुल करती रहीं लोग अपने बंद कमरों में पड़े सोते रहे, महफ़िलों में हम रफ़ीक़ ओ राज़ दाँ समझे गए घर - [अपने घर के दर ओ दीवार को ऊँचा न करो](https://bazmeshayari.com/apne-ghar-ke-dar-o-deewar-ko-ooncha-na/): अपने घर के दर ओ दीवार को ऊँचा न करो इतना गहरा मेरी आवाज़ से पर्दा न करो, जो न एक बार भी चलते हुए मुड़ के देखें ऐसी मग़रूर तमन्नाओं का पीछा न करो, हो अगर साथ किसी शोख़ की ख़ुशबू ए बदन राह चलते हुए मह पारों को देखा न करो, कल न हो ये कि मकीनों को तरस जाए ये दिल दिल के आसेब का हर एक से चर्चा न करो, इश्क़ आसार ज़ुलेखाओं की इस बस्ती में साहिबो पाकी ए दामाँ पे भरोसा न करो..!! ~ज़ुबैर रिज़वी ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस - [ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ](https://bazmeshayari.com/gurub-e-shaam-hi-se-khud-ko-yun-mahsus/): ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ कि जैसे एक दिया हूँ और हवा की ज़द पे रखा हूँ, चमकती धूप तुम अपने ही दामन में न भर लेना मैं सारी रात पेड़ों की तरह बारिश में भीगा हूँ, ये किस आवाज़ का बोसा मिरे होंटों पे काँपा है मैं पिछली सब सदाओं की हलावत भूल बैठा हूँ, बिछड़ के तुम से मैं ने भी कोई साथी नहीं ढूँडा हुजूम ए रहगुज़र में दूर तक देखो अकेला हूँ, कोई टूटा हुआ रिश्ता न दामन से उलझ जाए तुम्हारे साथ पहली बार बाज़ारों में निकला हूँ, मैं - [बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो](https://bazmeshayari.com/bichhadte-daamno-me-phool-kee-kuch-pattiyan/): बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो तअल्लुक़ की गिराँबारी में थोड़ी नर्मियाँ रख दो, भटक जाती हैं तुम से दूर चेहरों के तआक़ुब में जो तुम चाहो मेरी आँखों पे अपनी उँगलियाँ रख दो, बरसते बादलों से घर का आँगन डूब तो जाए अभी कुछ देर काग़ज़ की बनी ये कश्तियाँ रख दो, धुआँ सिगरेट का बोतल का नशा सब दुश्मन ए जाँ हैं कोई कहता है अपने हाथ से ये तल्ख़ियाँ रख दो, बहुत अच्छा है यारो महफ़िलों में टूट कर मिलना कोई बढ़ती हुई दूरी भी अपने दरमियाँ रख दो, नुक़ूश ए ख़ाल ओ ख़द - [कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली](https://bazmeshayari.com/kabhi-khirad-se-kabhi-dil-se-dosti-kar-lee-2/): कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली न पूछ कैसे बसर हम ने ज़िंदगी कर ली, अँधेरी रात का मंज़र भी ख़ूब था लेकिन तुम आ गए तो चराग़ों में रौशनी कर ली, तुम्हारा जिस्म है जाड़ों का सर्द सन्नाटा हरारतों से कहाँ तुम ने दोस्ती कर ली, हुज़ूर ए दोस्त अजब हादिसा हुआ यारो हर एक हर्फ़ ए शिकायत ने ख़ुदकुशी कर ली, लिए फिरे हैं बहुत तुम को दिल की गलियों में इस एक बात पे दुनिया ने दुश्मनी कर ली, हर एक मोड़ पे ख़ंजर ब कफ़ थी तन्हाई ग़रीब ए शहर ने घबरा के - [मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना](https://bazmeshayari.com/mujhe-tum-shohraton-ke-darmiyaan-gumnam-likh-dena/): मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना जहाँ दरिया मिले बे आब मेरा नाम लिख देना, ये सारा हिज्र का मौसम ये सारी ख़ाना वीरानी इसे ऐ ज़िंदगी मेरे जुनूँ के नाम लिख देना, तुम अपने चाँद तारे कहकशाँ चाहे जिसे देना मेरी आँखों पे अपनी दीद की एक शाम लिख देना, मेरे अंदर पनाहें ढूँढती फिरती है ख़ामोशी लब ए गोया मेरे अंदर भी एक कोहराम लिख देना, वो मौसम जा चुका जिस में परिंदे चहचहाते थे अब इन पेड़ों की शाख़ों पर सुकूत ए शाम लिख देना, शबिस्तानों में लौ देते हुए कुंदन से जिस्मों पर हवा - [होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी](https://bazmeshayari.com/hoti-hai-tere-naam-se-wahshat-kabhi-kabhi/): होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी बरहम हुई है यूँ भी तबी’अत कभी कभी, ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़ ए इज़्तिराब मिलती है ज़िंदगी में ये राहत कभी कभी, तेरे करम से ऐ अलम ए हुस्न आफ़रीं दिल बन गया है दोस्त की ख़ल्वत कभी कभी, जोश ए जुनूँ में दर्द की तुग़्यानियों के साथ अश्कों में ढल गई तेरी सूरत कभी कभी, तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमइन न था गुज़री है मुझ पे ये भी क़यामत कभी कभी, कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था यूँ भी गुज़र गई शब ए फ़ुर्क़त कभी - [तेरे आने का धोका सा रहा है](https://bazmeshayari.com/tere-aane-ka-dhoka-saa-raha-hai/): तेरे आने का धोका सा रहा है दिया सा रात भर जलता रहा है, अजब है रात से आँखों का आलम ये दरिया रात भर चढ़ता रहा है, सुना है रात भर बरसा है बादल मगर वो शहर जो प्यासा रहा है, वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का जो पिछली रात से याद आ रहा है, किसे ढूँढोगे इन गलियों में नासिर चलो अब घर चलें दिन जा रहा है..!! ~नासिर काज़मी वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए - [वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए](https://bazmeshayari.com/wo-saahilo-pe-gaane-wale-kya-hue/): वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए ? वो सुब्ह आते आते रह गई कहाँ जो क़ाफ़िले थे आने वाले क्या हुए ? मैं उन की राह देखता हूँ रात भर वो रौशनी दिखाने वाले क्या हुए ? ये कौन लोग हैं मेरे इधर उधर वो दोस्ती निभाने वाले क्या हुए ? वो दिल में खुबने वाली आँखें क्या हुईं वो होंट मुस्कुराने वाले क्या हुए ? इमारतें तो जल के राख हो गईं इमारतें बनाने वाले क्या हुए ? अकेले घर से पूछती है बे कसी तेरा दिया जलाने वाले क्या हुए ? - [ये भी क्या शाम ए मुलाक़ात आई](https://bazmeshayari.com/ye-bhi-kya-shaam-e-mulaqaat-aayee/): ये भी क्या शाम ए मुलाक़ात आई लब पे मुश्किल से तेरी बात आई, सुब्ह से चुप हैं तेरे हिज्र नसीब हाए क्या होगा अगर रात आई, बस्तियाँ छोड़ के बरसे बादल किस क़यामत की ये बरसात आई, कोई जब मिल के हुआ था रुख़्सत दिल ए बेताब वही रात आई, साया ए ज़ुल्फ़ ए बुताँ में नासिर एक से एक नई रात आई..!! ~नासिर काज़मी हुस्न को दिल में छुपा कर देखो - [हुस्न को दिल में छुपा कर देखो](https://bazmeshayari.com/husn-ko-dil-me-chhupa-kar-dekho/): हुस्न को दिल में छुपा कर देखो ध्यान की शम्अ’ जला कर देखो, क्या ख़बर कोई दफ़ीना मिल जाए कोई दीवार गिरा कर देखो, फ़ाख़्ता चुप है बड़ी देर से क्यूँ सर्व की शाख़ हिला कर देखो, क्यूँ चमन छोड़ दिया ख़ुश्बू ने फूल के पास तो जा कर देखो, नहर क्यूँ सो गई चलते चलते कोई पत्थर ही गिरा कर देखो, दिल में बेताब हैं क्या क्या मंज़र कभी इस शहर में आ कर देखो, इन अँधेरों में किरन है कोई शब ए ज़ूद आँख उठा कर देखो..!! ~नासिर काज़मी ये रात तुम्हारी है चमकते रहो तारो - [ये रात तुम्हारी है चमकते रहो तारो](https://bazmeshayari.com/ye-raat-tumhari-hai-chamakate-raho-taaro/): ये रात तुम्हारी है चमकते रहो तारो वो आएँ न आएँ मगर उम्मीद न हारो, शायद किसी मंज़िल से कोई क़ाफ़िला आए आशुफ़्ता सरो सुब्ह तलक यूँही पुकारो, दिन भर तो चले अब ज़रा दम ले के चलेंगे ऐ हम सफ़रो आज यहीं रात गुज़ारो, ये आलम ए वहशत है तो कुछ हो ही रहेगा मंज़िल न सही सर किसी दीवार से मारो, ओझल हुए जाते हैं निगाहों से दो आलम तुम आज कहाँ हो ग़म ए फ़ुर्क़त के सहारो, खोया है उसे जिस का बदल कोई नहीं है ये बात मगर कौन सुने लाख पुकारो..!! ~नासिर काज़मी नए देस - [नए देस का रंग नया था](https://bazmeshayari.com/naye-des-ka-rang-naya-tha/): नए देस का रंग नया था धरती से आकाश मिला था, दूर के दरियाओं का सोना हरे समुंदर में गिरता था, चलती नदियाँ गाते नौके नोकों में एक शहर बसा था नौके ही में रैन बसेरा नौके ही में दिन कटता था, नौका ही बच्चों का झूला नौका ही पीरी का असा था, मछली जाल में तड़प रही थी नौका लहरों में उलझा था, हँसता पानी रोता पानी मुझ को आवाज़ें देता था, तेरे ध्यान की कश्ती ले कर मैं ने दरिया पार किया था..!! ~नासिर काज़मी कोई और है नहीं तो नहीं मे रू ब रू कोई और है - [कोई और है नहीं तो नहीं मे रू ब रू कोई और है](https://bazmeshayari.com/koi-aur-hai-nahi-to-nahi-me-ru-ba-ru-koi-aur-hai/): कोई और है नहीं तो नहीं मे रू ब रू कोई और है बड़ी देर मैं तुझे देख कर ये लगा कि तू कोई और है, ये गुनाहगारों की सर ज़मीं है बहिश्त से भी सिवा हसीं मगर इस दयार की ख़ाक में सबब ए नुमू कोई और है, जिसे ढूँढता हूँ गली गली वो है मेरे जैसा ही आदमी मगर आदमी के लिबास में वो फ़रिश्ता ख़ू कोई और है, कोई और शय है वो बे ख़बर जो शराब से भी है तेज़ तर मेरा मयकदा कहीं और है मेरा हम सुबू कोई और है..!! ~नासिर काज़मी ज़बाँ सुख़न - [ज़बाँ सुख़न को सुख़न बाँकपन को तरसेगा](https://bazmeshayari.com/zabaan-sukhan-ko-sukhan-baankpan-ko-tarsega/): ज़बाँ सुख़न को सुख़न बाँकपन को तरसेगा सुख़न कदा मेरी तर्ज़ ए सुख़न को तरसेगा, नए पियाले सही तेरे दौर में साक़ी ये दौर मेरी शराब ए कुहन को तरसेगा, मुझे तो ख़ैर वतन छोड़ कर अमाँ न मिली वतन भी मुझ से ग़रीब उल वतन को तरसेगा, इन्ही के दम से फ़रोज़ाँ हैं मिल्लतों के चराग़ ज़माना सुहबत ए अरबाब ए फ़न को तरसेगा, बदल सको तो बदल दो ये बाग़बाँ वर्ना ये बाग़ साया ए सर्व ओ समन को तरसेगा, हवा ए ज़ुल्म यही है तो देखना एक दिन ज़मीन पानी को सूरज किरन को तरसेगा..!! ~नासिर काज़मी - [मुमकिन नहीं मता ए सुख़न मुझ से छीन ले](https://bazmeshayari.com/mumkin-nahi-mataa-e-sukhan-mujh-se-chheen-le/): मुमकिन नहीं मता ए सुख़न मुझ से छीन ले गो बाग़बाँ ये कुंज ए चमन मुझ से छीन ले, गर एहतिराम ए रस्म ए वफ़ा है तो ऐ ख़ुदा ये एहतिराम ए रस्म ए कोहन मुझ से छीन ले, मंज़र दिल ओ निगाह के जब हो गए उदास ये बे फ़ज़ा इलाक़ा ए तन मुझ से छीन ले, गुल रेज़ मेरी नाला कशी से है शाख़ शाख़ गुलचीं का बस चले तो ये फ़न मुझ से छीन ले, सींची हैं दिल के ख़ून से मैं ने ये कियारियाँ किस की मजाल मेरा चमन मुझ से छीन ले..!! ~नासिर काज़मी फूल - [फूल ख़ुश्बू से जुदा है अब के](https://bazmeshayari.com/phool-khushboo-se-juda-hai-ab-ke/): फूल ख़ुश्बू से जुदा है अब के यारो ये कैसी हवा है अब के ? दोस्त बिछड़े हैं कई बार मगर ये नया दाग़ खुला है अब के, पत्तियाँ रोती हैं सर पीटती हैं क़त्ल ए गुल आम हुआ है अब के, शफ़क़ी हो गई दीवार ए ख़याल किस क़दर ख़ून बहा है अब के, मंज़र ए ज़ख़्म ए वफ़ा किस को दिखाएँ शहर में क़हत ए वफ़ा है अब के, वो तो फिर ग़ैर थे लेकिन यारो काम अपनों से पड़ा है अब के, क्या सुनें शोर ए बहाराँ नासिर हम ने कुछ और सुना है अब के..!! ~नासिर - [पत्थर का वो शहर भी क्या था](https://bazmeshayari.com/patthar-ka-wo-shahar-bhi-kya-tha/): पत्थर का वो शहर भी क्या था शहर के नीचे शहर बसा था, पेड़ भी पत्थर फूल भी पत्थर पत्ता पत्ता पत्थर का था, चाँद भी पत्थर झील भी पत्थर पानी भी पत्थर लगता था, लोग भी सारे पत्थर के थे रंग भी उन का पत्थर सा था, पत्थर का एक साँप सुनहरा काले पत्थर से लिपटा था, पत्थर की अंधी गलियों में मैं तुझे साथ लिए फिरता था, गूँगी वादी गूँज उठती थी जब कोई पत्थर गिरता था..!! ~नासिर काज़मी सुनाता है कोई भोली कहानी - [सुनाता है कोई भोली कहानी](https://bazmeshayari.com/sunaata-hai-koi-bholee-kahani/): सुनाता है कोई भोली कहानी महकते मीठे दरियाओं का पानी, यहाँ जंगल थे आबादी से पहले सुना है मैं ने लोगों की ज़बानी, यहाँ एक शहर था शहर ए निगाराँ न छोड़ी वक़्त ने इस की निशानी, मैं वो दिल हूँ दबिस्तान ए अलम का जिसे रोएगी बरसों शादमानी, तहय्युर ने उसे देखा है अक्सर ख़िरद कहती है जिस को ला मकानी, ख़यालों ही में अक्सर बैठे बैठे बसा लेता हूँ एक दुनिया सुहानी, हुजूम ए नश्शा ए फ़िक्र ए सुख़न में बदल जाते हैं लफ़्ज़ों के मआ’नी, बता ऐ ज़ुल्मत ए सहरा ए इम्काँ कहाँ होगा मेरे ख़्वाबों का - [साज़ ए हस्ती की सदा ग़ौर से सुन](https://bazmeshayari.com/saaz-e-hastee-kee-sadaa-gaur-se-sun/): साज़ ए हस्ती की सदा ग़ौर से सुन क्यूँ है ये शोर बपा ग़ौर से सुन, दिन के हंगामों को बे कार न जान शब के पर्दों में है क्या ग़ौर से सुन, चढ़ते सूरज की अदा को पहचान डूबते दिन की निदा ग़ौर से सुन, क्यूँ ठहर जाते हैं दरिया सर ए शाम रूह के तार हिला ग़ौर से सुन, यास की छाँव में सोने वाले जाग और शोर ज़रा ग़ौर से सुन, हर नफ़स दाम ए गिरफ़्तारी है नौ गिरफ़्तार ए बला ग़ौर से सुन, दिल तड़प उठता है क्यूँ आख़िर ए शब दो घड़ी कान लगा ग़ौर - [ख़्वाब में रात हम ने क्या देखा](https://bazmeshayari.com/khwaab-me-raat-hum-ne-kya-dekha/): ख़्वाब में रात हम ने क्या देखा आँख खुलते ही चाँद सा देखा, कियारियाँ धूल से अटी पाईं आशियाना जला हुआ देखा, फ़ाख़्ता सर निगूँ बबूलों में फूल को फूल से जुदा देखा, उस ने मंज़िल पे ला के छोड़ दिया उम्र भर जिस का रास्ता देखा, हम ने मोती समझ के चूम लिया संग रेज़ा जहाँ पड़ा देखा, कम नुमा हम भी हैं मगर प्यारे कोई तुझ सा न ख़ुद नुमा देखा..!! ~नासिर काज़मी बने बनाए हुए रास्तों पे जा निकले - [बने बनाए हुए रास्तों पे जा निकले](https://bazmeshayari.com/bane-banaaye-hue-rasto-pe-jaa-nikale/): बने बनाए हुए रास्तों पे जा निकले ये हमसफ़र मेरे कितने गुरेज़ पा निकले, चले थे और किसी रास्ते की धुन में मगर हम इत्तिफ़ाक़ से तेरी गली में आ निकले, ग़म ए फ़िराक़ में कुछ देर रो ही लेने दो बुख़ार कुछ तो दिल ए बे क़रार का निकले, नसीहतें हमें करते हैं तर्क ए उल्फ़त की ये ख़ैर ख़्वाह हमारे किधर से आ निकले ? ये ख़ामुशी तो रग ओ पै में रच गई नासिर वो नाला कर कि दिल ए संग से सदा निकले..!! ~नासिर काज़मी नसीब ए इश्क़ दिल ए बे क़रार भी तो नहीं - [नसीब ए इश्क़ दिल ए बे क़रार भी तो नहीं](https://bazmeshayari.com/naseeb-e-ishq-dil-e-be-qarar-bhi-to-nahi/): नसीब ए इश्क़ दिल ए बे क़रार भी तो नहीं बहुत दिनों से तेरा इंतिज़ार भी तो नहीं, तलाफ़ी ए सितम ए रोज़गार कौन करे ? तू हम सुख़न भी नहीं राज़ दार भी तो नहीं, ज़माना पुर्सिश ए ग़म भी करे तो क्या हासिल कि तेरा ग़म ग़म ए लैल ओ निहार भी तो नहीं, तेरी निगाह ए तग़ाफ़ुल को कौन समझाए ? कि अपने दिल पे मुझे इख़्तियार भी तो नहीं, तू ही बता कि तेरी ख़ामुशी को क्या समझूँ ? तेरी निगाह से कुछ आश्कार भी तो नहीं, वफ़ा नहीं न सही रस्म ओ राह क्या कम - [तेरी निगाह के जादू बिखरते जाते हैं](https://bazmeshayari.com/teri-nigaah-ke-jaadoo-bikharte-jaate-hain/): तेरी निगाह के जादू बिखरते जाते हैं जो ज़ख़्म दिल को मिले थे वो भरते जाते हैं, तेरे बग़ैर वो दिन भी गुज़र गए आख़िर तेरे बग़ैर ये दिन भी गुज़रते जाते हैं, लिए चलो मुझे दरिया ए शौक़ की मौजो कि हमसफ़र तो मेरे पार उतरते जाते हैं, तमाम उम्र जहाँ हँसते खेलते गुज़री अब उस गली में भी हम डरते डरते जाते हैं, मैं ख़्वाहिशों के घरौंदे बनाए जाता हूँ वो मेहनतें मेरी बर्बाद करते जाते हैं..!! ~नासिर काज़मी दफ़अ’तन दिल में किसी याद ने ली अंगड़ाई - [दफ़अ'तन दिल में किसी याद ने ली अंगड़ाई](https://bazmeshayari.com/dafaatan-dil-me-kisi-yaad-ne-lee-angdaaee/): दफ़अ’तन दिल में किसी याद ने ली अंगड़ाई इस ख़राबे में ये दीवार कहाँ से आई ? आज खुलने ही को था दर्द ए मोहब्बत का भरम वो तो कहिए कि अचानक ही तेरी याद आई, बस यूँ ही दिल को तवक़्क़ो सी है तुझ से वर्ना जानता हूँ कि मुक़द्दर है मेरा तन्हाई, नश्शा ए तल्ख़ी ए अय्याम उतरता ही नहीं तेरी नज़रों ने गुलाबी तो बहुत छलकाई, यूँ तो हर शख़्स अकेला है भरी दुनिया में फिर भी हर दिल के मुक़द्दर में नहीं तन्हाई, डूबते चाँद पे रोई हैं हज़ारों आँखें मैं तो रोया भी नहीं तुम - [कारवाँ सुस्त राहबर ख़ामोश](https://bazmeshayari.com/kaarwaan-sust-raahbar-khamosh/): कारवाँ सुस्त राहबर ख़ामोश कैसे गुज़रेगा ये सफ़र ख़ामोश, तुझे कहना है कुछ मगर ख़ामोश देख और देख कर गुज़र ख़ामोश, यूँ तेरे रास्ते में बैठा हूँ जैसे एक शम ए रहगुज़र ख़ामोश, तू जहाँ एक बार आया था एक मुद्दत से है वो घर ख़ामोश, उस गली के गुज़रने वालों को तकते रहते हैं बाम ओ दर ख़ामोश, उठ गए कैसे कैसे प्यारे लोग हो गए कैसे कैसे घर ख़ामोश, ये ज़मीं किस के इंतिज़ार में है क्या ख़बर क्यूँ है ये नगर ख़ामोश, शहर सोता है रात जाती है कोई तूफ़ाँ है पर्दा दर ख़ामोश, अब के बेड़ा - [ये शब ये ख़याल ओ ख़्वाब तेरे](https://bazmeshayari.com/ye-shab-ye-khyaal-o-khwab-tere/): ये शब ये ख़याल ओ ख़्वाब तेरे क्या फूल खिले हैं मुँह अँधेरे, शोले में है एक रंग तेरा बाक़ी हैं तमाम रंग मेरे, आँखों में छुपाए फिर रहा हूँ यादों के बुझे हुए सवेरे, देते हैं सुराग़ फ़स्ल ए गुल का शाख़ों पे जले हुए बसेरे, मंज़िल न मिली तो क़ाफ़िलों ने रस्ते में जमा लिए हैं डेरे, जंगल में हुई है शाम हम को बस्ती से चले थे मुँह अँधेरे, रूदाद ए सफ़र न छेड़ नासिर फिर अश्क न थम सकेंगे मेरे..!! ~नासिर काज़मी किसी का दर्द हो दिल बे क़रार अपना है - [किसी का दर्द हो दिल बे क़रार अपना है](https://bazmeshayari.com/kisi-ka-dard-ho-dil-be-qarar-apna-hai/): किसी का दर्द हो दिल बे क़रार अपना है हवा कहीं की हो सीना फ़िगार अपना है, हो कोई फ़स्ल मगर ज़ख़्म खुल ही जाते हैं सदा बहार दिल ए दाग़ दार अपना है, बला से हम न पिएँ मय कदा तो गर्म हुआ ब क़द्र ए तिश्नगी रंज ए ख़ुमार अपना है, जो शाद फिरते थे कल आज छुप के रोते हैं हज़ार शुक्र ग़म ए पाएदार अपना है, इसी लिए यहाँ कुछ लोग हम से जलते हैं कि जी जलाने में क्यूँ इख़्तियार अपना है, न तंग कर दिल ए महज़ूँ को ऐ ग़म ए दुनिया ख़ुदाई भर - [इन सहमे हुए शहरों की फ़ज़ा कुछ कहती है](https://bazmeshayari.com/in-sahme-hue-shaharon-kee-fazaa-kuch-kahti-hai/): इन सहमे हुए शहरों की फ़ज़ा कुछ कहती है कभी तुम भी सुनो ये धरती क्या कुछ कहती है, ये ठिठुरी हुई लम्बी रातें कुछ पूछती हैं ये ख़ामोशी आवाज़ नुमा कुछ कहती है, सब अपने घरों में लम्बी तान के सोते हैं और दूर कहीं कोयल की सदा कुछ कहती है, जब रात को तारे बारी बारी जागते हैं कई डूबे हुए तारों की निदा कुछ कहती है, कभी भोर भए कभी शाम पड़े कभी रात गए हर आन बदलती रुत की हवा कुछ कहती है, मेहमान हैं हम मेहमान सरा है ये नगरी मेहमानों को मेहमान सरा कुछ - [जब ज़रा तेज़ हवा होती है](https://bazmeshayari.com/jab-zara-tez-hawa-hoti-hai/): जब ज़रा तेज़ हवा होती है कैसी सुनसान फ़ज़ा होती है, हम ने देखे हैं वो सन्नाटे भी जब हर एक साँस सदा होती है, दिल का ये हाल हुआ तेरे बाद जैसे वीरान सरा होती है, रोना आता है हमें भी लेकिन इस में तौहीन ए वफ़ा होती है, मुँह अँधेरे कभी उठ कर देखो क्या तर ओ ताज़ा हवा होती है, अजनबी ध्यान की हर मौज के साथ किस क़दर तेज़ हवा होती है, ग़म के बे नूर गुज़रगाहों में एक किरन ज़ौक़ फ़ज़ा होती है, ग़म गुसार ए सफ़र ए राह ए वफ़ा मिज़ा ए आबला पा - [सर में जब इश्क़ का सौदा न रहा](https://bazmeshayari.com/sar-me-jab-ishq-ka-sauda-na-raha/): सर में जब इश्क़ का सौदा न रहा क्या कहें ज़ीस्त में क्या क्या न रहा, अब तो दुनिया भी वो दुनिया न रही अब तेरा ध्यान भी उतना न रहा, क़िस्सा ए शौक़ सुनाऊँ किस को ? राज़दारी का ज़माना न रहा, ज़िंदगी जिस की तमन्ना में कटी वो मेरे हाल से बेगाना रहा, डेरे डाले हैं ख़िज़ाँ ने चौ देस गुल तो गुल बाग़ में काँटा न रहा, दिन दहाड़े ये लहू की होली ख़ल्क़ को ख़ौफ़ ख़ुदा का न रहा, अब तो सो जाओ सितम के मारो आसमाँ पर कोई तारा न रहा..!! ~नासिर काज़मी कल जिन्हें - [कल जिन्हें ज़िंदगी थी रास बहुत](https://bazmeshayari.com/kal-jinehn-zindagi-thee-raas-bahut/): कल जिन्हें ज़िंदगी थी रास बहुत आज देखा उन्हें उदास बहुत, रफ़्तगाँ का निशाँ नहीं मिलता एक रही है ज़मीन घास बहुत, क्यूँ न रोऊँ तेरी जुदाई में ? दिन गुज़ारे हैं तेरे पास बहुत, छाँव मिल जाए दामन ए गुल की है ग़रीबी में ये लिबास बहुत, वादी ए दिल में पाँव देख के रख है यहाँ दर्द की उगास बहुत, सूखे पत्तों को देख कर नासिर याद आती है गुल की बास बहुत..!! ~नासिर काज़मी दर्द कम होने लगा आओ कि कुछ रात कटे - [दर्द कम होने लगा आओ कि कुछ रात कटे](https://bazmeshayari.com/dard-kam-hone-laga-aao-ki-kuch-raat-kate/): दर्द कम होने लगा आओ कि कुछ रात कटे ग़म की मीआ’द बढ़ा जाओ कि कुछ रात कटे, हिज्र में आह ओ बुका रस्म ए कुहन है लेकिन आज ये रस्म ही दुहराओ कि कुछ रात कटे, यूँ तो तुम रौशनी ए क़ल्ब ओ नज़र हो लेकिन आज वो मो’जिज़ा दिखलाओ कि कुछ रात कटे, दिल दुखाता है वो मिल कर भी मगर आज की रात उसी बे दर्द को ले आओ कि कुछ रात कटे, दम घुटा जाता है अफ़्सुर्दा दिली से यारो कोई अफ़्वाह ही फैलाओ कि कुछ रात कटे, मैं भी बेकार हूँ और तुम भी हो - [यूँ तेरे हुस्न की तस्वीर ग़ज़ल में आए](https://bazmeshayari.com/yun-tere-husn-kee-tasveer-gazal-me-aaye/): यूँ तेरे हुस्न की तस्वीर ग़ज़ल में आए जैसे बिल्क़ीस सुलेमाँ के महल में आए, जब्र से एक हुआ ज़ाएक़ा ए हिज्र ओ विसाल अब कहाँ से वो मज़ा सब्र के फल में आए ? ये भी आराइश ए हस्ती का तक़ाज़ा था कि हम हल्क़ा ए फ़िक्र से मैदान ए अमल में आए, हर क़दम दस्त ओ गरेबाँ है यहाँ ख़ैर से शर हम भी किस मारका ए जंग ओ जदल में आए, ज़िंदगी जिन के तसव्वुर से जिला पाती थी हाए क्या लोग थे जो दाम ए अजल में आए..!! ~नासिर काज़मी तेरे मिलने को बेकल हो गए - [तेरे मिलने को बेकल हो गए हैं](https://bazmeshayari.com/tere-milne-ko-bekal-ho-gaye-hain/): तेरे मिलने को बेकल हो गए हैं मगर ये लोग पागल हो गए हैं, बहारें ले के आए थे जहाँ तुम वो घर सुनसान जंगल हो गए हैं, यहाँ तक बढ़ गए आलाम ए हस्ती कि दिल के हौसले शल हो गए हैं, कहाँ तक ताब लाए ना तवाँ दिल कि सदमे अब मुसलसल हो गए हैं, निगाह ए यास को नींद आ रही है मिज़ा पर अश्क बोझल हो गए हैं, उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना यहाँ जो हादसे कल हो गए हैं, जिन्हें हम देख कर जीते थे नासिर वो लोग आँखों से ओझल हो गए हैं..!! ~नासिर - [कब तलक मुद्दआ कहे कोई](https://bazmeshayari.com/kab-talak-muddaa-kahe-koee/): कब तलक मुद्दआ कहे कोई न सुनो तुम तो क्या कहे कोई ? ग़ैरत ए इश्क़ को क़ुबूल नहीं कि तुझे बेवफ़ा कहे कोई, मिन्नत ए ना ख़ुदा नहीं मंज़ूर चाहे उस को ख़ुदा कहे कोई, हर कोई अपने ग़म में है मसरूफ़ किस को दर्द आश्ना कहे कोई ? कौन अच्छा है इस ज़माने में क्यूँ किसी को बुरा कहे कोई ? कोई तो हक़ शनास हो यारब ज़ुल्म को ना रवाँ कहे कोई, वो न समझेंगे इन किनायों को जो कहे बरमला कहे कोई, आरज़ू है कि मेरा क़िस्सा ए शौक़ आज मेरे सिवा कहे कोई, जी में - [अव्वलीं चाँद ने क्या बात सुझाई मुझ को](https://bazmeshayari.com/avvalee-chaand-ne-kya-baat-sujhaaee-mujh-ko/): अव्वलीं चाँद ने क्या बात सुझाई मुझ को याद आई तेरी अंगुश्त ए हिनाई मुझ को, सर ए ऐवान ए तरब नग़्मा सरा था कोई रात भर उस ने तेरी याद दिलाई मुझ को, देखते देखते तारों का सफ़र ख़त्म हुआ सो गया चाँद मगर नींद न आई मुझ को, इन्ही आँखों ने दिखाए कई भरपूर जमाल इन्हीं आँखों ने शब ए हिज्र दिखाई मुझ को, साए की तरह मेरे साथ रहे रंज ओ अलम गर्दिश ए वक़्त कहीं रास न आई मुझ को, धूप इधर ढलती थी दिल डूबता जाता था इधर आज तक याद है वो शाम ए - [कुछ तो एहसास ए ज़ियाँ था पहले](https://bazmeshayari.com/kuch-to-ehsas-e-ziyaan-tha-pahle/): कुछ तो एहसास ए ज़ियाँ था पहले दिल का ये हाल कहाँ था पहले, अब तो झोंके से लरज़ उठता हूँ नश्शा ए ख़्वाब ए गिराँ था पहले, अब तो मंज़िल भी है ख़ुद गर्म ए सफ़र हर क़दम संग ए निशाँ था पहले, सफ़र ए शौक़ के फ़रसंग न पूछ वक़्त बे क़ैद मकाँ था पहले, ये अलग बात कि ग़म रास है अब उस में अंदेशा ए जाँ था पहले, यूँ न घबराए हुए फिरते थे दिल अजब कुंज ए अमाँ था पहले, अब भी तू पास नहीं है लेकिन इस क़दर दूर कहाँ था पहले ? डेरे - [याद आता है रोज़ ओ शब कोई](https://bazmeshayari.com/yaad-aata-hai-roz-o-shab-koi/): याद आता है रोज़ ओ शब कोई हम से रूठा है बे सबब कोई, लब ए जू छाँव में दरख़्तों की वो मुलाक़ात थी अजब कोई, जब तुझे पहली बार देखा था वो भी था मौसम ए तरब कोई, कुछ ख़बर ले कि तेरी महफ़िल से दूर बैठा है जाँ ब लब कोई, न ग़म ए ज़िंदगी न दर्द ए फ़िराक़ दिल में यूँही सी है तलब कोई, याद आती हैं दूर की बातें प्यार से देखता है जब कोई, चोट खाई है बार हा लेकिन आज तो दर्द है अजब कोई, जिन को मिटना था मिट चुके नासिर उन - [गली गली आबाद थी जिन से कहाँ गए वो लोग](https://bazmeshayari.com/gali-gali-aabaad-thi-jin-se-kahan-gaye-wo-log/): गली गली आबाद थी जिन से कहाँ गए वो लोग दिल्ली अब के ऐसी उजड़ी घर घर फैला सोग, सारा सारा दिन गलियों में फिरते हैं बेकार रातों उठ उठ कर रोते हैं इस नगरी के लोग, सहमे सहमे से बैठे हैं रागी और फ़नकार भोर भए अब इन गलियों में कौन सुनाए जोग, जब तक हम मसरूफ़ रहे ये दुनिया थी सुनसान दिन ढलते ही ध्यान में आए कैसे कैसे लोग ? नासिर हम को रात मिला था तन्हा और उदास वही पुरानी बातें उस की वही पुराना रोग..!! ~नासिर काज़मी भला कब मैं निशाने पर नहीं आया - [भला कब मैं निशाने पर नहीं आया](https://bazmeshayari.com/bhalaa-kab-main-nishaane-par-nahi-aaya/): भला कब मैं निशाने पर नहीं आया मेरे हाथों में पर पत्थर नहीं आया, मैं तौबा दोस्ती से कर तो लूँ लेकिन हमेशा पीठ पे ख़ंजर नहीं आया, कहीं ठहरे नहीं फिर भी शिकायत है सफ़र में ख़ुशनुमा मंज़र नहीं आया, निभाई है मोहब्बत उम्र-भर आतिश मोहब्बत में कभी अंतर नहीं आया..!! ~आतिश इंदौरी बहुत पेपर पे छपने हैं तो ठप्पा काट लेते हैं - [बहुत पेपर पे छपने हैं तो ठप्पा काट लेते हैं](https://bazmeshayari.com/bahut-paper-pe-chhapne-hai-to-thappa-kaat-lete-hain/): बहुत पेपर पे छपने हैं तो ठप्पा काट लेते हैं पिता जी मर गए हैं तो अँगूठा काट लेते हैं, मुकम्मल हो नहीं पाया वो हिस्सा काट लेते हैं कहानी से मोहब्बत वाला क़िस्सा काट लेते हैं, हमारे हाथ के पोरों पे कोई घाव क्या देता हमीं हैं वे जो नाख़ूनों को गहरा काट लेते हैं, मोहब्बत के महीने को अकेले जब निकाला है तुम्हारी ज़िंदगी से ये महीना काट लेते हैं..!! ~आतिश इंदौरी बे सबब ही इधर उधर जाता - [बे सबब ही इधर उधर जाता](https://bazmeshayari.com/be-sabab-hee-idhar-udhar-jaata/): बे सबब ही इधर उधर जाता तुम नहीं होते तो बिखर जाता, फूल की तरह तुम अगर खिलते इत्र की तरह मैं बिखर जाता, ख़्वाब देखे थे हर जगह हम ने छोड़ कर शहर ये किधर जाता, बात ये है कि ये जुदाई है हादिसा होता तो गुज़र जाता, फिर जुदा होना होता ना मुम्किन जिस्म में जिस्म गर उतर जाता..!! ~आतिश इंदौरी ख़ुदा के घर सड़क कोई नहीं जाती - [ख़ुदा के घर सड़क कोई नहीं जाती](https://bazmeshayari.com/khuda-ke-ghar-sadak-koi-nahi-jaati/): ख़ुदा के घर सड़क कोई नहीं जाती चलो पैदल वहाँ लॉरी नहीं जाती, चली जाती है हँसने और हँसाने से दवा खाने से बीमारी नहीं जाती, ज़ियादा सोचने से नींद जाती है मगर इस से परेशानी नहीं जाती, मुआ’फ़ी माँ ने दे दी ख़्वाब में आ कर मगर सर से पशेमानी नहीं जाती, उसे जाने दिया रोका नहीं मैं ने कभी उस की ये हैरानी नहीं जाती, मोहब्बत हो गई तो हो गई आतिश कभी ये वाली बीमारी नहीं जाती..!! ~आतिश इंदौरी सब पुराने ख़याल बदलो यार - [सब पुराने ख़याल बदलो यार](https://bazmeshayari.com/sab-puraane-khyaal-badlo-yaar/): सब पुराने ख़याल बदलो यार वक़्त बदला है साल बदलो यार, मात हर बार थोड़ी खाऊँगा वक़्त के साथ चाल बदलो यार, एक थप्पड़ अभी लगेगा और इस लिए अपना गाल बदलो यार, कर नहीं सकती मैं अभी शादी इस का मतलब सवाल बदलो यार, फिर से इस में नहीं फँसूँगा मैं इस लिए अपना जाल बदलो यार..!! ~आतिश इंदौरी कोशिशें कर लो मैं बादल नहीं होने वाला - [कोशिशें कर लो मैं बादल नहीं होने वाला](https://bazmeshayari.com/koshishe-kar-lo-main-badal-nahi-hone-wala/): कोशिशें कर लो मैं बादल नहीं होने वाला बरसों बे वज्ह यूँ पागल नहीं होने वाला, शर्त ये है कि हमारे ही तरह हो जाओ यार सोना हूँ मैं पीतल नहीं होने वाला, ख़्वाब टूटा तो नया ख़्वाब दिखाते क्यों हो ख़्वाब ये भी तो मुकम्मल नहीं होने वाला, चाहिए पेड़ उगाने के अलावा भी कुछ बाग़ पेड़ों से तो जंगल नहीं होने वाला..!! ~आतिश इंदौरी ख़ुद को बीमार मत किया कर यार - [ख़ुद को बीमार मत किया कर यार](https://bazmeshayari.com/khud-ko-bimar-mat-kiya-kar-yaar/): ख़ुद को बीमार मत किया कर यार डूब कर प्यार मत किया कर यार, जब मदद चाहे कोई ग़ैरत मंद तब तू इंकार मत किया कर यार, दिल को जाना जहाँ है जाने दो दिल से तकरार मत किया कर यार, ख़ुद के खाने के लाले पड़ जाएँ इतना उपकार मत किया कर यार..!! ~आतिश इंदौरी इश्क़ से दिल को ऊबा देखा - [इश्क़ से दिल को ऊबा देखा](https://bazmeshayari.com/ishq-se-dil-ko-ubaa-dekha/): इश्क़ से दिल को ऊबा देखा जिस्म का जब से सौदा देखा, भूका हम ने राजा देखा सागर को भी प्यासा देखा, दुनिया देखी कब बच्चों ने सी सी प्लस प्लस जावा देखा, उम्मीदें माँ बाप की देखीं बच्चों का जब बस्ता देखा, शाही पथ का लालच मत कर सच्चा रस्ता कच्चा देखा, बदल के देखा हम ने फिर भी राजा लेकिन बहरा देखा, तू प्यारा है क्यूँ कि मैं ने तुझ में अपना साया देखा, बात अगर चुभ जाए आतिश वार उस का फिर गहरा देखा..!! ~आतिश इंदौरी शजर जिस पे मैं रहता हूँ उसे काटा नहीं करता - [शजर जिस पे मैं रहता हूँ उसे काटा नहीं करता](https://bazmeshayari.com/shajar-jis-pe-main-rahta-hoon-use-kaata-nahi-karta/): शजर जिस पे मैं रहता हूँ उसे काटा नहीं करता मैं आतिश मुल्क से सपने में भी धोका नहीं करता, बनाते कैसे हैं मिट्टी से सोना मुझ को आता है मगर मैं दोस्तो ऐसा कोई दावा नहीं करता, भुला देते हैं लोग अक्सर मोहब्बत में किए वा’दे तभी तो जान मैं तुम से कोई वादा नहीं करता, मैं एक बूढ़ा शजर जिस को जवाँ रखा परिंदों ने तभी तो मैं परिंदों से कोई शिकवा नहीं करता, उड़ानें देखनी हैं गर तो मेरी शाइ’री देखो परिंदा हूँ मैं पर ऐसा कभी दावा नहीं करता..!! ~आतिश इंदौरी बात बच्चों की थी लड़ने - [बात बच्चों की थी लड़ने को सियाने निकले](https://bazmeshayari.com/baat-bachcho-kee-thi-ladne-ko-siyaane-nikale/): बात बच्चों की थी लड़ने को सियाने निकले फिर अजब क्या है कि बच्चे भी लड़ाके निकले, ध्यान माँ रखती थी मेरा वो ज़माने निकले हैं यूँ अब रोज़ सवेरे से कमाने निकले, आम के बाग़ से जब से हैं परिंदे ग़ाएब बा’द उस के कहाँ फिर आम रसीले निकले, पोटली जिस के लिए लड़ती रहीं औलादें माँ की उस पोटली में सिर्फ़ झरोके निकले, ये तो कलयुग है खरा इस में नहीं हैं कोई मुझ को शिकवा नहीं सिक्के मिरे खोटे निकले, फिर ग़रीबों की शिकायत का ख़ुदा हाफ़िज़ हैं जब वज़ीरों के अमीरों ही से रिश्ते निकले, गर्द - [उल्फ़तों का ख़ुदा नहीं हूँ मैं](https://bazmeshayari.com/ulfaton-ka-khuda-nahi-hoon-main/): उल्फ़तों का ख़ुदा नहीं हूँ मैं रंज ओ ग़म से जुदा नहीं हूँ मैं, एक अर्सा हुआ गए उस को अब तो उस का पता नहीं हूँ मैं, कलयुगी सोच से हूँ प्रदूषित कोई ताज़ा हवा नहीं हूँ मैं, ख़र्चों के बोझ ने कमर तोड़ी शौक़ से कुइ झुका नहीं हूँ मैं, बेवफ़ा बा वफ़ा नहीं होगा इश्क़ की कीमिया नहीं हूँ मैं, चंद सिक्के हैं लोगों की क़ीमत शुक्र है कि बिका नहीं हूँ मैं, धर्म और ज़ात की जकड़ ऐसी पर तो हैं पर उड़ा नहीं हूँ मैं..!! ~आतिश इंदौरी वो जिस पे तुम्हें शम ए सर ए - [दर्द से दिल ने वास्ता रखा](https://bazmeshayari.com/dard-se-dil-ne-vaasta-rakha/): दर्द से दिल ने वास्ता रखा वक़्त बदलेगा हौसला रखा, रो दिए मेरे हाल पे पंछी चुगने जब सिर्फ़ बाजरा रखा, मैं परिंदा बना हूँ जब से तू सरहदों से न वास्ता रखा, धोका अक्सर मिले है अपनों से अपनों से थोड़ा फ़ासला रखा, ताकि निकलें नहीं मेरे आँसू दर्द सहने का सिलसिला रखा, मंदिरों मस्जिदों में ढूँढे कौन इस लिए दिल में एक ख़ुदा रखा, तोड़ देते जो हौसला आतिश उन ख़यालों से फ़ासला रखा..!! ~आतिश इंदौरी दस्त ए मुनइम मेरी मेहनत का ख़रीदार सही - [दिल में है क्या अज़ाब कहे तो पता चले](https://bazmeshayari.com/dil-me-hai-kya-azaab-kahe-to-pata-chale/): दिल में है क्या अज़ाब कहे तो पता चले दीवार ख़ामोशी की ढहे तो पता चले, सब कुछ ही बाँटने को चली आती क्यूँ नदी ? उस की तरह से कोई बहे तो पता चले, बेटे तू जानता नहीं है माँ की अहमियत माँ की तरह तू दर्द सहे तो पता चले, कैसे बताए कोई जियो कैसे ज़िंदगी ? तू पंछियों के साथ रहे तो पता चले, पीने को पानी भी न हो रोटी की बात क्या नेता जी भूक तू यूँ सहे तो पता चले..!! ~आतिश इंदौरी सिखाएँ दस्त ए तलब को अदा ए बेबाकी - [क्या है ऊँचाई मोहब्बत की बताते जाओ](https://bazmeshayari.com/kya-hai-unchaaee-mohabbat-kee-batate-jaao/): क्या है ऊँचाई मोहब्बत की बताते जाओ पंछियों उड़ के यूँ ही ख़्वाब दिखाते जाओ, पेड़ पत्थर का जवाब आज भी देते फल से चोट खाओ भले पर रिश्ते निभाते जाओ, यूँ भी पैग़ाम मोहब्बत का पहुँच जाएगा साथ इंसाँ के परिंदों को बसाते जाओ, शहर में काम बहुत सारे समय लेकिन कम मत करो बात मगर हाथ हिलाते जाओ, एक दो मत भेद तो हर घर में हुआ करते हैं इन को नेता जी हवा मत दो बुझाते जाओ, गाँव में नाव थी काग़ज़ की सफ़र आसाँ था एक मुसाफ़िर हूँ यहाँ राह दिखाते जाओ, गालियाँ ऐसे ही दो - [काश मैं तुझ सा बेवफ़ा होता](https://bazmeshayari.com/kaash-main-tujh-saa-bewafa-hota/): काश मैं तुझ सा बेवफ़ा होता फिर मुझे तुझ से क्या गिला होता ? इश्क़ होता है क्या पता होता गर परिंदों से वास्ता होता, बोल के मुझ से गर जुदा होता मिलने जुलने का सिलसिला होता, यूँ हो कि घर बनाएँ दीवारें रात होते ही घर गया होता, बेवफ़ाई का सुर्ख़ रंग भी है इश्क़ में वर्ना क्या मज़ा होता ? ख़ुद पे गर इख़्तियार होता तो दूर मैं तुझ से जा चुका होता, हिस्से में आता सिर्फ़ अमीरों के इश्क़ पैसों में गर बिका होता..!! ~आतिश इंदौरी इस जादा ए उश्शाक़ की तक़दीर अजब है - [इस जादा ए उश्शाक़ की तक़दीर अजब है](https://bazmeshayari.com/is-jaada-e-ushshaaq-kee-taqdeer-azab-hai/): इस जादा ए उश्शाक़ की तक़दीर अजब है मुट्ठी में जहाँ पाँव में ज़ंजीर अजब है, बे वक़अत ओ कम माया सही ख़्वाब हमारे ख़्वाबों से अलग होने की ता’ज़ीर अजब है, मैं शे’र कहूँ और तेरे नाम पे रो दूँ ये रंज का पैरा ए दिलगीर अजब है, आँखों में बिछे सुरमई मख़मल की अदा और महमिल में फटे होंटों की तहक़ीर अजब है, हर ईंट मेरी नज़्म को देती है दिलासा ये कुंज ए ग़ज़ल सहन ए मज़ा मीर अजब है, दाग़ों की बहारों से मोअ’त्तर है कोई जिस्म और इस्म पढ़े जाने में ताख़ीर अजब है, ये - [गले से देर तलक लग के रोएँ अब्र ओ सहाब](https://bazmeshayari.com/gale-se-der-talak-lag-ke-royen-abr-o-sahaab/): गले से देर तलक लग के रोएँ अब्र ओ सहाब हटा दिए हैं ज़मान ओ मकाँ के हम ने हिजाब, लहद की मिट्टी की तक़दीर की अमान मैं दूँ सफ़ेद लट्ठे में कफ़ना के सुर्ख़ शाख़ ए गुलाब, मैं आसमान तेरे जिस्म पे बिछा देता मगर ये नील में चादर बनी नहीं कमख़ाब, तेरा वो रातों को उठ कर सिसक सिसक रोना लहू में नींद की टीसें पलक पे इज्ज़ के ख़्वाब, तेरे जलाए दियों में भड़कती आग का फेर ज़मीं की रेहल पे रक्खे न रौशनी की किताब, हवा बहिश्त के बाग़ों की ज़ुल्फ़ ज़ुल्फ़ फिरे तेरी लहद तेरे - [दस्त ए मुनइम मेरी मेहनत का ख़रीदार सही](https://bazmeshayari.com/dast-e-munaeem-meri-mehnat-ka-kharidar-sahi/): दस्त ए मुनइम मेरी मेहनत का ख़रीदार सही कोई दिन और मैं रुस्वा सर ए बाज़ार सही, फिर भी कहलाऊँगा आवारा ए गेसू ए बहार मैं तेरा दाम ए ख़िज़ाँ लाख गिरफ़्तार सही, जस्त करता हूँ तो लड़ जाती है मंज़िल से नज़र हाइल ए राह कोई और भी दीवार सही, ग़ैरत ए संग है साक़ी ये गुलू ए तिश्ना तेरे पैमाने में जो मौज है तलवार सही, मैं ने देखी देखी उसी में ग़म ए दौराँ की झलक बे ख़बर रंग ए जहाँ से निगह ए यार सही, उन से बिछड़े हुए मजरूह ज़माना गुज़रा अब भी होंटों में - [सिखाएँ दस्त ए तलब को अदा ए बेबाकी](https://bazmeshayari.com/sikhaayen-dast-e-talab-ko-adaa-e-babakee/): सिखाएँ दस्त ए तलब को अदा ए बेबाकी पयाम ए ज़ेर लबी को सला ए आम करें, ग़ुलाम रह चुके तोड़ें ये बंद ए रुस्वाई कुछ अपने बाज़ू ए मेहनत का एहतिराम करें, ज़मीं को मिल के सँवारें मिसाल ए रू ए निगार रुख़ ए निगार से रौशन चराग़ ए बाम करें, फिर उठ के गर्म करें कारोबार ए ज़ुल्फ़ ओ जुनूँ फिर अपने साथ उसे भी असीर ए दाम करें, मेरी निगाह में है अर्ज़ ए मास्को मजरूह वो सरज़मीं कि सितारे जिसे सलाम करें..!! ~मजरूह सुल्तानपुरी वो जिस पे तुम्हें शम ए सर ए रह का गुमाँ है - [वो जिस पे तुम्हें शम ए सर ए रह का गुमाँ है](https://bazmeshayari.com/wo-jis-pe-tumhen-sham-e-sar-e-rah-ka-gumaan-hai/): वो जिस पे तुम्हें शम ए सर ए रह का गुमाँ है वो शो’ला ए आवारा हमारी ही ज़बाँ है, अब हाथ हमारे है इनाँ रख़्श ए जुनूँ की अब सर पे हमारे कुलह ए संग ए बुताँ है, बस फेर के मुँह ख़ार क़दम खींच रहे थे देखा तो निहाँ क़ाफ़िला ए हम सफ़राँ है, चुभते ही बनी ख़ार सिफ़त पा ए ख़िज़ाँ में क्या कीजे बहुत हम को ग़म ए लाला रुख़ाँ है, काम आए बहुत लोग सर ए मक़्तल ए ज़ुल्मात ऐ रौशनी ए कूचा ए दिल दार कहाँ है, ऐ फ़स्ल ए जुनूँ हम को पए - [आबला पा कोई गुज़रा था जो पिछले सन में](https://bazmeshayari.com/aabla-paa-koi-guzaara-tha-jo-pichhle-san-me/): आबला पा कोई गुज़रा था जो पिछले सन में सुर्ख़ काँटों की बहार आई है अब के बन में, देखना रंग ए बदन यार के पैराहन में चाँदनी दूध सी छिटकी है मेरे आँगन में, देखना दीदावरो आमद ए तूफ़ान तो नहीं टपकी है दर्द की एक बूँद मेरे दामन में, मैं हम आग़ोश ए सनम था मगर ए पीर ए हरम ये शिकन कैसे पड़ी आप के पैरहन में, कुछ न कुछ आज असीरों ने कहा तो है ज़रूर एक एक गुल से लिपटती है सबा गुलशन में, सहल इतने भी नहीं ऐ सितम ईजाद कि हम थाम लेते - [जुनून ए दिल न सिर्फ़ इतना कि एक गुल पैरहन तक है](https://bazmeshayari.com/junun-e-dil-na-sirf-itna-ki-ek-gul-pairahan-tak-hai/): जुनून ए दिल न सिर्फ़ इतना कि एक गुल पैरहन तक है क़द ओ गेसू से अपना सिलसिला दार ओ रसन तक है, मगर ऐ हम-क़फ़स कहती है शोरीदा सरी अपनी ये रस्म ए क़ैद ओ ज़िंदाँ एक दीवार ए कुहन तक है, कहाँ बच कर चली ऐ फ़स्ल ए गुल मुझ आबला पा से मेरे क़दमों की गुलकारी बयाबाँ से चमन तक है, मैं क्या क्या जुरआ ए ख़ूँ पी गया पैमाना ए दिल में बला नोशी मेरी क्या एक मय ए साग़र शिकन तक है, न आख़िर कह सका उस से मेरा हाल ए दिल ए सोज़ाँ मह - [हों जो सारे दस्त ओ पा हैं ख़ूँ मैं नहलाए हुए](https://bazmeshayari.com/ho-jo-saare-dast-o-paa-hain-khoon-me-nahlaaye-hue/): हों जो सारे दस्त ओ पा हैं ख़ूँ मैं नहलाए हुए हम भी हैं ऐ दिल बहाराँ की क़सम खाए हुए, ख़ब्त है ऐ हमनशीं अक़्ल ए हरीफ़ान ए बहार है ख़िज़ाँ इन की इन्हें आईना दिखलाए हुए, क्या है ज़िक्र ए आतिश ओ आहन कि गद्दारान ए गूल मारते हैं हाथ अंगारों पे घबराए हुए, ज़िंदगी की क़द्र सीखी शुक्रिया तेग़ ए सितम हाँ हमें थे कल तलक जीने से उकताए हुए, सैर ए साहिल कर चुके ऐ मौज ए साहिल सर न मार तुझ से क्या बहलेंगे तूफ़ानों के बहलाए हुए, है यही एक कारोबार ए नग़्मा ओ - [जिस दम ये सुना है सुब्ह ए वतन महबूस फ़ज़ा ए ज़िंदाँ में](https://bazmeshayari.com/jis-dam-ye-suna-hai-subh-e-watan-mahbus-fazaa-e-zindaan-me/): जिस दम ये सुना है सुब्ह ए वतन महबूस फ़ज़ा ए ज़िंदाँ में जैसे कि सबा ऐ हम क़फ़सो बेताब हम आए ज़िंदाँ में, हो तेग़ ए असर ज़ंजीर ए क़दम फिर भी हैं नक़ीब ए मंज़िल हम ज़ख़्मों से चराग़ ए राहगुज़र बैठे हैं जलाए ज़िंदाँ में, सद चाक क़बा ए अम्न ओ सुकूँ उर्यां है अहिंसाई का जुनूँ कुछ ख़ूँ से शहीदों ने अपने वो गुल हैं खिलाए ज़िंदाँ में, ये जब्र ए सियासत ये इंसाँ मज़लूम आहें मजबूर फ़ुग़ाँ ज़ख़्मों की महक दाग़ों का धुआँ मत पूछ फ़ज़ा ए ज़िंदाँ में, ग़ैरों की ख़लिश अपनों की लगन - [मेरे पीछे ये तो मुहाल है कि ज़माना गर्म ए सफ़र न हो](https://bazmeshayari.com/mere-pichhe-ye-to-muhaal-hai-ki-zamana-garm-e-safar-na-ho/): मेरे पीछे ये तो मुहाल है कि ज़माना गर्म ए सफ़र न हो कि नहीं मेरा कोई नक़्श ए पा जो चिराग़ ए राहगुज़र न हो, रुख़ ए तेग़ से जो न हो कभी सहर ऐसी कोई नहीं मेरी नहीं ऐसी एक भी शाम जो तह ए ज़ुल्फ़ ए दार बसर न हो, मेरे हाथ हैं तो लूँगा ख़ुद मैं अब अपना साक़ी ए मयकदा ख़ुम ए ग़ैर से तो ख़ुदा करे लब ए जाम भी मेरा तर न हो, मैं हज़ार शक्ल बदल चुका चमन ए जहाँ में सुन ऐ सबा कि जो फूल है तेरे हाथ में ये - [दस्त ए पुर ख़ूँ को कफ़ ए दस्त ए निगाराँ समझे](https://bazmeshayari.com/dast-e-pur-khoon-ko-kaf-e-dast-e-nigaaraan-samjhe/): दस्त ए पुर ख़ूँ को कफ़ ए दस्त ए निगाराँ समझे क़त्ल गह थी जिसे हम महफ़िल ए याराँ समझे, कुछ भी दामन में नहीं ख़ार ए मलामत के सिवा ऐ जुनूँ हम भी किसे कू ए बहाराँ समझे, टूटे धागे ही से करते हैं रफ़ू चाक ए जिगर कौन बेचारगी ए सीना फ़िगाराँ समझे, हाँ वो बेदर्द तो बेगाना ही अच्छा यारो जो न तौक़ीर ए ग़म ए दर्द गुसाराँ समझे, ख़ंदा ज़न उस पे रहे हल्क़ा ए ज़ंजीर ए जुनूँ जो न कुछ मंज़िलत ए सिलसिला दाराँ समझे, आज से हम ने भी ज़ख़्मों को तबस्सुम जाना रज़्म - [मुझ से कहा जिब्रील ए जुनूँ ने ये भी वहइ ए इलाही है](https://bazmeshayari.com/mujh-se-kaha-zibreel-e-junoon-ne-ye-bhi-vahee-e-ilaahi-hai/): मुझ से कहा जिब्रील ए जुनूँ ने ये भी वहइ ए इलाही है मज़हब तो बस मज़हब ए दिल है बाक़ी सब गुमराही है, वो जो हुए फ़िरदौस बदर तक़्सीर थी वो आदम की मगर मेरा अज़ाब ए दर बदरी मेरी ना कर्दा गुनाही है, संग तो कोई बढ़ के उठाओ शाख़ ए समर कुछ दूर नहीं जिस को बुलंदी समझे हो इन हाथों की कोताही है, फिर कोई मंज़र फिर वही गर्दिश क्या कीजे ऐ कू ए निगार मेरे लिए ज़ंजीर ए गुलू मेरी आवारा-निगाही है, बहर ए ख़ुदा ख़ामोश रहो बस देखते जाओ अहल ए नज़र क्या लग़ज़ीदा - [ब नाम ए कूचा ए दिलदार गुल बरसे कि संग आए](https://bazmeshayari.com/ba-naam-e-koocha-e-dildar-gul-barse-ki-sang-aaye/): ब नाम ए कूचा ए दिलदार गुल बरसे कि संग आए हँसा है चाक ए पैराहन न क्यूँ चेहरे पे रंग आए ? बचाते फिरते आख़िर कब तलक दस्त ए अज़ीज़ाँ से उन्हीं को सौंप कर हम तो कुलाह ए नाम ओ नंग आए, हँसो मत अहल ए दिल अपनी सी जानो बज़्म ए ख़ूबाँ में चले आए इधर हम भी बहुत जब दिल से तंग आए, कहाँ सेहन ए चमन में बात कू ए सर फ़रोशाँ की इधर से सादा रू निकले उधर से लाला रंग आए, करो मजरूह तब दार ओ रसन के तज़्किरे हम से जब उस - [जल्वा ए गुल का सबब दीदा ए तर है कि नहीं](https://bazmeshayari.com/jalwa-e-gul-ka-sabab-deedaa-e-tar-hai-ki-nahi/): जल्वा ए गुल का सबब दीदा ए तर है कि नहीं मेरी आहों से बहाराँ की सहर है कि नहीं, राह ए गुम कर्दा हूँ कुछ उस को ख़बर है कि नहीं उस की पलकों पे सितारों का गुज़र है कि नहीं, दिल से मिलती तो है एक राह कहीं से आ कर सोचता हूँ ये तेरी राहगुज़र है कि नहीं, तेज़ हो दस्त ए सितम दे भी शराब ऐ साक़ी तेग़ गर्दन पे सही जाम सिपर है कि नहीं, मैं जो कहता था सो ऐ रहबर ए कोताह ख़िराम तेरी मंज़िल भी मेरी गर्द ए सफ़र है कि नहीं, - [अदा ए तूल ए सुख़न क्या वो इख़्तियार करे](https://bazmeshayari.com/adaa-e-tool-e-sukhan-kya-wo-ikhtiyaar-kare/): अदा ए तूल ए सुख़न क्या वो इख़्तियार करे जो अर्ज़ ए हाल ब तर्ज़ ए निगाह ए यार करे, बहुत ही तल्ख़ नवा हूँ मगर अज़ीज़ ए वतन मैं क्या करूँ जो तेरा दर्द बे क़रार करे, क़दम को फ़ैज़ ए जुनूँ से वो हौसला है नसीब जो ख़ार ए राह को भी शम ए रहगुज़ार करे, जगाएँ हम सफ़रों को उठाएँ परचम ए शौक़ न जाने कब हो सहर कौन इंतिज़ार करे ? मिसाल मिलती है कितनों की उस दिवाने से चमन से दूर जो बैठा ग़म ए बहार करे, दयार ए जौर में रस्ता है एक यही - [वो तो गया ये दीदा ए ख़ूँ बार देखिए](https://bazmeshayari.com/wo-to-gaya-ye-deeda-e-khoon-baar-dekhiye/): वो तो गया ये दीदा ए ख़ूँ बार देखिए दामन पे रंग ए पैरहन ए यार देखिए, दिखला के वो तो ले भी गया शोख़ी ए ख़िराम अब तक हैं रक़्स में दर ओ दीवार देखिए, उक्ता के हम ने तोड़ी थी ज़ंजीर ए नाम ओ नंग अब तक फ़ज़ा में है वही झंकार देखिए, सीने में छुप गया है तुलू ए सहर के साथ अब शाख़ ए दिल पे वो गुल ए रुख़्सार देखिए, बर्क़ ए तपीदा बाद ए सबा शोला और हम हैं कैसे कैसे उस के गिरफ़्तार देखिए, पहले भी तेज़ रौ थे पर उस दिल नशीं - [डरा के मौज ओ तलातुम से हम नशीनों को](https://bazmeshayari.com/dara-ke-mauj-o-talatum-se-hum-nasheeno/): डरा के मौज ओ तलातुम से हम नशीनों को यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को, जमाल ए सुब्ह दिया रू ए नौ बहार दिया मेरी निगाह भी देता ख़ुदा हसीनों को, हमारी राह में आए हज़ार मयख़ाने भुला सके न मगर होश के क़रीनों को, कभी नज़र भी उठाई न सू ए बादा ए नाब कभी चढ़ा गए पिघला के आबगीनों को, यही जहाँ है जहन्नम यही जहाँ फ़िरदौस बताओ आलम ए बाला के सैर बीनों को, हुए हैं क़ाफ़िले ज़ुल्मत की वादियों में रवाँ चराग़ ए राह किए ख़ूँ चकाँ जबीनों को, तुझे न माने कोई तुझ - [सब्ज़ हिकायत सुर्ख़ कहानी](https://bazmeshayari.com/sabz-hiqayat-surkh-kahani/): सब्ज़ हिकायत सुर्ख़ कहानी तेरे आँचल की मेहमानी, सहज सहज उस हुस्न का चलना उस पे अंधी शब तूफ़ानी, एक मिसरा वो जिस्म इकहरा दूजा मेरे लब दहक़ानी, जिल्द सुनहरी होंट पियाज़ी इस पे ख़्वाहिश की अर्ज़ानी, बालों का घनघोर अंधेरा उभरी ईंटों की हैरानी, पिंडली से टकराती पिंडली उतरन की फ़ित्ना सामानी, एक लड़की के दूपट्टे पर हम ने एक रुत है फैलानी, अंगूरों की बेल से शब भर बातें करती है वीरानी, पुश्त ये नील पड़े हों जैसे जलता है पाताल में पानी, दो जिस्मों की आँख अनोखी ख़्वाब और ख़्वाहिश की यकजानी, ओस के भाले रूह के - [कहानियों ने ज़रा खींच कर बदन अपने](https://bazmeshayari.com/kahaniyon-ne-zara-kheench-kar-badan-apne/): कहानियों ने ज़रा खींच कर बदन अपने हरम सरा से बुलाया हमें वतन अपने, खुले गले की क़मीसें खुले गले के फ़िराक़ ये लड़कियाँ हैं बदलती हैं पैरहन अपने, ग़दर के फूल सजाती हैं ऐसे बालों में सँभाल सकती हों जैसे भरे बदन अपने, अजब भड़क है शराबों की और आँखों की बला है हुस्न बिदकने लगे हैं बन अपने, पराए दर्द की ठिकरी से घर करें रौशन कि सिफ़्लगी की रियाज़त में हैं मगन अपने, ये इंकिसार के पुतले ये सीम ओ ज़र की सना ये मस्ख़रे हैं कि चोले में गोरकन अपने, हमें निकालो घरों की कमीन गाहों - [कँवल जो वो कनार ए आबजू न हो](https://bazmeshayari.com/kanval-jo-wo-kanaar-e-aabjoo-na-ho/): कँवल जो वो कनार ए आबजू न हो किसी भी अप्सरा से गुफ़्तुगू न हो, क़ज़ा हुआ है एक जिस्म ए बे तरह कहीं हमारी आँख बे वज़ू न हो, हथेलियों में भर के बात तो करें चराग़ को मुकालमे की ख़ू न हो, दमक रहा है केसरी हिजाब से इस आईने में कोई हू ब हू न हो, मैं क्या करूँगा रह के इस जहान में जहाँ पे एक ख़्वाब की नुमू न हो..!! ~आमिर सुहैल दिल यार का तख़्त हुआ ही नहीं - [दिल यार का तख़्त हुआ ही नहीं](https://bazmeshayari.com/dil-yaar-ka-takht-hua-hi-nahin/): दिल यार का तख़्त हुआ ही नहीं जीवन ख़ुश बख़्त हुआ ही नहीं, इसे तोड़ना भी तो नर्मी से ये दिल कभी सख़्त हुआ ही नहीं, आँखों ने बहुत इसरार किया सपना दो लख़्त हुआ ही नहीं, हम हँस कर उसे रुला देते वो और करख़्त हुआ ही नहीं, तुझ शहर तुझे हम आ मिलते कोई साज़ ओ रख़्त हुआ ही नहीं, हम छाँव बिछाते दूर तलक कोई हर्फ़ दरख़्त हुआ ही नहीं, मिट्टी के माधो रहे सदा हम सा कज बख़्त हुआ ही नहीं..!! ~आमिर सुहैल सिसकियों हिचकियों आहों की फ़रावानी में - [सिसकियों हिचकियों आहों की फ़रावानी में](https://bazmeshayari.com/siskiyon-hichkiyon-aahon-kee-farawani-me/): सिसकियों हिचकियों आहों की फ़रावानी में उलझनें कितनी हैं इस इश्क़ की आसानी में, ये तेरे बालों का तालाब की तह को छूना हालत ए ख़्वाब में या आलम ए उर्यानी में, बे हिजाबाना किसी लहर का तुझ तक आना फिर तिरे जिस्म का बह जाना घने पानी में, कहकशाओं का ग़ज़ालों का ग़ज़ल ज़ादों का दूर ओ नज़दीक से आना तेरी मेहमानी में, रात का झुकना तेरी पुश्त पे दिलदारी को बाग़ के पेड़ों का आ जाना रजज़ ख़्वानी में, बाम ओ दर देखते जाते हैं खड़े सकते में एक सितारे का तवारुद तेरी पेशानी में, मरमरीं उँगलियाँ एक - [ये तेरे हुस्न का आवेज़ा जो महताब नहीं](https://bazmeshayari.com/ye-tere-husn-ka-aaveza-jo-mahtab-nahin/): ये तेरे हुस्न का आवेज़ा जो महताब नहीं का’बा ए इश्क़ नहीं रौज़ा ए यक ख़्वाब नहीं, एक कोलाज़ बनाती है तेरी ख़ामोशी ख़त ए इंकार नहीं सूरत ए ईजाब नहीं, कोहर की रेहल पे और धुँद के जुज़दान में वो एक सहीफ़ा है कि जिस पर कोई एराब नहीं, एक कहानी के पस ओ पेश तेरी आहट है घास के कुंज नहीं काई के तालाब नहीं, तेरे पा पोश मेरा तकिया तेरा जिस्म ए हरम इस से ज़ियादा तो निगह वाक़िफ़ ए आदाब नहीं, आइनों की है कोई बाढ़ मिरे रस्ते में सद्द ए अफ़्लाक नहीं चादर ए अस्बाब - [सर को आवाज़ से वहशत ही सही](https://bazmeshayari.com/sar-ko-aawaz-se-wahshat-hi-sahi/): सर को आवाज़ से वहशत ही सही और वहशत में अज़िय्यत ही सही, ख़ाक ज़ादी तेरे उश्शाक़ बहुत मैं तेरी याद से ग़ारत ही सही, वो कहाँ हैं कि जो मस्लूब न थे मेरी मिट्टी में बग़ावत ही सही, आह ओ आहंग ओ इहानत के कनार ऐ मेरी प्यास पे तोहमत ही सही, ख़ुद से मीसाक़ ग़लत था मेरा ऐ तेरे ख़्वाब ज़रूरत ही सही, इश्क़ ऐ इश्क़ अज़ादार हूँ मैं दोश पे बार ए हज़ीमत ही सही, फिर किसी ख़्वाब की बैअ’त कर लें फिर किसी दुख की तिलावत ही सही, एक ख़्वाहिश कि जिसे सींच सकें राइगानी की - [लहू रगों में सँभाला नहीं गया मुझ से](https://bazmeshayari.com/lahoo-rago-me-sambhaala-nahi-gaya-mujh-se/): लहू रगों में सँभाला नहीं गया मुझ से किसी दिशा में उछाला नहीं गया मुझ से, सुडौल बाँहों में भरता मैं लोच सावन का वो संग मोम में ढाला नहीं गया मुझ से, मैं ख़्वाब पढ़ता था हमसायगी की अबजद से मगर वो हुस्न ख़याला नहीं गया मुझ से, वही है मेरे लहू में चमक उलूही सी समय उजालने वाला नहीं गया मुझ से, फ़िराक़ कहती थीं नेपाली नद्दियाँ आमिर मगर शिकोह ए हिमाला नहीं गया मुझ से..!! ~आमिर सुहैल लहू में रंग ए सुख़न उस का भर के देखते हैं - [लहू में रंग ए सुख़न उस का भर के देखते हैं](https://bazmeshayari.com/lahoo-me-rang-e-sukhan-us-ka-bhar-ke-dekhte-hain/): लहू में रंग ए सुख़न उस का भर के देखते हैं चराग़ बाम से जिस को उतर के देखते हैं, मुलाएमत है ग़ज़ल की सी उस की बातों में ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं, सहीफ़ा ए लब ओ रुख़्सार ओ पैरहन उस का तिलावतों में हैं पत्ते शजर के देखते हैं, बला के नामे हैं दो सीपयाई आँखों में गुरेज़ ओ गर्दिश ओ ग़म्ज़े नज़र के देखते हैं, बलाएँ लेते हुए हुस्न ए बे निहायत की तेरी तरफ़ तेरे उश्शाक़ डर के देखते हैं, चराग़ते हैं किसी नज़्म के घने अबरू किसी ग़ज़ल की जुदाई में - [ख्याल था कि तुझे पा के ख़ुद को ढूँढेंगे ](https://bazmeshayari.com/khyaal-tha-ki-tujhe-paa-ke-khud-ko-dhoondhenge/): ख्याल था कि तुझे पा के ख़ुद को ढूँढेंगे तू मिल गया है तो ख़ुद अपनी ज़ात से भी गए, बिछड़ के खत भी न लिखे उदास यारों ने कभी कभी की अधूरी सी बात से भी गए, वो शाख शाख लचकते हुए बदन मोहसिन मुझे तो मिल न सके तेरे हाथ से भी गए..!! ~अज्ञात आख़िर ग़म ए जानाँ को ऐ दिल बढ़ कर ग़म ए दौराँ होना था - [आख़िर ग़म ए जानाँ को ऐ दिल बढ़ कर ग़म ए दौराँ होना था](https://bazmeshayari.com/aakhir-gam-e-jaanaan-ko-ae-dil-badh-kar-gam-e-dauraan-hona-tha/): आख़िर ग़म ए जानाँ को ऐ दिल बढ़ कर ग़म ए दौराँ होना था इस क़तरे को बनना था दरिया इस मौज को तूफ़ाँ होना था, हर मोड़ पे मिल जाते हैं अभी फ़िरदौस ओ जिनाँ के शैदाई तुझ को तो अभी कुछ और हसीं ऐ आलम ए इम्काँ होना था, वो जिस के गुदाज़ ए मेहनत से पुर नूर शबिस्ताँ है तेरा ऐ शोख़ उसी बाज़ू पे तेरी ज़ुल्फ़ों को परेशाँ होना था, आती ही रही है गुलशन में अब के भी बहार आई है तो क्या है यूँ कि क़फ़स के गोशों से एलान ए बहाराँ होना था, - [जो समझाते भी आ कर वाइज़ ए बरहम तो क्या करते](https://bazmeshayari.com/jo-samjhaate-bhi-aa-kar-vaaieez-e-barham-to-kya-karte/): जो समझाते भी आ कर वाइज़ ए बरहम तो क्या करते हम इस दुनिया के आगे उस जहाँ का ग़म तो क्या करते ? हरम से मय कदे तक मंज़िल ए यक उम्र थी साक़ी सहारा गर न देती लग़्ज़िश ए पैहम तो क्या करते ? जो मिट्टी को मिज़ाज ए गुल अता कर दें वो ऐ वाइज़ ज़मीं से दूर फ़िक्र ए जन्नत ए आदम तो क्या करते ? सवाल उन का जवाब उन का सुकूत उन का ख़िताब उन का हम उन की अंजुमन में सर न करते ख़म तो क्या करते ? जहाँ मजरूह दिल के हौसले - [शिगाफ़ ए ख़ाना ए दिल से ही रौशनी आई](https://bazmeshayari.com/shigaaf-e-khana-e-dil-se-hi-raushni-aayi/): शिगाफ़ ए ख़ाना ए दिल से ही रौशनी आई उसे तो आना था हर हाल में चली आई, कहीं ख़ुदा न बने मुझ से ख़ौफ़ ए हिज्र ए अज़ीज़ कभी रुलाई कभी सोच के हँसी आई, उछल रही थीं बहुत मछलियाँ सी आँखों में जो डाला जाल तो खिंचती हुई नदी आई, हवा के हाथ जले एक दिया जलाने में वो सारी बस्ती जलाती हुई चली आई, वो अपने साथ कई साए ले के डूबेगा यही उमीद दर ए शम्स से लगी आई..!! ~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स जब शहर ए दिल में पड़ गए उस ज़र बदन के पाँव - [जब शहर ए दिल में पड़ गए उस ज़र बदन के पाँव](https://bazmeshayari.com/jab-shahar-e-dil-me-pad-gaye-us-zar-badan-ke-paanv/): जब शहर ए दिल में पड़ गए उस ज़र बदन के पाँव पड़ते नहीं ज़मीन पे अब इस चमन के पाँव, वो कौन आज रातों में घर से निकल पड़ा उठने लगे हैं शहर की सम्त आज बन के पाँव, लाओ तो धो दूँ अश्क से वो पाँव मैं ज़रा तेरी गली से आए हैं उस बरहमन के पाँव, कहता हूँ दिल में आने को आता नहीं है वो रखता नहीं है सिल पे वो अपने सनम के पाँव, आया तो दिल में बैठ गया बन के देवता उठे नहीं हैं इश्क़ ए दिल ए बुत शिकन के पाँव, इरफ़ान - [है ख़ुशी से किस तरह ग़म का ख़सारा देखिए](https://bazmeshayari.com/hai-khushi-se-kis-tarah-gam-ka-khasaara-dekhiye/): है ख़ुशी से किस तरह ग़म का ख़सारा देखिए आसमान ए यास पर उगता सितारा देखिए, आप गर चाहें तो ये जिंस ए वफ़ा भी आम हो रिश्ता ए मुबहम है अब एक इस्तिआरा देखिए, ये हिसार ए इश्क़ भी है एक हिसार ए ख़ुशनुमा ख़ुद चुना है गिर्द अपने ईंट गारा देखिए, था यक़ीन लंगड़ा उधर और प्यार अंधा था इधर पाँव लंगड़े को मिला अंधे को तारा देखिए, शम्स छुप सकता है जिस के एक इशारे से अगर चाँद भी हो सकता है फिर पारा पारा देखिए..!! ~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स जंगलों में जो ख़ुदा तितलियाँ महफ़ूज़ रखे - [जंगलों में जो ख़ुदा तितलियाँ महफ़ूज़ रखे](https://bazmeshayari.com/jungalon-me-jo-khuda-titliyan-mahfooz-rakhe/): जंगलों में जो ख़ुदा तितलियाँ महफ़ूज़ रखे तो ज़माने में वही लड़कियाँ महफ़ूज़ रखे, मैं ने एक फ़स्ल उगा रखी है दर्द ए दिल की मेरी आँखों में क़ज़ा बदलियाँ महफ़ूज़ रखे, बादबाँ खोल दिया हम ने फ़लक को कह दो आँधियाँ वाँधियाँ ये बिजलियाँ महफ़ूज़ रखे, दश्त ओ सहरा में रखे इश्क़ को ज़िंदा जो वो शहर के बीच में वीरानियाँ महफ़ूज़ रखे, जब क़फ़स दे ही दिया है मेरी क़िस्मत में तब वहशत ए इश्क़ से ये तीलियाँ महफ़ूज़ रखे..!! ~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स क्या अंधेरा है क्या उजाला है - [क्या अंधेरा है क्या उजाला है](https://bazmeshayari.com/kya-andhera-hai-kya-ujala-hai/): क्या अंधेरा है क्या उजाला है ये नज़रिये का बस हवाला है, रंग बस एक ही है दुनिया में इश्क़ ने हुस्न पर जो डाला है, रोज़ सूरज सहर में घर आए शाम को रोज़ घर निकाला है, हैं धनक में जो दिखते सातों रंग वो तबस्सुम ने तेरे डाला है, कौन खोलेगा दिल का वो कमरा नाम का तेरे जिस पे ताला है, ज़िंदगी की किताब का पन्ना एक उजला है एक काला है, शम्स कहती है जिस को ये दुनिया वो मेरे दिल का एक छाला है..!! ~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स सूरज उस के घर की कोई खिड़की है - [सूरज उस के घर की कोई खिड़की है](https://bazmeshayari.com/sooraj-us-ke-ghar-kee-koi-khidaki-hai/): सूरज उस के घर की कोई खिड़की है सुब्ह खुले तो शाम को बँद हो जाती है, नस्ल ए आदम जिस के पीछे है पागल दुनिया जन्नत से भागी एक लड़की है, इश्क़ भी फ़र्ज़ है तेरे इंसाँ होने का शादी भी सामाजिक ज़िम्मेदारी है, नीला दुपट्टा याद है क्या तुम को उस का आसमान के सीने पर जो भारी है, दिल से आँखों तक एक नद्दी है जिस में हर दम उल्टी गंगा बहती रहती है, दुनिया है एहसास का एक बेकल दरिया इश्क़ तो पार उतरने की तय्यारी है, आग लगी है दिल में फिर भी ग़म है - [हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए](https://bazmeshayari.com/hum-ne-kab-chaha-ki-wo-shakhs-humara-ho-jaaye/): हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए, हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए, तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए, है मोहब्बत भी अजब तर्ज़ ए तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए..!! ~यासिर ख़ान इनाम एक छोटा सा ख़्वाब था जो पूरा नहीं हुआ - [एक छोटा सा ख़्वाब था जो पूरा नहीं हुआ](https://bazmeshayari.com/ek-chhota-saa-khwab-tha-jo-poora-nahin-hua/): एक छोटा सा ख़्वाब था जो पूरा नहीं हुआ वो शख्स मेरा हो कर भी मेरा नहीं हुआ, आज भी ये याद करते हुए रोता हूँ क्यूँ किसी और का हुआ और मेरा नहीं हुआ ? यादें बहुत हसीन थी हमारे सफ़र की न जाने क्यूँ वो मेरा हमसफ़र नहीं हुआ ? बहुत कोशिश की के जी लूं उसके बगैर पर न जाने क्यूँ मुझ से सब्र नहीं हुआ..!! ~अज्ञात दार ओ रसन पे हर कोई मंसूर तो नहीं - [दार ओ रसन पे हर कोई मंसूर तो नहीं](https://bazmeshayari.com/daar-o-rasan-pe-har-koi-mansoor-to-nahin/): दार ओ रसन पे हर कोई मंसूर तो नहीं झुलसे हुए पहाड़ सभी तूर तो नहीं, ईसा नफ़स है इश्क़ अगर ये बताइए कि है कभी सलीब से वो दूर तो नहीं, हैं राहज़न ये साँसें मेरी क्या बताऊँ मैं फिर भी सफ़र हयात का मजबूर तो नहीं, ये रौशनी क़सीदा है तेरे ज़ुहूर का आँखों से दिख सके वो तिरा नूर तो नहीं, पत्थर गले में बाँध के दरिया में डूब जा ऐ शम्स तेरा इश्क़ उसे मंज़ूर तो नहीं..!! ~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स भटकता हूँ मगर खोया नहीं हूँ - [भटकता हूँ मगर खोया नहीं हूँ](https://bazmeshayari.com/bhatakta-hoon-magar-khoya-nahi-hoon/): भटकता हूँ मगर खोया नहीं हूँ बनाई राह पे चलता नहीं हूँ, मुझे रंगने की कोशिश मत करो तुम मैं माज़ी का कोई पन्ना नहीं हूँ, मुझे ही लोग खो देते हैं अक्सर किसी को मैं कभी खोता नहीं हूँ, मैं शामिल हूँ फ़क़ीरों की ख़ुशी में मैं सिक्का हूँ मगर खोटा नहीं हूँ, नहा लेता हूँ जा कर मयकदे में लहू से हाथ मैं धोता नहीं हूँ, ग़ज़ल के गाँव में सब हैं मुनाफ़िक़ किसी के घर मैं अब जाता नहीं हूँ, बिछा कर जिस्म की चादर वो बोला समझते हो जो तुम वैसा नहीं हूँ, मेरी क़ीमत गिरा - [वस्ल की आख़िरी मंज़िल है फ़ना हो जाना](https://bazmeshayari.com/vasl-kee-aakhiri-manzil-hai-fana-ho-jaana/): वस्ल की आख़िरी मंज़िल है फ़ना हो जाना तुझ से मिल कर तेरे बंदे का ख़ुदा हो जाना, शम्अ से मिल के ज़रा देख तो परवाने का रंग कितना मुश्किल है कोई फ़र्क़ ज़रा हो जाना, हम तो परछाई हैं बस इश्क़ की ऐ तेग़ ए वक़्त हम को काटे से भला इश्क़ का क्या हो जाना, ज़िंदगी को तो समझते हैं हम एक चाल तेरी मौत है इस का जवाब उस पे फ़िदा हो जाना, मुश्तरी ज़ोहरा ज़ुहल शम्स ओ हिलाल ओ मिर्रीख़ तेरे कूचे को है यूँ राह ए वफ़ा हो जाना..!! ~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स अपना तुम्हें बनाना - [अपना तुम्हें बनाना था कह कर बना लिया](https://bazmeshayari.com/apna-tumhen-banana-tha-kah-kar-bana-liya/): अपना तुम्हें बनाना था कह कर बना लिया तर्ज़ ए वफ़ा का एक नया दफ़्तर बना लिया, दुनिया को ग़म का दरिया कहा अहल ए इल्म ने हम ने तुम्हारी याद को गौहर बना लिया, हाथों में उस का हाथ लिया और इस तरह ख़ुद को रह ए वफ़ा का सिकंदर बना लिया, मेरे लहू में लम्स तेरा दौड़ता है यूँ सीना से दिल निकाल के सागर बना लिया, ठोकर लगा दी राह में जिस दर को आप ने उस दर को सब ने मील का पत्थर बना लिया, अहद ए विसाल उन से क़यामत के रोज़ था तो वक़्त - [मुझे यक़ीं है कोई रास्ता तो निकलेगा](https://bazmeshayari.com/mujhe-yaqeen-hai-koi-raasta-to-nikalega/): मुझे यक़ीं है कोई रास्ता तो निकलेगा अगर जो कुछ नहीं निकला ख़ुदा तो निकलेगा, मैं रेगज़ारों में दरिया तलाश करता हूँ मेरी तलाश से एक सिलसिला तो निकलेगा, किताब ए ज़ीस्त के पन्ने पलट रहा हूँ मैं किसी वरक़ से कोई फ़ल्सफ़ा तो निकलेगा, दिए दिखाते रहो दिन में ऐसे सूरज को जो उस के दिल में अंधेरा हुआ तो निकलेगा, ये सोच कर के चमन में लगा दी आग उस ने के इस में कोई परिंदा हुआ तो निकलेगा, सदाएँ देना मेरा काम है करूँगा मैं कोई पहाड़ मेरा हमनवा तो निकलेगा, मैं सारे शहर को ख़्वाबीदा छोड़ - [रस्सी तो जल गई मगर ऐंठन नहीं गई](https://bazmeshayari.com/rassi-to-jal-gayi-magar-aiethan-nahi-gayi/): रस्सी तो जल गई मगर ऐंठन नहीं गई चाहत तुम्हारी यूँ दम ए कुश्तन नहीं गई, तुम चाहते नहीं थे हमें फिर ये क्यों हुआ अब भी तुम्हारी आँखों की उलझन नहीं गई, करवट बदल के काटी थी हर शब तेरे बग़ैर आदत वो अब भी छोड़ के मदफ़न नहीं गई, सारी ख़ुदाई वैसे लगी तो रही मगर इस दिल से तेरी याद भी दुश्मन नहीं गई, एक बुत के इश्क़ में तू करे है ख़ुदा ख़ुदा ऐ शम्स तेरी ज़ात ए बरहमन नहीं गई..!! ~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स तुम से वाबस्ता है मेरी मौत मेरी ज़िंदगी - [बढ़ कर किसी से हाथ मिलाने नहीं गए](https://bazmeshayari.com/badh-kar-kisi-se-haath-milaane-nahi-gaye/): बढ़ कर किसी से हाथ मिलाने नहीं गए तेवर वही हैं अब भी पुराने नहीं गए, दालान अपनी छान के बैठे तमाम उम्र चक्कर किसी महल का लगाने नहीं गए, जब भी गए तो बैठ गए पाँव के तले ग़लती से भी बड़ों के सिरहाने नहीं गए, महफ़िल में तेरी शोर है मेरे ही नाम का जाने के बाद भी वो फ़साने नहीं गए, अपने हुनर से शम्स थे जुगनू थे जो भी थे फोटो किसी के साथ खिंचाने नहीं गए..!! ~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स दलाएल से ख़ुदा तक अक़्ल ए इंसानी नहीं जाती - [चुना था उन की मोहब्बत ने आज़मा के मुझे](https://bazmeshayari.com/chuna-tha-un-kee-mohabbat-ne-aazmaa-ke-mujhe/): चुना था उन की मोहब्बत ने आज़मा के मुझे सुपुर्द ए ख़ाक किया आदमी बना के मुझे, मैं अपने दिल में ख़ुद अपनी वफ़ा पे नादिम हूँ उन्हें ख़ुशी न हुई ख़ाक में मिला के मुझे, लगी में और लगाती है ख़ाक परवाना मआल ए सोज़ ए मोहब्बत दिखा दिखा के मुझे, ये मेरे दर्द ए तमन्ना की आज़माइश है क़फ़स में छोड़ दिया गुलसिताँ से ला के मुझे, वो बज़्म और मेरे बा’द जगमगा उट्ठी बहुत चराग़ जलाए गए बुझा के मुझे, नियाज़ मंद हूँ तौफ़ ए हरम भी कर लूँगा जो वक़्त मिल गया सज्दों से नक़्श ए - [शमअ से ये कह रही है ख़ाक ए परवाना अभी](https://bazmeshayari.com/shama-se-ye-kah-rahi-hai-khaaq-e-parwana-abhi/): शमअ से ये कह रही है ख़ाक ए परवाना अभी रात आख़िर हो गई बाक़ी है अफ़्साना अभी, ख़त्म हो जाएगी इस के बा’द तफ़्सीर ए हयात ज़िंदगी कहने को है एक और अफ़्साना अभी, बाल तो आ ही गया अब टूटने की देर है और एक सदमे का है मुहताज पैमाना अभी, क़ैद पीने की नहीं पी कर बहकना जुर्म है हम ने समझा ही नहीं दस्तूर ए मयख़ाना अभी, आज तो शायद थके हारों की मंज़िल आ गई और थोड़ी दूर चल ऐ अज़्म ए मर्दाना अभी, उस के हाथों से कहीं दामन छुड़ाया जाएगा तुम ने देखा - [मोहब्बत में शब ए तारीक ए हिज्राँ कौन देखेगा ?](https://bazmeshayari.com/mohabbat-me-shab-e-tareeq-e-hizraan-kaun-dekhega/): मोहब्बत में शब ए तारीक ए हिज्राँ कौन देखेगा हमीं देखेंगे ये ख़्वाब ए परेशाँ कौन देखेगा ? इन आँखों से तजल्ली को दरख़्शाँ कौन देखेगा उठा भी दो नक़ाब ए रू ए ताबाँ कौन देखेगा ? यही एक रात है बस काएनात ए ज़िंदगी अपनी सहर होती हुई ऐ शाम ए हिज्राँ कौन देखेगा ? चमन में गिर रही हैं बिजलियाँ शाख़ ए नशेमन पर यहाँ तक अपनी बर्बादी का सामाँ कौन देखेगा ? बसाना ही पड़ेगा एक न एक दिन ख़ाना ए दिल को बने फिरते हो यूसुफ़ शाम ए ज़िंदाँ कौन देखेगा ? हक़ीक़त में तक़ाज़ा भी - [मोहब्बत एहतिमाम ए दार भी है](https://bazmeshayari.com/mohabbat-ehtimam-e-daar-bhi-hai/): मोहब्बत एहतिमाम ए दार भी है मोहब्बत मिस्र का बाज़ार भी है, मोहब्बत मुस्तक़िल आज़ार भी है ये गुलशन वादी ए पुर ख़ार भी है, वो तूफ़ाँ जो डुबो देता है अक्सर इसी तूफ़ाँ से बेड़ा पार भी है, ख़ुदी की हद में है मजबूर इंसान ख़ुदी मिट जाए तो मुख़्तार भी है, हरीम ए दिल में भी है जल्वा फ़रमा मेरा यूसुफ़ सर ए बाज़ार भी है, न क्यों मर जाइए मरने से पहले यही होना मआल ए कार भी है, मेरा चाक ए गरेबाँ सीने वाले ये दिल में ज़ख़्म ए दामन दार भी है, ज़माने को शिकायत - [रुख़ हर एक तीर ए नज़र का है मेरे दिल की तरफ़](https://bazmeshayari.com/rukh-har-ek-teer-e-nazar-ka-hai-mere-dil-kee-taraf/): रुख़ हर एक तीर ए नज़र का है मेरे दिल की तरफ़ आने वाले आ रहे हैं अपनी मंज़िल की तरफ़, डूबने वाले की मायूसी पे दिल थर्रा गया किस निगाह ए यास से देखा था साहिल की तरफ़, सच है एक उजड़ी हुई दुनिया के क्या लैल ओ नहार तुम से भी अब तो न देखा जाएगा दिल की तरफ़, किस फ़सुर्दा-ख़ातिरी से रात भर जलती रही देर तक देखा किए हम शम ए महफ़िल की तरफ़, अपनी मर्ज़ी से नहीं अपने इरादे से नहीं हर मुसाफ़िर के क़दम उठते हैं मंज़िल की तरफ़, तुम को क्या मालूम क्या - [हज़ार रंज हो दिल लाख दर्द मंद रहे](https://bazmeshayari.com/hazar-ranj-ho-dil-laakh-dard-mand-rahe/): हज़ार रंज हो दिल लाख दर्द मंद रहे ख़याल पस्त न हो हौसला बुलंद रहे, ग़म ए फ़िराक़ में दिल क्यूँ न दर्द मंद रहे ? बहार आ के गई हम क़फ़स में बंद रहे, ख़ुदा की याद में दुनिया को भूल जा ऐ दिल वो काम कर कि हर एक तर्फ़ सूद मंद रहे, मिले कि कुछ न मिले माँगने से काम रखूँ तेरी जनाब में दस्त ए दु’आ बुलंद रहे, दिखाईं गर्दिश ए दौराँ ने सूरतें क्या क्या मगर मुझे तो अकेले तुम्हीं पसंद रहे, ग़ुरूर ए हुस्न उन्हें इन्किसार ए शेवा ए इश्क़ वो बे नियाज़ रहे - [दलाएल से ख़ुदा तक अक़्ल ए इंसानी नहीं जाती](https://bazmeshayari.com/dalayel-se-khuda-tak-aql-e-insani-nahin-jaati/): दलाएल से ख़ुदा तक अक़्ल ए इंसानी नहीं जाती वो एक ऐसी हक़ीक़त है जो पहचानी नहीं जाती, इसे तो राह में अरबाब ए हिम्मत छोड़ देते हैं किसी के साथ मंज़िल तक तन आसानी नहीं जाती, किसे मिलती हैं वो आँखें मोहब्बत में जो रोती हैं मुबारक हैं वो आँसू जिन की अर्ज़ानी नहीं जाती, उभरता ही नहीं दिल डूब कर बहर ए मोहब्बत में जब आ जाती है इस दरिया में तुग़्यानी नहीं जाती, गदाई में भी मुझ पर शान ए इस्तिग़ना बरसती है मेरे सर से हवा ए ताज ए सुल्तानी नहीं जाती, मुक़ीम ए दिल हैं - [तुम से वाबस्ता है मेरी मौत मेरी ज़िंदगी](https://bazmeshayari.com/tum-se-vabasta-hai-meri-maut-meri-zindagi/): तुम से वाबस्ता है मेरी मौत मेरी ज़िंदगी जिस्म से अपने कभी साया जुदा होता नहीं, इस तरह फ़रियाद करने को कलेजा चाहिए अब कोई गुलशन में मेरा हमनवा होता नहीं, वो मोहब्बत आफ़रीं देता है हस्ब ए ज़र्फ़ ए इश्क़ फिर किसी से भी तलबगार ए वफ़ा होता नहीं, एक तख़य्युल है कि जिस में महव है मेरा दिमाग़ एक तसव्वुर ये जो आँखों से जुदा होता नहीं, सई ए फ़हम ए ज़ात ए बारी और ये महदूद अक़्ल जिस का हासिल कुछ भी हैरत के सिवा होता नहीं, अशरफ़ उल मख़्लूक़ कहते हैं उसी मजबूर को जिस का - [ये तुझ से आश्ना दुनिया से बेगाने कहाँ जाते](https://bazmeshayari.com/ye-tujh-se-aashna-duniya-se-begaane-kahan-jaate/): ये तुझ से आश्ना दुनिया से बेगाने कहाँ जाते तेरे कूचे से उठते भी तो दीवाने कहाँ जाते, क़फ़स में भी मुझे सय्याद के हाथों से मिलते हैं मेरी तक़दीर के लिखे हुए दाने कहाँ जाते, न छोड़ा ज़ब्त ने दामन नहीं तो तेरे सौदाई हुजूम ए ग़म से घबरा कर ख़ुदा जाने कहाँ जाते, मैं अपने आँसुओं को कैसे दामन में छुपा लेता जो पलकों तक चले आए वो अफ़्साने कहाँ जाते, तुम्हारे नाम से मंसूब हो जाते हैं दीवाने ये अपने होश में होते तो पहचाने कहाँ जाते, अगर कोई हरीम ए नाज़ के पर्दे उठा देता तो - [ख़ुदा जब तक न चाहे आदमी से कुछ नहीं होता](https://bazmeshayari.com/khuda-jab-tak-na-chahe-aadmi-se-kuch-nahin-hota/): ख़ुदा जब तक न चाहे आदमी से कुछ नहीं होता मुझे मालूम है मेरी ख़ुशी से कुछ नहीं होता, मोहब्बत जज़्बा ए ईसार से परवान चढ़ती है ख़ुलूस ए दिल न हो तो दोस्ती से कुछ नहीं होता, वहाँ तेरा करम तेरा भरोसा काम आता है जहाँ मजबूर हो कर आदमी से कुछ नहीं होता, ज़िया ए शम्स भी मौजूद है नूर ए क़मर भी है बसीरत ही न हो तो रौशनी से कुछ नहीं होता, ग़रज़ तेरे सिवा हर एक को मजबूर पाता हूँ भरोसा जिस पे करता हूँ उसी से कुछ नहीं होता, ख़ुद अपने हाल से उलझे ## Pages - 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